भाग 1
दरवाजे के बाहर रखी 3 बच्चियों को देखकर अरुण की बुआ ने उसी रात कह दिया था कि अगर उसने उन्हें घर के अंदर लाया, तो उसकी पूरी जिंदगी बर्बाद हो जाएगी।
दिल्ली की सर्द रात थी। पहाड़गंज की पुरानी गली में धुंध ऐसे अटकी हुई थी जैसे किसी ने आसमान से राख झाड़ दी हो। अरुण 27 साल का था, करोल बाग की एक हार्डवेयर दुकान में काम करता था और अपने किराए के छोटे से कमरे में लौट रहा था, जहां 1 लोहे का पलंग, 1 पुराना चूल्हा और दीवार पर टंगी उसकी मां की फीकी तस्वीर के अलावा कुछ नहीं था।
उसने पूरे दिन सीमेंट की बोरियां उठाई थीं, पाइप काटे थे, ग्राहकों की डांट सुनी थी और मालिक की कड़क आवाज में “कल जल्दी आना” सुनकर दुकान बंद की थी। उसके हाथों में दर्द था, पीठ झुकी हुई थी, और जेब में सिर्फ 82 रुपये बचे थे।
कमरे की सीढ़ियों के पास पहुंचते ही उसे पहले लगा कि किसी ने पुराने डिब्बे रख छोड़े हैं। फिर उनमें से 1 हल्की सी रोने की आवाज आई।
अरुण का कदम वहीं जम गया।
पीली स्ट्रीट लाइट के नीचे 3 छोटे बेबी कैरियर रखे थे। उनके ऊपर अलग-अलग रंग की पतली रजाइयां थीं। एक गुलाबी, एक पीली, एक सफेद। पास में 1 फटा हुआ बैग था, जिसमें 2 बोतलें, आधा पैकेट डायपर और 1 मुड़ा हुआ पेट्रोल पंप का बिल रखा था।
बिल के पीछे लिखावट थी।
“माफ करना अरुण। मैं नहीं कर सकता। इनका ख्याल मुझसे अच्छा रखना।”
नीचे नाम था।
विक्रम।
अरुण का बड़ा भाई।
उसकी भाभी नेहा की मौत को सिर्फ 11 दिन हुए थे। 3 बच्चियां 6 महीने की थीं। परिवार अभी शोक से बाहर भी नहीं आया था और विक्रम गायब हो गया था।
अरुण ने कागज 3 बार पढ़ा। हर बार उम्मीद की कि शब्द बदल जाएंगे।
शब्द नहीं बदले।
सामने वाले कमरे से शर्मा आंटी निकलीं। उनके हाथ में पूजा की थाली थी और माथे पर सफेद चंदन लगा था।
—अरे अरुण बेटा, ये क्या है?
अरुण ने जवाब नहीं दिया। उसकी नजर सबसे छोटी बच्ची पर टिक गई थी। वह रो नहीं रही थी। बस आंखें खोलकर उसे देख रही थी, जैसे पूछ रही हो कि अब कौन बचेगा।
शर्मा आंटी पास आईं और घबरा गईं।
—हे भगवान… ये तो नेहा की तीनों बेटियां हैं।
उन्हें नाम याद थे। नेहा ने 1 बार गर्व से पूरी गली को दिखाया था।
सिया, सबसे शांत।
काव्या, सबसे बेचैन।
मीरा, सबसे छोटी।
मीरा ने अपनी छोटी उंगली बाहर निकाली और अरुण की उंगली पकड़ ली।
अरुण की सांस अटक गई।
इतनी छोटी पकड़ में इतना बड़ा फैसला कैसे छिप सकता था?
तभी बुआ कमला भी नीचे आ गईं। उन्हें किसी ने फोन कर दिया था। उन्होंने आते ही कागज पढ़ा और माथा पीट लिया।
—पागल मत बन, अरुण। ये 3-3 बेटियां हैं। तेरे पास कमरा नहीं, पैसा नहीं, बीवी नहीं। समाज जिंदा खा जाएगा।
—तो इन्हें यहीं छोड़ दूं?
—बाल गृह में दे दे। सरकार है। कोई संस्था है। तू क्यों अपना गला फंसा रहा है?
