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“इतने लोगों के सामने वह मना नहीं कर पाएगी” — मंगेतर ने सगाई की रात दुल्हन पर फैसला थोपना चाहा; मगर बूढ़े ड्राइवर की काली फाइल ने उसके सपनों के पीछे छिपा सौदा खोल दिया।

भाग 1
जिस सुबह दिनेश शर्मा ने अपनी बेटी के मंगेतर को यह कहते सुना कि शादी के बाद अनन्या अपने फैसले खुद लेना भूल जाएगी, उसका पैर ब्रेक पर ऐसे पड़ा कि पीछे बैठा आदमी आगे की ओर झटका खा गया।

दिल्ली की रिंग रोड पर हल्की बारिश हो रही थी। शीशे पर पानी की बूंदें रेंग रही थीं और ट्रैफिक सिग्नल लाल होने ही वाला था। दिनेश ने समय पर गाड़ी रोक ली, मगर उसकी उंगलियां स्टीयरिंग पर इतनी कस गईं कि हथेलियों की नसें उभर आईं।

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पीछे की सीट पर राघव मल्होत्रा आराम से बैठा था। महंगी घड़ी, करीने से प्रेस की हुई शर्ट, घुटनों पर लैपटॉप बैग और कान से चिपका फोन। उसकी आवाज में वही आत्मविश्वास था जो बड़े घरों के लड़कों में बचपन से भर दिया जाता है।

—शादी के बाद ज्यादा सवाल पूछने की आदत अपने आप चली जाएगी। अभी मायके, स्कूल, बच्चों और अपनी आजादी में बहुत उलझी हुई है।

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फोन के दूसरी तरफ किसी ने कुछ कहा। राघव हंसा।

—दिल्ली में रहेगी तो हर बात पर मां-बाप से सलाह लेगी। बेंगलुरु ले जाऊंगा तो सब आसान हो जाएगा। नई जगह, नया घर, नया रूटीन। 6 महीने में पूरी तरह बदल जाएगी।

दिनेश के सीने में जैसे किसी ने गरम तार चुभो दिया।

वह 62 साल का था। पुरानी दिल्ली की गलियों से लेकर नोएडा की ऊंची इमारतों तक उसने 38 साल बिजली का काम किया था। लोगों के घरों में रोशनी लगाई, टूटे बोर्ड ठीक किए, शॉर्ट सर्किट बचाए। 2 साल पहले घुटनों के दर्द और डॉक्टर की सलाह पर काम छोड़ा था, मगर घर बैठना उसे कभी रास नहीं आया। मीरा ने कहा था कि अब भजन, मंदिर और पार्क की सैर में मन लगाओ, पर दिनेश को लगता था कि उसके हाथ खाली होते ही उसका वजूद भी खाली हो गया है।

इसीलिए उसने सुबह-सुबह निजी कैब चलानी शुरू की थी। पैसे की जरूरत नहीं थी, पर रास्ते की जरूरत थी। उसे यह अच्छा लगता था कि सुबह 7 बजे गाड़ी निकालो, लोगों को एयरपोर्ट, दफ्तर, होटल, मीटिंग तक छोड़ो और दोपहर तक घर लौट आओ।

राघव उसका नियमित ग्राहक बन गया था। मंगलवार और गुरुवार को वह गुरुग्राम के साइबर हब, कभी साउथ दिल्ली, कभी नोएडा के किसी बड़े दफ्तर जाता। दिनेश ने शुरू में उसे बस एक अमीर, तेज बोलने वाला, थोड़ा घमंडी ग्राहक समझा था।

फिर एक दिन उसने फोन पर एक नाम सुना था।

अनन्या।

दिनेश की बेटी।

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उसका दिल धक से रह गया था। धीरे-धीरे बातों से स्पष्ट हुआ कि यही वही राघव है, जिससे अनन्या की शादी 5 महीने बाद तय हुई थी। घर पर राघव ने दिनेश को 3 बार देखा था, नमस्ते भी किया था, पर कभी ध्यान से नहीं देखा। दिनेश कैब चलाते समय कंपनी की काली टोपी, मास्क और हल्के काले चश्मे पहनता था। 8 महीने पहले दांतों की सर्जरी हुई थी, इसलिए वह मास्क लगाए रखता था। राघव वैसे भी उन लोगों में से था जो ड्राइवर की तरफ केवल उतना देखते थे जितना किराया चुकाने के लिए जरूरी हो।

जब दिनेश ने पहली बार यह बात मीरा को बताई, वह रसोई में चाय छान रही थी। उसके हाथ रुक गए।

—मतलब वह तुझे पहचानता ही नहीं?

