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मां की अस्थियां अभी घर भी नहीं पहुंची थीं, और पिता मंदिर में दूसरी शादी करने खड़े थे; जब उन्होंने बेटी से कहा, “यह घर अब उसकी मां का नहीं,” तो बेटी ने चुपचाप मां की अलमारी से पेन ड्राइव निकाली, जिसमें 12 करोड़ का राज दबा था।

PART 1

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मां की चिता की राख अभी पूरी तरह ठंडी भी नहीं हुई थी कि राजीव मल्होत्रा अपनी काली मर्सिडीज में बैठकर मंदिर की तरफ निकल गया, जहां उसकी प्रेमिका लाल जोड़े में दुल्हन बनकर उसका इंतजार कर रही थी।

दिल्ली के निगमबोध घाट पर बारिश की हल्की बूंदें गंगा के किनारे रखे गीले फूलों में मिल रही थीं। 10 बजकर 18 मिनट पर सावित्री मल्होत्रा की अस्थियां कलश में रखी जा रही थीं, और 10 बजकर 46 मिनट पर उनके पति राजीव अपनी घड़ी देख रहे थे, जैसे किसी मीटिंग में देर हो रही हो। उनकी 31 साल की पत्नी अभी-अभी दुनिया से गई थी, लेकिन उनके चेहरे पर दुख नहीं, अधीरता थी।

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उनकी बेटी अनन्या वहीं सीढ़ियों के पास खड़ी थी। सफेद सूट भीग चुका था, बाल चेहरे से चिपक गए थे, और आंखों में नींद, शोक और अपमान एक साथ जमा था। रिश्तेदार धीरे-धीरे लौट रहे थे। बुआ मीना कांपते हाथों से अपनी साड़ी का पल्लू संभाल रही थीं। पड़ोस की औरतें अभी भी राम नाम सत्य कहती हुई रो रही थीं। मगर राजीव मल्होत्रा की आंखों में सिर्फ अपनी अगली मंजिल थी।

उन्होंने कार का दरवाजा खोला, फिर मुड़कर अनन्या से कहा, “चल रही हो?”

अनन्या को लगा, शायद वह घर की बात कर रहे हैं। वही ग्रेटर कैलाश वाला घर, जहां मां की तस्वीर के सामने दीया जलना था, जहां लोग शोक जताने आने वाले थे, जहां मां की पसंद की सूजी की खीर बुआ ने सुबह ही बनवाई थी।

“मां के घर?” अनन्या ने धीमे से पूछा।

राजीव के होंठों पर सूखी मुस्कान आई। “वह अब उसकी नहीं रही। और आज मेरे पास रोने-धोने के लिए समय नहीं है।”

अनन्या ने जैसे जमीन खिसकती महसूस की। “आप आज शादी करने जा रहे हैं?”

“हां,” उन्होंने बिना शर्म कह दिया। “जीवन रुकता नहीं, अनन्या। तुम्हारी मां महीनों से बीमार थी। सबको पता था यही होना है।”

बुआ मीना चीख पड़ीं, “राजीव, कम से कम तेरहवीं तक तो रुक जाते!”

राजीव ने उन्हें ऐसे देखा जैसे नौकरानी ने बीच में बोलने की गलती कर दी हो। “मीना जी, भावनाओं से संपत्ति नहीं चलती।”

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यह वही आदमी था जिसे दिल्ली के बड़े अखबार “स्वास्थ्य सेवा का दानवीर” कहते थे। मल्होत्रा हेल्थकेयर के नाम पर उसके 7 निजी अस्पताल, 3 डायग्नोस्टिक सेंटर, कई वृद्धाश्रम और मेडिकल सप्लाई कंपनियां थीं। वह मंदिरों में चेक देता, विधवाओं के लिए कंबल बांटता, और मंच पर परिवार की मर्यादा पर भाषण देता। लेकिन घर में सावित्री उसके लिए सिर्फ एक हस्ताक्षर थी, एक पुराना फर्नीचर, जिसे हटाकर नई सजावट लाई जा सकती थी।

अनन्या पेशे से फॉरेंसिक फाइनेंशियल एनालिस्ट थी। वह बीमा घोटालों, जाली दस्तावेजों और कॉर्पोरेट धोखाधड़ी के मामलों में अदालतों और जांच एजेंसियों के साथ काम करती थी। राजीव उसे ताने देते, “तू बस कागजों में धूल ढूंढती रहती है।”

सावित्री हमेशा मुस्कुराकर कहतीं, “मेरी बेटी झूठ को अंकों के पीछे छिपा हुआ भी पकड़ लेती है।”

मां की मौत से 2 हफ्ते पहले सावित्री ने रात में अनन्या को फोन किया था। आवाज बहुत कमजोर थी।

“बेटा, तुम्हारे पापा मेरी दवा खुद देने लगे हैं।”

“तो इसमें डरने की बात क्या है, मां?”