शर्मा आंटी ने धीमे से कहा:
—बात गलत भी नहीं है बेटा। अकेले आदमी के लिए 3 बच्चियां पालना आसान नहीं।
अरुण ने मीरा को गोद में उठाया। बच्ची का शरीर ठंड से कांप रहा था। वह उसकी छाती से लगते ही शांत हो गई।
काव्या जोर से रो पड़ी। सिया की आंखें बंद थीं, पर होंठ सूख रहे थे।
अरुण ने टूटे बैग से बोतल निकाली। उसे दूध बनाना भी नहीं आता था।
बुआ कमला ने फिर कहा:
—विक्रम हमेशा से गैर जिम्मेदार था। उसकी गलती का बोझ तू क्यों उठाएगा?
अरुण ने 3 बच्चियों की तरफ देखा।
—क्योंकि अगर मैं नहीं उठाऊंगा, तो ये जमीन पर रह जाएंगी।
—लोग क्या कहेंगे?
—लोगों ने कभी मेरा किराया नहीं भरा, बुआ।
उसने 3 बेबी कैरियर उठाए। 2 शर्मा आंटी ने संभाले। 1 उसने खुद उठाया। फिर वह सीढ़ियां चढ़ गया।
उस रात उसका कमरा पहली बार घर बना, लेकिन चीखों, दूध की गंध, गीले कपड़ों और डर से भरा हुआ घर।
सिया 2 घंटे तक रोती रही। काव्या ने दूध उलट दिया। मीरा उसके सीने पर सो गई। अरुण फर्श पर बैठा रहा, दीवार से पीठ लगाए, आंखें खुली हुईं। उसे समझ ही नहीं आया कि वह कब चाचा से पिता बन गया।
सुबह परिवार आया।
मामा ने कहा:
—कानूनी झंझट में मत पड़।
चचेरे भाई ने कहा:
—3 लड़कियों का खर्चा मजाक नहीं है।
बुआ कमला ने मोहल्ले के सामने कहा:
—आज दया आ रही है, कल रोएगा।
अरुण ने किसी को जवाब नहीं दिया। उसने बस डायपर गलत तरफ से बांधा, दूध बहुत गरम कर दिया और सिया को गोद में लेकर फुसफुसाया:
—गलतियां होंगी, पर मैं भागूंगा नहीं।
22 साल बीत गए।
दिल्ली बदल गई। गली के ऊपर मेट्रो की आवाज आने लगी। हार्डवेयर की दुकान बड़ी हो गई। अरुण ने पहले नौकरी की, फिर पुरानी टूल्स की छोटी दुकान खोली। उसकी पीठ जल्दी झुक गई, बाल जल्दी सफेद हो गए, पर घर में 3 स्कूल बैग, 3 टिफिन, 3 जोड़ी चप्पलें और 3 आवाजें भर गईं।
सिया किताबों में डूबी रहती थी। काव्या हर बात पर बहस करती थी। मीरा कम बोलती थी, पर सब देखती थी।
अरुण ने चोटी बनाना सीखा, यूनिफॉर्म प्रेस करना सीखा, बुखार में माथा छूकर डरना सीखा। उसने 1 समोसे को 4 हिस्सों में बांटना सीखा। उसने अपनी भूख छिपाना सीखा।
उसे शादी का मौका भी मिला था। नंदिनी नाम की स्कूल टीचर थी। वह अरुण को पसंद करती थी। 2 साल तक वह इंतजार करती रही।
1 शाम उसने कहा:
—मैं बच्चियों से डरती नहीं, अरुण। बस जानना चाहती हूं कि तुम्हारे जीवन में मेरे लिए जगह है या नहीं।
अरुण ने जवाब देने में देर की। बहुत देर।
—जगह है, पर जितनी तुम्हें चाहिए, उतनी नहीं।
नंदिनी चली गई। अरुण ने उसे रोकने की कोशिश नहीं की। बाद में कई रातें वह छत पर बैठकर रोया, लेकिन सुबह 6 बजे फिर टिफिन बनाता रहा।
विक्रम कभी-कभी परछाईं की तरह लौटता। 1 बार 5,000 रुपये मनीऑर्डर भेजा। 1 बार सिया के 12वें जन्मदिन पर फोन किया। 1 बार कहा कि वह सुधर गया है और जल्दी लौटेगा।
वह कभी नहीं लौटा।
बच्चियां बड़ी हुईं। कभी उन्होंने पूछा:
—हमारे असली पापा कहां हैं?
