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बेटे के 8वें जन्मदिन पर चाचा ने उसे 12 मेहमानों के सामने बाँह पकड़कर रुलाया और कहा, “झूठ मत बोल, माफी माँग,” पिता ने बस फोन निकाला, स्क्रीन पर छिपी रिकॉर्डिंग चलाई, और तभी पुराने वसीयत वाले कागजों से ऐसा राज निकला कि पूरा परिवार काँप गया

PART 1

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8वें जन्मदिन की दोपहर, आरव को उसके ही चाचा ने 12 मेहमानों के सामने बाँह पकड़कर खींचा और चिल्लाकर कहा, “सबके सामने माफी माँग, वरना आज ही तेरी असलियत सबको बता दूँगा।”

लखनऊ के पुराने चौक इलाके में खड़ी त्रिपाठी परिवार की हवेली उस दिन बच्चों की हँसी से भरनी चाहिए थी। आँगन में पीले और नीले गुब्बारे बंधे थे, दीवार पर टेढ़ा-सा कागज चिपका था जिस पर लिखा था, “आरव 8 साल का हो गया।” पीतल की थाली में समोसे रखे थे, मेज पर चॉकलेट केक था, और रसोई से इलायची वाली चाय की खुशबू आ रही थी। लेकिन उसी आँगन में अब मिठास नहीं, अपमान की बदबू फैल गई थी।

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आरव की आँखें लाल थीं। उसके गालों पर आँसू चिपके थे। उसने छोटा-सा नीला एप्रन पहना था, जिस पर मैदा लगा हुआ था, क्योंकि वह अपनी दादी सावित्री देवी के साथ अपने ही केक पर क्रीम फैलाने की जिद कर रहा था। उसके छोटे हाथ काँप रहे थे।

“पापा, मैंने कुछ नहीं किया,” उसने धीमी आवाज में कहा। “मैं कसम खाता हूँ, मैंने जूस वाली मेज को हाथ भी नहीं लगाया।”

उसके पिता अर्जुन त्रिपाठी के भीतर कुछ टूटकर चुप हो गया। वह चिल्लाने वाला आदमी नहीं था। पत्नी नंदिता की मौत के बाद तो जैसे उसकी आवाज और भी भीतर धँस गई थी। 2 साल पहले नंदिता अस्पताल की ड्यूटी से लौटते समय बारिश में हुए सड़क हादसे में चली गई थी। तब से घर के कई लोग अर्जुन को ऐसे देखते थे, जैसे वह आधा आदमी रह गया हो—एक कमजोर विधुर, जो 2 बच्चों को सँभालते-सँभालते खुद बिखर रहा था।

आरव की 5 साल की बहन तारा एक कुर्सी के पीछे खड़ी थी। उसने अपनी कपड़े की गुड़िया मुँह से लगा रखी थी। तेज आवाज सुनते ही वह हमेशा डर जाती थी।

फर्श पर संतरे का रस फैला था। काँच की सुराही टूट चुकी थी। आरव का चचेरा भाई कबीर, 9 साल का, कोने में सिर झुकाए खड़ा था। बच्चों ने खेलना बंद कर दिया था। बड़े लोग भी ऐसे चुप थे जैसे सच बोलना अचानक महँगा हो गया हो।

राजीव मल्होत्रा, अर्जुन की बहन मीरा का पति, आँगन के बीच खड़ा था। महँगा कुर्ता, चमकती घड़ी, पैरों में पॉलिश किए जूते और चेहरे पर वही घमंडी मुस्कान, जिससे वह हर रिश्ते को एहसान समझता था।

“यह लड़का पूरे घर की मुसीबत है,” राजीव ने ऊँची आवाज में कहा। “आज के दिन भी तमाशा कर दिया।”

अर्जुन ने शांत स्वर में कहा, “राजीव, वह बच्चा है।”

राजीव हँसा। “बच्चा नहीं, बिगड़ा हुआ बच्चा। और इसमें हैरानी क्या है? बाप ही जब हर समय दुख का पुतला बनकर घूमेगा, तो बच्चे भी ऐसे ही होंगे।”

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कुछ रिश्तेदारों के होंठों पर कमजोर-सी हँसी आई। वह हँसी नहीं थी, कायरता थी। सावित्री देवी ने अपनी साड़ी का पल्लू कसकर पकड़ लिया, पर कुछ बोली नहींं। मीरा की आँखें झुक गईं।

राजीव ने आरव की बाँह और कस दी। “माफी माँग।”

“मैंने नहीं किया,” आरव रो पड़ा।

“माफी माँग!”