“दवा के बाद मेरा सिर भारी हो जाता है। आंखें धुंधली हो जाती हैं। कभी-कभी लगता है मैं अपने ही कमरे में कैद हूं। डॉक्टर माथुर कहते हैं बीमारी बढ़ रही है, पर मुझे कुछ ठीक नहीं लग रहा।”

सावित्री को कैंसर था। यह सच था। लेकिन डॉक्टरों ने कहा था कि उनके पास कई महीने हो सकते हैं। वह अभी भी होश में रहती थीं, रसोई की खुशबू पहचानती थीं, पुरानी साड़ियों की तह ठीक करती थीं, और कहती थीं कि दिवाली तक अनन्या के साथ जयपुर जाना है।

अनन्या अगले दिन मुंबई से दिल्ली आ गई। लेकिन तब तक मां बोलना लगभग बंद कर चुकी थीं। राजीव कमरे के कोने में खड़े थे।

“देख लिया?” उन्होंने कहा। “तुम्हारी फिल्मों जैसी कल्पनाएं गलत निकलीं। बीमारी जीत गई।”

डॉक्टर विकास माथुर ने मृत्यु प्रमाणपत्र पर हस्ताक्षर कर दिए। रात की नर्स पूजा अरोड़ा ने आंखें झुका लीं। 3 दिन बाद सावित्री चली गईं।

अब घाट से लौटते समय बुआ मीना ने अनन्या की हथेली में एक छोटी पीतल की चाबी रखी।

“तेरी मां ने कहा था, अगर राजीव बहुत जल्दी नई जिंदगी शुरू करे, तो यह तुझे दे दूं।”

अनन्या ने चाबी कसकर पकड़ ली। “किसकी है?”

मीना की आंखें भर आईं। “सावित्री ने कहा था, जहां वह सोचता है कि कोई नहीं देखेगा, वहीं देखना।”

अनन्या अकेली ग्रेटर कैलाश वाले बंगले में लौटी। घर में गीले फूलों और अगरबत्ती की गंध भारी थी। ड्रॉइंग रूम में मां की मुस्कुराती तस्वीर रखी थी। उसी घर में जहां सावित्री ने 31 साल काटे, आज शाम दूसरी औरत गृहप्रवेश करने वाली थी।

अनन्या सीढ़ियां चढ़कर मां के सिलाई कमरे में गई। राजीव को वह कमरा हमेशा नापसंद था। वह कहते, “यहां गरीबों जैसी गंध आती है।” सावित्री के लिए वही कमरा सांस लेने की जगह था। रंग-बिरंगे धागे, अधूरी कढ़ाई, पुरानी बनारसी साड़ियां और एक शीशम की मेज।

चाबी मेज के नीचे बने गुप्त दराज में लग गई।

अंदर एक लिफाफा, एक पेन ड्राइव और नीली डायरी रखी थी। लिफाफे में सिर्फ एक पंक्ति थी।

अगर वह मुझे जल्दी बदलने निकले, तो पैसे का पीछा करना।

अनन्या ने पेन ड्राइव लगाई। स्क्रीन पर दवाओं की तस्वीरें, बैंक स्टेटमेंट, बीमा फाइलें, ईमेल, हस्ताक्षर वाले दस्तावेज और ऑडियो रिकॉर्डिंग खुलने लगीं। 6 महीने पहले सावित्री की जीवन बीमा राशि 2 करोड़ से बढ़ाकर 12 करोड़ कर दी गई थी। लाभार्थी के नाम से बेटी और चैरिटी हटाकर “आर्या वेल्थ होल्डिंग्स” नाम की कंपनी डाली गई थी।

उस कंपनी की मालकिन थी नताशा कपूर।

राजीव की प्रेमिका।

फिर अनन्या ने पहली रिकॉर्डिंग चलाई। राजीव की आवाज साफ थी।

“यह प्राकृतिक लगना चाहिए। वह वैसे भी मरने वाली है।”

