भाग 1:
आंगन में सबके सामने 4 साल के आरव की नन्ही हथेलियों से प्रसाद की थाली गिराकर दादी सावित्री देवी ने कहा,
—मुझे फिर कभी दादी मत कहना। तू इस घर के खून का नहीं है।
थाली मिट्टी के फर्श पर टूटकर बिखर गई। गरम सूजी का हलवा, केसर वाला दूध, किशमिश और बादाम के टुकड़े आरव के छोटे पैरों पर फैल गए। वह सफेद कुर्ता-पायजामा पहने खड़ा था, माथे पर छोटी-सी चंदन की बिंदी लगी थी, बाल साइड से कंघी किए हुए थे, और उसकी आंखें इतनी बड़ी हो गई थीं जैसे किसी ने उसके भीतर से सारी रोशनी खींच ली हो।
लखनऊ के पुराने चौक इलाके में त्रिपाठी परिवार का बड़ा पुश्तैनी घर उस दिन रामनवमी की पूजा के लिए सजाया गया था। दरवाजे पर आम के पत्तों की बंदनवार, आंगन में रंगोली, तुलसी चौरे के पास पीतल का दीपक, रसोई से घी, इलायची और गुड़ की खुशबू, और बाहर गली में बजते भजन। हर चीज त्योहार जैसी थी, बस सावित्री देवी का चेहरा पत्थर जैसा था।
नंदिनी सुबह 4 बजे से जागी हुई थी। उसने अपने हाथों से चने, पूड़ी, हलवा, खीर और पंजीरी बनाई थी। यह सब उसने सावित्री देवी को खुश करने के लिए नहीं किया था। वह जानती थी कि उस घर की सबसे बड़ी औरत उसे कभी बहू नहीं मानेगी। उसने यह सब इसलिए किया था कि आरव को कभी यह महसूस न हो कि वह इस परिवार में पराया है।
आरव जन्म से ही दादी के प्यार के पीछे भागता था। जब भी सावित्री देवी पूजा में बैठतीं, वह उनके पास जाकर कहता,
—दादी, मैं आपके लिए फूल लाया हूं।
सावित्री देवी फूल लेकर मंदिर में रख देतीं, मगर आरव को छूती तक नहीं थीं।
जब वह दौड़कर उनके पैर पकड़ता, वे झटके से अपना पल्लू खींच लेतीं।
—हाथ गंदे हैं तेरे, दूर रह।
नंदिनी हर बार मुस्कुराने की कोशिश करती, लेकिन भीतर कहीं टूट जाती। बच्चे बड़ों की नफरत नहीं समझते। आरव तो बस इतना समझता था कि अगर वह अच्छे कपड़े पहनेगा, धीरे बोलेगा, दादी के लिए प्रसाद ले जाएगा, तो शायद एक दिन दादी उसे गोद में उठा लेंगी।
उस सुबह भी वह छोटी प्लास्टिक की स्टूल पर चढ़कर रसोई में नंदिनी की मदद कर रहा था। उसके हाथों में आटा लग गया था, नाक पर भी थोड़ा सूजी का चूरा चिपका था। नंदिनी ने उसके गाल साफ किए तो वह हंस पड़ा।
—मम्मा, आज दादी मुझे प्यार करेंगी न?
नंदिनी का गला भर आया, मगर उसने मुस्कुराते हुए कहा,
—तू बस अच्छे से प्रसाद देना, बेटा। प्यार मांगना नहीं पड़ता, पर तू संस्कार दिखा सकता है।
—अगर मैं दोनों हाथ से थाली दूं तो?
—हां, दोनों हाथ से।
—और बोलूं, दादी, ये आपके लिए?
