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और कल की तारीख़ वाला एक मुद्रित मृत्यु प्रमाणपत्र।

और कल की तारीख़ वाला एक मुद्रित मृत्यु प्रमाणपत्र।

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कुछ सेकंड तक मैंने उसे छुआ तक नहीं।

मैं बस उसे घूरती रही।

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उस पर मेरा नाम काले अक्षरों में लिखा था।

अरुंधती रायचंद।

उम्र: 71 वर्ष।
मृत्यु का कारण: अचानक हृदयाघात।
मृत्यु का स्थान: निजी आवास, पुणे।
समय: सुबह 4:35 बजे।

कल।

मेरी मौत ऐसे तय कर दी गई थी जैसे दाँतों के डॉक्टर की अपॉइंटमेंट हो।

मेरे पैरों से ताक़त निकल गई, और मैंने मेज़ का किनारा कसकर पकड़ लिया। तहखाने में भीगे हुए कंक्रीट, पुरानी लकड़ी और ताज़ी प्रिंटर की स्याही की गंध फैली हुई थी। इस कमरे का इस्तेमाल वर्षों पहले नहीं किया गया था।

इसका इस्तेमाल हाल ही में हुआ था।

मेज़ पर मेरा पासपोर्ट खुला पड़ा था, वीज़ा वाले पन्ने पर।

उसके अंदर पेरिस का मेरा टिकट रखा हुआ था।

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वन-वे।

उसके बगल में एक मेडिकल फ़ाइल थी, जिस पर मेरा नाम, मेरी तस्वीर और पेशेवर आत्मविश्वास के साथ टाइप किए गए झूठ दर्ज थे।

धीरे-धीरे बढ़ती संज्ञानात्मक क्षमता में गिरावट।

भ्रम की आवर्ती अवस्थाएँ।

संदेहग्रस्त व्यवहार।

निगरानी में देखभाल की आवश्यकता।

उपचाररत चिकित्सक के हस्ताक्षर: डॉ. आर. सालुंखे।

मैं कभी डॉ. आर. सालुंखे से मिली ही नहीं थी।

मेरा दिल मेरी पसलियों से टकरा रहा था।

महीरांश मुझे सेवानिवृत्ति के लिए पेरिस नहीं ले जा रहा था।

वह मुझे इतनी देर के लिए भारत से बाहर ले जा रहा था कि मुझे मानसिक रूप से अयोग्य घोषित किया जा सके, मेरा घर बेचा जा सके, मेरा पैसा अपने नाम किया जा सके, और शायद वापस सिर्फ़ मेरी अस्थियाँ लाई जाएँ।

या शायद वह भी नहीं।

फिर मेरी नज़र आख़िरी फ़ाइल पर पड़ी।

संपत्ति हस्तांतरण विलेख।

खरीदार: हेलिओस अर्बन रीडेवलपर्स।

राशि: ₹9.8 करोड़।

विक्रेता: अरुंधती रायचंद।

सहमति सत्यापित।

चिकित्सकीय रूप से सक्षम होने की पुष्टि।

पारिवारिक गवाह: महीरांश रायचंद।

हर पन्ने पर मेरे हस्ताक्षर थे।

लेकिन वे मेरे नहीं थे।

लगभग मेरे जैसे।

पर पूरी तरह नहीं।

रायचंद के R का घुमाव थोड़ा ज़्यादा नीचे झुका हुआ था।

मेरे पति अक्सर मेरा मज़ाक उड़ाते हुए कहते थे कि मेरे R की आकृति हाथ में छड़ी लिए किसी स्कूल के प्रधानाचार्य की तरह सीधी खड़ी रहती है।

लेकिन इस जाली R ने चोर की तरह सिर झुका रखा था।

मैंने अपना हाथ मुँह पर रख लिया।

“विक्रम,” मैंने खाली कमरे से फुसफुसाकर कहा, “हमारा बेटा आखिर क्या बन गया?”

ऊपर से एक आवाज़ आई।

कदमों की नहीं।

मेरे फ़ोन की।

वह अभी भी ऊपर मेरे हैंडबैग में रखा था, पुरानी लकड़ी की मेज़ पर कंपन कर रहा था।

मैं उसे वहीं छोड़ आई थी।

मूर्ख।

एक ऐसी प्रिंसिपल, जिसने कभी तीसरी बेंच से नकल करते छात्रों को पकड़ लिया था, आज अपने ही घर में लापरवाह हो गई थी।

मैंने तहखाने की बत्ती बंद कर दी और अँधेरे में खड़ी हो गई।

फ़ोन बजना बंद हो गया।

फिर पूरे घर में सन्नाटा छा गया।

बहुत ज़्यादा सन्नाटा।

मैं सीढ़ियाँ आधी चढ़ी और ध्यान से सुनने लगी।
बाहर एक कार का दरवाज़ा बंद होने की आवाज़ आई।

