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“कैब बुला लो, हम व्यस्त हैं” — पिता ने प्रसव पीड़ा में तड़पती बेटी से कहा; लेकिन 7 दिन बाद आया गुलाबी गिफ्ट बैग और 2 प्रिंटआउट ने परिवार की सबसे कड़वी गद्दारी हिला दी।

भाग 1:
डाइनिंग टेबल के बीचोंबीच जब अनन्या का पानी टूट गया, तब उसके पिता ने प्लेट से नज़र उठाए बिना कहा—

—अगर सच में डिलीवरी हो रही है, तो ओला बुला लो। हम लोग अभी व्यस्त हैं।

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कमरे में कुछ सेकंड के लिए ऐसी चुप्पी छा गई, जैसे किसी ने सारी हवा खींच ली हो। अनन्या मेहरा अपने माता-पिता के गुरुग्राम वाले आलीशान घर के डाइनिंग हॉल में खड़ी थी। उसके हल्के पीले सूट की सलवार भीग चुकी थी, एक हाथ उसके 37 हफ्ते के पेट पर था और दूसरा हाथ कुर्सी की पीठ को कसकर पकड़े हुए था। दर्द उसकी कमर से उठकर पूरे शरीर में ऐसे दौड़ रहा था, जैसे अंदर कोई हड्डियों को मरोड़ रहा हो।

टेबल पर पनीर मलाई टिक्का, दाल मखनी, नान, गुलाब जामुन और महंगे काँच के गिलास सजे थे। हवा में घी, इत्र और चमेली की अगरबत्ती की मिली-जुली खुशबू थी। यह कोई साधारण रात नहीं थी। घर में उसकी छोटी बहन रिया की सगाई की तैयारी पर चर्चा हो रही थी। रिया की शादी आर्यन मल्होत्रा से तय हुई थी, जो दिल्ली के नामी वकील परिवार से था। माँ सविता ने चांदी की थाली निकाली थी, पिता राजीव ने सबके सामने गर्व से बताया था कि उन्होंने जयपुर से खास कारीगर बुलाए हैं, और रिया हर 5 मिनट में अपना फोन सबको दिखाकर शादी के आउटफिट चुनवा रही थी।

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अनन्या लगभग नहीं आई थी। शाम 6 बजे से उसे हल्के-हल्के दर्द शुरू हो गए थे। डॉक्टर ने पहले ही कह दिया था कि बच्चा कभी भी आ सकता है। उसने रिया को मैसेज किया था—

“मुझे कॉन्ट्रैक्शन हो रहे हैं। शायद आज नहीं आ पाऊँ।”

रिया का जवाब तुरंत आया था—

“दीदी, प्लीज ड्रामा मत करना। आज मेरी बात हो रही है। मम्मी पहले ही टेंशन में हैं।”

अनन्या ने फोन बंद कर दिया था। उसे यह वाक्य नया नहीं लगा था। इस घर में बचपन से एक नियम था—रिया की खुशी सबसे ऊपर, अनन्या की तकलीफ बाद में। रिया रो दे तो घर रुक जाता था। अनन्या रो दे तो कहा जाता था, “थोड़ी मजबूत बनो।”

इसलिए वह आ गई।

डिनर शुरू होते ही किसी ने नहीं पूछा कि वह कैसी है। माँ फूलों की सजावट पर बात कर रही थीं। पिता गेस्ट लिस्ट गिन रहे थे। रिया बार-बार कह रही थी कि शादी में कोई चीज सस्ती नहीं लगनी चाहिए। आर्यन ही था जो बीच-बीच में अनन्या की तरफ देख रहा था।

एक तेज दर्द उठा तो अनन्या के मुँह से हल्की चीख निकल गई।

आर्यन तुरंत कुर्सी से झुका।

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—दीदी, आप ठीक हैं?

अनन्या ने मुस्कुराने की कोशिश की, लेकिन उसका चेहरा पीला पड़ चुका था।

—शायद… कॉन्ट्रैक्शन हैं।

सविता ने भौंहें सिकोड़ लीं।

—अनन्या, आज के दिन मत शुरू हो जाना। पूरा परिवार इतने दिनों बाद आराम से बैठा है।

—माँ, यह मेरे हाथ में नहीं है।

रिया ने अपनी नाक चढ़ाई।

—हर बार यही होता है। जब भी मेरी कोई बड़ी बात होती है, दीदी को कुछ न कुछ हो जाता है।

अनन्या ने उसे देखा। दर्द से ज्यादा चोट उस वाक्य ने दी। क्योंकि वह झूठ होते हुए भी इस घर की पुरानी सच्चाई बन चुका था।

