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करोड़पति की मौत का इल्जाम आया पर लगा था, मगर नंगे पाँव अदालत पहुँची बेटी चिल्लाई, “मेरी आया को छोड़ दो, असली कातिल मेरी सौतेली माँ है”, और उसी पल विधवा का नकली शोक सभी के सामने चूर हो गया

PART 1

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“मेरी आया को छोड़ दो, उसने पापा को नहीं मारा… असली कातिल मेरी सौतेली माँ है!”

साकेत जिला अदालत की भारी लकड़ी की दरवाज़े अचानक धड़ाम से खुले और पूरी अदालत जैसे जम गई। काले कोट पहने वकील, पत्रकार, पुलिसवाले, दर्शक—सबने एक साथ मुड़कर देखा।

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दरवाज़े पर 8 साल की एक बच्ची खड़ी थी। उसके नंगे पैरों पर धूल लगी थी, गुलाबी फ्रॉक मिट्टी से सनी थी, बाल पसीने और आँसुओं से चेहरे से चिपके थे। वह हाँफ रही थी, लेकिन उसकी आँखों में ऐसा डर और साहस था जिसे देखकर अदालत में बैठे बड़े-बड़े लोग भी सन्न रह गए।

“नंदिनी दीदी ने कुछ नहीं किया!” वह रोते हुए आगे बढ़ी। “मेरी नंदिनी दीदी ने पापा को नहीं मारा!”

कटघरे में खड़ी नंदिनी मिश्रा के हाथों में हथकड़ी थी। 6 महीनों से वही हथकड़ी उसके शरीर पर नहीं, उसकी आत्मा पर लगी हुई थी। उस पर आरोप था कि उसने दिल्ली के बड़े उद्योगपति आर्यमान खन्ना की हत्या की थी—उस आदमी की, जिसकी बेटी की देखभाल उसने 5 साल तक अपनी छोटी बहन की तरह की थी।

नंदिनी ने बच्ची को देखा तो उसकी आँखों से आँसू बह निकले।

“अनाया…”

अनाया सीधे उसकी तरफ भागी, लेकिन 2 पुलिसकर्मियों ने उसे रोकना चाहा। बच्ची ने छूटकर पहली पंक्ति की ओर उंगली उठाई।

“वो है कातिल,” उसने काँपती आवाज़ में कहा। “रिया आंटी… नहीं, मेरी सौतेली माँ।”

पहली पंक्ति में बैठी रिया मल्होत्रा खन्ना का चेहरा सफेद पड़ गया। महँगी काली साड़ी, मोतियों की माला, हल्का मेकअप, आँखों में बनावटी नमी—वह पिछले 6 महीनों से चैनलों पर “टूटी हुई विधवा” बनकर रोती रही थी। लोग उसे दया से देखते थे। उसे न्याय की देवी कहते थे।

अब वही औरत पलक तक नहीं झपका पा रही थी।

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न्यायाधीश ने मेज़ पर हथौड़ा मारा।

“अदालत में शांति रखी जाए!”

लेकिन शांति अब संभव नहीं थी। पत्रकार खड़े हो गए। पीछे बैठे लोग फुसफुसाने लगे। सरकारी वकील के चेहरे पर झुंझलाहट थी, बचाव पक्ष का वकील स्तब्ध था।

अनाया नंदिनी तक पहुँची और उसकी हथकड़ी वाली उंगलियों को पकड़ लिया।

“मैंने देखा था,” बच्ची ने फूटते हुए कहा। “मैंने देखा था पापा के साथ क्या हुआ था।”

नंदिनी की साँस जैसे रुक गई।

6 महीने पहले खन्ना हाउस दक्षिण दिल्ली की सबसे चर्चित कोठियों में से एक था। संगमरमर की सीढ़ियाँ, शीशे की दीवारें, हर सुबह ताज़े गेंदा और गुलाब, पूजा के कमरे में चाँदी की घंटी, बाहर 3 गाड़ियाँ, अंदर दर्जनों नौकर। लेकिन अनाया के लिए उस बड़े घर में सिर्फ 1 जगह घर जैसी थी—नंदिनी की गोद।

अनाया की माँ की मृत्यु तब हो गई थी जब वह सिर्फ 3 साल की थी। आर्यमान काम में डूबा रहता था, पर बेटी से बहुत प्यार करता था। नंदिनी उसे स्कूल के लिए तैयार करती, बालों में दो चोटी बनाती, रात को दाल-चावल खिलाती, बुखार में पूरी रात उसके माथे पर पट्टी रखती।