—हां, बिल्कुल।
आरव ने बहुत गंभीर चेहरा बनाया, जैसे कोई बड़ा काम करने जा रहा हो।
दोपहर तक पूरा परिवार जमा हो गया। अनिल चाचा अपनी पत्नी और 2 बेटियों के साथ आए। पड़ोस की शुक्ला आंटी, दूर के रिश्तेदार, राजीव के कुछ कारोबारी साथी, और सावित्री देवी की खास मेहमान रश्मि भी आई थी।
रश्मि वही औरत थी जिसे सावित्री देवी हमेशा अपनी असली बहू मानती थीं। शहर के बड़े मिठाई कारोबारी की बेटी, महंगे सूट, हीरे की अंगूठी, और हर बात में बनावटी मिठास। नंदिनी जानती थी कि शादी से पहले सावित्री देवी ने राजीव पर रश्मि से विवाह करने का बहुत दबाव डाला था।
लेकिन राजीव ने नंदिनी को चुना था।
यही अपराध था।
नंदिनी एक मध्यमवर्गीय परिवार की लड़की थी। उसके पिता रेलवे में क्लर्क थे और मां घर से सिलाई करती थीं। नंदिनी ने बी.कॉम के बाद एक स्कूल में अकाउंट का काम शुरू किया था। राजीव से उसकी मुलाकात बाढ़ राहत शिविर में हुई थी, जहां दोनों पुराने कपड़े और राशन बांट रहे थे। राजीव तब अपने पिता की छोटी निर्माण कंपनी संभालने की कोशिश कर रहा था। वह अमीर था, मगर घमंडी नहीं। उसने नंदिनी को पहली बार देखा तो उससे पानी की बाल्टी उठाने में मदद मांगी, और फिर खुद ही हंसकर बोला,
—असल में मदद मुझे चाहिए थी, आपको नहीं।
धीरे-धीरे दोनों मिले, बातें हुईं, और शादी का फैसला किया। सावित्री देवी ने उस दिन ही कहा था,
—घर की लक्ष्मी सड़क से नहीं उठाई जाती।
राजीव ने पहली बार अपनी मां से ऊंची आवाज में कहा था,
—मां, नंदिनी सड़क से नहीं, मेरे दिल से आई है।
लेकिन यह वाक्य सावित्री देवी के अहंकार पर चोट बनकर रह गया।
शादी के दिन उन्होंने सबके सामने मुस्कुराकर नंदिनी को आशीर्वाद दिया, मगर उसके कान के पास झुककर फुसफुसाईं,
—अभी घर में आई है, इसका मतलब यह नहीं कि जड़ पकड़ लेगी।
नंदिनी ने सोचा था, बच्चा होगा तो सब बदल जाएगा। पर जब आरव पैदा हुआ, सावित्री देवी ने अस्पताल में उसे गोद लेने से भी मना कर दिया।
—अभी छोटा है। चेहरा बदलता रहता है। बाद में देखेंगे किस पर गया है।
राजीव ने तब बात टाल दी थी। मगर नंदिनी ने वह वाक्य अपनी हड्डियों तक महसूस किया था।
वक्त बीता। आरव चलना सीख गया, बोलना सीख गया, दादी कहना सीख गया। मगर सावित्री देवी की आंखें कभी नहीं पिघलीं।
कुछ महीने पहले सावित्री देवी अजीब सवाल पूछने लगी थीं।
—आरव को बादाम से एलर्जी तो नहीं?
—खीर खाने के बाद पेट खराब होता है क्या?
—हलवे में गुड़ डालो तो उसे पसंद है या चीनी?
एक दिन उन्होंने नंदिनी को बिना लेबल की एक छोटी शीशी दी।
—यह काशी से लाया हुआ देसी अर्क है। बच्चे का खून साफ रहता है। दूध में 2 बूंद डाल देना।
नंदिनी ने डरकर शीशी रख ली, मगर कभी आरव को नहीं दी। उसने राजीव को बताने की सोची, लेकिन उस समय राजीव कानपुर की बड़ी साइट पर फंसा था। कंपनी पर कर्ज, मजदूरों की मजदूरी, बैंक का दबाव। नंदिनी ने सोचा, शायद वह बेकार शक कर रही है।
फिर पूजा से 3 दिन पहले सावित्री देवी ने अचानक कहा,
—इस बार प्रसाद तू बनाएगी। और आरव मेरे लिए अपने हाथ से थाली लेकर आएगा। अगर इस घर का बच्चा कहलाना है, तो संस्कार दिखाए।
नंदिनी को लगा शायद यह मौका है। शायद इतने साल बाद दादी का मन बदले। शायद त्योहार के दिन कोई कठोर दिल भी नरम हो जाए।
मगर उस दोपहर, जब आरव थाली लेकर सावित्री देवी के सामने खड़ा हुआ, नंदिनी को उनकी आंखों में कोई नरमी नहीं दिखी। वहां एक ठंडी तैयारी थी।
आरव ने दोनों हाथों से थाली उठाई।
—दादी, ये प्रसाद आपके लिए है। मम्मा ने बनाया है। मैंने भी किशमिश डाली है।
कुछ रिश्तेदार मुस्कुरा दिए। किसी ने कहा,
—अरे वाह, कितना संस्कारी बच्चा है।
रश्मि ने होंठ दबाकर देखा। सावित्री देवी ने पहले आरव को ऊपर से नीचे तक देखा, फिर नंदिनी को, फिर राजीव को जो मेहमानों के साथ दरवाजे पर खड़ा था।
अगले ही पल उन्होंने पैर उठाकर थाली को इतनी जोर से लात मारी कि पीतल की कटोरी दूर जाकर दीवार से टकराई।
हलवा फर्श पर फैला। खीर की धार रंगोली पर बह गई। आरव की उंगलियां हवा में ही रह गईं।
वह तुरंत नहीं रोया। पहले उसने खाली हथेलियों को देखा। फिर दादी का चेहरा। फिर नंदिनी को।
—मम्मा, मैंने गलत पकड़ा था क्या?
