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उस 12 साल की बच्ची ने कैंसर से जूझती सहेली के लिए अपने बाल काट दिए, लेकिन अगले दिन कैंटीन में अपमान देखकर उसने धक्का दिया—तभी फुटेज ने सच दिखाया, “उसने विग नहीं छीनी, उसकी हिम्मत छीनी थी”

PART 1

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पूरे स्कूल की कैंटीन में जब 12 साल की अनाया ने अपने सहपाठी आरव को धक्का दिया, तो प्रिंसिपल ने उसकी माँ को फोन पर इतना सख्त कह दिया कि वह लड़की अब इस स्कूल में पहले जैसी वापस नहीं आएगी।

दिल्ली के लाजपत नगर की एक तंग गली में बने 2 कमरों के फ्लैट में राधिका शर्मा के हाथ से चाय का गिलास लगभग छूट गया। सुबह के 8:12 बजे थे। खिड़की के बाहर दूधवाले की घंटी बज रही थी, नीचे सब्ज़ीवाला आवाज़ लगा रहा था, और रसोई की दीवार पर अभी भी उसके पति निखिल की वही मुस्कुराती तस्वीर टंगी थी, जिस पर पिछले 3 महीनों से ताज़ा गेंदे की माला चढ़ती थी।

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निखिल कैंसर से चला गया था। जाते-जाते घर की आवाज़, राधिका की हँसी और अनाया की बचपन वाली बेफिक्री सब साथ ले गया था।

फोन पर प्रिंसिपल श्री मेहरा की आवाज़ काँप रही थी।

“मैडम, आप तुरंत स्कूल आइए। बात बहुत गंभीर है।”

राधिका का दिल धक से रह गया।

“मेरी बेटी ठीक है? उसे चोट लगी है?”

थोड़ी चुप्पी रही।

“आप बस आ जाइए। आपको अपनी आँखों से देखना होगा।”

राधिका ने अलमारी पर टंगी निखिल की पुरानी जैकेट को देखा। अनाया रातों में उसी जैकेट को छाती से लगाकर सोती थी, जैसे पिता की बची हुई खुशबू उसे टूटने से रोक सकती हो।

कल रात भी वही जैकेट बिस्तर पर पड़ी थी, लेकिन अनाया बाथरूम में बंद थी।

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दरवाज़ा खुला तो राधिका जम गई। फर्श पर लंबे, घने, काले बालों की लटें बिखरी थीं। अनाया आईने के सामने खड़ी थी, हाथ में छोटी कैंची, आँखें लाल, बाल कंधों तक टेढ़े-मेढ़े कटे हुए।

“अनाया, ये क्या किया तुमने?”

लड़की ने काँपते हुए कहा, “माँ, ये सिया के लिए है।”

सिया उसकी क्लास की शांत लड़की थी। लखनऊ से इलाज के लिए दिल्ली आई थी। कीमोथेरेपी के कारण उसके बाल लगभग झड़ चुके थे। वह हमेशा दुपट्टे जैसे मुलायम स्कार्फ से सिर ढककर आती थी।

“आज लंच ब्रेक में उसका स्कार्फ गिर गया,” अनाया ने टूटी आवाज़ में कहा, “सबने देखा। कुछ लड़कों ने कहा वह भूत जैसी लगती है। किसी ने कहा उसके पास बैठने से अपशकुन होगा।”

राधिका की साँस अटक गई।

“वह वॉशरूम में रो रही थी, माँ। बिल्कुल वैसे ही जैसे पापा उस दिन रोए थे, जब उनके बाल शॉवर में गिर गए थे और वे नहीं चाहते थे कि मैं देखूँ।”

राधिका के पास कोई जवाब नहीं था।

अनाया ने रिबन से बाँधी बालों की लट उठाई।

“मैंने पढ़ा कि असली बालों से बीमार बच्चों के लिए विग बनती है। मेरे बाल पूरे नहीं पड़ेंगे, लेकिन शायद थोड़ी मदद हो जाए। सिया फिर सिर झुकाकर नहीं चलेगी।”

