Posted in

अपने ही अंतिम संस्कार में 300 लोगों के सामने मेरा पति बंद ताबूत पीटकर रो रहा था, “तुम मुझे छोड़कर क्यों गई?”, और मेरी सहेली उसके कंधे पर ऐसे हाथ रखे थी जैसे घर अब उसका हो; मैं लाल साड़ी में दरवाज़े के पीछे चुप खड़ी रही, क्योंकि पिता के पास 18 करोड़ की फाइल और एक ऐसा सबूत था जो सबकी साँस रोक देने वाला था।

PART 1

Advertisements

अपनी ही अंतिम विदाई में, जब आरव मेहता बंद ताबूत पर मुट्ठियाँ मार-मारकर चिल्ला रहा था, “तुम मुझे छोड़कर क्यों चली गई, मीरा?”, तब दिल्ली के उस आलीशान श्मशान सभागार में बैठे 300 लोगों को अंदाज़ा भी नहीं था कि जिसकी मौत पर वे रो रहे थे, वह औरत दरवाज़े के पीछे ज़िंदा खड़ी थी।

सफेद फूलों, धूपबत्ती और कैमरों से भरे उस हॉल में आरव घुटनों के बल बैठा था। उसका चेहरा ऐसा टूटा हुआ दिख रहा था जैसे किसी ने उसकी दुनिया छीन ली हो। सामने बंद ताबूत रखा था, जिस पर मीरा राठौर की तस्वीर लगी थी—वही मीरा, जिसकी टेक्सटाइल कंपनी गुड़गांव से लेकर जयपुर तक मशहूर थी, और जिसके “हादसे” की खबर पिछले 3 दिनों से हर बिज़नेस पेज पर छपी थी।

Advertisements

आरव रो रहा था, मगर उसकी आँखों में आँसू कम और अभिनय ज़्यादा था।

पहली पंक्ति में नंदिता खन्ना बैठी थी, मीरा की बचपन की सहेली। काली साड़ी, माथे पर छोटी बिंदी, हाथ में रूमाल। वह रोने का नाटक कर रही थी, लेकिन जब भी आरव की उंगलियाँ काँपतीं, उसका हाथ चुपके से उसके कंधे पर टिक जाता। वह छूना दुख का नहीं, अधिकार का था।

आरव को यकीन था कि उसने अपनी पत्नी, उसके शक और सारे सबूतों को हमेशा के लिए दफना दिया है।

उसे नहीं पता था कि उसी हॉल के भारी लकड़ी के दरवाज़ों के पीछे मीरा खड़ी है—ज़िंदा, घायल, लेकिन टूटी नहीं। उसने वही लाल साड़ी पहनी थी, जिसमें 3 दिन पहले आरव ने उसे जयपुर-अजमेर हाईवे के पास पहाड़ी मंदिर की रेलिंग से नीचे धक्का दिया था।

उसके बगल में उसके पिता, विक्रम राठौर, खड़े थे। राजस्थान के पुराने कपड़ा व्यापारी, जिनकी आँखों में आज पिता का दर्द नहीं, न्याय की आग थी। उनके हाथ में एक मोटा फाइल-कवर था। पीछे एक महिला निजी जासूस और क्राइम ब्रांच के 2 अधिकारी खामोशी से इंतज़ार कर रहे थे।

और सबसे बड़ा सच यह था कि जिस ताबूत पर आरव अपनी छाती पीट रहा था, वह खाली था।

3 दिन पहले आरव ने मीरा से कहा था कि उसे थोड़ा बाहर जाना चाहिए। “दिल्ली की हवा तुम्हें और बेचैन कर रही है,” उसने बड़ी नरमी से कहा था। पिछले कई महीनों से वह यही कर रहा था—मीरा को बेचैन, कमज़ोर और मानसिक रूप से अस्थिर साबित करना।

वह उसकी दवाइयाँ खुद देता था। फोन अपने पास रख लेता था। मेहमानों के सामने कहता, “मीरा को आराम चाहिए, वह आजकल बहुत उलझी हुई है।” कभी-कभी वह मीरा के संदेशों का जवाब भी खुद लिख देता था।

