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एक विधुर हर शुक्रवार अपनी मर चुकी पत्नी के लिए दूसरी थाली मंगाता था, लेकिन उस रात भूखे बच्चे ने वही थाली खाई… और दरवाजे पर खड़ा अतीत सबकी जिंदगी बदलने आ गया

भाग 1

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अर्जुन राणे ने उस रात अपनी मृत पत्नी की थाली एक भूखे बच्चे के सामने सरका दी, और पूरा ढाबा ऐसे खामोश हो गया जैसे किसी ने किसी पुराने जख्म पर हाथ रख दिया हो।

पुणे के पुराने औद्योगिक इलाके में अर्जुन की छोटी-सी मोटरसाइकिल रिपेयर शॉप थी। दिन भर उसके हाथ ग्रीस, पेट्रोल और लोहे की गंध में डूबे रहते थे। लोग उसे कम बोलने वाला, सीधा आदमी मानते थे, लेकिन कोई नहीं जानता था कि उसकी चुप्पी के अंदर 3 साल से एक खाली कुर्सी रखी थी। हर शुक्रवार रात वह “अन्नपूर्णा ढाबा” के कोने वाले टेबल पर बैठता, 2 थाली मंगवाता और सामने वाली कुर्सी पर अपनी पत्नी मीरा को याद करता।

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मीरा नर्स थी। 3 साल पहले अस्पताल की ड्यूटी से लौटते समय एक तेज रफ्तार ट्रक ने उसकी स्कूटी को टक्कर मार दी थी। उस दिन के बाद अर्जुन की जिंदगी चलती तो रही, पर जैसे इंजन बिना आवाज के जलता रहे। हर शुक्रवार वह वही दाल, वही जीरा राइस, वही आलू की सब्जी और वही मीरा की पसंद की गुलाब जामुन वाली थाली मंगवाता। दूसरी थाली ठंडी हो जाती, फिर वह उसे पैक कराकर घर ले जाता और आधी रात को फेंक देता।

उस रात बारिश तेज थी। ढाबे में बस कुछ लोग थे। शांता काकी, जो वर्षों से वहाँ खाना परोसती थीं, बिना पूछे 2 थाली रख गईं। अर्जुन सामने वाली खाली कुर्सी को देख ही रहा था कि दरवाजा खुला। एक दुबली, थकी हुई औरत अंदर आई। उसकी साड़ी भीग चुकी थी, कंधे पर पुराना बैग था और उसके पीछे 6 साल का एक बच्चा अपनी मां के पल्लू को ऐसे पकड़े था जैसे दुनिया में वही उसका आखिरी सहारा हो।

औरत ने धीरे से कहा, “बस 5 मिनट बैठने दीजिए। पैसे नहीं हैं… बच्चा सुबह से भूखा है।”

मालिक ने झुंझलाकर कहा, “यह धर्मशाला नहीं है। बैठना है तो ऑर्डर देना पड़ेगा।”

बच्चे ने सिर नीचे कर लिया। अर्जुन ने उसकी आंखों में भूख से ज्यादा शर्म देखी। वह शर्म जिसने बच्चे को बच्चा रहने ही नहीं दिया था।

अर्जुन अचानक उठ खड़ा हुआ। उसने सामने रखी दूसरी थाली बच्चे की ओर बढ़ाई और बोला, “ये मेरे साथ हैं। बच्चा खाएगा।”

औरत घबरा गई। “नहीं साहब, हम परेशान नहीं करेंगे।”

“परेशानी खाना नहीं होती,” अर्जुन ने शांत आवाज में कहा, “भूखा रहना परेशानी होती है।”

बच्चा कुर्सी पर बैठा, पर पहले मां की ओर देखा। मां ने सिर हिलाया। फिर वह ऐसे खाने लगा जैसे हर निवाला कहीं गायब हो सकता हो। औरत की आंखें भर आईं। उसने अपना नाम काव्या बताया और बच्चे का नाम आरव।

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अर्जुन ने पूछा, “कहाँ ठहरे हो?”