—बिलकुल नहीं।

—दिनेश, यह तो बहुत अजीब बात है।

—अजीब है, पर थोड़ी मजेदार भी।

मीरा ने उसे घूरा।

—बेटी का मंगेतर अपने होने वाले ससुर को पहचानता नहीं और तुझे मजा आ रहा है?

दिनेश ने उस दिन हंसकर बात टाल दी थी। उसे लगा था, शहरों में लोग व्यस्त होते हैं, ध्यान नहीं रहता। पर धीरे-धीरे मजाक चिंता में बदलने लगा।

राघव होटल के गेट पर खड़े गार्ड से ऐसे बात करता जैसे वह इंसान नहीं, कुर्सी हो। रेस्तरां में वेटर से पानी देर से आने पर उसकी आवाज बदल जाती। मीटिंग में फोन पर दूसरों की बात काट देता। हर कहानी में वह खुद नायक होता, बाकी लोग सहायक पात्र।

दिनेश खुद को समझाता रहा। सफल लोग शायद ऐसे ही होते हैं। अनन्या कोई छोटी बच्ची नहीं थी। वह 31 साल की थी, एक नामी स्कूल में काउंसलर थी। टूटे हुए घरों के बच्चों, परीक्षा के डर से रोते किशोरों और चुपचाप डिप्रेशन झेलते छात्रों के साथ काम करती थी। लोगों की आंखों में छिपे दुख पहचानना उसे आता था। 20 की उम्र में एक खराब रिश्ते से निकलने के बाद वह और सावधान हो गई थी।

इसलिए दिनेश ने खुद को रोका।

उस सुबह तक।

राघव ने फोन पर जो कहा, वह कोई मजाक नहीं था। वह योजना थी।

दिनेश ने उसे गुरुग्राम के शीशे वाले ऑफिस टावर के सामने उतारा। राघव ने फोन काटते हुए कहा:

—थर्सडे को 8 बजे तैयार रहना।

दिनेश ने गर्दन झुकाई।

—जी, साहब।

राघव उतर गया। उसे अंदाजा भी नहीं था कि उसी आदमी ने उसकी जिंदगी की सबसे खतरनाक बात सुन ली थी।

घर लौटकर दिनेश ने मीरा से कुछ नहीं कहा। शाम को अनन्या आई तो उसकी आंखों में शादी की चमक थी। वह लहंगे के रंग, मेहंदी की सूची और संगीत की कोरियोग्राफी के बारे में बोलती रही। दिनेश चुपचाप उसकी बातें सुनता रहा। उसे लगा, अभी बोल देगा तो बेटी टूट जाएगी। फिर लगा, नहीं बोलेगा तो शायद पूरी जिंदगी टूट जाएगी।

3 दिन तक वह इसी डर में जलता रहा।

चौथे दिन मीरा ने आंगन में तुलसी को पानी देते हुए पूछा:

—अब बता भी दे, अंदर क्या चल रहा है?

दिनेश ने सब बता दिया। शब्द दर शब्द। मीरा का चेहरा पीला पड़ गया।

—अनन्या को अभी मत बता। पहले देख। बिना प्रमाण के बोलेगा तो वह तुझे ही गलत समझेगी।

दिनेश ने वही किया।

अगले सप्ताह राघव गाड़ी में बैठा और फोन पर बोला:

—हां, ऑफर स्वीकार कर लिया। पैकेज अच्छा है। अनन्या को अभी मत बताना। शादी के बाद बोलना आसान होगा।

कुछ पल बाद वह मुस्कराया।

—बेंगलुरु सही रहेगा। वहां मेरे लोग हैं। यहां उसका स्कूल, उसके माता-पिता, उसकी सहेलियां सब बीच में आते हैं।

दिनेश की नजर शीशे में जम गई।

उसी रविवार अनन्या घर आई। मीरा ने राजमा चावल बनाए थे। खाने के बाद दिनेश ने सहज बनने की कोशिश की।

—शादी के बाद यहीं रहोगे न, बेटा?