शुरू में मीरा ने इसे पति की चिंता समझा। फिर थकान। फिर धीरे-धीरे उसे समझ आया कि यह प्यार नहीं, एक सुनहरी जेल है।

Advertisements

आरव जब उसकी ज़िंदगी में आया था, तो हर किसी को अच्छा लगा था। पढ़ा-लिखा, शालीन, महंगे सूट पहनने वाला, अंग्रेज़ी में मीठी बातें करने वाला, बड़े अफसरों और वकीलों से पहचान रखने वाला। दिल्ली के बिज़नेस सर्कल में उसका चेहरा भरोसेमंद माना जाता था।

मीरा ने अपने पिता की कंपनी संभाली थी—राठौर टेक्सटाइल्स। जयपुर की पुरानी हवेली से शुरू हुआ कारोबार अब करोड़ों का हो चुका था। विक्रम राठौर ने 40 साल में पसीना बहाकर नाम बनाया था। उन्हें नकली खातों, फर्जी दस्तखतों और मीठी आवाज़ में बोले गए झूठ पहचानने की आदत थी।

शादी के बाद आरव ने सबसे पहले मीरा को उसके पिता से दूर किया।

“तुम्हारे पापा मुझे इसलिए पसंद नहीं करते क्योंकि उन्हें लगता है कि मैंने तुमसे पैसों के लिए शादी की है,” वह हँसते हुए कहता।

मीरा पूछती, “और क्या वे गलत हैं?”

आरव मुस्कुराता। “तुम बहुत फिल्मी बातें सोचती हो, मीरा।”

लेकिन अब बातें फिल्मी नहीं रही थीं। कागज़ों में, ईमेलों में, बैंक स्टेटमेंट में और आरव के लैपटॉप के छिपे हुए फोल्डरों में सच्चाई धीरे-धीरे साँप की तरह रेंग रही थी।

पहले उसने मीरा से कुछ “साधारण कागज़ों” पर दस्तखत करवाए। फिर 18 करोड़ की लाइफ इंश्योरेंस पॉलिसी का नाम आया। फिर उसने कंपनी की होल्डिंग के शेयरों में बदलाव की बात की। जब भी मीरा सवाल करती, वह उसे गले लगाकर कहता, “बड़ों वाली चीजें मुझे संभालने दो, तुम बस आराम करो।”

“बड़ों वाली चीजें”—यह वाक्य मीरा को थप्पड़ से भी ज्यादा जलाता था।

फिर एक रात मीरा को आरव के स्टडी रूम में दूसरी मोबाइल सिम मिली। उसके बाद डर खत्म हो गया। उसने अपने पिता के पुराने परिचितों की मदद ली। एक छोटी-सी कैमरा डिवाइस किताबों की अलमारी में छिपाई गई, जहाँ आरव कभी हाथ नहीं लगाता था।

वीडियो गुरुवार रात आया।

स्क्रीन पर आरव उसी कमरे में बैठा था। हाथ में महंगी शराब का ग्लास था। नंदिता सोफे पर लेटी थी, जैसे वह घर उसी का हो। उसने आरव की शर्ट पहन रखी थी।

“इंश्योरेंस का पैसा मिलते ही हम निकल जाएंगे,” नंदिता ने कहा।

आरव ने जवाब दिया, “18 करोड़। और अगर वह शुक्रवार को शेयर वाले कागज़ पर साइन कर दे, तो आधी कंपनी भी। रविवार के बाद सब साफ हो जाएगा।”

नंदिता हँसी। “बेचारा दुखी पति। पहाड़ी रास्ता। कमजोर पत्नी। सच में, यह बहुत आसान है।”

आरव झुका और बोला, “सबसे जरूरी है कि लोग पहले से मानें कि वह मानसिक रूप से ठीक नहीं थी।”

मीरा ने वीडियो 2 बार देखा। पहली बार वह बाथरूम में जाकर उल्टी कर आई। दूसरी बार उसने अपने पिता को भेज दिया।