अर्जुन 1 कदम आगे बढ़ा। “उसका हाथ छोड़ो।”

राजीव ने तिरछी नजर से देखा। “वरना क्या करोगे, अर्जुन? अपनी टूटी हुई आवाज में कानून समझाओगे? भूल गए हो क्या, अब तुम अदालत वाले अर्जुन त्रिपाठी नहीं रहे। तुम बस एक थका हुआ बाप हो।”

ये शब्द थप्पड़ से ज्यादा जोर से लगे। कभी अर्जुन दिल्ली में तेजतर्रार आपराधिक वकील था। नंदिता की मौत के बाद उसने प्रैक्टिस छोड़ दी थी, ताकि बच्चों को अकेला न छोड़ना पड़े। परिवार के कुछ लोग इसे त्याग नहीं, कमजोरी समझ बैठे थे।

तभी अर्जुन की जेब में रखा फोन कांपा। स्क्रीन पर नोटिफिकेशन चमका—“अंदरूनी कैमरा सक्रिय। गतिविधि दर्ज हुई।”

इस हवेली में कुछ महीने पहले चोरी की कोशिश हुई थी। अर्जुन ने सावित्री देवी की सुरक्षा के लिए छोटे-छोटे कैमरे लगवाए थे। घर वालों ने उस बात को लगभग भुला दिया था। राजीव भी।

अर्जुन ने फोन खोला। वीडियो चला।

फुटेज में 2 मिनट पहले का आँगन दिखाई दिया। कबीर प्लास्टिक का हवाई जहाज लेकर मेज के चारों ओर दौड़ रहा था। आरव तो केक के पास तारा के साथ मोमबत्ती सीधी कर रहा था। राजीव अपने बेटे कबीर को दौड़ते देख रहा था, मगर रोक नहीं रहा था। फिर जैसे ही कबीर कुर्सी के पास पहुँचा, राजीव ने अपने घुटने से हल्का-सा धक्का देकर कुर्सी को जूस वाली मेज की तरफ सरका दिया। कबीर अटका, कुर्सी टकराई, गिलास गिरे, सुराही टूट गई।

और राजीव ने आवाज पूरी होने से पहले आरव पर इल्जाम लगा दिया था।

अर्जुन की साँस ठंडी हो गई। गुस्सा अब चीख नहीं बन रहा था, सबूत बन रहा था।

फिर वीडियो थोड़ा पीछे गया। रसोई के पास राजीव मीरा से धीमे स्वर में कह रहा था, “लड़के को सबके सामने अस्थिर दिखाना जरूरी है। सबको लगेगा अर्जुन बच्चों को नहीं संभाल सकता। फिर वह कागजों पर साइन करेगा।”

मीरा की आवाज काँपी, “राजीव, यह जन्मदिन है।”

राजीव ने झुककर कहा, “मुझे हवेली चाहिए, मीरा। तुम्हारी माँ वसीयत बदलने से पहले। समझीं?”

अर्जुन ने फोन से नजर उठाई। सावित्री देवी सफेद पड़ चुकी थीं। उन्हें अभी पूरा सच नहीं पता था, लेकिन इतना समझ आ गया था कि उनके पोते को किसी खेल में मोहरा बनाया गया है।

राजीव फिर गरजा, “देखिए इसे। अपने पिता के पीछे छिप रहा है। अर्जुन कभी किसी बात को अंजाम तक नहीं पहुँचा पाया।”

अर्जुन ने फोन लॉक किया। “तुम एक बात सही कह रहे हो, राजीव।”

राजीव मुस्कुराया। “अच्छा?”

