Posted in

अपने ही अंतिम संस्कार में ताबूत के भीतर जिंदा पड़ा पति सब सुनता रहा, पत्नी फुसफुसाई “सूर्यास्त से पहले जला दो”, लेकिन कूड़े में मिली छोटी शीशी ने ऐसा सच खोला कि पूरा परिवार कांप उठा और श्मशान की आग रुक गई

PART 1

Advertisements

—अगर सूर्यास्त से पहले इनका दाह संस्कार नहीं हुआ, तो हमारी पूरी योजना खत्म हो जाएगी —काव्या ने अपने पति के ताबूत के पास खड़े होकर बहुत धीमी आवाज़ में कहा।

लकड़ी के उस बंद बक्से के भीतर आरव मल्होत्रा ने हर शब्द सुन लिया।

Advertisements

उसकी आंखें नहीं खुल रही थीं। उंगलियां नहीं हिल रही थीं। छाती में सांस जैसे किसी ने पत्थर के नीचे दबा दी थी। शरीर ठंडा, भारी और पराया लग रहा था, मगर दिमाग पूरी तरह जाग रहा था। गेंदे और चमेली की मालाओं की गंध उसके गले में चुभ रही थी। पास बैठी औरतों का राम नाम सत्य का धीमा जाप उसके सिर में हथौड़े की तरह बज रहा था।

पहले उसे लगा, यह कोई डरावना सपना है।

फिर उसने अपनी मां की टूटी हुई आवाज़ सुनी।

—मेरा बेटा ऐसे नहीं जा सकता था… भगवान ने मेरे साथ ऐसा क्यों किया…

आरव चीखना चाहता था, मां, मैं जिंदा हूं।

लेकिन उसके होंठों से हवा तक नहीं निकली।

उसे आखिरी बात याद थी। जयपुर के सिविल लाइंस वाले घर में रात के करीब 10 बजे काव्या उसके कमरे में आई थी। हाथ में केसर वाला दूध था। पिछले 3 हफ्तों से आरव बहुत कमजोर महसूस कर रहा था। अचानक चक्कर आना, पसीना, धीमी धड़कन, हाथ-पैर सुन्न होना। काव्या हर बार कहती, काम का तनाव है। डॉक्टर बत्रा कहते, शायद दिल की लय बिगड़ रही है। और समीर, वही फिटनेस कोच जिसे काव्या ने “आरव की सेहत के लिए” रखा था, हमेशा मुस्कुराकर कहता, भाई साहब, शरीर को आराम चाहिए।

उस रात काव्या ने दूध उसके होंठों तक लाकर कहा था—

—पी लीजिए, जान। इससे नींद अच्छी आएगी।

Advertisements

दूध मीठा था, मगर नीचे कहीं हल्की कड़वाहट छिपी थी।

फिर नींद आई।

फिर अंधेरा।

और अब वह अपने ही अंतिम संस्कार की तैयारी सुन रहा था।

घर के आंगन में सफेद चादरें बिछी थीं। रिश्तेदारों के चेहरे दुख से ज्यादा औपचारिकता से भरे थे। पड़ोस की औरतें धीरे-धीरे फुसफुसा रही थीं। उसके ऑटो पार्ट्स के शोरूम के कर्मचारी आंखें झुकाए खड़े थे। मां, शकुंतला देवी, ताबूत के पास बैठी थीं, जैसे किसी ने उनकी रीढ़ से जीवन खींच लिया हो।

काव्या का रोना बिल्कुल सही जगह पर शुरू होता था और बिल्कुल सही जगह पर रुकता था।

जब कोई उसके पास आता, वह पल्लू आंखों पर रखकर कहती—

—सब कुछ अचानक हो गया… आरव तो कल रात तक ठीक थे…

लेकिन जैसे ही लोग दूर जाते, उसकी आवाज़ बदल जाती।

—मुझे यह नाटक और नहीं झेलना —उसने दांत भींचकर कहा।

एक पुरुष की धीमी आवाज़ आई—

—बस कुछ घंटे। इलेक्ट्रिक शवदाह गृह में 6:30 बजे का समय मिल गया है।

आरव ने उस आवाज़ को पहचान लिया।

समीर।

वही आदमी जो घर में दोस्त बनकर आता था। वही जो काव्या के बहुत पास खड़ा रहता था। वही जिसे देखकर आरव का छोटा भाई निखिल कई बार तमतमा उठा था।

