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ऑफिस मीटिंग में देर से पहुँची लड़की लंगड़ा रही थी, सबने नजरें झुका लीं, लेकिन खतरनाक मालिक ने उसके गले के निशान देखकर पूछा, “किसने मारा?” और नीचे उसका प्रेमी 53 कॉल के साथ इंतज़ार कर रहा था…

भाग 1

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नैना शर्मा ने मीटिंग में देर से पहुँचने पर माफ़ी माँगी, लेकिन जब अर्जुन राठौड़ ने उसके लंगड़ाते कदमों को देखकर पूछा कि उसके घुटने पर चोट कैसे आई, तो पूरे कमरे की साँस जैसे अटक गई।

मुंबई के बांद्रा-कुर्ला कॉम्प्लेक्स की 38वीं मंज़िल पर काँच की दीवारों वाला वह कॉन्फ्रेंस रूम हमेशा करोड़ों की बातें सुनता था, मगर उस सुबह वहाँ एक औरत की छिपी हुई चीख सबसे ज़्यादा तेज़ थी। नैना सफेद कुर्ते और हल्के नीले दुपट्टे में खड़ी थी। दुपट्टा उसने गले के पास कुछ ज़्यादा ही कसकर लिया हुआ था, ताकि नीले निशान छिपे रहें। उसके हाथ में फाइल थी, मगर उंगलियाँ इतनी ज़ोर से मुड़ी थीं कि कागज़ के कोने हथेली में धँस गए थे।

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उसकी मैनेजर कविता मल्होत्रा ने झुंझलाकर कहा, “नैना, पर्सनल ड्रामा बाद में। पहले प्रोजेक्ट रिपोर्ट दो।”

लेकिन अर्जुन राठौड़ ने कविता की तरफ देखा भी नहीं। वह शहर का सबसे खतरनाक रियल एस्टेट मालिक माना जाता था। लोग कहते थे कि मुंबई की आधी ऊँची इमारतों की नींव में उसका पैसा था और आधे पुलिस वालों की चुप्पी में उसका नाम। वह कम बोलता था, मगर जब बोलता था तो बड़े-बड़े लोग भी अपनी कुर्सी सीधी कर लेते थे।

उसने नैना से फिर पूछा, “यह मोच नहीं है। किसने मारा?”

नैना के चेहरे का रंग उड़ गया। उसने धीमे से कहा, “सीढ़ियों से फिसल गई थी।”

अर्जुन की आँखें उसके गले, कंधे और घुटने पर ठहरती चली गईं। जैसे वह कपड़े नहीं, सच पढ़ रहा हो। कमरे में बैठे अधिकारी स्क्रीन पर झूठी व्यस्तता दिखाने लगे। किसी ने खाँसा, किसी ने पेन घुमाया, किसी ने नजर झुका ली। सबने चोट देखी थी, मगर किसी ने उसे सवाल नहीं बनाया था।

बैठक शुरू हुई। नैना ने किरायेदारों, मरम्मत, बजट और खाली फ्लैटों की रिपोर्ट आवाज़ काँपने दिए बिना पढ़ी। वह 4 साल से इसी इमारत की प्रॉपर्टी मैनेजर थी और उसने दर्द के साथ मुस्कुराना सीख लिया था। पिछली रात विक्रम ने उसे धक्का दिया था। सिर्फ इसलिए कि उसने उसके 5 कॉल तुरंत नहीं उठाए थे। घुटना सेंटर टेबल से टकराया था, कंधा दीवार से, और गले पर उसकी उंगलियों के निशान अब भी सांस रोकते थे।

बैठक खत्म हुई तो अर्जुन ने कहा, “नैना, मेरे साथ चलो।”

कविता का चेहरा सफेद पड़ गया। नैना ने संभलकर कहा, “मुझे अपनी मैनेजर से बात करनी है।”

अर्जुन ने शांत आवाज़ में कहा, “तुम्हें आज देर से आने पर कोई डांटेगा नहीं।”

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कॉरिडोर में पहुँचकर उसने नैना को दूर खिड़की के पास रोका। नीचे मुंबई की सड़कें दौड़ रही थीं, लेकिन ऊपर एक सन्नाटा था।

“घर जाना तुम्हारे लिए खतरनाक है?” उसने पूछा।

नैना ने नज़र फेर ली। “आप मुझे जानते नहीं।”