काव्या चुप हो गई। वही चुप्पी जवाब थी।

अर्जुन के मन में दुकान के पीछे की छोटी कोठरी आई। एक पुराना पलंग, कंबल, हीटर और अंदर से बंद होने वाला दरवाजा। उसने कहा, “आज रात मेरे गैराज के पीछे एक कमरा खाली है। मां-बेटा वहाँ सो सकते हो।”

काव्या ने तुरंत मना किया। उसकी आंखों में डर था, जैसे किसी आदमी की मदद के पीछे हमेशा कोई कीमत छिपी होती हो। लेकिन आरव की पलकें भारी हो चुकी थीं। बच्चा कुर्सी पर ही सोने लगा।

आखिर काव्या ने धीरे से कहा, “सिर्फ आज रात।”

अर्जुन ने बिल चुकाया। बाहर निकलते समय उसने आरव को उठाया। बच्चा बहुत हल्का था, जरूरत से ज्यादा हल्का। काव्या उसे देखती रही—आभार और डर के बीच फंसी हुई।

दुकान पर पहुंचकर अर्जुन ने उन्हें कमरा दिखाया। काव्या ने कांपती आवाज में पूछा, “आप हमारी मदद क्यों कर रहे हैं?”

अर्जुन ने सोते हुए आरव को देखा, फिर मन में मीरा की खाली कुर्सी चमक गई।

“क्योंकि किसी को तो करनी चाहिए,” उसने कहा।

लेकिन उसी रात, जब अर्जुन ऊपर अपने छोटे कमरे में गया, दुकान के बाहर एक काली बाइक आकर रुकी। हेलमेट पहने आदमी ने पीछे की कोठरी की खिड़की की ओर देखा और फोन पर बस 1 वाक्य कहा, “मिल गए… और औरत अकेली नहीं है।”

भाग 2

सुबह अर्जुन नीचे आया तो काव्या फर्श पर जमी पुरानी ग्रीस रगड़ रही थी। उसके हाथ साबुन से लाल हो गए थे। अर्जुन ने कहा, “ये करने की जरूरत नहीं।”

काव्या बोली, “जरूरत है। एहसान खाकर चुप बैठना मुझे नहीं आता।”

अर्जुन ने शांता काकी से बात की। ढाबे में बर्तन धोने और सब्जी काटने का काम खाली था। पैसे कम थे, लेकिन रोज का खाना और हफ्ते के अंत में नकद मजदूरी मिल जाती। काव्या ने तुरंत हां कर दी। आरव स्कूल के बाद गैराज में बैठने लगा। शुरू में वह कोने में चुप रहता, फिर धीरे-धीरे औजारों के नाम पूछने लगा।

“इंजन गुस्सा क्यों करता है?” उसने एक दिन बाइक की आवाज सुनकर पूछा।

अर्जुन पहली बार मुस्कुराया। “क्योंकि उसे सही तेल और सही ध्यान नहीं मिला।”

आरव ने गंभीरता से कहा, “लोग भी ऐसे ही होते हैं क्या?”

उस सवाल ने अर्जुन को अंदर तक हिला दिया।

दिन बीतने लगे। काव्या मेहनत करती, आरव पढ़ता और शाम को 3 लोग पुराने लकड़ी के डिब्बे को मेज बनाकर साथ खाते। अर्जुन ने खुद से कहा कि यह सब अस्थायी है, लेकिन वह चुपके से आरव के लिए दूध, ब्रेड और वही चॉकलेट वाला सीरियल लाने लगा जो बच्चे ने दुकान में बस 1 बार देखकर पसंद किया था।

फिर एक रात आरव तेज बुखार में तपने लगा। काव्या अस्पताल जाने से डर रही थी। “मेरे पास पैसे नहीं हैं,” उसने रोते हुए कहा।

अर्जुन ने बिना बहस किए उसे सरकारी अस्पताल ले गया। दवा, जांच और रातभर की भागदौड़ के बाद डॉक्टर ने कहा कि संक्रमण समय पर पकड़ा गया है। बिल और दवाओं में लगभग ₹4,000 लगे। अर्जुन ने चुपचाप भुगतान कर दिया।

वापसी में काव्या टूट गई। उसने बताया कि उसका पति राघव उसे वर्षों तक मारता रहा। उनकी पहली बेटी परी सिर्फ 3 दिन जिंदा रही थी, और राघव ने उसकी मौत का दोष काव्या पर डाल दिया था। जब उसने आरव को भी मारा, तब काव्या भागी।

फिर उसने अर्जुन से पूछा, “क्या आप हमें इसलिए बचा रहे हैं क्योंकि आपकी पत्नी नहीं रही? क्या आरव आपकी खाली जगह भर रहा है?”

