
भाग 1
नंदिनी ने 3 दिन बाद जाना कि वह गर्भवती है, ठीक 3 दिन बाद जब अर्जुन मल्होत्रा उसे बिना पीछे देखे लंदन की उड़ान में छोड़ गया था।
मुंबई के अंधेरी वाले छोटे से किराए के फ्लैट के बाथरूम में वह ठंडी फर्श पर बैठी थी। हाथ में टेस्ट किट थी, आंखें सूखी थीं, पर गला ऐसा बंद था जैसे किसी ने भीतर से आवाज चुरा ली हो। उसी फ्लैट की दीवार पर अभी भी वह निशान था, जहां अर्जुन ने हंसते हुए कहा था, “लंदन से लौटकर इसे ठीक करवाऊंगा।”
वह लौटा ही नहीं।
नंदिनी ने उसे 2 बार कॉल किया। तीसरी बार फोन सीधा बंद मिला। उस रात उसने पहली बार समझा कि किसी के चले जाने की आवाज दरवाजा बंद होने से नहीं आती, वह अंदर बहुत देर तक टूटती रहती है।
5 साल बाद अर्जुन मुंबई लौटा, लेकिन नंदिनी के लिए नहीं। उसके पिता राजीव मल्होत्रा को रात में दिल का दौरा पड़ा था और उन्हें दक्षिण मुंबई के एक बड़े निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया था। अर्जुन अब लंदन की एक बड़ी वित्तीय कंपनी में ऊंचे पद पर था। महंगे सूट, शांत चेहरा, तेज फैसले और ऐसी जिंदगी जिसे देखकर लोग सफल कहते थे। बस उसे खुद कभी नींद पूरी नहीं आती थी।
अस्पताल पहुंचते ही उसने पिता को आईसीयू से बाहर आते देखा। मां सविता मल्होत्रा शांत दिखने की कोशिश कर रही थीं, पर उनकी उंगलियां बार-बार पल्लू मरोड़ रही थीं। पिता ने अर्जुन को देखते ही कहा, “तू थका हुआ लग रहा है।”
अर्जुन ने मुस्कुराकर कहा, “फ्लाइट लंबी थी, पापा।”
राजीव ने धीमे से कहा, “5 साल की दूरी भी लंबी होती है।”
उसके पास कोई जवाब नहीं था।
अगले दिन अस्पताल प्रशासन ने उसे नए बाल कैंसर विभाग का छोटा सा दौरा करवाने को कहा, क्योंकि मल्होत्रा परिवार उस अस्पताल को दान देने की बात कर रहा था। अर्जुन ने बस समय काटने के लिए हां कर दी।
पर बच्चों के वार्ड के रंगीन गलियारे में पहुंचते ही उसकी चाल रुक गई।
दूर एक महिला नीले रंग का डॉक्टर कोट पहने, एक छोटे बच्चे के सामने घुटनों के बल बैठी थी। बाल ढीले से बंधे थे, गले में स्टेथोस्कोप था, चेहरा थका हुआ लेकिन कोमल। वह बच्चा उसकी बात ऐसे सुन रहा था जैसे दुनिया में सबसे सुरक्षित जगह वही आवाज हो।
अर्जुन का सीना एकदम भारी हो गया।
वह नंदिनी थी।
नंदिनी राव। वही लड़की जिसे उसने यह कहकर छोड़ा था कि “अभी करियर ज्यादा जरूरी है।” वही लड़की जिसने कभी उसके लिए लोकल ट्रेन में धक्का खाते हुए भी हंसना नहीं छोड़ा था। अब वह डॉक्टर थी। मजबूत थी। और उसके पास बैठा बच्चा…
अर्जुन ने बच्चे को गौर से देखा। लगभग 4 या 5 साल का। घुंघराले काले बाल। पतला चेहरा। और आंखें।
वही धूसर-नीली आंखें।
अर्जुन की आंखें।
उसके साथ चल रहे प्रशासक ने पूछा, “सर, आप ठीक हैं?”
