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बेटी के 96.8 प्रतिशत लाने के बाद जब हम ननिहाल पहुँचे, तो 35 रिश्तेदारों के सामने केक पर लिखा था “हमारी इकलौती नातिन”, मेरी बच्ची चुपचाप मिठाई का डिब्बा कुर्सी पर रखकर बाहर चली गई, और मैंने बस वकील को फोन किया—फिर दादी की वसीयत का पुराना राज खुलने वाला था

PART 1

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जब 18 साल की रिया अपने ननिहाल के आँगन में उस केक के सामने खड़ी हुई, जिस पर गुलाबी क्रीम से लिखा था “हमारी इकलौती नातिन अवनि”, तो नंदिनी को पहली बार समझ आया कि उसके माता-पिता ने उसकी बेटी को सिर्फ भुलाया नहीं था, पूरे परिवार के सामने मिटा दिया था।

रिया ने न चीखा, न रोई। वह गहरे नीले रंग का सूट पहने खड़ी थी, वही सूट जो उसने 3 दिन पहले बड़े चाव से चुना था, क्योंकि उसे लगा था कि लखनऊ के उस पुराने पुश्तैनी घर में आज उसकी 12वीं की शानदार सफलता मनाई जाएगी। उसके हाथ में मिठाई का छोटा डिब्बा था, जो वह अपने नाना-नानी को देने लाई थी। पर सामने फूलों की झालरों, पीतल के दीयों और रंगोली से सजे आँगन में हर चीज़ पर सिर्फ अवनि का नाम था।

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अवनि 14 साल की थी। उसने 10वीं में अच्छे अंक पाए थे। रिया ने 12वीं में 96.8 प्रतिशत अंक लाकर दिल्ली के प्रतिष्ठित कॉलेज में छात्रवृत्ति के साथ प्रवेश पाया था। पूरे स्कूल ने उसकी तारीफ की थी। लेकिन आज, 35 रिश्तेदारों, पड़ोसियों और दूर के काकाओं-मौसियों के बीच, सब ऐसे व्यवहार कर रहे थे जैसे रिया वहाँ मौजूद ही नहीं थी।

“मम्मा,” रिया ने धीमे से कहा, “केक पर इकलौती नातिन लिखा है।”

नंदिनी का दिल जैसे किसी ने मुट्ठी में भींच लिया।

3 दिन पहले उसकी माँ शारदा देवी ने फोन पर कहा था, “हम अपनी नातिन की सफलता की छोटी-सी पूजा और दावत रख रहे हैं। तुम लोग जरूर आना।”

नंदिनी ने पूछा भी नहीं था कि किस नातिन की बात हो रही है। उसे लगा था, इतने वर्षों के बाद शायद उसके माता-पिता रिया को अपनाने की कोशिश कर रहे हैं। रिया बचपन से जानती थी कि नानी की गोद अवनि के लिए थी, नाना की शाबाशी अवनि के लिए थी, त्योहारों के नए कपड़े अवनि के लिए थे। उसके हिस्से बस हल्की मुस्कानें और मजबूर आशीर्वाद आते थे।

उस दिन जब वे पहुँचे, शारदा देवी ने दरवाजे पर रोली लगाई, नंदिनी के पति समीर को औपचारिक नमस्ते किया और रिया के सिर पर उँगलियाँ छुआकर बोलीं, “बड़ी हो गई।”

बस इतना।

आँगन में अवनि फूलों का मुकुट पहने बैठी थी। नंदिनी की छोटी बहन कविता सबको मिठाई बाँट रही थी और बार-बार कह रही थी, “मेरी बेटी ने खानदान का नाम रोशन कर दिया।”

नंदिनी ने खुद को समझाया कि शायद रिया के लिए अलग से कुछ होगा। शायद बाद में घोषणा होगी। शायद यह सब गलतफहमी है।

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फिर उसने वह केक देखा।

केक के पास उपहारों की मेज थी। नया लैपटॉप, सोने की चेन, लिफाफे, महँगे कपड़े। एक कार्ड पर लिखा था, “नाना-नानी की तरफ से अपनी इकलौती रोशनी के लिए।”

रिया ने मिठाई का डिब्बा धीरे से पास की कुर्सी पर रख दिया।

तभी नाना हरिशंकर प्रसाद ने गिलास उठाकर कहा, “हमारी इकलौती नातिन अवनि को आशीर्वाद। यही हमारे घर की असली खुशी है।”

