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उड़ान रद्द होते ही वह चुपचाप महल जैसे घर लौटा, और 4 साल की बेटी को भूख से काँपते देखा; सौतेली माँ की चीख गूँजी, “किताब गिरी तो फिर से शुरू”, फिर पिता ने सब उजाड़ दिया

PART 1

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उसकी 4 साल की बेटी बीमार नहीं थी, उसे उसी के घर में भूख, डर और अपमान से तोड़ा जा रहा था।

उस सुबह गुरुग्राम के गोल्फ कोर्स रोड पर बने शीशे और संगमरमर वाले बंगले में अर्जुन मल्होत्रा ने अपनी टाई ऐसे ठीक की, जैसे हर गाँठ के साथ वह अपनी थकान छिपा रहा हो। बाहर से वह वही सफल कारोबारी था, जिसकी तस्वीरें बिजनेस पत्रिकाओं में छपती थीं। अंदर से वह अब भी अनन्या की मौत के बाद टूट चुका पति था, जो अपनी छोटी बेटी तारा की आँखों में रोज़ अपनी मरी हुई पत्नी का चेहरा देखता था।

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नीचे डाइनिंग हॉल में चाँदी के बर्तनों की चमक थी, अगरबत्ती और महँगे इत्र की मिली-जुली गंध थी, लेकिन घर में वह गर्माहट नहीं थी जो कभी अनन्या के रहते हर सुबह रसोई से उठती थी। मेज के सिरहाने नैना बैठी थी, अर्जुन की दूसरी पत्नी। हल्की रेशमी साड़ी, बिना बिगड़ा जूड़ा, माथे पर छोटी-सी बिंदी और आवाज़ में वह मिठास, जो सुनने में प्यार लगती थी लेकिन भीतर कहीं नियंत्रण की ठंडक छिपाए रहती थी।

तारा बड़ी कुर्सी पर चुप बैठी थी। उसके छोटे पैर नीचे तक नहीं पहुँच रहे थे। उसके सामने हरे रंग का गाढ़ा पेय रखा था। वह काँपते हाथों से गिलास पकड़े हुए थी।

अर्जुन ने झुककर बेटी का माथा चूमा। वह ठंडी थी, लेकिन उसके माथे पर पसीना था।

“फिर पेट दर्द है, गुड़िया?” उसने धीरे से पूछा।

तारा ने पलकें उठाईं, होंठ काँपे, “पापा… स्कूल नहीं जाना…”

नैना तुरंत बीच में बोली, “उसकी तबीयत अभी भी नाज़ुक है, अर्जुन। डॉक्टर ने भी कहा था ना कि उसे हल्का रखना है। बाहर का खाना, स्कूल का शोर, बच्चों की गंदगी… सब नुकसान करता है। मैं घर पर ही उसके व्यायाम करा दूँगी।”

अर्जुन ने सिर हिला दिया। पिछले कई महीनों से यही सुन रहा था। तारा कमज़ोर है। तारा का पेट खराब है। तारा को मीठा नहीं देना। तारा को ज्यादा खिलाओगे तो उल्टी करेगी। और अर्जुन, बैठकों, उड़ानों और सौदों में उलझा हुआ, हर बार मानता रहा।

रसोई के दरवाज़े पर शांति बुआ खड़ी थीं, जो अनन्या के समय से घर में थीं। उनके चेहरे पर दबा हुआ गुस्सा था। उन्होंने अर्जुन को देखा, जैसे कुछ कहना चाहती हों, मगर नैना की नज़र पड़ते ही चुप हो गईं।

एयरपोर्ट निकलने से पहले तारा दौड़कर आई और अर्जुन की हथेली में एक कागज़ दबा गई। उस पर एक बड़ा घर बना था, जिसकी सारी खिड़कियाँ काली थीं। बीच में एक छोटी बच्ची थी, जिसके मुँह की जगह खाली सफेद गोला था।

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अर्जुन ने पूछा, “यह क्या है, बेटा?”