“डर को पहचानने के लिए नाम जानना ज़रूरी नहीं होता।”

उसके फोन पर संदेश चमका। विक्रम था।

“6 बजे नीचे रहना। आज बात पूरी होगी।”

नैना की उंगलियाँ जम गईं।

अर्जुन ने स्क्रीन देखी और उसकी आवाज़ और ठंडी हो गई। “आज शाम ऊपर मेरे ऑफिस आना।”

नैना ने कहा, “मैं नहीं आ सकती।”

अर्जुन ने एक पल उसे देखा। “फिर वह आदमी नीचे तुम्हारा इंतज़ार करेगा… और तुम फिर कहोगी कि तुम सीढ़ियों से फिसल गई थीं।”

उसी क्षण फोन फिर चमका।

“अगर नहीं आई तो मैं खुद अंदर आ जाऊँगा।”

नैना ने स्क्रीन बंद कर दी, मगर अर्जुन ने वह डर देख लिया था जिसे उसने 2 साल से दुनिया से छिपा रखा था।

भाग 2

शाम 5:27 पर नैना के डेस्क फोन की घंटी बजी। दूसरी तरफ अर्जुन के ऑफिस से आवाज़ आई, “मैडम, साहब ने आपको ऊपर बुलाया है।”

नैना की नजर मोबाइल पर गई। विक्रम का नया संदेश था, “मैं रास्ते में हूँ।”

वह धीरे-धीरे निजी लिफ्ट की तरफ चली। हर कदम घुटने में आग बनकर चढ़ रहा था। ऊपर अर्जुन का ऑफिस किसी होटल जैसा शांत था। लकड़ी की दीवारें, पीली रोशनी, नीचे चमकती मुंबई और बीच में वह आदमी, जिसके नाम से लोग रास्ता बदल लेते थे।

“सच बताओ,” अर्जुन ने कहा, “आज घर जाना सुरक्षित है?”

नैना ने झूठ बोलना चाहा, लेकिन आवाज़ नहीं निकली।

तभी उसका फोन बजा। विक्रम। उसने काट दिया। संदेश आया, “लॉबी में हूँ। नीचे आओ।”

अर्जुन तुरंत खड़ा हुआ। “यहीं रहो।”

नैना घबरा गई। “आप उसे नहीं जानते। वह अपमान सह नहीं सकता।”

अर्जुन ने दरवाज़े तक जाते हुए कहा, “ऐसे आदमी अपमान से नहीं, नियंत्रण छिनने से डरते हैं।”

कुछ मिनट बाद वह लौटा। चेहरा शांत था, मगर आँखें बेहद ठंडी।

“वह ऊपर नहीं आएगा।”

“आपने क्या किया?”

“उसे बताया कि यह इमारत निजी है और अब उसके लिए बंद है।”

फोन फिर चमका।

“तुझे लगता है वह राठौड़ तुझे मुझसे बचा लेगा?”

नैना काँप गई। अर्जुन ने कहा, “फोन बंद करो।”

यह छोटा काम उसके लिए पहाड़ जैसा था। 2 साल में उसने कभी विक्रम का कॉल अनदेखा नहीं किया था। लेकिन जब आखिरी संदेश आया, “हाथ लग गई तो खत्म कर दूँगा,” नैना ने फोन बंद कर दिया।

उसी समय उसके भीतर कुछ टूटा नहीं, बल्कि खुल गया।

अर्जुन ने अपनी महिला सुरक्षा प्रमुख मीरा को बुलाया। “नैना को सुरक्षित सुइट में ले जाओ। आज रात कोई पुरुष उस कॉरिडोर में नहीं आएगा।”

मीरा उसे लेकर चली गई। कमरे में गर्म चाय, सूप, साफ कपड़े और बंद दरवाज़े की शांति थी। नैना बिस्तर पर बैठी और पहली बार बिना आवाज़ दबाए रो पड़ी।

सुबह उसे पता चला कि अर्जुन ने विक्रम की पूरी जानकारी निकलवा ली थी—पुरानी शिकायतें, शराब में मारपीट, एक पूर्व प्रेमिका की वापस ली गई रिपोर्ट और कई झूठ।

फिर अर्जुन ने पूछा, “तुम्हारे जरूरी कागज़ घर में हैं?”

