
भाग 1
दिल्ली के सबसे महंगे न्यूरो अस्पताल की चमकदार लॉबी में उस सुबह एक बूढ़े पूर्व नौसेना अधिकारी को सबके सामने यह कहकर अपमानित कर दिया गया कि उसकी बची हुई जिंदगी अब सिर्फ व्हीलचेयर और दया पर चलनी चाहिए।
रियर एडमिरल अरविंद राठौड़ ने 20 साल पहले कश्मीर सीमा के पास हुए एक गुप्त सैन्य ऑपरेशन में अपने पैरों की ताकत खो दी थी। उस दिन से उनका शरीर कमर के नीचे पत्थर जैसा शांत हो गया था, लेकिन उनकी आँखों में अब भी वही समुद्र जैसी गहराई थी, जिसने कभी युद्धपोतों को तूफानों से निकाल लिया था। देश ने उन्हें मेडल दिए, पर वक्त ने उनसे चलने का अधिकार छीन लिया।
उनकी बेटी नंदिनी राठौड़, जो मुंबई में वकील थी, उन्हें आखिरी उम्मीद लेकर दिल्ली के “श्रीनाथ सुपर स्पेशलिटी न्यूरो सेंटर” लाई थी। साथ में उनका छोटा भाई कबीर भी था, जो अभी 21 साल का था और बचपन से अपने पिता को चलते हुए सिर्फ पुरानी तस्वीरों में देखता आया था। नंदिनी ने 8 महीने इंतजार किया था, अपॉइंटमेंट के लिए लाखों रुपये जमा किए थे, और माँ की मौत के बाद पहली बार पिता से कहा था, “पापा, एक बार और कोशिश कर लेते हैं।”
लेकिन विभागाध्यक्ष डॉ. प्रखर मेहरा ने फाइल के सिर्फ 2 पन्ने पलटे और ठंडी आवाज में कह दिया, “इनका केस खत्म हो चुका है। 20 साल पुरानी स्पाइनल इंजरी में चमत्कार नहीं होते। इन्हें घर ले जाइए। नर्स, इन्हें बाहर करवा दीजिए।”
कमरे में जैसे किसी ने हवा खींच ली। नंदिनी का चेहरा सफेद पड़ गया। कबीर की मुट्ठियाँ भींच गईं। अरविंद राठौड़ ने सिर झुका लिया, जैसे यह अपमान नया न हो। 20 साल में उन्होंने डॉक्टरों की सहानुभूति भी देखी थी और अहंकार भी, पर आज अपनी बेटी की आँखों में टूटती उम्मीद देखना उन्हें सबसे ज्यादा घायल कर गया।
दरवाजे के पास खड़ी नर्स आर्या देशमुख चुप थी। वह अस्पताल में सिर्फ एक सीनियर शिफ्ट नर्स के रूप में जानी जाती थी। 43 साल की, शांत चेहरा, नीली यूनिफॉर्म, बाल कसकर बंधे हुए, और नामपट्टी के ऊपर एक छोटा-सा पुराना बैज, जिस पर जैतून की टहनी बनी थी। कोई नहीं जानता था कि वह बैज किस कहानी का हिस्सा था।
आर्या ने अरविंद के गले के बाईं तरफ एक पतली पुरानी सर्जरी की निशानी देखी। फिर गर्दन के नीचे एक और छोटा गोल निशान। उसके चेहरे पर पहली बार हल्की-सी सख्ती आई। उसने यह निशान 11 साल पहले पुणे के सैन्य अस्पताल के बंद तहखाने में देखे थे, जहाँ एक ऐसी रिसर्च चलती थी जिसके बारे में सरकारी कागजों में सिर्फ आधा सच लिखा गया था।
डॉ. मेहरा ने फिर आदेश दिया, “नर्स आर्या, मरीज को डिस्चार्ज कीजिए।”
आर्या ने पहली बार सीधे उनकी तरफ देखा। “सर, इन्हें डिस्चार्ज करने से पहले मुझे 6 मिनट की जांच करनी होगी।”
डॉ. मेहरा हँस पड़े। “आप मुझे सिखाएँगी?”