अनन्या ज्यादा सोचती है।

अनन्या खुद संभाल लेगी।

अनन्या को आदत है।

फिर एक और दर्द आया। इस बार वह टेबल पर झुक गई। उसकी उंगलियाँ मेजपोश में धँस गईं। गिलास हिल गए। आर्यन ने कुर्सी पीछे धकेली।

—मैं कार निकालता हूँ। इन्हें अस्पताल ले जाना होगा।

रिया ने उसका हाथ पकड़ लिया।

—तुम कहीं नहीं जा रहे।

—रिया, तुम्हारी बहन लेबर में है।

—वह ओवररिएक्ट कर रही है।

अनन्या ने माँ की तरफ देखा।

—माँ, प्लीज… मुझे अस्पताल जाना है।

सविता की आँखें एक पल के लिए नरम हुईं, लेकिन फिर वे रिया की तरफ मुड़ गईं। रिया का चेहरा गुस्से से तना हुआ था।

—मम्मी, अगर अभी सब अस्पताल भागे तो मेरी शादी की बात अधूरी रह जाएगी। वैसे भी पहली डिलीवरी में टाइम लगता है।

राजीव ने धीरे से पानी पिया और कहा—

—डॉक्टर ने ऐसा क्या कहा है? हर दर्द डिलीवरी नहीं होता।

अनन्या बोलने ही वाली थी कि अचानक उसके शरीर के अंदर कुछ गर्म, तेज और अंतिम सा टूट गया। पानी उसके पैरों से बहता हुआ संगमरमर के फर्श पर फैल गया। चमकदार रोशनी में वह साफ दिख रहा था। अब कोई इसे अभिनय नहीं कह सकता था।

अनन्या ने काँपती आवाज़ में कहा—

—मेरा पानी टूट गया है। मुझे अभी अस्पताल ले चलो।

आर्यन फिर उठा।

—बस, अब बहस बंद। मैं लेकर जा रहा हूँ।

रिया ने कुर्सी पर हाथ पटक दिया।

—तुम मेरे मंगेतर हो या इनके ड्राइवर?

आर्यन का चेहरा बदल गया।

—मैं इंसान हूँ, रिया।

रिया की आँखों में गुस्सा भर आया।

—अगर तुम गए तो यह सगाई यहीं खत्म समझो।

सविता घबरा गईं।

—अरे, ऐसी बात क्यों कर रही हो?

राजीव ने थके हुए स्वर में कहा—

—बस करो। अनन्या, अगर तुम्हें इतना ही डर लग रहा है तो कैब बुला लो। हम अभी जरूरी बात में हैं।

यह वाक्य कमरे में नहीं गिरा। यह सीधे अनन्या के अंदर गिरा और कुछ हमेशा के लिए तोड़ गया।

उसने एक पल के लिए सबको देखा। माँ, जो माँ कहलाती थीं लेकिन उसकी आँखों से बच रही थीं। पिता, जिनके लिए वह हमेशा समझदार बेटी थी, यानी वह बेटी जिसे कोई मदद नहीं चाहिए। बहन, जो उसके दर्द को अपनी बेइज्जती समझ रही थी। और आर्यन, जो खड़ा था, पर रिया की धमकी और परिवार के दबाव में जड़ हो गया था।

अनन्या ने अपना बैग उठाया। मोबाइल, चाबी और मेडिकल फाइल संभाली। हर कदम दर्द से काँप रहा था। पानी से भीगे कपड़े उसके पैरों से चिपक रहे थे। वह दरवाजे की तरफ चली।

पीछे से माँ की आवाज आई—

—अनन्या, थोड़ा आराम से जाना।

बस इतना।

आर्यन बाहर तक आया।

—दीदी, मुझे माफ कर दीजिए। मैं…

अनन्या ने उसे बीच में रोक दिया।

—आर्यन, जो लोग सही समय पर खड़े नहीं होते, वे बाद में सिर्फ सफाई देते हैं।

वह लिफ्ट में उतर गई। पार्किंग तक पहुँचते-पहुँचते उसे लगा कि वह गिर जाएगी। लेकिन उसने कार का दरवाज़ा खोला, खुद ड्राइविंग सीट पर बैठी, पेट पर हाथ रखा और धीरे से बोली—

—बस थोड़ी देर, मेरी बच्ची। माँ आ रही है।

रात की सड़कें धुंधली थीं। दिल्ली-गुरुग्राम एक्सप्रेसवे पर हॉर्न, हेडलाइट्स और बारिश की हल्की बूंदें उसके सामने मिल रही थीं। हर कॉन्ट्रैक्शन पर उसका पैर ब्रेक पर काँपता था। उसने 2 बार गाड़ी साइड में रोकी, साँस ली, फिर आगे बढ़ी। एक बार दर्द इतना तेज हुआ कि उसने स्टीयरिंग पर सिर टिकाकर रोते हुए कहा—