उस रात राधिका उसे कॉलोनी के एक छोटे पार्लर में ले गई। पार्लर वाली फरहीन आंटी ने बिना पैसे लिए बाल ठीक किए और एक संस्था से बात की, जो कैंसर से जूझते बच्चों के लिए विग बनाती थी। संयोग से एक छोटी विग तैयार थी, जिसे थोड़ा सँवारकर सिया के लिए ठीक किया जा सकता था। अनाया के कुछ बाल आगे की लटों में जोड़े गए।

सुबह अनाया स्कूल गई तो उसके बैग में पारदर्शी कवर में वही विग रखी थी।

राधिका ने कहा था, “उसे अकेले में देना। एहसान की तरह नहीं, दोस्ती की तरह।”

अनाया ने सिर हिलाया था।

लेकिन अब स्कूल से आए फोन ने राधिका की छाती में डर भर दिया था।

जब वह स्कूल पहुँची, गार्ड ने बिना नाम पूछे रास्ता दे दिया। प्रिंसिपल के कमरे के बाहर अजीब सन्नाटा था। दरवाज़ा खुला तो राधिका ने अपनी बेटी को देखा। अनाया की शर्ट धूल से सनी थी, गाल पर हल्की खरोंच थी। उसके पास सिया बैठी थी, विग को दोनों बाँहों में ऐसे पकड़े जैसे कोई ढाल हो।

सामने एक महँगी साड़ी पहने महिला खड़ी थी। वह आरव की माँ, कविता मल्होत्रा थी। उसका पति स्कूल मैनेजमेंट कमेटी में था और हाल ही में उसने लाइब्रेरी के लिए बड़ा दान दिया था।

कविता ने राधिका को देखते ही कहा, “आपकी बेटी ने मेरे बेटे पर हमला किया है। मैं अभी इसी वक्त उसका सस्पेंशन चाहती हूँ।”

राधिका ने अनाया की ओर देखा।

“सच बताओ, क्या हुआ?”

अनाया ने आँखें उठाईं।

“मैंने उसे धक्का दिया।”

कविता मुस्कुराई।

“देखा? उसने खुद मान लिया।”

अनाया की आवाज़ अचानक सख्त हो गई।

“क्योंकि उसने सिया की विग खींचकर सबके सामने फेंक दी थी।”

कमरा एक पल में पत्थर हो गया।

PART 2

सिया की माँ, नसीमा, कुर्सी पर बैठी-बैठी काँप गईं। उनका चेहरा रातभर जागी औरत जैसा पीला था।

कविता ने ठंडी आवाज़ में कहा, “बच्चे हैं, मज़ाक कर रहे थे। हर बात को बीमारी का मुद्दा मत बनाइए।”

सिया ने बहुत धीरे कहा, “उसने कहा था मैं आधी मरी हुई लगती हूँ।”

राधिका के भीतर कुछ जल उठा।

अनाया खड़ी हो गई। “उसने कहा सिया के साथ बैठने से कैंसर लग जाएगा। उसने कहा वह नकली बाल लगाकर सामान्य बनने की एक्टिंग कर रही है।”

आरव सिर झुकाए खड़ा था।

कविता ने तुरंत कहा, “मेरा बेटा ऐसा नहीं कह सकता। और मान भी लें कि उसने कुछ कहा, तो आपकी बेटी को हाथ उठाने का हक नहीं था।”

श्री मेहरा ने लैपटॉप खोला।

“कविता जी, आपने ही कैंटीन की फुटेज देखने की माँग की थी।”

“बिल्कुल,” कविता ने कहा, “वीडियो सब साबित कर देगा।”