अर्जुन ने धीमे से पूछा, “वह डॉक्टर कौन हैं?”
“डॉ. नंदिनी राव। हमारे बाल कैंसर विभाग की सबसे अच्छी डॉक्टरों में से एक। बहुत समर्पित हैं।”
“और वह बच्चा?”
प्रशासक झिझका, “शायद किसी मरीज का भाई होगा।”
तभी नंदिनी ने मुड़कर देखा। अर्जुन और उसकी नजरें मिलीं। उसके चेहरे पर पहले हैरानी आई, फिर एक ऐसी सावधानी, जो सिर्फ उन लोगों के चेहरे पर आती है जिन्होंने बहुत कुछ अकेले सहा हो।
वह धीरे-धीरे उसके सामने आकर खड़ी हुई।
“अर्जुन,” उसने कहा।
“नंदिनी…”
“तुम यहां क्यों हो?”
“पापा… अस्पताल में हैं।”
“सुना था।”
अर्जुन ने बच्चे की तरफ देखा। “वह कौन है?”
नंदिनी का चेहरा कड़ा हो गया। “एक बच्चे को देखने आई थी।”
“उसकी आंखें मेरी जैसी हैं।”
नंदिनी ने कुछ नहीं कहा।
अर्जुन की आवाज टूट गई। “नंदिनी, वह कौन है?”
कुछ सेकंड तक गलियारे में बच्चों की हंसी, मशीनों की बीप और नर्सों के कदम चलते रहे। फिर नंदिनी ने पहली बार नजर झुका ली।
“उसका नाम ईशान है,” उसने कहा।
अर्जुन ने दीवार का सहारा लिया।
“कितने साल का है?”
नंदिनी ने गहरी सांस ली।
“मार्च में 5 का हो जाएगा।”
और उसी पल अर्जुन को समझ आ गया कि उसकी लंदन की उड़ान सिर्फ एक औरत को छोड़कर नहीं गई थी। वह अपने बेटे को भी छोड़ गया था।
भाग 2
अर्जुन ने धीमे से कहा, “तुम गर्भवती थीं?”
नंदिनी की आंखें लाल नहीं हुईं, आवाज भी ऊंची नहीं हुई। यही बात अर्जुन को और तोड़ गई।
“जब तुम गए, तब मुझे नहीं पता था। 3 दिन बाद पता चला। मैंने कॉल किया था। 2 बार। तीसरी बार तुम्हारा फोन बंद था।”
“मैंने देखा नहीं…”
“क्योंकि तुमने देखना बंद कर दिया था, अर्जुन।”
वह जवाब नहीं दे पाया।
ईशान दूर कुर्सी पर बैठा अस्पताल का पर्चा मोड़कर कोई अजीब सा जहाज बना रहा था। नंदिनी की नजर बार-बार उस पर जा रही थी। उस एक नजर में 5 साल की नींदहीन रातें थीं, बुखार में भीगी चादरें थीं, स्कूल की फीस थी, अकेले डॉक्टर ड्यूटी थी, और हर उस सवाल का बोझ था जिसमें बच्चे ने पूछा होगा, “मेरे पापा कहां हैं?”
अर्जुन ने कहा, “मैं उससे मिलना चाहता हूं।”
नंदिनी तुरंत बोली, “नहीं। अभी नहीं। वह तुम्हें नहीं जानता। तुम उसके लिए अचानक से पिता बनकर नहीं आ सकते।”
“मैं भागूंगा नहीं।”
“तुम पहले भी यही कह सकते थे।”
उस वाक्य ने अर्जुन को वहीं रोक दिया।
शाम को नंदिनी उससे अस्पताल के पास एक छोटी सी चाय की दुकान पर मिली। बाहर मुंबई की ट्रैफिक चीख रही थी, अंदर दोनों ऐसे बैठे थे जैसे 5 साल उनके बीच कुर्सी खींचकर बैठ गए हों।
नंदिनी ने कहा, “ईशान की जिंदगी स्थिर है। उसका स्कूल है, मेरी मां है, मेरी ड्यूटी है, उसकी कहानियां हैं, उसका पसंदीदा पीला कप है। तुम आओगे तो सब बदलेगा। और अगर फिर चले गए तो मैं उसे दोबारा टूटने नहीं दूंगी।”
अर्जुन ने पहली बार बिना बचाव के कहा, “मैंने तुम्हारे साथ गलत किया। पर अब उसके साथ वही गलती नहीं करूंगा।”
नंदिनी ने उसे देर तक देखा।
“शनिवार को वह नेहरू तारामंडल जाना चाहता है,” उसने कहा। “तुम आ सकते हो। मेरे पुराने दोस्त की तरह। बस इतना।”
शनिवार को ईशान ने अर्जुन को देखते ही पूछा, “आपको ग्रहों के नाम आते हैं?”