यह सुनते ही नंदिनी दौड़कर उसे सीने से लगा ली।
—नहीं, मेरे बच्चे। तूने कुछ गलत नहीं किया।
सावित्री देवी की आवाज फिर गूंजी,
—गलती इसकी नहीं, तेरी है। पराए खून को त्रिपाठी नाम दे देने से वह त्रिपाठी नहीं हो जाता।
पूरा आंगन जम गया।
राजीव का चेहरा सफेद पड़ गया। उसने धीमे कदमों से आगे आकर पूछा,
—मां, आपने मेरे बेटे से अभी क्या कहा?
सावित्री देवी ने तिरछी मुस्कान से कहा,
—तेरा बेटा? इतना भरोसा है?
नंदिनी के कानों में जैसे धमाका हुआ। रिश्तेदारों की फुसफुसाहट शुरू हो गई। रश्मि ने नजरें झुका लीं, मगर उसके चेहरे पर छुपी हुई संतुष्टि थी।
राजीव ने आरव को नंदिनी की बांहों में देखा। बच्चा सिसक रहा था, मगर फिर भी दादी की तरफ देख रहा था, जैसे अभी भी उम्मीद हो कि वह कहेंगी, “गलती हो गई।”
राजीव की आवाज कांप रही थी, पर कठोर थी।
—मां, अभी इसी वक्त इस घर से बाहर जाइए।
सावित्री देवी ने भौंहें उठाईं।
—मुझे मेरे ही घर से निकालेगा?
—यह घर अब मेरे नाम है। और इसमें मेरे बेटे का अपमान करने वालों की जगह नहीं।
आंगन में खलबली मच गई। अनिल चाचा बीच में आए।
—राजीव, त्योहार का दिन है। बात बढ़ा मत।
राजीव गरजा,
—जिस दिन एक 4 साल के बच्चे की थाली लात मारकर तोड़ी जाए, उस दिन त्योहार खत्म हो जाता है।
सावित्री देवी ने अपना पल्लू संभाला और दरवाजे की ओर बढ़ीं। पर जाते-जाते उन्होंने नंदिनी के पास आकर धीमी आवाज में कहा,
—खेल अभी शुरू हुआ है।
नंदिनी के शरीर में ठंड दौड़ गई।
उसी समय आरव ने अचानक पेट पकड़ लिया।
—मम्मा… दर्द हो रहा है।
नंदिनी ने सोचा डर की वजह से होगा। उसने उसे गोद में उठाया। पर आरव का चेहरा पीला पड़ता जा रहा था। उसके माथे पर पसीना चमकने लगा।
—मम्मा, नींद आ रही है…
राजीव ने हाथ लगाया तो बच्चे की उंगलियां बर्फ जैसी थीं।
अगले ही पल आरव ने नंदिनी की साड़ी पर उल्टी कर दी। उसमें हलवे के टुकड़े, किशमिश और दूध की गंध थी। वही प्रसाद, जिसका छोटा-सा कौर उसने रसोई में चखा था।
नंदिनी की आंखें फैल गईं। सावित्री देवी दरवाजे पर रुक गईं, मगर मुड़ी नहीं।
राजीव चिल्लाया,
—गाड़ी निकालो! अभी अस्पताल!