आर्या ने बिना आवाज ऊँची किए कहा, “नहीं सर, मैं सिर्फ उस आदमी को देख रही हूँ जिसे 20 साल से किसी ने सचमुच देखा ही नहीं।”
कमरे में खामोशी जम गई। अरविंद राठौड़ ने पहली बार सिर उठाया। उनकी नजर आर्या के बैज पर गई, फिर उसकी आँखों पर। जैसे किसी पुराने सैनिक ने दूसरे सैनिक की पहचान बिना परिचय के पढ़ ली हो।
आर्या उनके सामने झुकी। “एडमिरल साहब, अगर आप अनुमति दें तो मैं आपकी गर्दन और रीढ़ की जांच करना चाहती हूँ। मैं कोई झूठा वादा नहीं करूँगी, लेकिन मुझे लगता है उस रात सीमा पर किसी सैन्य चिकित्सक ने आपके शरीर को पूरी तरह हारने नहीं दिया था।”
अरविंद ने लंबी साँस ली। नंदिनी रोने से खुद को रोक रही थी। कबीर पिता के कंधे के पीछे खड़ा था।
फिर 20 साल से उम्मीद को दफना चुके एडमिरल ने धीरे से कहा, “अनुमति है।”
और उसी पल डॉ. मेहरा ने अस्पताल की सुरक्षा को फोन उठाकर बुलाना चाहा।
भाग 2
आर्या ने ट्रॉली पर एक छोटा रिफ्लेक्स हैमर, पेनलाइट और अपने बैग से निकाली हुई कपड़े की एक सील बंद पट्टी रखी। डॉ. मेहरा का चेहरा लाल हो गया। “यह अस्पताल का उपकरण नहीं है।”
आर्या ने शांत स्वर में कहा, “नहीं सर, यह सैन्य चिकित्सा कार्यक्रम की स्टिमुलेशन पट्टी है। 12 संपर्क बिंदु हैं। बहुत साल से इस्तेमाल नहीं की।”
नंदिनी डर और उम्मीद के बीच काँप रही थी। “क्या पापा चल सकेंगे?”
आर्या ने उसकी तरफ देखा। “अभी इतना मत सोचिए। पहले यह जानना जरूरी है कि उनके शरीर में रास्ता बचा है या नहीं।”
कबीर ने पिता की शर्ट सावधानी से हटाई। अरविंद की पीठ दुबली हो चुकी थी, पर कंधों में अब भी सैनिक जैसी कठोरता थी। आर्या ने गर्दन के नीचे छोटे गोल निशान पर उंगली रखी और बहुत हल्का दबाव दिया।
अरविंद के होंठों से टूटी हुई साँस निकली।
नंदिनी पीछे हट गई। “पापा?”
अरविंद की आँखें फैल गईं। “मुझे… कुछ महसूस हुआ।”
डॉ. मेहरा आगे झुक गए। उनकी आवाज अब पहले जैसी कठोर नहीं थी। “क्या किया आपने?”
आर्या बोली, “गर्दन में सबडर्मल कंडक्शन मार्कर है। अगर यह सही है, तो इनकी रीढ़ पूरी तरह टूटी नहीं थी। संकेत 20 साल से सोए हुए थे।”
उसने पट्टी अरविंद की कमर के पास रखी और छोटा नियंत्रक चालू किया। सेटिंग 1 पर अरविंद ने कहा, “बाईं जांघ में झनझनाहट।”
सेटिंग 2 पर उनकी दाहिनी जांघ हल्की सी हिली।
कबीर घुटनों के बल बैठ गया। नंदिनी का हाथ मुँह पर चला गया। 20 साल से न हिली हुई मांसपेशी ने जैसे पूरे परिवार की किस्मत हिला दी थी।
सेटिंग 3 पर अरविंद के पैर की उँगलियाँ जूते के भीतर मुड़ीं।
डॉ. मेहरा की उंगलियों से टैबलेट लगभग छूट गया।
आर्या ने उपकरण बंद किया। “आज ही एमआरआई, नर्व कंडक्शन टेस्ट और भर्ती की जरूरत है।”
डॉ. मेहरा ने धीमी आवाज में पूछा, “आप असल में हैं कौन?”
