
भाग 2
प्रकाश मामा ने धीरे-धीरे बोलना शुरू किया। उन्होंने कहा कि वह मुझसे अपनी बेटी की तरह प्यार करते हैं। उन्होंने कहा कि मेरे खिलाफ खड़े होना उन्हें तकलीफ़ देता है। उन्होंने कहा कि उनके पास कोई और विकल्प नहीं था क्योंकि “सच्चाई खून के रिश्ते से बड़ी होती है।” मैं वहीं बैठी एक ऐसे आदमी को हाथ जोड़कर मुझे बेचते हुए सुन रही थी।
उनके वकील ने पूछा:
—क्या प्रतिवादी ने कभी आपको बताया था कि उसने यह संपत्ति खरीदने के लिए परिवार के पैसे इस्तेमाल किए थे?
प्रकाश मामा ने अपनी नज़रें झुका लीं।
—हाँ।
मेरी माँ ने अपने दुपट्टे के पल्लू से अपना चेहरा ढक लिया। मेरे पिता ने अपनी आँखें बंद कर लीं, मानो स्वयं भगवान अदालत में आ गए हों। रोहन ने मेरी ओर देखा और मुस्कुरा दिया।
उनके वकील ने आगे पूछा:
—उसने आपको यह कब बताया था?
—गृह प्रवेश वाले दिन। मेहमानों के जाने के बाद। वह रसोई में थी। उसने कहा, “मामा, किसी को मत बताइए, लेकिन मैंने वह पैसा इस्तेमाल कर लिया जो पापा ने रोहन के लिए अलग रख छोड़ा था।”
वे शब्द पत्थरों की तरह आकर गिरे। एक पल के लिए तो मुझे भी लगा कि कोई झूठ इतना सहज कैसे लग सकता है। मीरा ने कोई आपत्ति नहीं जताई। उसने बीच में नहीं टोका। उसने बस नीली स्याही से कुछ लिख लिया।
उनके वकील का आत्मविश्वास बढ़ गया।
—क्या वह खुद को दोषी महसूस कर रही थी?
—बहुत ज़्यादा।
—क्या उसने आपसे यह बात किसी को न बताने के लिए कहा था?
—हाँ। उसने कहा था कि अगर उसके माता-पिता को पता चल गया तो उनका दिल टूट जाएगा।
मेरी उँगलियाँ मेरी हथेली में धँस गईं। मेरा मन हुआ कि खड़ी होकर चिल्लाऊँ कि वह झूठ बोल रहा है। लेकिन मेज़ के नीचे मीरा का पैर हल्के से मेरे पैर से एक बार छुआ। रुको। इसलिए मैं रुकी रही।
जब उनके वकील की बात खत्म हुई, तो वह इतने गर्व से भर गया था मानो खुद को माला पहनाने वाला हो। जज ने मीरा की ओर देखा।
—जिरह?
मीरा धीरे-धीरे खड़ी हुई।
—जी, माननीय न्यायालय।
वह केवल एक फाइल लेकर गवाह के कटघरे तक गई। सिर्फ़ एक।
—श्री प्रकाश, क्या आप मेरी मुवक्किल के गृह प्रवेश में शामिल हुए थे?
—हाँ।
—आप कितने बजे पहुँचे थे?
—लगभग सुबह दस बजे।
—और मेहमानों के जाने के बाद तक रुके थे?
—हाँ।
—कितने बजे तक?
वह झिझका।
—शायद साढ़े छह बजे।
मीरा ने उसकी ओर देखा।
—क्या आपको पूरा विश्वास है?
—हाँ।
—उसके बाद आपने मेरी मुवक्किल से रसोई में अकेले बात की थी?
—हाँ।
—वहाँ और कोई मौजूद नहीं था?
—नहीं।
मीरा ने सिर हिलाया। फिर उसने फाइल खोली।
—श्री प्रकाश, क्या मैसूरु में आपकी एक मिठाई की दुकान है?
वह पलकें झपकाने लगा।
—हाँ।
—क्या गृह प्रवेश वाले उसी दिन आपकी दुकान पर अग्नि सुरक्षा निरीक्षण हुआ था?
उसके चेहरे का रंग थोड़ा बदल गया।
—छोटा-सा निरीक्षण था।
—छोटा नहीं। गैस रिसाव की शिकायत के बाद आपातकालीन निरीक्षण।
उनके वकील खड़े हो गए।
—माननीय न्यायालय, इसका क्या संबंध है?