अर्जुन ने कहा, “कुछ-कुछ।”
ईशान ने गंभीर होकर कहा, “तो आपको सीखना पड़ेगा।”
उस दिन पहली बार अर्जुन ने अपने बेटे को हंसते देखा।
और फिर तारामंडल की सीढ़ियों पर ईशान फिसल गया। अर्जुन ने बिना सोचे उसे पकड़ लिया। वह छोटा शरीर उसकी बांहों में बस एक पल रहा, लेकिन अर्जुन के लिए वह 5 साल का सबसे भारी पल था।
ईशान ने ऊपर देखकर कहा, “थैंक्यू।”
नंदिनी ने यह देखा।
उसकी आंखों में पहली बार डर से ज्यादा कुछ और था।
शायद भरोसे का बहुत छोटा, बहुत घायल बीज।
भाग 3
अगले कुछ हफ्तों में अर्जुन लौटता रहा।
वह कभी ज्यादा मांग नहीं करता। कभी पिता कहलाने की जल्दी नहीं करता। कभी ईशान के सामने अपनी जगह साबित करने की कोशिश नहीं करता। वह बस आता। समय पर आता। और रुकता।
ईशान उसे पहले “अर्जुन अंकल” कहता था। फिर धीरे-धीरे सिर्फ “अर्जुन” कहने लगा। स्कूल से लौटते हुए वह बताता कि उसके दोस्त आरव को लगता है मंगल ग्रह लाल मिर्च जैसा है, और वह इस बात से सहमत नहीं है। कभी वह पूछता, “अर्जुन, अगर चांद पर गड्ढे हैं तो कोई उन्हें भरता क्यों नहीं?” कभी वह अपने खिलौना रॉकेट को पकड़कर कहता, “आप finance करते हो न? तो क्या आप मेरे चांद मिशन को पैसा दिला सकते हो?”
अर्जुन हर सवाल का गंभीरता से जवाब देता, जैसे उसके सामने कोई 5 साल का बच्चा नहीं, बल्कि दुनिया का सबसे जरूरी निवेशक बैठा हो।
नंदिनी यह सब देखती रही।
वह आसानी से भरोसा करने वाली औरत नहीं बची थी। 5 साल पहले जो लड़की बारिश में वड़ा पाव खाते हुए अर्जुन के साथ सपने बांटती थी, अब वह डॉक्टर नंदिनी राव थी। वह ऑपरेशन थिएटर में बच्चों के माता-पिता को संभालती थी। वह रात 3 बजे बुखार में तपते बेटे को गोद में लेकर भी सुबह 8 बजे अस्पताल पहुंचती थी। वह किसी के वादे पर अपनी दुनिया नहीं टिकाती थी।
पर अर्जुन अब वादा कम, काम ज्यादा कर रहा था।
एक दिन ईशान को बुखार था। नंदिनी अस्पताल में आपातकालीन ड्यूटी पर फंस गई। उसने डरते हुए अर्जुन को फोन किया। अर्जुन 25 मिनट में उसके घर पहुंच गया। उसने दवा का समय लिखा, थर्मामीटर देखा, ईशान को कहानी पढ़ी और आधी रात तक उसके पास बैठा रहा।
नंदिनी जब लौटी, तो ईशान सोफे पर सोया था और अर्जुन फर्श पर पीठ दीवार से लगाए बैठा था, हाथ में खुली कहानी की किताब थी।
“तुम जा सकते थे,” नंदिनी ने धीमे से कहा।
अर्जुन ने ईशान की तरफ देखकर जवाब दिया, “नहीं। मैं नहीं जा सकता था।”
उस रात नंदिनी ने पहली बार समझा कि कुछ लोग वापस आकर भी सिर्फ माफी नहीं मांगते, वे अपनी अनुपस्थिति की जगह धीरे-धीरे भरना शुरू करते हैं।
पर सच छिपा रहना अब भारी होने लगा था।
ईशान ने एक शाम स्कूल से लौटकर पूछा, “मम्मा, मेरे पापा मुझे जानते क्यों नहीं?”