अरुण ने झूठ नहीं बोला।
—वह टूट गए थे। चले गए। लेकिन तुम किसी की गलती नहीं थीं।
फिर वह बाथरूम में जाकर चुपचाप रोया।
उसे हमेशा डर रहा कि 1 दिन वे विक्रम को ढूंढेंगी। खून को चुनेगी। उसे बस चाचा समझेंगी। वह आदमी जिसने मजबूरी में जिम्मेदारी उठाई थी।
उनकी यूनिवर्सिटी ग्रेजुएशन वाले दिन अरुण 50 मिनट पहले ऑडिटोरियम पहुंच गया। उसने अपनी पुरानी कैमरा जेब में रखी थी। पर्स में वही पेट्रोल पंप का बिल भी था, जो 22 साल से कांटे की तरह चुभता रहा था।
जब सिया ने डिग्री ली, अरुण की आंखें भर आईं।
जब काव्या ने मंच से उसे देखकर हाथ हिलाया, वह मुस्कुराया।
जब मीरा मंच पर चली, उसके चेहरे पर मुस्कान नहीं थी। वह जैसे कोई भारी फैसला सीने में लेकर चल रही थी।
कार्यक्रम खत्म होने ही वाला था कि प्रिंसिपल ने माइक पर कहा:
—समारोह समाप्त करने से पहले, सिया, काव्या और मीरा मल्होत्रा कुछ कहना चाहती हैं।
तीनों बहनें मंच पर लौट आईं। हाथों में हाथ डाले।
मीरा ने माइक पकड़ा।
—आज हमारे पापा यहां नहीं आ सके।
अरुण के हाथ से कैमरा लगभग छूट गया।
विक्रम।
22 साल बाद वे सबके सामने विक्रम का नाम लेने वाली थीं।
और फिर जो होने वाला था, उसकी कल्पना किसी ने नहीं की थी।
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भाग 2
ऑडिटोरियम की सारी आवाजें अरुण से दूर चली गईं। तालियां, मोबाइल कैमरे, कुर्सियों की खड़खड़ाहट, सब धुंधला हो गया। उसके कानों में सिर्फ 1 शब्द गूंज रहा था, पापा। 22 साल तक वह इसी पल से डरता रहा था। उसने 3 बच्चियों को उधार के दूध, सेकंड हैंड किताबों, फटी यूनिफॉर्म और बिना नींद वाली रातों में पाला था, मगर हमेशा डरता रहा कि आखिर में खून की पुकार उसकी मौजूदगी से बड़ी साबित होगी। मीरा ने माइक कसकर पकड़ा और कहा, हमारे जैविक पापा यहां नहीं आ सके, क्योंकि सच यह है कि वह कभी हमारे जीवन में थे ही नहीं। पूरा हॉल शांत हो गया। सिया ने अपनी गाउन के अंदर से 1 पुरानी लाल डायरी निकाली। अरुण का चेहरा पीला पड़ गया। वह डायरी उसकी थी। वही डायरी जिसमें उसने बच्चियों के 1 साल की होने से लेकर उनकी 12वीं की फीस तक हर डर, हर कर्ज और हर टूटन लिखी थी। उसने वह डायरी कभी पढ़वाने के लिए नहीं लिखी थी। वह इसलिए लिखता था क्योंकि किसी रात उसे लगता था कि अगर उसने दिल का बोझ कागज पर नहीं रखा, तो वह सांस नहीं ले पाएगा। काव्या ने कहा, हमें यह डायरी 4 महीने पहले मिली, जब हम पापा के पुराने कमरे की मरम्मत कर रहे थे। पहले लगा खर्चों की लिस्ट होगी, लेकिन यह तो उनकी पूरी जिंदगी थी। सिया ने पन्ना खोला और पढ़ा, आज मेरी बेटियां 1 साल की हुईं। चावल जल गए, 2 डायपर उल्टे पहनाए और मीरा इतना रोई कि मैं भी रो पड़ा। मुझे नहीं पता मैं अच्छा पिता बन पाऊंगा या नहीं, लेकिन मैं कहीं नहीं जाऊंगा। अरुण ने आंखें बंद कर लीं। मीरा ने अगला पन्ना पढ़ा, सिया मुझे ऐसे देखती है जैसे जानती हो