—भगवान, इसे बचा लेना। मेरी गलती की सजा इसे मत देना।

उसने माँ को फोन नहीं किया। पिता को नहीं किया। रिया को तो बिल्कुल नहीं। उसने अपनी सोसाइटी की सामने वाली फ्लैट वाली बुजुर्ग पड़ोसन, शांति आंटी को फोन लगाया। 68 साल की शांति आंटी, जो हर मंगलवार उसे पालक पराठे भेजती थीं, जिसने 7वें महीने में उसके पैरों की सूजन देखकर बिना पूछे डॉक्टर का नंबर ढूँढा था।

फोन उठते ही अनन्या रो पड़ी।

—आंटी… मैं अस्पताल जा रही हूँ… अकेली हूँ…

उधर से सिर्फ एक बात आई—

—कौन सा अस्पताल? मैं अभी आती हूँ।

अस्पताल पहुँचते-पहुँचते अनन्या की हालत बिगड़ चुकी थी। गार्ड ने उसे देखकर स्ट्रेचर बुलाया। नर्सें दौड़ीं। डॉक्टर ने जाँच की और चेहरे पर गंभीरता आ गई।

—बेबी का हार्ट रेट गिर रहा है। तुरंत इमरजेंसी सी-सेक्शन करना होगा।

एक नर्स ने फॉर्म लेकर पूछा—

—परिवार में किसे कॉल करें? जिम्मेदार अटेंडेंट का नाम?

अनन्या ने आँखें बंद कर लीं। अंदर दर्द था, बाहर रोशनी थी, और उसके पीछे एक पूरा परिवार था जो डाइनिंग टेबल पर बैठा रह गया था।

उसने धीमे से कहा—

—शांति वर्मा। मेरी पड़ोसन।

नर्स ने पूछा—

—माँ?

अनन्या ने आँख खोलकर छत की सफेद लाइट देखी।

—नहीं। मेरी माँ नहीं।

उसी समय दूर कॉरिडोर से चप्पलों की आवाज आई। शांति आंटी नीली सूती साड़ी के ऊपर पुराना स्वेटर पहने, बाल जल्दबाजी में बाँधे, हाथ में प्लास्टिक का बैग लिए भागती हुई आईं। बैग में बच्चे के डायपर, एक छोटी सी टोपी और स्टील के डिब्बे में चीनी वाली सौंफ रखी थी।

उन्होंने अनन्या का हाथ पकड़ा।

—मैं आ गई, बेटा। अब तू अकेली नहीं है।

अनन्या के होंठ काँपे। ऑपरेशन थिएटर के दरवाजे खुल गए। डॉक्टर उसे अंदर ले जाने लगे। आखिरी पल में शांति आंटी ने उसके माथे पर हाथ रखा।

—हिम्मत रख। तेरी बच्ची तेरा इंतजार कर रही है।

दरवाजा बंद हो गया।

रात 11:48 पर बच्ची रोई। तेज, गुस्से से भरी, ज़िंदा। डॉक्टर ने कहा कि कुछ मिनट और देर होती तो खतरा बहुत बढ़ सकता था। अनन्या ने बस एक पल उसे देखा—गुलाबी चेहरा, छोटी बंद मुट्ठियाँ, आँखों के कोने सिकुड़े हुए। फिर एनेस्थीसिया और खून की कमी ने उसे गहरी धुंध में धकेल दिया।

बाहर उसी समय गुरुग्राम वाले घर में रिया अपनी शादी के लहंगे का रंग चुन रही थी।

सुबह जब अनन्या होश में आई, उसके फोन में सिर्फ 1 मैसेज था। माँ का—

“सब ठीक हो गया न?”

पिता का मैसेज 3 घंटे बाद आया—

“घर पहुँचकर बता देना।”

रिया का कोई मैसेज नहीं था।

लेकिन आर्यन का मैसेज था—

“दीदी, मुझे सच बताना है। रिया को आपके कॉन्ट्रैक्शन के बारे में डिनर से पहले पता था। मैंने आपका मैसेज उसके फोन पर देखा था। उसने कहा था कि अगर सबको पता चल गया तो आप फिर उसकी रात छीन लेंगी। जब आपका पानी टूटा, उसने मम्मी-पापा को यकीन दिलाया कि आप ड्रामा कर रही हैं। मैं कायर निकला। मुझे शर्म है।”

अनन्या ने स्क्रीन को देर तक देखा। फिर उसने फोन बंद कर दिया।

उसने अपनी बच्ची का नाम तारा रखा।

7 दिन बाद, जब टांके अभी भी खिंचते थे, शरीर कमजोर था और तारा पालने में सो रही थी, दरवाजे की घंटी बजी। शांति आंटी किचन में अजवाइन का पानी बना रही थीं। अनन्या ने कैमरा देखा।

