
PART 1
तीस हजारी अदालत की भरी हुई अदालत में महिला सब-इंस्पेक्टर ने फटे कुर्ते वाले आदमी को बिजली वाला स्टनर मार दिया, और वह आदमी लकड़ी की बेंचों के बीच ऐसे गिरा जैसे किसी ने इंसाफ के फर्श पर ही उसकी इज़्ज़त तोड़ दी हो।
कमरा 12 में 2 सेकंड तक कोई साँस भी नहीं ले पाया। पंखा घूम रहा था, पर हवा जैसे डर गई थी। एक बुज़ुर्ग औरत के हाथ से पूजा की छोटी माला गिर गई। एक वकील की फाइल खुलकर फर्श पर फैल गई। पीछे खड़े लोग, जिनके मोबाइल बाहर बंद रखने का बोर्ड लगा था, जेब से फोन निकालने लगे।
सब-इंस्पेक्टर कविता राठौर ने गिरते हुए आदमी की कनपटी से बहते काले पसीने और खून को नहीं देखा। उसने भीड़ को देखा। उसे चाहिए था कि सब देखें, सब समझें—इस अदालत में, जहाँ गरीब परिवार कपड़े के थैलों में कागज़ लेकर आते थे, जहाँ आरोपी नीचे नज़र करके खड़े रहते थे, जहाँ माँएँ मन ही मन भगवान का नाम लेती थीं, वहाँ आख़िरी आवाज़ कविता की चलती थी।
— नीचे पड़ा रह! गलत अदालत और गलत पुलिसवाली चुन ली तूने।
आदमी का शरीर झटके से काँप रहा था। उसके घुटने बेंच के लोहे से टकराए। उसने किसी पर हाथ नहीं उठाया था। उसने किसी को धमकाया नहीं था। वह बस कमरे से बाहर जाना चाहता था।
लेकिन कविता राठौर को यह बर्दाश्त नहीं था कि कोई उसकी पीठ दिखाकर चला जाए।
वह उस पर टूट पड़ी, घुटना उसकी पीठ पर जमा दिया और उसके हाथ पीछे मोड़ दिए। हथकड़ी की आवाज़ इतनी तेज़ गूँजी कि तीसरी कतार में बैठी एक महिला ने अपना मुँह दुपट्टे से ढक लिया।
— वह विरोध नहीं कर रहा! छोड़ दो उसे!
यह आवाज़ अधिवक्ता मीरा राठौर की थी, जो सरकारी पैनल की वकील थी। मगर बात सिर्फ इतनी नहीं थी। मीरा उसकी छोटी बहन थी। वही बहन, जो करोल बाग के घर में हर पारिवारिक खाने को खराब कर देती थी, जब वह हिरासत में पिटे लड़कों, गरीबों पर झूठे मुकदमों और अदालतों में फैले डर की बात करती थी। वही बहन, जिसे उनके पिता, रिटायर्ड एसीपी वीरेंद्र राठौर, घर की “वर्दी पर धब्बा” कहते थे।
कविता ने गुस्से से सिर उठाया।
— पीछे हटो, मैडम वकील, वरना तुम्हें भी अंदर कर दूँगी।
— कविता, देखो उसे! वह जा रहा था। तुमने उसका कॉलर पकड़ा था।
— मैंने कहा पीछे हटो।
अदालत में फुसफुसाहट लहर की तरह फैलने लगी। लोग एक-दूसरे को देख रहे थे। कोई कविता से प्यार नहीं करता था, मगर लगभग हर कोई उससे डरता था। पिछले 8 साल से वह कमरा 12 को अपनी जागीर की तरह चलाती थी। जज, पेशकार, मुंशी, लॉकअप स्टाफ—सब उसकी आदतों को जानते थे। उसके पिता वीरेंद्र राठौर की पुरानी पहुँच अभी भी पुलिस लाइनों से लेकर कोर्ट परिसर तक बची थी। कविता “बाहर” कहती, तो उससे दोगुने बड़े आदमी भी उठ जाते।
फटे भूरे कुर्ते वाला आदमी कराहा। कविता ने उसके हाथ और ऊपर खींच दिए।
— रुकिए, उसने भारी आवाज़ में कहा। आप बहुत बड़ी गलती कर रही हैं।
कविता हँसी।
— गलती? कीचड़ लगे चप्पल पहनकर तू मुझे कानून सिखाएगा?