अनन्या हंसी।

—और कहां? मेरी नौकरी, बच्चे, सब यहीं हैं। राघव भी कहता है दिल्ली छोड़ना पागलपन होगा।

दिनेश के हाथ से स्टील का गिलास छूटते-छूटते बचा।

अब हर सफर में कोई न कोई टुकड़ा जुड़ने लगा। राघव बेंगलुरु में अपार्टमेंट देख रहा था। प्रीमियम सोसायटी, क्लब हाउस, निजी स्कूलों की सूची। एक दिन उसने वकील से बात की।

—समझौता ऐसा रखो कि संपत्ति मेरी सुरक्षित रहे। उसके नाम पर कुछ हो तो शादी के बाद संयुक्त नियंत्रण में आए। वह भावुक है, पढ़ेगी तो भी समझ नहीं पाएगी।

दिनेश की सांस भारी हो गई।

फिर एक सुबह राघव ने वह बात कही जिसने दिनेश की रीढ़ में बर्फ उतार दी।

—स्कूल काउंसलर वाली नौकरी छोड़ देगी तो घर शांत रहेगा। उसे बच्चों के रोने-धोने में बहुत दिलचस्पी है। मैं उसे किसी फाउंडेशन का नाममात्र पद दे दूंगा। समाज सेवा का शौक भी पूरा और नियंत्रण भी मेरे हाथ में।

दिनेश ने गाड़ी एक पेट्रोल पंप पर रोक दी। राघव उतर चुका था, पर दिनेश 10 मिनट वहीं बैठा रहा। उसे लगा जैसे किसी ने उसकी बेटी की आवाज बंद करने की तैयारी कर ली है।

पर सबसे कठिन यह था कि राघव अनन्या से बात करते समय बिल्कुल अलग लगता था। एक बार उसने गाड़ी में ही अनन्या को फोन किया। उसकी आवाज नरम हो गई। वह उसके स्कूल के एक बच्चे की बनाई ड्राइंग पर खुश हो रहा था। उसने कहा कि उसे उस पर गर्व है। उस पल दिनेश उलझ गया। क्या यह आदमी सचमुच प्यार करता था, या प्यार के नाम पर मालिकाना हक चाहता था?

कुछ दिन बाद अनन्या अकेली चाय पीने आई। दिनेश खुद को रोक नहीं पाया।

—बेटा, शादी के बाद बैंक खाते अलग रखोगी या साथ?

अनन्या का चेहरा सख्त हो गया।

—पापा, आपको राघव से दिक्कत है न?

दिनेश चुप रहा।

—मुझे पता था। आपको कोई लड़का पसंद आ ही नहीं सकता। आपको लगता है मैं खुद फैसला नहीं कर सकती।

—मैं बस चाहता हूं कि तू सुरक्षित रहे।

—नहीं, आप चाहते हैं कि मैं हमेशा आपकी छोटी बच्ची बनी रहूं।

यह कहकर वह चली गई। 2 हफ्ते तक उसने फोन कम उठाया। दिनेश हर सुबह राघव को गाड़ी में बैठाता रहा और खुद को गद्दार महसूस करता रहा।

फिर वह गुरुवार आया, जब राघव ने फोन पर हंसते हुए कहा:

—सब बुक हो गया। छतरपुर फार्महाउस, लगभग 250 मेहमान। संगीत की रात सबसे सही रहेगी। अनन्या को वहीं बताऊंगा कि शादी के बाद हम बेंगलुरु जा रहे हैं। इतने लोगों के सामने मना नहीं कर पाएगी।

दिनेश के कानों में गूंज भर गई।

राघव आगे बोला:

—और हां, समझौते के कागज भी उसी रात साइन करवा लेंगे। भावुक माहौल रहेगा। परिवार, कैमरे, रिश्तेदार। कोई लड़की उस वक्त ड्रामा नहीं करती।