अर्जुन के पास तुरंत जवाब नहीं था। बारिश शीशे पर गिरती रही। फिर उसने कहा, “मीरा की जगह कोई नहीं ले सकता। लेकिन शायद तुम्हें और आरव को बचाते-बचाते मैं खुद भी थोड़ा बच रहा हूं।”

काव्या कुछ बोलती, उससे पहले उसकी नजर सड़क के किनारे खड़ी उसी काली बाइक पर पड़ी। बाइक पर बैठा आदमी हेलमेट उतार रहा था।

वह राघव था।

भाग 3

राघव की आंखों में वही ठंडापन था जिससे काव्या कई साल पहले पहली बार डरी थी। वह सड़क की पीली रोशनी में खड़ा था, जैसे उसे पूरा यकीन हो कि जो चीजें कभी उसकी थीं, वे फिर उसके हाथ में लौट आएंगी। अर्जुन ने तुरंत गाड़ी आगे बढ़ा दी, लेकिन काव्या की सांस अटक गई। पीछे की सीट पर आरव दवा के असर से सो रहा था, पर उसके छोटे हाथ अब भी कांप रहे थे।

दुकान पहुंचकर काव्या ने सबसे पहले दरवाजा बंद किया। वह दीवार से टिक गई और बोली, “वह हमें ढूंढ चुका है। अब हमें जाना होगा।”

अर्जुन ने धीरे से कहा, “भागकर कितनी दूर जाओगी?”

“जहां तक आरव जिंदा रहे,” काव्या ने टूटे हुए स्वर में जवाब दिया।

उस रात कोई नहीं सोया। ऊपर अर्जुन पुराने औजारों के बीच बैठा मीरा की फोटो देखता रहा। फोटो में मीरा मुस्कुरा रही थी, माथे पर छोटी-सी बिंदी, आंखों में वही भरोसा जिसे मौत भी मिटा नहीं पाई थी। अर्जुन ने मन ही मन पूछा, “मैं क्या करूं?” जवाब कहीं बाहर से नहीं आया। जवाब वही था जो वह मीरा के बारे में जानता था। अगर मीरा जिंदा होती, तो वह दरवाजा बंद नहीं करती। वह काव्या और आरव को बचाने के लिए सबसे आगे खड़ी होती।

सुबह सब सामान्य दिखाने की कोशिश करते रहे। काव्या ढाबे गई, आरव स्कूल गया, अर्जुन ने दुकान खोली। पर दोपहर करीब 2 बजे गैराज का शटर आधा उठा और राघव अंदर आ गया। उसकी चाल में धमकी थी, आवाज में मालिकाना हक।

“मेरी पत्नी और मेरा बेटा कहाँ हैं?” उसने पूछा।

अर्जुन ने हाथ से ग्रीस पोंछते हुए कहा, “यहाँ कोई तुम्हारी चीज नहीं रखी।”

राघव हंसा। “चीज नहीं? शादी की है मैंने उससे। बच्चा मेरा है। तुम कौन हो? कोई गैराज वाला, जो किसी और की बीवी को कमरे में रखकर हीरो बन रहा है?”