“आज मैं चिल्लाऊँगा नहीं।”

“क्योंकि तुममें हिम्मत नहीं।”

“नहीं। क्योंकि अब चिल्लाने की जरूरत नहीं।”

राजीव की मुस्कान 1 पल के लिए काँपी। फिर उसने चमड़े का फोल्डर निकाला और मेज पर पटक दिया।

“सभी लोग सुनिए। सावित्री माँ बूढ़ी हो रही हैं। अर्जुन बिखर चुका है। यह हवेली बेकार पड़ी है। मैंने एक समझदार प्रस्ताव तैयार करवाया है—हवेली की बिक्री, हिस्सा बराबर, और माँ को एक अच्छे सीनियर होम में शिफ्ट करना।”

सावित्री देवी के होंठ सूख गए। “मुझे मेरे घर से निकालोगे?”

मीरा ने टूटती आवाज में कहा, “माँ, राजीव बस आपकी देखभाल की बात कर रहे हैं।”

“मैं चश्मा भूलती हूँ, अपनी जिंदगी नहीं,” सावित्री देवी ने कहा।

अर्जुन ने फोल्डर उठाया। अंदर बिक्री की अनुमति, संपत्ति प्रबंधन का अधिकार और कुछ ऐसे कागज थे जिनकी भाषा जानबूझकर डराने वाली थी। नीचे एक जगह सावित्री देवी जैसी दिखती नकली साइन थी।

अर्जुन ने पन्ने पलटे। “यह किसने बनाया?”

राजीव ने गर्व से कहा, “किसी ऐसे ने, जो तुमसे ज्यादा महँगा है।”

पहली बार अर्जुन मुस्कुराया। “मजेदार है। क्योंकि इसमें कम से कम 3 अपराध साफ दिख रहे हैं—बुजुर्ग पर दबाव, फर्जी हस्ताक्षर, और विश्वास का दुरुपयोग।”

आँगन पत्थर हो गया।

राजीव गुर्राया, “सोचकर बोलो।”

अर्जुन ने टीवी का रिमोट उठाया। वही बड़ा स्क्रीन, जिस पर जन्मदिन की तस्वीरें दिखनी थीं, अचानक चमक उठा।

और अगली ही सांस में राजीव का चेहरा स्क्रीन पर था, रसोई के कोने में झुका हुआ।

“मुझे हवेली चाहिए, मीरा। तुम्हारी माँ वसीयत बदलने से पहले।”

PART 2

सावित्री देवी ने मुँह पर हाथ रख लिया। मीरा वहीं बैठ गई, जैसे पैरों से ताकत निकल गई हो। स्क्रीन पर आगे वही दृश्य चला—राजीव का घुटने से कुर्सी सरकाना, कबीर का लड़खड़ाना, जूस गिरना, और फिर बिना देखे आरव पर इल्जाम लगाना।

फिर स्पीकर से राजीव की आवाज निकली, “अर्जुन के बेटे को दोष दो। वैसे भी उस बच्चे की बात कौन मानता है?”

आरव अपने पिता से चिपक गया। कबीर रोते हुए बोला, “पापा, कुर्सी आपने धकेली थी…”

राजीव ने उसे घूरा। “चुप रहो।”

इस बार मीरा उठ खड़ी हुई। “मेरे बेटे से ऐसे बात मत करो।”

राजीव फटा, “बैठ जाओ मीरा। तुम्हें कभी समझ नहीं आया कि तुम्हारे लिए अच्छा क्या है।”

अर्जुन ने फोन मिलाया। उसकी आवाज बिल्कुल शांत थी। “इंस्पेक्टर राठौर, आप अंदर आ सकते हैं।”

मुख्य दरवाजा खुला। 2 पुलिसकर्मी भीतर आए, उनके पीछे सादे कपड़ों में एक महिला अधिकारी थी। राजीव का चेहरा पीला पड़ गया।

अधिकारी ने कार्ड दिखाया। “राजीव मल्होत्रा, आपको हमारे साथ चलना होगा।”

राजीव हँसने की कोशिश करने लगा। “एक घरेलू वीडियो से क्या साबित होगा?”