कि मैं डरा हुआ हूं। काव्या मेरी छींक पर हंसती है। मीरा मेरी उंगली पकड़ती है तो लगता है अगर छोड़ दिया, तो मैं गिर जाऊंगा। मैं पापा बनना नहीं जानता, पर सीखूंगा। ऑडिटोरियम में कई लोग रो रहे थे। तभी काव्या ने 1 नीली फाइल उठाई और बोली, लेकिन आज हम सिर्फ डायरी पढ़ने नहीं आए। हमने 1 काम चुपचाप शुरू किया था। हमें कानूनी रूप से साबित करना था कि जो हमारे दिल में हमेशा से सच था, वह कागज पर भी सच हो। मीरा मंच से नीचे उतरी, फाइल लेकर अरुण के सामने आई, घुटनों के बल बैठी और बोली, चाचा अरुण, अब पूरी सच्चाई सुनने का समय आ गया है। ❤️नमस्ते, प्यारे रीडर्स! अगर आप अगले पार्ट के लिए तैयार हैं, तो प्लीज़ नीचे “Yes” लिखें, और मैं इसे तुरंत भेज दूँगा। मैं उन सभी के अच्छे स्वास्थ्य और खुशी की कामना करता हूँ जिन्होंने यह कहानी पढ़ी और पसंद की है! 💚
भाग 3
अरुण ने फाइल खोली, पर पहले कुछ समझ नहीं पाया। कागजों पर अदालत की मुहर थी, वकील के हस्ताक्षर थे, 3 नए प्रमाणपत्र थे और 1 आदेश था, जिसे पढ़ते-पढ़ते उसकी उंगलियां कांपने लगीं।
सिया मल्होत्रा शर्मा।
काव्या मल्होत्रा शर्मा।
मीरा मल्होत्रा शर्मा।
अंतिम उपनाम अरुण का था।
विक्रम का नहीं।
उस आदमी का नहीं जिसने 3 बच्चियों को सर्द रात में सीढ़ियों के नीचे छोड़ दिया था।
अरुण का।
मीरा घुटनों के बल बैठी थी। उसकी आंखें लाल थीं, पर आवाज साफ थी।
—हम चाहती थीं कि यह सिर्फ भावना न रहे, पापा। यह कानून में भी लिखा जाए।
अरुण का गला सूख गया।
—तुमने… तुमने यह कब किया?
काव्या मंच से उतरी। उसकी वही तेज चाल थी, जो बचपन में स्कूल की शिकायत सुनने के बाद भी रुकती नहीं थी।
—जब हमें पता चला कि आपने हमारे लिए अपना नाम कभी कागज पर नहीं मांगा, क्योंकि आपको डर था कि हमें बुरा लगेगा।
सिया ने धीरे से कहा:
—और जब हमें पता चला कि आपने 22 साल तक पर्स में वह बिल रखा। जैसे हमारी शुरुआत शर्म की बात थी।
अरुण ने सिर हिलाया।
—नहीं, शर्म नहीं… बस डर था। कहीं तुम लोग उसे ढूंढना चाहो। कहीं तुम कहो कि मैं तो बस चाचा था।
मीरा ने उसका हाथ पकड़ा।
—हमारा जन्म नेहा मां से हुआ था। हमारा खून शायद विक्रम से आया। लेकिन हमें जीवन आपने दिया।
हॉल में कोई आवाज नहीं थी। जो लोग थोड़ी देर पहले डिग्रियों की फोटो खींच रहे थे, वे अब अपनी सांस तक रोककर खड़े थे।
बुआ कमला भी सामने की पंक्ति में बैठी थीं। वह अब बहुत बूढ़ी हो चुकी थीं। सफेद साड़ी में उनका चेहरा कठोर नहीं, शर्मिंदा लग रहा था। वही बुआ जिन्होंने कभी कहा था कि 3 लड़कियां अरुण की जिंदगी डुबो देंगी।
काव्या ने अचानक उनकी तरफ देखा।
—बुआ जी, आपने उस रात कहा था कि ये 3 बच्चियां अरुण की जिंदगी बर्बाद कर देंगी। आज देख लीजिए। हम उनकी जिंदगी नहीं खा गईं। हम उनकी गवाही बन गईं।
बुआ कमला की आंखें भर आईं। उन्होंने नजर झुका ली।
