Posted in

मैंने बीस वर्षों तक अपने सेना के पद को साधारण कुर्तों के पीछे छिपाए रखा, लेकिन जब मेरे माता-पिता नानी की 39 करोड़ रुपये की संपत्ति के लिए मुझे दिल्ली की अदालत में घसीट लाए, तो उन्होंने सबके सामने मुझे मानसिक रूप से अस्थिर बताया—फिर न्यायाधीश ने मेरी सीलबंद फ़ाइल खोली, और पूरा अदालत कक्ष जैसे साँस लेना ही भूल गया।

पूजा सिर पर धूप का चश्मा लगाए अंदर आई, और उसके चेहरे पर तिरस्कार पहले से ही सजा हुआ था।

Advertisements

उनका वकील, तेज़ नैन-नक्श वाला एक आदमी जिसका नाम भल्ला था, ऐसे चल रहा था मानो जीत का हिसाब पहले ही चुकाया जा चुका हो।

सबसे पहले मेरी माँ ने मुझे देखा।

Advertisements

उनकी नज़र मेरी साड़ी से मेरी फ़ाइल पर गई।

फिर उन्होंने तिरस्कार से हँसी उड़ाई।

धीरे नहीं।

निजी तौर पर नहीं।

खुले न्यायालय में।

—इसे देखो। अब भी खुद को सीधी-सादी दिखाने का नाटक कर रही है।

मेरे पिता ने तो अपनी आवाज़ भी धीमी नहीं की।

—इसने मेरी माँ को बेवकूफ़ बना दिया। लेकिन अदालत को बेवकूफ़ नहीं बना पाएगी।

लोग मुड़कर देखने लगे।

Advertisements

एक क्लर्क ने सिर उठाया।

पीछे की कतार में बैठा एक जूनियर वकील फुसफुसाते-फुसफुसाते रुक गया।

मैं स्थिर खड़ी रही।

इससे उन्हें गुस्से से भी ज़्यादा चिढ़ हुई।

विक्रम पूजा की ओर झुका और इतनी ऊँची आवाज़ में बोला कि मैं सुन सकूँ।

—उनतालीस करोड़ इसके हाथ में? यह तो रिश्ते भी नहीं संभाल सकती।

पूजा ने सूखी-सी हँसी हँसी।

—रिश्तों को छोड़ो। यह खुद को भी नहीं संभाल सकती।

मेरी उँगलियाँ फ़ाइल के किनारे पर कस गईं।

बस एक बार।

फिर मैंने उन्हें ढीला छोड़ दिया।

कुछ जगहों पर चिल्लाना ताकत होता है।

अदालत उनमें से एक नहीं होती।

ग्यारह बजकर पंद्रह मिनट पर न्यायाधीश अरविंद मल्होत्रा अंदर आए।

सब खड़े हो गए।

उनका चेहरा उस ख़तरनाक शांति से भरा था जो कभी-कभी न्यायाधीशों के चेहरे पर होती है, जैसे वे इंसानियत के गढ़े हुए हर झूठ को पहले ही सुन चुके हों और अब बस यह देखना चाहते हों कि सबसे पहले कौन-सा झूठ उनके सामने आता है।

मामले की पुकार हुई।

भल्ला तुरंत खड़ा हो गया।

वह बहुत सहजता से बोला।

कुछ ज़्यादा ही सहजता से।

—माननीय न्यायालय, यह एक दुखद मामला है जिसमें एक बुज़ुर्ग महिला को उसकी स्वाभाविक उत्तराधिकारियों से एक चालाक नातिन ने अलग कर दिया, जिसने उसकी उम्र, अकेलेपन और गिरती मानसिक स्थिति का फायदा उठाया।

मेरी माँ ने अपनी साड़ी के पल्लू से आँखें पोंछीं।

सूखी आँखें।

बिल्कुल सही समय।

भल्ला आगे बोला।

उसने कहा कि मैंने पिछले एक वर्ष में नानी से बहुत ज़्यादा मुलाकातें की थीं।

मानो किसी बुज़ुर्ग महिला से मिलने जाना ही संदेहास्पद हो।

उसने कहा कि मैंने उनकी चिकित्सकीय नियुक्तियों की व्यवस्था करने में मदद की थी।

मानो देखभाल भी कोई साज़िश हो।

उसने कहा कि मैंने अपने परिवार को उनसे दूर रखा।

मानो मेरे माता-पिता ने “हवाई अड्डे तक बहुत ट्रैफ़िक है” कहकर पोंगल पर तीन बार उनसे मिलने आना छोड़ा ही न हो।

