
PART 1
ठंडी बारिश में भीगती हुई 62 साल की सावित्री मेहरा अपने बेटे को 63 करोड़ रुपये की विरासत की खबर देने दौड़ी थी, और सिर्फ 20 मिनट बाद वही माँ लखनऊ के एक निजी अस्पताल के फर्श पर सिर से बहते खून के साथ पड़ी थी, जबकि उसका बेटा फोन पर झुंझलाकर कह रहा था, “मेरे पास इन नाटकों के लिए समय नहीं है।”
नर्स ने जब सावित्री को इमरजेंसी के बाहर आधी बेहोश हालत में देखा, तो पहले उसे लगा कोई बुजुर्ग औरत फिसल गई होगी। उसकी साड़ी बारिश से चिपकी हुई थी, बालों में खून जम रहा था, और हाथ में टूटा हुआ मोबाइल अब भी काँप रहा था। स्क्रीन पर एक नाम चमक रहा था—आरव।
3 घंटे पहले सावित्री हजरतगंज के एक बड़े वकील के दफ्तर में बैठी थी। सामने बैठे एडवोकेट नरेश कपूर ने सफेद फाइल उसकी ओर बढ़ाई और धीमे स्वर में कहा, “सावित्री जी, आपकी बड़ी बहन कमला देवी ने अपनी पूरी संपत्ति आपके नाम कर दी है।”
सावित्री की सूखी आँखें फैल गईं।
“पूरी?”
“63 करोड़ रुपये। गोमती नगर का बंगला, मुंबई के 2 फ्लैट, जयपुर की जमीन, कुछ निवेश और नकद राशि। सब कानूनी रूप से आपके नाम है।”
सावित्री ने काँपते हाथ होंठों पर रख लिए। वह पैसों के लिए नहीं रोई। वह इसलिए रोई क्योंकि उसे लगा अब वह अपने बेटे आरव को बचा सकेगी। आरव कई महीनों से कारोबार में घाटे, निवेशकों के दबाव और बैंक के नोटिस की बातें करता था। वह महँगी गाड़ी चलाता, ऊँचे लोगों के बीच उठता-बैठता और हर बार माँ को समझाता कि वह पुराने ज़माने की औरत है, उसे “आज की दुनिया” समझ नहीं आती।
फिर भी सावित्री उसे प्यार करती थी। उसी अंधे, अटूट प्यार से, जिसमें माँ अपने बच्चे की गलती को उसके माफी माँगने से पहले ही माफ कर देती है।
पति की मौत के बाद पिछले 2 साल से वह आरव और उसकी पत्नी निशा के साथ रह रही थी। दुनिया से कहा जाता था कि बेटा माँ को अकेला नहीं छोड़ना चाहता। सच यह था कि सावित्री की पेंशन से घर का किराया वसूला जाता, उसकी बचत से राशन मँगाया जाता, और उसकी पुरानी आदतों पर हँसा जाता। निशा उसे मेहमानों के सामने “हमारी पुरानी अलमारी” कहकर मुस्कुराती, जैसे सावित्री कोई इंसान नहीं, घर का बोझ हो।
उस दिन वकील के दफ्तर से निकलते हुए सावित्री ने फाइल सीने से ऐसे लगा ली जैसे कोई बच्चा हो। बाहर बारिश तेज थी। वह ऑटो ले सकती थी, फोन कर सकती थी, इंतज़ार कर सकती थी। पर उसके मन में सिर्फ एक तस्वीर थी—आरव सब सुनकर पछताएगा, माँ को गले लगाएगा, और समझेगा कि जिसे वह बोझ समझता था, वही उसकी आखिरी उम्मीद है।
जब वह आरव के फ्लैट पहुँची, दरवाजा उसने ही खोला। नीले सूट में, महँगी घड़ी पहने, वह किसी पार्टी के लिए तैयार था। पीछे निशा आईने के सामने हीरे की बालियाँ पहन रही थी।
“माँ? आप इस हालत में?”
“आरव, बहुत बड़ी बात है। बस 2 मिनट सुन ले बेटा।”
निशा ने आँखें घुमा दीं। “हमें निकलना है। फिर से रोना शुरू?”