स्क्रीन चालू हुई। फुटेज में सिया खिड़की के पास बैठी थी। अनाया उसके साथ थी। सिया पहली बार मुस्कुरा रही थी।

फिर आरव 2 लड़कों के साथ आया। उसने उँगली से सिया की ओर इशारा किया। दूसरे लड़के हँसे। आरव ने आगे बढ़कर उसकी विग पकड़ी और झटके से खींच ली।

सिया ने दोनों हाथ सिर पर रख लिए और मेज़ के नीचे सिकुड़ गई।

उसी पल अनाया ने आरव का हाथ धक्का देकर हटाया। आरव पीछे पड़ा बैग से टकराकर गिर गया।

लेकिन वीडियो यहीं खत्म नहीं हुआ।

पूरी कैंटीन में बच्चे उठ खड़े हुए। कोई सिया के आगे खड़ा हो गया, किसी ने विग उठाई, किसी ने कैमरे की ओर इशारा किया।

श्री मेहरा ने वीडियो रोक दिया।

तभी आरव फूट पड़ा।

“माँ, मैंने जानबूझकर किया था।”

PART 3

कविता का चेहरा जैसे किसी ने एक झटके में खाली कर दिया हो। वह आरव की ओर मुड़ी, आँखों में गुस्सा और डर दोनों थे।

“चुप रहो, आरव। तुम्हें समझ नहीं है तुम क्या कह रहे हो।”

लेकिन इस बार आरव चुप नहीं हुआ। उसके कंधे काँप रहे थे, पर उसकी आवाज़ में पहली बार सच था।

“मैंने जानबूझकर किया। मैं चाहता था सब हँसें। मैं चाहता था लोग मुझे देखें। मैंने कहा था कि वह डरावनी लगती है। मैंने यह भी कहा था कि उसके साथ बैठना अशुभ है।”

सिया ने विग को और कसकर पकड़ लिया। उसकी आँखें खाली थीं, जैसे वह सब सुन भी रही हो और नहीं भी।

नसीमा ने होंठ दबा लिए। वह रोना नहीं चाहती थीं। शायद इतने महीनों के इलाज, इंजेक्शन, उल्टियों, अस्पताल की लाइनों और डर भरी रातों ने उनके आँसू भी थका दिए थे।

राधिका ने अनाया का हाथ पकड़ा। उसे लगा जैसे बेटी की छोटी हथेली में निखिल की आखिरी गर्माहट रह गई हो।

श्री मेहरा ने धीमी लेकिन साफ आवाज़ में कहा, “आरव, सच बोलना जरूरी है, लेकिन सच बोल देने से परिणाम खत्म नहीं होते।”

आरव ने सिर झुका लिया।

“जी, सर।”

कविता ने तुरंत कहा, “आप मेरे बेटे की जिंदगी बर्बाद नहीं कर सकते। उसने गलती मान ली है। अब बात यहीं खत्म होनी चाहिए।”

नसीमा पहली बार कुर्सी से उठीं। उनकी साड़ी का पल्लू कंधे से फिसल रहा था, चेहरा थका हुआ था, पर आवाज़ में ऐसी गरिमा थी कि कमरे में सब सीधा हो गया।

“मेरी बेटी 12 साल की है। वह हफ्ते में 3 दिन उल्टियाँ करती है। रात को मुझसे पूछती है कि क्या वह अगले जन्मदिन तक जिंदा रहेगी। आज उसने पहली बार स्कूल आने से पहले आईने में खुद को देखकर मुस्कुराया था। आपकी नजर में वह बस एक मज़ाक था?”