नैना ने धीमे से कहा, “और मेरी नानी की माला भी।”

अर्जुन का जवाब आया, “तो आज तुम्हारी जिंदगी वापस लानी होगी।”

भाग 3

दोपहर तक वह सुइट एक छोटे कानूनी दफ्तर में बदल चुका था। टेबल पर नैना का बंद फोन, पानी का गिलास, कुछ खाली प्लेटें और उसकी काँपती उंगलियों के निशान पड़े थे। अर्जुन ने एक वकील बुलवाई थी, अनन्या सेन। वह लगभग 45 साल की तेज़ नजरों वाली महिला थी, जिसकी आवाज़ में न दया का बोझ था, न डराने की आदत। उसने आते ही कहा, “नैना, तुम्हें सलाह चाहिए, एहसान नहीं। दोनों अलग चीज़ें हैं।”

मीरा दरवाज़े के पास खड़ी रही। उसका चेहरा कठोर था, मगर जब वह नैना को देखती, तो आँखों में एक ऐसी समझ उतर आती जो केवल वही औरतें पहचानती हैं जिन्होंने कभी किसी दूसरी औरत को डर से बाहर निकाला हो।

अनन्या ने कागज़ खोले। “सबसे पहले संरक्षण आदेश की अर्जी। फिर बैंक पासवर्ड बदलेंगे, क्रेडिट कार्ड बंद करेंगे, दस्तावेज़ सुरक्षित करेंगे। उसके सारे संदेश स्क्रीनशॉट बनेंगे। तुम जवाब नहीं दोगी।”

नैना ने धीमे से पूछा, “अगर वह पुलिस में उल्टा बोल दे कि मैं उसके पैसे लेकर भागी हूँ?”

अनन्या ने बिना पलक झपकाए कहा, “ऐसे आदमी यही करते हैं। इसलिए हम पहले रिकॉर्ड बनाएँगे।”

जब पुराना फोन चालू किया गया, कमरे का वातावरण बदल गया। स्क्रीन पर 53 मिस्ड कॉल थे। संदेश एक के बाद एक खुलते गए।

“घर आ जाओ, गलती हो गई।”

“मुझे गुस्सा मत दिलाओ।”

“वह आदमी तुझे इस्तेमाल करेगा।”

“तू मेरी है।”

“अगर पुलिस के पास गई तो देख लेना।”

नैना का गला सूख गया। उस छोटे से फोन में 2 साल की कैद भरी थी। अनन्या ने हर संदेश सुरक्षित किया। मीरा ने फोन उल्टा रख दिया और कहा, “सांस लो।”

नैना खिड़की तक चली गई। नीचे शहर सामान्य था। ऑटो चल रहे थे, लोग चाय पी रहे थे, डब्बेवाले रास्ता पार कर रहे थे। दुनिया को क्या पता कि 38 मंज़िल ऊपर एक औरत पहली बार अपने ही नाम को वापस लेने की कोशिश कर रही थी।

शाम 4 बजे अर्जुन कमरे में आया। उसने दरवाज़ा तभी खोला जब मीरा ने अनुमति दी। यह बात नैना ने देखी। वह आदमी जिसे शहर में लोग खौफ से देखते थे, उसके कमरे में बिना पूछे कदम नहीं रख रहा था। यह बात अजीब तरह से उसके भीतर टिक गई।

“अब सामान लेने चलते हैं,” उसने कहा।

नैना का चेहरा कस गया। “मैं घर के अंदर नहीं जाऊँगी।”

“तुम्हें जाना भी नहीं है,” अर्जुन ने कहा। “तुम बिल्डिंग तक चलोगी, मीरा अंदर जाएगी।”

वह काली गाड़ी में बैठी तो मुंबई का चेहरा बदलता गया। बीकेसी की चमकीली इमारतों से निकलकर गाड़ी दादर की भीड़, छोटे दुकानों, पुराने फ्लैटों और धूल भरी गलियों की तरफ बढ़ी। नैना ने शीशे से बाहर देखा। हर मोड़ उसके भीतर किसी स्मृति को खरोंच रहा था। इसी रास्ते से वह कई रातें घर लौटती थी और फोन पर विक्रम की आवाज़ सुनती थी—“किसके साथ थी?”, “इतनी देर क्यों हुई?”, “तू मुझे बेवकूफ समझती है?”