नंदिनी ने आरव को सीने से भींचा, और पहली बार उसे लगा कि थाली टूटना उस दिन की सबसे छोटी त्रासदी थी।
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भाग 2:
अस्पताल पहुंचते-पहुंचते आरव की पलकों की हरकत धीमी पड़ने लगी थी, और नंदिनी बार-बार उसके गाल थपथपाकर कह रही थी, —बेटा, आंख खोलो, मम्मा को देखो। राजीव गाड़ी ऐसे चला रहा था जैसे सड़क, सिग्नल और भीड़ सब गायब हो चुके हों। इमरजेंसी में डॉक्टर ने बच्चे की हालत देखते ही स्ट्रेचर मंगाया। —बच्चे ने क्या खाया था? नंदिनी की आवाज टूट गई। —घर का प्रसाद… हलवा और खीर… सिर्फ 1 छोटा कौर। डॉक्टर ने तुरंत पेट साफ करने, खून की जांच और टॉक्सिकोलॉजी टेस्ट का आदेश दिया। दरवाजा बंद हुआ तो नंदिनी दीवार से टिककर बैठ गई। राजीव ने उसकी ओर देखा, मगर बोल नहीं पाया। कुछ देर बाद उसे अचानक याद आया कि 6 महीने पहले घर में चोरी की कोशिश के बाद उसने रसोई और आंगन में छोटे कैमरे लगवाए थे। उसने फोन निकाला, सिक्योरिटी ऐप खोला और सुबह की रिकॉर्डिंग देखने लगा। स्क्रीन पर रसोई दिखी। नंदिनी चने छानने बाहर गई थी। आरव जूते ढूंढने कमरे की तरफ भागा था। रसोई खाली थी। तभी सावित्री देवी अंदर आईं। वे सीधे प्रसाद की थाली के पास गईं, पल्लू में छुपी छोटी शीशी निकालीं, और खीर के भगोने में 3 बूंदें टपका दीं। फिर चम्मच से धीरे-धीरे मिलाया। नंदिनी ने चीख दबाने के लिए अपना मुंह बंद कर लिया। राजीव का हाथ कांपने लगा। —मेरी मां… मेरे बच्चे को… उसी वक्त डॉक्टर बाहर आया। —जहर की आशंका है। बच्चा फिलहाल सांस ले रहा है, लेकिन अगले 24 घंटे बहुत जरूरी हैं। राजीव ने पुलिस को फोन किया। तभी अस्पताल के गलियारे में सावित्री देवी की आवाज गूंजी। —मेरा पोता कहां है? मुझे मेरे पोते से मिलने दो। उनके साथ अनिल चाचा, रश्मि और 2 रिश्तेदार थे। सावित्री देवी ने नंदिनी पर उंगली तानी। —इस औरत ने बच्चे को जहर दिया है ताकि मुझे फंसाए और घर हड़प ले। नंदिनी उठी, मगर राजीव उसके सामने खड़ा हो गया। —एक कदम और आगे बढ़ीं तो मैं भूल जाऊंगा कि आप मेरी मां हैं। सावित्री देवी हंसीं। —तू मुझे धमकाएगा? उस बच्चे ने तेरी नसों से क्या छीन लिया है, जानता भी है? रश्मि ने घबराकर कहा, —आंटी, अभी नहीं… सावित्री देवी ने उसे घूरा, पर देर हो चुकी थी। राजीव ने मोबाइल पुलिस अधिकारी के हाथ में दे दिया। वीडियो चल पड़ा। रसोई, शीशी, बूंदें, चम्मच… सब साफ दिख रहा था। गलियारे में सन्नाटा जम गया। तभी राजीव के फोन पर अस्पताल लैब से एक और संदेश आया। नई डीएनए जांच का शुरुआती परिणाम स्क्रीन पर चमका। आरव, राजीव त्रिपाठी का जैविक पुत्र था। सावित्री देवी की आंखों में पहली बार डर उतरा, और रश्मि के चेहरे से रंग उड़ गया।
भाग 3:
राजीव ने वह रिपोर्ट ऐसे पकड़ी थी जैसे किसी ने उसके हाथ में जलता हुआ कोयला रख दिया हो। कागज पर लिखे शब्द साफ थे, मगर उसके भीतर 4 साल पुराना अंधेरा टूट रहा था।
आरव उसका बेटा था।
उसका अपना खून।
नंदिनी ने रिपोर्ट देखी तो उसकी सांस रुक गई। उसे कभी शक नहीं था, लेकिन दुनिया के सामने सच का कागज हाथ में होना अजीब दर्द देता है। जैसे किसी ने पहले झूठ से जख्म दिया हो, फिर सच से पट्टी बांधी हो।
पुलिस अधिकारी ने सावित्री देवी से पूछा,
—आप इस वीडियो के बारे में क्या कहना चाहेंगी?