आदमी ने धीरे से चेहरा मोड़ा। उसका गाल ठंडे फर्श से चिपका था, मगर उसकी आँखों में ऐसी शांति थी जिसने कविता के भीतर पहली बार हल्की बेचैनी पैदा की।
— हाँ। और आपको पहली बार में ही सुन लेना चाहिए था।
उस सुबह अदालत पहले से ही तप रही थी। बाहर जून की धूप लाल किले की दीवारों तक सफेद चुभन फैला रही थी। अंदर 43 केस लगे थे—मोबाइल चोरी, बिना लाइसेंस गाड़ी, झगड़ा, गाली-गलौज, छोटे-मोटे ड्रग्स। न्यायाधीश राघव भसीन देर से आने वाले थे। सब जानते थे, जब भसीन साहब देर करते, तब तक कमरा कविता को “काबू” में रखना होता था।
वह कतारों के बीच घूम रही थी, जैसे जेल की वार्डन हो। तभी वह आदमी आया था। लंबा, चौड़े कंधे वाला, दाढ़ी हल्की सफेद, हाथ में पुराना कपड़े का झोला, पैरों में धूल भरी चप्पल। देखने में वह किसी निर्माण साइट का मजदूर लग रहा था। लेकिन उसकी चाल मजदूर जैसी थकी हुई नहीं थी। वह दीवारों, कैमरों, बेंचों और चेहरों को देख रहा था, जैसे हर कोना गिन रहा हो।
फिर वह पहली कतार में बैठ गया।
कविता का खून खौल गया।
— ओए, उठो।
आदमी ने ऊपर देखा।
— जी?
— यह कतार तुम्हारे लिए नहीं है। आरोपी पीछे बैठते हैं।
— मैं आरोपी नहीं हूँ।
— तो क्या हो? रास्ता भूल गए?
कुछ लोग दबे हँसे। आदमी शांत रहा।
— सार्वजनिक सुनवाई है। मैं सुनने आया हूँ।
— सुनना है तो पीछे से सुनो।
— यहाँ कोई बोर्ड नहीं लिखा कि यह बेंच आरक्षित है।
कविता उसके पास झुक गई।
— अदालत में पहले नंबर की सीट पर ऐसे कपड़े पहनकर नहीं बैठते।
आदमी ने धीमे से कहा।
— अदालत की शांति मेरे कपड़ों से नहीं, आपके लहजे से टूट रही है।
यही वाक्य आग बन गया। कविता ने उसका कुर्ता गर्दन के पास से पकड़ लिया।
— बहुत अक्ल है?
आदमी उठा।
— मैं बाहर जा रहा हूँ, ताकि बात बिगड़े नहीं।
वह 2 कदम चला ही था कि कविता ने उसका कंधा झटका।
— मैंने जाने की इजाज़त नहीं दी।
वह सचमुच हैरान दिखा।
— पहले आप हटने को कहती हैं, अब जाने पर रोक रही हैं?
मीरा ने तभी अपना फोन रिकॉर्डिंग पर लगाया। कविता ने चीखकर कहा।
— सरकारी काम में बाधा! पुलिस पर हमला!
और स्टनर की नीली चिंगारी ने अदालत की हवा फाड़ दी।
अब जज राघव भसीन अंदर आए, काला कोट ठीक करते हुए, हाथ में चाय का पेपर कप।
— यह क्या तमाशा है?