उस रात दिनेश ने अपने पुराने दोस्त संजय वर्मा को फोन किया, जो कभी दिल्ली पुलिस में इंस्पेक्टर था। 11 बजे वे लक्ष्मी नगर की एक पुरानी चाय की दुकान पर मिले। दिनेश ने पूरी बात बताई। संजय ने बहुत देर तक चुप रहकर सुना।

—तू राघव को बुरा साबित करने मत निकल। बस यह साबित कर कि अनन्या से सच छिपाया गया है।

दिनेश ने उसी पल फैसला कर लिया।

उसे बेटी को बचाना था, पर बेटी की जिंदगी अपने हाथ में लेकर नहीं। उसे बस अंधेरे में छिपे स्विच को चालू करना था।

अगले 12 दिन में उसने हर वह सबूत जोड़ा जो कानूनन और साफ तरीके से मिल सकता था। गाड़ी की पिछली सीट पर छूटे प्रिंटआउट, फार्महाउस की बुकिंग की प्रति, बेंगलुरु के किराये के घरों की सूची, वकील के गलत पते पर भेजे गए कागजों की प्रति जो शादी के साझा ईमेल में आ गई थी, और स्कूल से मिली पुष्टि कि अनन्या ने किसी छुट्टी या इस्तीफे की बात नहीं की थी।

संगीत की रात आ गई।

छतरपुर का फार्महाउस रोशनी से भरा था। ढोल, फूल, कैमरे, रिश्तेदार, महंगे कपड़े, चमकते चेहरे। अनन्या पीले लहंगे में सचमुच खुश लग रही थी। दिनेश ने उसे देखा और उसका साहस डगमगा गया।

8:20 बजे राघव मंच पर चढ़ा। हाथ में माइक था, चेहरे पर वही विजयी मुस्कान।

—आज मैं अनन्या को एक ऐसी सरप्राइज देने वाला हूं, जिसे वह जिंदगी भर नहीं भूल पाएगी।

अनन्या मुस्कराई, पर दिनेश के हाथ में पकड़ी फाइल कांप गई।

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भाग 2

राघव ने मंच पर खड़े होकर सबके सामने घोषणा की कि शादी के बाद वह और अनन्या बेंगलुरु में नई जिंदगी शुरू करेंगे, और पहले 3 सेकंड तक मेहमानों ने इसे रोमांटिक सरप्राइज समझकर ताली बजाई। फिर ताली धीरे-धीरे रुक गई, क्योंकि अनन्या का चेहरा खाली पड़ चुका था। उसकी मां मीरा कुर्सी के हत्थे को पकड़े बैठी थी और दिनेश की आंखें मंच पर जमी थीं। राघव ने माहौल संभालने के लिए मुस्कराकर कहा कि जीवन में बड़े फैसले साहस से लिए जाते हैं, मगर अनन्या की आंखों में सवाल था, खुशी नहीं। राघव की मां ने तुरंत आगे बढ़कर कहा कि लड़की को पति के साथ ही जाना चाहिए, यही घर की मर्यादा है। उसके पिता ने भी हंसकर बात हल्की करने की कोशिश की, जैसे बेटी की नौकरी, उसके माता-पिता और उसके छात्रों का कोई वजन न हो। उसी क्षण दिनेश उठा। फार्महाउस की रोशनी में उसकी पुरानी सफेद कमीज और कांपते हाथ साफ दिख रहे थे। राघव ने उसे पहले मेहमान समझा, फिर उसके चेहरे पर पहचान उतरने लगी। वही आवाज, वही कद, वही शांत आंखें, वही ड्राइवर जो हर मंगलवार और गुरुवार उसे शहर भर घुमाता था। अनन्या ने पिता को देखा और उसके चेहरे पर दुख, गुस्सा और डर एक साथ आ गए। दिनेश ने कोई भाषण नहीं दिया। उसने केवल फाइल आगे बढ़ाई। फाइल में बेंगलुरु के घरों की सूची, नौकरी का स्वीकार पत्र, संगीत की बुकिंग, गुप्त वैवाहिक समझौते का मसौदा और वह नोट था जिसमें अनन्या की नौकरी को “विवाह के बाद अनावश्यक भावनात्मक बाधा” लिखा गया था। राघव ने फाइल छीनने की कोशिश की, पर संजय वर्मा पहले ही पास खड़ा था। राघव के चाचा ने दिनेश को धक्का देने के लिए कदम बढ़ाया, तो सुरक्षा कर्मी बीच में आ गए। पूरे फार्महाउस में सन्नाटा फैल गया। अनन्या ने आखिरी पन्ना खोला और उसका चेहरा राख जैसा हो गया, क्योंकि उसमें सिर्फ बेंगलुरु की योजना नहीं थी—उसमें यह भी लिखा था कि शादी के 30 दिन बाद उसके पिता के पुराने घर को “संयुक्त निवेश” के नाम पर गिरवी रखने की तैयारी थी।