तारा ने जवाब देने से पहले नैना की तरफ देखा और सहम गई।

“चलो,” नैना ने मुस्कुराते हुए कहा, “आज साँस रोकने वाला अभ्यास करना है।”

अर्जुन कार में बैठ गया। रास्ते में भारी बारिश शुरू हुई। एयरपोर्ट पहुँचते-पहुँचते पता चला कि उसकी मुंबई वाली उड़ान रद्द हो गई है। अजीब तरह से उसे राहत मिली। उसने ड्राइवर से कहा कि बंगले वापस चलो। रास्ते में वह तारा के लिए गुलाबी गुड़िया और गर्म जलेबी भी खरीद लाया। उसे लगा, आज अचानक लौटकर वह बेटी को खुश कर देगा।

लेकिन जब वह चुपचाप घर में दाखिल हुआ, पूरा बंगला अंधेरा और डरा हुआ लग रहा था।

ऊपर से एक टक-टक की आवाज़ आ रही थी।

फिर नैना की कड़क आवाज़ गूँजी, “पीठ सीधी रखो। अगर किताब गिरी, तो शुरू से शुरू करोगी।”

अर्जुन दबे पाँव फैमिली रूम के पास पहुँचा। दरवाज़ा थोड़ा खुला था। उसने अंदर झाँका, और उसकी साँस रुक गई।

तारा लकड़ी के छोटे चौकोर तख्ते पर 1 पैर पर खड़ी थी। उसके सिर पर मोटी संस्कृत शब्दकोश रखी थी। हाथ फैलाए हुए, शरीर काँप रहा था, होंठ सूखे थे, आँखों में आँसू अटके थे।

और सामने सोफे पर बैठी नैना उसे ऐसे देख रही थी, जैसे वह बच्ची नहीं, कोई टूटी हुई चीज़ हो जिसे तराशना हो।

तभी तारा ने फुसफुसाया, “मम्मा… भूख लगी है…”

नैना उठी, मुस्कुराई और बोली, “भूख कमजोरी की पहली निशानी है।”

अर्जुन ने दरवाज़ा धक्का देकर खोल दिया।

PART 2

दरवाज़े की आवाज़ से तारा घबरा गई। शब्दकोश धड़ाम से गिरा, और वह खुद घुटनों के बल फर्श पर आ पड़ी। अर्जुन दौड़कर उसे उठाने गया, मगर तारा पीछे हट गई।

“नहीं पापा… प्लीज़… मैं फिर से करूँगी… मुझे मत छोड़ना…”

अर्जुन का सीना फट गया। उसकी बेटी दर्द से नहीं, उससे डर रही थी।

शांति बुआ भागती हुई आईं। उन्होंने अपने आँचल से तारा को ढका और जेब से सूखी रोटी का टुकड़ा निकाला। तारा ने उसे ऐसे पकड़ा, जैसे कोई डूबता बच्चा साँस पकड़ता है। वह रोटी चबाने लगी, जल्दी-जल्दी, बिना ऊपर देखे।

अर्जुन पत्थर हो गया।

उसकी करोड़ों की वारिस बेटी अपने ही घर में छिपकर सूखी रोटी खा रही थी।

शांति बुआ रो पड़ीं, “साहब, आँख खोलिए। जब आप जाते हैं, यह इसे घंटों खड़ा रखती है। खाना नहीं देती। कहती है मोटी हो जाएगी, बदसूरत हो जाएगी, और आप प्यार करना छोड़ देंगे।”

नैना की आँखों में शर्म नहीं थी। बस ठंडी नाराज़गी थी।

“मैं इसे मजबूत बना रही हूँ,” उसने कहा। “तुम लोग इसे कमजोर बना रहे हो।”

अर्जुन ने तारा को बाँहों में लिया। इस बार बच्ची ने विरोध नहीं किया। वह उसके सीने से चिपककर बेहोश-सी ढीली पड़ गई।

