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एक अकेली मां ने महंगे रेस्टोरेंट में जब 5 साल पहले गायब हुए प्रेमी को देखा, तो बस इतना कहा—“मेरी 4 साल की बेटी है”… और उसकी आंखों में पछतावे से ज्यादा दावा जल उठा

भाग 1

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जिस रात निशा ने दिल्ली के सबसे महंगे रेस्टोरेंट में पानी का गिलास उस आदमी के सामने रखा, उसी रात उसे समझ आ गया कि मरा हुआ अतीत भी कभी-कभी काले सूट पहनकर लौट आता है।

कनॉट प्लेस की ठंडी हवा में भागते हुए उसके पतले दुपट्टे का किनारा बार-बार उड़ रहा था। पैरों में सस्ते जूते थे, हाथों की उंगलियां ठंड से सुन्न थीं, और मन में बस एक ही डर था—आज फिर देर हुई तो मैनेजर उसे नौकरी से निकाल देगी। घर में 4 साल की तारा थी, जिसका स्कूल का बकाया, दूधवाले का हिसाब और मकान मालिक की चेतावनी सब निशा की छाती पर पत्थर की तरह रखे थे।

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रेस्टोरेंट के पिछले दरवाजे से अंदर घुसते ही मसालों, घी, तंदूर और महंगे इत्र की मिली-जुली खुशबू ने उसे घेर लिया। उसने जल्दी से अपना पुराना स्वेटर लॉकर में ठूंसा और सफेद कुरता ठीक किया।

—फिर लेट, निशा? आज बड़े लोग आए हैं, संभलकर रहना।

रसोई के शेफ राघव ने धीमे से कहा। निशा ने सिर झुका लिया। वह जवाब देने की हालत में नहीं थी।

टेबल 12 पर 4 आदमी बैठे थे। काले सूट, महंगी घड़ियां, खामोश चेहरे। उनके बीच जो आदमी बैठा था, उसे देखते ही निशा के कदम जैसे फर्श में धंस गए।

अर्जुन राठौर।

वही आंखें। वही गहरी, बेचैन कर देने वाली नजर। बस अब उनमें मोहब्बत की जगह कोई ठंडी ताकत थी। वही अर्जुन, जिसने 5 साल पहले निशा से कहा था कि वह उसे कभी अकेला नहीं छोड़ेगा। फिर एक रात बिना किसी फोन, बिना किसी चिट्ठी, बिना किसी सफाई के गायब हो गया था। उस समय निशा 18 साल की थी। कुछ हफ्तों बाद उसे पता चला कि वह मां बनने वाली है।

अर्जुन ने पहले कुछ नहीं कहा। बस उसे देखा। जैसे वह किसी पुराने जख्म को पहचान रहा हो।

—क्या लेंगे, सर?

निशा की आवाज कांप रही थी।

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—सिर्फ काली कॉफी, बिना चीनी।

उसकी आवाज पहले से भारी थी। और जब उसने धीरे से कहा, “धन्यवाद, निशा,” तो निशा का दिल जैसे एक पल के लिए रुक गया।

उसे याद था। वह सब जानता था। फिर भी उसने कभी लौटकर नहीं देखा।

रात भर निशा ने दूरी बनाए रखी। वह उनके लिए खाना लाई, बिल लाई, मुस्कान लाई, लेकिन आंखें नहीं मिलाईं। जब बिल चुका दिया गया, अर्जुन उठते हुए उसके पास आया।

—तुमसे बात करनी है।

—मैं काम पर हूं।

—तुम्हारी शिफ्ट 11 बजे खत्म होती है। मैं इंतजार करूंगा।

उसका लहजा विनती का नहीं, आदेश का था। निशा के भीतर 5 साल का दर्द आग बनकर उठ खड़ा हुआ।

—मेरे पास घर जाने की जल्दी है।

अर्जुन की आंखें सिकुड़ीं।

—किसके पास?

निशा ने पहली बार उसे सीधे देखा।

—मेरी बेटी के पास।

अर्जुन का चेहरा पत्थर हो गया।

—बेटी?