नंदिनी का हाथ वहीं रुक गया। वह उसके टिफिन का डिब्बा धो रही थी। पानी चलता रहा।
“तुमने यह क्यों पूछा?”
“क्योंकि आरव के पापा उसे लेने आते हैं। कबीर के पापा क्रिकेट खेलते हैं। मेरे पास नाना हैं… आप हैं… अर्जुन हैं…” वह थोड़ा रुका। “पर पापा नहीं हैं। क्या मेरे पापा को मैं पसंद नहीं आया?”
नंदिनी ने नल बंद किया। दिल ऐसा हुआ जैसे किसी ने उसे पकड़कर मोड़ दिया हो।
उसने उस रात अर्जुन को बुलाया।
ईशान अपने कमरे में सो रहा था। छोटी सी मेज पर उसका सौरमंडल वाला चित्र रखा था। उसने उसमें अपनी मां, नानी, नाना, खुद को और एक लंबा आदमी बनाया था। नीचे टीचर ने लिखा था: “ईशान का परिवार।”
लंबे आदमी के नीचे ईशान ने लिखा था: “अर्जुन।”
नंदिनी ने वह कागज अर्जुन के सामने रखा।
“वह तुम्हें अपने परिवार में रख चुका है,” उसने कहा। “हम उससे सच कब तक छिपाएंगे?”
अर्जुन की आंखें भर आईं। उसने कागज छुआ भी नहीं, जैसे वह कोई बहुत पवित्र चीज हो।
“तुम कहो,” उसने कहा। “जैसे तुम ठीक समझो।”
“नहीं,” नंदिनी बोली। “हम दोनों कहेंगे। इस बार कोई अकेला नहीं बोलेगा।”
रविवार सुबह वे तीनों फर्श पर बैठे। ईशान अपने ब्लॉक्स से शहर बना रहा था, जिसमें एक अस्पताल, एक रॉकेट स्टेशन और एक मिठाई की दुकान थी।
नंदिनी ने कहा, “ईशान, बेटा, हमें तुमसे एक जरूरी बात करनी है।”
ईशान ने तुरंत ब्लॉक नीचे रखा। “बुरी बात है?”
“नहीं,” नंदिनी ने उसके बाल सहलाए। “सच वाली बात है।”
अर्जुन ने सांस रोक ली।
नंदिनी ने कहा, “तुमने एक बार पूछा था न कि तुम्हारे पापा कहां हैं?”
ईशान ने सिर हिलाया।
“तुम्हारे पापा को पहले तुम्हारे बारे में नहीं पता था। अब पता है।”
ईशान ने कुछ पल सोचा। फिर उसने अर्जुन की तरफ देखा।
“क्या अर्जुन मेरे पापा हैं?”
उसकी आवाज में रोना नहीं था। डर नहीं था। बस सीधा सा सवाल था।
नंदिनी ने कहा, “हां। अर्जुन तुम्हारे पापा हैं।”
ईशान लंबे समय तक अर्जुन को देखता रहा। अर्जुन ने खुद को रोका कि वह आगे बढ़कर उसे गले न लगा ले। यह पल उसका नहीं, ईशान का था।
“आपको सच में नहीं पता था?” ईशान ने पूछा।
अर्जुन ने कहा, “नहीं, बेटा। मुझे नहीं पता था। और मुझे बहुत दुख है कि मैं इतने साल तुम्हारे साथ नहीं था।”
ईशान ने ब्लॉक घुमाया। “अब पता है?”