साथ में सिर्फ एक लाइन लिखी—

अगर मेरे साथ कुछ हो जाए, तो रोना मत। उसे खत्म कर देना।

PART 2

अगली सुबह 6 बजे विक्रम राठौर दिल्ली पहुँचे। उनके साथ एक निजी जासूस सायरा कुरैशी और क्राइम ब्रांच के इंस्पेक्टर देशमुख थे। देशमुख ने मीरा की बात बिना टोके सुनी। उन्होंने उससे यह नहीं पूछा कि क्या उसे यकीन है। उन्हें ऐसे कई चेहरे याद थे, जहाँ औरत की चुप्पी को पागलपन और मर्द की चालाकी को संस्कार समझ लिया गया था।

रविवार को आरव ने मीरा को जयपुर के पास एक पहाड़ी मंदिर ले जाने का प्रस्ताव दिया। उसने रास्ते में कचौरी खरीदी, कार में पुराने गाने चलाए और मीरा के माथे पर हाथ रखकर कहा, “आज सब ठीक हो जाएगा।”

मीरा मुस्कुराई।

उसकी लाल साड़ी के नीचे माइक्रोफोन लगा था। पल्लू की सिलाई में लोकेशन डिवाइस छिपी थी। थोड़ी दूर पीछे सायरा की कार चल रही थी, जिसमें कैमरा और पुलिस टीम थी।

मंदिर के पीछे की रेलिंग पर हवा तेज थी। नीचे खाई थी। आरव ने इंतज़ार किया कि आसपास के श्रद्धालु चले जाएँ। फिर उसने मीरा की कमर थामी।

“माफ करना,” उसने फुसफुसाया।

एक पल के लिए मीरा को लगा, शायद वह आदमी कहीं भीतर अभी भी बचा है।

फिर उसने धक्का दे दिया।

मीरा नीचे गिरी, लेकिन एक टेढ़ी जड़ उसके हाथ में आ फँसी। पत्थर से उसका कंधा छिल गया, साँस रुक गई, मगर उंगलियाँ नहीं छूटीं। ऊपर आरव ने झाँका। उसने मदद के लिए हाथ नहीं बढ़ाया।

वह पलटकर चला गया।

कुछ ही सेकंड बाद सड़क के नीचे धमाका हुआ। मीरा की कार, जिसे पहले से छेड़ा गया था, आग में बदल गई। आरव ने 30 सेकंड बाद चीखना शुरू किया—इतना देर से कि रिकॉर्डिंग में सच बच गया।

सायरा ने रस्सी डालकर मीरा को निकाला।

रात 3 बजे तक पुलिस को पता था कि मीरा ज़िंदा है।

विक्रम बोले, “अभी उसे गिरफ्तार करो।”

मीरा ने टूटी आवाज़ में कहा, “नहीं। वह मुझे सबके सामने पागल साबित करेगा। मैं चाहती हूँ कि उसका झूठ उसी मंच पर मरे, जहाँ वह मेरा शोक मनाएगा।”

और अगले दिन आरव ने खुद अपनी बर्बादी की रस्सी बुननी शुरू कर दी।

PART 3

आरव ने सोमवार की सुबह से ही ऐसे फोन करने शुरू कर दिए जैसे उसकी पत्नी की चिता की राख ठंडी होने का इंतज़ार भी मुश्किल हो रहा हो। उसने बीमा कंपनी को 5 बार फोन किया। नोटरी को ईमेल भेजा कि मीरा ने अपनी मर्जी से शेयर ट्रांसफर के कागज़ों पर दस्तखत किए थे। बैंक से कहा कि कुछ बड़े भुगतान “तुरंत” प्रोसेस किए जाएँ। वह हर जगह दुखी पति की आवाज़ में बात करता, मगर हर शब्द में लालच का वजन था।

हर कॉल रिकॉर्ड हो रही थी।

हर ईमेल पुलिस के पास जा रहा था।

हर झूठ उस ताबूत में कील बनकर जुड़ रहा था, जिसमें वह मीरा को नहीं, खुद को बंद कर रहा था।