कविता ने नज़र फेर ली।

नसीमा आगे बोलीं, “आपके बेटे ने उसके सिर से सिर्फ विग नहीं उतारी। उसने उससे वह हिम्मत छीनी जो उसने महीनों बाद जुटाई थी।”

कमरे में भारी चुप्पी फैल गई।

आरव की आँखों से आँसू बहने लगे।

“सिया, मुझे माफ कर दो,” वह बोला, “मैं सच में बहुत बुरा था।”

सिया ने तुरंत कुछ नहीं कहा। उसके हाथ अभी भी विग के किनारे पर थे, जहाँ अनाया के बालों की छोटी-छोटी लटें लगी थीं।

कुछ देर बाद उसने बहुत धीमे कहा, “तुम्हें पता है, जब तुमने विग खींची, मुझे लगा सब फिर मेरे सिर को देख रहे हैं। मुझे लगा मैं लड़की नहीं, बीमारी हूँ।”

आरव सिसक पड़ा।

“मुझे नहीं सोचना चाहिए था कि लोग हँसेंगे तो मैं बड़ा लगूँगा।”

अनाया ने उसकी ओर देखा। उसकी छोटी कटिंग अभी भी थोड़ी असमान थी, पर उसकी आँखों में अजीब दृढ़ता थी।

“तुम्हें हँसाने के लिए किसी को तोड़ना जरूरी नहीं होता।”

आरव ने सिर हिलाया। वह जवाब देने लायक नहीं था।

श्री मेहरा अपनी कुर्सी से उठे। अब उनकी आवाज़ में डर नहीं था।

“आरव को 2 सप्ताह के लिए स्कूल से निलंबित किया जाएगा। उसके साथ मौजूद 2 छात्रों पर भी अनुशासनात्मक कार्रवाई होगी। तीनों को स्कूल काउंसलर के साथ अनिवार्य सत्र में बैठना होगा। उनके माता-पिता को भी बुलाया जाएगा। कैंटीन और कॉरिडोर में एंटी-बुलिंग निगरानी बढ़ेगी।”

कविता ने तीखी आवाज़ में कहा, “आप भूल रहे हैं कि मेरे पति ने इस स्कूल के लिए कितना किया है।”

श्री मेहरा ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा, “दान से लाइब्रेरी बन सकती है, लेकिन किसी बच्चे की बेइज्जती का अधिकार नहीं खरीदा जा सकता।”

कविता का चेहरा तमतमा गया।

“आप इसका परिणाम भुगतेंगे।”

“हो सकता है,” श्री मेहरा ने शांत स्वर में कहा, “लेकिन एक बीमार बच्ची के अपमान को छिपाने का परिणाम मैं जिंदगी भर भुगतता।”

राधिका को लगा कमरे की हवा पहली बार हल्की हुई है।

फिर उसने डरते-डरते पूछा, “और अनाया?”

श्री मेहरा ने अनाया की ओर देखा।

“अनाया को सजा नहीं मिलेगी। उसने हमला नहीं किया। उसने एक अपमानजनक हरकत को रोकने की कोशिश की। हाँ, आगे से उसे तुरंत शिक्षक को बुलाना चाहिए, पर मैं उस बच्ची को अपराधी नहीं बनाऊँगा जिसने उस समय वह किया जो आसपास खड़े कई बड़े बच्चे भी नहीं कर पाए।”

अनाया की आँखें भर आईं। वह अब तक मजबूत बनी हुई थी, लेकिन यह सुनकर उसके होंठ काँप गए।

सिया धीरे से उठी। वह अनाया के पास आई और उसे गले लगा लिया। दोनों बच्चियाँ बहुत हल्के से एक-दूसरे से लिपटीं, जैसे दोनों को डर हो कि ज़ोर से पकड़ने पर कहीं दर्द टूटकर बाहर न आ जाए।

“मुझे लगा सब हँसेंगे,” सिया ने कहा।

अनाया ने उसके कंधे पर चेहरा छुपाते हुए कहा, “सब नहीं।”

कविता ने आरव का हाथ पकड़ा।

“चलो।”

पर आरव वहीं खड़ा रहा।

“माँ, पापा को फोन मत करना। किसी से बात करके इसे दबाना मत। मैंने गलत किया है।”