“हां।”
“फिर आप जाओगे तो नहीं?”
अर्जुन की आवाज पहली बार पूरी तरह टूट गई। “नहीं। अब नहीं।”
ईशान ने कुछ देर सोचा, फिर बोला, “तो मंगलवार को आप मुझे स्कूल से लेने आ सकते हो? उस दिन मुझे ड्राइंग वाली फाइल ले जानी होती है।”
अर्जुन ने सिर हिलाया। “हां। जरूर।”
ईशान ने ब्लॉक वापस उठाए। “ठीक है। अब शहर पूरा करना है। इसमें पापा का घर भी बनाना पड़ेगा।”
नंदिनी उठकर रसोई में चली गई, क्योंकि वह ईशान के सामने रोना नहीं चाहती थी। अर्जुन वहीं बैठा रहा, और ईशान ने उसके हाथ में एक पीला ब्लॉक पकड़ा दिया।
“यह आपका घर है,” ईशान ने कहा। “इसे मेरे घर के पास लगाइए।”
कुछ रिश्ते अदालत में नहीं, बच्चों के छोटे हाथों में तय होते हैं।
उसके बाद अर्जुन ने सचमुच रहना शुरू किया। उसने लंदन की नौकरी छोड़ दी और मुंबई के दफ्तर में पद ले लिया। मल्होत्रा परिवार में तूफान आया। सविता ने पहले कहा, “इतना बड़ा फैसला एक बच्चे के लिए?”
राजीव ने अस्पताल की कमजोरी के बावजूद तेज आवाज में कहा, “एक बच्चे के लिए नहीं, अपने बेटे के लिए। और हमारे पोते के लिए।”
सविता चुप हो गईं। कुछ दिन बाद वे नंदिनी के घर आईं। हाथ में ईशान के लिए किताब थी और चेहरे पर वह शर्म जो अमीर घरों में बहुत कम दिखाई जाती है।
“मैंने तुम्हें गलत समझा था,” सविता ने नंदिनी से कहा। “तुमने हमारा खून अकेले पाला और हमने तुम्हें बोझ समझा।”
नंदिनी ने तुरंत माफ नहीं किया। उसने सिर्फ दरवाजा पूरा खोल दिया।
“ईशान अंदर है,” उसने कहा। “उससे धीरे बोलिए। वह अभी चांद पर शोध कर रहा है।”
सविता की आंखें भर आईं।
ईशान ने उन्हें देखते ही पूछा, “आप दादी हैं?”
सविता ने सिर हिलाया।
“आपको ग्रहों के नाम आते हैं?”
“नहीं,” सविता बोलीं।
ईशान ने गंभीर होकर कहा, “तो आपको भी सीखना पड़ेगा।”
पहली बार मल्होत्रा परिवार में किसी ने इतने छोटे बच्चे से हार मानकर मुस्कुराया।
समय धीरे-धीरे आगे बढ़ा। अर्जुन ईशान को स्कूल से लेने जाने लगा। पहले दिन ईशान ने गेट से बाहर आते ही सबको बताया, “ये मेरे पापा हैं।” वह वाक्य अर्जुन के लिए किसी पुरस्कार से बड़ा था।
नंदिनी अभी भी सावधान थी। वह अर्जुन को अपने जीवन में वापस आने दे रही थी, पर उसकी गति वही तय कर रही थी। अर्जुन ने कभी जल्दी नहीं की। वह बर्तन धोता, ईशान को कहानी पढ़ता, स्कूल प्रोजेक्ट में ग्रहों की कतरनें चिपकाता, और कभी-कभी नंदिनी के लिए चाय बना देता, जो अक्सर ठंडी हो जाती थी क्योंकि वह बहुत देर तक सोचती रहती थी।
फिर एक दिन नंदिनी को लंदन के बाल कैंसर शोध संस्थान से प्रस्ताव मिला। विभाग प्रमुख का पद। वह पद जिसके लिए उसने 2 साल पहले आवेदन किया था और फिर भूल गई थी। यह उसके करियर का सबसे बड़ा मौका था। लेकिन वह लंदन था।
वही शहर, जहां अर्जुन कभी उसे छोड़कर गया था।
उसने पत्र अर्जुन के सामने रखा।
“मैं नहीं जानती क्या करूं,” उसने कहा। “ईशान ने अभी तुम्हें पाया है। मैं उसे दूसरे देश कैसे ले जाऊं?”