फिर उसने रिकॉर्ड पर एक दस्तावेज़ प्रस्तुत किया।

एक मनोचिकित्सकीय प्रमाणपत्र।

उसके बोलना समाप्त करने से पहले ही मेरा पेट मरोड़ खाने लगा।

—हम यह भी प्रस्तुत करते हैं, माननीय न्यायालय, कि प्रतिवादी स्वयं भावनात्मक अस्थिरता, लोगों से अलग-थलग रहने और संभावित भ्रमग्रस्तता के इतिहास से जुड़ी रही है। उसके अपने माता-पिता को गंभीर चिंता है कि वह इतनी बड़ी संपत्ति संभालने में सक्षम नहीं है।

मेरी माँ ने अपना चेहरा झुका लिया।

मेरे पिता ने अपने होंठ ऐसे भींच लिए जैसे कोई शहीद हों।

मेरे वकील खड़े हुए।

—माननीय न्यायालय, हम इसका कड़ा विरोध करते हैं। यह प्रमाणपत्र ऐसे डॉक्टर का है जिसने कभी मेरी मुवक्किल की जाँच ही नहीं की।

भल्ला मुस्कराया।

—उसकी जाँच हो जाएगी। हम तो केवल संपत्ति की अंतरिम सुरक्षा की मांग कर रहे हैं।

अंतरिम सुरक्षा।

कितना अच्छा वाक्यांश।

इसका मतलब था सब कुछ रोक देना।

मुझे हटाना।

उन्हें स्थापित कर देना।

और इसे चिंता का नाम देना, जबकि दूसरे कमरे में बैठकर वे नानी के पैसों की गिनती करें।

न्यायाधीश मल्होत्रा ने अपना चश्मा ठीक किया और प्रमाणपत्र को देखा।

फिर मेरी ओर देखा।

—सुश्री रमन, क्या आपका कभी डॉ. कैलाश सूरी द्वारा इलाज किया गया है?

—नहीं, माननीय न्यायालय।

—क्या आप उनसे कभी मिली हैं?

—नहीं, माननीय न्यायालय।

भल्ला बीच में बोल पड़ा।

—जो लोग सच्चाई स्वीकार नहीं करते, वे अक्सर चिकित्सकीय सहायता भी ठुकरा देते हैं, माननीय न्यायालय।

उस एक वाक्य ने आरोप से भी ज़्यादा गहरी चोट पहुँचाई।

क्योंकि मैं समझ गई थी कि वे क्या कर रहे थे।

अगर मैं बहुत ज़ोर से अपना बचाव करती, तो मैं अस्थिर कहलाती।

अगर मैं चुप रहती, तो मुझे टालमटोल करने वाली कहा जाता।

अगर मैं रोती, तो मैं कमज़ोर होती।

अगर मैं नहीं रोती, तो मैं निर्दयी होती।

उन्होंने हर संभव प्रतिक्रिया से मेरे लिए एक पिंजरा बना दिया था।

मेरे पिता अचानक खड़े हो गए और अपने वकील का हाथ नज़रअंदाज़ कर दिया।

—माननीय न्यायालय, मैं इसका पिता हूँ। मैं इस लड़की को जानता हूँ। बचपन से ही यह मुश्किल रही है। ज़िद्दी। रहस्य छिपाने वाली। इसने कभी परिवार का सम्मान नहीं किया। मेरी माँ बूढ़ी हो गईं, और इसने उनके दिमाग़ पर कब्ज़ा कर लिया।

इसने।

मेरी बेटी नहीं।

मीरा नहीं।

इसने।

मेरी माँ ने काँपती हुई अभिनय भरी आवाज़ में जोड़ा—

—इसने तो हमें ठीक से यह भी नहीं बताया कि यह क्या काम करती है। हमेशा छिपाती रहती है। हमेशा खुद को सबसे बेहतर समझती है। क्या ऐसी इंसान करोड़ों की संपत्ति संभालने के योग्य है?

