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अस्पताल के ठंडे गलियारे में 3 शवों के सामने वह अकेली खड़ी रही, जब घरवालों ने सगाई चुनी; 7 दिन बाद उसी परिवार ने कहा, “दावत में पनीर बना देना,” और बीमा ने उनका असली चेहरा खोल दिया

PART 1

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रात 21:47 बजे जयपुर के सवाई मानसिंह अस्पताल के ठंडे गलियारे में नंदिनी अकेली 3 सफेद चादरों के सामने खड़ी थी, और उसकी माँ ने फोन पर कहा था कि वे अभी नहीं आ सकते, क्योंकि छोटी बहन की सगाई में मेहमानों को मिठाई खिलाई जा रही थी।

नंदिनी के हाथ में अब भी वही मोबाइल था, जिससे उसकी आखिरी उम्मीद टूटकर फर्श पर बिखर गई थी। फोन के उस पार ढोलक की आवाज, औरतों की हँसी, प्लेटों की खनक और किसी की तेज आवाज आ रही थी—“जल्दी आओ, रिंग सेरेमनी शुरू हो रही है!”

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उसने काँपती आवाज में कहा था, “माँ… अर्जुन नहीं रहा। आर्या भी नहीं… कबीर भी नहीं। मुझे आपकी जरूरत है।”

कुछ पल चुप्पी रही, फिर सावित्री देवी की आवाज आई, थकी हुई नहीं, परेशान भी नहीं—बस झुंझलाहट भरी।

“नंदिनी, अभी कैसे आएँ? पूरी बिरादरी बैठी है। रिया की सगाई है। लोग क्या कहेंगे अगर हम बीच में उठकर चले गए?”

नंदिनी को लगा, शायद माँ ने सुना नहीं।

“माँ, मेरे बच्चे मर गए।”

फोन के उस पार फिर वही संगीत था। फिर सावित्री बोलीं, “किसी नर्स को बोलो तुम्हारे साथ रहे। हम सुबह आ जाएँगे। अभी माहौल खराब मत करो।”

लाइन कट गई।

नंदिनी ने मोबाइल कान से हटाया भी नहीं। जैसे आवाज लौट आएगी। जैसे माँ कहेगी—“रुक, मैं आ रही हूँ।” लेकिन दरवाजे के पीछे अर्जुन, 38 साल का उसका पति, आर्या, 7 साल की उसकी बेटी, और कबीर, 4 साल का उसका बेटा, अब सिर्फ 3 शव थे।

अर्जुन जयपुर के एक सरकारी स्कूल में इतिहास पढ़ाता था। आर्या को मोर बनाना पसंद था और वह हर कॉपी के कोने में नीले-हरे पंख बना देती थी। कबीर अपने पीले हाथी वाले खिलौने “गज्जू” को हर जगह साथ ले जाता था।

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उस शाम अर्जुन बच्चों को कथक क्लास से लेकर लौट रहा था। एक शराबी बिल्डर ने लाल बत्ती तोड़कर एसयूवी उनकी छोटी कार पर चढ़ा दी। अर्जुन ने मौके पर दम तोड़ दिया। आर्या एम्बुलेंस में चली गई। कबीर 23 मिनट तक अस्पताल में साँसों से लड़ता रहा, पर नंदिनी उसके आखिरी शब्द सुनने से पहले पहुँच नहीं पाई।

जब डॉक्टर ने पूछा, “पहचान कर लेंगी?” तो नंदिनी ने सिर हिलाया। उसने पहले अर्जुन की घड़ी पहचानी, फिर आर्या की गुलाबी क्लिप, फिर कबीर का एक छोटा मोजा, जिस पर हाथी बना था।

उसने चीख नहीं मारी। दर्द इतना गहरा था कि आवाज बनने से पहले ही मर गया।

रात 23:12 पर पिता महेश जी का फोन आया। उन्होंने कहा, “बेटा, तुम्हारी माँ ने बताया। बहुत दुख हुआ। लेकिन अभी देर हो गई है। तुम्हारी माँ ने दवा ले ली है। हम कल देखेंगे।”

“पापा, आप आओगे?”