सावित्री अंदर आ गई। घर में महँगे इत्र, मोमबत्तियों और छुपे हुए तिरस्कार की गंध थी।
“कमला दीदी ने मेरे नाम कुछ छोड़ा है,” सावित्री बोली।
आरव ने घड़ी देखी। “अभी नहीं माँ। हमें महत्वपूर्ण लोगों से मिलना है।”
“यह उससे भी महत्वपूर्ण है। बहुत पैसा है बेटा।”
आधे पल के लिए आरव का चेहरा बदल गया। उसकी आँखों में चिंता नहीं, भूख चमकी। तभी उसका फोन बजा। उसने कॉल उठाया और मुड़कर कहा, “हाँ, हम पहुँच रहे हैं। माँ बस यूँ ही आ गई हैं।”
सावित्री ने उसका हाथ पकड़ लिया। “मेरी बात सुन ले।”
आरव ने झटके से हाथ छुड़ाया। “छोड़िए मुझे!”
झटका इतना तेज था कि सावित्री पीछे लड़खड़ा गई। उसका पैर मुड़े हुए कालीन में अटका। वह संभलने से पहले काँच की मेज के कोने से टकराई। सिर में सफेद बिजली-सी फटी। खून उसके बालों में फैल गया।
निशा चीखी, पर डर से नहीं।
“आरव, कालीन खराब हो गया!”
सावित्री ने मुश्किल से कहा, “एम्बुलेंस बुला दे…”
आरव उसके ऊपर खड़ा रहा। उसका चेहरा सफेद था, लेकिन आँखों में गुस्सा ज्यादा था।
“आप हमेशा यही करती हैं। सब बिगाड़ देती हैं।”
“बेटा…”
“हमारे पास आपके नाटक के लिए समय नहीं है।”
वह चाबी उठाकर बाहर चला गया। निशा ने एक पल सावित्री को देखा, फिर अपना पर्स उठाया और उसके पीछे निकल गई।
दरवाजा बंद हुआ। सावित्री अकेली रह गई—खून, बारिश और सीने से चिपकी उस फाइल के साथ, जिसमें उसके बेटे की मुक्ति भी थी और उसकी सच्चाई भी।
PART 2
बिल्डिंग के चौकीदार रामप्रसाद ने दरवाजे के बाहर खून की पतली लकीर देखी तो घबरा गया। उसने घंटी बजाई, जवाब नहीं मिला, फिर मास्टर चाबी से दरवाजा खुलवाया। सावित्री फर्श पर पड़ी थी, आँखें आधी खुली, होंठ काँपते हुए।
अस्पताल में नर्स ने आरव को फोन किया।
“आपकी माँ को सिर में चोट आई है। खून बह रहा है। आपको तुरंत आना होगा।”
कुछ पल सन्नाटा रहा। सावित्री ने आँखें बंद कर लीं। उसे लगा अब बेटे की आवाज टूटेगी।
पर आरव बोला, “देखिए, मेरे पास उनके नाटकों के लिए समय नहीं है। वह ध्यान खींचने के लिए ऐसा करती हैं।”
नर्स सन्न रह गई। “सर, आपकी माँ के सिर से खून बह रहा है।”
“तो इलाज कीजिए। आपका काम है ना?”
फोन कट गया।
सावित्री ने आँसू नहीं बहाए। उस पल उसके भीतर कुछ मर गया, लेकिन वह उसका शरीर नहीं था। वह माँ के मन में 38 साल से बची वह जगह थी, जहाँ आरव अब भी छोटा बच्चा बना बैठा था।
सुबह जब सावित्री को होश आया, उसी समय आरव और निशा उसके कमरे की अलमारी उलट रहे थे। पुरानी साड़ियों, दवाइयों और पूजा की किताबों के बीच निशा को सफेद फाइल मिली।
उसने काँपती आवाज में कहा, “आरव…”
आरव ने कागज छीने। पढ़ते-पढ़ते उसकी आँखें चमक उठीं।
“63 करोड़,” वह फुसफुसाया।
निशा ने पूछा, “अगर वह मर गई तो?”
आरव ने धीमे से कहा, “मैं इकलौता बेटा हूँ।”
तभी पीछे से आवाज आई।
“और अगर उसने सब पहले ही सुरक्षित कर दिया हो तो?”