सावित्री देवी ने तुरंत अपना चेहरा बदल लिया। आंखों में आंसू लाने की कोशिश की, आवाज में बुजुर्ग मां वाली थरथराहट भर ली।
—मुझे नहीं पता वह शीशी क्या थी। मैंने तो पूजा का गंगाजल डाला था। ये लोग मुझे फंसाना चाहते हैं।
राजीव ने धीरे से कहा,
—गंगाजल पल्लू में छुपाकर नहीं लाया जाता, मां।
सावित्री देवी का चेहरा तमतमा गया।
—तू अपनी मां से ऐसे बात करेगा? मैंने तुझे जन्म दिया है।
—और आपने मेरे बेटे की जान लेने की कोशिश की।
—वह बच्चा तेरे लायक नहीं था।
गलियारे में खड़े लोगों ने जैसे एक साथ सांस रोक ली। सावित्री देवी को शायद एहसास हुआ कि शब्द मुंह से निकल गए हैं। उन्होंने तुरंत बात संभालनी चाही।
—मेरा मतलब है… वह औरत…
नंदिनी ने पहली बार सीधे उनकी आंखों में देखा।
—मेरा नाम नंदिनी है। 5 साल से आप मुझे वह औरत कहती रहीं। आज मेरे बच्चे को जहर देने के बाद भी आपका गुस्सा मुझ पर है, पछतावा उस पर नहीं।
रश्मि पीछे हट रही थी। उसके चेहरे पर साफ लिखा था कि वह भागना चाहती है। राजीव ने उसे देख लिया।
—रश्मि, तुम रुको।
—मुझे कुछ नहीं पता, राजीव। मैं तो आंटी के साथ आई थी।
—सच?
राजीव ने जेब से दूसरा फोन निकाला। वह सावित्री देवी का पुराना फोन था, जो घर के पूजा कमरे की दराज में पड़ा रहता था। अस्पताल आते समय राजीव ने घर से सिक्योरिटी हार्ड ड्राइव के साथ वही फोन भी उठा लिया था, क्योंकि उसे अचानक याद आया था कि उसकी मां पुराने फोन में कई नंबर सेव रखती थीं।
उसने स्क्रीन खोली। कई संदेश पहले ही डिलीट थे, मगर क्लाउड बैकअप में बचे हुए थे। पुलिस अधिकारी ने फोन अपने हाथ में लिया।
संदेशों में रश्मि और सावित्री देवी की बातें थीं।
“पुरानी रिपोर्ट अभी भी काम आ सकती है।”
“राजीव को बस एक झटका चाहिए।”
“बच्चा बीमार पड़ेगा तो शक नंदिनी पर जाएगा।”
“अगर नंदिनी घर से निकली तो राजीव टूटेगा, फिर तुम संभाल लेना।”
नंदिनी को लगा किसी ने उसके पैरों के नीचे से जमीन खींच ली। यह केवल दादी की नफरत नहीं थी। यह एक रचा हुआ जाल था, जिसमें एक 4 साल के बच्चे को चारा बनाया गया था।
पुलिस अधिकारी ने रश्मि की तरफ देखा।
—आप हमारे साथ चलिए।
रश्मि रो पड़ी।
—मैंने जहर नहीं डाला। कसम से नहीं। मुझे लगा आंटी सिर्फ बच्चा बीमार करके नंदिनी को दोष देंगी। मैं नहीं जानती थी कि हालत इतनी खराब हो जाएगी।
सावित्री देवी ने चीखकर कहा,
—चुप रह, निकम्मी लड़की!
रश्मि भी टूट गई।
—निकम्मी मैं नहीं, आप हैं! आपने कहा था राजीव मेरा होना चाहिए था। आपने कहा था नंदिनी ने आपका बेटा चुरा लिया। आपने ही उस लैब वाले को पैसे दिए थे!
राजीव की आंखों में नया सवाल जला।
—कौन-सा लैब वाला?
सावित्री देवी चुप हो गईं।
रश्मि ने कांपते हुए कहा,
—4 साल पहले… जब नंदिनी गर्भवती थी… आपने नकली डीएनए रिपोर्ट बनवाई थी।
नंदिनी ने राजीव की तरफ देखा। राजीव की पलकें झुक गईं। वह सच जो उसने सालों छुपाकर रखा था, अब सबके सामने आ रहा था।
उसने धीमी आवाज में कहा,
—मां ने मुझे एक रिपोर्ट दिखाई थी। उसमें लिखा था कि बच्चा मेरा नहीं है।
नंदिनी पीछे हट गई।
—तुमने मुझे बताया क्यों नहीं?