उसकी बिल्डिंग एक पुरानी 7 मंज़िला सोसायटी थी। दीवारों पर सीलन थी, गेट के पास प्लास्टिक की कुर्सी पर चौकीदार बैठा था। गाड़ी आधे ब्लॉक दूर रुकी। मीरा 2 सुरक्षा वालों के साथ अंदर गई। नैना ने अपनी हथेली दबा ली।

“वह कहेगा कि मैं गलत हूँ,” नैना ने फुसफुसाकर कहा।

अर्जुन ने बिल्डिंग से नज़र हटाए बिना कहा, “वह वही कहेगा जिससे तुम वापस छोटी लगने लगो।”

“कभी-कभी लगता है सच में मेरी गलती है।”

“तुम्हें ऐसा सोचने के लिए 2 साल तक सिखाया गया है।”

उसने पहली बार अर्जुन की तरफ सीधा देखा। उसके चेहरे पर कोई नर्मी नहीं थी, लेकिन उसमें कोई लालच भी नहीं था। वह उसे बचाने की कोशिश में भी उस पर कब्ज़ा नहीं कर रहा था। यही फर्क नैना को भीतर तक हिला रहा था।

कुछ देर बाद मीरा बाहर आई। उसके हाथ में नीला फोल्डर था, दूसरा आदमी पुराना लैपटॉप बैग और छोटा सूटकेस उठा रहा था। नैना की सांस रुक गई।

“पासपोर्ट, जन्म प्रमाण पत्र, बैंक पेपर, ऑफिस दस्तावेज़,” मीरा ने कहा।

“माला?” नैना की आवाज़ टूट गई।

मीरा ने अपनी मुट्ठी खोली। पतली सोने की चेन में छोटी अंडाकार लॉकेट चमक रही थी। थोड़ा खरोंच लगा था, मगर वह सही थी।

नैना ने माला अपनी हथेली में लेते ही आँखें बंद कर लीं। यह सिर्फ गहना नहीं था। नानी ने उसे 18 साल की उम्र में देते हुए कहा था, “जब कोई तुझे अपनी परछाई बनाने लगे, तब याद रखना, तू खुद भी रोशनी है।” विक्रम ने कई बार उसे बेचने की धमकी दी थी। उस दिन उसे पहली बार लगा कि वह सिर्फ माला नहीं, अपनी आखिरी बची पहचान छू रही है।

मीरा ने धीमे से कहा, “घर अस्त-व्यस्त था। अलमारी खुली थी। कुछ चीज़ें टूट चुकी हैं।”

नैना ने पूछा, “वह अंदर था?”

अर्जुन बोला, “नहीं। और अगर आता, तो भी तुम उससे नहीं मिलती।”

गाड़ी लौटने लगी। नैना ने पीछे मुड़कर बिल्डिंग को देखा। बाहर से वह बस एक साधारण इमारत थी। कोई नहीं जान सकता था कि उसी घर में कितनी रातें उसने बाथरूम का नल चला कर रोना छिपाया था, कितनी सुबहों में उसने मेकअप से गला ढका था, कितनी बार उसने दरवाज़े की चाबी घूमने की आवाज़ सुनकर पेट में डर का पत्थर महसूस किया था।

अगले दिन संरक्षण आदेश की अर्जी दाखिल हुई। अनन्या ने नैना के बयान को साफ शब्दों में लिखा। “उसने मेरा फोन देखा।” “उसने मुझे दोस्तों से दूर किया।” “उसने मुझे धक्का दिया।” “मैं उससे डरती हूँ।” हर वाक्य नैना के लिए चाकू जैसा था, मगर हर हस्ताक्षर एक बंद ताला खोलता गया।

विक्रम ने पहले माफी माँगी। फिर रोया। फिर धमकाया। फिर सोशल मीडिया पर लिखा कि नैना पैसों के लिए अमीर आदमी के साथ भाग गई। उसने कविता मल्होत्रा को भी फोन किया और कहा कि नैना मानसिक रूप से अस्थिर है। कविता ने पहले तो कानाफूसी शुरू की, मगर जब अनन्या का कानूनी नोटिस और इमारत की लॉबी की फुटेज सामने आई, तो उसकी आवाज़ भी धीमी पड़ गई।