फिर रिया आई।

वह सुंदर थी, पढ़ी-लिखी थी, आर्यमान के व्यापारिक समारोहों में आत्मविश्वास से मुस्कुराती थी। लेकिन आर्यमान के कमरे से बाहर जाते ही उसकी आवाज़ बदल जाती।

“एक आया को बेटी की माँ बनने का शौक है?” वह नंदिनी से कहती। “अपनी औकात मत भूलो।”

अनाया से वह और भी ठंडी रहती।

“रोना बंद करो। तुम्हारी माँ वापस नहीं आने वाली।”

आर्यमान को कुछ पता नहीं था। वह समझता था रिया घर संभाल रही है। समाज, रिश्तेदार, व्यापार मंडल—सब रिया की तारीफ़ करते थे। सिर्फ नंदिनी जानती थी कि उस मुस्कान के पीछे ज़हर छिपा है।

एक शाम आर्यमान अचानक जयपुर की यात्रा से 1 दिन पहले लौट आया। उसने सीढ़ियों के पास अनाया को रोते देखा। बच्ची के हाथ पर नीला निशान था।

“ये कैसे हुआ?” उसने पूछा।

अनाया ने रिया की तरफ देखा और चुप हो गई।

नंदिनी ने हिम्मत करके कहा, “साहब, बिटिया डरी हुई रहती है। मेमसाहब उसे कमरे में बंद कर देती हैं।”

रिया ने तुरंत आँसू निकाल लिए।

“आप अपनी नौकरानी की बात पर मुझ पर शक करेंगे?”

पहली बार आर्यमान का चेहरा कठोर हुआ।

उस रात स्टडी रूम में ऊँची आवाज़ें आईं। अनाया दरवाज़े की दरार के पीछे छिपी थी।

“मैं वसीयत बदल रहा हूँ,” आर्यमान ने कहा। “और कल सुबह अपने वकील से मिलकर तलाक की प्रक्रिया शुरू करूँगा।”

रिया की आवाज़ बर्फ जैसी ठंडी थी।

“तुम मुझे इतनी आसानी से बाहर नहीं कर सकते, आर्यमान।”

कुछ घंटों बाद आर्यमान अपने स्टडी रूम में मृत मिला। पास में बादाम वाला दूध का गिलास था। नंदिनी ने घबराहट में गिलास उठाया था, इसलिए उस पर उसकी उंगलियों के निशान मिले। रिया रोई, चिल्लाई, आरोप लगाया।

और सबने मान लिया कि गरीब आया ने लालच में मालिक को मार दिया।

अदालत में लौटकर अनाया ने अपनी फ्रॉक की छोटी जेब से एक पुराना मोबाइल निकाला। उस पर टूटे हुए मोरपंख वाले कवर की प्लास्टिक लटक रही थी।

“मेरे पास सबूत है,” उसने कहा।

रिया अचानक खड़ी हो गई।

“ये बच्ची सदमे में है। इसे किसी ने सिखाया है!”

अनाया ने मोबाइल छाती से चिपका लिया।

न्यायाधीश ने सख्त आवाज़ में कहा, “मोबाइल अदालत में पेश किया जाए।”

और जब स्क्रीन अदालत के सामने रखी गई, किसी को अंदाज़ा नहीं था कि अगले कुछ मिनटों में दिल्ली की सबसे ताकतवर विधवा का मुखौटा टूटने वाला था।

PART 2

मोबाइल अदालत के रिकॉर्ड सिस्टम से जोड़ा गया। स्क्रीन पर धुंधली, टेढ़ी छवि उभरी। जैसे फोन किसी किताबों की अलमारी के पीछे रखा हो।

सरकारी वकील तुरंत खड़ा हुआ।

“मान्यवर, यह सबूत पहले सूची में नहीं था।”

नंदिनी के वकील ने तीखी आवाज़ में कहा, “एक बच्ची अदालत में आकर हत्या की गवाह होने की बात कह रही है। इसे अनसुना करना न्याय का अपमान होगा।”

वीडियो चला।

स्टडी रूम दिख रहा था। मेज़ पर गिलास रखा था। आर्यमान कुर्सी पर बैठे थे, माथे पर पसीना था। सामने रिया खड़ी थी, लाल बनारसी नाइटगाउन में, बिना आँसू, बिना दुख, बिना मुखौटे।

“साइन कर दो,” रिया बोली। “बस इतनी सी बात है।”

आर्यमान ने काँपते हुए कहा, “मैं कुछ साइन नहीं करूँगा। कल तलाक होगा। अनाया मेरी सारी संपत्ति की वारिस रहेगी।”

रिया हँसी।

“तुम्हें लगता है कोई तुम्हारी बात मानेगा? सब कहेंगे पत्नी दुखी थी, आया लालची थी, बच्ची कल्पना कर रही थी।”

आर्यमान उठने की कोशिश में लड़खड़ाए।

“तुमने दूध में क्या मिलाया?”