राजीव की आंखें भर आईं।
—क्योंकि मैंने उस रिपोर्ट पर भरोसा नहीं किया। क्योंकि मैं तुम्हें जानता था। क्योंकि तुम 8 महीने की गर्भवती थीं और मैं तुम्हें उस गंदे झूठ से तोड़ना नहीं चाहता था।
—पर तुम्हारे मन में कभी…
—नहीं। एक पल भी नहीं।
उसकी आवाज बिखर गई।
—अगर शक होता तो मैं आरव को जन्म से पहले नाम क्यों देता? उसके लिए पहला झूला क्यों खरीदता? उसकी हर रिपोर्ट पर रातभर क्यों बैठता? मैं बेवकूफ था कि मैंने मां के झूठ को वहीं खत्म नहीं किया। मैंने सोचा चुप रहने से घर बच जाएगा।
नंदिनी की आंखों से आंसू बहने लगे।
—घर चुप रहने से नहीं बचता, राजीव। चुप्पी में जहर पलता है।
यह वाक्य सावित्री देवी के चेहरे पर थप्पड़ की तरह पड़ा।
उसी समय आईसीयू से डॉक्टर बाहर आए। सबकी नजरें उनकी ओर मुड़ गईं।
—बच्चा खतरे से बाहर है, लेकिन अभी निगरानी में रहेगा। शरीर में कीटनाशक जैसा रसायन पाया गया है। मात्रा कम थी, मगर उम्र के हिसाब से बहुत गंभीर थी। देर होती तो परिणाम अलग हो सकता था।
नंदिनी के घुटने जवाब दे गए। राजीव ने उसे संभाला। राहत भी कभी-कभी इतनी भारी होती है कि इंसान खड़ा नहीं रह पाता।
डॉक्टर ने आगे कहा,
—बच्चे ने शायद बहुत कम मात्रा ली थी। यही उसकी बचत बन गई।
नंदिनी को याद आया, उसने आरव को बस छोटा-सा कौर चखाया था। अगर आरव ने पूरी कटोरी खा ली होती, अगर पूजा में बाकी बच्चों ने भी प्रसाद खा लिया होता, अगर सावित्री देवी की योजना थोड़ी और सफल हो जाती…
वह कांप गई।
पुलिस ने उसी रात सावित्री देवी को हिरासत में ले लिया। अस्पताल के गलियारे में रिश्तेदार खड़े थे, पर कोई उनके पक्ष में आगे नहीं आया। जो औरत कुछ देर पहले घर की मालकिन जैसी खड़ी थी, अब पुलिस की महिला कॉन्स्टेबल के सामने बौनी लग रही थी।
जाते-जाते उन्होंने राजीव को देखा।
—तू अपनी मां को जेल भेजेगा?
राजीव ने बहुत देर तक उन्हें देखा। उस नजर में बचपन की यादें थीं, मां की उंगली पकड़कर स्कूल जाना था, बीमारी में माथे पर रखी पट्टी थी, और फिर उसी मां के हाथ से बच्चे की खीर में जहर गिरता हुआ वीडियो था।
—मां वही होती है जो बच्चे की जान बचाए। जो बच्चे की जान ले, वह सिर्फ अपराधी है।
सावित्री देवी की आंखों में आग भर गई।
—मैंने तेरे लिए सब किया।
—मेरे लिए नहीं। अपने घमंड के लिए।
—उस औरत ने तुझे मुझसे दूर किया।
राजीव ने नंदिनी का हाथ पकड़ा।
—नहीं। आपने खुद मुझे अपने से दूर किया, जिस दिन आपने मेरे बेटे की थाली लात मारी।
रश्मि को भी पूछताछ के लिए ले जाया गया। बाद की जांच में वह पुराना लैब कर्मचारी मिला, जिसने पैसे लेकर राजीव की नमूना रिपोर्ट बदल दी थी। पैसे रश्मि के पिता की कंपनी के खाते से घुमाकर भेजे गए थे, पर निर्देश सावित्री देवी के थे। पुराने कॉल रिकॉर्ड, बैंक ट्रांसफर और संदेशों ने सच को खोलकर रख दिया।
सावित्री देवी ने कोर्ट में भी पहले कहा कि सब साजिश है। फिर बोलीं कि वह सिर्फ नंदिनी को सबक सिखाना चाहती थीं। फिर बोलीं कि उन्हें नहीं पता था कि बच्चा प्रसाद चख लेगा। हर बयान पिछले से ज्यादा डरावना था, क्योंकि किसी भी बयान में पछतावा नहीं था।
एक सुनवाई में जज ने पूछा,
—आपको बच्चे से कोई निजी शिकायत थी?