अर्जुन ने खुद को संभाला। “काव्या यहाँ सुरक्षित है। अगर वह तुमसे नहीं मिलना चाहती, तो तुम नहीं मिलोगे।”

राघव ने जेब से कुछ कागज निकाले। “वकील से बात कर चुका हूं। अदालत में बोलूंगा कि मेरी पत्नी मानसिक रूप से अस्थिर है, बच्चे को लेकर भाग गई, और एक अजनबी आदमी के साथ रह रही है। सोच ले, तेरी दुकान भी जाएगी, इज्जत भी।”

अर्जुन ने सीधे उसकी आंखों में देखा। “जिस आदमी की इज्जत औरतों को मारने से बनती है, उसे इज्जत शब्द बोलना नहीं चाहिए।”

राघव का चेहरा कस गया। वह एक कदम आगे बढ़ा, फिर अचानक मुस्कुराया। “ठीक है। पहले वह खुद आएगी। मांओं को बच्चे से डराकर बुलाना आसान होता है।”

वह चला गया, पर उसकी बात दीवारों में फंसी रह गई।

शाम को काव्या ढाबे से वापस नहीं लौटी। फोन बंद। शांता काकी ने बताया कि एक आदमी ढाबे के बाहर खड़ा था, उसके बाद काव्या ने जल्दी छुट्टी ली। अर्जुन का दिल बैठ गया। वह आरव को लेने स्कूल भागा, लेकिन पता चला कि काव्या उसे पहले ही ले गई थी।

2 घंटे तक अर्जुन ने स्टेशन, बस स्टैंड, सस्ते लॉज, मंदिरों के बाहर, महिला आश्रय गृह और अस्पताल तक खोज लिया। हर जगह वही जवाब—कोई जानकारी नहीं। रात करीब 9 बजे उसके फोन पर अनजान नंबर से कॉल आई।

दूसरी ओर आरव की कांपती आवाज थी। “अर्जुन अंकल… मम्मा ने मुझे बाथरूम में छिपाया है… पापा चिल्ला रहे हैं… दरवाजा नीला है… पुराना घर… शिव मंदिर वाली गली…”

कॉल कट गई।

अर्जुन ने 112 पर फोन किया, लोकेशन बताई और खुद गाड़ी लेकर निकल पड़ा। शिव मंदिर वाली गली शहर के पुराने हिस्से में थी, जहां लोग झगड़ों की आवाज सुनकर खिड़कियां बंद कर लेते थे। नीला दरवाजा आधा खुला था। अंदर शराब की बदबू, टूटे कांच और डर की गंध मिली हुई थी।

कमरे के अंदर राघव ने काव्या की कलाई पकड़ी हुई थी। उसके होंठ से खून बह रहा था। वह कह रहा था, “तू भूल गई थी कि तेरी औकात क्या है? ये बच्चा मेरा है। तू कहीं नहीं जाएगी।”

अर्जुन ने दरवाजे पर खड़े होकर कहा, “हाथ छोड़।”

राघव ने मुड़कर देखा और हंसा। “फिर आ गया मसीहा?”

“बच्चा कहाँ है?”

“तुझसे मतलब?”

अर्जुन जानता था कि उसे गुस्से से नहीं, सावधानी से काम लेना होगा। वह नहीं चाहता था कि आरव फिर हिंसा देखे। उसने धीरे से कहा, “काव्या, आरव कहाँ है?”

काव्या की आंखें बाथरूम की ओर गईं। बस उतना काफी था।

राघव ने उसकी कलाई और जोर से मरोड़ी। काव्या दर्द से चीख उठी। अर्जुन का संयम टूट गया। उसने राघव को खींचकर अलग किया। राघव ने घूंसा मारा, अर्जुन की पसलियों में तेज दर्द उठा, लेकिन उसने जवाब में उसे जमीन पर पटकने के बजाय बस पकड़कर रोके रखा। काव्या भागकर बाथरूम तक पहुंची, आरव को निकाला और पुलिस को फिर फोन किया।

कुछ ही मिनटों में पुलिस आ गई। इस बार राघव की कहानी नहीं चली। काव्या के चेहरे के निशान, टूटी चीजें, पड़ोसियों की आवाजें, आरव का बयान और अर्जुन की कॉल रिकॉर्डिंग—सब उसके खिलाफ खड़े थे। राघव हथकड़ी लगते समय भी बोला, “तू पछताएगी।”

काव्या ने आरव को सीने से लगाकर पहली बार बिना कांपे जवाब दिया, “नहीं। पछताना मैंने आज बंद कर दिया।”

उस रात अर्जुन उन्हें वापस गैराज ले आया। आरव गाड़ी से उतरते ही अर्जुन से लिपट गया। “आप सच में आए,” उसने सुबकते हुए कहा।