इंस्पेक्टर राठौर ने कहा, “वीडियो अकेला नहीं है। 3 हफ्ते पहले अर्जुन त्रिपाठी ने आपकी शिकायत दर्ज कराई थी। बैंक खातों, फर्जी बिलों और संदिग्ध पावर ऑफ अटॉर्नी की जाँच पूरी हो चुकी है।”

PART 3

राजीव ने तुरंत अपना चेहरा बदला। वह सावित्री देवी की तरफ मुड़ा, आवाज में बनावटी मिठास भरकर बोला, “माँजी, आप तो जानती हैं, मैं हमेशा आपकी भलाई चाहता था। इन्हें बताइए ना, यह गलतफहमी है।”

सावित्री देवी ने उसे ऐसे देखा जैसे पहली बार उसका असली चेहरा दिखाई दे रहा हो। “मेरी भलाई? मुझे मेरे ही घर से हटाकर? मेरे पोते को झूठा बनाकर? मेरे बेटे को निकम्मा साबित करके?”

राजीव का नकाब गिर गया। “यह घर बेच देना चाहिए था बहुत पहले! आप सब दीवारों से चिपके बैठे हैं, क्योंकि बाबूजी ने आँगन में 1 अमरूद का पेड़ लगा दिया था!”

आँगन में हवा थम गई। वह पेड़ अर्जुन और मीरा के पिता ने अपने हाथों से लगाया था। नंदिता गर्मियों में उसी पेड़ के नीचे बच्चों को आम का पना पिलाती थी। सावित्री देवी धीरे से उठीं। उनके घुटने काँप रहे थे, मगर आवाज साफ थी।

“उस पेड़ में तुमसे ज्यादा शर्म बाकी है।”

रिश्तेदारों की आँखें झुक गईं। डर अब राजीव के चेहरे पर था।

इंस्पेक्टर राठौर ने इशारा किया। पुलिसकर्मी आगे बढ़े। राजीव पीछे हटने लगा। “मीरा, कहो कि तुम्हें कुछ नहीं पता। कहो ये सब अर्जुन की साजिश है।”

मीरा रो रही थी, पर उसकी रीढ़ पहली बार सीधी थी। “क्या तुमने माँ के साइन बनाए थे?”

“चुप रहो।”

“क्या तुमने मेरे हाथ से उनके पुराने कागज निकलवाए थे?”

“मीरा, अपनी औकात मत भूलो।”

मीरा ने आँसू पोंछे। “12 साल से भूलती रही। आज याद आ गई।”

राजीव ने दाँत भींचे। “मेरे बिना तुम कुछ नहीं हो।”

“तो मैं कुछ नहीं रहना पसंद करूँगी,” मीरा बोली, “लेकिन तुम्हारी साथी बनकर नहीं।”

उस वाक्य के साथ राजीव का राज खत्म हो गया।

जब पुलिस ने उसके हाथों में हथकड़ी डाली, उसने आखिरी कोशिश आरव को चोट पहुँचाने की की। वह जाते-जाते बुदबुदाया, “झूठा लड़का।”

अर्जुन तुरंत उसके और आरव के बीच खड़ा हो गया। इंस्पेक्टर राठौर ने साफ आवाज में कहा, “नाबालिग को डराने की बात भी दर्ज की जाएगी।”

दरवाजा बंद हुआ तो हवेली में अजीब सन्नाटा भर गया। वही गुब्बारे हवा में हिल रहे थे, वही केक मेज पर पड़ा था, वही रिश्तेदार खड़े थे, लेकिन अब अपमान की जगह थकी हुई सच्चाई थी।

आरव अभी भी नहीं हिला। उसकी छोटी उंगलियाँ अर्जुन की कमीज पकड़े थीं। सावित्री देवी उसके पास आईं। दर्द से कराहते हुए भी वह उसके सामने घुटनों के बल बैठ गईं और उसे सीने से लगा लिया।

“मुझे माफ कर दे, बेटा,” उन्होंने कहा। “मैंने तुझे तुरंत नहीं बचाया।”

आरव कुछ पल तक कठोर रहा, फिर फूट-फूटकर रो पड़ा। “दादी, मैं सच बोल रहा था…”

“मुझे अब पता है,” सावित्री देवी ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा। “और मुझे पहले ही पता होना चाहिए था।”