उसने अंतिम विदाई भी बहुत जल्दी तय कर दी। “शरीर बहुत खराब हालत में है,” वह रिश्तेदारों से कहता। “ताबूत बंद रहेगा। मैं मीरा की छवि बचाना चाहता हूँ।”

मीरा के ऑफिस के कर्मचारी सचमुच रो रहे थे। कुछ ने उसे अपनी बड़ी बहन माना था, कुछ ने मालिक से ज्यादा सहारा। पर आरव सबके सामने रूमाल दबाकर खड़ा होता और कहता, “वह अंदर से बहुत टूट चुकी थी। मैं उसे बचा नहीं पाया।”

नंदिता और भी खतरनाक खेल खेल रही थी। वह मीरा की पुरानी सहेली बनकर औरतों के बीच बैठती, धीमी आवाज़ में कहती, “मीरा पिछले कई महीनों से अजीब व्यवहार कर रही थी। कभी बिना वजह रोती, कभी सब पर शक करती। आरव बेचारा तो बस उसे संभाल रहा था।”

कुछ लोग चुपचाप सिर हिलाते। सच मानकर नहीं, बल्कि इसलिए कि समाज को कमजोर औरत की कहानी सुनना आसान लगता है, चालाक पति की नहीं।

अंतिम विदाई से एक रात पहले आरव और नंदिता मीरा के घर गए। उन्होंने उसी रसोई में चाय बनाई, जहाँ मीरा ने कभी नंदिता के लिए अपने हाथ से परांठे बनाए थे। उन्हें नहीं पता था कि कोर्ट के आदेश से वहाँ पहले ही माइक्रोफोन लगाया जा चुका था।

नंदिता हँसते हुए बोली, “उसका चेहरा देखा था जब तुमने धक्का दिया?”

आरव झल्लाया, “चुप रहो।”

“वह सच में तुमसे प्यार करती थी।”

“वह सब पर भरोसा करती थी। यही उसकी बेवकूफी थी।”

कुछ देर बाद नंदिता की आवाज़ धीमी हुई, “हम कब कहेंगे कि हम साथ हैं?”

आरव बोला, “पैसा आने के बाद। कल मैं मीरा को दफनाऊँगा। सोमवार को हम अमीर होंगे।”

क्लिनिक के कमरे में यह रिकॉर्डिंग सुनते हुए विक्रम ने मुट्ठियाँ भींच लीं। उनके चेहरे पर कोई आँसू नहीं था। कुछ दर्द इतने गहरे होते हैं कि वे आँखों से नहीं, हड्डियों से बहते हैं।

मीरा बिस्तर पर बैठी थी। हाथ पर पट्टी थी। पसलियों में दर्द था। माथे पर चोट का निशान था। लाल साड़ी कुर्सी पर रखी थी, किनारे से फटी हुई।

विक्रम ने धीरे से कहा, “तू कभी कमजोर नहीं थी, बेटा।”

मीरा ने अपनी टूटी हुई उंगलियों को देखा। “शायद अब मुझे भी पता चल गया है।”

सुबह जब वह तैयार हुई, तो उसने वही लाल साड़ी पहनी। सायरा ने साड़ी का फटा हिस्सा जितना हो सका, ठीक कर दिया था, लेकिन मीरा ने कंधे के पास का गहरा दाग छिपाने नहीं दिया।

विक्रम ने पल्लू ठीक करते हुए पूछा, “अभी भी लौट सकती है।”

मीरा ने शांत आँखों से कहा, “उसने मुझे लोगों की नजरों में जिंदा दफना दिया था, पापा। आज मैं उन्हीं लोगों के सामने बाहर आऊँगी।”

दिल्ली के उस सभागार में जब वे पहुँचे, अंदर मंत्र पढ़े जा रहे थे। फूलों की गंध भारी थी। लोग धीमी आवाज़ में बात कर रहे थे। कुछ पत्रकार भी मौजूद थे, क्योंकि “करोड़पति बिज़नेसवुमन की रहस्यमय मौत” अब खबर बन चुकी थी।