“अभी? नंदिनी, थोड़ा संभलकर बात करो। हम भी सदमे में हैं।”

रिया का मैसेज 00:03 पर आया—“मुझे बहुत बुरा लग रहा है। जब तुम थोड़ी शांत हो जाओगी, तब बात करेंगे।”

नंदिनी ने वह वाक्य 14 बार पढ़ा। “जब तुम थोड़ी शांत हो जाओगी।” जैसे उसका पति और बच्चे किसी झगड़े में नहीं, मर गए थे।

अस्पताल की नर्स मीरा ने उसका हाथ पकड़ा और कहा, “दीदी, बैठ जाइए।”

लेकिन नंदिनी बैठी नहीं। उसे डर था, अगर वह बैठ गई, तो सच उसके सीने पर चढ़ बैठेगा।

4 दिन बाद अंतिम संस्कार हुआ। श्मशान घाट में 3 चिताएँ थीं। एक बड़ी, 2 इतनी छोटी कि पूरा आसमान शर्म से झुक जाए। अर्जुन के सहकर्मी आए। नंदिनी की सहेलियाँ आईं। पड़ोसी शर्मा अंकल चुपचाप उसके लिए छाता पकड़े रहे। मीरा ने कबीर का गज्जू उसके पास रख दिया। नंदिनी ने आर्या के हाथ में छोटा सा मोर वाला लॉकेट रखा और अर्जुन की जेब में परिवार की एक फोटो।

पहली पंक्ति में 4 जगह खाली रहीं—माँ, पिता, रिया और रिया के मंगेतर करण के लिए।

वे नहीं आए।

और उसी रात, नंदिनी को पहली बार समझ आया कि मौत हमेशा सड़क पर नहीं होती। कभी-कभी वह परिवार के भीतर भी होती है।

PART 2

7 दिन बाद सुबह 10:18 पर सावित्री देवी ने फोन किया।

नंदिनी ने फोन इसलिए उठाया क्योंकि उसके भीतर कहीं टूटी हुई बच्ची अब भी माँ से बस एक वाक्य सुनना चाहती थी—“माफ कर दे, बेटी। हमें आना चाहिए था।”

लेकिन सावित्री बोलीं, “रविवार को रिया के ससुराल वाले खाने पर आ रहे हैं। तुम अपनी पनीर कोफ्ता वाली सब्जी बना देना। सबको बहुत पसंद है।”

नंदिनी ने फ्रिज पर लगी अर्जुन, आर्या और कबीर की फोटो देखी। तीनों आमेर किले के सामने हँस रहे थे।

“माँ, मैंने 7 दिन पहले अपने पति और बच्चों को जलाया है।”

“इसीलिए तो कह रही हूँ, लोगों में बैठोगी तो मन बदलेगा। वैसे भी रिया को खाना बनाना नहीं आता।”

नंदिनी के भीतर कुछ टूटने के बजाय इस बार सीधा खड़ा हो गया।

“मैं नहीं आऊँगी। खाना भी नहीं बनाऊँगी।”

फोन के उस पार सावित्री की साँस भारी हुई। “अब तुम पूरी परिवार को सजा दोगी?”

“आप लोग आए नहीं थे।”

“कितनी बार यही सुनाओगी?”

नंदिनी ने फोन काट दिया। उसने माँ, पिता, रिया और करण के नंबर ब्लॉक कर दिए। परिवार के व्हाट्सऐप ग्रुप में बस लिखा—“मुझे अकेला छोड़ दीजिए।”

सावित्री ने तुरंत जवाब दिया—“शर्म करो। दुख सिर्फ तुम्हें नहीं है।”

रिया ने लिखा—“ड्रामा करना बंद करो।”

नंदिनी ने ग्रुप छोड़ दिया।

उसे नहीं पता था कि असली धोखा अभी बाकी था।

PART 3

घर में पहली बार सन्नाटा साफ लग रहा था। पहले यही सन्नाटा उसे काटता था, अब उसी में थोड़ी इज्जत थी। कोई उसे सुबह-सुबह फोन करके नहीं कहता था कि रिया के मेहमान आ रहे हैं, जल्दी आकर रसोई संभाल लो। कोई यह नहीं कहता था कि 50000 रुपये अभी दे दो, बाद में लौटा देंगे। कोई यह नहीं कहता था कि “नंदिनी मजबूत है, इसे संभालने की जरूरत नहीं।”