तालियाँ बजीं।

रिया की आँखें झुक गईं।

समीर ने नंदिनी के कंधे पर हाथ रखा। “चलो, यहाँ से चलते हैं।”

पर नंदिनी जैसे जमीन में गड़ गई थी। इतने सालों का अपमान, इतने त्योहारों की चुप्पी, इतने अधूरे निमंत्रण, सब उसके गले में फँस गए।

वह अपनी माँ के पास गई। “माँ, यहाँ हर जगह इकलौती नातिन क्यों लिखा है? रिया भी आपकी नातिन है।”

शारदा देवी ने थकी हुई आवाज में कहा, “नंदिनी, आज तमाशा मत करो।”

“तमाशा? मेरी बेटी ने 12वीं में 96.8 प्रतिशत लाए हैं।”

हरिशंकर प्रसाद पास आ गए। “रिया ने भी कुछ पास किया है क्या?”

नंदिनी ने उन्हें अविश्वास से देखा। “पापा, आपने तस्वीरें देखी थीं। आपने अंगूठे वाला जवाब भी भेजा था।”

उन्होंने कंधे उचकाए। “अच्छा, 12वीं। आजकल तो सब कर लेते हैं।”

कविता हँसी दबाते हुए बोली, “दीदी, इतना जलना ठीक नहीं। अवनि का दिन है।”

रिया ने सब सुन लिया। उसके चेहरे पर आँसू नहीं थे, बस एक अजीब-सी खाली शांति थी। वह मुड़ी, गेट के पास जाकर खड़ी हो गई।

नंदिनी ने पहली बार बिना अनुमति माँगे फैसला लिया।

“हम जा रहे हैं।”

पीछे संगीत फिर बजने लगा। किसी ने रोका नहीं। कार में रिया खिड़की के बाहर देखती रही।

नंदिनी ने कहा, “मुझे माफ कर दो।”

रिया ने बहुत देर बाद उत्तर दिया, “अब मैं कोशिश नहीं करूँगी, मम्मा।”

समीर ने स्टीयरिंग कसकर पकड़ लिया। “अब तुम्हें करनी भी नहीं पड़ेगी।”

नंदिनी को लगा बात वहीं खत्म हो जाएगी, पर उसी रात उसे अपनी नानी की वसीयत की पुरानी फाइल याद आई। वह पुश्तैनी घर, जहाँ आज रिया का अपमान हुआ था, पूरी तरह उसके माता-पिता का नहीं था। उसमें नंदिनी का भी हिस्सा था।

और अगले सोमवार उसने एक वकील को फोन किया।

PART 2

जब शारदा देवी को कानूनी नोटिस मिला कि नंदिनी अपना हिस्सा बेचना चाहती है, तो घर में पहली बार वही चीखें गूँजीं, जिन्हें सालों तक रिया के गले में दबाया गया था।

कविता ने फोन पर चिल्लाकर कहा, “एक केक के लिए माँ-बाप को सड़क पर ला दोगी?”

नंदिनी ने शांत स्वर में कहा, “केक सिर्फ निशान था। जख्म 18 साल पुराने हैं।”

शाम को शारदा देवी और हरिशंकर प्रसाद रिया के कोचिंग सेंटर के बाहर पहुँच गए। उन्होंने उससे कहा, “अगर तुम सच में हमें प्यार करती हो तो अपनी माँ को रोक लो। परिवार में गद्दार लोग अंत में अकेले रह जाते हैं।”

रिया घर आई तो उसका चेहरा सफेद था, पर आवाज साफ थी। “मैंने उनसे कहा, मैं उनके फैसलों की जिम्मेदार नहीं हूँ।”

नंदिनी ने बेटी को बाँहों में भर लिया।

लेकिन असली वार 7 दिन बाद हुआ।

दिल्ली कॉलेज से पत्र आया। रिया की छात्रवृत्ति और छात्रावास प्रवेश पर अस्थायी रोक लगा दी गई थी, क्योंकि किसी अनाम शिकायत में उसके पारिवारिक और आर्थिक दस्तावेजों पर सवाल उठाए गए थे।

नंदिनी ने पत्र पढ़ा और बिना कुछ कहे घर से निकल गई।

जब वह ननिहाल पहुँची, उसने फोन की रिकॉर्डिंग चालू कर दी।

“आपने मेरी बेटी की शिकायत की?”