कविता तुरंत सीधी खड़ी हो गई।
— सर, एक आक्रामक आदमी पहली कतार में बैठा था। आदेश नहीं मान रहा था। हमला करने की कोशिश की। मजबूरन बल प्रयोग करना पड़ा।
मीरा आगे आई।
— यह झूठ है। वह बाहर जा रहा था। इसने उसे पकड़कर मारा।
भसीन ने मीरा को ठंडी नज़र से देखा।
— अधिवक्ता राठौर, आपका पारिवारिक झगड़ा अदालत में मत लाइए।
कविता के चेहरे पर हल्की मुस्कान आई। उसे लगा वह बच गई। तभी फर्श पर पड़ा आदमी सिर उठाकर बोला।
— मुझे डॉक्टर चाहिए। और मुझे अभी फोन करना है।
भसीन ने बिना देखे कहा।
— जब अनुमति मिलेगी, तब माँगिएगा।
— पहले मेरी पहचान देख लीजिए।
— अब आप हमें सलाह देंगे?
आदमी ने खून भरी कनपटी के साथ सीधा जवाब दिया।
— हाँ। नहीं तो अगला दरवाज़ा आप सबके लिए बंद हो जाएगा।
PART 2
कविता ने उसे लॉकअप की तरफ घसीटा और लोहे का दरवाज़ा धड़ाम से बंद कर दिया। छोटे गलियारे में फिनाइल, पसीने और पुराने डर की गंध थी। आदमी को बेंच पर बैठाकर उसने हथकड़ी और कस दी।
— दर्द हो रहा है, उसने कहा।
— नाटक बाहर करना।
पीछे खड़ा 24 साल का कांस्टेबल इमरान काँप रहा था। उसने सब देखा था। वह जानता था कि आदमी ने हमला नहीं किया था। पर इमरान की 1 बेटी थी, 1 बूढ़ी माँ थी, और कविता पहले भी 2 कांस्टेबलों का तबादला करवा चुकी थी।
— मैडम, डॉक्टर बुला लें? खून काफी है।
कविता ने उसे घूरा।
— रिपोर्ट तुम लिखोगे?
इमरान चुप हो गया।
आदमी ने बस इतना कहा।
— तुम्हारी चुप्पी भी बयान बनेगी।
अदालत में मीरा का फोन काँपा। अनजान नंबर से संदेश आया—“कमरा मत छोड़िए। निरीक्षण दल रास्ते में है।”
उसी पल कोर्ट के मुख्य गेट पर 4 लोग बिना रुके सुरक्षा जांच पार कर गए। 2 अधिकारी, 1 महिला फाइल लेकर, और 1 सीबीआई अधिकारी। रिसेप्शन ने रोका, तो महिला ने कार्ड दिखाया।
— न्यायिक सतर्कता प्रकोष्ठ। न्यायमूर्ति आरिफ खान कहाँ हैं?
क्लर्क सन्न रह गया।
— कौन?
— इलाहाबाद हाई कोर्ट से विशेष निरीक्षण पर आए न्यायमूर्ति आरिफ खान। वह 18 मिनट पहले साधारण कपड़ों में कमरा 12 में गए थे।
कमरा 12 का दरवाज़ा अचानक खुला।
— अदालत स्थगित। अभी।
PART 3
न्यायाधीश राघव भसीन का चेहरा गुस्से से लाल हो गया।
— किस अधिकार से मेरी अदालत रोकी जा रही है?
फाइल लिए महिला अधिकारी ने बिना झिझक कहा।
— उसी अधिकार से, जिससे अदालत जनता के लिए होती है, किसी की निजी चौकी नहीं। न्यायमूर्ति आरिफ खान कहाँ हैं?