न्यायाधीश मल्होत्रा ने फिर मेरी ओर देखा।

इस बार थोड़ी देर तक।

—सुश्री रमन, आपका व्यवसाय क्या है?

मेरे वकील मेरी ओर हल्के से मुड़े, प्रतीक्षा करते हुए।

मेरे माता-पिता खुले संतोष के साथ मुझे देख रहे थे।

उन्हें उम्मीद थी कि मैं झिझकूँगी।

उन्हें उम्मीद थी कि मैं कोई अस्पष्ट-सा उत्तर दूँगी जिससे मैं वैसी ही अजीब बेटी लगूँ जैसी उन्होंने अदालत के सामने मुझे बताया था।

मैं पूरा उत्तर दे सकती थी।

मैंने नहीं दिया।

—सरकारी विधिक सेवा, माननीय न्यायालय।

भल्ला हल्के से हँसा।

—बहुत सुविधाजनक। कौन-सा कार्यालय? कौन-सा पद? या यह भी अदालत से छिपा हुआ कोई राज़ है?

मेरे वकील का जबड़ा कस गया।

मैंने फ़ाइल पर एक हाथ रख दिया।

—मेरी सेवा का पूरा विवरण, माननीय न्यायालय, मेरे शपथपत्र के साथ जमा किए गए सीलबंद लिफ़ाफ़े में है।

इससे माहौल बदल गया।

बस थोड़ा-सा।

लेकिन इतना कि फर्क पड़ गया।

न्यायाधीश मल्होत्रा ने कोर्ट मास्टर की ओर देखा।

—सीलबंद लिफ़ाफ़ा?

कोर्ट मास्टर ने दस्तावेज़ों का पुलिंदा देखा और गोपनीय लिखे हुए क्रीम रंग के लिफ़ाफ़े को आगे बढ़ाया।

भल्ला ने भौंहें सिकोड़ लीं।

मेरे पिता झुंझला गए।

मेरी माँ ने विक्रम से कुछ फुसफुसाया।

न्यायाधीश मल्होत्रा ने लिफ़ाफ़ा खोला।

उसके अंदर तीन दस्तावेज़ थे।

मेरे रोजगार का सत्यापन।

मेरी सेवा पहचान प्रमाणित करने वाला दस्तावेज़।

और निदेशालय का एक पत्र, जिसे मेरे वकील ने विशेष आग्रह करके शामिल कराया था, सीमित लेकिन आधिकारिक, जिसमें लिखा था कि कुछ विवरण सार्वजनिक अभिलेख का हिस्सा नहीं हैं।

न्यायाधीश पढ़ने लगे।

कुछ सेकंड तक उनके आसपास अदालत की गतिविधियाँ चलती रहीं।

फ़ाइलों के पन्ने पलटे गए।

ऊपर पंखा चरमराया।

पीछे कहीं किसी ने खाँसी की।

फिर सब कुछ धीमा पड़ गया।

न्यायाधीश मल्होत्रा की नज़र दूसरे पन्ने पर जाकर ठहर गई।

उनके चेहरे का भाव बदल गया।

नाटकीय रूप से नहीं।

लेकिन इतना कि मेरे पिता ने देख लिया।

इतना कि भल्ला मुस्कुराना बंद कर दे।

न्यायाधीश ने उस पंक्ति को एक बार पढ़ा।

फिर दोबारा।

उन्होंने अपने चश्मे के ऊपर से सीधे मेरी ओर देखा।

—सुश्री रमन…

मेरी माँ तनकर बैठ गई।

मेरे पिता आगे झुक गए।

भल्ला की कलम उसकी नोटबुक के ऊपर ही ठहर गई।

न्यायाधीश मल्होत्रा ने अपनी एक उँगली से पन्ने पर हल्के से थपथपाया।

फिर उन्होंने वह वाक्य कहा जिसने पूरे न्यायालय को सन्नाटे में डुबो दिया।

—क्या आप इस न्यायालय से यह कह रही हैं कि जिस व्यक्ति को ये लोग मानसिक रूप से अयोग्य घोषित करवाना चाहते हैं, वह भारतीय सेना की जज एडवोकेट जनरल शाखा में कार्यरत एक लेफ्टिनेंट कर्नल है?

Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.