शारदा देवी ने ठंडी आँखों से कहा, “तुमने घर पर हाथ डाला, हमने भविष्य पर। उसे अपनी औकात समझनी चाहिए।”

नंदिनी ने फोन ऊपर उठाया।

शारदा देवी का चेहरा पहली बार डर से पीला पड़ गया।

PART 3

उस रात नंदिनी ने खाना नहीं बनाया। घर की मेज पर दिल्ली कॉलेज का पत्र रखा था और उसके पास फोन, जिसमें शारदा देवी की आवाज बंद कैद थी। समीर चुप बैठा था। रिया अपनी उँगलियों को बार-बार मोड़ रही थी, जैसे खुद को याद दिला रही हो कि वह टूट नहीं सकती।

“यह सब परिवार वाले समूह में भेजना होगा,” नंदिनी ने कहा।

समीर ने उसकी तरफ देखा। “सोच लो। इसके बाद वापसी नहीं होगी।”

रिया ने पहली बार सिर उठाया। “वापसी कहाँ थी, पापा? हम तो कभी वहाँ पहुँचे ही नहीं।”

नंदिनी ने पहले केक की तस्वीर भेजी। वही गुलाबी क्रीम, वही सुनहरे अक्षर, वही “इकलौती नातिन”। फिर कॉलेज का पत्र। फिर रिकॉर्डिंग।

कुछ ही मिनटों में पूरे परिवार के फोन काँपने लगे।

शारदा देवी की आवाज सबने सुनी।

“उसे अपनी औकात समझनी चाहिए।”

फिर लंबी चुप्पी।

वह चुप्पी अलग थी। पहले हमेशा नंदिनी और रिया पर गिरती थी। इस बार वह उन लोगों पर गिरी, जिन्होंने आँगन में सब देखा था और फिर भी मिठाई खाते रहे थे।

सबसे पहले मामा जगदीश का संदेश आया।

“मैं दावत में था। मैंने केक देखा था। रिया को जाते देखा था। हमें उसी दिन बोलना चाहिए था। हम सब दोषी हैं।”

फिर मौसी उषा ने लिखा, “बच्ची की छात्रवृत्ति रुकवाने की कोशिश घिनौनी है। यह परिवार की इज्जत नहीं, पाप है।”

कविता ने लंबा संदेश भेजा, जिसमें उसने नंदिनी पर घर तोड़ने, माँ को बदनाम करने और अवनि को दुख देने का आरोप लगाया। पर इस बार किसी ने उसकी बात नहीं पकड़ी। पहली बार उसकी आवाज अकेली पड़ गई।

शारदा देवी समूह छोड़कर चली गईं। हरिशंकर प्रसाद ने भी वही किया।

रिया ने फोन दूर रख दिया। “क्या इससे सब ठीक हो जाएगा?”

नंदिनी उसके पास बैठ गई। “नहीं। लेकिन अब झूठ अकेला नहीं रहेगा।”

अगले ही दिन नंदिनी और समीर ने सारे दस्तावेज जुटाए। रिया की अंकतालिकाएँ, स्कूल की प्रशंसा-पत्र, छात्रवृत्ति की सूचना, बैंक दस्तावेज, शिकायत के बाद आया कॉलेज का पत्र और वह रिकॉर्डिंग। समीर के एक पुराने सहकर्मी की पत्नी वकील थी। उसने मामला ध्यान से सुना।

“शिकायत कमजोर है,” उसने कहा, “लेकिन नुकसान करने के लिए काफी थी। हमें साबित करना होगा कि यह पारिवारिक बदले की कार्रवाई है।”

रिया ने धीमी आवाज में कहा, “रिकॉर्डिंग इस्तेमाल कर लीजिए।”

नंदिनी को लगा जैसे किसी ने उसकी बेटी से फिर कुछ छीन लिया हो। एक 18 साल की लड़की, जिसे किताबें, नए शहर और सपने सँभालने थे, वह अब अपने ही नाना-नानी के खिलाफ सबूत देने की अनुमति दे रही थी।

वकील ने कॉलेज प्रशासन को विस्तृत जवाब भेजा। स्कूल की प्रधानाचार्या ने भी लिखा कि रिया का रिकॉर्ड उत्कृष्ट था और उसके दस्तावेज सत्यापित थे। एक अध्यापिका ने अलग से पत्र भेजा, जिसमें लिखा था कि रिया ने कठिन पारिवारिक परिस्थितियों के बावजूद असाधारण प्रदर्शन किया।