—हां। वह 4 साल की है।

टेबल के बाकी आदमी अचानक चुप हो गए। अर्जुन ने कुर्सी का किनारा इतना कसकर पकड़ा कि उसकी उंगलियां सफेद पड़ गईं।

उस रात 11:15 पर जब निशा पीछे के दरवाजे से बाहर निकली, सड़क पर एक काली गाड़ी खड़ी थी। अर्जुन उसके सामने आकर रुका।

—5 साल, निशा। 5 साल तक तुमने मुझे नहीं बताया कि मेरी बेटी है?

निशा की आंखों में आंसू नहीं, आग थी।

—तुम कहां थे बताने के लिए?

अर्जुन ने कुछ कहना चाहा, तभी दूर से बस आती दिखी। निशा ने कदम बढ़ाए, लेकिन अर्जुन ने उसकी हथेली में एक काला कार्ड रख दिया।

—कल फोन करना। मैं अपनी बेटी से मिलना चाहता हूं।

बस चल पड़ी। खिड़की से निशा ने देखा, अर्जुन बर्फ जैसी ठंडी दिल्ली की रात में खड़ा था। उसकी आंखों में पछतावा नहीं, दावा था।

और निशा को पहली बार डर लगा कि वह सिर्फ लौटकर नहीं आया था। वह अपना सब कुछ वापस लेने आया था।

भाग 2

अगले दिन निशा ने बहुत देर तक अर्जुन का कार्ड देखा। फिर तारा के स्कूल से लौटने के बाद उसने उसे गुलाबी स्वेटर पहनाया और लोधी गार्डन ले गई। ठंडी धूप घास पर बिखरी थी। तारा झूले पर बैठी थी, और निशा हर आने वाली गाड़ी को डर और जिज्ञासा के बीच देख रही थी।

ठीक 3:30 पर काली गाड़ी रुकी। अर्जुन उतरा। उसके पीछे एक भारी कद का सुरक्षा गार्ड था। निशा का दिल बैठ गया।

—तुम अकेले नहीं आ सकते थे?

—अब मेरी जिंदगी ऐसी नहीं रही।

—कैसी जिंदगी?

अर्जुन ने तारा को झूले पर हंसते देखा। उसकी आंखों में पहली बार वह पुराना लड़का लौट आया।

—वह मेरी है?

—वह कोई चीज नहीं है, अर्जुन।

—मैंने यह नहीं कहा। पर वह मेरी बेटी है।

निशा ने कड़वे स्वर में पूछा।

—और तुम कौन हो अब? कारोबारी? या वह आदमी जिसे अपनी बेटी से मिलने भी पहरेदार चाहिए?

अर्जुन चुप रहा। फिर बोला।

—मेरे चाचा की ट्रांसपोर्ट कंपनी सिर्फ ट्रांसपोर्ट नहीं थी। उनके मरने के बाद कर्ज, दुश्मन और नाम सब मेरे सिर आ गया। जिंदा रहने के लिए मुझे वही बनना पड़ा जिससे मैं भागना चाहता था।

तभी तारा दौड़ती हुई आई और निशा की टांगों के पीछे छिप गई।

—मम्मा, ये कौन हैं?

अर्जुन घुटनों पर बैठ गया।

—नमस्ते, तारा। मैं तुम्हारी मम्मा का पुराना दोस्त हूं।

तारा ने उसे ध्यान से देखा।

—आप राजकुमार जैसे कपड़े पहनते हो।

अर्जुन हल्के से मुस्कुराया। निशा का गला भर आया। वे पास के छोटे कैफे में गए। तारा ने गरम चॉकलेट पी, मूंछ जैसी मलाई उसके होंठों पर लग गई।

फिर उसने अचानक पूछा।

—आपकी कोई छोटी बच्ची है?

अर्जुन ने निशा की ओर देखा।

—नहीं। सिर्फ एक।

निशा ने कांपते हाथ से तारा का चेहरा पोंछा।

—तारा, याद है मम्मा ने तुम्हें तुम्हारे पापा के बारे में बताया था?

तारा की आंखें बड़ी हो गईं।

—जो दूर चले गए थे?

निशा ने धीरे से अर्जुन की ओर इशारा किया।

—ये वही हैं।

तारा ने अर्जुन को देखा।

—आप मेरे पापा हो?