अर्जुन ने पत्र पढ़ा। फिर बिना रुके बोला, “तुम्हें जाना चाहिए।”
नंदिनी हैरान रह गई।
“और ईशान?”
“मैं साथ चलूंगा।”
“अर्जुन, यह कोई प्रायश्चित यात्रा नहीं है।”
“नहीं,” अर्जुन ने कहा। “पहली बार लंदन मैं भागकर गया था। इस बार मैं अपने बेटे और उसके जीवन की सबसे बहादुर औरत के साथ जाऊंगा।”
नंदिनी ने उसे देखा। उस वाक्य में कोई दिखावा नहीं था। कोई पुरानी चमक नहीं। सिर्फ एक आदमी था, जिसने देर से सही, पर रहना सीख लिया था।
वे लंदन गए।
ईशान ने उड़ान में खिड़की से बादल देखे और पूछा, “क्या हम चांद के करीब हैं?”
अर्जुन ने कहा, “थोड़े।”
ईशान ने तुरंत कहा, “तो आपको सही जानकारी रखनी चाहिए। पापा लोग अनुमान नहीं लगाते।”
नंदिनी ने पहली बार उसके सामने खुलकर हंसी।
लंदन में नंदिनी ने अपना विभाग संभाला। भारतीय समुदाय, अस्पताल की लंबी ड्यूटी, नई टीम, नया स्कूल, नई सड़कों की ठंड—सब कठिन था, लेकिन इस बार वह अकेली नहीं थी। अर्जुन ने नौकरी बदली। ईशान को स्कूल छोड़ा। शाम को भारतीय किराना से धनिया, हल्दी और आम का अचार लाया। कभी-कभी चाय खराब बनाता और ईशान कहता, “पापा, इसमें सुधार की संभावना है।”
1 साल बाद, ईशान के 6वें जन्मदिन की रात, जब सब मेहमान जा चुके थे, अर्जुन और नंदिनी छोटी बालकनी में बैठे थे। नीचे लंदन की सड़कें भीगी चमक रही थीं। ईशान अंदर सो रहा था, उसके तकिए के पास खिलौना दूरबीन रखी थी।
अर्जुन ने जेब से कागज का छोटा फूल निकाला। थोड़ा टेढ़ा, थोड़ा बेढंगा। ठीक वैसा जैसा उसने उनकी पहली मुलाकात के दिनों में बनाया था।
नंदिनी ने उसे देखते ही कहा, “अब भी ठीक से नहीं बना पाते?”
अर्जुन मुस्कुराया। “थोड़ा बेहतर हूं। हर चीज में।”
फिर उसने अंगूठी निकाली।
“मैं तुम्हें दोबारा पाने की मांग नहीं कर रहा,” उसने कहा। “मैं तुम्हारे साथ वही जीवन बनाना चाहता हूं जिसमें ईशान कोई बीच की कड़ी नहीं, हमारा घर हो। मैं देर से आया। पर अब मैं पूरी तरह यहां हूं।”
नंदिनी चुप रही। बहुत देर तक।
फिर उसने कागज का फूल दोनों हाथों से लिया।
“मैंने तुम्हें बहुत सालों तक माफ नहीं किया,” उसने कहा। “फिर एक दिन देखा कि गुस्सा अब ईशान को नहीं बचा रहा, सिर्फ मुझे थका रहा है। तुम बदले हो, अर्जुन। और मुझे यह मानने में समय लगा, पर अब मैं मानती हूं।”
अर्जुन ने कुछ नहीं कहा।
नंदिनी ने धीरे से कहा, “हां।”
सुबह ईशान टोस्ट खा रहा था जब उन्होंने बताया कि वे शादी करेंगे।
उसने गंभीर होकर पूछा, “मतलब हम सब एक घर में रहेंगे?”