तारा धीरे-धीरे कुर्सी के पीछे से निकली और दादी से लिपट गई। उधर मीरा अपने बेटे कबीर को देख रही थी। कबीर जमीन पर आँखें गड़ाए था, जैसे वह तय नहीं कर पा रहा था कि पिता से डरना है या सच से।

मीरा उसके सामने बैठ गई। “कबीर, मेरी तरफ देखो।”

“पापा गुस्सा होंगे,” कबीर ने रोते हुए कहा।

“तुमने कुछ गलत नहीं किया।”

“मैं दौड़ रहा था…”

“तुम बच्चे हो। जन्मदिन पर बच्चे दौड़ते हैं। गलती उस आदमी की थी जिसने तुम्हें इस्तेमाल किया।”

अर्जुन ने यह सुना तो उसकी आँखें भर आईं। काश हर बच्चे को यह बात समय पर कोई कह पाता।

जन्मदिन फिर से वैसा नहीं हो सकता था। न कोई जोर से गा सका, न कोई हँसा। लेकिन सावित्री देवी ने कहा, “मोमबत्तियाँ जलेंगी। आरव का दिन उससे छीना नहीं जाएगा।”

केक का एक कोना दब चुका था। क्रीम बह गई थी। चॉकलेट पर रंग-बिरंगी गोलियाँ तिरछी पड़ गई थीं। अर्जुन ने 8 मोमबत्तियाँ जलाईं। उसके हाथ अब काँप रहे थे, क्योंकि खतरा टल चुका था और दर्द को बाहर आने की जगह मिल गई थी।

आरव के सामने सभी चुप खड़े थे। तारा ने धीरे से कहा, “भैया, विश माँगो।”

आरव ने अपने पिता को देखा। “क्या मैं मांग सकता हूँ कि मम्मी को पता चले कि मैंने कुछ नहीं किया?”

अर्जुन का गला भर गया। उसने आरव के कंधे पर हाथ रखा। “मुझे लगता है, उन्हें पहले से पता है।”

आरव ने धीरे से फूँक मारी। छोटी-सी फूँक, लेकिन 8 की 8 लौ बुझ गईं।

अगले कुछ हफ्ते आसान नहीं थे। परिवार दो हिस्सों में बँट गया। कुछ रिश्तेदारों ने कहा कि अर्जुन ने घर की बात पुलिस तक ले जाकर इज्जत मिटा दी। कुछ बोले कि बूढ़ी माँ को वैसे भी हवेली संभालनी मुश्किल थी। एक मामी ने मीरा को फोन करके कहा कि उसने “एक साइन की बात” पर अपना घर तोड़ लिया।

लेकिन इस बार अर्जुन चुप रहकर अन्याय नहीं पीता रहा। जरूरी बातों का जवाब दिया, जहरीली बातों से दूरी बनाई, और बच्चों के सामने किसी को ऊँची आवाज में बोलने नहीं दिया।

जाँच में राजीव की परतें खुलती चली गईं। सावित्री देवी के खाते से निकाले गए पैसे फर्जी मरम्मत के बिलों में छिपाए गए थे। हवेली की छत के नाम पर 3 गुना खर्च दिखाया गया था। मीरा से दबाव डालकर पुरानी फाइलें निकलवाई गई थीं। कुछ पावर ऑफ अटॉर्नी ऐसे तैयार किए गए थे जिनके बारे में सावित्री देवी को ठीक से बताया ही नहीं गया था। राजीव का रियल एस्टेट कारोबार, जो बाहर से चमकता था, अंदर से कर्ज और लालच से भरा निकला।

मीरा ने तलाक की अर्जी दे दी। वह फैसला न तो फिल्मी था, न आसान। कई रातों तक वह सो नहीं पाई। उसे अपने सारे मौन याद आते रहे—वह दिन जब उसने राजीव की बदतमीजी को “तनाव” कहकर टाल दिया, वह शाम जब उसने अर्जुन के बच्चों को “थोड़ा संभालो” कहकर दोषी बना दिया, वह पल जब उसने अपनी माँ की थकान को राजीव की सुविधा के हिसाब से समझा।

एक शाम वह कबीर के साथ अर्जुन के घर आई। हाथ में स्टील का डब्बा था। दरवाजे पर खड़ी होकर बोली, “मैं आज माफी माँगने नहीं आई हूँ, क्योंकि मुझे पता है कि माफी माँगना आसान है और भरोसा लौटाना मुश्किल।”

अर्जुन ने पूछा, “तो क्यों आई हो?”