दरवाजे पर सविता थीं। हाथ में गुलाबी गिफ्ट बैग। राजीव पीछे खड़े थे। रिया ने काले चश्मे लगा रखे थे, जैसे किसी अस्पताल नहीं, किसी मजबूरी में आई हो।

अनन्या ने दरवाजा आधा खोला।

सविता ने बनावटी मुस्कान के साथ कहा—

—बेटा, हम अपनी नातिन से मिलने आए हैं।

अनन्या ने उनकी आँखों में सीधा देखा।

—कौन सी नातिन?

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भाग 2:

सविता की मुस्कान उसी पल टूट गई। —अनन्या, यह कैसा सवाल है? —वही बच्ची, जिसे जन्म लेते समय आप लोगों ने अकेला छोड़ दिया था? राजीव ने गहरी साँस ली। —हम झगड़ा करने नहीं आए। रिया ने धीरे से कहा— —दीदी, अब यह इमोशनल ब्लैकमेल बंद करो। बच्ची ठीक है, तुम ठीक हो, बात खत्म। अनन्या ने दरवाजा पूरा खोल दिया। —अंदर आइए। तीनों को लगा शायद वह पिघल गई है। सविता ने गिफ्ट बैग टेबल पर रखा, जैसे गुलाबी कपड़े और चाँदी की पायल उस रात का हिसाब बराबर कर सकते थे। शांति आंटी किचन के दरवाजे पर चुप खड़ी थीं। तारा पालने में सो रही थी, उसकी साँसें छोटी-छोटी थीं। अनन्या ने सेंटर टेबल पर रखे 2 प्रिंटआउट उनकी तरफ सरका दिए। —पहले यह पढ़िए। राजीव ने पहला कागज उठाया। वह रिया को भेजा गया अनन्या का मैसेज था: “मुझे 5 मिनट में कॉन्ट्रैक्शन हो रहे हैं। डॉक्टर ने कहा है कि मदद लगे तो अस्पताल जाना। शायद आज जरूरत पड़े।” नीचे साफ लिखा था—रीड। सविता का चेहरा सफेद पड़ गया। —रिया… तूने यह पढ़ा था? रिया ने होंठ भींचे। —तो क्या? हर प्रेग्नेंट औरत को दर्द होता है। अनन्या ने दूसरा कागज उठाया। —और यह आर्यन का मैसेज है। सविता ने काँपते हाथों से पढ़ा। उसमें लिखा था कि रिया ने जानबूझकर बात छिपाई, सबको शांत रखा, और कहा कि अनन्या फिर से उसकी रात खराब कर रही है। कमरे में ऐसी चुप्पी पसर गई कि तारा की हल्की साँस भी सुनाई दे रही थी। राजीव धीरे से सोफे पर बैठ गए। —तूने हमें झूठ बोला? रिया ने चश्मा उतार दिया। उसकी आँखों में पछतावा नहीं, चिढ़ थी। —मैंने सोचा नहीं था कि कुछ सीरियस होगा। अनन्या की आवाज बर्फ जैसी ठंडी हो गई। —लेकिन तूने सोचा था कि हो सकता है। उसी पल पालने से तारा रो पड़ी। सविता ने स्वाभाविक रूप से कदम बढ़ाया, पर अनन्या ने हाथ उठाकर रोक दिया। —नहीं। शांति आंटी ने तारा को उठाया, सीने से लगाया और धीरे-धीरे झुलाने लगीं। सविता ने टूटे स्वर में कहा— —वह हमारी नहीं है। अनन्या ने पहली बार आवाज ऊँची की। —उस रात भी आप यही साबित कर चुके थे।

भाग 3:

कमरे में तारा की रुलाई धीरे-धीरे कम हो रही थी। शांति आंटी उसे ऐसे थामे थीं जैसे कोई अपने शरीर से हवा रोक रहा हो। सविता की आँखें बच्ची पर थीं, लेकिन अनन्या की आँखें अपनी माँ पर।

—नानी बनना खून का रिश्ता नहीं है, माँ। नानी बनना जिम्मेदारी है।

सविता ने गिफ्ट बैग की तरफ देखा।

—हम गलती मानते हैं, बेटा। लेकिन दरवाजे पर यूँ अपमान…

—अपमान?