—भाभी उसे तुम्हारी पत्नी जैसी नहीं देखतीं —निखिल ने एक बार साफ कहा था— वह तुम्हें संपत्ति की तरह देखती हैं।

आरव ने उस दिन गुस्से में निखिल से बात बंद कर दी थी।

अब लकड़ी के भीतर कैद पड़ा वह समझ रहा था कि सच देखने वाला अकेला वही था।

दोपहर तक निखिल आया। उसके कदम भारी थे, मगर उनमें घबराहट से ज्यादा आग थी। वह ताबूत के पास झुका।

—भैया, कुछ तो गड़बड़ है। मैं कसम खाकर कहता हूं, यह मौत सीधी नहीं है।

काव्या तुरंत पास आ गई।

—निखिल, आज के दिन तमाशा मत करो। तुम्हारे भैया दिल के दौरे से गए हैं।

—दिल का दौरा? —निखिल की आवाज़ कांपी नहीं— 1 महीने पहले आदमी दुकान संभाल रहा था। फिर हर रात तुम्हारे हाथ का दूध पीकर बुझने लगा।

काव्या ने आंखें फैलाकर देखा।

—तुम मुझ पर इल्जाम लगा रहे हो?

—मैं पूछ रहा हूं कि इतनी जल्दी जलाने की क्या पड़ी है?

आंगन में अचानक चुप्पी गिर गई। यहां तक कि मंत्र पढ़ता पंडित भी रुक गया।

काव्या ने आंसू बहाए।

—यह आरव की इच्छा थी।

झूठ।

आरव ने कभी ऐसा नहीं कहा था। वह हमेशा कहता था कि उसे अपने पिता के पास पुरानी हवेली वाले श्मशान में ही विदा करना।

निखिल को भी यह बात पता थी।

करीब 2 बजे निखिल ने कहा कि वह आरव का सफेद कुर्ता लेने घर जा रहा है। काव्या के चेहरे पर पल भर के लिए डर चमका, फिर उसने चाबी उसकी हथेली पर रख दी।

—जल्दी लौटना। 6 बजे निकलना है।

निखिल बिना कुछ बोले घर पहुंचा।

घर डरावनी तरह से साफ था। सिंक खाली, बिस्तर खिंचा हुआ, दवा की शीशियां गायब। जैसे किसी ने एक बीमार आदमी के सारे निशान मिटा दिए हों।

वह सीधे रसोई में गया। मसालों के डिब्बे, आयुर्वेदिक चूर्ण, प्रोटीन पाउडर, दूध का भगोना, सब देखा। कुछ नहीं मिला। फिर उसकी नजर पीछे की सर्विस बालकनी में रखे काले कूड़े के थैले पर पड़ी। थैला बांधकर कोने में छिपाया गया था।

उसने हाथ में रूमाल लपेटा और कूड़ा खोलना शुरू किया।

संतरे के छिलकों, गीले टिशू और चायपत्ती के बीच उसे कांच की एक छोटी शीशी मिली। उस पर कोई नाम नहीं था। अंदर तल में पारदर्शी, चिपचिपी सी एक बूंद बची थी।

निखिल की गर्दन के पीछे ठंड उतर गई।

उसने तुरंत डॉ. मीरा सेन को फोन किया, जो फॉरेंसिक केमिस्ट्री विभाग में काम करती थीं और कॉलेज के दिनों से उसे जानती थीं।

—मीरा, आज ही एक चीज़ जांचनी है।

—निखिल, प्रयोगशाला कोई फिल्म नहीं है।

—मेरा भाई शायद मरा नहीं है। उसे सुन्न करके जलाने ले जा रहे हैं।

दूसरी तरफ सन्नाटा छा गया।

—अभी आओ।

उधर ताबूत के भीतर आरव अपनी पत्नी की चूड़ियों की खनक सुन रहा था। फिर काव्या उसके सिर के पास झुकी। उसका इत्र लकड़ी की दरारों से भीतर आया।