वीडियो अचानक रुक गया।

अदालत में सन्नाटा टूटकर शोर में बदल गया।

न्यायाधीश ने पूछा, “और फाइलें हैं?”

अनाया ने सिर हिलाया। “हाँ… रिया ने उस रात मोबाइल छीन लिया था। मुझे स्टोर रूम में बंद कर दिया था। कल कमला काकी ने इसे पुराने खिलौनों में ढूँढा।”

नंदिनी का चेहरा तड़प उठा। “तुझे बंद किया था?”

अनाया रो पड़ी। “उन्होंने कहा था अगर मैंने सच बोला तो वो आपको हमेशा के लिए जेल में सड़ा देंगी। और मेरी बिल्ली मीशा को सड़क पर छोड़ देंगी।”

दूसरा वीडियो चला।

इस बार स्क्रीन लगभग अंधेरी थी, लेकिन आवाज़ साफ थी।

रिया बोली, “बस ऐसा लगे कि नंदिनी ने किया। गिलास उसने छुआ है। पुलिस को कहानी मिल जाएगी।”

एक मर्द की आवाज़ आई।

“मैंने कहा था बच्ची को मत डराओ। अगर बात बाहर गई तो मैं भी फँसूँगा।”

सबकी नज़रें जम गईं।

अनाया ने धीरे से उंगली उठाई।

“ये आवाज़… उनके वकील की है।”

और तभी स्क्रीन के शीशे में उस आदमी का चेहरा साफ चमक उठा।

PART 3

अदालत में बैठे लोग जैसे एक ही पल में साँस लेना भूल गए।

स्क्रीन पर दिखाई दिया चेहरा धुंधला था, लेकिन पहचानने के लिए काफी था। वह था देवेश भसीन—रिया का निजी वकील, खन्ना परिवार की कानूनी टीम का वरिष्ठ सलाहकार, वही आदमी जिसने पिछले 6 महीनों से टीवी चैनलों पर बैठकर कहा था कि “नंदिनी जैसी नौकरानियाँ अमीर घरों के भरोसे का फायदा उठाती हैं।”

देवेश सरकारी वकील के पीछे दूसरी पंक्ति में बैठा था। उसकी आँखें फैल गईं। उसने उठने की कोशिश की, लेकिन 2 पुलिसकर्मी तुरंत उसके पास पहुँच गए।

“यह फर्जी है!” देवेश चिल्लाया। “वीडियो एडिट किया गया है। एक बच्ची के खिलौने वाले फोन पर अदालत भरोसा करेगी?”

रिया ने उसकी तरफ देखा। उस नज़र में डर से ज्यादा नफरत थी, जैसे वह कह रही हो—चुप रहो।

पर अब बहुत देर हो चुकी थी।

न्यायाधीश ने आदेश दिया कि मोबाइल को तुरंत फॉरेंसिक जाँच के लिए जब्त किया जाए। साथ ही अदालत परिसर में मौजूद सभी संबंधित व्यक्तियों को बाहर जाने से रोक दिया गया। रिया ने अपनी साड़ी का पल्लू कसकर पकड़ा, लेकिन उसकी उंगलियाँ काँप रही थीं। जिस औरत ने 6 महीने तक कैमरों के सामने विधवा की करुणा बेची थी, वह अब भीड़ के सामने अपराध की गंध में भीग रही थी।

तभी अदालत के दरवाज़े पर एक और हलचल हुई।

एक दुबली-पतली औरत, सादे सूती सलवार-कुर्ते में, पुलिसकर्मी के साथ अंदर आई। उसके बालों में सफेदी थी, आँखों में नींदहीन रातों की थकान। यह कमला काकी थीं—खन्ना हाउस में 22 साल से काम कर रही पुरानी रसोइया।

उन्होंने हाथ जोड़कर न्यायाधीश से कहा, “मुझे भी कुछ कहना है, साहब।”