दरवाजे पर एडवोकेट नरेश कपूर खड़े थे।
PART 3
आरव के हाथ से फाइल लगभग छूट गई। निशा के चेहरे का रंग उड़ गया। दोनों ने ऐसे पीछे मुड़कर देखा जैसे किसी ने चोरी करते समय दीपक जला दिया हो।
“आप यहाँ कैसे?” आरव ने आवाज सँभालने की कोशिश की।
एडवोकेट कपूर अंदर आए। उनके साथ एक महिला पुलिस अधिकारी और अस्पताल की सामाजिक कार्यकर्ता थी। कपूर साहब ने कमरे की हालत देखी—खुले दराज, जमीन पर बिखरी सावित्री की साड़ियाँ, पलंग पर उलटे पड़े पुराने फोटो, और निशा के हाथ में वह छोटी कपड़े की थैली, जिसमें सावित्री अपने पति की अंगूठी रखती थी।
“मुझे आपकी माँ ने बुलाया है,” कपूर ने कहा। “और सच कहूँ तो आपकी मौसी कमला देवी ने पहले ही कहा था कि एक दिन मुझे ऐसी जगह पहुँचना पड़ सकता है।”
आरव हँस पड़ा, मगर उस हँसी में डर था। “मेरी माँ अस्पताल में है। वह क्या समझेंगी? उन्हें आराम चाहिए, वकील नहीं।”
महिला पुलिस अधिकारी ने शांत स्वर में कहा, “इसीलिए हम यहाँ हैं। घायल बुजुर्ग की निजी चीजों की तलाशी लेना आराम दिलाने का तरीका नहीं होता।”
निशा तुरंत रोने जैसा चेहरा बनाकर बोली, “हम तो बस उनके कपड़े लेने आए थे।”
कपूर साहब ने जमीन पर पड़ी निवेश फाइल उठाई। “कपड़े पढ़कर ले जाते हैं क्या, बहूजी?”
निशा चुप हो गई।
अस्पताल में सावित्री सफेद चादर पर लेटी थी। सिर पर 7 टाँके थे, आँखों के नीचे नीले घेरे, बाँह पर पुराने दबावों के निशान। डॉक्टर ने जब पूछा था, “क्या आप अपने बेटे के घर में सुरक्षित महसूस करती हैं?” तो सावित्री ने पहली बार किसी से सच कहा था।
“नहीं।”
वह एक शब्द कमरे की हवा नहीं, उसकी पूरी जिंदगी बदल गया।
सावित्री ने सामाजिक कार्यकर्ता को सब बताया—कैसे पेंशन लेते ही आरव कहता था घर का खर्च बढ़ गया है, कैसे निशा मेहमानों के सामने उसे चुप रहने का इशारा करती, कैसे उससे खाली कागजों पर हस्ताक्षर करवाने की कोशिश हुई, कैसे उसके पति की घड़ी बेच दी गई और कहा गया कि घर में कहीं खो गई होगी। हर बात कहते हुए सावित्री को लगता जैसे वह अपने ही बेटे को अदालत में खड़ा कर रही है। पर हर बात के साथ उसके भीतर वर्षों से जमा डर हल्का होता गया।
दोपहर तक एडवोकेट कपूर अस्पताल पहुँचे। उन्होंने सावित्री के बिस्तर के पास कुर्सी खींची और फाइल खोली।
“सावित्री जी, आपकी बहन कमला देवी ने आपको सिर्फ संपत्ति नहीं दी। उन्होंने आपकी रक्षा भी की।”
सावित्री ने थकी आँखों से देखा।
“कमला दीदी को क्या पता था?”