मीरा दरवाज़े के पीछे खड़ी रही। उसने आरव को ताबूत की ओर जाते देखा। वह बेदाग काले सूट में था। उसकी घड़ी कफ के नीचे से ठीक उतनी ही दिख रही थी, जितनी वह चाहता था। वह अपने शोक को भी नियंत्रित कर रहा था।

“मीरा मेरी जान थी,” आरव ने भर्राई आवाज़ में कहा। “काश मैं उसे बचा पाता। मैं उसके बिना कुछ नहीं हूँ।”

पहली पंक्ति में आरव की माँ रो रही थीं। उनके आँसू असली थे। यही देखकर मीरा का दिल सबसे ज्यादा टूटा। वह औरत सच नहीं जानती थी। उसने एक महत्वाकांक्षी बेटे को संस्कारी समझकर पाला था। उसे पता ही नहीं चला कि कुछ महत्वाकांक्षाएँ प्रेम को भी खा जाती हैं।

नंदिता उठी और आरव के कंधे पर हाथ रखा। वह सहेली की तरह नहीं, मालिकाना हक से खड़ी थी।

पास में आरव का वकील फाइल लेकर खड़ा था—बीमा कागज़, शेयर ट्रांसफर, नकली दस्तखत। उसे लगता था कि वह अंतिम संस्कार में आया है। असल में वह एक खुलते हुए भंडाफोड़ के किनारे खड़ा था।

फिर मंत्र रुक गए।

भारी दरवाज़े खुले।

पहले ठंडी हवा अंदर आई। फिर रोशनी। फिर मीरा।

सभागार में जैसे किसी ने साँस खींच ली हो। एक औरत चीख पड़ी। एक बुज़ुर्ग आदमी उठते-उठते कुर्सी से टकरा गया। पुजारी के हाथ से फूल गिर गए। नंदिता का हाथ आरव के कंधे से छूट गया।

मीरा धीमे-धीमे आगे बढ़ी। लाल साड़ी, घायल चेहरा, सीधी गर्दन। उसके कदमों की आवाज़ संगमरमर पर इतनी साफ गूँज रही थी कि हर व्यक्ति को अपना दिल सुनाई देने लगा।

विक्रम उसके साथ थे। पीछे देशमुख और 2 पुलिस अधिकारी अंदर आए।

आरव ने उसे देखा।

उसके चेहरे का रंग ऐसे उड़ गया जैसे ताबूत सचमुच खुल गया हो।

“नहीं,” उसके मुँह से निकला।

मीरा ताबूत के पास रुकी। उसने खाली ताबूत पर हाथ रखा। लकड़ी ठंडी थी। उसने सोचा—कितनी औरतों को दुनिया ने पागल कहा होगा, सिर्फ इसलिए क्योंकि उन्होंने सच समय से पहले पहचान लिया था।

फिर उसने आरव की तरफ देखा।

“तुम पूछ रहे थे कि मैं तुम्हें छोड़कर क्यों चली गई,” वह बोली। “मैं नहीं गई थी, आरव। तुमने मुझे धक्का दिया था।”

हॉल में शोर उठ गया। आरव की माँ ने मुँह पर हाथ रख लिया। नंदिता पीछे हट गई, चेहरे पर मोम जैसी सफेदी।

आरव तुरंत संभलने की कोशिश में आगे बढ़ा। “मीरा, तुम सदमे में हो। डॉक्टर को बुलाओ। वह ठीक नहीं है। मेरी जान, मेरी बात सुनो।”

विक्रम आगे आए। उनकी आवाज़ धीमी थी, पर धारदार।

“यह वाक्य तुमने बहुत इस्तेमाल कर लिया।”

देशमुख ने इशारा किया। पीछे लगी बड़ी स्क्रीन, जिस पर मीरा की तस्वीरें दिखाने की तैयारी थी, अचानक जल उठी।

पहला वीडियो चला।

आरव का स्टडी रूम। नंदिता सोफे पर। हाथ में ग्लास।

“18 करोड़,” स्क्रीन पर आरव की आवाज़ गूँजी। “वह शुक्रवार को साइन करेगी। रविवार को हादसा होगा।”

सभा में कोई फुसफुसाया, “हे भगवान…”

फिर स्क्रीन बदली। नकली दस्तखत। बैंक ट्रांसफर। विदेशी कंपनी का नाम। फिर रसोई की रिकॉर्डिंग चली।

“कल मैं मीरा को दफनाऊँगा। सोमवार को हम अमीर होंगे।”

नंदिता वहीं फूटकर रो पड़ी।

“सब आरव ने किया! उसने मुझे फँसाया!”