अस्पताल में रिपोर्ट आई तो सच चाकू की तरह उतरा।

तारा बीमार नहीं थी।

वह कुपोषित थी।

और डॉक्टर ने धीमे स्वर में कहा, “शरीर ठीक हो जाएगा, मगर इस बच्ची को यह विश्वास दिलाना कठिन होगा कि प्यार कमाने के लिए भूखा रहना जरूरी नहीं।”

उसी रात अर्जुन घर लौटा।

उसे नहीं पता था कि नैना के कमरे की अलमारी में छिपी डायरी उसकी दुनिया की आखिरी गलतफहमी भी तोड़ देगी।

PART 3

बंगला रात में पहले से भी बड़ा और खाली लग रहा था। बाहर बारिश शीशे की दीवारों पर बह रही थी, भीतर संगमरमर की फर्श पर अर्जुन के कदमों की आवाज़ गूँज रही थी। वह सीधे नैना के कमरे में नहीं गया। पहले वह उसी फैमिली रूम में गया, जहाँ उसने अपनी बेटी को 1 पैर पर काँपते देखा था।

फर्श पर अब भी शब्दकोश पड़ा था। लकड़ी का तख्ता कोने में टिकाया था। छोटी-सी मेज पर पीतल की घंटी, स्टील का टाइमर, वजन नापने की मशीन और एक मोटी कॉपी रखी थी। दीवार पर तारा की कई तस्वीरें पिन से चिपकी थीं। हर तस्वीर में लाल गोले बने थे—गाल, पेट, ठुड्डी, हाथ। जैसे कोई 4 साल की बच्ची नहीं, निरीक्षण की वस्तु हो।

अर्जुन के हाथ काँप गए।

उसने कॉपी खोली।

पहले पन्ने पर साफ अक्षरों में लिखा था, “प्रोजेक्ट मोरनी।”

नीचे तारीखें थीं। समय था। भोजन की सूची थी। दंड की सूची थी।

“दिन 12: तारा ने पराठे की माँग की। नियंत्रण कमजोर। रात का खाना आधा।”

“दिन 19: दादी जैसी नौकरानी ने बिस्किट देने की कोशिश की। निगरानी बढ़ानी होगी।”

“दिन 31: बच्ची ने कहा पापा गोद में लें। भावनात्मक निर्भरता खतरनाक है।”

“दिन 46: स्कूल जाने की जिद। बाहर के बच्चों से बिगड़ सकती है। अलगाव जारी रखना है।”

अर्जुन की आँखों के सामने महीनों की यादें घूम गईं। तारा का धीरे-धीरे चुप हो जाना। उसका हर निवाला खाने से पहले नैना की तरफ देखना। रात में नींद में “माफ कर दो” बड़बड़ाना। और वह खुद, अपनी व्यस्तता की आड़ में, हर संकेत को बीमारी समझता रहा।

अगले पन्ने पर तस्वीर चिपकी थी। किसी पुराने बाल-सौंदर्य प्रतियोगिता की। तस्वीर में 8 या 9 साल की एक लड़की भारी लहंगे, चमकदार मेकअप और नकली मुस्कान में खड़ी थी। हाथ में दूसरा स्थान वाला ट्रॉफी था। उसकी आँखें रोने से सूजी थीं। पीछे एक सख्त चेहरे वाली औरत खड़ी थी, होंठ तिरछे, जैसे दूसरा स्थान अपराध हो।

तस्वीर के पीछे लिखा था, “नैना, 1998। माँ ने कहा था, अगर सुंदर नहीं बनी तो कोई प्यार नहीं करेगा।”

अर्जुन कुर्सी पर बैठ गया। कुछ पल के लिए कमरे की दीवारें धुंधली हो गईं।

सच डरावना था। नैना ने अपनी माँ से जो जहर पिया था, वही तारा के मुँह में डाल रही थी। उसके भीतर की टूटी बच्ची ने किसी और बच्ची को तोड़ना शुरू कर दिया था। यह दुखद था, मगर माफी नहीं था। किसी की टूटी हुई आत्मा को किसी मासूम की हड्डियों और भूख पर खड़ा होने का अधिकार नहीं था।