भाग 3

अनन्या ने वह पन्ना दोनों हाथों से पकड़ा हुआ था। उसकी उंगलियां कांप रही थीं, पर उसकी आवाज धीरे-धीरे मजबूत हो रही थी। फार्महाउस में 250 लोगों की भीड़ थी, मगर उस पल हर चेहरा जैसे दूर चला गया। केवल मंच, राघव, दिनेश, मीरा और वह कागज बचे थे जिस पर उसकी जिंदगी को किसी सौदे की तरह बांटा गया था।

राघव ने माइक नीचे रख दिया। उसका चेहरा लाल था, पर आंखों में शर्म से ज्यादा गुस्सा था।

—ये सब गलत तरीके से निकाला गया है।

अनन्या ने उसकी तरफ देखा।

—गलत क्या है? कागज या इरादा?

राघव चुप हो गया।

उसकी मां ने साड़ी का पल्लू संभालते हुए आगे बढ़कर कहा:

—बेटा, बड़े घरों में शादी ऐसे ही होती है। समझौते होते हैं, योजनाएं बनती हैं। लड़की को इतना भावुक नहीं होना चाहिए।

मीरा पहली बार उठी। वह शांत और सीधी खड़ी थी।

—लड़की भावुक नहीं है। लड़की को धोखा दिया गया है।

राघव के पिता ने स्वर भारी किया।

—शर्मा जी, यह पारिवारिक बात है। इतने लोगों के सामने तमाशा करने की क्या जरूरत थी?

दिनेश ने पहली बार सीधा जवाब दिया।

—तमाशा मैंने नहीं किया। आपकी तरफ से मंच पर घोषणा हुई थी। मेरी बेटी को उसकी जिंदगी की खबर मेहमानों के साथ सुनाई जा रही थी।

भीड़ में फुसफुसाहट बढ़ने लगी। अनन्या की सहेलियां एक तरफ खड़ी थीं, आंखों में अविश्वास। उसके स्कूल की 2 साथी शिक्षिकाएं भी आई थीं। उनमें से एक ने धीरे से कहा कि अनन्या ने तो कल ही अगले सत्र की छात्र सलाह योजना बनाई थी। यह बात छोटे से तीर की तरह हवा में गई और अनन्या के दिल में उतर गई।

राघव ने नरम बनने की कोशिश की। वह मंच से उतरा और अनन्या के पास आया।

—सुनो, मैं तुम्हें चोट नहीं पहुंचाना चाहता था। मैं बस हमारे लिए बेहतर भविष्य बना रहा था।

—हमारे लिए?

—हां। तुम्हारे लिए, मेरे लिए। दिल्ली में तुम हर बात अपने पापा से पूछती हो। हर बच्चे की परेशानी घर ले आती हो। तुम्हें खुद पता नहीं कि तुम कितनी थक चुकी हो।

—तो समाधान यह था कि मुझे बताए बिना मेरी नौकरी, शहर, घर और पिता का मकान सब तय कर दो?