दूसरी आवाज डॉक्टर माथुर की थी। “डोज ज्यादा हुआ तो निशान रह सकते हैं।”

राजीव बोला, “आप डॉक्टर हैं। कागज पर क्या लिखना है, आप जानते हैं।”

अनन्या की सांस रुक गई।

उसी समय फोन पर संदेश आया। “पापा की शादी 12:30 बजे छतरपुर मंदिर में है। नताशा ने मां का हार पहना है।”

PART 2

अनन्या ने चीखने की जगह दस्ताने पहने। उसने हर फाइल की कॉपी बनाई, डायरी की तस्वीरें लीं, पेन ड्राइव का फॉरेंसिक इमेज बनाया और अपनी वकील इरा सूद को फोन किया।

“इरा, मेरी मां मरी नहीं हैं। उन्हें धीरे-धीरे खत्म किया गया है।”

15 मिनट में मामला दिल्ली पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा और क्राइम ब्रांच तक पहुंच गया। इरा ने कहा, “राजीव को शक मत होने देना। मंदिर जाओ। उसे वहीं रोको।”

छतरपुर मंदिर में लाल और सफेद फूलों की सजावट थी। वही सफेद लिली, जो सुबह सावित्री के कलश के पास रखी थीं। नताशा कपूर भारी लहंगे में चमक रही थी। उसके गले में सावित्री का नीलम हार था।

राजीव ने अनन्या को देखा। “ड्रामा मत करना।”

नताशा हंसी। “तुम्हारी मां चाहतीं कि तुम्हारे पापा खुश रहें।”

अनन्या ने हार की ओर देखा। “हां, आज सब जानेंगे कि यह हार किसका है।”

पंडित ने मंत्र शुरू किए। अनन्या का फोन कांपा।

इरा का संदेश था, “डॉक्टर माथुर के क्लिनिक से बंद फ्रिज में दवा मिली। नर्स पूजा टूट गई है।”

अनन्या खड़ी हो गई।

“यह शादी नहीं होगी।”

उसी पल मंदिर के बड़े दरवाजे खुल गए।

PART 3

मंदिर के भीतर ढोलक की आवाज अचानक बंद हो गई। सबकी गर्दनें दरवाजे की तरफ घूमीं। 6 पुलिसकर्मी अंदर आए, उनके पीछे 2 सादे कपड़ों वाले अधिकारी और सरकारी वकील निधि रमन थीं। राजीव ने पहले तो भौंहें सिकोड़कर देखा, जैसे किसी ने उसके निजी समारोह में अनुशासन तोड़ दिया हो।

निधि रमन ने कागज खोला। “राजीव मल्होत्रा, आपको सावित्री मल्होत्रा की संदिग्ध मृत्यु, बीमा धोखाधड़ी, जाली हस्ताक्षर, मेडिकल रिकॉर्ड से छेड़छाड़, मनी लॉन्ड्रिंग और आपराधिक साजिश के आरोपों में हिरासत में लिया जाता है।”

मंदिर में ऐसा सन्नाटा उतरा कि फूलों की लड़ियां हिलने की आवाज भी सुनाई देने लगी। राजीव ने पहले हंसने की कोशिश की।

“आप मेरी बेटी की मानसिक हालत का फायदा उठा रही हैं। आज सुबह उसने अपनी मां को खोया है।”

निधि ने पीछे देखा। 2 पुलिसकर्मी डॉक्टर विकास माथुर को अंदर लाए। उसके हाथों में हथकड़ी थी। चेहरा राख जैसा हो गया था।

राजीव की आंखों का आत्मविश्वास पहली बार टूटा। “विकास, तुम यहां क्या कर रहे हो?”

डॉक्टर माथुर हकलाया, “उन्होंने सब ढूंढ लिया। ट्रांसफर, मैसेज, दवा की शीशियां… सब।”

नताशा कपूर का चेहरा पीला पड़ गया। “कौन सी दवा?”