तभी हॉल के पीछे हलचल हुई। 1 आदमी दरवाजे के पास खड़ा था। दाढ़ी बढ़ी हुई, आंखें धंसी हुई, कपड़े महंगे लेकिन चेहरा थका हुआ। अरुण ने उसे देखते ही पहचान लिया।
विक्रम।
22 साल बाद।
अरुण के भीतर जैसे पुराना घाव अचानक खुल गया। वह खड़ा होने की कोशिश करने लगा, पर सिया ने उसका कंधा दबा दिया।
विक्रम धीरे-धीरे आगे आया। कुछ लोग उसे पहचानते नहीं थे, मगर तीनों बहनों की आंखों में ठंड उतर गई थी।
—सिया… काव्या… मीरा… मैं…
काव्या ने तुरंत कहा:
—रुक जाइए।
विक्रम ठिठक गया।
—मैं बहुत सालों से तुमसे मिलना चाहता था।
सिया की आवाज शांत थी, पर चुभती हुई।
—तो मिल लेते। हम कोई गुप्त जेल में नहीं थे। हम दिल्ली में थे। उसी पते पर, जहां आप हमें छोड़कर गए थे।
विक्रम की आंखें भर आईं।
—मैं टूट गया था। नेहा के जाने के बाद मैं संभल नहीं पाया।
मीरा ने पहली बार कड़वी आवाज में कहा:
—और चाचा नहीं टूटे थे? उन्हें पत्नी नहीं खोनी पड़ी, पर उन्होंने भाई खोया, जवानी खोई, नींद खोई, और फिर भी हमें नहीं छोड़ा।
विक्रम ने अरुण की तरफ देखा।
—भाई, मैंने गलती की। मुझे माफ कर दे। मैं वापस आया हूं। मैं इनके साथ संबंध बनाना चाहता हूं। आखिर मैं इनका पिता हूं।
यह सुनते ही अरुण के चेहरे पर वही पुराना डर लौट आया।
वह 22 साल पुराना डर।
कि कहीं ये 3 बेटियां उसके सामने से उठकर उस आदमी की तरफ चली जाएंगी, जिसकी नसों में उनका खून था।
लेकिन इस बार सिया ने अरुण का हाथ और कसकर पकड़ लिया।
—नहीं। आप हमारे जैविक पिता हैं। यह तथ्य है। लेकिन पिता? वह शब्द आपने खो दिया था, जब आपने 3 बेबी कैरियर सीढ़ियों पर रखे और पेट्रोल पंप के बिल पर माफी लिखकर भाग गए।
विक्रम के चेहरे पर शर्म फैल गई।
—मैं पैसा दे सकता हूं। मैं सब ठीक कर सकता हूं।
काव्या हंसी, पर वह हंसी दर्द से भरी थी।
—आप 22 साल का बुखार लौटा सकते हैं? 3 बेटियों की पहली फीस? पापा की टूटी पीठ? वह रातें जब उन्होंने अपना खाना हमें खिला दिया? वह दिन जब मोहल्ले ने कहा कि बिना औरत का घर लड़कियों को बिगाड़ देगा और पापा ने अकेले सबका सामना किया?
मीरा ने फाइल उठाई।
—आज अदालत ने भी मान लिया कि हमारे पिता अरुण शर्मा हैं। और हम भी यही मानती हैं। आपको माफी चाहिए तो वह भगवान से मांगिए। हमसे नहीं।
विक्रम ने अरुण को देखा। पहली बार उसकी आंखों में सचमुच पछतावा था।
—अरुण…
अरुण ने बहुत धीरे से कहा:
—मैंने उस रात तुझे खोजा था। 3 दिन तक। फिर समझ गया कि जिन्हें बचाना था, वे मेरे कमरे में थीं। तू नहीं।
विक्रम चुप हो गया।
हॉल में 1 अजीब भारीपन फैल गया। यह कोई फिल्मी चीख-पुकार नहीं थी। यह उन 22 सालों का हिसाब था, जिनकी आवाज अब निकल रही थी।
प्रिंसिपल की आंखों में आंसू थे। उन्होंने माइक पकड़ा, पर बोल नहीं पाईं।
सिया ने डायरी का आखिरी पन्ना खोला।
—पापा, हमें 1 पन्ना और पढ़ना है।
अरुण ने कमजोर आवाज में कहा:
—मत पढ़ो बेटा। बहुत है।
सिया ने सिर हिलाया।
—नहीं। यह जरूरी है।
उसने पढ़ना शुरू किया:
—आज मेरी बेटियां 18 की हो गईं। मीरा ने पूछा कि क्या मेरे सपने कभी थे। मैंने कहा थे, लेकिन बताए नहीं। मैं 1 बड़ी दुकान खोलना चाहता था, ऋषिकेश जाना चाहता था, शादी करना चाहता था, 1 रात पूरी नींद सोना चाहता था। फिर मैंने तीनों को कमरे में नाचते देखा और समझा कि कुछ सपने नाम बदलकर आते हैं। मैंने अपनी जिंदगी नहीं खोई। मेरी जिंदगी ने रूप बदल लिया।
अरुण की आंखों से आंसू गिरने लगे। उसने खुद को संभालने की कोशिश की, पर शरीर जैसे जवाब दे गया। उसके घुटने मुड़ गए। वह पंक्ति 7 और 8 के बीच फर्श पर बैठ गया।
मीरा तुरंत उसके पास झुक गई।
—पापा, हमें देखिए।
अरुण ने उसका चेहरा देखा। वही बच्ची, जिसने पहली रात उसकी उंगली पकड़ी थी। अब वह डिग्री गाउन में थी और उसकी दुनिया संभाल रही थी।
—मैं डरता रहा… —अरुण ने फुसफुसाया— कि आज तुम लोग उसे चुनोगी।
सिया घुटनों के बल बैठ गई।
—उसने हमें 1 बिल दिया था।
काव्या ने अरुण के कंधे पर सिर रखा।
—आपने हमें पूरा जीवन दिया।
मीरा ने उसका चेहरा दोनों हाथों में लिया।
—हम अपने असली पापा को ढूंढ नहीं रही थीं। हम सही दिन का इंतजार कर रही थीं, जब पूरी दुनिया को बता सकें कि वह हमेशा से हमारे सामने थे।
तभी पूरा ऑडिटोरियम खड़ा हो गया।
पहले पीछे की 1 पंक्ति। फिर दूसरी। फिर पूरा हॉल।
तालियां गूंज उठीं। कुछ लोग रो रहे थे। कुछ अपने मोबाइल पर यह पल रिकॉर्ड कर रहे थे। 1 बुजुर्ग प्रोफेसर ने चश्मा उतारकर आंखें पोंछीं। 1 मां अपनी बेटी को सीने से लगाए खड़ी थी।
शर्मा आंटी भी आई थीं। अब वह लाठी के सहारे चलती थीं। तीनों बहनों ने उन्हें छुपाकर बुलाया था। वह अरुण के पास आईं और उसके सिर पर हाथ रखा।
—मैंने कहा था न बेटा, भगवान तेरे साथ है। उस रात दरवाजा तूने खोला था, पर घर भगवान ने भर दिया।
अरुण रोते हुए हंस पड़ा।
विक्रम चुपचाप पीछे हट गया। कोई नाटक नहीं हुआ। कोई उसे धक्का देकर नहीं निकाला गया। लेकिन उसे समझ आ गया कि कुछ दरवाजे ऐसे होते हैं, जो 22 साल बाद लौटने पर भी नहीं खुलते।
समारोह के बाद सैकड़ों तस्वीरें खिंचीं। डिग्रियां, गले, आंसू, मुस्कानें। कई लोग अरुण के पास आकर हाथ जोड़ रहे थे, जैसे उसने कोई पूजा नहीं, बल्कि जीवन का सबसे कठिन धर्म निभाया हो।
बाहर दिल्ली की धूप तेज थी। तीनों बेटियां आगे चल रही थीं। उनके हाथों में डिग्रियां थीं। अरुण पीछे खड़ा उन्हें देख रहा था।
सिया अब वकील बनने जा रही थी।
काव्या सामाजिक काम में मास्टर्स करेगी।
मीरा बाल मनोविज्ञान पढ़ना चाहती थी, ताकि छोड़े गए बच्चों को समझ सके।
वे नेहा की बेटियां थीं। यह सच था।
पर वे अरुण की भी बेटियां थीं। यह अब कागज, खून, समाज और भगवान—सबके सामने सच था।
3 हफ्ते बाद अरुण पुराने कमरे में लौटा। वह अब वहां नहीं रहता था। तीनों बेटियों ने मिलकर उसके लिए लक्ष्मी नगर में छोटा सा फ्लैट किराए पर लिया था। मगर वह पुराना कमरा उसने खाली नहीं किया। वहां उसकी आधी जिंदगी पड़ी थी। पुरानी स्कूल ड्रेस, टूटी गुड़िया, पहले जूते, रिपोर्ट कार्ड, बुखार की दवाइयों के खाली पत्ते, और वह लाल डायरी।