मीरा उनकी ओर मुड़ी।
—यह सीधे तौर पर इस बात से जुड़ा है कि यह गवाह उस समय वास्तव में वहाँ मौजूद था या नहीं, जैसा यह दावा कर रहा है।
जज ने अनुमति दे दी। मीरा ने एक मुद्रित दस्तावेज़ निकाला।
—क्या उसी दिन शाम 5:55 बजे मैसूरु सिटी कॉरपोरेशन कार्यालय के निरीक्षण रजिस्टर पर यह आपके हस्ताक्षर हैं?
प्रकाश मामा ने घूँट भरा।
—शायद मेरे मैनेजर ने हस्ताक्षर किए होंगे।
—कृपया ध्यान से देखिए। यह आपका आधार से जुड़ा डिजिटल सत्यापन है। आपका फ़ोन नंबर भी इसके साथ दर्ज है।
पूरी अदालत में सन्नाटा छा गया। मीरा ने आगे कहा:
—शाम के ट्रैफिक में मैसूरु से बेंगलुरु आने में कम से कम तीन घंटे लगते हैं। तो अगर आप शाम 5:55 बजे निरीक्षण कार्यालय में थे, तो शाम 6:30 बजे बेंगलुरु में मेरी मुवक्किल की रसोई में उससे अकेले कैसे बात कर रहे थे?
मेरी माँ रोना बंद कर चुकी थीं। पापा की प्रार्थना की माला वहीं थम गई। रोहन की मुस्कान गायब हो गई। प्रकाश मामा का मुँह खुला रह गया, लेकिन कोई आवाज़ नहीं निकली।
मीरा एक कदम और आगे बढ़ी।
—मैं आपकी मदद करती हूँ। आप दोपहर 3 बजे के बाद वहाँ थे ही नहीं। अपनी दुकान में गैस रिसाव के कारण आप जल्दी निकल गए थे। सही है?
उन्होंने फुसफुसाकर कहा:
—हाँ।
—तो फिर वह निजी स्वीकारोक्ति कभी हुई ही नहीं।
उनके वकील ने फिर आपत्ति जताई, लेकिन अब उसकी आवाज़ में पहले जैसी ताकत नहीं थी। मीरा ने एक और पन्ना पलटा।
—एक और सवाल। क्या आपने इस हलफ़नामे पर हस्ताक्षर करने से तीन दिन पहले श्री सुरेश कुलकर्णी से पंद्रह लाख रुपये प्राप्त किए थे?
प्रकाश मामा ने मेरे पिता की ओर देखा। बस वह एक नज़र ही काफ़ी थी। मेरे पिता का चेहरा राख जैसा पड़ गया। मीरा ने अदालत के सामने बैंक लेन-देन का रिकॉर्ड रख दिया।
—माननीय न्यायालय, बचाव पक्ष निवेदन करता है कि इस गवाही को प्रथम दृष्टया झूठा माना जाए और अदालत गवाह के साथ की गई छेड़छाड़ का संज्ञान ले।
जज ने प्रकाश मामा की ओर देखा।
—सवाल का जवाब दीजिए।
वह टूट गया।
—वह झूठ बोलने के लिए नहीं था। वह एक उधार था।
मीरा की आवाज़ शांत रही।
—एक ऐसा उधार, जो आधी रात को ट्रांसफ़र हुआ, वादी के वकील द्वारा आपका हलफ़नामा तैयार किए जाने के दो दिन बाद, और जिसकी टिप्पणी में “Rohan support” लिखा था?
रोहन अचानक खड़ा हो गया।
—यह सब हेरफेर है!
जज ने तेज़ आवाज़ में कहा:
—बैठ जाइए।
रोहन बैठ गया। अपनी पूरी ज़िंदगी में पहली बार मैंने किसी और को उसे बैठने का आदेश देते देखा था। मेरी आँखों में लगभग आँसू आ गए। लेकिन मीरा अभी खत्म नहीं हुई थी। उसने जज की ओर देखा।
—माननीय न्यायालय, बचाव पक्ष के पास एक और दस्तावेज़ है। यह बताता है कि वादी इस घर को हासिल करने के लिए इतने बेताब क्यों हैं।
उसने एक दूसरा सीलबंद लिफाफा खोला। मेरे पिता आगे की ओर झुक गए। मेरी माँ फुसफुसाईं:
—सुरेश…
मीरा उनकी ओर मुड़ी।
—क्या मैं इसे अभी अदालत में प्रस्तुत करूँ, या आपके मुवक्किल अपना दावा वापस लेना चाहेंगे?
उनके वकील उलझन में पड़ गए। पापा अपनी कुर्सी से आधे खड़े हो गए।
—वह दस्तावेज़ परिवार का निजी मामला है।
मीरा मुस्कुराई।
—जब वही धोखाधड़ी का उद्देश्य बन जाए, तब वह निजी मामला नहीं रह जाता।
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