—माफ करना, आरव —वह फुसफुसाई— मगर जिंदा पति से ज्यादा काम का मरा हुआ पति होता है।

इसके बाद ढक्कन पर तेज आवाज़ हुई।

ताबूत बंद कर दिया गया।

और आरव समझ गया कि उसे आग की तरफ ले जाया जा रहा है।

PART 2

पहला कुंडा लगा तो आरव के भीतर अंधेरा और गहरा हो गया।

दूसरा लगा तो उसे लगा, दुनिया ने उसे सचमुच मृत मान लिया है।

तीसरा लगा तो ताबूत उठाया गया।

हर झटका उसके मन में एक ही बात ठोक रहा था—श्मशान।

प्रयोगशाला में डॉ. मीरा ने शीशी ली, दस्ताने पहने और बिना सवाल किए अंदर चली गईं। निखिल गलियारे में पागलों की तरह चक्कर काटता रहा। उसने काव्या को फोन किया। कॉल काट दी गई। उसने मां को फोन नहीं किया। वह उन्हें दूसरी बार मार नहीं सकता था।

38 मिनट बाद मीरा बाहर आईं। उनका चेहरा पीला था।

—यह कोई घरेलू दवा नहीं है।

—क्या है?

—प्रारंभिक जांच में ऐसा रसायन मिला है जो शरीर की मांसपेशियों को निष्क्रिय कर सकता है। धड़कन और सांस इतनी धीमी हो सकती है कि आदमी मृत दिखे।

निखिल की आंखें भर आईं।

—होश रह सकता है?

मीरा ने नजर झुका ली।

—हां।

निखिल पुलिस थाने भागा। ड्यूटी अफसर ने पहले उसे पागल समझा। फिर उसने शीशी, रिपोर्ट, काव्या और समीर की छुपी हुई तस्वीरें, और आरव के पुराने वॉयस मैसेज दिखाए जिनमें वह हर रात दूध पीने के बाद अजीब कमजोरी की बात कर रहा था।

इंस्पेक्टर देशमुख ने सब देखा।

—सिर्फ शक पर दाह संस्कार नहीं रुकता।

निखिल मेज पर झुक गया।

—अगर मैं गलत हूं तो मुझे जेल भेज दीजिए। अगर आप गलत हुए, तो मेरे भाई को जिंदा जला देंगे।

देशमुख की आंखें बदल गईं।

उन्होंने वायरलेस उठाया।

—विद्युत शवदाह गृह को तुरंत रोको।

लेकिन श्मशान में इंतजार का समय खत्म हो चुका था।

एक कर्मचारी ने काव्या से कहा—

—मैडम, अब प्रक्रिया शुरू कर सकते हैं।

काव्या ने बहुत जल्दी सिर हिलाया।

—कर दीजिए।

ताबूत लोहे की पटरी पर आगे बढ़ा।

भीतर आरव ने आखिरी ताकत से गला धकेला।

शब्द नहीं निकला।

सिर्फ टूटी हुई कराह।

कर्मचारी रुक गया।

—कुछ आवाज़ आई?

काव्या चिल्लाई—

—लकड़ी की होगी। आगे बढ़ाइए।

और तभी बाहर सायरनों ने शाम को चीर दिया।

PART 3

—भट्टी बंद करो! ताबूत अभी खोलो! —इंस्पेक्टर देशमुख की आवाज़ विद्युत शवदाह गृह की दीवारों से टकराकर गूंज गई।

काव्या जैसे पत्थर बन गई। उसके माथे की बिंदी पसीने में बह गई थी। समीर ने चुपचाप पीछे के दरवाजे की तरफ बढ़ने की कोशिश की, मगर एक कांस्टेबल ने उसका हाथ पकड़ लिया।

—कहीं नहीं जाना है।

—मैं तो बस… पानी लेने जा रहा था —समीर ने कहा, मगर उसकी आवाज़ में पानी से ज्यादा डर था।

निखिल इंस्पेक्टर के पीछे भागता हुआ अंदर आया। उसके साथ डॉक्टर बत्रा भी थे, जिनके हाथ कांप रहे थे। आरव का ताबूत लोहे की पटरी पर आधा भट्टी की तरफ जा चुका था। अंदर से गर्मी की लहर उठ रही थी।

—भैया! —निखिल चीखा— बस 1 बार हिम्मत कर लो!