अर्जुन ने उसके सिर पर हाथ रखा। “तुमने बुलाया था।”

काव्या थोड़ी दूरी पर खड़ी रो रही थी। उसके चेहरे पर चोट थी, लेकिन आंखों में पहली बार हार नहीं थी। उसने कहा, “मैं तुम्हें बचाने के लिए गई थी।”

अर्जुन ने शांत आवाज में कहा, “मुझे बचाने के लिए गायब मत हुआ करो। कुछ रिश्ते डर से नहीं, भरोसे से बचते हैं।”

काव्या ने पहली बार खुद आगे बढ़कर अपना माथा अर्जुन के सीने से टिकाया। यह कोई फिल्मी प्रेम का पल नहीं था। यह 2 टूटे हुए लोगों का वह पल था जब वे समझ रहे थे कि सुरक्षा भी प्रेम की एक भाषा होती है।

अगले कई महीने आसान नहीं थे। पुलिस स्टेशन, महिला संरक्षण अधिकारी, अदालत, मेडिकल रिपोर्ट, काउंसलिंग, स्कूल की मीटिंग—काव्या की जिंदगी कागजों और बयानबाजी में उलझ गई। राघव ने वकील किया। अदालत में उसने दावा किया कि काव्या अस्थिर है, कि वह बच्चे को पिता से दूर कर रही है, कि अर्जुन जैसा अजनबी आदमी उसके परिवार को तोड़ रहा है।

लेकिन सच धीरे-धीरे सामने आया। शांता काकी ने बयान दिया कि काव्या मेहनती है, समय पर काम करती है और बेटे के लिए हर कौर बचाती है। स्कूल की टीचर ने कहा कि आरव पहले डरता था, पर अर्जुन की दुकान के बाद वह पढ़ाई में सुधरने लगा। पड़ोसी, जो पहले चुप थे, अदालत में बोले कि राघव के घर से अक्सर चीखें आती थीं। डॉक्टर ने चोटों की रिपोर्ट रखी। और सबसे मजबूत बयान आरव का था।

जज ने बच्चे से नरम आवाज में पूछा, “तुम किसके साथ सुरक्षित महसूस करते हो?”

आरव ने काव्या की साड़ी पकड़कर कहा, “मम्मा के साथ। और अर्जुन अंकल के गैराज में। वहाँ कोई चिल्लाता नहीं।”

काव्या की आंखें भर आईं। अर्जुन पीछे बैठा था। उसने सिर झुका लिया, क्योंकि वह नहीं चाहता था कि अदालत उसे हीरो समझे। वह सिर्फ इतना चाहता था कि मां-बेटा फिर उसी अंधेरे में न धकेले जाएं।

अदालत ने काव्या को आरव की पूरी कस्टडी दी। राघव पर 5 साल का प्रोटेक्शन ऑर्डर लगा। बच्चे से मिलने की कोई भी अनुमति मनोवैज्ञानिक जांच और अदालत की निगरानी के बिना नहीं थी। फैसला सुनते ही काव्या की देह जैसे वर्षों बाद ढीली पड़ी। आरव उसकी गोद में चढ़ गया। अर्जुन दूर खड़ा रहा, जब तक काव्या ने मुड़कर उसे नहीं देखा। उसने हाथ बढ़ाया। अर्जुन ने वह हाथ थाम लिया।

जीत के बाद भी जीवन तुरंत सुंदर नहीं हुआ। काव्या रात को कई बार उठकर दरवाजा जांचती। आरव तेज आवाज से डरकर टेबल के नीचे छिप जाता। अर्जुन भी कभी-कभी शुक्रवार की रात मीरा की फोटो देखकर टूट जाता। लेकिन अब किसी का दुख अकेला नहीं था।