मीरा ने डब्बा आगे किया। “नंदिता भाभी जब किसी का मन टूटता था, तो खिचड़ी बनाती थीं। मैंने वैसी बनाने की कोशिश की। शायद शुरुआत इतनी छोटी ही हो सकती है।”

अर्जुन दरवाजा बंद कर सकता था। उसके भीतर का घायल भाई चाहता भी था। लेकिन तभी आरव पीछे से आया। उसने कबीर को देखा। कबीर के हाथ में मुड़ी हुई ड्राइंग शीट थी।

“ये मेरे लिए है?” आरव ने पूछा।

कबीर ने सिर हिलाया और कागज पकड़ा दिया। उसमें 2 बच्चे बने थे, एक उलटी मेज, और ऊपर टेढ़े अक्षरों में लिखा था, “माफ करना, मैं डर गया था।”

आरव काफी देर तक देखता रहा। फिर बोला, “अंदर आ सकते हो। लेकिन आज मेज के चारों ओर दौड़ना नहीं।”

कबीर हँसते-हँसते रो पड़ा। मीरा ने मुँह ढक लिया। अर्जुन ने दरवाजा खोल दिया।

उस रात वे सब रसोई में बैठे। खिचड़ी में नमक थोड़ा ज्यादा था, लेकिन किसी ने शिकायत नहीं की। बात माफी की नहीं हुई। बात स्कूल, होमवर्क, तारा की गुड़िया और आँगन के अमरूद के पेड़ की हुई, जिस पर फिर छोटे-छोटे फल आ रहे थे। टूटे परिवारों में कभी-कभी इतनी-सी सामान्य बातचीत भी चमत्कार जैसी लगती है।

3 महीने बाद राजीव पर फर्जी हस्ताक्षर, विश्वासघात, आर्थिक शोषण और बुजुर्ग पर दबाव डालने के आरोप लगे। उसकी कंपनी से साझेदार अलग हो गए। जिन पार्टियों में वह खुद को बड़ा आदमी साबित करता था, वहाँ उसका नाम धीरे-धीरे फुसफुसाहट बन गया। मीरा ने बयान दिया। सावित्री देवी ने भी। अर्जुन ने कोई जीत महसूस नहीं की। सच सामने आ जाने से बच्चे के भीतर लगी चोट अपने आप नहीं भरती।

एक दिन सावित्री देवी ने वकील बुलाकर वसीयत बदलनी चाही। वह हवेली अर्जुन के नाम करना चाहती थीं।

अर्जुन ने सिर हिला दिया। “नहीं माँ। यह घर किसी की जीत का इनाम नहीं बनेगा।”

“तो क्या करोगे?” उन्होंने पूछा। “बेच देंगे?”

अर्जुन ने आँगन देखा। चूने से उतरी दीवारें, पुरानी लकड़ी का दरवाजा, रसोई की खिड़की, और अमरूद का पेड़ जिसकी छाया में कभी नंदिता बैठती थी।

“इसे ऐसी जगह बनाएँगे जहाँ बच्चों की बात पहले मानी जाए,” उसने कहा।

काम आसान नहीं था। नगर निगम के चक्कर, कागज, अनुमति, मरम्मत, पैसों की व्यवस्था, स्थानीय संस्था से जुड़ना—सबमें महीने लग गए। मीरा ने साथ दिया। मामा दिनेश ने पुराना फर्नीचर ठीक किया। पड़ोस की अरोड़ा आंटी ने बच्चों के लिए किताबें दीं। सावित्री देवी ने अपनी चूड़ियों का एक सेट बेचकर पहली पेंटिंग का खर्च दिया। कबीर और आरव ने मिलकर पुराने खिलौने छाँटे।