कर्मचारी घबराकर पीछे हट गए। एक आदमी कुंडे खोलने लगा, मगर उसके हाथ इतने कांप रहे थे कि चाबी गिर गई। निखिल ने उसे धक्का नहीं दिया, बस उसके हाथ से चाबी लेकर खुद झुक गया।

एक।

दो।

तीन।

ढक्कन उठा।

सभी लोग ठिठक गए।

आरव सफेद कपड़ों में कठोर पड़ा था। होंठ नीले, त्वचा राख जैसी, आंखें बंद। गले पर माला आधी खिसक गई थी। देखने वाला कोई भी उसे मृत ही कहता।

काव्या ने राहत की सांस ली, मगर वह राहत बहुत जल्दी दिखाई दे गई।

—देख लिया आपने? —वह रोने का अभिनय करते हुए बोली— मेरे पति को शांति भी नहीं लेने दी जा रही।

डॉक्टर बत्रा ने ताबूत के पास आकर आरव की गर्दन छुई। फिर कलाई पकड़ी। उनकी उंगलियां स्थिर होने की कोशिश कर रही थीं।

—रुकिए…

उन्होंने छोटी टॉर्च निकाली और आरव की पुतलियों पर रोशनी डाली।

उनका चेहरा बदल गया।

—प्रतिक्रिया है।

काव्या पीछे हट गई।

—नहीं… यह संभव नहीं…

निखिल ने आरव का हाथ पकड़ लिया। वह हाथ बर्फ जैसा था, लेकिन पूरी तरह निर्जीव नहीं।

—भैया, मैं निखिल हूं। अगर सुन रहे हो तो कुछ करो। कुछ भी।

आरव के भीतर दुनिया आग और अंधेरे के बीच फंसी थी। उसे मां का रोना याद आया। काव्या की फुसफुसाहट याद आई। समीर की आवाज़ याद आई। और यह भी याद आया कि उसने अपने भाई को कितनी बार गलत समझा था।

उसने अपनी सारी बची हुई चेतना एक उंगली में इकट्ठी की।

पहले कुछ नहीं हुआ।

फिर उसकी तर्जनी हल्की सी कांपी।

इतनी हल्की कि जैसे हवा ने छुआ हो।

लेकिन वहां मौजूद हर आंख ने उसे देखा।

निखिल टूट गया।

—जिंदा है! मेरे भैया जिंदा हैं!

अगले 5 मिनट अराजकता में बदल गए। एम्बुलेंस के पैरामेडिक दौड़े। ऑक्सीजन मास्क लगाया गया। नाड़ी बेहद कमजोर थी। रक्तचाप खतरनाक रूप से नीचे। एक पैरामेडिक ने इंस्पेक्टर को देखा।

—अगर 5 मिनट और देर होती, तो इन्हें कोई नहीं बचा सकता था।

काव्या अब सचमुच रो रही थी, लेकिन अब वह दुख नहीं था। वह भय था। वह उस औरत का भय था जिसे पहली बार समझ आया कि दफनाया हुआ सच सांस ले सकता है।

—मुझे नहीं पता था… मैंने तो समझा…

आरव ने मुश्किल से आंखें खोलीं। पलकें भारी थीं, मगर उसकी नजर सीधी काव्या पर गई।

उस नजर में दूध का स्वाद था। बंद ताबूत का अंधेरा था। भट्टी की गर्मी थी। और वह वाक्य था—जिंदा पति से ज्यादा काम का मरा हुआ पति।

काव्या समझ गई कि उसने सब सुना है।

समीर ने सिर झुका लिया। उसके हाथों में हथकड़ी लग गई।

आरव को तुरंत सवाई मानसिंह अस्पताल ले जाया गया। 19 दिन वह गहन चिकित्सा कक्ष में रहा। डॉक्टरों ने बताया कि उसके शरीर में जिस रसायन के अंश मिले, वे साधारण जांच में आसानी से नहीं पकड़ आते। सही मात्रा में दिया जाए तो आदमी को लगभग मृत जैसा दिखा सकता है। गलत मात्रा जान ले सकती है। काव्या ने यह खेल कई रातों तक धीरे-धीरे खेला था, ताकि बीमारी प्राकृतिक लगे।

शकुंतला देवी अस्पताल के कॉरिडोर में बैठकर हर दिन भगवान से एक ही बात मांगती रहीं—बेटा आंख खोल दे। निखिल हर रिपोर्ट पढ़ता, हर डॉक्टर से सवाल करता, हर पुलिस कॉल का जवाब देता। वह अब भाई नहीं, पहरेदार था।