अदालत में फिर सन्नाटा फैल गया।

कमला काकी ने गवाही के कटघरे में खड़े होकर बताया कि आर्यमान की मौत से 3 हफ्ते पहले उन्होंने रिया को देवेश से फोन पर बात करते सुना था। बात वसीयत, बीमा, शेयर और एक ट्रस्ट की थी, जो आर्यमान अपनी बेटी अनाया के नाम करना चाहता था।

“मेमसाहब कह रही थीं,” कमला काकी ने काँपती आवाज़ में कहा, “कि अगर वसीयत बदल गई तो उनके हाथ में कुछ नहीं बचेगा। देवेश बाबू कह रहे थे कि कागज़ तैयार हैं, बस साहब के साइन चाहिए।”

रिया ने कुर्सी पकड़ ली।

कमला काकी ने आगे कहा, “जिस रात साहब की मौत हुई, मैंने स्टडी के बाथरूम में मेमसाहब को कुछ धोते देखा था। वो छोटी सी शीशी थी। उन्होंने मुझे देखकर दरवाज़ा बंद कर दिया। बाद में उन्होंने कहा—अगर मुँह खोला तो चोरी के केस में फँसा दूँगी। मेरी बेटी की शादी टूटवा दूँगी।”

नंदिनी की आँखें भर आईं। यह वही डर था जिसे गरीब लोग उम्र भर ढोते हैं—सच जानकर भी चुप रहना, क्योंकि अमीर के झूठ के सामने उनकी आवाज़ छोटी मान ली जाती है।

देवेश अचानक बेकाबू हो गया।

“चुप रहो, बुढ़िया! तुम्हें पैसे किसने दिए?”

उसकी आवाज़ अदालत की दीवारों से टकराई। उसी क्षण रिया के मुँह से फिसला—

“तुम्हें बोलना ही नहीं आता, देवेश।”

माइक्रोफोन चालू था।

हर किसी ने सुन लिया।

सरकारी वकील, जिसने अब तक नंदिनी को कठोर शब्दों में हत्यारी कहा था, पहली बार चुप हो गया। उसके चेहरे पर शर्म साफ थी। उसने न्यायाधीश से कहा कि मामले की दिशा बदल चुकी है और नई आपराधिक जाँच तुरंत शुरू होनी चाहिए।

न्यायाधीश ने कड़ा आदेश दिया।

नंदिनी की हथकड़ियाँ वहीं अदालत में खोली गईं।

जब लोहे की ठंडी पकड़ उसकी कलाइयों से हटी, तो नंदिनी कुछ पल अपने हाथों को देखती रह गई। 6 महीने तक उसे जेल की दीवारों ने नहीं, लोगों की नज़रों ने तोड़ा था। हर सुनवाई में उसे “लालची आया” कहा गया था। हर खबर में उसकी गरीबी को उसके अपराध का कारण बताया गया था।

लेकिन आज उसकी चुप्पी के बीच एक बच्ची की आवाज़ खड़ी थी।

अनाया दौड़कर उससे लिपट गई।

“दीदी, मुझे माफ कर दो,” वह सुबक रही थी। “मैं पहले क्यों नहीं भागी? मैंने पहले क्यों नहीं बताया?”

नंदिनी घुटनों के बल बैठ गई और उसे कसकर पकड़ लिया।

“पगली,” उसने रोते हुए कहा, “तूने मुझे नहीं, सच को बचाया है। तेरे पापा तुझ पर गर्व करेंगे।”

रिया यह दृश्य देख रही थी। उसकी आँखों में पछतावा नहीं था, सिर्फ हार थी। पुलिस ने उसके हाथों में हथकड़ी लगाई तो पहली बार उस महँगी साड़ी का पल्लू जमीन पर घिसट गया। पत्रकार, जो कभी उसके आँसू का क्लोज़अप लेते थे, अब उसके अपराध की तस्वीरें ले रहे थे।

“ये सब उस आया ने करवाया है,” रिया चीखी। “उसने बच्ची को भड़काया है!”