अनन्या हल्का सा हँसी, लेकिन वह हँसी टूटे काँच जैसी थी।

—अपमान वह था जब मेरा पानी आपके डाइनिंग रूम में टूटा और आप लोग चम्मच से दाल मखनी खा रहे थे। अपमान वह था जब मैंने माँ कहा और आपने रिया की तरफ देखा। अपमान वह था जब पापा ने कहा, “कैब बुला लो।”

राजीव ने सिर झुका लिया।

—मुझसे बहुत बड़ी गलती हुई।

—नहीं पापा। गलती तब होती है जब चाय में नमक पड़ जाए। आपने चुनाव किया था।

रिया अचानक बोल पड़ी—

—बस करो दीदी। तुम चाहती क्या हो? सब तुम्हारे पैरों में गिरें? तुम हमेशा से ऐसे ही करती हो। पहले चुप रहती हो, फिर सबको अपराधी बना देती हो।

राजीव ने तेज आवाज में कहा—

—रिया, चुप रहो।

रिया हिल गई। उसने शायद अपने पिता को पहली बार अपने खिलाफ सुना था।

—पापा?

—मैंने कहा चुप रहो। तुम्हारी बहन मर सकती थी। उसकी बच्ची मर सकती थी। और तू अभी भी ऐसे बोल रही है जैसे किसी ने तेरी मेहंदी का डिजाइन खराब कर दिया हो।

सविता रोने लगीं।

—मुझे नहीं पता था कि बात इतनी गंभीर है।

अनन्या ने धीरे से जवाब दिया—

—मैंने कहा था, माँ। मेरा पानी आपके सामने टूटा था। डॉक्टर का मैसेज था। मेरी हालत आपकी आँखों के सामने थी। आपको पता था। बस आपको रिया ज्यादा जरूरी लगी।

सविता कुर्सी पर बैठ गईं। उनकी साड़ी का पल्लू फर्श पर गिर गया। पहली बार वह वैसी नहीं लग रही थीं जैसी हमेशा दिखती थीं—सलीकेदार, नियंत्रण में, घर की रानी। वह एक ऐसी औरत लग रही थीं जिसने अभी-अभी देखा हो कि उसकी पसंद ने उसकी ही बेटी की आत्मा में कितनी गहरी दरार डाल दी है।

अनन्या ने शांति आंटी से तारा को लिया। बच्ची उसकी छाती से लगते ही शांत हो गई। छोटी सी उंगलियाँ माँ के कुर्ते में उलझ गईं। उस पल कमरे में किसी के पास झूठ बोलने की जगह नहीं बची।

—जब मैं 8 साल की थी, स्कूल के बाहर 2 घंटे खड़ी रही क्योंकि आप लोग रिया के डांस फंक्शन में थे।

सविता ने आँखें बंद कर लीं।

—जब मैं 15 साल की थी, मुझे अपना बर्थडे कैंसिल करना पड़ा क्योंकि रिया का मूड खराब था। जब मेरी कॉलेज डिबेट में मुझे अवॉर्ड मिला, पापा नहीं आए क्योंकि रिया का बॉयफ्रेंड उसे छोड़ गया था। जब मैंने बताया कि मैं माँ बनने वाली हूँ, आपने 5 मिनट बाद रिया की सगाई की तारीख पर बात शुरू कर दी।

रिया ने होंठ मोड़े।

—अब पुरानी बातें निकालोगी?

—पुरानी बातें नहीं। वही रास्ता है जिस पर चलते-चलते आप लोग उस रात तक पहुँचे।

राजीव ने दोनों हाथ जोड़ लिए। उनका चेहरा भारी था।

—अनन्या, मैं पिता होकर फेल हो गया। उस रात मुझे उठना चाहिए था। मुझे चाबी उठानी चाहिए थी। मुझे तुझे अस्पताल ले जाना चाहिए था। मैं रिया के गुस्से से डर गया, सगाई टूटने से डर गया, समाज से डर गया। लेकिन मुझे अपनी बेटी के मरने से डरना चाहिए था।

अनन्या की आँखें भर आईं, पर उसने आँसू गिरने नहीं दिए।

—पापा, आपकी यह बात उस ऑपरेशन थिएटर में मेरे साथ नहीं थी।

राजीव चुप हो गए।

सविता उठीं और अनन्या के पास आईं।

—मुझे एक बार तारा को गोद में लेने दे। सिर्फ 1 बार। मैं कसम खाती हूँ, फिर जो तू कहेगी वही करूँगी।

अनन्या ने तारा को और कसकर पकड़ लिया।

—नहीं।

सविता का चेहरा बिखर गया।

—मैं तेरी माँ हूँ।

—उस रात भी थीं।

यह सुनकर सविता जैसे भीतर से बैठ गईं। कमरे में कोई आवाज नहीं थी, सिर्फ घड़ी की टिक-टिक।

रिया ने बैग उठाया।

—यह सब नाटक है। कुछ दिन बाद खुद फोन करेगी। बच्चे अकेले नहीं पलते। तब देखेंगे किसे जरूरत पड़ती है।

अनन्या ने शांत स्वर में कहा—

—तू सही कह रही है, बच्चे अकेले नहीं पलते। इसलिए मैंने तय किया है कि तारा उन लोगों के बीच नहीं पलेगी जहाँ प्यार शर्तों पर मिलता है।

रिया दरवाजे की तरफ बढ़ी।

—मतलब?