आर्या ने उसकी तरफ देखा। “फिलहाल वही, जिसे आपने अभी तक सिर्फ नर्स समझा था।”
भाग 3
उस दोपहर अस्पताल में खबर आग की तरह फैल गई। वही मरीज जिसे सुबह बाहर भेजा जा रहा था, अब वीआईपी न्यूरो सूट में भर्ती था। डॉ. प्रखर मेहरा, जो किसी जूनियर डॉक्टर की बात भी मुश्किल से सुनते थे, खुद रेडियोलॉजी विभाग को फोन कर रहे थे। एमआरआई मशीन खाली करवाई गई। नर्व टेस्ट की टीम बुलवाई गई। अस्पताल प्रशासन, कानूनी सलाहकार और पूर्व सैनिक बोर्ड तक खबर पहुँच गई।
नंदिनी पिता के कमरे के बाहर दीवार से लगी खड़ी थी। उसके आँसू अब डर के नहीं थे। 20 साल से उसके भीतर एक अपराधबोध था कि शायद वह पिता के लिए पर्याप्त नहीं कर पाई। माँ के अंतिम दिनों में उसने उन्हें यही कहते सुना था, “कभी अरविंद को यह मत मानने देना कि वह खत्म हो गए हैं।” लेकिन अरविंद खुद उम्मीद से थक चुके थे।
कमरे के भीतर अरविंद ने आर्या से पूछा, “तुम्हारा पूरा सच क्या है?”
आर्या कुछ पल चुप रही। फिर उसने कुर्सी खींचकर उनके सामने बैठते हुए कहा, “मेजर आर्या देशमुख, भारतीय सेना मेडिकल कोर, सेवानिवृत्त। 2011 से 2015 तक मैं पुणे के एक गुप्त सैन्य न्यूरो रिकवरी कार्यक्रम में थी। उस कार्यक्रम में उन सैनिकों और अधिकारियों का अध्ययन होता था जिन्हें युद्धक्षेत्र में विशेष वेगल कंडक्शन ब्रिज लगाए गए थे। यह तकनीक घायल रीढ़ को पूरी तरह ठीक नहीं करती थी, पर संकेतों को एक वैकल्पिक मार्ग से जीवित रख सकती थी।”
कबीर ने अविश्वास से पूछा, “तो पापा 20 साल तक पूरी तरह लकवाग्रस्त नहीं थे?”
आर्या ने धीरे से कहा, “उनका शरीर सोया हुआ था। मरा हुआ नहीं।”
नंदिनी की आँखें भर आईं। “तो किसी ने बताया क्यों नहीं?”
आर्या का चेहरा पहली बार टूटता हुआ लगा। “क्योंकि कार्यक्रम बंद कर दिया गया। फंडिंग हट गई। फाइलें सील हो गईं। हमें 37 नामों की सूची दी गई थी। मैं जानती थी उनमें से 24 लोग जिंदा थे। मुझे उन्हें संपर्क करने से मना किया गया। मैंने विरोध किया। मैं हार गई। मैंने सेना छोड़ दी। नर्स बनी। लेकिन यह पट्टी और वे नाम मैंने अपने भीतर छुपाकर रखे।”
अरविंद ने धीमे से अपना हाथ आगे बढ़ाया। आर्या ने उसका हाथ थाम लिया।
“मेरा नाम उस सूची में था?” उन्होंने पूछा।
“हाँ, सर। आप नंबर 9 थे।”
अरविंद ने आँखें बंद कर लीं। 20 साल की रात जैसे उनके चेहरे से होकर गुजर गई। फिर उन्होंने कहा, “मैंने अपनी बेटी से कहा था कि उम्मीद करना बंद कर दे। मैंने अपने बेटे को कभी अपने साथ क्रिकेट खेलते नहीं देखा। मैंने अपनी पत्नी की अंतिम यात्रा व्हीलचेयर से देखी। अगर आज तुमने मुझे यह न बताया होता, तो मैं अपनी गलती लेकर मर जाता।”
आर्या कुछ बोल नहीं पाई।
उसी समय डॉ. मेहरा कमरे में आए। सुबह वाले अहंकार की जगह अब उनके चेहरे पर थकान और शर्म थी। “एमआरआई रिपोर्ट आ गई है,” उन्होंने कहा। “रीढ़ पूरी तरह कटी नहीं है। संपीड़न है, एट्रोफी है, लेकिन कंडक्शन संभव है।”
नंदिनी ने कुर्सी पकड़ ली। “मतलब?”