सबसे बड़ा मोड़ 3 दिन बाद आया। विक्रम ने शराब पीकर अर्जुन की इमारत के सामने हंगामा किया। वह चिल्ला रहा था, “नैना मेरी है! उसे बाहर भेजो!” गेट पर सुरक्षा थी, पुलिस भी आ गई। नैना ऊपर सुइट की खिड़की से सब देख रही थी। उसके हाथ ठंडे थे। शरीर फिर उसी पुराने डर में लौटना चाहता था। वह नीचे जाना चाहती थी, सिर्फ इसलिए कि हंगामा रुक जाए।

अर्जुन उसके पास खड़ा था, मगर उसने उसे रोका नहीं। उसने सिर्फ कहा, “अगर तुम चाहो तो उसे देख सकती हो। अगर चाहो तो नहीं। फैसला तुम्हारा है।”

नैना ने बहुत देर तक नीचे खड़े विक्रम को देखा। वही आदमी जो घर में पहाड़ बन जाता था, सड़क पर पुलिस के सामने बिखरा हुआ दिख रहा था। उसका गुस्सा अब भी खतरनाक था, मगर पहली बार वह सर्वशक्तिमान नहीं लग रहा था। वह बस एक आदमी था, जो अपना नियंत्रण खो चुका था।

नैना ने पर्दा बंद कर दिया।

“मैं उससे नहीं मिलूँगी,” उसने कहा।

अर्जुन ने बस सिर हिलाया। कोई ताली नहीं, कोई तारीफ नहीं। जैसे उसने कोई युद्ध नहीं जीता, बस अपने लिए एक दरवाज़ा चुना हो।

कुछ हफ्तों में नैना एक सुरक्षित अपार्टमेंट में रहने लगी। यह जगह न बहुत बड़ी थी, न बहुत महंगी, मगर उसके दरवाज़े की चाबी सिर्फ उसके पास थी। उसने पहली रात पूरी बत्ती जलाकर सोई। दूसरी रात एक लैंप। तीसरी रात अंधेरे में भी उसे लगा कि कमरे में कोई छिपा नहीं है। यह छोटा बदलाव उसके लिए चमत्कार जैसा था।

वह काम पर लौटना चाहती थी, मगर उसी ऑफिस में नहीं जहाँ उसके दर्द को “ड्रामा” कहा गया था। अर्जुन ने उसे नौकरी देने की पेशकश की, पर उसने तुरंत मना कर दिया। उसे डर था कि एक कैद से निकलकर दूसरी छाया में न चली जाए। अर्जुन ने कोई बहस नहीं की। उसने कहा, “तुम्हें मेरा नाम इस्तेमाल करने की जरूरत नहीं। तुम्हें बस अपनी योग्यता याद रखने की जरूरत है।”

नैना ने 2 महीने बाद एक नई कंपनी में काम शुरू किया। छोटा पद था, लेकिन सांस लेने की जगह थी। वह मीरा से कभी-कभी मिलती। मीरा उसे आत्मरक्षा सिखाती, सिर्फ हाथ-पैर नहीं, बल्कि “ना” कहना भी। अनन्या का केस जारी रहा। विक्रम को अदालत से दूरी बनाए रखने का आदेश मिला। उसने 2 बार आदेश तोड़ा और दोनों बार उसे पुलिस स्टेशन जाना पड़ा। धीरे-धीरे उसके संदेश बंद हुए। फिर उसका नाम भी नैना के दिन से कम होने लगा।

लेकिन जख्म सिर्फ आदमी के दूर जाने से नहीं भरते। कभी-कभी चाय की तेज़ आवाज़ से नैना चौंक जाती। कभी किसी पुरुष की ऊँची आवाज़ सुनते ही उसके कंधे सिकुड़ जाते। कभी देर रात फोन की रोशनी देख वह फिर उसी पुराने कमरे में लौट जाती। उन रातों में वह नानी की माला पकड़ती और धीरे-धीरे खुद को याद दिलाती कि दरवाज़ा बंद है, चाबी उसके पास है, और वह अब किसी की सजा नहीं है।