सावित्री देवी ने सिर ऊंचा करके कहा,
—वह मेरे बेटे को उस लड़की से बांधे हुए था।
कोर्ट रूम में बैठे लोग सन्न रह गए। नंदिनी ने आरव को उस दिन कोर्ट नहीं लाया था। वह चाहती थी कि आरव को यह कभी न सुनना पड़े कि उसकी दादी ने उसे बच्चा नहीं, बेड़ी समझा था।
मामला लंबा चला, मगर सबूत मजबूत थे। सावित्री देवी पर बच्चे को नुकसान पहुंचाने की कोशिश, जहर देने, साजिश और फर्जी दस्तावेज बनवाने के आरोप लगे। रश्मि ने सरकारी गवाह बनकर पूरा सच बताया। उसे भी सजा से बचाव नहीं मिला, मगर उसकी गवाही से साजिश की हर परत खुली।
पर असली लड़ाई अदालत से बाहर थी।
आरव अस्पताल से घर लौट आया, पर वह पहले जैसा नहीं था। पहले वह आंगन में दौड़ता था, अब अचानक रुककर पूछता,
—मम्मा, इसमें कुछ मिलाया तो नहीं?
पहले वह मेहमानों को देखकर खिल जाता था, अब दरवाजे की घंटी बजते ही नंदिनी के पीछे छुप जाता।
पहले वह दादी शब्द सुनकर मुस्कुराता था, अब उसके चेहरे पर उलझन आ जाती।
एक रात नंदिनी ने उसे दूध दिया। उसने कप को देखा और धीमे से पूछा,
—मम्मा, अगर कोई मुझे प्यार नहीं करता तो क्या मैं बीमार हो जाता हूं?
नंदिनी का दिल चकनाचूर हो गया। उसने कप नीचे रखा और उसे गोद में भर लिया।
—नहीं, मेरे राजा। किसी का प्यार न करना उसकी बीमारी है, तेरी नहीं।
—दादी मुझे क्यों नहीं चाहती थीं?
राजीव दरवाजे पर खड़ा था। वह अंदर आया, आरव के पास बैठा और उसका छोटा हाथ अपने हाथ में लिया।
—क्योंकि दादी का दिल बहुत गुस्से से भर गया था। लेकिन बेटा, किसी बड़े की गलती से बच्चा छोटा नहीं हो जाता।
आरव ने पूछा,
—मैं आपका बेटा हूं न?
राजीव टूट गया। उसने आरव को सीने से लगा लिया।
—तू मेरा बेटा है। मेरी सांस है। मेरी दुनिया है।
उस रात 3 लोग रोए। मगर पहली बार वे एक-दूसरे से कुछ नहीं छुपा रहे थे।
राजीव ने घर की चाबियां बदलीं। पूजा कमरा फिर से सजाया गया, मगर उस कोने को खाली छोड़ दिया गया जहां सावित्री देवी बैठती थीं। नंदिनी ने उनके पुराने फ्रेम हटवाए नहीं। उसने बस उन्हें स्टोर रूम में रख दिया। मिटाने से इतिहास खत्म नहीं होता, मगर उसे घर के मंदिर में जगह देना भी जरूरी नहीं होता।
परिवार के कई रिश्तेदार माफी मांगने आए। अनिल चाचा ने सिर झुकाकर कहा,
—हमें पहले समझना चाहिए था। इतने साल हम चुप रहे।
नंदिनी ने शांत स्वर में कहा,
—आपकी चुप्पी ने उन्हें हिम्मत दी।
किसी के पास जवाब नहीं था।
कुछ ने कहा,
—बुजुर्गों से गलती हो जाती है।
राजीव ने दरवाजा खोलकर कहा,
—गलती नमक ज्यादा पड़ना होती है। बच्चे के प्रसाद में जहर डालना अपराध है।
धीरे-धीरे घर ने सांस लेना शुरू किया। आरव को काउंसलर के पास ले जाया गया। नंदिनी ने फिर रसोई में गाना गुनगुनाना शुरू किया। राजीव ने काम कम किया और शाम 7 बजे तक घर आने लगा। वह आरव के साथ छत पर पतंग उड़ाता, उसे साइकिल चलाना सिखाता, और हर रात कहानी सुनाता जिसमें राजकुमार को किसी राजवंश की नहीं, अपने साहस की जरूरत होती थी।
1 साल बाद फिर रामनवमी आई।
सुबह नंदिनी 4 बजे नहीं उठी। इस बार वह 7 बजे उठी, आराम से नहाई, पीली साड़ी पहनी और रसोई में गई। राजीव पहले से वहां था। उसने चने भिगो दिए थे, मगर नमक इतना डाल दिया था कि नंदिनी हंस पड़ी।
—तुम्हें रसोई से दूर ही रहना चाहिए।
राजीव मुस्कुराया।
—मुझे मौका दो। मैं सीख रहा हूं।
आरव भी आया। वह अब 5 साल का था। थोड़ा लंबा, थोड़ा शांत, मगर आंखों में फिर चमक लौट आई थी। उसने पूछा,
—आज प्रसाद बनेगा?