आर्या ने उसकी ओर मुड़कर कहा, “मतलब रास्ता है। लंबा है, कठिन है, दर्दनाक है, लेकिन रास्ता है।”
डॉ. मेहरा ने धीमे स्वर में कहा, “मिस आर्या… सुबह मैंने गलती की। इस परिवार के सामने कहना चाहता हूँ कि मैं गलत था।”
आर्या ने सीधा उत्तर दिया, “डॉक्टर, आपकी माफी से ज्यादा जरूरी है कि अब कोई और परिवार 20 साल तक अंधेरे में न रहे।”
अगले दिन अस्पताल में आपात बैठक हुई। डीन, मेडिकल बोर्ड, पूर्व सैनिक कल्याण विभाग, कानूनी टीम और डॉ. मेहरा सब मौजूद थे। आर्या ने मेज पर अपनी पुरानी डायरी रखी। उसमें 37 नाम थे। कुछ नामों पर पुराना निशान, कुछ पर प्रश्नचिह्न, कुछ पर तारीखें। उसने कहा, “इनमें से कई लोग अब बहुत बूढ़े होंगे। कई शायद नहीं बचे। लेकिन जिन्हें बचाया जा सकता है, उनके पास ज्यादा समय नहीं है।”
एक अधिकारी ने कहा, “यह मामला संवेदनशील है। सरकार से अनुमति में महीनों लग सकते हैं।”
आर्या की आँखें कठोर हो गईं। “इन लोगों ने देश के लिए अपने शरीर दिए थे। अब उन्हें फाइलों में मरने नहीं दिया जाएगा।”
बैठक में खामोशी छा गई। उस दिन पहली बार डॉ. मेहरा ने आर्या का साथ दिया। “अस्पताल क्लिनिकल जिम्मेदारी लेगा,” उन्होंने कहा। “मैं हस्ताक्षर करूँगा।”
इसी फैसले के बाद एक छोटा-सा कार्यक्रम शुरू हुआ। नाम रखा गया “पुनर्संचार क्लिनिक।” आर्या उसकी निदेशक बनी, लेकिन उसने सफेद कोट पहनने से मना कर दिया। वह अपनी नीली नर्स यूनिफॉर्म और छोटा जैतून वाला बैज ही पहनती रही।
अरविंद राठौड़ की असली लड़ाई अब शुरू हुई।
पहले दिन फिजियोथेरेपी रूम में उन्हें समानांतर लोहे की छड़ों के बीच खड़ा करने की कोशिश हुई। उनके पैर काँप रहे थे। पसीना माथे से बह रहा था। नंदिनी दरवाजे पर खड़ी थी, कबीर उनके पीछे सुरक्षा बेल्ट पकड़े हुए था। आर्या कमरे के कोने में खड़ी होकर बस देख रही थी।
फिजियोथेरेपिस्ट मीरा ने कहा, “सर, 3 तक गिनूँगी। दाहिने पैर पर दबाव डालिए। 1… 2… 3।”
अरविंद ने पूरा शरीर कस लिया। दाहिना घुटना आधा इंच सीधा हुआ। वह दर्द से कराहे, पर बैठे नहीं।
मीरा ने कहा, “फिर से।”
उन्होंने फिर कोशिश की।
पहले सप्ताह के अंत तक वह 4 सेकंड सहारे से खड़े हो पाए। दूसरे सप्ताह में 9 सेकंड। तीसरे सप्ताह में उनके पैर में आग जैसी जलन होती, रात को ऐंठन होती, और कई बार वह चिल्लाकर कहते, “बस, आज नहीं।” पर अगले दिन सबसे पहले फिजियो रूम में वही पहुँचते।
एक रात नंदिनी ने उन्हें कमरे में अकेला रोते देखा। वह चुपचाप दरवाजे पर रुक गई। अरविंद ने बिना मुड़े कहा, “अंदर आ जाओ।”
नंदिनी उनके पास बैठ गई। “दर्द बहुत है?”
उन्होंने सिर हिलाया। “दर्द से ज्यादा शर्म है।”
“शर्म?”
“तुम 20 साल मेरी ताकत बनी रहीं। मैंने तुम्हें बोझ समझकर दूर किया। जब तुम मुझे इलाज के लिए खींचकर लाती थीं, मैं झुंझलाता था। तुम सही थीं, मैं हार गया था।”
नंदिनी ने उनका हाथ पकड़ लिया। “पापा, माँ कहती थीं कि सैनिक जब हारता है तो सिर्फ मैदान बदलता है, लड़ाई नहीं छोड़ता।”
अरविंद की आँखें भर आईं। “तुम्हारी माँ को मैंने बहुत याद किया आज।”
कबीर दरवाजे पर खड़ा सब सुन रहा था। वह भीतर आया और पिता की गोद के पास बैठ गया। “जब आप चलेंगे न, तो सबसे पहले मेरे साथ इंडिया गेट चलना।”
अरविंद ने पहली बार हल्की मुस्कान दी। “और तू मुझे गिराएगा नहीं?”