पीछे से पायल की हल्की आवाज़ आई।

नैना दरवाज़े पर खड़ी थी। उसने शायद रोया था, मगर अब चेहरा फिर से सँवारा हुआ था। बाल ठीक, साड़ी ठीक, आवाज़ कोमल बनाने की कोशिश में।

“अर्जुन,” उसने कहा, “तुम भावुक हो गए हो। मैंने कुछ गलत नहीं किया। मैं उसे इस समाज के लिए तैयार कर रही थी। यहाँ हर लड़की को देखा जाता है, तौला जाता है, आँका जाता है। मैं उसे बचा रही थी।”

अर्जुन ने डायरी उठाकर उसकी तरफ फेंकी। डायरी फर्श पर खुल गई।

“बचा रही थी?” उसकी आवाज़ धीमी थी, पर इतनी ठंडी कि नैना का चेहरा उतर गया। “तुमने मेरी बेटी को यह विश्वास दिलाया कि उसे प्यार पाने के लिए भूखा रहना पड़ेगा।”

नैना की आँखों में पहली बार बेचैनी आई।

“तुम नहीं समझोगे। अनन्या ने उसे बिगाड़ दिया था। तुमने भी। गोद, मिठाई, कहानियाँ, स्कूल की बेवकूफी। बच्चे फूल नहीं होते, अर्जुन। उन्हें आकार देना पड़ता है।”

“वह बच्ची है,” अर्जुन ने दाँत भींचकर कहा। “पत्थर नहीं।”

“और तुम?” नैना अचानक चीखी। “तुम कहाँ थे? तुमने कब देखा कि वह क्या खा रही है? कब पूछा कि वह स्कूल क्यों नहीं जा रही? कब जाना कि वह रात में क्यों काँपती है? तुम मुझे दोष दे सकते हो, लेकिन तुम भी नहीं थे।”

यह वाक्य अर्जुन के भीतर की सबसे गहरी जगह पर लगा। वह चुप हो गया। क्योंकि उसमें सच का एक टुकड़ा था। वह पिता था, मगर उसने भरोसे को जिम्मेदारी समझने की भूल की थी। उसने नैना को पत्नी मानकर बेटी की आवाज़ अनसुनी कर दी थी। उसने शांति बुआ की आँखों में छिपी चेतावनी देखी थी, मगर सुविधा के लिए नजर फेर ली थी।

पर अपराध स्वीकारना और अपराधी को छोड़ देना अलग बात थी।

उसने फोन उठाया। “इंस्पेक्टर राठौड़, आप अंदर आ सकते हैं।”

नैना पीछे मुड़ी। मुख्य दरवाज़े से 2 पुलिसकर्मी, अर्जुन का वकील और बाल संरक्षण अधिकारी अंदर आए। शांति बुआ भी थीं, उनकी बाँहों में तारा का छोटा कंबल था। तारा अस्पताल में डॉक्टरों की निगरानी में थी, मगर शांति बुआ ने वह कंबल साथ रखा था, जैसे बच्ची की गवाही कपड़े में भी सांस ले रही हो।

वकील ने फाइल मेज पर रखी।

“यह शिकायत है,” अर्जुन बोला। “यह अस्पताल की रिपोर्ट है। यह घर के कैमरों की फुटेज है। यह डायरी है। और यह तलाक के कागज़ हैं। आज से तुम इस घर, मेरी बेटी, मेरे बैंक खातों, मेरे परिवार और मेरे नाम से बाहर हो।”

नैना का चेहरा सफेद पड़ गया।

“तुम मुझे जेल भिजवाओगे?”