“हां,” नंदिनी ने कहा।
“तो कुत्ता भी ले सकते हैं?”
नंदिनी ने तुरंत कहा, “अभी नहीं।”
अर्जुन ने कहा, “यह अलग चर्चा है।”
ईशान मुस्कुराया। “मतलब मना नहीं किया।”
कुछ महीने बाद उनकी शादी हुई। छोटा सा समारोह। लंदन के एक घर के बगीचे में। नंदिनी लाल बनारसी साड़ी में थी, अर्जुन क्रीम रंग की शेरवानी में। ईशान नारंगी जैकेट पहने अपनी मां का हाथ पकड़कर उसे मंडप तक लाया।
वह अर्जुन के सामने रुककर बोला, “यह रही मम्मा। मैंने इतने साल संभाली है। अब आप भी संभालिए।”
कोई हंसा नहीं। सबकी आंखें भर आईं।
राजीव मल्होत्रा ने कुर्सी पर बैठे-बैठे चेहरा छिपा लिया। सविता ने पहली बार नंदिनी को सचमुच बहू की तरह नहीं, बेटी की तरह देखा। नंदिनी के माता-पिता ने चुपचाप ईशान के कंधे पर हाथ रखा।
शादी के वचनों में अर्जुन ने कहा, “मैंने कभी सोचा था कि सफलता कहीं दूर है। फिर समझा कि सबसे बड़ी असफलता उसी घर से दूर जाना था, जो मेरा हो सकता था।”
नंदिनी ने कहा, “मैं आसान नहीं हूं। मैं जल्दी भरोसा नहीं करती। पर मैं पूरी तरह आती हूं। और आज मैं आई हूं।”
2 साल बाद नंदिनी को अपने शोध के लिए बड़ा सम्मान मिला। ईशान ने समारोह में अपने पिता से धीरे से कहा, “मम्मा सच में बहुत अच्छी डॉक्टर हैं।”
अर्जुन ने कहा, “वह असाधारण हैं।”
ईशान ने कहा, “मुझे पता है। दुनिया को अब पता चल रहा है।”
बाद में वे फिर भारत लौटे। मुंबई में समुद्र दिखने वाले एक फ्लैट में रहने लगे। ईशान के कमरे की खिड़की से आसमान साफ दिखता था। और हां, अंत में एक कुत्ता भी आया। उसका नाम ईशान ने “आकाश” रखा, क्योंकि वह कहता था कि जिसने बहुत इंतजार किया हो, उसे खुली जगह मिलनी चाहिए।
आकाश रात को ईशान के पैरों के पास सोता। अर्जुन कभी-कभी दरवाजे से उन्हें देखता और सोचता कि 5 साल की अनुपस्थिति मिटाई नहीं जा सकती। पर उसके बाद के हर दिन को सचमुच जिया जा सकता है।
एक शाम मुंबई की छत पर ईशान दूरबीन से आकाश देख रहा था। नंदिनी उसके पास बैठी थी। अर्जुन थोड़ा पीछे खड़ा था। ईशान ने अचानक कहा, “पापा, जल्दी आइए। शायद शनि दिख रहा है।”
अर्जुन उनके बीच आकर लेट गया। तीनों ने एक ही आसमान देखा।
कुत्ता आकाश ईशान के पैर पर सिर रखकर सो गया।
ऊपर शनि अपने छल्लों के साथ चुप था। नीचे एक परिवार था, जो टूटा भी था, जुड़ा भी था, और शायद इसी वजह से सचमुच पूरा था।
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