मीरा ने अपनी प्रारंभिक जांच को आधिकारिक रिपोर्ट में बदला। डॉक्टर बत्रा ने स्वीकार किया कि मृत्यु प्रमाणपत्र जल्दी में जारी हुआ था। उन्होंने लिखा कि काव्या ने अस्पताल ले जाने से मना किया था और बार-बार कहा था कि आरव अस्पतालों से डरता है। जबकि आरव अपने पिता के आखिरी इलाज में 4 महीने तक अस्पताल में रहा था और कभी पीछे नहीं हटा था।

जब आरव ने पहली बार बोलने की ताकत पाई, उसने निखिल को बुलवाया।

निखिल कुर्सी पर बैठा तो आरव ने बहुत धीमे कहा—

—तू आया था।

निखिल की आंखें भर आईं।

—मैं देर से आया, भैया।

—नहीं। आग से पहले आ गया। वही काफी है।

दोनों भाइयों के बीच वर्षों की गलतफहमी उस एक वाक्य में पिघल गई। अस्पताल के कमरे में मशीनें बीप कर रही थीं, बाहर चायवाला आवाज़ लगा रहा था, मगर उस पल दुनिया में सिर्फ 2 भाई थे—एक जिसने मौत के भीतर से लौटना सीखा, और एक जिसने कूड़े में झुककर सच उठाया।

जांच आगे बढ़ी तो कहानी और गंदी निकली।

काव्या और समीर का संबंध 14 महीने पुराना था। दोनों ने आरव की बीमा पॉलिसी बदलवाने की कोशिश की थी। काव्या चाहती थी कि सिविल लाइंस वाला घर उसके नाम हो जाए, शोरूम बिक जाए और पैसा लेकर वह समीर के साथ गुड़गांव में नई जिंदगी शुरू करे। आरव ने कुछ कागजों पर हस्ताक्षर करने से मना कर दिया था। उसी रात से उसका “स्वास्थ्य” गिरने लगा।

पुलिस ने घर के सीसीटीवी फुटेज बरामद किए। कई रातों में समीर रसोई में दिखा। कभी दूध के पास, कभी दवा के डिब्बे के पास। काव्या के फोन से हटाए गए संदेश भी वापस मिले।

“धीरे देना, अचानक मौत शक पैदा करेगी।”

“अगर धड़कन बहुत धीमी हो जाए तो डॉक्टर दिल का मामला लिख देगा।”

“जल्दी दाह संस्कार जरूरी है।”

ये पंक्तियां अदालत में पढ़ी गईं तो पूरा कमरा सन्न रह गया।

काव्या ने पहले खुद को पीड़ित पत्नी कहा। उसने दावा किया कि समीर ने उसे फंसाया। समीर ने कहा कि काव्या ही सबकी मास्टरमाइंड थी। दोनों एक-दूसरे को बचाने के बजाय खींचने लगे। वही प्रेम, जिसके लिए वे हत्या तक पहुंचे थे, पहले ही सवाल में बिखर गया।

मुकदमा जयपुर में चर्चा का विषय बन गया। अखबारों ने लिखा—“आग से 5 मिनट पहले बचा व्यापारी।” सोशल मीडिया पर लोग गुस्से से भर गए। कोई कहता, ऐसी औरत को पत्नी कहना भी पाप है। कोई पूछता, डॉक्टर ने बिना गहराई से जांच किए प्रमाणपत्र कैसे दे दिया। कोई निखिल को भाई नहीं, भगवान का भेजा हुआ पहरा कहता।

लेकिन आरव इन शोरों से दूर रहा।

उसका शरीर धीरे-धीरे ठीक हो रहा था। पहले उसने गर्दन मोड़ना सीखा। फिर उंगलियां। फिर बैठना। 7 सप्ताह बाद उसने वॉकर पकड़ा। 3 महीने बाद वह अदालत में अपनी गवाही देने पहुंचा।

उस दिन वह बहुत कमजोर दिख रहा था, पर उसकी आवाज़ साफ थी।

जज ने पूछा—

—क्या आपको कुछ याद है?