“मैं तुम्हें वही दिखाऊँगा जो तुमने तारा को दिखाया था,” अर्जुन ने कहा, “पर फर्क इतना है कि तुम्हारे साथ कानून होगा। उसके साथ तो सिर्फ डर था।”

पुलिस ने नैना को वहीं गिरफ्तार नहीं किया, क्योंकि प्रक्रिया पूरी करनी थी, बयान लेने थे, चिकित्सा और मानसिक मूल्यांकन भी होना था। मगर उसी रात उसे बंगले से बाहर कर दिया गया। अदालत से अस्थायी रोक आदेश जारी हुआ। उसे तारा से मिलने, संपर्क करने, स्कूल या अस्पताल के पास जाने की मनाही हुई। उसके निजी खातों की जाँच शुरू हुई, क्योंकि अर्जुन को बाद में पता चला कि उसने तारा के नाम की ट्रस्ट राशि से निजी सौंदर्य केंद्र खोलने की योजना बनाई थी—एक ऐसी जगह जहाँ “बच्चियों का व्यक्तित्व निर्माण” नाम पर वही क्रूरता बिकने वाली थी।

अर्जुन ने वह योजना भी बंद करवा दी।

पर सबसे कठिन लड़ाई अदालत में नहीं, अस्पताल के छोटे कमरे में शुरू हुई।

तारा बिस्तर पर बैठी थी। उसकी बाँह में सलाइन लगी थी। सामने खिचड़ी का कटोरा था। वह चम्मच उठाती, फिर अर्जुन की तरफ देखती, जैसे अनुमति माँग रही हो।

अर्जुन ने मुस्कुराने की कोशिश की। “खा लो, गुड़िया।”

“ज्यादा खाऊँगी तो आप नाराज़ होंगे?” उसने पूछा।

अर्जुन ने उसी पल महसूस किया कि उसकी असली सज़ा नैना को बर्बाद करना नहीं थी। असली सज़ा यह थी कि वह हर दिन अपनी बेटी की आँखों में अपने भरोसे की विफलता देखेगा।

वह कुर्सी से उठा, तारा के पास बैठा और कटोरा अपनी तरफ खींच लिया।

“आज पापा पहले खाएँगे।”

उसने 1 चम्मच खिचड़ी खाई और आँखें बंद करके बोला, “वाह। शांति बुआ के हाथ की खिचड़ी तो दिल्ली के बड़े-बड़े होटल से भी अच्छी है।”

शांति बुआ, जो दरवाज़े के पास खड़ी थीं, रोते-रोते हँस पड़ीं।

तारा ने धीरे से पूछा, “सच?”

“बिलकुल सच।”

उसने काँपते हाथ से चम्मच उठाया। थोड़ा-सा खाया। फिर आँखें बंद कर लीं। उसके चेहरे पर डर और राहत दोनों तैर रहे थे। जैसे उसका शरीर खाना पहचान रहा था, मगर मन अभी भी उसे अपराध समझ रहा था।

अगले कई हफ्ते इसी तरह गुजरे।

तारा अचानक प्लेट छिपा देती। कभी शीशे में पेट देखती। कभी रात में उठकर कहती, “मैं अच्छी बच्ची हूँ ना?” कभी दरवाज़े के पीछे खड़ी होकर अपने ही कमरे में जाने से डरती, क्योंकि उसे लगता था कोई फिर लकड़ी के तख्ते पर खड़ा कर देगा।

अर्जुन ने अपना दफ्तर घर से चलाना शुरू किया। बोर्ड मीटिंगें छोटी कर दीं। विदेश यात्राएँ रद्द कीं। लोग बोले, कारोबार गिर जाएगा। उसने कहा, “गिरने दो। बच्ची का बचपन एक बार गया तो वापस नहीं आएगा।”

उसने बंगला बेच दिया।

लोग हैरान रह गए। वही बंगला जो उसके पिता ने खरीदा था, वही जिसके ड्राइंग रूम में बड़े राजनेता और उद्योगपति बैठते थे। मगर अर्जुन के लिए वह घर अब घर नहीं रहा था। उसकी दीवारों में तारा की सिसकियाँ बंद थीं। उसने उसे एक ट्रस्ट को बेच दिया, जो बेघर बच्चों के लिए आश्रय बनाना चाहता था। शर्त बस 1 थी—ऊपर वाले फैमिली रूम को खेलघर बनाया जाएगा, जहाँ किसी बच्चे को कभी चुप खड़ा नहीं रखा जाएगा।