कपूर साहब का चेहरा नरम हो गया। “उन्हें इतना पता था कि पैसा रिश्तों का चेहरा साफ कर देता है। उन्होंने कहा था, ‘मेरी बहन का दिल बहुत बड़ा है, पर वही उसका सबसे कमजोर दरवाजा है।’ इसलिए 2 महीने पहले आपने जो दस्तावेज साइन किए थे, वे सिर्फ विरासत के नहीं थे। संपत्ति एक सुरक्षा न्यास में है। कोई भी पैसा, जमीन या निवेश आपके स्पष्ट, स्वतंत्र और चिकित्सकीय रूप से प्रमाणित निर्णय के बिना स्थानांतरित नहीं हो सकता। दूसरी स्वीकृति मेरे दफ्तर की होगी। परिवार के दबाव, धमकी या बीमारी की स्थिति में सब लेन-देन स्वतः रुक जाएगा।”
सावित्री ने धीमे से आँखें बंद कर लीं। कमला दीदी मरने के बाद भी उसके सिरहाने खड़ी थीं।
“और आरव?” उसने पूछा।
“आरव आपका बेटा है,” कपूर बोले, “पर इस संपत्ति का मालिक नहीं। जब तक आप चाहेंगी, उसे एक रुपया भी नहीं मिलेगा।”
शाम को आरव और निशा अस्पताल आए। आरव हाथ में फूलों का गुलदस्ता लिए था, जिस पर कीमत का टैग अब भी लटका था। निशा ने हल्की रेशमी साड़ी पहनी थी, चेहरे पर बनावटी दुख और आँखों में सावधानी।
“माँ,” आरव ने मीठी आवाज में कहा, “आपने तो हमें डरा ही दिया।”
सावित्री उसे देखती रही। सामने वही चेहरा था जिसके माथे पर उसने बचपन में तेल लगाया था, जिसे बुखार में रातभर सीने से लगाए रखा था, जिसके स्कूल की फीस भरने के लिए उसने अपने गहने गिरवी रखे थे। मगर अब उसी चेहरे पर ममता नहीं, हिसाब लिखा था।
“सच?” सावित्री ने पूछा।
आरव कुर्सी पर बैठ गया। “बिल्कुल। कल बहुत दबाव था। निवेशकों से मीटिंग थी। गलती हो गई। अब हम सब संभाल लेंगे।”
“सब?”
निशा आगे झुकी। “हाँ मम्मी जी। आपका इलाज, घर, कागज, वकील… आपको इन झंझटों में पड़ने की जरूरत नहीं।”
सावित्री ने शांत स्वर में पूछा, “कौन से कागज?”
आरव ने एक पल को निशा को देखा, फिर बोला, “कमला मौसी वाली संपत्ति के। आखिर परिवार में ही तो रहना है।”
सावित्री के सिर की चोट धड़कने लगी, लेकिन उसकी आवाज नहीं काँपी।
“कल मैं यही बताने आई थी।”
आरव ने जल्दी से कहा, “हाँ माँ, और मैं सुनना चाहता था। पर आप अचानक गिर पड़ीं।”
“मैं खुद नहीं गिरी थी, आरव। तुमने हाथ झटका था।”
आरव का चेहरा कस गया। “आप फिर वही शुरू कर रही हैं? डॉक्टर ने कहा है आपको भ्रम हो सकता है।”
निशा ने आह भरी। “मम्मी जी, परिवार की बात बाहर ले जाना ठीक नहीं। लोग क्या कहेंगे?”
सावित्री ने पहली बार हल्की मुस्कान की। “लोगों ने बहुत कहा। अब सच कहेगा।”
दरवाजा खुला। एडवोकेट कपूर अंदर आए। उनके पीछे वही महिला पुलिस अधिकारी, सामाजिक कार्यकर्ता और अस्पताल की वरिष्ठ नर्स थी।
आरव खड़ा हो गया। “यह सब क्या है?”
कपूर साहब ने शांत स्वर में कहा, “सुरक्षा।”
उन्होंने नर्स की ओर देखा। नर्स ने फोन कॉल का लिखित रिकॉर्ड मेज पर रखा। फिर अस्पताल की रिकॉर्डिंग से आरव की आवाज कमरे में गूँजी।
“मेरे पास उनके नाटकों के लिए समय नहीं है।”
कमरे में हवा जैसे जम गई।
सावित्री ने आँखें नहीं झुकाईं। आरव का चेहरा सफेद हो गया।
“यह गैरकानूनी है!” वह चिल्लाया।
महिला पुलिस अधिकारी बोली, “यह अस्पताल की आधिकारिक लाइन पर प्राप्त आपात कॉल का रिकॉर्ड है। साथ ही स्टाफ का बयान भी है।”
कपूर ने दूसरा कागज खोला। “और यह आपके घर से बरामद दस्तावेजों की सूची है। आपकी माँ के कमरे से ली गई निवेश फाइल, पुरानी पेंशन पासबुक, खाली हस्ताक्षर वाले 3 कागज, और वह आवेदन जिसमें आपकी माँ के खाते का संयुक्त संचालन आपके नाम करने की तैयारी थी।”
निशा ने तुरंत कहा, “वह तो सुविधा के लिए था।”
सावित्री ने उसकी तरफ देखा। “सुविधा किसकी, बहू?”