अर्जुन उससे मिलता रहा, मगर दूरी के साथ। कभी ऑफिस के नीचे कॉफी भेज देता, कभी मीरा के हाथ कोई दस्तावेज़, कभी सिर्फ एक छोटा संदेश—“आज खाना खाया?” नैना पहले ऐसे संदेशों से डरती थी। देखभाल और निगरानी में फर्क पहचानने में उसे समय लगा। अर्जुन कभी जवाब की मांग नहीं करता था। यही बात उसे सबसे ज्यादा असहज और फिर धीरे-धीरे शांत करती गई।

6 महीने बाद विक्रम का केस अदालत में था। नैना ने गवाही दी। वह सफेद साड़ी में आई, गले में नानी की वही माला। विक्रम ने उसे देखते ही पहले आँखों से डराने की कोशिश की, फिर चेहरे पर दर्द का अभिनय लाया। उसने कहा कि वह उससे प्यार करता था, कि वह भटक गई थी, कि अर्जुन ने उसे फँसाया।

नैना ने जज के सामने कहा, “प्यार वह नहीं होता जिसमें कोई औरत अपने कदमों की आवाज़ भी छिपाकर चले।”

कमरे में सन्नाटा छा गया। विक्रम की आँखों में पहली बार वह घबराहट आई जो कभी नैना की आँखों में रहती थी। अदालत ने आदेश बढ़ाया, आर्थिक नुकसान की जाँच शुरू हुई, और उसके खिलाफ दर्ज पुराने मामलों को भी फिर से देखा जाने लगा।

बाहर निकलते समय नैना ने अर्जुन को कोर्ट की सीढ़ियों के पास खड़े देखा। वह भीतर नहीं आया था। उसने उसकी लड़ाई उसकी जगह नहीं लड़ी थी। वह बस बाहर इंतज़ार कर रहा था, जैसे कोई दरवाज़ा खुला रखता है और भीतर आने का फैसला दूसरे पर छोड़ देता है।

नैना उसके पास गई। “आज मुझे डर लगा,” उसने कहा।

अर्जुन ने उत्तर दिया, “फिर भी तुम बोलीं।”

“पहले मैं सोचती थी कि डर खत्म होगा तो बोलूँगी।”

“नहीं,” अर्जुन ने शांत स्वर में कहा, “कई बार बोलने से डर छोटा होना शुरू होता है।”

बारिश शुरू हो चुकी थी। मुंबई की सड़कें चमक रही थीं। लोग भाग रहे थे, ऑटो वाले चिल्ला रहे थे, ट्रैफिक रुका हुआ था। सब कुछ वैसा ही था, फिर भी नैना के भीतर कुछ अलग था।

उसने पूछा, “आपने मुझे क्यों बचाया था? सच में।”

अर्जुन कुछ देर चुप रहा। फिर बोला, “क्योंकि बहुत साल पहले मेरी माँ भी ऐसे ही चुप रहती थी। और मेरे घर में बहुत लोग ताकतवर थे, मगर किसी ने उसकी चुप्पी नहीं पढ़ी। जब तक मैंने पढ़ना सीखा, बहुत देर हो चुकी थी।”

नैना ने पहली बार उसके चेहरे पर वह दरार देखी जो वह दुनिया से छिपाकर रखता था। वह खतरनाक आदमी था, इसमें कोई भ्रम नहीं था। मगर उस खतरे के पीछे एक पुराना शोक था, और शायद वही शोक उसे उन निशानों को पहचानना सिखा चुका था जिन्हें बाकी लोग मेकअप समझकर आगे बढ़ जाते थे।

नैना ने धीरे से कहा, “आपने मुझे खरीदा नहीं।”

अर्जुन ने उसकी ओर देखा। “तुम कोई चीज़ नहीं थीं।”

“आपने मुझे रखा भी नहीं।”

“तुम्हें जगह चाहिए थी, पिंजरा नहीं।”

बारिश तेज़ हो गई। नैना ने नानी की माला को छुआ। उसे याद आया वह सुबह जब उसने झूठ बोला था कि वह सीढ़ियों से फिसली है। वह कॉन्फ्रेंस रूम। वह सवाल। वह डर। और फिर वह फोन बंद करने का छोटा-सा क्षण, जिसने उसकी पूरी जिंदगी का रास्ता बदल दिया।