अर्जुन अक्सर उसे समझाता था, “वे तुम्हें नहीं देखते, नंदू। वे बस तुम्हारी सेवा देखते हैं।”

नंदिनी हमेशा कहती, “पर वे मेरे अपने हैं।”

अर्जुन मुस्कुराकर कहता, “अपने वह होते हैं जिनके बीच तुम गायब नहीं होती।”

अब अर्जुन नहीं था। लेकिन उसके कहे हुए शब्द दीवारों में साँस लेते थे।

तीसरे हफ्ते नंदिनी को एक अनजान नंबर से फोन आया। आवाज शांत थी।

“क्या मैं नंदिनी शर्मा से बात कर रहा हूँ? मैं अधिवक्ता विक्रम मेहता बोल रहा हूँ, दिल्ली से। आपके पति अर्जुन शर्मा ने मुझे कुछ कानूनी कामों के लिए नियुक्त किया था। उन्होंने कहा था, अगर उन्हें कुछ हो जाए, तो मैं आपसे संपर्क करूँ।”

नंदिनी को लगा, शायद कोई गलती है। अर्जुन ने कभी किसी वकील का जिक्र नहीं किया था।

2 दिन बाद वह दिल्ली पहुँची। विक्रम मेहता का ऑफिस कनॉट प्लेस की पुरानी इमारत में था। अंदर लकड़ी की अलमारियाँ, फाइलों की गंध और ऐसी खामोशी थी, जिसमें कोई दर्द को जल्दी खत्म करने की कोशिश नहीं कर रहा था।

वकील ने उसके सामने एक फाइल रखी।

“आपके पति ने 9 महीने पहले एक जीवन बीमा योजना ली थी। इसमें उन्होंने आपको अकेली लाभार्थी बनाया था।”

नंदिनी ने सूनी आँखों से कागज देखा।

राशि लिखी थी—₹28000000।

उसने कागज पर हाथ रखा। “यह कैसे हो सकता है? अर्जुन तो स्कूल टीचर था।”

विक्रम ने धीमे से कहा, “शिक्षक बनने से पहले वे एक शैक्षणिक ऐप के सह-संस्थापक थे। अपनी हिस्सेदारी बेचने पर उन्हें अच्छी रकम मिली थी। उन्होंने उसे निवेश किया। उनका कहना था कि आप और बच्चे सुरक्षित रहें।”

नंदिनी का गला भर आया। “उन्होंने मुझे बताया क्यों नहीं?”

“उन्होंने कहा था, आप बुरे समय की बात सुनना पसंद नहीं करेंगी।”

फिर वकील ने एक लिफाफा उसकी ओर बढ़ाया। उस पर अर्जुन की लिखावट थी—“नंदिनी के लिए, अगर मैं बोलने के लिए न रहूँ।”

नंदिनी ने लिफाफा नहीं खोला। हाथ काँप रहे थे।

विक्रम मेहता ने कहा, “उन्होंने कहा था, अगर आप तुरंत पत्र न पढ़ पाएँ, तो मैं आपको एक पंक्ति पढ़कर सुनाऊँ।”

नंदिनी ने सिर उठाया।

“उन्होंने लिखा है—‘तुमने सारी जिंदगी दूसरों को उठाया है, अब मुझे तुम्हें आखिरी बार संभालने दो।’”

वह वहीं टूट गई। रोना इस बार अस्पताल जैसा बेजान नहीं था। इस बार आँसू में अर्जुन की हथेली थी, जैसे मौत के बाद भी उसने उसके सिर के नीचे तकिया रख दिया हो।

कई हफ्ते तक नंदिनी ने पैसे को छुआ भी नहीं। वह उसी घर में रहती रही जहाँ अर्जुन की चप्पलें दरवाजे पर थीं, आर्या की आधी बनी मोर वाली ड्राइंग मेज पर थी, और कबीर का गज्जू हर सुबह सोफे के कोने से उसे देखता था।