अर्जुन, तारा और शांति बुआ दिल्ली के शांत इलाके में एक छोटे-से घर में रहने लगे। वहाँ संगमरमर नहीं था, मगर आँगन था। तुलसी का गमला था। शाम को सड़क से चाट वाले की आवाज़ आती थी। पड़ोस की आंटियाँ बालकनी से पूछतीं, “बेटा, स्कूल कैसा था?” और तारा धीरे-धीरे जवाब देना सीख रही थी।

पहले दिन जब उसे नए स्कूल छोड़ा गया, वह गेट पर जम गई। उसकी उँगलियाँ अर्जुन की शर्ट में धँस गईं।

“मुझे सुधारने नहीं भेज रहे?” उसने पूछा।

अर्जुन घुटनों के बल बैठा। भीड़, बसें, हॉर्न, सब जैसे दूर हो गए।

“नहीं,” उसने कहा, “तुझे जीने भेज रहा हूँ। खेलने, सीखने, दोस्त बनाने। कोई तुझे सुधारने नहीं जा रहा, क्योंकि तू खराब बनी ही नहीं थी।”

तारा ने उसकी आँखों में लंबे समय तक देखा। फिर शांति बुआ ने उसके टिफिन का डिब्बा दिखाया।

“आलू पराठा है। और थोड़ा अचार भी। मैडम से छिपाना नहीं। खाना है।”

तारा ने पहली बार बिना डर के हल्की-सी मुस्कान दी।

अदालत का मामला महीनों चला। नैना ने पहले कहा कि यह सब गलतफहमी है। फिर कहा कि शांति बुआ ने साजिश की। फिर कहा कि अर्जुन उसे छोड़ना चाहता था, इसलिए झूठे आरोप लगाए। मगर डायरी, कैमरा, अस्पताल, मनोवैज्ञानिक रिपोर्ट और तारा की छोटी-छोटी बातों ने सच की परतें खोल दीं।

एक दिन अदालत में बाल मनोवैज्ञानिक ने तारा का बनाया चित्र दिखाया। पहले चित्र में काली खिड़कियों वाला घर था। दूसरे में 1 बच्ची थी जो बहुत छोटी थी और उसके ऊपर बहुत बड़ी किताब रखी थी। तीसरे में वही बच्ची एक आदमी का हाथ पकड़े खड़ी थी, और पास में एक बूढ़ी औरत रोटी लेकर मुस्कुरा रही थी।

न्यायाधीश ने लंबे समय तक चित्र देखा।

फैसले में नैना को तारा से दूर रहने का स्थायी आदेश मिला। उसके खिलाफ बाल उत्पीड़न, मानसिक प्रताड़ना और भोजन से वंचित करने के आरोपों में मामला आगे बढ़ा। उसे अनिवार्य मनोचिकित्सीय उपचार के आदेश भी दिए गए। अदालत ने यह भी लिखा कि बचपन पर नियंत्रण के नाम पर की गई क्रूरता, अनुशासन नहीं अपराध है।

नैना के माता-पिता अदालत के बाहर चुप खड़े रहे। उनकी आँखों में पहली बार वह शर्म दिखी, जो शायद 20 साल पहले दिख जाती तो तारा की जिंदगी बच जाती। नैना ने अर्जुन की तरफ देखा। वहाँ न नफरत थी, न दया। बस एक दीवार थी, जो अब कभी नहीं टूटने वाली थी।

लेकिन कहानी का असली अंत अदालत में नहीं हुआ।

वह एक बरसाती शाम को हुआ।

दिल्ली में मानसून की पहली तेज बारिश थी। तारा खिड़की से बाहर देख रही थी। आँगन में पानी भर गया था। मिट्टी की खुशबू कमरे तक आ रही थी। पहले वह बारिश से डरती थी, क्योंकि पुराने बंगले में बारिश का मतलब था अँधेरा, बंद कमरा और टक-टक करती घड़ी। आज अर्जुन ने धीरे से दरवाज़ा खोला।

