
मज़दूर चीख पड़ा और घबराकर पीछे उछल गया।
मेरी माँ के मुँह से ऐसी आवाज़ निकली, जैसी मैंने पहले कभी किसी इंसान से नहीं सुनी थी।
न वह चीख थी।
न कोई शब्द।
वह मानो भीतर से फट जाने की आवाज़ थी।
मैं फिर से आगे लपकी, लेकिन रुद्रवीर ने मेरा कंधा पकड़कर इतनी ज़ोर से धक्का दिया कि मेरी पीठ धातु की रेलिंग से जा टकराई।
“इसे मत खोलो!” वह चिल्लाया।
श्मशान का कर्मचारी उसकी ओर घूरने लगा।
“इसके अंदर एक बच्चा है!”
“अंदर कोई बच्चा नहीं है!” रुद्रवीर दहाड़ा। “यह एक उपकरण है। इसे अंदर धकेल दो!”
उसी एक वाक्य ने हमें बचा लिया।
क्योंकि वहाँ मौजूद हर व्यक्ति ने वह बात सुन ली।
उसने यह नहीं कहा—देखो, यह क्या है।
उसने यह नहीं कहा—डॉक्टर को बुलाओ।
उसने यह नहीं कहा—मेरा बच्चा।
उसने कहा—
“इसे अंदर धकेल दो।”
मैंने पुजारी के पास रखा पीतल का लोटा उठाया और पूरी ताकत से रुद्रवीर के हाथ पर दे मारा। पानी चारों ओर बिखर गया। वह गाली देता हुआ मुझे छोड़ बैठा। कर्मचारी काँपते हाथों से सफ़ेद अस्पताल वाली टेप उखाड़ने लगा। टेप बुरी तरह चिपकी हुई थी।
ज़िप के नीचे भी और टेप लगी हुई थी।
उसके अंगूठे पर ताज़ा खून लग गया।
“इसे काटो!” मैं चीखी।
किसी ने उसे एक छोटा-सा ब्लेड थमा दिया।
रुद्रवीर फिर आगे बढ़ा, लेकिन इस बार पुजारी उसके सामने आकर खड़े हो गए। माथे पर भस्म लगाए, काँपते घुटनों वाले एक बूढ़े आदमी ने एक हत्यारे और अग्निकुंड के बीच दीवार बनकर खड़े होने का साहस किया।
“बस,” पुजारी ने कहा।
रुद्रवीर ने हाथ उठाया।
मेरी माँ ने उसे तमाचा मार दिया।
उस थप्पड़ की आवाज़ पूरे श्मशान गृह में गूँज उठी।
“तुमने कहा था कि मेरी बेटी मर चुकी है,” उन्होंने फुसफुसाकर कहा। “तुमने कहा था कि मेरा नाती नहीं रहा।”
एक पल के लिए रुद्रवीर उन्हें ऐसे घूरता रह गया, मानो उसे समझ ही न आया हो कि एक टूटी हुई माँ को फिर से हिम्मत कैसे मिल गई।
फिर ज़िप खुल गई।
सबसे पहले गंध आई।
खून।
दवाइयों की।
पसीने की।
प्लास्टिक की।
फिर काला बैग पीछे की ओर खुल गया।
उसके अंदर मेरी बहन थी।
तिष्य।
उसका चेहरा राख जैसा धूसर था। उसके होंठ नीले पड़ चुके थे। उसके कानों के पास ढीली-ढाली रुई ठूँस दी गई थी। उसके बाल गीले होकर गालों से चिपके हुए थे। उसके मुँह पर चिपकाई गई टेप को जल्दबाज़ी में उखाड़ा गया था, जिससे वहाँ की त्वचा लाल हो गई थी।
लेकिन उसकी छाती उठ-गिर रही थी।
बहुत मुश्किल से।
उसके पेट से सटा हुआ, अस्पताल की दाग़दार चादर में लिपटा एक नवजात शिशु था।
बहुत छोटा।
बैंगनी-लाल रंग का।
ज़िंदा।
उसके टखने पर एक सफ़ेद पहचान-पट्टी बँधी हुई थी, जिसका छोटा-सा प्लास्टिक टैग हल्की-सी चमक रहा था।
बीप।
बीप।
बीप।
मेरा भांजा।
मेरी माँ घुटनों के बल गिर पड़ीं।
“तिष्य!”