एक रात उसने अर्जुन का पत्र पूरा पढ़ा। उसमें एक पंक्ति ने उसे भीतर तक बदल दिया—

“मेरी मौत को उन लोगों का सहारा मत बनने देना, जिन्होंने जिंदगी भर तुमसे लिया और कभी लौटाया नहीं। इसे हमारे प्यार जैसा कुछ बना देना।”

अगले दिन उसने विक्रम मेहता को फोन किया।

“मैं एक ट्रस्ट बनाना चाहती हूँ। उन परिवारों के लिए जिन्हें शराब पीकर गाड़ी चलाने वालों ने तोड़ दिया है। अंतिम संस्कार, किराया, बच्चों की पढ़ाई, मनोवैज्ञानिक मदद, वकील… जो कुछ उस रात मुझे अकेले झेलना पड़ा।”

ट्रस्ट का नाम रखा गया—“3 दीप।” अर्जुन, आर्या, कबीर।

4 महीने में “3 दीप” ने राजस्थान और दिल्ली के 11 परिवारों की मदद की। अलवर की एक माँ अपने बेटे का सम्मान से अंतिम संस्कार कर पाई। अजमेर के एक पिता ने अपनी घायल बेटी के लिए व्हीलचेयर खरीदी। गुरुग्राम की एक विधवा को 6 महीने का किराया और काउंसलिंग मिली।

एक हिंदी डिजिटल पोर्टल ने नंदिनी पर लेख छापा—“पति और 2 बच्चों को खोने वाली महिला ने दर्द को सहारे में बदला।”

लेख वायरल हो गया। हजारों लोगों ने शेयर किया। लोगों ने अर्जुन, आर्या और कबीर को बिना जाने रोया। कमेंट्स में लोग अपनी कहानियाँ लिखने लगे। उसी लेख की एक छोटी पंक्ति ने आग लगा दी—

“अंतिम संस्कार में नंदिनी के करीबी मायके वाले मौजूद नहीं थे।”

इसके बाद सावित्री देवी लौट आईं।

पहले चचेरी बहन के फोन से मैसेज आया—“बात करनी है। तुम्हारी वजह से हमारी बहुत बदनामी हो रही है।”

फिर घर के दरवाजे पर चिट्ठी मिली—“माँ-बाप को समाज में नीचा दिखाना पाप है।”

फिर एक सुबह रिया फूलों का गुलदस्ता लेकर दरवाजे पर खड़ी थी। नंदिनी ने उसे डोर कैमरा में देखा। मन हुआ दरवाजा न खोले। फिर अर्जुन याद आया। वह सच से भागता नहीं था।

नंदिनी ने दरवाजा खोला, पर चेन नहीं हटाई।

“क्या चाहिए?”

रिया ने गुलदस्ता ऊपर किया। “दीदी, देखने आई थी कि तुम कैसी हो।”

“5 महीने बाद?”

“तुम बात नहीं कर रही थीं।”

“जब मैं बात कर रही थी, तब तुम लोग नहीं थे।”

रिया का चेहरा तना। “मम्मी बहुत टूट गई हैं। मंदिर में, बाजार में, रिश्तेदारों में सब उन्हें जज कर रहे हैं।”

“क्योंकि वे अपने नाती-नातिन के अंतिम संस्कार में नहीं आईं।”

“उस दिन स्थिति मुश्किल थी।”

“नहीं। उस दिन सगाई थी।”

रिया की आँखें कठोर हो गईं। “तुम कब तक हमें अपमानित करोगी?”

“मैंने सच बोला है।”

“सच बोलने का भी तरीका होता है।”

नंदिनी ने पहली बार अपनी बहन को साफ देखा। वह सिर्फ स्वार्थी नहीं थी। वह उस पुराने घर की राजकुमारी थी, जिसे डर था कि अगर नंदिनी ने झुकना बंद कर दिया, तो उसकी सारी सुविधा खत्म हो जाएगी।

“तुम मेरे लिए नहीं आई,” नंदिनी बोली। “तुम चाहती हो मैं सबके सामने कह दूँ कि मेरा परिवार बहुत अच्छा है।”

रिया चुप रही।

नंदिनी ने दरवाजा बंद कर दिया।

2 दिन बाद विक्रम मेहता का फोन आया।

“नंदिनी जी, आपकी माँ और बहन ने मेरे ऑफिस से संपर्क किया है। वे कहती हैं कि उनके पास अर्जुन जी का हस्ताक्षर किया हुआ एक निजी समझौता है।”

नंदिनी की उँगलियाँ ठंडी पड़ गईं।

“कैसा समझौता?”