कविता ने उसे ऐसे देखा जैसे उसके अपने बेटे ने उसकी सत्ता के खिलाफ गवाही दे दी हो।

“तुम बच्चे हो। तुम्हें नहीं पता दुनिया कैसे चलती है।”

आरव ने रोते हुए कहा, “अगर दुनिया ऐसे चलती है, तो मुझे वैसी दुनिया नहीं चाहिए।”

कविता ने कुछ कहना चाहा, पर शब्द नहीं निकले। पहली बार वह कमरे में सबसे अमीर होते हुए भी सबसे गरीब लग रही थी। उसके पास पैसे थे, पहचान थी, दबाव था, लेकिन सच उसके हाथ से निकल चुका था।

वह बाहर चली गई। आरव उसके पीछे गया, मगर जाते-जाते उसने मुड़कर सिया से कहा, “मैं माफी के लायक नहीं हूँ, लेकिन मैं फिर ऐसा नहीं करूँगा।”

सिया ने सिर्फ सिर झुका लिया। माफी कोई मिठाई नहीं थी, जो तुरंत बाँट दी जाए। कुछ घावों को भरने से पहले समय चाहिए होता है।

दरवाज़ा बंद हुआ तो राधिका ने लंबी साँस ली। उसे याद आया निखिल अस्पताल के कमरे में कैसे मुस्कुराते थे, जब अनाया उन्हें टोपी पहनाकर कहती थी कि वे फिल्मी हीरो लग रहे हैं। फिर एक रात वह चुपचाप बाथरूम में रोए थे, बालों की गिरी लटें हाथ में पकड़े। अनाया ने वह सब देख लिया था, पर किसी से कहा नहीं।

श्री मेहरा ने दोनों बच्चियों के सामने झुककर कहा, “सिया, तुम्हें किसी से छिपने की जरूरत नहीं है। और अनाया, तुम्हारे बालों का दान बहुत बड़ा काम है। लेकिन तुम्हें दुनिया की हर लड़ाई अकेले नहीं लड़नी। हम बड़े लोग अगर समय पर नहीं पहुँचे, तो गलती हमारी है।”

अनाया की आँखें भर आईं।

“जब पापा बीमार थे, लोग भी अजीब बातें कहते थे,” उसने धीमे से कहा।

राधिका चौंक गई।

“किसने?”

“अस्पताल के कॉरिडोर में एक आदमी ने अपनी पत्नी से कहा था कि पापा तो पहले से ही मरे हुए जैसे लगते हैं। पापा ने सुना था। उन्होंने मुस्कुराने की कोशिश की, पर उनकी आँखें बदल गई थीं।”

राधिका के भीतर वर्षों जितना दर्द एक पल में उतर आया।

“तुमने मुझे बताया क्यों नहीं?”

अनाया ने माँ की ओर देखा।

“क्योंकि आप कार में रोती थीं, जब आपको लगता था मैं सो रही हूँ।”

राधिका वहीं घुटनों के बल बैठ गई और बेटी को बाँहों में भर लिया। वह रोई, पर इस बार छिपाकर नहीं। अनाया भी रोई। वे दोनों उस आदमी के लिए रो रही थीं जो अब नहीं था, उस बच्ची के लिए जो जल्दी बड़ी हो गई थी, और उन सभी अपमानों के लिए जो लोग बीमारी को देखकर हँसते हुए छोड़ जाते हैं।

नसीमा ने आगे बढ़कर अनाया के छोटे बालों पर हाथ फेरा।

“तुम्हारे पापा ने तुम्हारे अंदर बहुत उजली चीज़ छोड़ी है।”

अनाया फफक पड़ी।

सिया पास खड़ी सब देखती रही। फिर उसने धीरे से विग अपने सिर पर रखी। वह अभी भी काँप रही थी, लेकिन इस बार उसने अपना चेहरा नहीं छिपाया।