राजीव ने दांत भींचे। “चुप रहो।”

“तुमने कहा था वह कैंसर से मरी। तुमने कहा था सब कानूनी है।”

“नताशा, एक शब्द और नहीं।”

लेकिन शब्द निकल चुके थे। वे दीवारों, कैमरों, रिश्तेदारों और देवताओं के सामने गूंज चुके थे।

पुलिस नताशा की ओर बढ़ी। “आपको भी जाली दस्तावेज, अवैध लाभ और संपत्ति छिपाने के आरोपों में पूछताछ के लिए ले जाया जाएगा।”

“मैंने कुछ नहीं किया!” नताशा चिल्लाई। “राजीव ने सब कराया। मैं तो बस…”

अनन्या ने उसकी गर्दन की ओर देखा। सावित्री का नीलम हार वहां कांप रहा था।

निधि ने कहा, “यह गहना जब्त किया जाएगा। यह विवादित उत्तराधिकार का हिस्सा है।”

नताशा ने हार पकड़ लिया। “यह मेरा शादी का तोहफा है!”

पीछे से बुआ मीना की आवाज फटी, “वह मेरी भाभी का था, तेरे लालच का नहीं।”

एक महिला अधिकारी ने सावधानी से हार उतारा और सीलबंद थैली में रख दिया। नताशा के चेहरे से जैसे दुल्हन का रंग उतर गया। लाल जोड़े में खड़ी वह अचानक चमकती हुई प्रेमिका नहीं, पकड़ी गई साझेदार लग रही थी।

राजीव ने हथकड़ी लगने दी, लेकिन उसकी नजरें अनन्या पर थीं। “तू सोचती है सब ले लेगी? घर, अस्पताल, पैसा? तेरे पास कुछ नहीं बचेगा।”

अनन्या उसके पास आई। आवाज धीमी थी, पर हर शब्द साफ।

“मां ने तुम्हें बहुत पहले पहचान लिया था।”

राजीव का चेहरा बदल गया। पहली बार उसमें डर दिखा।

दरअसल, सावित्री केवल बीमार पत्नी नहीं थीं। शादी से पहले वह 17 साल तक एक वरिष्ठ वकील के चैंबर में काम कर चुकी थीं। उन्हें दस्तावेज पढ़ना आता था, चालें समझना आता था, और चुप रहकर सही वक्त का इंतजार करना भी आता था। पिछले 1 साल से उन्होंने बुआ मीना और एक पुराने वकील अरुण भसीन की मदद से मल्होत्रा हेल्थकेयर में अपने हिस्से को एक फैमिली ट्रस्ट में डाल दिया था। शर्त साफ थी—अगर उनकी मृत्यु संदिग्ध हालत में हो, या पति पर धोखाधड़ी, हिंसा, बीमा हेरफेर या संपत्ति कब्जाने का आरोप लगे, तो ट्रस्ट की जिम्मेदारी अनन्या को मिल जाएगी।

राजीव ने 12 करोड़ के लिए पत्नी को मिटाना चाहा था।

दोपहर 2 बजे तक वह करीब 300 करोड़ की संपत्ति पर अपना नियंत्रण खो चुका था।

उस शाम दिल्ली के सोशल मीडिया पेजों पर खबर फैल गई—“पत्नी की अस्थि विसर्जन के कुछ घंटे बाद शादी कर रहे हेल्थकेयर मालिक को मंदिर से गिरफ्तार किया गया।” वीडियो वायरल हुआ। लोग कमेंट कर रहे थे। कोई कह रहा था बेटी ने पिता की इज्जत मिट्टी में मिला दी। कोई लिख रहा था, “ऐसे शरीफ दिखने वाले मर्द घरों में कितनी औरतों को चुपचाप मार देते हैं।”

अनन्या ने कोई इंटरव्यू नहीं दिया। वह घर लौटी, मां का कमरा बंद नहीं किया, बल्कि खिड़की खोल दी। उसे लगा जैसे इतने महीनों बाद उस कमरे ने सांस ली हो। वह डायरी लेकर बैठ गई। हर पन्ने में सावित्री की टूटती लिखावट थी।

“रात 9:15—राजीव ने दवा दी। स्वाद कड़वा था।”

“10:05—मैंने उसे फोन पर कहते सुना, सितंबर तक इंतजार नहीं कर सकता।”

“अगर मैं न बचूं, अनन्या को सच मिलना चाहिए।”

यह पढ़कर अनन्या कई बार फूटकर रोई। गुस्सा भी आया। क्यों मां ने पहले नहीं बताया? क्यों अकेली सहती रहीं? फिर उसे याद आया—घर में राजीव का डर हवा में घुला रहता था। वह ऊंची आवाज नहीं करता था, लेकिन उसकी चुप्पी भी आदेश बन जाती थी। सावित्री जैसी लाखों औरतें घर बचाने के नाम पर खुद को खो देती हैं, जब तक घर ही उनका कातिल न बन जाए।