“जिसमें लिखा है कि अर्जुन जी ने बीमा राशि का 35 प्रतिशत आपके माता-पिता को देने का वादा किया था, ताकि वे आपके शोक में आपका साथ दे सकें।”

कुछ सेकंड तक नंदिनी कुछ बोल नहीं पाई। फिर उसके मुँह से सूखी हँसी निकली।

“वे तो आए ही नहीं थे।”

“हाँ,” विक्रम ने कहा। “और एक और बात है। दस्तावेज की तारीख 6 सितंबर है। उस दिन अर्जुन जी अपने स्कूल के बच्चों के साथ उदयपुर शैक्षणिक यात्रा पर थे। हमारे पास होटल, बस और स्कूल के रिकॉर्ड हैं।”

अगले दिन नंदिनी ने उस कागज की कॉपी देखी। अर्जुन का हस्ताक्षर नीचे था। लगभग सही। इतना सही कि वह नकली लग रहा था। जैसे किसी ने प्यार नहीं, लालच से हाथ पकड़ा हो।

गवाह के रूप में महेश जी का नाम था—उसके पिता।

दूसरे गवाह के रूप में करण का नाम था—रिया का होने वाला पति।

फॉरेंसिक रिपोर्ट जल्दी आ गई। हस्ताक्षर अर्जुन के पुराने घर खरीद समझौते से स्कैन करके चिपकाए गए थे। वही कागज, जिसकी कॉपी नंदिनी ने कभी सावित्री को भेजी थी, क्योंकि माँ ने कहा था—“तुम्हें कागज संभालना नहीं आता, मुझे भेज दो।”

उस रात नंदिनी बहुत रोई। लेकिन यह शोक नहीं था। यह अपमान था। उन्होंने उसके बच्चों की चिता पर कदम नहीं रखा, फिर अर्जुन के मृत हाथ से पैसे माँगने की कोशिश की।

जब सावित्री ने अनजान नंबर से फोन किया, नंदिनी ने उठा लिया।

“किसने अर्जुन का साइन नकली बनाया?”

सावित्री की आवाज में घबराहट थी, पर पछतावा नहीं।

“हम बस देखना चाहते थे कि तुम पैसा बर्बाद न कर दो। तुम अजनबियों में बाँट रही हो, और अपना परिवार…”

“मेरा परिवार मुझे 3 शवों के सामने छोड़ गया था।”

“तुम हमेशा बात बढ़ाती हो।”

नंदिनी ने आँखें बंद कर लीं। यही वाक्य उसने बचपन में सुना था, जब रिया ने उसकी गुड़िया तोड़ी थी। यही तब सुना था, जब पिता उसका स्कूल फंक्शन भूल गए थे। यही तब सुना था, जब शादी के बाद भी माँ उसे हर त्योहार में रसोई में खड़ा कर देती थी।

“नहीं माँ,” उसने धीमे कहा, “पहली बार मैं बात नहीं बढ़ा रही। पहली बार मैं बात को उसके असली नाम से बुला रही हूँ।”

“तुम अपने पिता को जेल भेजोगी? पैसे के लिए?”

“यह पैसे के लिए नहीं है। यह अर्जुन के लिए है।”

“अर्जुन मर चुका है!”