धीरे-धीरे हवेली बदलने लगी। जिस आँगन में आरव को झूठा कहा गया था, वहाँ रंगीन चटाइयाँ बिछीं। जिस कमरे में राजीव ने कागज रखे थे, वहाँ काउंसलर का छोटा कमरा बना। रसोई में बच्चों के लिए दूध, फल और हल्का खाना रखा जाने लगा। सावित्री देवी इसे “केंद्र” कहलाना पसंद नहीं करती थीं। वह कहतीं, “यह घर है। और घर का पहला काम सुनना होता है।”

नाम तय करने में सबसे कम समय लगा। दरवाजे पर लकड़ी का बोर्ड लगा—“नंदिता सदन।”

उद्घाटन के दिन हल्की बारिश थी। वही हवेली, वही आँगन, वही दीवारें, लेकिन हवा बदल चुकी थी। गुब्बारे फिर बँधे थे, पर इस बार वे अपमान के नहीं, उम्मीद के गवाह थे।

आरव हाथ में कागज लिए आया। उसने वही पुराना नीला एप्रन पहन रखा था, जिसे 100 बार धोया जा चुका था और जो अब छोटा पड़ने लगा था। फिर भी वह उसे फेंकने को तैयार नहीं था। उसने अर्जुन से टेप माँगा और कुर्सी पर चढ़कर दरवाजे के पास अपना चित्र चिपका दिया।

चित्र में एक घर था, 3 बच्चे थे, खिड़की पर दादी थीं, दरवाजे पर पिता खड़ा था और आँगन में अमरूद का पेड़ था। ऊपर आरव ने टेढ़े अक्षरों में लिखा था—

“यहाँ बच्चों की बात हमेशा सुनी जाती है।”

अर्जुन ने पढ़ा और चेहरा दूसरी तरफ घुमा लिया, ताकि आँसू कोई न देखे।

सावित्री देवी ने आरव के बाल सहलाए। “तेरे दादाजी को यह बहुत पसंद आता।”

आरव ने खिड़की से बाहर देखा। “मम्मी को भी?”

अर्जुन ने उसके कंधे पर हाथ रखा। “सबसे ज्यादा उन्हें।”

उस दिन पहली बच्ची वहाँ आई—7 साल की, बहुत चुप, बड़ी-सी फ्रॉक पहने, आँखें जमीन पर गड़ी हुईं। वह दहलीज पर रुक गई, जैसे उसे यकीन ही न हो कि कोई जगह बिना डाँट के भी हो सकती है।

आरव ने उसे देखा। वह रसोई में गया, प्लेट में चॉकलेट केक का छोटा टुकड़ा रखा और धीरे से उसके पास आया।

“केक लोगी?” उसने पूछा। “यहाँ कोई जबरदस्ती नहीं करता। लेकिन अगर तुम बोलना चाहो, तो सब सुनेंगे।”

बच्ची ने पहली बार आँखें उठाईं।

अर्जुन दरवाजे के पास खड़ा था। उसने अपने बेटे को देखा और समझ गया कि उस टूटे हुए जन्मदिन ने केवल एक अपराध नहीं खोला था। उसने एक दरवाजा भी खोला था—दर्द से भरा, खतरनाक, लेकिन सच्चा दरवाजा—एक ऐसी जगह की ओर, जहाँ किसी बच्चे को सच साबित करने के लिए रोना न पड़े।

शाम को जब सब चले गए, अर्जुन कुछ देर अकेला आँगन में खड़ा रहा। बारिश की बूँदें अमरूद के पत्तों से टपक रही थीं। गुब्बारे धीरे-धीरे हिल रहे थे। रसोई से जैसे नंदिता की हँसी की परछाईं आती महसूस हुई। सावित्री देवी बच्चों के बिखरे कप उठाकर बड़बड़ा रही थीं। तारा कोने में गुड़िया सुला रही थी। आरव दरवाजे के पास अपना चित्र सीधा कर रहा था।

अर्जुन ने उस वाक्य पर उंगली फेरी—

“यहाँ बच्चों की बात हमेशा सुनी जाती है।”

और 2 साल में पहली बार उसने अपने भीतर के सन्नाटे से कुछ वापस माँगना बंद कर दिया। उसने उसे बस रहने दिया—धीमा, गहरा, और आखिरकार थोड़ा-सा शांत।

Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.