काव्या ने ढाबे की नौकरी से आगे बढ़कर एक छोटे रेस्टोरेंट में काम शुरू किया, जहां नियमित वेतन और मेडिकल सुविधा थी। उसने दुकान से कुछ गलियां दूर एक छोटा कमरा किराए पर लिया। आरव स्कूल के बाद फिर भी अर्जुन के गैराज आता। उसके लिए अब एक छोटा टेबल था, जिस पर वह होमवर्क करता और दीवार पर अपनी ड्रॉइंग चिपकाता। एक ड्रॉइंग में उसने 3 लोग बनाए थे—एक आदमी औजार पकड़े, एक औरत पौधा पकड़े, और एक बच्चा बीच में मुस्कुराता हुआ। नीचे लिखा था, “हमारा सुरक्षित घर।”

अर्जुन ने उस कागज को अपनी टूलबॉक्स के ऊपर लगा दिया।

काव्या और अर्जुन ने रिश्ते को जल्दबाजी में नाम नहीं दिया। दोनों जानते थे कि चोट खाए दिल को सहारे और कब्जे में फर्क समझने में समय लगता है। अर्जुन ने कभी काव्या से यह नहीं कहा कि वह उसके कारण ठीक हो गया। काव्या ने भी कभी मीरा की जगह लेने की कोशिश नहीं की। जब भी अर्जुन मीरा की बात करता, काव्या शांत सुनती। जब काव्या परी की छोटी-सी जिंदगी का जिक्र करती, अर्जुन चुपचाप उसके पास बैठता।

एक रात गैराज के बाहर चाय पीते हुए काव्या ने कहा, “परी सिर्फ 3 दिन रही। लेकिन मैं आज भी उसकी मां हूं। कभी-कभी आरव को हंसते देखती हूं तो खुश होती हूं, फिर अपराधबोध होता है कि परी को यह सब नहीं मिला।”

अर्जुन ने धीरे से कहा, “मीरा चली गई, लेकिन उसके लिए मेरा प्रेम नहीं गया। पहले लगता था यह प्रेम अब बेकार है। फिर उस रात आरव ने वही दूसरी थाली खाई… तब समझ आया कि बचा हुआ प्रेम भी किसी को जिंदा रख सकता है।”

काव्या ने उसकी ओर देखा। “क्या तुम मुझे मीरा भूलने के लिए चाहोगे?”

अर्जुन ने तुरंत सिर हिलाया। “नहीं। मैं तुम्हें इसलिए चाहता हूं क्योंकि तुम काव्या हो। मीरा मेरी जिंदगी का हिस्सा है, और तुम मेरी आज की सांस हो। एक को रखने के लिए दूसरे को मिटाना जरूरी नहीं।”

काव्या रो पड़ी। “मैं भी तुम्हें इसलिए नहीं चाहती कि तुमने हमें बचाया। मैं तुम्हें इसलिए चाहती हूं क्योंकि तुमने कभी मुझे एहसान की रस्सी से नहीं बांधा।”

उस रात उन्होंने प्रेम का इजहार धीरे से किया, बिना शोर, बिना वादे की चमक के। बस 2 हाथों ने एक-दूसरे को पकड़ा, और दोनों ने समझ लिया कि यह रिश्ता किसी खाली जगह को भरने के लिए नहीं, बल्कि टूटे हुए जीवनों को सम्मान से जोड़ने के लिए है।

करीब 1 साल बाद, उसी शुक्रवार की रात अर्जुन फिर “अन्नपूर्णा ढाबा” गया। इस बार उसने 2 नहीं, 3 थाली मंगवाई। शांता काकी मुस्कुराईं, लेकिन कुछ बोली नहींं। आरव ने पेट भरकर खाना खाया और फिर गुलाब जामुन की जिद की। काव्या ने उसे डांटा, “इतना खाएगा तो घर तक लुढ़ककर जाना पड़ेगा।”

अर्जुन ने टेबल पर एक छोटी-सी चाबी रखी। काव्या चौंक गई।

“ये दुकान और ऊपर वाले घर की चाबी है,” अर्जुन ने कहा। “मैं तुम्हें मजबूर नहीं कर रहा। बस इतना जान लो, जब भी तुम्हें और आरव को लगे कि दरवाजा चाहिए, यह दरवाजा पहले से खुला है।”

काव्या ने चाबी उठाई। उसकी आंखों में डर नहीं, नमी थी। “ये प्रस्ताव जैसा लग रहा है।”