अर्जुन की आंखों में नमी चमक उठी।

—हां, बेटा।

तारा ने अगला सवाल इतना सीधा पूछा कि कैफे की सारी गर्मी ठंडी पड़ गई।

—तो आप इतने साल आए क्यों नहीं?

अर्जुन जवाब दे पाता, उससे पहले उसका सुरक्षा गार्ड दरवाजे से भीतर आया। उसके फोन पर तारा की तस्वीर खुली थी, और नीचे संदेश लिखा था—

“लड़की मिल गई।”

भाग 3

निशा ने फोन की स्क्रीन देखी तो उसका चेहरा सफेद पड़ गया। तारा अभी भी अर्जुन की ओर मासूमियत से देख रही थी। उसे नहीं पता था कि उसकी एक तस्वीर किसी अनजान आदमी के फोन पर पहुंच चुकी है।

अर्जुन ने फोन राघव से लिया। उसकी आंखें एक पल में बदल गईं। वह पिता से फिर वही खतरनाक आदमी बन गया, जिससे निशा डरती थी।

—किसने भेजा?

राघव ने धीमे स्वर में कहा।

—वही पुराना आदमी। विक्रम मल्होत्रा। उसने लिखा है कि अब आपकी कमजोरी पता चल गई।

निशा के कानों में सिर्फ एक शब्द गूंजा—कमजोरी।

उसने तारा को तुरंत अपनी गोद में खींच लिया।

—यह क्या है, अर्जुन? कौन है ये आदमी? मेरी बेटी की तस्वीर उसके पास कैसे आई?

अर्जुन ने तारा की ओर देखा, फिर आवाज धीमी कर ली।

—निशा, अभी यहां से निकलना होगा।

—कहीं नहीं। पहले सच बताओ।

—सच यह है कि जिस दुनिया से मैं बाहर निकल रहा हूं, वह मुझे आसानी से जाने नहीं देगी।

निशा हंस पड़ी, लेकिन उस हंसी में डर था।

—मतलब तुम आए नहीं, तूफान लेकर आए हो। 5 साल बाद मेरी बच्ची ने अपने पापा को देखा और उसी दिन उसकी तस्वीर किसी दुश्मन के फोन पर पहुंच गई?

अर्जुन ने आगे बढ़कर कहा।

—मैं उसे कुछ नहीं होने दूंगा।

—तुम्हारे होने से ही खतरा आया है।

ये शब्द अर्जुन के चेहरे पर थप्पड़ की तरह लगे। तारा ने मां की साड़ी पकड़ ली।

—मम्मा, हम घर चलें?

निशा ने बिना अर्जुन की ओर देखे कहा।

—हां।

अर्जुन ने गाड़ी भेजने की कोशिश की, लेकिन निशा ने मना कर दिया। वह ऑटो से तारा को लेकर घर लौटी। रास्ते भर उसने तारा को सीने से चिपकाए रखा। ऑटो के शोर, हॉर्न और धूल में भी उसे बस अर्जुन की आवाज याद आती रही—“वह मेरी बेटी है।”

रात को तारा सो गई, पर निशा बैठी रही। छोटे से किराए के कमरे की दीवारों पर नमी थी। पंखे से हल्की खरखराहट आती थी। रसोई में रखे डिब्बे लगभग खाली थे। मेज पर स्कूल की फीस की पर्ची पड़ी थी। दुनिया कहती कि अर्जुन का पैसा तारा का भविष्य बदल सकता था। पर क्या उस पैसे की छाया में डर भी नहीं आएगा?

लगभग 12 बजे दरवाजे पर धीमी दस्तक हुई।

निशा का दिल उछल गया। उसने दरवाजा थोड़ा सा खोला। बाहर अर्जुन खड़ा था। अकेला। बिना सुरक्षा गार्ड। बिना गाड़ी की चमक। बस थका हुआ, टूटा हुआ, और पहली बार सचमुच इंसान जैसा।

—मुझे 5 मिनट दो।

—तारा सो रही है।

—मैं आवाज नहीं करूंगा।

निशा ने दरवाजा खोला, लेकिन दूरी बनाए रखी। अर्जुन ने कमरे में नजर दौड़ाई। कोने में तारा के रंगीन चित्र लगे थे—एक घर, एक औरत, एक छोटी लड़की, और आसमान में बड़ा पीला सूरज। घर में कहीं पिता नहीं था।

अर्जुन उस चित्र के सामने रुक गया।

—उसने मुझे कभी बनाया नहीं?