फिर दूसरी।

मेरे शरीर का ख़ून जैसे जम गया।

महीरांश पुणे पहुँच चुका था।

बेशक पहुँच चुका था।

जो बेटा अपनी माँ की मौत की योजना बना सकता है, वह उसे फँसाए रखने के लिए सिर्फ़ एयरलाइंस पर भरोसा नहीं करेगा।

मुख्य दरवाज़ा चाबी से खुला।

“माँ?” उसने आवाज़ लगाई।

उसकी आवाज़ शांत थी।

यही बात मुझे सबसे ज़्यादा डरा रही थी।

“माँ, अब बहुत नाटक हो गया। बाहर आ जाइए।”

उसके साथ एक और आवाज़ थी।

गहरी।

चिढ़ी हुई।

“ठीक से तलाश करो। बूढ़ी औरतें घबरा जाती हैं और छिप जाती हैं।”

मैं उस आवाज़ को पहचानती थी।

प्रकाश।

वही प्रॉपर्टी ब्रोकर, जो दो बार हाथ जोड़कर और झूठा सम्मान दिखाते हुए आया था और कहता था, “मैडम, पुराने घर भावनाओं से जुड़े होते हैं, लेकिन पुनर्विकास ही व्यावहारिक होता है।”

मेरे बेटे ने कहा, “वह ज़्यादा दूर नहीं गई होगी। उसका बैग यहीं है।”

मेरा हैंडबैग।

मेरा फ़ोन।

मेरी दवाइयाँ।

सब कुछ ऊपर ही था।

मैं छिपी हुई सीढ़ियों के रास्ते में जड़ होकर खड़ी थी, एक हाथ अपने मुँह पर रखे हुए।

तभी तीसरी आवाज़ सुनाई दी।

एक औरत की।

“पीछे वाले बगीचे में देखो। शायद वह बेहोश हो गई हो।”

वह आवाज़ मेरे भीतर ऐसे उतर गई, जैसे धीरे-धीरे ज़हर घोला जा रहा हो।

मधुमिता।

मेरे बेटे की पत्नी।

वान्या की माँ।

सालों तक मैं खुद को यही समझाती रही कि वह बस ठंडी स्वभाव की है, बस व्यवहारिक है, बस अलग माहौल में पली-बढ़ी है।

लेकिन मेरी पोती ने उस घर में किसी से डरना सीखा था।

मेरे ऊपर रखी किताबों की अलमारी हल्की-सी हिली। धूल मेरे बालों पर गिर गई।

कोई उस गुप्त दरवाज़े के पास था।

मैंने साँस तक नहीं ली।

प्रकाश ने कहा, “उसे यह गुप्त पैनल कैसे मिल गया?”

मधुमिता फुसफुसाई, “वान्या।”

मेरा दिल कस गया।

मेरी नन्ही बच्ची।

मेरी बहादुर आठ साल की बच्ची।

महीरांश बड़बड़ाया।

“मैंने तुमसे कहा था कि उसे माँ के साथ अकेला मत छोड़ना।”

“उसने पिछले हफ़्ते कीपैड देख लिया था,” मधुमिता ने कहा। “मुझे लगा वह बस चित्र बना रही थी।”

“तुम्हें लगा?” महीरांश झल्लाया। “तुम्हारे इसी सोचने की वजह से अब माँ के पास सारे कागज़ हैं।”

प्रकाश ने धीमी आवाज़ में कहा,

“अगर उन्होंने मृत्यु प्रमाणपत्र देख लिया है, तो हमें जल्दी करनी होगी।”

महीरांश ने कुछ नहीं कहा।

उसकी वही ख़ामोशी उसका जवाब थी।

मेरा अपना बेटा मेरे ठीक ऊपर खड़ा था और यह सोच रहा था कि मेरे ज़िंदा बच जाने की गलती कैसे सुधारी जाए।

मैंने सीढ़ियों की दरार से आती हल्की रोशनी में तहखाने के चारों ओर नज़र दौड़ाई।

यहाँ से बाहर निकलने का कोई और रास्ता होना चाहिए।

पुराने घर सिर्फ़ उन्हीं लोगों के सामने अपने राज़ खोलते हैं जो उनकी रग-रग को जानते हैं। विक्रम ने यह बंगला अपने हाथों से बनवाया था। वह कहा करते थे, “हर घर में एक राज़ होना चाहिए, आरू। झूठ के लिए नहीं। सुरक्षा के लिए।”

तब मैं हँस दी थी।

“हमारे घर में कौन-सा राज़ छिपाया है?”