अनाया नंदिनी की बाँहों से अलग हुई। उसकी आवाज़ छोटी थी, पर अदालत के हर कोने तक पहुँची।

“झूठ बोलने से कोई माँ नहीं बन जाता।”

रिया चुप हो गई।

उस एक वाक्य ने उसके सारे बनावटी मातृत्व को नंगा कर दिया।

अगले 15 दिनों में मामले की परतें खुलती चली गईं। मोबाइल की जाँच में साबित हुआ कि वीडियो असली थे। उनमें कोई छेड़छाड़ नहीं थी। स्टडी रूम की पुरानी सजावटी घड़ी में लगा सुरक्षा कैमरा, जिसे रिया ने बंद समझा था, उसमें भी उस रात की कुछ धुंधली छवियाँ मिलीं। खन्ना हाउस के स्टोर रूम से दवाओं की खाली शीशी, देवेश के नाम पर किए गए 2 बड़े बैंक ट्रांसफर और आर्यमान के बदले हुए दस्तावेज़ मिले।

सबसे बड़ा सच तब सामने आया जब आर्यमान के पुराने वकील ने बयान दिया कि आर्यमान ने मौत से 1 दिन पहले उसे फोन करके कहा था—“मैं अपनी बेटी को सुरक्षित करना चाहता हूँ। रिया पर अब भरोसा नहीं रहा।”

रिया और देवेश के बीच सिर्फ कानूनी रिश्ता नहीं था। वे आर्यमान की संपत्ति पर कब्ज़ा करने की योजना बना रहे थे। आर्यमान की कंपनी के 38 प्रतिशत शेयर, गुरुग्राम की जमीन, बीमा की बड़ी रकम और अनाया के नाम बनने वाला ट्रस्ट—सब उनकी लालच की वजह थे।

नंदिनी पर आरोप लगाना आसान था। वह बनारस के पास के एक छोटे कस्बे से आई थी। पिता रिक्शा चलाते थे। माँ सिलाई करती थी। दिल्ली में लोगों के घरों में काम करते-करते उसने अपनी छोटी बहन की पढ़ाई कराई थी। अमीर समाज के लिए वह “परिवार जैसी” तब तक थी, जब तक चुप रहती थी। जैसे ही उसने अनाया के लिए आवाज़ उठाई, वह “नौकरानी” बन गई।

जेल में उसने बहुत कुछ सहा। गालियाँ, शक, अपमान। मगर हर रात वह सिर्फ अनाया को याद करती। उसे डर था कि उस बच्ची का क्या हो रहा होगा, जिसे रात में सोते समय अब भी माँ की पुरानी साड़ी पकड़कर नींद आती थी।

दूसरी ओर अनाया खन्ना हाउस में कैद जैसी जिंदगी जी रही थी। रिया ने स्कूल जाना बंद करा दिया, कहकर कि मीडिया से बचाना है। दादा-दादी को मिलने नहीं दिया। पुराने स्टाफ को निकाल दिया। मीशा, उसकी सफेद बिल्ली, को कई बार बाहर फिंकवा देने की धमकी दी। अनाया को समझाया गया कि अगर उसने मुँह खोला तो नंदिनी “जेल में मर जाएगी।”

लेकिन बच्चे सब भूलते नहीं। डर उनके भीतर बैठ जाता है, पर सच भी वहीं बैठा रहता है।

कमला काकी ने एक दिन स्टोर रूम में पुराने खिलौनों के डिब्बे में वह मोबाइल पाया। अनाया ने उसे महीनों पहले वहाँ छिपाया था। बैटरी खत्म थी, स्क्रीन टूटी थी, पर यादें बची थीं। जब कमला काकी ने चार्जर लगाकर वीडियो देखा, उनका शरीर काँप गया। उसी रात उन्होंने पीछे के गेट की चाबी छिपा ली।

सुनवाई वाले दिन सुबह रिया मंदिर जाने का नाटक करके घर से निकली। कमला काकी ने अनाया को पुराने दुपट्टे में मोबाइल बाँधकर दिया।

“भाग बिटिया,” उन्होंने कहा। “आज नहीं भागी तो सच मर जाएगा।”

अनाया नंगे पाँव भागी। गली, बाजार, ट्रैफिक, हॉर्न, धूप—सब पार करती हुई। एक चायवाले ने उसे पहचान लिया क्योंकि उसकी तस्वीर समाचारों में छपी थी। उसने ऑटो रोका। ड्राइवर ने जब सुना कि बच्ची अदालत जाना चाहती है, उसने पैसे लेने से मना कर दिया।

“बेटी, सच बोलना,” उसने कहा। “डरना मत।”

उसी सच ने अदालत की नींव हिला दी।

3 महीनों बाद नंदिनी को पूर्ण रूप से निर्दोष घोषित किया गया। न्यायालय ने पुलिस जाँच की प्रारंभिक लापरवाही पर भी टिप्पणी की। रिया और देवेश पर हत्या, साजिश, झूठे सबूत गढ़ने, गवाह को डराने और संपत्ति हड़पने की कोशिश के आरोप तय हुए।