इसी बीच नंदिनी के बड़े भाई अभय का फोन आया। वह जयपुर में रहता था और वर्षों से माता-पिता से दूरी बनाए हुए था।

“मैंने रिकॉर्डिंग सुनी,” उसने कहा।

नंदिनी चुप रही।

“मैं भी अपना हिस्सा बेचूँगा।”

“भैया…” नंदिनी की आवाज काँप गई।

“चुप रहने की कीमत बहुत दे चुका हूँ। माँ ने तुम्हारे साथ जो किया, वही अब रिया के साथ किया। बस फर्क इतना है कि इस बार तुम खड़ी हो गई।”

नंदिनी की आँखों से आँसू बह निकले। “मुझे लगता था किसी ने देखा ही नहीं।”

अभय ने भारी स्वर में कहा, “मैंने देखा था। बस हिम्मत नहीं की।”

उन शब्दों ने नंदिनी के भीतर वर्षों से बंद एक दरवाजा खोल दिया। उसे याद आया कैसे बचपन में कविता की हर गलती बचपन कहलाती थी और नंदिनी की हर जरूरत बोझ। कैसे शारदा देवी मेहमानों के सामने कविता को “घर की शोभा” कहतीं और नंदिनी को “काम की लड़की”। कैसे दादी ने जब नंदिनी के लिए किताबें खरीदी थीं तो शारदा देवी ने 3 दिन तक बात नहीं की थी।

अब समझ आया, यह पक्षपात अचानक पैदा नहीं हुआ था। यह पीढ़ियों से बहती हुई कोई कड़वी नदी थी।

जब शारदा देवी को पता चला कि अभय भी हिस्सा बेचेगा, वह बिना बताए नंदिनी के घर पहुँचीं। सफेद साड़ी, मोतियों की माला, माथे पर बड़ी बिंदी। चेहरा ऐसा जैसे न्याय माँगने आई हों।

“तूने मेरे बेटे को भी मेरे खिलाफ कर दिया,” उन्होंने दरवाजे पर कहा।

नंदिनी चौखट पर खड़ी रही। “मैंने किसी को मजबूर नहीं किया। सबने आपकी आवाज सुनी।”

“तू अपने बाप को मार डालेगी। उनका रक्तचाप बढ़ गया है।”

“उन्होंने भी मेरी बेटी को रोकने की कोशिश की।”

“हमने उसे पाला-पोसा है।”

नंदिनी के चेहरे पर दर्द भरी हँसी आई। “रिया को? आपने उसे कब पाला? त्योहारों पर उसका नाम तक भूल जाती थीं।”

शारदा देवी की आँखें सख्त हो गईं। “क्योंकि तूने हमेशा उसे हम पर थोपना चाहा। तू चाहती थी कि तेरी बेटी कविता की बेटी से आगे निकले। तू बचपन से जलनखोर है।”

नंदिनी ने पहली बार अपनी माँ की आँखों में सीधा देखा। “नहीं माँ। मैं सिर्फ चाहती थी कि मेरी बेटी को उसके हिस्से की जगह मिले।”

“तेरी नानी ने तुझे बिगाड़ा था। वही घर का हिस्सा देकर गई और आज तू उसी के नाम पर हमें बेघर करेगी।”

दादी का नाम आते ही नंदिनी के भीतर कुछ काँपा। वही दादी थीं, जिन्होंने उसे पहली किताब दी थी। वही कहती थीं, “बेटी, जिसे घर में कम जगह मिले, उसे दुनिया में ज्यादा जगह बनानी पड़ती है।”

शारदा देवी शायद उसी प्यार से जलती रहीं।

“दादी मुझे देखती थीं,” नंदिनी ने कहा।

“और मैं तेरी माँ हूँ,” शारदा देवी ने गरजकर कहा।

यह वाक्य पहले नंदिनी को झुका देता था। वह चुप हो जाती, पानी लाती, माफी माँगती, अपने ही दर्द को गलत मानती।

पर इस बार उसने कहा, “और मैं रिया की माँ हूँ।”

शारदा देवी पीछे हट गईं, जैसे यह वाक्य थप्पड़ हो।

“तू पछताएगी।”

“हो सकता है। पर अपनी बेटी को बचाने का पछतावा नहीं होगा।”

नंदिनी ने दरवाजा बंद कर दिया।

3 सप्ताह बाद दिल्ली कॉलेज का अंतिम पत्र आया। रिया का प्रवेश बहाल कर दिया गया था। छात्रवृत्ति सुरक्षित थी। छात्रावास भी मिल गया था। शिकायत में दिए गए आरोप असत्य और अप्रमाणित पाए गए थे।