यह वाक्य थप्पड़ की तरह गिरा।

नंदिनी ने जवाब दिया, “हाँ। और इसी वजह से तुम उसका हस्ताक्षर नहीं चुरा सकती।”

विक्रम मेहता ने कानूनी नोटिस भेजा। अगर नकली दस्तावेज किसी अदालत, बैंक या बीमा कंपनी में इस्तेमाल हुआ, तो जालसाजी, धोखाधड़ी और मृत व्यक्ति के दस्तावेज के दुरुपयोग का मामला दर्ज होगा।

सबसे पहले महेश जी टूटे। उन्होंने मैसेज किया कि उन्होंने “बिना समझे” गवाह के तौर पर हस्ताक्षर किए थे, क्योंकि सावित्री ने कहा था कि अर्जुन हमेशा परिवार की मदद करना चाहता था। फिर करण ने कहा कि रिया ने उसे “सिर्फ दबाव बनाने” के लिए साइन करने को कहा था। रिया ने माँ को दोष दिया। माँ ने सबको।

वह परिवार, जो सालों तक नंदिनी से शांति बनाए रखने को कहता रहा, अब एक मृत आदमी के पैसे के लिए एक-दूसरे का गला पकड़ रहा था।

नंदिनी चाहती तो तुरंत शिकायत दर्ज कराती। उसके भीतर एक हिस्सा चाहता था कि सावित्री देवी अदालत में खड़ी होकर जवाब दें—“आपने अपने मृत दामाद के हस्ताक्षर क्यों चुराए?”

लेकिन वह थक चुकी थी। वह उन्हें अपनी जिंदगी में और जगह नहीं देना चाहती थी।

इसलिए उसने दूसरा रास्ता चुना। नोटरी के सामने समझौता हुआ। सावित्री, महेश, रिया और करण ने लिखकर दिया कि बीमा, घर, अर्जुन के खातों या “3 दीप” ट्रस्ट पर उनका कोई अधिकार नहीं है। वे नंदिनी से सीधे संपर्क नहीं करेंगे। वे अर्जुन, आर्या और कबीर के नाम का इस्तेमाल अपनी छवि बचाने के लिए नहीं करेंगे। अगर उन्होंने नियम तोड़ा, तो पूरा मामला पुलिस और अदालत तक जाएगा।

हस्ताक्षर जयपुर की एक नोटरी ऑफिस में हुए। नंदिनी ने साधारण सफेद सूती साड़ी पहनी थी। सावित्री ने गहरा मेकअप किया हुआ था, जैसे कोई शादी में आई हो। रिया ने नंदिनी की तरफ नहीं देखा। महेश जी का हाथ इतना काँप रहा था कि स्याही कागज पर फैल गई।

अंत में सावित्री बोलीं, “तुम बहुत कठोर हो गई हो।”

नंदिनी ने कागज अपने बैग में रखा।

“नहीं माँ। मैं पहली बार अपने लिए मौजूद हुई हूँ।”

“3 दीप” धीरे-धीरे बड़ा होता गया। डॉक्टर, वकील, सामाजिक कार्यकर्ता, काउंसलर जुड़ते गए। हर मदद में अर्जुन की शांत मुस्कान थी। हर बच्चे की फीस में आर्या का मोर था। हर माँ की नींद में कबीर का गज्जू था।

पहले वार्षिक कार्यक्रम में, जयपुर के एक सामुदायिक भवन में 200 लोग आए। मंच के पीछे 3 तस्वीरें थीं—अर्जुन बोर्ड पर नक्शा बनाते हुए, आर्या उँगली पर मोरपंख पकड़े हुए, और कबीर अपने पीले हाथी को सीने से लगाए हुए।

नंदिनी माइक पर आई।

“मेरे पति मानते थे कि प्रेम सिर्फ साथ जीना नहीं, पीछे छूट जाने वालों के लिए छत छोड़ जाना भी है। मेरे बच्चे मानते थे कि दुनिया अच्छी है। मैं उन्हें वापस नहीं ला सकती। लेकिन मैं यह कोशिश कर सकती हूँ कि कोई और माँ उस अस्पताल के गलियारे में अकेली न खड़ी रहे जहाँ मैं अकेली थी।”

हॉल खड़ा हो गया। तालियाँ बजती रहीं। नंदिनी रोई, लेकिन छिपी नहीं।

पीछे दरवाजे के पास सावित्री और रिया खड़ी थीं। बिना बुलाए। सजी हुई। जैसे कैमरों के सही पल का इंतजार कर रही हों।

जब एक स्थानीय नेता नंदिनी से हाथ मिलाने आया, सावित्री तेज आवाज में बोलीं, “मेरी बेटी, मुझे तुम पर बहुत गर्व है।”