पेशकार के हाथ से कलम गिर गई। मीरा ने 1 सेकंड के लिए आँखें बंद कीं। कविता, जो लॉकअप से लौटकर अपनी बेल्ट ठीक कर रही थी, दरवाज़े के पास पत्थर की तरह जम गई।
— न्यायमूर्ति? भसीन की आवाज़ फँस गई।
महिला अधिकारी ने कमरे को देखा। पहली बेंच के पास फर्श पर अभी भी खून की छोटी लकीर चमक रही थी।
— उन्हें बिना पहचान बताए इस अदालत की कार्यवाही देखने भेजा गया था। पिछले 6 महीनों से इस कमरे को लेकर शिकायतें आ रही थीं। उनका सुरक्षा संकेत बंद हुआ है। वह कहाँ हैं?
सारी आँखें कविता पर टिक गईं।
वह पहली बार डरी। यह डर किसी थप्पड़ जैसा नहीं था। यह ठंडा, सरकारी, कागज़ों में उतरने वाला डर था—बैज उतरने का डर, फोन रिकॉर्ड खुलने का डर, पुराने सहारों के गायब हो जाने का डर।
मीरा ने साफ आवाज़ में कहा।
— वह लॉकअप में हैं। घायल हैं। मेरी बहन ने उन्हें बिजली वाला स्टनर मारा, जबकि वह अदालत से बाहर जा रहे थे।
भसीन खड़े हो गए।
— अधिवक्ता राठौर, अपने शब्दों की मर्यादा रखिए।
मीरा की आँखें भर आईं, मगर आवाज़ नहीं टूटी।
— मैं 8 साल से मर्यादा रख रही हूँ, साहब। आज सच रख रही हूँ।
कविता ने बचने की कोशिश की।
— वह अज्ञात व्यक्ति था। आक्रामक था। उसने—
महिला अधिकारी ने काट दिया।
— आपका नाम?
— सब-इंस्पेक्टर कविता राठौर।
— हथियार नीचे रखिए। स्टन डिवाइस, सर्विस पिस्तौल और हथकड़ी जमा कीजिए।
सीबीआई अधिकारी ने पीछे खड़े 2 सुरक्षाकर्मियों को इशारा किया। वे कविता की तरफ बढ़े। अदालत में ऐसा सन्नाटा था कि किसी बच्चे की सुबकती आवाज़ साफ सुनाई दे रही थी।
कविता ने भसीन की तरफ देखा। वही जज, जो उसे “मेरी सख्त बेटी” कहकर हँसते थे। वही आदमी, जिसके सामने उसने कई बार गरीबों को “लाइन में रखो” कहा था। आज उन्होंने नज़रें झुका लीं।
कविता के चेहरे से रंग उतर गया।
— सर?
भसीन फाइलों में ऐसे देखने लगे जैसे वह इस कमरे में थे ही नहीं।
मीरा ने यह देखा। उसे खुशी नहीं हुई। उसे अपनी बहन में वही लड़की दिखी, जो बचपन में पिता की मंजूरी पाने के लिए घर की हर गलती दूसरों पर डाल देती थी। वीरेंद्र राठौर की मेज पर हमेशा एक ही वाक्य गूँजता था—“डर बनाओ, तभी लोग सीधे रहते हैं।” कविता ने वह वाक्य जीवन बना लिया था। मीरा ने उसी वाक्य से भागकर कानून चुना था।
लोहे का दरवाज़ा खुला। कुछ सेकंड बाद आरिफ खान बाहर आए।
उनके हाथों पर हथकड़ी के लाल निशान थे, कनपटी पर चोट थी, कुर्ते पर धूल और खून के दाग थे। फिर भी वह सीधे चलते हुए अदालत के बीच में आकर रुके। उनके पीछे कांस्टेबल इमरान था, हाथ में रूई और पट्टी लिए, आँखों में अपराध-बोध भरा हुआ।