रिया ने पत्र पढ़ा। एक बार। फिर दूसरी बार। फिर अचानक वह रसोई की दीवार से टिककर नीचे बैठ गई और फूट-फूटकर रो पड़ी।

वह केक के सामने नहीं रोई थी। नाना-नानी की धमकी पर नहीं रोई थी। छात्रवृत्ति रुकने की खबर पर भी नहीं रोई थी।

वह तब रोई जब उसे समझ आया कि उसका भविष्य बच गया है।

नंदिनी उसके साथ फर्श पर बैठ गई। समीर भी पास आ गया। तीनों ठंडी टाइलों पर एक-दूसरे से लिपटे रहे, जैसे किसी जलते हुए घर से बाहर निकले लोग पहली बार साँस ले रहे हों।

पुश्तैनी घर की बिक्री आसान नहीं थी। हरिशंकर प्रसाद हर कागज में देरी करते। शारदा देवी कहतीं कि उन्हें शर्तें समझ नहीं आ रहीं। कविता रोती, गिड़गिड़ाती, फिर धमकाती। वह बार-बार कहती, “अवनि बच्ची है, उसके बारे में सोचो।”

नंदिनी ने एक बार जवाब दिया, “मैं अपनी बच्ची के बारे में सोच रही हूँ। तुम्हें भी यही करना चाहिए था।”

अंततः कागजों पर हस्ताक्षर का दिन आया। वकील के दफ्तर में चार लोग बैठे थे, पर हवा में 40 साल की खामोशी थी। हरिशंकर प्रसाद ने कलम ऐसे पकड़ी जैसे उनसे जायदाद नहीं, सम्मान छीना जा रहा हो। शारदा देवी ने नंदिनी की तरफ देखा तक नहीं। अभय ने कागजों पर हस्ताक्षर किए और बाहर निकलते हुए नंदिनी के कंधे पर हाथ रखा।

“रिया से कहना, मुझे उस पर गर्व है।”

नंदिनी ने कहा, “यह बात उसे खुद कहना।”

उस रात अभय का संदेश आया। रिया ने पढ़ा, बहुत देर तक स्क्रीन देखती रही, फिर हल्का-सा मुस्कुराई। शायद यह देर से आया हुआ रिश्ता था, पर फिर भी रिश्ता था।

नंदिनी ने अपने हिस्से के पैसों से रिया की फीस भरी, छात्रावास का खर्च जमा किया, किताबें खरीदीं, एक अच्छा लैपटॉप लिया और उसके नाम एक छोटा-सा खाता खुलवाया। रकम बहुत बड़ी नहीं थी, पर इतनी थी कि रिया अपने सपनों की शुरुआत उन लोगों की दया पर निर्भर होकर न करे, जिन्होंने उसे अपमान में धकेला था।

अगस्त के अंत में वे रिया को दिल्ली छोड़ने गए। पुरानी दिल्ली की भीड़, मेट्रो की आवाज, हॉस्टल के बाहर खड़े ऑटो, हाथ में फाइलें लिए लड़कियाँ, और नए जीवन की घबराहट हवा में तैर रही थी। रिया ने हल्का पीला कुर्ता पहना था। कंधे पर भारी बैग था और हाथ में तुलसी का छोटा पौधा।

“कमरे में थोड़ा घर जैसा लगेगा,” उसने कहा।

नंदिनी ने मुस्कुराने की कोशिश की, मगर आँखें भर आईं।

रिया ने उसे कसकर गले लगाया। “मम्मा, मैं ठीक रहूँगी।”

“मुझे पता है।”

“नहीं, आपको डर है कि मैं अकेली पड़ जाऊँगी।”

नंदिनी हँसी और रोई साथ-साथ। “थोड़ा।”

रिया ने उसके आँसू पोंछे। “मैं भीड़ भरे परिवार में अकेली रही हूँ। यहाँ कम से कम मुझे पता होगा कि अकेलापन क्यों है।”

यह वाक्य नंदिनी के दिल में बहुत देर तक जलता रहा।

महीने बीतते गए। रिया ने मेहनत की। कई बार डर गई। कभी परीक्षा खराब हुई तो रात में रोते हुए फोन किया। कभी किसी अमीर सहपाठी की सहजता देखकर खुद को छोटा महसूस किया। पर वह रुकी नहीं। उसने 2 अच्छी सहेलियाँ बनाईं, पुस्तकालय में अपनी पसंद की मेज खोज ली, और धीरे-धीरे वह जानने लगी कि सम्मान माँगा नहीं जाता, जहाँ न मिले वहाँ से उठ जाना पड़ता है।

एक सर्द शाम उसने वीडियो पर नंदिनी से कहा, “एक दुख की बात कहूँ?”