नंदिनी का दिल एक पल को कस गया। 34 साल से वह यह वाक्य सुनना चाहती थी। आज मिला भी तो कैमरों और तालियों के बीच।

“आने के लिए धन्यवाद,” नंदिनी ने शांत स्वर में कहा।

सावित्री मुस्कुराईं। “हम 3 की एक फोटो हो जाए? दिखे कि परिवार तो परिवार होता है।”

नंदिनी ने माँ और बहन को देखा। फिर मंच के पीछे लगी तस्वीरों को।

“मेरा परिवार वहाँ है।”

रिया का चेहरा सफेद पड़ गया। “दीदी, ऐसा मत कहो।”

“मैं कह सकती हूँ। और मैंने कह दिया।”

सावित्री की आवाज धीमी हो गई। “गलतियाँ हो जाती हैं।”

“गलती अपॉइंटमेंट भूलना होती है। आपने मेरी बच्चों की मौत पर सगाई चुनी। फिर आपने सच की जगह पैसा चुना।”

“तुम हमें जिंदगी भर सजा दोगी?”

नंदिनी ने अस्पताल का गलियारा याद किया। 3 सफेद चादरें। 3 चिताएँ। 7 दिन बाद पनीर कोफ्ता। अर्जुन का नकली हस्ताक्षर।

“नहीं माँ। मैं आपको सजा नहीं दे रही। मैं आपको आपके किए हुए के साथ छोड़ रही हूँ।”

वह आगे बढ़ गई।

इस बार किसी ने उसे रोका नहीं।

दुर्घटना के 1 साल बाद, नंदिनी सूरज उगने से पहले श्मशान के पास बने स्मृति स्थल गई, जहाँ अर्जुन, आर्या और कबीर की अस्थियों का एक हिस्सा रखा गया था। वह अर्जुन के लिए गेंदे के फूल लाई, क्योंकि उसे गुलाब “बहुत गंभीर” लगते थे। आर्या के लिए उसने लकड़ी का छोटा मोर रखा। कबीर के लिए नया पीला हाथी, पुराने गज्जू के पास।

वह 3 नामों के बीच बैठ गई।

“आज हमने 47वें परिवार की मदद की,” उसने धीरे से कहा। “एक माँ थी, जोधपुर से। उसके बेटे का नाम विवेक था। 19 साल का। उसने कहा, कल रात 2 घंटे सो पाई।”

हवा ने पेड़ की पत्तियाँ हिलाईं।

नंदिनी ने बैग से अर्जुन का पत्र निकाला। वह इतना पढ़ा जा चुका था कि मोड़ सफेद पड़ गए थे। उसने वही पंक्ति फिर पढ़ी—

“मुझे तुम्हें आखिरी बार संभालने दो।”

महीनों तक उसे लगता रहा कि दुर्घटना ने उसका परिवार छीन लिया। फिर उसने जाना, उसकी जिंदगी में 2 मौतें हुई थीं। पहली सड़क पर हुई—एक शराबी ने अर्जुन, आर्या और कबीर छीन लिए। दूसरी घर के भीतर हुई—जब माँ, पिता और बहन ने उसका संसार टूटते सुना, फिर मिठाई, मेहमान और इज्जत को चुन लिया।

लेकिन उस दूसरी मौत से एक भयानक आजादी जन्मी।

नंदिनी अब वह बेटी नहीं थी जो रसोई में खटकर मेज पर जगह कमाती थी। वह वह बहन नहीं थी जो रिया की चमक के लिए खुद को बुझाती थी। वह वह औरत नहीं थी जो कहती थी “कोई बात नहीं”, जबकि भीतर सब चिल्लाता था—“बहुत बड़ी बात है।”

हर रात वह खिड़की पर 3 छोटे दीये जलाती।

“शुभ रात्रि, अर्जुन। शुभ रात्रि, आर्या। शुभ रात्रि, कबीर।”

फिर वह धीमे से जोड़ती—

“आज मैंने खुद को नहीं छोड़ा।”

और शायद यही अर्जुन का आखिरी उपहार था—इतना प्रेम छोड़ जाना कि नंदिनी ने पहली बार खुद से प्रेम करना सीख लिया।

Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.