—मतलब तारा अभी इस परिवार से नहीं मिलेगी। न तुमसे, न माँ से, न पापा से। जब तक मुझे यकीन न हो जाए कि तुम लोग उसकी माँ की इज्जत कर सकते हो, तब तक तुम उसके आसपास भी नहीं आओगे।

सविता ने काँपते हुए कहा—

—कितने समय तक?

—महीने लग सकते हैं। साल लग सकते हैं। शायद कभी नहीं।

राजीव ने दर्द से आँखें बंद कर लीं।

—क्या हमें मौका भी नहीं मिलेगा?

—मौका तब मिलता है जब गलती के बाद पछतावा हो। यहाँ तो पहले सच सामने लाना पड़ा, फिर भी रिया कह रही है कि मैं नाटक कर रही हूँ।

रिया पलटी।

—क्योंकि तुम कर रही हो!

तभी दरवाजे पर दस्तक हुई। सब चौंक गए। शांति आंटी ने जाकर दरवाजा खोला। बाहर आर्यन खड़ा था। चेहरे पर थकान, हाथ में एक फाइल और आँखों में भारी अपराधबोध।

रिया चीखी—

—तुम यहाँ क्या कर रहे हो?

आर्यन ने उसकी तरफ नहीं देखा। उसने सीधा अनन्या से कहा—

—दीदी, मुझे देर से सही, पर आज सच बोलना है।

रिया आगे बढ़ी।

—आर्यन, एक शब्द भी बोला तो शादी खत्म।

आर्यन ने शांत होकर जवाब दिया—

—रिया, शादी पहले ही खत्म हो चुकी है। जिस इंसान की वजह से एक माँ और बच्ची खतरे में पड़ीं, उससे मैं जीवन नहीं जोड़ सकता।

कमरे में जैसे बिजली गिर गई। सविता ने घबराकर कहा—

—आर्यन बेटा, बात इतनी दूर मत ले जाओ।

आर्यन ने फाइल टेबल पर रखी।

—आंटी, यह कोई छोटी बात नहीं है। उस रात मैंने भी गलती की। मैं डर गया। लेकिन मैंने अस्पताल की कॉल रिकॉर्डिंग और सोसाइटी के सीसीटीवी फुटेज निकलवाए हैं। अनन्या दीदी अकेली 10:37 पर कार लेकर निकलीं। 11:12 पर अस्पताल पहुँचीं। डॉक्टर की रिपोर्ट में लिखा है कि फेटल डिस्ट्रेस था। अगर देरी होती तो माँ और बच्ची दोनों को गंभीर खतरा था।

राजीव ने फाइल काँपते हाथों से खोली। रिपोर्ट की लाइनें उन्हें चाकू की तरह काटती जा रही थीं। “इमरजेंसी सी-सेक्शन”, “फेटल हार्ट रेट ड्रॉप”, “मदर एग्जॉस्टेड”, “नो फैमिली अटेंडेंट अवेलेबल।”

सविता ने मुँह पर हाथ रख लिया।

—हे भगवान…

आर्यन ने रिया की तरफ देखा।

—मैंने तुम्हें रास्ते में रोकना चाहा था। तुमने कहा था, “अगर वह इतनी ही माँ बनने को उत्सुक है, तो अकेले बन जाए।” क्या तुम अब भी यही कहोगी?

रिया का चेहरा सफेद पड़ गया। पहली बार उसकी आँखों में डर आया। पछतावा नहीं, डर। क्योंकि अब उसकी छवि, शादी, रिश्ता सब टूट रहे थे।

—मैंने गुस्से में कहा था।

अनन्या ने धीमे से कहा—

—कभी-कभी गुस्से में कहा गया वाक्य किसी की जिंदगी का सच खोल देता है।

आर्यन ने अनन्या की तरफ सिर झुकाया।

—मैं आपकी माफी के लायक नहीं हूँ। लेकिन मैं गवाही देने को तैयार हूँ, अगर आपको कभी कानूनी रूप से मदद चाहिए। मैंने अपने परिवार को सब बता दिया है। सगाई अब नहीं होगी।

रिया ने उसके गाल पर थप्पड़ मारने को हाथ उठाया, लेकिन राजीव ने पहली बार उसकी कलाई पकड़ ली।

—बस। अब एक शब्द और नहीं।

रिया की आँखों में आग थी।

—आप सब मेरी जिंदगी बर्बाद कर रहे हैं!