कई महीने बाद नैना ने अपने नए घर की बालकनी में एक तुलसी का पौधा लगाया। मिट्टी में हाथ डालते हुए उसके घुटने का पुराना निशान हल्का खिंचा। दर्द अब भी था, मगर वह आदेश नहीं था, बस स्मृति थी। नीचे सड़क पर बच्चे क्रिकेट खेल रहे थे। पास की खिड़की से प्रेशर कुकर की सीटी आई। शहर की शाम में वह साधारण जीवन लौट रहा था, जिसे उसने कभी अपने लिए असंभव मान लिया था।

दरवाज़े की घंटी बजी। उसने घबराकर नहीं, सामान्य कदमों से दरवाज़ा खोला। बाहर अर्जुन था, हाथ में कोई महंगा तोहफा नहीं, सिर्फ गरम समोसे और अदरक वाली चाय।

“मीरा ने कहा आज तुम्हारी छुट्टी है,” उसने कहा।

नैना मुस्कुराई। “मीरा अब मेरी खबर आपको देती है?”

अर्जुन ने पहली बार हल्की मुस्कान दिखाई। “नहीं। उसने कहा कि अगर मैं खाली हाथ आया तो दरवाज़े से लौटा दिया जाऊँगा।”

नैना हँस पड़ी। वह हँसी छोटी थी, थोड़ी काँपती हुई, लेकिन असली थी। कमरे में कोई डर नहीं दौड़ा। कोई आवाज़ नहीं बोली कि यह हँसी महंगी पड़ेगी। कोई आदमी यह नहीं पूछ रहा था कि वह किस बात पर खुश है।

अर्जुन दरवाज़े पर ही खड़ा रहा। उसने अंदर आने की जल्दी नहीं की।

नैना ने दरवाज़ा थोड़ा और खोल दिया।

उस शाम दोनों बालकनी में बैठे। बारिश के बाद की हवा में मिट्टी और मसालों की गंध थी। अर्जुन ने उसकी तरफ देखा, पर उस नज़र में दावा नहीं था। नैना ने चाय का कप थामा और पहली बार महसूस किया कि सुरक्षा हमेशा दीवारों, गार्डों और आदेशों से नहीं बनती। कभी-कभी सुरक्षा वह क्षण होती है जब कोई ताकतवर आदमी भी तुम्हारी अनुमति का इंतज़ार करे।

रात गहराने लगी। नीचे शहर का शोर धीमा हुआ। नैना ने नानी की माला को अपनी गर्दन पर ठीक किया। लॉकेट उसकी त्वचा से लगा था, उसी जगह जहाँ कभी चोट छिपाई जाती थी। अब वहाँ कोई concealer नहीं था, कोई दुपट्टा कसकर नहीं बाँधा गया था, कोई झूठ तैयार नहीं रखा गया था।

वह अभी पूरी तरह ठीक नहीं हुई थी। शायद कोई भी इतने लंबे डर से एक दिन में ठीक नहीं होता। लेकिन अब उसके पास अपना घर था, अपना नाम था, अपना फोन था, अपनी चाबी थी, अपनी आवाज़ थी।

और सबसे बड़ी बात, अब उसके पास यह समझ थी कि किसी का बचाया जाना उसकी कमजोरी नहीं होता। कई बार किसी एक आदमी का एक सही सवाल, किसी औरत की पूरी जिंदगी को झूठ से बाहर खींच सकता है।

उस रात जब अर्जुन जाने लगा, नैना ने दरवाज़े पर उसे रोका।

“अर्जुन,” उसने कहा, “उस दिन अगर आपने वह सवाल नहीं पूछा होता, तो शायद मैं अब भी कह रही होती कि मैं सीढ़ियों से फिसल गई थी।”

अर्जुन ने धीमे से कहा, “नहीं, नैना। सवाल ने दरवाज़ा खोला था। बाहर तुम खुद चली थीं।”

दरवाज़ा बंद हुआ। कमरे में शांति रह गई। मगर इस बार वह शांति डर की नहीं थी। वह एक औरत की अपनी चुनी हुई शांति थी।

नैना ने बालकनी का दरवाज़ा खुला छोड़ा, बारिश की हल्की हवा भीतर आने दी और पहली बार बिना फोन देखे, बिना किसी की इजाज़त का इंतज़ार किए, गहरी नींद सो गई।

Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.