नंदिनी रुक गई। राजीव ने उसकी तरफ देखा।
—अगर तू चाहे तो बनेगा। अगर नहीं चाहे तो हम कुछ और बनाएंगे।
आरव ने कुछ देर सोचा।
—हलवा बनेगा। पर मैं किसी को देकर प्यार नहीं मांगूंगा।
नंदिनी की आंखें भर आईं। उसने कहा,
—बिल्कुल नहीं। प्यार थाली से नहीं खरीदा जाता।
आरव ने हंसकर कहा,
—तो मैं खुद खाऊंगा। पापा को थोड़ा दूंगा। आपको ज्यादा दूंगा।
राजीव ने नाटक किया,
—मुझे थोड़ा क्यों?
—क्योंकि आपने पिछली बार नमक ज्यादा डाला था।
रसोई में हंसी गूंजी। वही रसोई जहां कभी कैमरे ने जहर की बूंदें कैद की थीं, आज फिर इलायची और घी की खुशबू से भर गई थी।
पूजा के बाद नंदिनी ने 3 कटोरियों में हलवा निकाला। एक आरव के लिए, एक राजीव के लिए, एक अपने लिए। चौथी कटोरी नहीं बनी। कोई खाली जगह किसी जहरीले रिश्ते के नाम नहीं छोड़ी गई।
आरव ने पहला कौर खाया। कुछ पल चुप रहा। नंदिनी की सांस अटक गई।
फिर वह मुस्कुराया।
—मम्मा, इस बार पेट में डर नहीं लगा।
नंदिनी ने उसे कसकर गले लगा लिया।
राजीव ने आंखें पोंछीं।
आंगन में तुलसी के पास दीपक जल रहा था। बाहर गली में भजन चल रहा था। सूरज की रोशनी रंगोली पर पड़ रही थी, जिसमें आरव ने अपने हाथ से 3 छोटे फूल बनाए थे।
उस दिन नंदिनी ने समझा कि परिवार हमेशा खून से नहीं बनता। कभी-कभी परिवार वह होता है जो टूटे हुए बच्चे की आंखों में फिर भरोसा लौटा दे। जो चुप्पी को परंपरा नहीं बनने देता। जो अपराध को मां का अधिकार कहकर माफ नहीं करता।
और कभी-कभी एक घर सच में तब बसता है, जब उससे वह इंसान निकाल दिया जाता है जो हर रिश्ते को अपने अहंकार का कैदी बनाकर रखना चाहता था।
आरव ने हलवे की कटोरी खत्म की और राजीव से कहा,
—पापा, अगले साल मैं प्रसाद बनाऊंगा।
राजीव ने पूछा,
—किसके लिए?
आरव ने नंदिनी की तरफ देखा, फिर मुस्कुराया।
—हम 3 के लिए। और अगर कोई अच्छा बच्चा आएगा तो उसके लिए भी। लेकिन किसी बुरी दादी के लिए नहीं।
नंदिनी ने उसे डांटा नहीं। कुछ सच बच्चों की भाषा में ही सबसे साफ निकलते हैं।
उसने बस उसके माथे को चूमा और कहा,
—तू बस इतना याद रख, बेटा, तुझे प्यार पाने के लिए किसी के आगे थाली लेकर खड़ा नहीं होना पड़ेगा।
दीपक की लौ हिली, फिर सीधी हो गई।
घर में पहली बार रामनवमी सचमुच शांति लेकर आई थी।
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