खन्ना हाउस अब पहले जैसा नहीं रहा।

बड़े झूमर अब भी थे, संगमरमर अब भी चमकता था, पर घर की हवा बदल चुकी थी। वहाँ अब नकली रोने की आवाज़ नहीं गूँजती थी। आर्यमान की तस्वीर के पास रोज़ ताज़े फूल रखे जाते। अनाया के दादा-दादी लखनऊ से दिल्ली आ गए और अदालत से उसकी संरक्षकता उन्हें मिली।

नंदिनी चाहती तो अपने गाँव लौट जाती। वह चाहती तो इस शहर, इस अदालत, इस कोठी, इन यादों से दूर चली जाती। लेकिन अनाया ने एक दिन उसका दुपट्टा पकड़कर कहा—

“आप चली गईं तो घर फिर खाली हो जाएगा।”

नंदिनी ने नौकरी के रूप में वापस आने से मना कर दिया। दादा-दादी ने भी कहा कि वह अब कर्मचारी नहीं, परिवार है। उसके लिए घर के उसी हिस्से में कमरा तैयार किया गया जहाँ पहले अनाया की माँ का संगीत-कक्ष था। नंदिनी ने शर्त रखी कि वह अपनी पढ़ाई भी पूरी करेगी और अनाया की देखभाल भी करेगी। आर्यमान की कंपनी ने उसकी कानूनी लड़ाई के खर्च और जेल में हुए अन्याय के लिए मुआवजा दिया, पर नंदिनी ने उस पैसे का बड़ा हिस्सा गरीब घरेलू कामगारों की कानूनी सहायता के लिए एक छोटे ट्रस्ट में लगाया।

“कितनी नंदिनियाँ होंगी,” उसने एक दिन कहा, “जिनके लिए कोई अनाया अदालत में नहीं दौड़ती।”

अनाया धीरे-धीरे फिर स्कूल जाने लगी। शुरुआत में वह तेज आवाज़ से डर जाती थी। रात को दरवाज़ा बंद होने की आवाज़ सुनते ही रो पड़ती थी। लेकिन नंदिनी उसके बालों में तेल लगाती, दादी उसे कहानी सुनातीं, दादा आर्यमान की पुरानी बातें बताते। मीशा फिर उसके तकिए के पास सोने लगी।

एक शाम दिल्ली में हल्की बारिश हो रही थी। गुलमोहर के पेड़ से भीगे फूल गिर रहे थे। अनाया बगीचे में आर्यमान की तस्वीर लेकर बैठी थी। नंदिनी उसके पास आई।

“दीदी,” अनाया ने धीमे से पूछा, “क्या पापा मुझसे नाराज़ होंगे? मैं बहुत डर गई थी।”

नंदिनी ने उसका चेहरा अपनी हथेलियों में लिया।

“नहीं, बच्ची। जो डरते हुए भी सच बोलता है, उससे भगवान भी नाराज़ नहीं होते। तेरे पापा तो तुझ पर बहुत गर्व कर रहे होंगे।”

अनाया की आँखों से आँसू गिरे, पर इस बार उनमें सिर्फ दर्द नहीं था। उनमें राहत भी थी।

उस मामले की चर्चा पूरे देश में हुई। लोग समाचारों में बहस करते रहे। कोई कहता, एक बच्ची को अदालत तक पहुँचने की नौबत ही क्यों आई। कोई पूछता, अमीर घरों की चमक के पीछे कितनी आवाज़ें बंद कमरों में दबाई जाती हैं। कोई लिखता, गरीब औरत पर इल्ज़ाम लगाना आसान है क्योंकि समाज पहले ही उसे दोषी मानने को तैयार बैठा है।

लेकिन जिन्होंने उस दिन साकेत अदालत में वह दृश्य देखा था, वे कभी नहीं भूल पाए।

एक नंगे पाँव बच्ची, गुलाबी मिट्टी-सनी फ्रॉक, टूटे मोरपंख वाले मोबाइल, काँपती आवाज़ और सीधी उंगली।

कानून की बड़ी किताबों, काले कोटों और भारी शब्दों के बीच न्याय उस दिन किसी वकील की दलील बनकर नहीं आया था।

न्याय उस दिन एक डरी हुई बच्ची के रूप में दौड़ता हुआ आया था—जिसने रोते-रोते भी सच को मरने नहीं दिया।