राजीव की आवाज टूट गई।

—नहीं, रिया। तूने अपनी जिंदगी उस रात बर्बाद की जब तुझे अपनी बहन की जान से ज्यादा अपना फंक्शन प्यारा लगा।

सविता फूट-फूटकर रोने लगीं।

—मैंने तुझे बहुत बिगाड़ दिया, रिया। और अनन्या से बहुत छीन लिया।

यह सुनकर अनन्या के अंदर कुछ हिला। वह यह वाक्य 32 साल से सुनना चाहती थी। पर अब जब वह आया, तो उसका दर्द कम नहीं हुआ। कुछ सत्य इतने देर से आते हैं कि वे मरहम नहीं बन पाते, सिर्फ गवाही बनते हैं।

शांति आंटी ने चुपचाप पानी का गिलास रखा। उन्होंने किसी को उपदेश नहीं दिया। वह उन लोगों में थीं जो संकट में भाषण नहीं देते, हाथ पकड़ते हैं।

अनन्या ने तारा की पेशानी चूमी।

—आप लोग अब जा सकते हैं।

सविता ने काँपते हुए पूछा—

—क्या मैं कभी तुझसे मिल पाऊँगी?

अनन्या ने लंबी साँस ली।

—मुझसे शायद। तारा से नहीं, अभी नहीं। पहले आपको समझना होगा कि बच्ची से मिलने का अधिकार उसकी माँ को तोड़कर नहीं मिलता।

राजीव उठे। उनका चेहरा बूढ़ा लग रहा था।

—मैं इंतजार करूँगा। जितना समय लगे।

रिया ने तिरस्कार से कहा—

—बहुत अच्छा। सब लोग महान बन गए। दीदी जीत गईं।

अनन्या ने उसकी तरफ देखा। उसके चेहरे पर न गुस्सा था, न जीत।

—नहीं, रिया। कोई नहीं जीता। उस रात अगर तारा को कुछ हो जाता, तो तुम फिर भी शायद यही कहती कि मैंने ड्रामा किया। इसलिए मैं जीतना नहीं चाहती। मैं बस अपनी बेटी को बचाना चाहती हूँ।

आर्यन चुपचाप पीछे हट गया। दरवाजे के बाहर उसने बस इतना कहा—

—दीदी, आपने जो कहा था, सही कहा था। सही समय पर न खड़ा होने वाला आदमी बाद में सिर्फ सफाई देता है। मैं कोशिश करूँगा कि जिंदगी में फिर वैसा आदमी न बनूँ।

अनन्या ने सिर हिलाया, पर कुछ नहीं कहा।

एक-एक करके सब बाहर चले गए। सविता ने जाते-जाते गुलाबी गिफ्ट बैग उठाने की कोशिश की, फिर रुक गईं।

—यह तारा के लिए है।

अनन्या ने जवाब दिया—

—तारा को अभी खिलौनों की नहीं, सुरक्षित लोगों की जरूरत है।

सविता ने बैग वापस उठाया। इस बार वह सच में समझ गईं कि माफी खरीदने के लिए कोई चीज काफी नहीं होती।

दरवाजा बंद हुआ।

इस बार आवाज बहुत हल्की थी, मगर अनन्या को लगा जैसे किसी पुराने पिंजरे का ताला टूट गया हो।

रात गहरी हो चुकी थी। शांति आंटी ने लाइट धीमी कर दी। बाहर सड़क पर दूधवाले की गाड़ी दूर से बजती हुई गुजरी। कहीं कोई कुत्ता भौंका। शहर अपनी रफ्तार में चल रहा था, जैसे किसी घर की चुप्पी उसका हिस्सा न हो।

अनन्या सोफे पर बैठी रही। तारा उसकी गोद में सो गई थी। उसके छोटे होंठ कभी-कभी हिलते, जैसे वह सपने में दूध पी रही हो। अनन्या ने उसकी उंगली अपनी उंगली से छुई। इतनी छोटी उंगली, फिर भी उसने अपनी माँ को एक पूरी जिंदगी से बाहर निकाल दिया था।

शांति आंटी उसके पास बैठीं।

—बेटा, दिल भारी है?

अनन्या ने सिर हिलाया।

—हाँ। लेकिन डर नहीं है।

—डर क्यों नहीं?