उस दिन वह 2 फ्रेम लेकर आया।
पहले फ्रेम में उसने वही पुराना पेट्रोल पंप का बिल रखा।
“माफ करना अरुण। मैं नहीं कर सकता।”
दूसरे फ्रेम में उसने अदालत का आदेश रखा, जिसमें 3 नाम थे।
सिया मल्होत्रा शर्मा।
काव्या मल्होत्रा शर्मा।
मीरा मल्होत्रा शर्मा।
उसने दोनों फ्रेम दीवार पर साथ टांग दिए।
बाईं तरफ त्याग था।
दाईं तरफ उत्तर था।
वह बहुत देर तक उन्हें देखता रहा।
सालों तक उसने सोचा था कि उसने अपनी जवानी कुर्बान कर दी। अपना प्रेम खो दिया। अपने सपने दफना दिए। हर कर्ज चुकाते समय, हर त्योहार अकेले मनाते समय, हर बार नंदिनी का पुराना नंबर देखकर उसने यही सोचा था कि जिंदगी उससे कुछ छीनकर चली गई।
लेकिन उस दिन उसे पहली बार समझ आया कि हर दर्द नुकसान नहीं होता।
कभी-कभी जिंदगी टूटती है, ताकि किसी और रूप में फिर जन्म ले सके।
उसने मोबाइल निकाला।
नंदिनी का नंबर अभी भी सेव था।
12 साल से कॉल नहीं की थी।
उंगली स्क्रीन पर कांपी। पहले वह सोचता कि बहुत देर हो गई है। कि उसे अधिकार नहीं। कि वह आदमी सिर्फ वहीं रुकना जानता है, जहां जरूरत हो, वहां नहीं जहां प्यार हो।
लेकिन उस दिन 3 बेटियों ने उसे उसका नाम लौटा दिया था। शायद अब वह अपने दिल का बचा हुआ हिस्सा भी वापस मांग सकता था।
उसने कॉल दबा दिया।
2 रिंग के बाद आवाज आई।
—अरुण?
उसने दीवार पर लगे 2 फ्रेम देखे। बिल। आदेश। शुरुआत। जवाब।
उसकी आंखें फिर भर आईं।
—नंदिनी… माफ करना। बहुत देर कर दी।
दूसरी तरफ लंबी चुप्पी रही।
फिर एक धीमी, टूटी हुई हंसी सुनाई दी।
—देर तो की है, अरुण। लेकिन शायद अभी सब खत्म नहीं हुआ।
अरुण ने आंखें बंद कर लीं।
पहली बार उसे लगा कि जिंदगी उससे हिसाब नहीं मांग रही।
जिंदगी, अजीब और दर्दनाक रास्तों से होकर, उसे सब कुछ वापस लौटा रही थी।
और उस रात जब सिया, काव्या और मीरा पुराने कमरे में आईं, उन्होंने दीवार पर लगे दोनों फ्रेम देखे। मीरा ने पेट्रोल पंप के बिल को देखा, फिर अदालत के आदेश को।
—पापा, इसे ऐसे ही रहने देना।
अरुण ने पूछा:
—क्यों?
सिया ने मुस्कुराकर कहा:
—ताकि हमें याद रहे कि हमारी कहानी किसी के छोड़ने से शुरू हुई थी, लेकिन किसी के रुकने से पूरी हुई।
काव्या ने अरुण को गले लगा लिया।
—और अगली बार कोई कहे कि बेटियां बोझ होती हैं, तो उसे यह दीवार दिखा देना।
अरुण हंस पड़ा। उसके आंसू फिर निकल आए, मगर इस बार उनमें डर नहीं था।
सिर्फ 1 सुकून था।
22 साल पहले 1 आदमी ने दरवाजा बंद कर दिया था।
उसी रात दूसरे आदमी ने अपनी बाहें खोल दी थीं।
और दुनिया ने देर से सही, लेकिन देख लिया था कि पिता वह नहीं होता जो जन्म देता है।
पिता वह होता है, जो रोती हुई जिंदगी को गोद में उठाकर कहता है—
—मैं कहीं नहीं जाऊंगा।
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