मैंने अपनी बहन की गर्दन पर उँगलियाँ रखीं, जो मुझे अपनी ही नहीं लग रही थीं।
नाड़ी।
बहुत धीमी।
लेकिन सचमुच धड़क रही थी।
“यह ज़िंदा है,” मैंने काँपती आवाज़ में कहा।
श्मशान का कर्मचारी लड़खड़ाता हुआ पीछे हटा और एम्बुलेंस बुलाने के लिए ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाने लगा।
रुद्रवीर दरवाज़े की ओर मुड़ा।
मैंने उसे देख लिया।
दुःख कुछ लोगों को तोड़ देता है।
गुस्सा कुछ लोगों को तेज़ बना देता है।
मैं दौड़ पड़ी।
वह गलियारे तक लगभग पहुँच चुका था, तभी मैंने पीछे से उसका कुर्ता पकड़ लिया। कपड़ा मेरी मुट्ठी में फट गया। वह घूमकर मेरी कलाई पकड़ बैठा और इतनी ज़ोर से दबाया कि दर्द मेरी पूरी बाँह में दौड़ गया।
“बेवकूफ़ लड़की,” उसने दाँत भींचकर कहा। “तुम्हें पता भी नहीं कि तुमने क्या किया है।”
“मैंने इन्हें बचाया है।”
उसकी आँखें काली पड़ गईं।
“नहीं। तुमने सिर्फ़ उस चीज़ को थोड़ी देर के लिए टाल दिया है, जो होना ही था।”
उसी समय श्मशान के कर्मचारी ने पीछे से स्ट्रेचर धकेलने वाले लकड़ी के तख़्त से उसके ऊपर वार कर दिया।
रुद्रवीर एक घुटने पर गिर पड़ा।
पुजारी ने बाहर का दरवाज़ा बंद कर दिया।
कर्मचारी चिल्लाया,
“पुलिस बुलाओ! अभी पुलिस बुलाओ!”
मैंने अपनी कलाई छुड़ाई और वापस तिष्य के पास दौड़ी।
बच्चे का रोना अब बहुत धीमा हो गया था।
उसकी पहली चीख से भी ज़्यादा मुझे उसी बात ने डरा दिया।
“हिम्मत मत हारना, छोटे,” मैंने उसे बहुत सावधानी से बैग से उठाते हुए फुसफुसाया। “हमारे साथ रहना। तुमने इतनी ज़ोर से रोकर हमें बुलाया था। अब चुप मत हो जाना।”
वह इतना छोटा था कि मुझे अपने हाथ उसके लिए बहुत खुरदरे लग रहे थे।
मेरी माँ ने अपना दुपट्टा उतारा और अस्पताल की चादर के ऊपर उसे उसमें लपेट दिया।
तिष्य की पलकों में हलचल हुई।
“तिष्य,” मैं उसके बिल्कुल पास झुककर बोली। “दीदी, मैं हूँ। वायु।”
उसके होंठ हिले।
लेकिन कोई आवाज़ नहीं निकली।
मैं और झुक गई।
उसकी साँसों से रसायनों की गंध आ रही थी।
“बच्चा…” उसने बहुत धीमे से कहा।
“वह ज़िंदा है। वह मेरे पास है।”
उसकी आँख के कोने से आँसू की एक बूँद बह निकली।
फिर उसकी नज़र मेरे पीछे चली गई।
उसकी आँखों में फिर डर लौट आया।
उलझन नहीं।
पहचान।
“उसे… मत…”
उसकी आँखें फिर बंद हो गईं।
एम्बुलेंस नौ मिनट में पहुँच गई।
पुलिस बारह मिनट में पहुँची।
उन बारह मिनटों में रुद्रवीर अपनी कहानी बदलता रहा।
पहले उसने कहा कि अस्पताल के कर्मचारियों ने उसे ग़लत जानकारी दी थी।
फिर उसने कहा कि जब तिष्य उसे सौंपी गई थी, तब उसकी नाड़ी नहीं चल रही थी।
फिर उसने कहा कि बच्चा शायद गलती से उस बैग में रख दिया गया होगा।
फिर उसने कहा कि यह सब मैंने रचा है, क्योंकि मैं हमेशा से उससे नफ़रत करती थी।
हर झूठ पिछले झूठ से भी तेज़ी से निकला।
और हर झूठ पहले से भी ज़्यादा खोखला और घिनौना था।
इंस्पेक्टर अनामिका शुक्ला बिना पलक झपकाए उसकी बातें सुनती रहीं।
फिर उन्होंने बॉडी बैग की ओर देखा।
टेप की ओर।
खून की ओर।
मेरी माँ की बाँहों में रोते हुए नवजात की ओर।
और उस स्ट्रेचर पर पड़े मेरी बहन की ओर, जिसकी नाड़ी पैरामेडिक्स जाँच रहे थे।
आख़िरकार उन्होंने रुद्रवीर की ओर देखा।
“तो आपके मुताबिक़, एक ज़िंदा माँ और एक ज़िंदा नवजात को गलती से सीलबंद बॉडी बैग में डालकर सीधे दाह-संस्कार के लिए भेज दिया गया?”
उसका चेहरा सख्त हो गया।
“मेरी पत्नी को मृत घोषित किया गया था।”
“किसने?”
वह समय पर जवाब नहीं दे पाया।
इंस्पेक्टर शुक्ला के होंठों पर बिना गर्मजोशी वाली मुस्कान उभरी।
“बहुत अच्छा। यह बात हम अस्पताल से पूछ लेंगे।”
अस्पताल पहुँचते ही सब कुछ और ज़्यादा अफ़रातफ़री भरा हो गया।
डॉक्टर तिष्य को तुरंत आपातकालीन कक्ष में ले गए।
मेरे भांजे को नवजात गहन चिकित्सा इकाई में ले जाया गया।
मेरी माँ दोनों के पीछे भागना चाहती थीं और दोनों दरवाज़ों के बीच ही लगभग गिर पड़ीं।
मैंने उन्हें संभालकर खड़ा रखा, जबकि मेरे अपने पैर भी काँप रहे थे।
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