अनन्या ने तारा को देखा।

—क्योंकि आज पहली बार मैंने अपने लिए नहीं, इसके लिए दरवाजा बंद किया है।

शांति आंटी की आँखें भर आईं।

—यही माँ होती है।

अनन्या ने धीमे से कहा—

—नहीं आंटी। माँ होना सिर्फ जन्म देना नहीं होता। उस रात मुझे यह समझ आया। माँ वह होती है जो फोन उठते ही पूछे, “कहाँ आना है?” माँ वह होती है जो आधी रात चप्पल पहनकर अस्पताल पहुँच जाए। माँ वह होती है जो बच्चे को यह न सिखाए कि प्यार माँगना पड़ता है।

शांति आंटी ने उसका हाथ दबाया।

कुछ महीनों बाद राजीव हर रविवार अनन्या के दरवाजे के बाहर एक छोटा डिब्बा रख जाते—कभी फल, कभी दवाई, कभी बच्ची के लिए सूती कपड़े। वह घंटी नहीं बजाते थे। बस डिब्बे पर एक पर्ची होती—

“जब भी अनुमति होगी, मैं सुनने आऊँगा। बोलने नहीं।”

सविता ने थेरेपी शुरू की। उन्होंने 3 बार लंबा पत्र लिखा, पर अनन्या ने सिर्फ तीसरा पत्र पढ़ा, क्योंकि उसमें पहली बार “लेकिन” नहीं था। उसमें लिखा था—

“मैंने तुझे कम प्यार नहीं किया, यह कहना भी झूठ होगा। मैंने तुझे सुविधाजनक समझा, यह सच है।”

रिया ने कई महीनों तक परिवार से बात नहीं की। आर्यन की शादी टूट गई। समाज ने बात बनाई, फिर नई बात खोज ली। लेकिन रिया के चेहरे से वह घमंड धीरे-धीरे उतर गया, क्योंकि पहली बार उसे बिना ताली, बिना केंद्र, बिना बचाव के जीना पड़ा।

अनन्या ने जल्दी माफ नहीं किया। उसने अपने दर्द को किसी धार्मिक संवाद, किसी परिवार की इज्जत, किसी रिश्तेदार की सलाह के नीचे दफन नहीं किया। उसने सीमा रखी। उसने कहा “नहीं”। और हर “नहीं” के बाद तारा की नींद थोड़ी गहरी होती गई।

1 साल बाद, तारा के पहले जन्मदिन पर घर में कोई बड़ी पार्टी नहीं हुई। छोटा सा केक था, पीली फ्रॉक थी, दीवार पर हाथ से कटे सितारे लगे थे। शांति आंटी ने सूजी का हलवा बनाया। आर्यन ने दरवाजे पर गिफ्ट छोड़कर सिर्फ मैसेज किया—

“भगवान उसे सुरक्षित रखे।”

शाम को राजीव और सविता नीचे पार्क में आए। अनन्या ने उन्हें दूर से देखा। वे पास नहीं आए। राजीव के हाथ में छोटा सा गुब्बारा था। सविता की आँखें तारा पर थीं, लेकिन पैरों ने सीमा नहीं पार की। अनन्या ने पहली बार तारा का हाथ उठाकर दूर से हल्का सा हिलाया।

सविता रो पड़ीं। राजीव ने सिर झुका लिया।

वह माफी नहीं थी। वह शुरुआत भी नहीं थी। वह सिर्फ यह संकेत था कि दर्द के बाद भी इंसान पत्थर नहीं बनना चाहता।

उस रात अनन्या ने तारा को सुलाते हुए कान में फुसफुसाया—

—अगर कभी तू डरकर मुझे बुलाएगी, मैं आऊँगी। अगर सब कहेंगे तू बढ़ा-चढ़ाकर बोल रही है, तब भी मैं आऊँगी। अगर पूरी दुनिया कहे कि अभी समय नहीं है, तब भी मैं आऊँगी। तू कभी अकेली अस्पताल नहीं जाएगी। तू कभी प्यार के लिए भीख नहीं माँगेगी।

तारा ने नींद में आँख खोली और अपनी छोटी हथेली अनन्या की ठोड़ी पर रख दी।

अनन्या रोई। लेकिन इस बार वह अस्पताल वाली रोना नहीं था। वह हार का रोना नहीं था। वह किसी भूली हुई बेटी का रोना था, जिसने अपनी बच्ची को देखते हुए तय कर लिया था कि यह कहानी यहीं टूटेगी।

क्योंकि कुछ परिवार खून से बनते हैं, कुछ समय पर पहुँचने से।

और उस रात के बाद अनन्या ने जान लिया था कि उसकी बेटी का घर वह जगह नहीं होगा जहाँ दर्द को ड्रामा कहा जाए।

उसकी बेटी का घर वह होगा जहाँ किसी की 1 पुकार पर कोई जरूर कहे—

—मैं आ रही हूँ।

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