जांच लंबी चली। नर्स पूजा अरोड़ा ने पहले इंकार किया। फिर बैंक स्टेटमेंट सामने आए। उसकी मां की सर्जरी के लिए अचानक 18 लाख जमा हुए थे, जो आर्या वेल्थ होल्डिंग्स से जुड़े खाते से आए थे। पूजा रोते हुए बोली, “मैंने सिर्फ समय बदला था। मुझे लगा डॉक्टर जानते हैं। मैंने नहीं सोचा था कि मैडम सच में…”

अनन्या ने बयान पढ़ा और कागज मेज पर रख दिया। उसे लगा, “मैंने नहीं सोचा” दुनिया का सबसे खतरनाक वाक्य है। इसी वाक्य के पीछे कितने अपराध छिप जाते हैं।

डॉक्टर माथुर ने भी पहले कहा कि कैंसर अंतिम अवस्था में था। लेकिन उसके कंप्यूटर से दवा के डोज, मृत्यु के अनुमानित समय, और राजीव से हुई चैट मिलीं। एक मैसेज में राजीव ने लिखा था, “बारात से पहले सब शांत होना चाहिए।” माथुर ने जवाब दिया था, “मेडिकल पेपर मैं संभाल लूंगा।”

नताशा कपूर खुद को मासूम बताती रही। उसने कहा, वह राजीव के प्यार में अंधी थी। लेकिन उसके लैपटॉप में बीमा लाभार्थी बदलने वाले ड्राफ्ट मिले। एक चैट में उसने राजीव से पूछा था, “पुरानी रानी कब तक सिंहासन पकड़े रहेगी?” दूसरी तस्वीर में वह सावित्री का हार पहनकर होटल के शीशे के सामने मुस्कुरा रही थी, वह भी सावित्री की मौत से 4 दिन पहले।

11 महीने बाद मुकदमा शुरू हुआ। दिल्ली की अदालत खचाखच भरी थी। पत्रकार बाहर खड़े थे, लेकिन अनन्या की नजर सिर्फ कटघरे पर थी। राजीव काले सूट में आया। चेहरा दुबला था, मगर गर्दन अभी भी अकड़ी हुई थी। उसने अनन्या को उसी नजर से देखा, जिससे बचपन में वह उसकी रिपोर्ट कार्ड पर 1 नंबर कम आने पर देखता था—जैसे वह गलती हो।

7 हफ्तों तक अदालत में सच की परतें खुलीं। सावित्री की डायरी स्क्रीन पर दिखाई गई। उनकी रिकॉर्डिंग सुनाई गई। एक जगह उनकी कांपती आवाज थी।

“मुझे डर है कि वह मेरी मौत का इंतजार नहीं कर रहा, उसे जल्दी कर रहा है।”

अदालत में बैठे कई लोग सिर झुकाकर रो पड़े। बुआ मीना ने अपना चेहरा पल्लू में छिपा लिया। अनन्या ने आंखें बंद कर लीं। उसे लगा मां फिर उसी कमरे में हैं, नीली चादर पर लेटी हुई, किसी से मदद मांगती हुई, लेकिन आवाज दीवारों से टकराकर लौट आती है।

जब अनन्या गवाही देने खड़ी हुई, वह रोई नहीं। उसने दस्तावेजों, तारीखों, हस्ताक्षरों और पैसों की पूरी कड़ी समझाई। बचाव पक्ष के वकील ने कहा, “आप अपने पिता से संपत्ति को लेकर नाराज थीं?”

अनन्या ने शांत होकर जवाब दिया, “मैं उस आदमी से नाराज थी जिसने मेरी मां को इंसान नहीं, रुकावट समझा।”

वकील ने फिर पूछा, “क्या आपकी मां ने कभी स्पष्ट रूप से कहा कि राजीव उन्हें मार रहे हैं?”