कुछ देर बाद जब वे कमरे से बाहर निकले, राधिका को लगा पूरा स्कूल उन्हें घूर रहा होगा। उसे डर था कि बच्चे फुसफुसाएँगे, कोई हँसेगा, कोई वीडियो बनाएगा। उसने अनाया के कंधे पर हाथ रखा, जैसे वह उसे दुनिया से ढक लेगी।

लेकिन बाहर का दृश्य अलग था।

कैंटीन के पास वाली खुली जगह में कई बच्चे खड़े थे। किसी के हाथ में नोटबुक का फाड़ा हुआ पन्ना था, किसी के हाथ में स्केच पेन। 9वीं की एक लंबी लड़की, इशिता, आगे आई। वही लड़की थी जिसने फुटेज में विग उठाई थी।

“मैम,” उसने राधिका से कहा, “हमने एक अपील लिखी है। हम स्कूल में बाल दान अभियान शुरू करना चाहते हैं। और एक एंटी-बुलिंग डे भी। क्लास टीचर ने कहा है, अगर प्रिंसिपल सर अनुमति दें तो हम पोस्टर बना सकते हैं।”

श्री मेहरा, जो पीछे खड़े थे, चुपचाप सुनते रहे।

एक लड़के ने कहा, “मेरे बाल छोटे हैं, लेकिन मैं पोस्टर बनाऊँगा।”

एक लड़की जिसकी कमर तक चोटी थी, धीरे से बोली, “मैं बाल कटवाना चाहती हूँ। लेकिन डर लग रहा है कि लोग मज़ाक उड़ाएँगे।”

अनाया ने अपनी गर्दन छुई, जहाँ उसके लंबे बाल अब नहीं थे।

“लोगों की हँसी से बाल छोटे नहीं होते,” उसने कहा, “दिल छोटा होता है।”

सिया ने उसकी ओर देखा। फिर उसने बच्चों की भीड़ की तरफ कदम बढ़ाया। उसका चेहरा पीला था, शरीर कमजोर था, लेकिन आँखों में पहली बार धुंध के पीछे रोशनी थी।

“मैं बीमार हूँ,” उसने कहा, “लेकिन मैं अपशकुन नहीं हूँ।”

यह सुनते ही कोई बच्चा तालियाँ बजाने लगा। फिर दूसरा। फिर 10, फिर 30। कुछ ही पलों में पूरा मैदान तालियों से भर गया। वह कोई शोर नहीं था। वह जैसे किसी बच्ची की गरिमा लौटाने की सामूहिक कोशिश थी।

नसीमा रोने लगीं। उन्होंने चेहरा नहीं छिपाया।

राधिका ने अपनी बेटी को देखा। 12 साल की बच्ची, जिसने पिता खोया, बाल खोए, बचपन का एक हिस्सा खोया, लेकिन किसी और बच्चे की इज़्ज़त बचाने के लिए खड़ी हो गई।

श्री मेहरा ने वहीं घोषणा की कि अगले महीने स्कूल में “सम्मान और संवेदना सप्ताह” मनाया जाएगा। कैंसर से जूझते बच्चों के लिए बाल दान शिविर लगेगा, डॉक्टरों को बुलाया जाएगा, बच्चों को समझाया जाएगा कि बीमारी मज़ाक नहीं होती, और किसी की देह, बाल, रंग, वजन या कमजोरी पर हँसना चरित्र की हार है।

कई माता-पिता को यह बात बाद में चुभी। कुछ ने कहा स्कूल बच्चों को “बहुत भावुक” बना रहा है। कुछ ने कहा अनाया जैसी लड़की को हीरो बनाना गलत है। लेकिन उसी शाम स्कूल के पैरेंट्स ग्रुप में फुटेज के बारे में सच फैल गया। कविता के पति ने पहले दबाव बनाने की कोशिश की, पर जब कई बच्चों ने लिखित बयान दिए, तो मामला दबाया नहीं जा सका।