कबीर रोते हुए हँसा। “नहीं पापा, इस बार मैं पकड़ूँगा।”
इसी बीच आर्या दूसरे मरीजों को ढूँढ़ रही थी। 37 नामों में से पहला कॉल महाराष्ट्र से आया। एक पूर्व जवान, जगदीश सालुंखे, 2005 से व्हीलचेयर पर था। उसकी पत्नी ने फोन पर रोते हुए कहा, “मैडम, उसके गले पर वही निशान है। वह रात को सो नहीं पाता। क्या आप सच में मदद कर सकती हैं?”
आर्या ने कहा, “मैं यह वादा नहीं करूँगी कि वह चलेगा। लेकिन मैं यह वादा करती हूँ कि हम उसे देखकर हार नहीं मानेंगे।”
फिर पंजाब से हरभजन सिंह आया, राजस्थान से इमरान खान आया, असम से देवोजीत बरुआ आया। कुछ के शरीर में रास्ता बचा था, कुछ में बहुत देर हो चुकी थी। जिनकी मदद संभव नहीं थी, उनके सामने भी आर्या झूठ नहीं बोलती थी। एक बुजुर्ग पूर्व सैनिक ने उसका हाथ पकड़कर कहा, “बेटी, तू देर से आई, पर आई तो सही। अब मरूँगा तो यह जानकर कि कोई हमें भूल नहीं गया था।”
उस रात आर्या अस्पताल की सीढ़ियों में अकेली बैठकर रोई। 11 साल की चुप्पी, 37 नाम, और हर नाम के पीछे एक परिवार। वह खुद को दोष देती रही कि काश वह पहले लड़ पाती। लेकिन अगले ही सुबह 6 बजे वह फिर वार्ड में थी।
7वें सप्ताह में अरविंद ने पहली बार कदम उठाया।
मीरा ने बेल्ट पकड़ी हुई थी। कबीर सामने खड़ा था। नंदिनी ने साँस रोक रखी थी। आर्या दरवाजे के पास थी। अरविंद ने दाहिना पैर उठाया। बहुत धीरे। जैसे जमीन से कोई पुराना रिश्ता फिर जुड़ रहा हो। फिर बायाँ पैर। सिर्फ 2 छोटे कदम। फिर वह कुर्सी पर बैठ गए।
कोई ताली नहीं बजा। कोई चिल्लाया नहीं। कमरे में बस नंदिनी की सिसकी सुनाई दी। अरविंद ने आर्या की तरफ देखा। आर्या ने सिर झुका कर सलामी जैसी मुद्रा में हल्का हाथ उठाया। वह समझ गए। यह जश्न नहीं था। यह वापसी की शुरुआत थी।
6 महीने बाद अस्पताल के सभागार में एक छोटा समारोह रखा गया। मीडिया को अंदर नहीं बुलाया गया था। वहाँ सिर्फ डॉक्टर, नर्सें, फिजियोथेरेपिस्ट, परिवार और वे पूर्व सैनिक थे जिनकी जिंदगी इस कार्यक्रम ने बदल दी थी।
पहली पंक्ति में 11 पूर्व सैनिक बैठे थे। कोई छड़ी के सहारे था, कोई हल्के ब्रेस में, कोई अभी भी व्हीलचेयर में पर चेहरे पर नई रोशनी लिए। अरविंद राठौड़ नौसेना की पुरानी औपचारिक वर्दी में बैठे थे। वर्दी थोड़ी ढीली हो चुकी थी, पर उनके कंधे फिर सीधे थे।
मंच से डीन ने कार्यक्रम की बात की। डॉ. मेहरा ने कम शब्दों में स्वीकार किया कि चिकित्सा विज्ञान में सबसे खतरनाक रोग अहंकार है। फिर अरविंद राठौड़ को बुलाया गया।
नंदिनी ने उनका हाथ पकड़ना चाहा, पर उन्होंने हल्के से मना किया। कबीर पीछे खड़ा रहा। अरविंद ने छड़ी उठाई और धीरे-धीरे मंच तक चले। हर कदम पर सभागार की साँस अटकती रही। 20 साल बाद एक पिता, एक सैनिक, एक पति की स्मृति, एक देशभक्त शरीर, सब मिलकर मंच तक चल रहे थे।