निशा चुप हो गई।
आरव अब अभिनय छोड़ चुका था। उसकी आँखों में वही भूख लौट आई थी, नंगी और कठोर।
“आपने हमसे 63 करोड़ छुपाए,” वह गुर्राया।
वाक्य कमरे में थप्पड़ की तरह गिरा। उसमें माँ की चोट नहीं थी, खून नहीं था, रात की बारिश नहीं थी। बस पैसा था।
सावित्री ने धीरे से कहा, “मैंने कुछ नहीं छुपाया। मैं बारिश में भीगकर तुझे बताने आई थी। तूने घड़ी देखी, मुझे फर्श पर छोड़ा और चला गया।”
“मैं आपका बेटा हूँ!”
“बेटा माँ को खून में छोड़कर पार्टी में नहीं जाता, आरव।”
आरव ने मुट्ठियाँ भींच लीं। “आप अकेली रह जाएँगी। याद रखिएगा, पैसा माँ नहीं कहता।”
सावित्री ने गहरी साँस ली। “और बेटा अगर माँ को सिर्फ एटीएम समझे, तो वह बेटा नहीं रहता।”
कपूर साहब ने आगे कहा, “सावित्री जी ने आपको आपात संपर्क से हटा दिया है। आपकी किसी भी वित्तीय पहुँच को रद्द कर दिया गया है। आपकी माँ की सुरक्षा के लिए आवेदन दायर हो चुका है। बुजुर्ग की उपेक्षा, मानसिक प्रताड़ना और आर्थिक शोषण के प्रयास पर शिकायत दर्ज होगी। आप दोनों को उनसे बिना अनुमति संपर्क करने की मनाही होगी।”
निशा सचमुच रो पड़ी, पर सावित्री को पता था वे आँसू उसके लिए नहीं थे। वे आँसू उन छुट्टियों के लिए थे जो अब नहीं होंगी, उन पार्टियों के लिए जो रुक जाएँगी, उन तस्वीरों के लिए जिनमें वह धनवान बहू बनकर चमकना चाहती थी।
“मम्मी जी,” निशा बोली, “हम परिवार हैं।”
सावित्री ने उसे लंबे समय तक देखा। फिर बोली, “नहीं। तुम लोग मेरे दिल में किराएदार थे। अब मैं मकान खाली करवा रही हूँ।”
महिला पुलिस अधिकारी ने आरव और निशा को बाहर जाने को कहा। आरव ने वकीलों की धमकी दी, बदनामी की बात की, माँ को कृतघ्न कहा। मगर सावित्री चुप रही। फर्क सिर्फ इतना था कि इस बार दरवाजा उनके पीछे बंद हुआ, और वह फर्श पर नहीं थी।
अगले कुछ हफ्ते सावित्री के लिए आसान नहीं थे। शरीर का घाव भर रहा था, मगर मन का घाव हर बयान के साथ फिर खुलता। पुलिस के सामने उसने बताया कि कैसे उसकी पेंशन से किराया लिया गया, कैसे आरव ने पिता की यादें बेचीं, कैसे निशा ने उसे रिश्तेदारों के सामने नौकरानी जैसा बर्ताव करवाया। हर सच बोलते हुए उसका गला सूख जाता। माँ होकर बेटे की शिकायत करना आसान नहीं होता। वह अपराधी को नहीं, अपने गर्भ की स्मृति को कटघरे में खड़ा करती थी।
आरव ने पहले माफी वाले संदेश भेजे।
“माँ, बात कर लो।”
फिर फूल भेजे।
“मैं तनाव में था।”
फिर धमकी दी।
“अपने बेटे को बर्बाद करोगी तो पछताओगी।”
फिर चुप हो गया, जब उसके बैंक खातों और कारोबार की जाँच शुरू हुई। जिन निवेशकों के लिए वह माँ को छोड़ गया था, वे एक-एक करके पीछे हट गए। कोई ऐसे आदमी से जुड़ना नहीं चाहता था, जिसका नाम घायल माँ को छोड़ने और उसकी संपत्ति पर नजर रखने की खबर से जुड़ गया हो। निशा ने अपने सोशल मीडिया से महँगी पार्टियों की तस्वीरें हटाईं। किराए का आलीशान फ्लैट बोझ बन गया। चमकदार दोस्त ऐसे गायब हुए जैसे दीपावली के बाद बुझी हुई झालरें।