उन्होंने अपनी नाक पर उँगली रखकर कहा था,

“जिस दिन तुम प्रिंसिपल होना छोड़कर जासूस बनोगी, उस दिन उसे ढूँढ़ लोगी।”

मेरी आँखों में आँसू भर आए।

उन्होंने मुझे नहीं बताया था, क्योंकि उन्हें पता था कि मुझे रहस्य से ज़्यादा व्यवस्था पसंद है।

लेकिन वान्या ने वह काला चौकोर हिस्सा ढूँढ़ लिया था।

शायद मेरे पति मेरे लिए और भी कुछ छोड़ गए थे।

मैं फिर मेज़ के पास लौटी। मेरे हाथ फ़ाइलों, दराज़ों और हर कोने को टटोलने लगे।

एक लोहे की अलमारी के पीछे मेरी उँगलियाँ एक ठंडी धातु की गोल पकड़ से टकराईं।

मैंने उसे खींचा।

फ़र्श के पास एक छोटा-सा पैनल खुल गया।

एक सुरंग।

संकरी।

धूल से भरी।

मेरे बूढ़े घुटनों के लिए मुश्किल से पर्याप्त।

उसी क्षण ऊपर छिपी हुई सीढ़ियों का दरवाज़ा चरमराया।

रोशनी की एक धार तहखाने में उतर आई।

महीरांश की आवाज़ नीचे से सुनाई दी।

“माँ?”

मैं तुरंत ज़मीन पर लेट गई और रेंगते हुए सुरंग में घुस गई।

मेरी साड़ी एक कील में अटक गई।

मैंने ज़ोर से खींचा।

कपड़ा फट गया।

मेरे पीछे कदमों की आहट नीचे उतर रही थी।

“माँ, मुझे पता है कि आप यहीं नीचे हैं।”

अब उसकी आवाज़ फिर मुलायम थी।

वही आवाज़, जिससे वह मुझसे दस्तख़त करवाता था।

वही आवाज़, जिससे त्योहारों पर मेरे पैर छूता था।

वही आवाज़, जिससे मैंने प्यार किया था।

“कृपया इसे बदसूरत मत बनाइए।”

मैं और भीतर रेंगती गई। मेरे घुटने दर्द से चीख रहे थे।

फिर मैंने उसे मेज़ तक पहुँचते हुए सुना।

ख़ामोशी।

उसने देख लिया था कि फ़ाइलों के साथ छेड़छाड़ हुई है।

“माँ,” उसने कहा, और इस बार उसकी आवाज़ की सारी नरमी गायब थी। “अगर आपने मुझे मजबूर किया, तो मैं सबको बता दूँगा कि आपका मानसिक संतुलन बिगड़ चुका है। आपकी बात पर कौन यक़ीन करेगा? एक बूढ़ी विधवा, जो हवाई अड्डे से काल्पनिक डर लेकर भागी फिर रही है?”

मैंने रेंगना रोक दिया।

डर की वजह से नहीं।

ग़ुस्से की वजह से।

बूढ़ी विधवा।

काल्पनिक।

मानसिक संतुलन खो चुकी।

ये वही शब्द हैं जिनका इस्तेमाल मर्द तब करते हैं, जब किसी संपत्ति पर किसी औरत का नाम लिखा होता है।

मैं फिर आगे बढ़ी।

सुरंग ऊपर की ओर जा रही थी। दोनों तरफ़ की मिट्टी मेरे शरीर को दबा रही थी। एक मकड़ी का जाला मेरे चेहरे से चिपक गया। मेरी साँसें तेज़-तेज़ चल रही थीं।

तभी मेरी हथेली लकड़ी से टकराई।

एक छोटा-सा दरवाज़ा।

अंदर की तरफ़ से जंग लगे कुंडे से बंद।

मैंने कुंडा उठा दिया।

दरवाज़ा खुला और मैं रसोई के आँगन के पीछे बने पुराने कोयले के भंडार वाले कमरे में पहुँच गई।

चाँदनी टूटे हुए गमलों और मेरे पति के छोड़े हुए बागवानी के औज़ारों पर बिखरी हुई थी।

मैं हाँफते हुए बाहर निकली।

मेरे घुटनों से ख़ून बह रहा था।

मेरी साड़ी फट चुकी थी।

मेरे बाल बिखर गए थे।

लेकिन मैं बाहर थी।

ज़िंदा।

घर के पीछे से आवाज़ें गूँज उठीं।

“पूरे परिसर की तलाशी लो!”

मैं दौड़ पड़ी।

शालीनता से नहीं।

वैसे भी नहीं जैसे कभी मैं स्कूल की दौड़ के लिए लड़कियों को प्रशिक्षित करती थी।

मैं उस बूढ़ी औरत की तरह दौड़ी जिसकी मौत के प्रमाणपत्र ने गलती कर दी थी।

पीछे की दीवार पर चढ़ती बोगनवेलिया की शाखाओं ने मेरी बाँहों को खरोंच दिया, जब मैं उन ढीली ईंटों वाली दरार से निकलकर बाहर आई।

पड़ोसी का कुत्ता एक बार भौंका।

फिर चुप हो गया।

वह मुझे पहचानता था।

बहुत अच्छा बेटा।

मैं श्रीमती डी’सूज़ा के पिछवाड़े वाले आँगन में उनके साइड गेट से दाखिल हुई और उनकी रसोई की खिड़की पर दस्तक दी।

उन्होंने हाथ में बेलन पकड़े खिड़की खोली।

Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.