आरव ने काव्या की तरफ देखा। वह सफेद सूट में बैठी थी, आंखों में बनावटी पश्चाताप लेकर।

—सब याद है —आरव ने कहा— मैं ताबूत में था। मैं सुन रहा था। मेरी पत्नी दाह संस्कार की जल्दी कर रही थी। उसने कहा था कि मरा हुआ पति जिंदा पति से ज्यादा काम का होता है।

अदालत में किसी ने सांस तक नहीं ली।

काव्या का चेहरा ढह गया।

फैसला आने में 11 महीने लगे। काव्या और समीर को हत्या के प्रयास, आपराधिक षड्यंत्र, विषैले रसायन के इस्तेमाल और सबूत मिटाने के अपराध में लंबी सजा मिली। डॉक्टर बत्रा का लाइसेंस निलंबित हुआ, और उनकी लापरवाही पर अलग कार्रवाई चली। इंस्पेक्टर देशमुख ने बाद में कहा कि उस दिन अगर निखिल मेज पर हाथ मारकर वह सवाल न पूछता, तो शायद पुलिस कागज पूरे होने का इंतजार करती रहती।

फैसला सुनते समय आरव ने खुशी महसूस नहीं की।

उसे सिर्फ भारी थकान महसूस हुई। वह अपने ही भरोसे की राख पर बैठा आदमी था। जिस औरत के लिए उसने मां से बहस की, भाई से दूरी बनाई, घर के दरवाजे खोले, उसी ने उसे लकड़ी के बक्से में बंद कर दिया था।

अदालत से बाहर निकलते हुए निखिल ने पूछा—

—अब क्या करोगे?

आरव ने लंबे समय बाद आकाश देखा। बारिश के बाद जयपुर की हवा साफ थी। दूर कहीं मंदिर की घंटी बज रही थी।

—जीऊंगा —उसने कहा— इस बार आंखें खोलकर।

उसने सिविल लाइंस वाला घर बेच दिया। काव्या से जुड़े हर खाते बंद किए। बीमा की रकम का बड़ा हिस्सा घरेलू हिंसा और चिकित्सकीय लापरवाही के पीड़ितों की मदद करने वाली संस्था को दान किया। शोरूम निखिल के साथ मिलकर फिर शुरू किया, लेकिन अब वहां एक नियम लगा—कोई भी कर्मचारी बीमार पड़े तो उसे तुरंत अस्पताल भेजा जाएगा, घरेलू अंदाजों पर जान नहीं छोड़ी जाएगी।

शकुंतला देवी ने बेटे को वापस पाकर जैसे उम्र से समझौता कर लिया। वह हर सुबह उसके लिए तुलसी वाली चाय बनातीं, मगर कप उसके सामने रखकर मुस्कुरातीं—

—खुद देख ले, बेटा। अब मां भी तुझे बिना पूछे कुछ नहीं पिलाएगी।

आरव हल्का सा हंस देता। उस हंसी में दर्द भी था और बच जाने का आभार भी।

वह कभी फिर बंद कमरे में नहीं सो पाया। रात में दरवाजा आधा खुला रखता। भट्टी की गर्मी कभी-कभी सपने में लौट आती। ताबूत की लकड़ी की गंध उसे अचानक पसीने से भर देती। लेकिन हर बार निखिल कमरे में आकर कहता—

—मैं बाहर हूं।

और आरव की सांस धीरे-धीरे सामान्य हो जाती।

1 साल बाद, पिता की बरसी पर, आरव पुराने श्मशान घाट गया। वहां पीपल के पेड़ के नीचे पिता की स्मृति में छोटा सा पत्थर लगा था। उसने गेंदे के फूल रखे, आंखें बंद कीं और बहुत देर तक खड़ा रहा।

फिर धीमे से बोला—

—पापा, इस बार मैं आपके पास आने वाला था। मगर निखिल ने बीच रास्ते से वापस खींच लिया।

हवा चली। फूलों की खुशबू उठी। दूर से किसी अंतिम यात्रा की आवाज़ आई, मगर इस बार आरव ने डरकर आंखें बंद नहीं कीं।

उसे समझ आ चुका था कि चमत्कार हमेशा आसमान से नहीं उतरते।

कभी-कभी चमत्कार एक जिद्दी भाई के रूप में आता है।

कभी वह कूड़े के थैले में छिपी छोटी शीशी बनकर सच बोलता है।

कभी वह उस पुलिस वाले के दिल में उठी एक बेचैन शंका होता है, जो नियमों से पहले इंसान की सांस को चुन लेता है।

क्योंकि धोखा अक्सर सिंदूर लगाकर रोता है।

लालच अक्सर परिवार के सामने आंसू बहाता है।

लेकिन सच, चाहे उसे ताबूत में बंद कर दिया जाए, आग तक पहुंचने से पहले एक बार ढक्कन जरूर खटखटाता है।

Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.