भीड़ में फुसफुसाहट उठी। अब वह “फटे कपड़ों वाला आदमी” नहीं था। वह न्यायमूर्ति आरिफ खान थे—वह जज जिनकी नियुक्ति 3 हफ्ते पहले खबरों में आई थी, जो पुरानी अदालतों में भ्रष्टाचार और गरीबों के साथ दुर्व्यवहार की बंद फाइलें खोलने के लिए जाने जाते थे। अलीगढ़ के छोटे घर से निकले, पिता रिक्शा चलाते थे, माँ जिला अस्पताल में सफाई करती थीं। कानून पढ़कर वह वहाँ पहुँचे थे जहाँ पहुँचने का सपना उनके मोहल्ले के बच्चों को भी डर लगता था।
महिला अधिकारी उनके पास आई।
— सर, आपको तुरंत मेडिकल सहायता चाहिए।
आरिफ खान ने धीमे से कहा।
— 2 मिनट। पहले यह कमरा सुनेगा।
भसीन ने आख़िरी कोशिश की।
— न्यायमूर्ति खान, यह एक दुर्भाग्यपूर्ण परिचालनात्मक गलतफहमी है।
आरिफ ने उनकी ओर देखा। वह नज़र शांत थी, मगर उसमें वर्षों के दबे हुए गवाह खड़े थे।
— नहीं, न्यायाधीश भसीन। यह गलतफहमी नहीं है। यह तरीका है।
भसीन का चेहरा सफेद पड़ गया।
आरिफ ने बेंचों की तरफ देखा—मजदूर, रिक्शा चालक, घरेलू कामगार, युवा वकील, डरे हुए परिवार, माँएँ, बेटियाँ, वे लड़के जिनकी जेबों में जमानत के पैसे भी पूरे नहीं थे।
— पिछले 6 महीनों में इस कमरे से 31 शिकायतें मेरे पास पहुँचीं। वकीलों को अपमानित किया गया। मुल्ज़िमों को कैमरे से बाहर मारा गया। परिवारों को गाली देकर निकाला गया। जिन लोगों ने सवाल पूछा, उनके केस दिन के अंत तक रोक दिए गए। जिनके पास पैसा या पहचान थी, उनकी फाइलें तेज़ चलीं। जिनके पास सिर्फ माँ की दुआ थी, उन्हें यहाँ अपराधी मानकर लाया गया, आदमी मानकर नहीं।
अदालत में कई सिर झुक गए।
— आज मैं सूट में नहीं आया, क्योंकि मुझे यह देखना था कि आप उस आदमी से क्या करते हैं जिसके पास नाम नहीं दिखता, पहचान नहीं चमकती, और कपड़े गरीब लगते हैं।
कविता की उँगलियाँ काँप रही थीं। उसकी वर्दी अब कवच नहीं लग रही थी। वही खाकी, जिसके बल पर वह लोगों को चुप कराती थी, अब उसके गले में फँसी रस्सी जैसी लग रही थी।
आरिफ ने आगे कहा।
— मेरी माँ 22 साल तक अदालतों और अस्पतालों के गलियारे साफ करती रही। वह कहती थीं, “बेटा, अदालतों में फर्श इसलिए चमकता है क्योंकि लोग यहाँ डर के निशान मिटाते रहते हैं।” वह यह मानकर गईं कि कानून सुंदर हो सकता है, अगर उसे चलाने वाले लोग चेहरों को देखना बंद न करें। आज इस कमरे में चेहरों को नहीं, कपड़ों को देखा गया। गरीबी को अपराध समझा गया।
पीछे बैठे एक बूढ़े आदमी ने अपना सिर पकड़ लिया। एक महिला अपने बेटे की उँगलियाँ कसकर थामे रही। मीरा का गला भर आया। उसे अपनी माँ याद आई, जो 25 साल तक वीरेंद्र राठौर की आवाज़ से डरकर चुप रहती थीं। घर में भी वर्दी थी, अदालत में भी। फर्क सिर्फ इतना था कि घर में दरवाज़े बंद थे, यहाँ सबके सामने बंद किए जाते थे।