“चलें?” उसने पूछा।

तारा ने घबराकर कहा, “कपड़े गंदे हो जाएँगे।”

शांति बुआ रसोई से चिल्लाईं, “गंदे कपड़े धुल जाते हैं। बचपन नहीं धुलता।”

अर्जुन हँस पड़ा। उसने अपनी चप्पलें उतारीं और आँगन में उतर गया। फिर उसने जानबूझकर कीचड़ में पैर मारा। पानी उछलकर उसके कुर्ते पर पड़ा। तारा की आँखें फैल गईं। यह वही आदमी था जो कभी महँगे सूट में रहता था। अब वह कीचड़ में खड़ा था, दोनों हाथ फैलाए, जैसे दुनिया का सबसे बड़ा सौदा जीत लिया हो।

तारा धीरे-धीरे बाहर आई। पहली बूंद उसके चेहरे पर पड़ी। उसने आँखें बंद कीं। फिर 1 कदम और। फिर दूसरा। अचानक वह फिसली, अर्जुन ने पकड़ लिया। एक पल के लिए डर उसके चेहरे पर लौटा।

“गिरी तो?” उसने पूछा।

अर्जुन ने उसे बाँहों में उठाकर कहा, “तो फिर उठेंगे। सज़ा नहीं मिलेगी।”

तारा ने उसे देखा। फिर उसके होंठ काँपे। फिर उसके गले से वह आवाज़ निकली जिसका इंतजार अर्जुन महीनों से कर रहा था—सच्ची, खुली, बेपरवाह हँसी।

शांति बुआ दरवाज़े पर खड़ी रो रही थीं। उनके हाथ में गरम पकौड़ों की प्लेट थी। तारा की हँसी बारिश से भी तेज गूँज रही थी। वह कीचड़ में कूदी, पानी उछाला, अपने फ्रॉक पर मिट्टी लगाई और पहली बार अपने गंदे होने पर डरने के बजाय खुश हुई।

उस रात उसने अर्जुन को एक नया चित्र दिया।

कागज़ पर घर छोटा था, पर खिड़कियाँ पीली रोशनी से भरी थीं। आँगन में बारिश थी। 1 बच्ची थी, 1 आदमी था, 1 बूढ़ी औरत थी। उनके बीच गोल मेज पर पराठे, जलेबी और चॉकलेट आइसक्रीम बनी थी। सबसे ऊपर बड़ा सूरज बना था, जबकि चित्र में बारिश भी थी।

अर्जुन ने पूछा, “बारिश में सूरज?”

तारा ने धीरे से कहा, “हाँ। क्योंकि अब घर में अँधेरा नहीं है।”

अर्जुन ने कागज़ सीने से लगा लिया। उसकी आँखें भर आईं। उसे पता था कि घाव पूरी तरह भरने में लंबा समय लगेगा। तारा अभी भी कभी-कभी रात में चौंक जाएगी। कभी खाने से पहले अनुमति माँगेगी। कभी किसी ऊँची आवाज़ पर काँप जाएगी। मगर अब वह अकेली नहीं थी। अब हर डर के सामने कोई खड़ा था। अब हर झूठ के सामने सच था। अब हर दंड के सामने बाँहें थीं।

कुछ साल बाद जब लोग अर्जुन मल्होत्रा से पूछते कि उसने अपनी सबसे बड़ी जीत कौन-सी मानी, वह किसी कंपनी, सौदे या संपत्ति का नाम नहीं लेता। वह बस उस शाम को याद करता जब उसकी बेटी ने कीचड़ में खड़े होकर हँसना सीखा था।

क्योंकि कभी-कभी बच्चे को बचाने के लिए महल छोड़ना पड़ता है।

कभी-कभी खून का रिश्ता नहीं, रोटी छिपाकर देने वाली हथेलियाँ परिवार बन जाती हैं।

और कभी-कभी सबसे डरावना दुश्मन बाहर नहीं होता।

वह पूजा की थाली सजाता है, मीठी आवाज़ में बोलता है, घर की इज्जत का नाम लेता है… और खुद को परिवार कहता है।

Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.