निशा ने धीरे से कहा।

—वह कैसे बनाती? उसके पास चेहरा नहीं था।

अर्जुन की आंखें भीग गईं। उसने जेब से एक पुराना कपड़े का छोटा पाउच निकाला। उसमें एक टूटी हुई चांदी की पायल थी।

निशा ने उसे पहचानते ही सांस रोक ली।

यह वही पायल थी जो उसने 5 साल पहले अर्जुन को दी थी, जब वे पुरानी दिल्ली की गलियों में चाट खाते हुए भविष्य की बातें किया करते थे। उसने मजाक में कहा था—“अगर कभी खो जाओ तो इसे देखकर लौट आना।”

अर्जुन ने पायल मेज पर रख दी।

—मैं खोया नहीं था, निशा। मैं फंसा हुआ था। मेरे चाचा ने मरने से पहले ऐसे लोगों से पैसे ले रखे थे जो इंसान को कर्ज नहीं, जिंदगी से बांधते हैं। उसी रात जब मैं गायब हुआ, मुझे उठा लिया गया था। उन्होंने कहा था, अगर मैंने किसी को खबर दी, तो सबसे पहले तुम्हें ढूंढेंगे। मैं तुम्हें बचाने के लिए गया था। फिर एक दिन 1 साल, फिर 2 साल, फिर 5 साल हो गए। मैं बाहर निकला तो हाथ साफ नहीं थे। मैं वह लड़का नहीं रहा जिसे तुम प्यार करती थीं।

निशा की आंखों में दर्द था।

—तुमने एक फोन भी नहीं किया।

—हर बार डर लगा कि फोन तुम्हें मेरे दुश्मनों तक ले जाएगा। फिर मुझे लगा शायद तुमने शादी कर ली होगी। शायद तुम खुश होगी। मैं वापस आने से डरता रहा।

—और मैं हर रात सोचती रही कि मुझमें क्या कमी थी।

अर्जुन जैसे टूट गया।

—कमी मुझमें थी। हिम्मत नहीं थी। सच कहने की, लौटने की, तुम्हारी आंखों में खुद को गिरा हुआ देखने की।

कमरे में लंबी चुप्पी छा गई। बाहर गली में कुत्ते भौंक रहे थे। दूर कहीं मंदिर की घंटी की आवाज आई।

निशा ने पहली बार धीमे स्वर में पूछा।

—अब क्या चाहते हो?

—तारा के जीवन में जगह। तुम्हारे जीवन में तब तक नहीं, जब तक तुम खुद न चाहो। पैसे, फ्लैट, स्कूल—सब तारा के अधिकार हैं, एहसान नहीं। और अगर तुम कहो, तो मैं उसके पास तब तक नहीं आऊंगा जब तक मेरा नाम पूरी तरह साफ न हो जाए।

निशा ने उसे देखा। यह वही अर्जुन नहीं था जो आदेश देता था। यह एक पिता था जो अपनी बेटी के दरवाजे पर खड़ा होकर अनुमति मांग रहा था।

तभी कमरे के भीतर से तारा की नींद भरी आवाज आई।

—मम्मा?

निशा तुरंत उठी। अर्जुन भी पीछे हट गया। तारा दरवाजे पर खड़ी थी, बाल बिखरे, आंखें आधी खुली।

—पापा आए हैं?

निशा ने अर्जुन की ओर देखा। अर्जुन ने तारा से कुछ कदम दूर रहते हुए घुटनों पर बैठकर कहा।

—हां, बेटा। पर अगर तुम सोना चाहो तो मैं चला जाऊंगा।

तारा कुछ पल उसे देखती रही। फिर बोली।

—आप कल पराठा बना सकते हो? पैनकेक नहीं। दादी कहती थीं, पराठा ज्यादा अच्छा होता है।

अर्जुन के होंठ कांपे।

—मैं सीख लूंगा।

तारा ने पूछा।

—फिर आप फिर चले जाओगे?