आरिफ ने इमरान की तरफ देखा।
— कांस्टेबल, आपने मेरी चोट देखी। आपने मदद माँगनी चाही, पर चुप हो गए। मैं आपको अपमानित नहीं करूँगा। लेकिन आप बयान देंगे कि आपको डर किससे था।
इमरान की आँखों से आँसू गिर पड़े।
— जी, सर। मैं सच बोलूँगा।
फिर आरिफ ने कविता की ओर देखा।
— और आप, सब-इंस्पेक्टर कविता राठौर, आपने वर्दी को सेवा नहीं, निजी संपत्ति समझ लिया। आपने एक आदमी का चेहरा नहीं देखा। आपने फटा कुर्ता देखा, धूल भरी चप्पल देखी, और फैसला सुना दिया।
कविता ने बोलने की कोशिश की, मगर आवाज़ नहीं निकली।
महिला अधिकारी ने आदेश दिया।
— तत्काल निलंबन की संस्तुति। स्टन डिवाइस, कोर्ट लॉगबुक, सीसीटीवी रिकॉर्ड, लॉकअप रजिस्टर, ड्यूटी फोन और वायरलेस सेट सील किए जाएँ। सब-इंस्पेक्टर कविता राठौर को प्रशासनिक हिरासत में लिया जाए।
सुरक्षाकर्मियों ने कविता के दोनों हाथ थामे। उन्होंने उसे वैसे नहीं पकड़ा जैसे उसने आरिफ को पकड़ा था। न घुटना, न गाली, न झटका। बस कानून की ठंडी पकड़। वही संयम उसे अंदर तक तोड़ गया।
वह मीरा के पास से गुज़री तो होंठ काँपे।
— पापा को फोन कर दे।
मीरा ने उसे देखा। उसकी आँखों में न जीत थी, न बदला। सिर्फ थकान और दुख था।
— पापा ने पूरी जिंदगी गलत लोगों को फोन करके तुम्हें बचाया। आज कोई फोन नहीं बचेगा।
कविता को बाहर ले जाया गया। किसी ने ताली नहीं बजाई। वह खामोशी ताली से भी ज्यादा भारी थी। उसी खामोशी में उन सभी लोगों की साँसें थीं जिन्हें उसने कभी “चुप” कहा था।
राघव भसीन ने कुर्सी से उतरने की कोशिश की, लेकिन सीबीआई अधिकारी ने रास्ता रोक लिया।
— आप भी उपलब्ध रहेंगे, न्यायाधीश भसीन।
— मैं न्यायिक अधिकारी हूँ।
— इसलिए।
उनका चेहरा झुक गया। पहली बार अदालत ने देखा कि कुर्सी ऊँची हो सकती है, लेकिन सवाल उससे ऊँचे होते हैं।
अगले कई हफ्तों तक दिल्ली की अदालतों, वकीलों के व्हाट्सऐप ग्रुपों, चाय की दुकानों और घरों में सिर्फ कमरा 12 की चर्चा रही। वीडियो फैल गया। उसमें साफ दिखता था—कविता ने कॉलर पकड़ा, आरिफ पीछे हटे, फिर उसने स्टनर चलाया, और बाद में जज के सामने झूठ बोला। मगर लोगों को सबसे ज्यादा चोट बिजली के झटके से नहीं लगी। उन्हें तोड़ दिया उस मुस्कान ने, जो कविता के चेहरे पर आरिफ के गिरते ही आई थी।
जाँच में 14 पुरानी शिकायतें खुलीं। लॉकअप के बाहर कैमरे सालों से “खराब” बताए गए थे, जबकि फुटेज अंदरूनी सिस्टम में दबे मिले। गरीब मुल्ज़िमों से वकील बदलवाने का दबाव बनाया गया था। जमानत की फाइलें जानबूझकर रोकी गई थीं। एक फलवाले को 3 घंटे खड़ा रखा गया था क्योंकि उसने कविता से पानी माँगा था। एक घरेलू कामगार की माँ को अदालत से इसलिए बाहर किया गया था क्योंकि वह रोते हुए बहुत ज़ोर से “हे राम” बोल रही थी।