अनन्या की आवाज भर्रा गई। “डर में जीने वाली औरतें हर बात सीधे शब्दों में नहीं कह पातीं। लेकिन उन्होंने सबूत छोड़े। वही उनकी आखिरी आवाज थी।”

अदालत में सन्नाटा छा गया।

सरकारी वकील निधि रमन ने अंतिम बहस में कहा, “यह सिर्फ हत्या का मामला नहीं है। यह उस अहंकार का मामला है जो मानता है कि पत्नी की बीमारी, बेटी का दुख, डॉक्टर की शपथ और कानून की मुहर—सब खरीदे जा सकते हैं।”

फैसला शुक्रवार शाम आया। राजीव मल्होत्रा को आजीवन कारावास और 22 साल की कठोर न्यूनतम सजा मिली। डॉक्टर विकास माथुर को 30 साल की सजा और मेडिकल लाइसेंस रद्द हुआ। नर्स पूजा अरोड़ा को 12 साल की सजा हुई। नताशा कपूर को जालसाजी, धनशोधन और साजिश में 18 साल की सजा मिली। उसके फ्लैट, गहने, विदेशी खाते और फार्महाउस जब्त कर लिए गए।

जब पुलिस राजीव को ले जा रही थी, वह अनन्या के पास झुका।

“तू हमेशा मेरी जगह चाहती थी।”

अनन्या ने पहली बार बिना डर के उसकी आंखों में देखा।

“नहीं। मैं सिर्फ मां की जगह वापस ला रही हूं, जिसे तुमने मिटा दिया था।”

राजीव ने मुंह खोला, पर शब्द नहीं निकले। शायद पहली बार उसकी आवाज उससे छिन गई थी।

1 साल बाद अनन्या ने मल्होत्रा हेल्थकेयर का नाम बदलकर “सावित्री फाउंडेशन” कर दिया। उसने 2 संदिग्ध वृद्धाश्रम बंद किए, पेलिएटिव केयर में स्वतंत्र निगरानी शुरू करवाई, और उन परिवारों के लिए मुफ्त कानूनी सहायता केंद्र खोला जिन्हें लगता था कि उनके बुजुर्गों या बीमार प्रियजनों का शोषण हो रहा है। पुराने साझेदारों ने कहा, “तुम अपने पिता की विरासत बर्बाद कर रही हो।”

अनन्या ने जवाब भेजा, “विरासत अस्पतालों की इमारतों से नहीं, उन लोगों से बनती है जिन्हें उनमें बचाया जाता है।”

बुआ मीना अब उसी बंगले में रहने लगीं। वह सावित्री की जगह नहीं ले सकती थीं, लेकिन उन्होंने घर को फिर से घर बनाना शुरू किया। हर रविवार सिलाई कमरे की खिड़की खुलती, धागों की रीलें धूप में रखी जातीं, और मेज पर 2 कप चाय रखे जाते—एक मीना के लिए, एक सावित्री की याद के लिए।

नीलम का हार अदालत की प्रक्रिया के बाद वापस मिला। अनन्या ने उसे तुरंत नहीं पहना। वह 3 महीने तक शीशम की मेज पर रखा रहा। फिर मां की पहली बरसी पर, उसने सफेद साड़ी पहनी और वही हार गले में बांधा। शीशे में अपना चेहरा देखकर उसका दिल भर आया।

मीना ने पीछे से कहा, “सावित्री होती तो कहती, मेरी बेटी रानी लग रही है।”

अनन्या ने हार को छुआ। “यह मां पर ज्यादा अच्छा लगता था।”

मीना ने उसके कंधे पर हाथ रखा। “आज वही तुझे दे रही है।”

वे दोनों यमुना किनारे गईं, जहां सावित्री की अस्थियां बहाई गई थीं। आसमान धुंधला था। हवा में हल्की ठंड थी। अनन्या ने सफेद लिली पानी के पास रखीं। वही फूल, जिन्हें राजीव ने मां के शोक और अपनी शादी के बीच बेहयाई से बांट दिया था। आज अनन्या ने उन्हें धीरे से रखा, जैसे किसी अपमानित याद को सम्मान लौटा रही हो।

उसने आंखें बंद कीं। उसे मां की हंसी याद आई, रसोई में बेसुरा गाना, अधूरी कढ़ाई, माथे पर ठंडी हथेली, और वह वाक्य—“मेरी बेटी झूठ को अंकों के पीछे भी पकड़ लेती है।”

अनन्या ने फुसफुसाकर कहा, “मां, मैंने पैसे का पीछा किया।”

हवा में कहीं मंदिर की घंटी बजी। पानी की सतह पर फूल धीरे-धीरे दूर जाने लगे। इस बार अनन्या को सन्नाटा खाली नहीं लगा।

उसे लगा, मां ने जवाब दिया है।

Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.