—मैं तुम्हारा पति बनने वाला हूं।

अनन्या की आंखें नम थीं, पर अब उनमें धुंध नहीं थी।

—पति बनने वाले थे। मालिक नहीं।

राघव का चेहरा बदल गया।

—तुम अपने पिता की बातों में आ रही हो। वह शुरू से मुझे पसंद नहीं करते थे। उन्होंने ड्राइवर बनकर मेरी जासूसी की।

दिनेश ने सिर झुका लिया। यह आरोप पूरी तरह झूठ नहीं था, और वही उसे सबसे ज्यादा चुभ रहा था।

—अनन्या, मैं मानता हूं कि मुझे पहले तुझसे बात करनी चाहिए थी। मुझे डर था कि तू मुझ पर भरोसा नहीं करेगी। शायद मैंने गलत किया। पर मैंने तेरे लिए फैसला नहीं किया। मैंने बस वह दिखाया जो तुझसे छिपाया गया था।

अनन्या ने पिता को देखा। 2 हफ्तों की नाराजगी, पुराने झगड़े, बचपन की सुरक्षा, युवावस्था की घुटन—सब उसकी आंखों में एक साथ आए। वह जानती थी कि पिता ने सीमा पार की थी, मगर यह भी सच था कि राघव ने उसकी पूरी जिंदगी को सीमा मानने से इनकार कर दिया था।

राघव ने जेब से अंगूठी का डिब्बा निकाला, जैसे दृश्य को फिर से अपने नियंत्रण में लेना चाहता हो।

—अनन्या, देखो, हम इस पर बाद में बात कर सकते हैं। अभी सबके सामने यह मत करो। लोग क्या कहेंगे?

अनन्या के होंठों पर एक बहुत हल्की, बहुत दुखी मुस्कान आई।

—तुम्हें अब भी लोगों की चिंता है। मेरी नहीं।

उसने अपनी उंगली से सगाई की अंगूठी निकाली। आसपास खड़े लोगों ने सांस रोक ली। ढोल वाला भी ढोल पर हाथ रखकर चुप खड़ा था। फोटोग्राफर ने कैमरा नीचे कर लिया।

—राघव, मैं मानती हूं कि तुमने मुझसे प्यार किया होगा। शायद अपने तरीके से। लेकिन तुम्हारे तरीके में मेरी जगह नहीं थी। उसमें मेरी आवाज नहीं थी।

राघव की आंखें फैल गईं।

—तुम यह रिश्ता 1 गलतफहमी पर तोड़ रही हो?

अनन्या ने फाइल उठाई।

—गलतफहमी तब होती, जब 1 बात छिपती। यहां तो पूरी जिंदगी छिपाई गई।

उसने अंगूठी उसकी हथेली पर रख दी।

—यह शादी नहीं होगी।

फार्महाउस में कोई ताली नहीं बजी। यह जीत का पल नहीं था। यह उस सपने का अंतिम संस्कार था जिसे अनन्या ने सच माना था। मीरा तेजी से आगे आई और बेटी को गले लगा लिया। अनन्या पहले तो सीधी खड़ी रही, फिर जैसे भीतर से टूट गई। उसने मां के कंधे पर सिर रख दिया और रो पड़ी।

राघव के परिवार ने बात संभालने की कोशिश की। कोई कह रहा था कि लड़की भावुक है, कोई कह रहा था कि शर्मा परिवार ने अपमान किया, कोई कह रहा था कि यह सब कमरे में होना चाहिए था। संजय वर्मा ने शांत आवाज में सुरक्षा वालों से कहा कि कोई कागज छीने नहीं, कोई मेहमान पर हाथ न उठाए। फार्महाउस का चमकदार समारोह धीरे-धीरे बिखरने लगा।

राघव आखिरी बार अनन्या के सामने आया। उसकी आवाज धीमी थी।

—तुम पछताओगी।

अनन्या ने आंसू पोंछे।

—हो सकता है। लेकिन वह पछतावा मेरा होगा। किसी और द्वारा लिखा हुआ जीवन नहीं।

राघव बिना पीछे देखे चला गया।

उस रात घर लौटते समय गाड़ी में कोई नहीं बोला। दिल्ली की सड़कें आधी रात को भी जाग रही थीं, मगर शर्मा परिवार के भीतर एक भारी शून्य था। अनन्या पिछली सीट पर बैठी थी। वही सीट, जहां राघव बैठकर उसकी जिंदगी की योजनाएं बना रहा था। दिनेश गाड़ी चला रहा था, मगर आज वह पहली बार सचमुच थका हुआ लग रहा था।