अर्जुन ने सिर झुका लिया।

—अगर तुम्हारी मम्मा मना करेंगी तो दूर रहूंगा। पर गायब नहीं होऊंगा। रोज तुम्हें बताऊंगा कि कहां हूं।

तारा ने निशा का हाथ पकड़ा।

—मम्मा, पापा को डांटो मत। बस बोलो कि झूठ नहीं बोलना।

निशा की आंखों से आंसू बह निकले। बच्चे कभी-कभी अदालत से ज्यादा साफ फैसला सुनाते हैं।

अगले कई हफ्ते आसान नहीं थे। अर्जुन ने तारा को अचानक महंगे तोहफों से नहीं भरा। निशा ने साफ नियम बनाए—कोई बिना बताए स्कूल नहीं जाएगा, कोई सुरक्षा गार्ड बच्ची को डराएगा नहीं, कोई फैसला अकेले नहीं होगा। अर्जुन ने हर नियम माना। वह रविवार को आता, तारा के साथ रंग भरता, कहानियां सुनता, और सचमुच पराठा बनाना सीखता। पहले 3 पराठे जल गए। तारा ने हंसकर कहा—

—मम्मा से भी खराब।

अर्जुन ने इसे अपनी जिंदगी की सबसे बड़ी हार और सबसे प्यारी जीत माना।

लेकिन विक्रम मल्होत्रा की छाया खत्म नहीं हुई थी। एक शाम, जब निशा रेस्टोरेंट से लौट रही थी, 2 बाइक सवार उसके पास रुके। एक ने कहा—

—राठौर से कहना, परिवार छिपाने से परिवार बचता नहीं।

निशा कांपती हुई घर पहुंची। उसने तुरंत अर्जुन को फोन किया। 15 मिनट में अर्जुन आया, लेकिन इस बार वह गुस्से में नहीं, साफ कागजों के साथ आया। उसने निशा के सामने फाइलें रखीं—कानूनी दस्तावेज, कंपनी हस्तांतरण, पुलिस शिकायत, एक वकील का बयान, और सरकारी गवाह बनने की अर्जी।

—मैंने फैसला कर लिया है। आधा सच नहीं चलेगा। तारा को ऐसा पिता नहीं चाहिए जिसे लोग नाम से डरें। उसे ऐसा पिता चाहिए जिस पर वह स्कूल में गर्व कर सके।

निशा ने फाइलें पढ़ीं। अर्जुन अपने पुराने नेटवर्क के खिलाफ गवाही देने वाला था। इसका मतलब खतरा भी था, जेल की संभावना भी, दुश्मनी भी। लेकिन पहली बार वह भाग नहीं रहा था।

—तुम्हें पता है इसका मतलब क्या है?

—हां। शायद मुझे कुछ समय के लिए दूर रहना पड़े। पर इस बार मैं गायब नहीं होऊंगा। हर तारीख, हर बात, हर सच तुम जानोगी।

कुछ महीनों तक सब उलझा रहा। पुलिस सुरक्षा आई। अदालत के चक्कर लगे। अखबारों में राठौर नाम छपा। रेस्टोरेंट में लोग निशा को पहचानने लगे। कुछ ने उसे बदनाम किया—“गैंग वाले आदमी की औरत।” कुछ ने दया दिखाई। लेकिन निशा हर दिन तारा को स्कूल छोड़ती, काम पर जाती और रात में उसे वही कहानी सुनाती—एक आदमी जो देर से लौटा, लेकिन सच बोलकर लौटा।

अर्जुन ने विक्रम मल्होत्रा के खिलाफ गवाही दी। कई अवैध रास्ते बंद हुए। उसके पुराने धंधे जब्त हुए, लेकिन उसके वैध रेस्टोरेंट और लॉजिस्टिक कंपनी बच गए। अदालत ने उसे जेल नहीं भेजा, पर 2 साल की निगरानी, भारी जुर्माना और सामाजिक सेवा का आदेश दिया। अर्जुन ने पहली बार राहत की सांस ली। उसने ताकत खोई थी, लेकिन चेहरा पा लिया था।