“हाँ बेटा।”

“कभी-कभी नाना-नानी होने की कल्पना याद आती है। वे लोग नहीं। बस कल्पना। कोई रविवार को फोन करे, पूछे खाना खाया या नहीं, परीक्षा कैसी रही, बिना यह जताए कि मेरा होना बोझ है।”

नंदिनी के पास शब्द नहीं थे।

“तू इसके लायक थी,” उसने आखिर कहा।

रिया ने सिर हिलाया। “हाँ। शायद इसी बात का दुख है।”

उसके बाद एक लंबी चुप्पी रही, जिसमें वह सब था जिसे कोई फैसला पूरी तरह ठीक नहीं कर सकता।

करीब 1 साल बाद नंदिनी को अवनि का संदेश मिला।

“मौसी, उस दिन के लिए माफ कीजिए। मुझे सच में नहीं पता था कि आप लोग समझ रहे थे कि दावत रिया दीदी के लिए है। केक देखकर मुझे भी अजीब लगा था, लेकिन मैंने कुछ नहीं कहा। मुझे अफसोस है। उम्मीद है रिया दीदी अच्छी होंगी।”

नंदिनी ने संदेश कई बार पढ़ा। अवनि दोषी नहीं थी। उसे भी अपनी माँ और नानी ने एक ट्रॉफी की तरह सजाकर रखा था।

नंदिनी ने उत्तर दिया, “धन्यवाद अवनि। रिया ठीक है। अपना ध्यान रखना।”

उसने और कुछ नहीं लिखा। कुछ जख्म बच्चों तक नहीं पहुँचाए जाने चाहिए।

बाद में पता चला, शारदा देवी और हरिशंकर प्रसाद ने शहर से दूर छोटा-सा मकान खरीद लिया। रिश्तेदारों के समारोहों में उनका आना कम हो गया। कविता ने महीनों तक उनका बचाव किया, फिर एक दिन उसे पता चला कि अनाम शिकायत सचमुच हरिशंकर प्रसाद ने अपने एक पुराने परिचित से लिखवाई थी।

“हमने जो सही लगा, किया,” उन्होंने कहा था।

यही वाक्य अंत था।

नंदिनी ने उनसे मिलने की कोशिश नहीं की।

कभी-कभी रिश्तेदार कहते, “जो हुआ, बहुत दुखद था।”

नंदिनी अब चुप रहती।

हाँ, दुखद था।

दुखद था कि 18 साल की लड़की को एक केक के सामने समझना पड़ा कि किसी परिवार से नाम काटना कभी-कभी गुलाबी क्रीम और सुनहरे अक्षरों से भी किया जाता है।

दुखद था कि एक माँ को यह समझने में इतने साल लगे कि जो चुप्पी उससे माँगी गई थी, वह शांति नहीं, आज्ञाकारिता थी।

दुखद था कि एक पुश्तैनी घर बिक गया क्योंकि उसमें रहने वाले लोग प्यार और चोट पहुँचाने के अधिकार में फर्क भूल गए थे।

लेकिन वह सिर्फ दुखद नहीं था।

वह न्याय था।

नंदिनी ने घर बदले की आग में नहीं बेचा। उसने वह आखिरी झूठ बेचा, जो उसे खून के रिश्ते के नाम पर बाँधे हुए था। उसने वह छोटी-सी जगह बेची, जहाँ बैठकर पहले वह खुद गायब होना सीखती रही थी और जहाँ उसकी बेटी को भी गायब होना सिखाया जा रहा था।

उस केक पर लिखा था कि अवनि उनकी इकलौती नातिन है।

वह झूठ था।

पर उसी दिन नंदिनी ने एक सच्चाई पहचान ली।

रिया उसकी इकलौती बेटी थी।

और उस पल के बाद उसने अपने माता-पिता से जगह माँगना बंद कर दिया।

उसने बस यह तय कर लिया कि उसकी बेटी फिर कभी ऐसी मेज के सामने खड़ी नहीं होगी, जहाँ उसकी पीड़ा को सजावट बनाकर परोसा गया हो।

Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.