आरव को सस्पेंशन मिला। पर उससे भी बड़ा दंड था उसका रोज़ खुद को याद करना कि एक कमजोर पल में उसने किसी और की कमजोरी को तमाशा बनाया था। काउंसलिंग के दौरान उसने पहली बार माना कि वह हमेशा ध्यान चाहता था, क्योंकि घर में उसकी हर गलती पैसे से ठीक कर दी जाती थी। उसे कभी शर्म से बैठना नहीं पड़ा था। इस बार पड़ा।

2 सप्ताह बाद जब वह स्कूल लौटा, तो वह पहले जैसा शोर मचाने वाला लड़का नहीं था। उसने सिया से फिर माफी माँगी, इस बार भीड़ के सामने नहीं, प्रिंसिपल के कमरे में, जहाँ नसीमा और राधिका भी थीं। सिया ने कहा, “मैं तुम्हें भूल नहीं सकती, लेकिन मैं चाहती हूँ तुम किसी और को कभी ऐसा महसूस न कराओ।”

आरव ने सिर झुका लिया।

“मैं कोशिश करूँगा।”

वह माफी नहीं थी। वह एक शर्त थी। और शायद कुछ रिश्तों में यही पर्याप्त शुरुआत होती है।

बाल दान शिविर वाले दिन स्कूल का आँगन फूलों, मेज़ों और कुर्सियों से भर गया। स्थानीय अस्पताल की डॉक्टर आईं। एक संस्था की महिलाएँ साफ पैकेट लेकर बैठीं। बच्चों ने कतार लगाई। किसी ने 7 इंच बाल दिए, किसी ने 10। कुछ लड़कियाँ रोईं, फिर आईने में खुद को देखकर हँसीं। कुछ लड़कों ने बाल छोटे होने के बावजूद पैसे जमा किए ताकि विग बनाने में मदद हो सके।

फरहीन आंटी भी आईं। उन्होंने अनाया की कटिंग फिर से सँवारी और मज़ाक में कहा, “अब तो तुम दिल्ली की सबसे बहादुर मॉडल लग रही हो।”

अनाया मुस्कुराई। वह पहले जैसी मुस्कान नहीं थी। उसमें दुख की छाया थी, पर वह सच्ची थी।

सिया ने उस दिन स्टेज पर जाकर पहली बार बिना झिझक कहा, “यह विग मेरे लिए सिर्फ बाल नहीं है। यह याद दिलाती है कि जब कुछ लोग आपको तोड़ते हैं, तो कुछ लोग अपना हिस्सा देकर आपको फिर जोड़ते हैं।”

तालियाँ फिर गूँजीं।

राधिका भीड़ में खड़ी थी। उसकी आँखें भर आई थीं। उसने अपने फोन में निखिल की तस्वीर खोली। वही तस्वीर जिसमें वह अनाया को कंधे पर बैठाए इंडिया गेट के सामने हँस रहे थे।

अनाया स्टेज से उतरकर माँ के पास आई।

“माँ,” उसने धीमे से पूछा, “आपको लगता है पापा ने देखा?”

राधिका ने आसमान की ओर देखा। दिल्ली का आसमान धुएँ और धूप के बीच धुंधला था। दूर ट्रैफिक की आवाज़ थी, पास बच्चों की हँसी थी, और बीच में उसकी बेटी खड़ी थी, जिसके छोटे बाल हवा में हिल रहे थे।

राधिका ने अनाया का चेहरा दोनों हथेलियों में लिया।

“उन्होंने देखा।”

अनाया की आँखें भर आईं।

“और उन्होंने क्या किया होगा?”

राधिका मुस्कुराई। दिल टूटा हुआ था, पर उसमें पहली बार दर्द के साथ गर्व भी था।

“वे सबसे पहले खड़े होकर ताली बजा रहे होंगे।”

Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.