निशा ने तुरंत उसका दिया महंगा फ्लैट स्वीकार नहीं किया। उसने कहा—

—तारा का भविष्य खरीदकर नहीं, बनाकर देना होगा।

अर्जुन ने सिर झुका दिया।

कुछ समय बाद वह एक सुरक्षित, साधारण लेकिन उजले 2 कमरे वाले फ्लैट में शिफ्ट हुई। किराया अर्जुन और निशा दोनों ने मिलकर दिया। तारा के नाम शिक्षा निधि बनी, लेकिन दस्तावेजों में लिखा गया कि उसका इस्तेमाल सिर्फ निशा की सहमति से होगा। निशा ने अपनी पढ़ाई फिर शुरू की। दिन में काम, शाम को कक्षाएं, रात में तारा की कहानियां। अर्जुन रविवार को आता, कभी सब्जी काटता, कभी होमवर्क कराता, कभी पराठे बेलता। गोल पराठा अभी भी नहीं बनता था।

1 साल बाद तारा के स्कूल में पिता दिवस का कार्यक्रम था। बच्चों से कहा गया था कि वे अपने पिता के बारे में 4 पंक्तियां बोलें। निशा पीछे बैठी थी। अर्जुन दरवाजे के पास खड़ा था, जैसे भीतर आने का हक अभी भी मांग रहा हो।

तारा मंच पर चढ़ी। उसके हाथ में चित्र था। इस बार चित्र में 3 लोग थे—मम्मा, पापा और वह। घर के ऊपर वही बड़ा पीला सूरज था।

तारा ने माइक्रोफोन पकड़ा और बोली—

—मेरे पापा देर से आए। मम्मा उनसे नाराज थीं। मैं भी थोड़ी नाराज थी। पर पापा ने झूठ बोलना बंद किया। अब वह पराठे बनाते हैं। थोड़े टेढ़े, पर अच्छे।

हॉल में हल्की हंसी गूंजी। अर्जुन की आंखें भर आईं। निशा ने पहली बार उसे देखकर मुस्कुराया।

कार्यक्रम के बाद तारा दौड़कर अर्जुन की गोद में चढ़ गई।

—पापा, आज आप भागोगे तो नहीं?

अर्जुन ने उसे कसकर पकड़ लिया।

—नहीं, बेटा। अब अगर जाना भी पड़ा, तो बताकर जाऊंगा। और लौटकर आऊंगा।

निशा पास खड़ी थी। उसके भीतर पुराने घाव पूरी तरह भरे नहीं थे। शायद कभी पूरी तरह भरते भी नहीं। लेकिन अब उनके ऊपर सच की पट्टी बंध चुकी थी।

उस शाम 3 लोग इंडिया गेट के पास गोलगप्पे खाने गए। अर्जुन ने पहली बार सड़क किनारे खड़े होकर तारा के हाथ से पानीपुरी खाई और खांस पड़ा। तारा हंसते-हंसते दोहरी हो गई। निशा ने उसके लिए पानी खरीदा। अर्जुन ने पानी लेते हुए धीमे से कहा—

—धन्यवाद।

निशा ने पूछा—

—किस बात का?

—दरवाजा पूरी तरह बंद नहीं करने के लिए।

निशा ने दूर रोशनी में नहाए इंडिया गेट को देखा। फिर तारा को, जो गुब्बारे वाले से नीला गुब्बारा चुन रही थी।

—दरवाजा खुला है, अर्जुन। लेकिन इस बार अंदर आने से पहले दस्तक देना।

अर्जुन ने सिर हिला दिया।

तारा नीला गुब्बारा लेकर उनके बीच आ गई। एक हाथ मम्मा का, एक हाथ पापा का। भीड़, रोशनी, हॉर्न, चाट की खुशबू और दिल्ली की रात के बीच वह उछलती हुई चल रही थी।

निशा ने उस पल महसूस किया कि हर लौटना माफ नहीं किया जा सकता, लेकिन कुछ लौटने ऐसे होते हैं जो इंसान को फिर से इंसान बना देते हैं।

और तारा, जिसे 4 साल तक अपने पिता का चेहरा नहीं पता था, उस रात अपने दोनों हाथों में अपना पूरा आसमान पकड़े घर लौटी।

Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.