सावित्री को अस्पताल से एक सुरक्षित अपार्टमेंट में रखा गया, जो कमला देवी की संपत्ति का हिस्सा था। पहली रात वह डर के कारण सो नहीं सकी। उसे बार-बार लगा कोई दरवाजा खटखटाएगा, कोई कहेगा कि वह झूठ बोल रही है, कोई फिर उसका हाथ पकड़कर कागज पर हस्ताक्षर करवाएगा। पर सुबह जब धूप खिड़की से भीतर आई, तो पहली बार किसी ने उसे नहीं टोका कि चाय में चीनी क्यों कम है, साड़ी इतनी पुरानी क्यों है, या दवा पर इतना खर्च क्यों किया।
1 महीने बाद कपूर साहब ने उसे एक लिफाफा दिया।
“यह आपकी बहन ने आपके लिए छोड़ा था। कहा था, जब आप सच देखने लगें, तभी दीजिएगा।”
सावित्री ने काँपते हाथों से लिफाफा खोला। भीतर कमला देवी की लिखावट थी।
“मेरी सावित्री, अगर तू यह पढ़ रही है तो जिंदगी ने तुझे वह दिखा दिया है जिससे तू आँखें फेरती रही। आरव को प्यार करना बंद मत करना, क्योंकि माँ का दिल आदेश से नहीं बदलता। लेकिन अपने प्यार को उसके पैरों के नीचे चटाई मत बना देना। बुरा दिल पैसे से ठीक नहीं होता, पैसा बस बता देता है कि वह तुझे कितने में बेचने को तैयार था। अब जीना शुरू कर। मेरे लिए नहीं, अपने बेटे के लिए नहीं, उस औरत के लिए जिसे तूने ‘माँ’ शब्द के नीचे दबा दिया।”
सावित्री पत्र से लिपटकर रोई। वह कमजोरी का रोना नहीं था। वह अंतिम संस्कार था—उस उम्मीद का, कि एक दिन आरव अचानक वही बच्चा बन जाएगा जो बुखार में उसका आँचल पकड़कर सोता था।
3 महीने बाद सावित्री जयपुर के बाहर कमला देवी के पुराने हवेली जैसे घर में रहने लगी। सफेद दीवारें, नीले दरवाजे, आँगन में तुलसी, और सुबह-सुबह चाय की भाप। उसने धीरे चलना सीखा, अपने लिए चूड़ियाँ खरीदीं, अपने लिए फूल चुने, और बिना डर के खाना खाया। कपूर साहब की मदद से उसने बुजुर्गों के लिए एक कानूनी सहायता केंद्र शुरू किया—“कमला गृह”।
वहाँ ऐसे लोग आने लगे जिनकी कहानियाँ उसकी कहानी से मिलती थीं। कोई बेटा माँ से जमीन लिखवाना चाहता था। कोई बहू बूढ़े ससुर की पेंशन लेती थी। कोई बेटी पिता की दवा रोककर बैंक पासबुक माँगती थी। सावित्री उन्हें सुनती, चाय देती और बस एक बात कहती।
“किसी से प्यार करना और उसे खुद को मिटाने देना, दोनों अलग बातें हैं।”
एक शाम बारिश फिर आई। जयपुर की मिट्टी से भीनी खुशबू उठी। सावित्री बरामदे में बैठी थी कि फोन काँपा। स्क्रीन पर आरव का संदेश था।
“माँ मुझे आपकी जरूरत है”
सावित्री ने संदेश 1 बार पढ़ा। फिर 2 बार। उसके भीतर कहीं पुरानी माँ करवट लेने लगी। उसे वह बच्चा याद आया जो स्कूल से लौटकर कहता था कि आज किसी ने उसका टिफिन छीन लिया। वह युवक याद आया जिसने पहली नौकरी पर उसका आशीर्वाद लिया था। फिर वही आदमी सामने आया जिसने उसे खून में छोड़ा था, जिसने कहा था कि उसके पास माँ के नाटकों के लिए समय नहीं है।
बारिश की बूंदें आँगन में गिर रही थीं। तुलसी के पत्ते काँप रहे थे। सावित्री ने लंबी साँस ली, संदेश मिटा दिया और फोन उल्टा रख दिया।
उसने आसमान की ओर देखा और कमला का नाम मन ही मन लिया।
उस रात सावित्री मेहरा को पहली बार लगा कि अकेलापन भी कभी-कभी आशीर्वाद होता है, जब वह अपमान से मुक्त हो। अब उसके पास किसी के नाटक के लिए समय नहीं था।
अब उसके पास अपनी शांति से मिलने का समय था।
Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.