अर्जुन हल्का-सा मुस्कुराया। “शायद है। लेकिन बिना जल्दबाजी के।”

काव्या ने धीरे से कहा, “मैं तुमसे प्रेम करती हूं।”

अर्जुन कुछ पल बोल नहीं पाया। फिर उसने कहा, “मैं भी। और यह प्रेम किसी की जगह लेने के लिए नहीं है।”

कुछ महीनों बाद काव्या और आरव दुकान के ऊपर वाले घर में आ गए। काव्या ने खिड़की पर तुलसी और मनीप्लांट रखे। आरव ने अपना स्कूल बैग खिड़की के पास रखा। अर्जुन ने मीरा की फोटो शेल्फ पर रहने दी, उसके बगल में काव्या और आरव के साथ पार्क में खिंचवाई गई नई तस्वीर रख दी। काव्या ने कभी मीरा की फोटो हटाने को नहीं कहा। अर्जुन ने कभी परी का नाम दबाने को नहीं कहा।

घर में खोए हुए लोग भी थे, और बचे हुए लोग भी। यही उस घर की सच्चाई थी।

एक शुक्रवार रात आरव ने ढाबे में बैठे-बैठे पूछा, “अर्जुन अंकल, पहले आप सच में अकेले 2 थाली खाते थे?”

अर्जुन ने सिर हिलाया। “हाँ।”

“बहुत दुख होता था?”

“बहुत।”

आरव ने कुछ देर सोचा, फिर बोला, “अगर मीरा आंटी ऊपर से देखती होंगी तो खुश होंगी न? क्योंकि अब उनकी थाली किसी भूखे को मिल गई।”

अर्जुन की आंखें भर आईं। काव्या ने मेज के नीचे उसका हाथ पकड़ लिया।

अर्जुन ने धीमे से कहा, “हाँ, मुझे लगता है वह खुश होंगी। क्योंकि अब वह कुर्सी खाली नहीं लगती।”

समय आगे बढ़ता रहा। राघव अदालत के आदेशों के कारण दूर रहा। आरव धीरे-धीरे डर से बाहर आया। उसने मोटरसाइकिल के पार्ट्स पहचानना सीख लिया और स्कूल में विज्ञान की प्रदर्शनी में “छोटा इंजन” बनाकर इनाम जीता। काव्या अब कम आवाज में नहीं बोलती थी। वह सीधी खड़ी होती, हंसती, मोलभाव करती, फैसले लेती। अर्जुन अब भी हर शुक्रवार मीरा को याद करता, लेकिन उस याद में अब सिर्फ टूटन नहीं थी। उसमें आभार भी था।

वह जान चुका था कि दुख को हराया नहीं जाता। उसे साथ लेकर चलना सीखा जाता है। किसी की मौत का मतलब यह नहीं कि प्रेम खत्म हो गया। और किसी नए प्रेम का मतलब यह नहीं कि पुराना प्रेम धोखा हो गया।

3 साल तक अर्जुन जिस दूसरी थाली को ठंडा होने देता रहा, उसी थाली ने एक भूखे बच्चे को खाना दिया, एक डरी हुई मां को आश्रय दिया और एक टूटे हुए आदमी को यह याद दिलाया कि उसके अंदर अब भी देने लायक जीवन बाकी है।

उस रात ढाबे की खिड़की पर बारिश फिर पड़ रही थी। फर्क बस इतना था कि इस बार सामने वाली कुर्सी खाली नहीं थी। वहाँ काव्या बैठी थी, बगल में आरव अपनी गुलाब जामुन बचाकर रख रहा था, और अर्जुन के दिल में मीरा की याद किसी खुले घाव की तरह नहीं, बल्कि एक शांत दीपक की तरह जल रही थी।

कभी-कभी जिंदगी किसी बड़े चमत्कार से नहीं बदलती। कभी-कभी बस एक आदमी अपनी मृत पत्नी की थाली एक भूखे बच्चे की ओर बढ़ा देता है, और उसी छोटे से क्षण में 3 टूटे हुए लोगों को फिर से परिवार कहने की हिम्मत मिल जाती है।

Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.