घर पहुंचकर अनन्या सीधे अपने पुराने कमरे में चली गई। दीवार पर अभी भी 12वीं की एक ट्रॉफी रखी थी, एक फ्रेम में स्कूल की पुरानी फोटो और एक कोने में पीला छोटा हेलमेट, जो बचपन में दिनेश उसे अपने काम की साइट पर ले जाते समय पहनाता था।

सुबह उसने किसी से बात नहीं की।

अगले 15 दिन मुश्किल थे। शादी रद्द करनी पड़ी। रिश्तेदारों के फोन आए। कुछ ने कहा कि लड़की ने सही किया, कुछ ने कहा कि इतने बड़े घर से रिश्ता तोड़ना मूर्खता है। राघव ने कई संदेश भेजे। कभी प्यार, कभी गुस्सा, कभी पछतावा, कभी आरोप। अनन्या ने केवल 1 बार जवाब दिया।

—मेरे फैसले पर अब मेरी ही मुहर होगी।

उसके बाद उसने नंबर बंद कर दिया।

दिनेश ने उससे माफी मांगने की कोशिश की, पर अनन्या तैयार नहीं थी।

—पापा, आपने मेरी मदद की, पर आपने मुझ पर भरोसा नहीं किया।

दिनेश ने सिर झुका लिया।

—सच है।

—आपको मुझे पहले बताना चाहिए था।

—हां।

—अगर मैं आपकी बात न मानती, तब भी वह मेरा अधिकार था।

दिनेश की आंखें भर आईं।

—यह बात मुझे बहुत देर से समझ आई।

अनन्या ने जवाब नहीं दिया। पर उसने दरवाजा बंद भी नहीं किया।

धीरे-धीरे घर में चुप्पी थोड़ी नरम होने लगी। मीरा हर शाम चाय में अदरक ज्यादा डालती। दिनेश बाहर बरामदे में बैठकर पुराने रेडियो को ठीक करता। अनन्या स्कूल लौट गई। पहले दिन बच्चों ने उसे घेर लिया। 1 लड़की, जिसकी मां-बाप की लड़ाई चल रही थी, ने उससे पूछा कि क्या बड़े लोग हमेशा सही फैसला लेते हैं। अनन्या बहुत देर तक उसे देखती रही, फिर बोली:

—नहीं। लेकिन सही फैसला लेने की कोशिश छोड़नी नहीं चाहिए।

उस दिन वह घर आकर बहुत रोई। मगर उन आंसुओं में हार नहीं थी। वे लौटने की शुरुआत थे।

3 महीने बाद रविवार को वह मिठाई का डिब्बा लेकर आई। दिनेश बरामदे में पुराने पंखे की वायरिंग ठीक कर रहा था। उसने बिना देखे कहा:

—मीरा, प्लास दे देना।

अनन्या ने प्लास उसके हाथ में रख दिया।

दिनेश ने चौंककर देखा।

—तू?

—हां। और यह जलेबी है। मां को मत बताना, डॉक्टर ने आपको मीठा कम कहा है।

दिनेश हंस पड़ा, पर आवाज में कंपकंपी थी।

वे रसोई में बैठे। मीरा ने चाय बनाई। अनन्या ने अपने बैग से एक फाइल निकाली। दिनेश का चेहरा फिर डर से भर गया।

—अब कौन सी फाइल?

अनन्या हल्का सा मुस्कराई।

—इस बार मेरी फाइल है। मैंने पारिवारिक काउंसलिंग की 1 साल की ट्रेनिंग के लिए आवेदन किया है। और स्कूल ने मुझे वरिष्ठ काउंसलर बना दिया है।

मीरा ने उसके माथे को चूमा।

—मुझे पता था मेरी बेटी और चमकेगी।

अनन्या ने दूसरा कागज निकाला।

—मैंने एक छोटा फ्लैट भी देख लिया है। स्कूल से 15 मिनट दूर। बड़ा नहीं है, पर मेरा होगा। किसी संयुक्त नियंत्रण में नहीं।

दिनेश ने उसे देखा। उसकी आंखों में गर्व और पछतावा साथ-साथ थे।

—तू हमेशा से अपना घर खुद रोशन करने वाली लड़की थी।

अनन्या ने धीरे से कहा:

—पापा, आप बहुत परेशान करने वाले हैं।

दिनेश ने सांस छोड़ी।

—यह तो पुरानी बात है।

—बहुत ज्यादा परेशान करने वाले।

—यह भी मानता हूं।

वह कुछ पल चुप रही। फिर उसके चेहरे की कठोरता पिघल गई।

—लेकिन उस रात अगर आप खड़े नहीं होते, तो शायद मैं अपनी ही शादी में अपनी आवाज खो देती।

दिनेश कुछ बोल नहीं पाया।

अनन्या ने उसका हाथ पकड़ लिया।

—धन्यवाद। और अगली बार, मेरी जिंदगी का स्विच मुझे खुद छूने देना।

दिनेश ने सिर हिलाया।

—वादा।

1 साल बाद अनन्या अपने छोटे फ्लैट में रहती थी। दीवारों पर हल्के रंग, बालकनी में तुलसी और मनी प्लांट, और दरवाजे के पास एक भूरा आवारा कुत्ता, जिसे उसने सड़क से अपनाया था। उसका नाम उसने “फ्यूज” रखा था। मीरा ने पूछा था कि इतना अजीब नाम क्यों, तो अनन्या ने हंसकर कहा था कि शर्मा परिवार में खराब कनेक्शन ठीक करने की परंपरा है।

राघव सचमुच बेंगलुरु चला गया। कुछ लोगों ने बताया कि उसकी नौकरी अच्छी चल रही है, मगर वह अब पहले जैसा आत्मविश्वासी नहीं दिखता। शायद पहली बार उसे समझ आया था कि किसी को प्यार करना और किसी की जिंदगी चलाना 2 अलग बातें हैं।

दिनेश ने कैब चलाना छोड़ दिया। उसे अब रास्ते पर निकलकर किसी और की बातचीत सुनने की जरूरत नहीं थी। वह फिर अपने पुराने औजारों के पास लौट आया। पड़ोस की आंटी का पंखा ठीक करता, मंदिर की ट्यूबलाइट बदलता, बच्चों की साइकिल में घंटी लगाता। पर अब वह हर काम के बाद मीरा से कहता:

—जिस चीज में करंट हो, उसे पूछकर ही छूना चाहिए।

मीरा मुस्कराती।

—तुझे यह बात समझने में 62 साल लगे।

एक शाम अनन्या ने उसे अपने फ्लैट में बुलाया। दीवार पर शेल्फ लगानी थी। दिनेश ड्रिल मशीन लेकर पहुंचा। फ्यूज उसके पैरों के पास पूंछ हिलाता रहा। अनन्या ने एक पुरानी फोटो फ्रेम में लगाकर मेज पर रखी। फोटो में 8 साल की अनन्या पीला हेलमेट पहने दिनेश के कंधों पर बैठी थी। पीछे अधबना मकान था और दिनेश के हाथ में प्लास।

दिनेश ने फोटो उठाई।

—याद है? तू मजदूरों को आदेश दे रही थी कि बल्ब कहां लगना चाहिए।

अनन्या हंसी।

—शायद मुझे हमेशा से तय करना पसंद था।

दिनेश ने शेल्फ पर आखिरी पेंच कसते हुए कहा:

—और तुझे कभी इसके लिए माफी नहीं मांगनी चाहिए।

अनन्या चुप रही। फिर उसने धीरे से पिता के कंधे पर सिर रख दिया। कोई बड़ा संवाद नहीं हुआ, कोई फिल्मी संगीत नहीं बजा, कोई ताली नहीं पड़ी। बस एक छोटे फ्लैट में शाम की रोशनी फैल रही थी, जैसे लंबे अंधेरे के बाद कोई घर फिर से सांस ले रहा हो।

दिनेश ने जिंदगी भर तार जोड़े थे। उसने देखा था कि गलत जोड़ छिपे रहें तो पूरी दीवार जला सकते हैं। पर उसने यह भी देखा था कि समय रहते सच का स्विच दब जाए, तो घर जलता नहीं।

बस फिर से रोशनी लौट आती है।

Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.