वीरेंद्र राठौर को भी बुलाया गया। वही बूढ़ा शेर, जो कभी थाने में कुर्सी पीछे झुकाकर लोगों को देखता था, अब फाइलों के सामने बैठा था। वह बार-बार कहता रहा कि उसने सिर्फ बेटी को बचाना चाहा। मगर कॉल रिकॉर्ड, संदेश और पुराने प्रभाव की परतें खुलती गईं।
मीरा को गवाह बनाया गया। उससे पूछा गया कि क्या उसे अपनी बहन से नफरत है। उसके होंठ काँपे। कमरे में बैठे सबने सोचा, वह हाँ कहेगी। लेकिन उसने कहा।
— नहीं। नफरत ने उसे वहाँ पहुँचाया है। मैं बस चाहती हूँ कि यह रुक जाए।
आरिफ खान को 7 टाँके लगे। कलाई के निशान कई हफ्तों तक रहे। वह चाहें तो इस घटना को निजी बदले की आग बना सकते थे। मगर उन्होंने ऐसा नहीं किया। उन्होंने उससे भी कठोर रास्ता चुना—उन्होंने सबूतों को बोलने दिया। क्योंकि जब सबूत बोलते हैं, तो ताकतवर लोग पहली बार चुप होते हैं।
6 महीने बाद कमरा 12 फिर खुला। बेंचों की व्यवस्था बदली गई थी। लॉकअप के गलियारे में नए कैमरे लगे थे। दीवार पर बड़ा बोर्ड लगाया गया था—“सुनवाई सार्वजनिक है। हर व्यक्ति सम्मान का अधिकारी है।”
उस सुबह आरिफ खान फिर आए। इस बार गहरे रंग का सूट पहने, चमकते जूते में। वह पहली कतार में बैठे। मीरा भी वहाँ थी, एक युवा डिलीवरी बॉय का केस लड़ने आई थी, जिस पर स्कूटर चोरी का झूठा आरोप लगा था। उसने आरिफ को देखा तो हल्का-सा सिर झुकाया। आरिफ ने थकी हुई मुस्कान से जवाब दिया।
पीछे बैठी एक बुज़ुर्ग औरत ने अपनी पड़ोसन से फुसफुसाकर कहा।
— यही हैं वो कुर्ते वाले जज।
आरिफ ने सुन लिया। उन्होंने अपने चमकते जूतों को देखा, फिर उसी फर्श को, जहाँ वह गिरे थे। निशान अब नहीं था। फर्श फिर चमक रहा था। मगर डर इतनी जल्दी नहीं मिटता। वह लोगों की हड्डियों, आवाज़ों और चलने के ढंग में रह जाता है।
नए न्यायाधीश कमरे में आए। उन्होंने पहले वकीलों को नमस्कार किया, फिर परिवारों की तरफ देखा, फिर उन मुल्ज़िमों की तरफ, जो घबराकर खड़े हो गए थे।
— बैठ जाइए। अदालत में खड़े होने से पहले इंसान होना ज़रूरी है।
कमरे में कुछ ऐसा टूटा, जो वर्षों से जकड़ा हुआ था। एक माँ ने पहली बार अदालत में गहरी साँस ली। डिलीवरी बॉय की आँखों में उम्मीद लौटी। मीरा ने अपनी फाइल खोली, और आरिफ ने चुपचाप उस बोर्ड की ओर देखा।
उन्हें अपनी माँ याद आई—फटी एड़ियाँ, सफाई के केमिकल से छिली उँगलियाँ, और वह वाक्य कि चमकते फर्श डर छिपाते हैं। उस दिन उन्हें समझ आया कि इंसाफ हमेशा घाव नहीं भरता। कभी-कभी वह बस इतना करता है कि अगला शरीर उसी जगह न गिरे।