उन्होंने माइक पकड़ा। “मुझे 20 साल तक कहा गया कि मैं कभी नहीं चलूँगा। मैंने विश्वास कर लिया। मेरी पत्नी मुझे उम्मीद देती रही, पर वह यह दिन देखे बिना चली गई। मेरी बेटी लड़ती रही, मेरा बेटा बड़ा हो गया, और मैं खुद को खत्म मानता रहा। फिर 1 सुबह एक नर्स कमरे में आई। उसने मेरी फाइल नहीं, मुझे देखा।”
सभागार में सन्नाटा था।
“आज मैं अपने पैरों पर खड़ा हूँ। पूरी तरह मजबूत नहीं, पर खड़ा हूँ। मेरे जैसे 18 लोगों को फिर से जीवन मिला है। कुछ लोग नहीं बच पाए। उनके नाम हम भूलेंगे नहीं। यह जीत किसी मशीन की नहीं, किसी डिग्री की नहीं, यह जीत उस नजर की है जो मरीज को केस नंबर नहीं मानती।”
फिर उन्होंने आर्या की ओर देखा। “मेजर आर्या देशमुख, कृपया आगे आइए।”
आर्या दूसरी पंक्ति में बैठी थी, नीली यूनिफॉर्म में, वही छोटा बैज लगाए हुए। वह धीरे से उठी और मंच के सामने आकर रुक गई।
अरविंद ने छड़ी किनारे रखी। वह बिना सहारे 3 कदम चले। उनके पैर काँपे, पर वह रुके नहीं। वह आर्या के सामने खड़े हुए। फिर उन्होंने दाहिना हाथ माथे तक उठाया और सलाम किया।
पहली पंक्ति में बैठे पूर्व सैनिक एक-एक कर उठने लगे। कोई छड़ी पर टिककर, कोई पत्नी के कंधे पर हाथ रखकर, कोई मुश्किल से, लेकिन सब खड़े हुए। 11 हाथ एक साथ सलामी में उठे। नंदिनी रो रही थी। कबीर की आँखों से आँसू बह रहे थे। डॉ. मेहरा पीछे खड़े थे, उन्होंने भी अनाड़ी-सी सलामी दी।
आर्या ने अपना दाहिना हाथ उठाया। वही हाथ जिसमें पुराने छर्रे का हल्का निशान था। वही हाथ जिसने 11 साल तक पट्टी नहीं खोली थी। वही हाथ जिसने सोए हुए शरीरों में उम्मीद का पहला संकेत छुआ था।
उसने सलामी लौटाई।
तालियाँ धीरे शुरू हुईं, फिर पूरे सभागार में गूंजने लगीं। किसी समारोह की तरह नहीं, जैसे इतने वर्षों से बंद पड़ा कोई दरवाजा आखिर खुल गया हो।
समारोह के बाद नंदिनी आर्या से मिली। उसने उसे गले लगा लिया। “पापा इस रविवार अपने पुराने कमरे में सोएँगे। 20 साल बाद पहली मंजिल पर। उन्होंने कहा है कि सीढ़ियाँ चढ़कर जाएँगे।”
आर्या ने हल्की मुस्कान से कहा, “तो नीचे कोई कुर्सी मत रखना। वरना वह बीच में बैठ जाएँगे।”
दोनों हँस पड़ीं, और हँसी के भीतर आँसू थे।
शाम को जब सब जा चुके, आर्या फिर उसी न्यूरो वार्ड के गलियारे से गुजरी। वही सफेद दीवारें, वही मशीनों की आवाज, वही साफ दवाइयों की गंध। पर अब सब कुछ थोड़ा अलग था। रिसेप्शन पर डॉ. मेहरा खड़े थे। उन्होंने बिना अहंकार के कहा, “आर्या, कमरा 6 में नया मरीज आया है। महिला है, 56 साल की। उसके गले पर भी निशान है।”
आर्या की चाल एक पल के लिए थम गई।
कमरा 6 के काँच से उसने देखा। एक मध्यम उम्र की महिला व्हीलचेयर में सिर झुकाए बैठी थी। उसकी बेटी पीछे खड़ी रो रही थी। पति कोने में थका हुआ, पर उम्मीद से भरा, आर्या की तरफ देख रहा था।
आर्या ने अपनी नामपट्टी ठीक की। छोटे जैतून वाले बैज को छुआ। गहरी साँस ली।
फिर उसने दरवाजा खोला और भीतर चली गई।
“नमस्ते,” उसने कहा, “मैं आर्या देशमुख हूँ। आज आपकी जांच मैं करूँगी।”
Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.