आरव उसकी ओर घूमकर गरजा, “चुप रहो! पैसे के पीछे तुम पड़ी थी!”

एक पल में उसके चेहरे से दुखी पति का मुखौटा गिर गया। जो आदमी अभी तक टूटे दिल का नाटक कर रहा था, अब नंगी क्रूरता में खड़ा था।

मीरा ने देशमुख से फोन लिया और आखिरी रिकॉर्डिंग चलाई।

नंदिता की आवाज़ आई, “उसका चेहरा देखा था जब तुमने धक्का दिया?”

फिर आरव की आवाज़—“चुप रहो।”

उसके बाद जो सन्नाटा फैला, वह किसी चीख से ज्यादा भयानक था।

पत्रकारों के कैमरे उठ गए। रिश्तेदारों के चेहरे झुक गए। मीरा के कर्मचारी रोते हुए उसे देख रहे थे। कुछ लोगों की आँखों में अपराध था, क्योंकि वे लगभग उस झूठ पर भरोसा कर चुके थे।

आरव ने एक कदम मीरा की ओर बढ़ाया।

“तुम मेरे साथ ऐसा नहीं कर सकती।”

मीरा ने कहा, “तुमने किया था।”

“मैं तुमसे प्यार करता था।”

“नहीं। तुम मेरी मौत से मिलने वाली जिंदगी से प्यार करते थे।”

आरव अचानक झपटा। देशमुख ने उसका हाथ पकड़कर उसे कुर्सियों के पास दबा दिया। एक अधिकारी ने हथकड़ी लगा दी। नंदिता भागकर पीछे के दरवाज़े की ओर बढ़ी, लेकिन सायरा उसके सामने आ खड़ी हुई।

“नंदिता खन्ना, आपको हत्या की कोशिश, फर्जी दस्तावेज़, बीमा धोखाधड़ी और साजिश के आरोप में हिरासत में लिया जाता है।”

“मैंने किसी को हाथ नहीं लगाया!” नंदिता चिल्लाई।

सायरा ने पारदर्शी पाउच निकाला। उसमें लाल कपड़े का फटा टुकड़ा था।

“कार की सुरक्षा बेल्ट काटने वाली कैंची पर आपके निशान मिले हैं। आपके संदेश भी काफी बोलते हैं।”

आरव अब भी चिल्ला रहा था। “तुम साबित नहीं कर सकते कि मैंने धक्का दिया!”

देशमुख ने कहा, “तुम्हारे ‘माफ करना’ शब्द गिरने से ठीक पहले रिकॉर्ड हुए हैं। रेलिंग पर तुम्हारी उंगलियों के निशान हैं। और कार में धमाके के लिए इस्तेमाल डिवाइस तुम्हारे कोट की जेब से मिला है, जो तुमने अंतिम संस्कार वालों को दिया था।”

पहली बार आरव के पास कोई जवाब नहीं था।

उसके चेहरे से आँसू, शोक, प्रेम—सब गायब हो गया। बस एक आदमी बचा, जो अपनी ही सच्चाई के सामने नंगा खड़ा था।

मीरा उसके पास इतनी गई कि उसकी आवाज़ सिर्फ आरव तक पहुँचे।

“तुमने मेरी नरमी को बेवकूफी समझा। यही तुम्हारी आखिरी गलती थी।”

फिर आरव चीखने लगा। उसने अपनी माँ को पुकारा। विक्रम से गिड़गिड़ाया। नंदिता को गालियाँ दीं। आखिरी कोशिश में उसने मीरा का नाम पुकारा, जैसे वह नाम अब भी कोई दरवाज़ा खोल सकता हो।

मीरा ने जवाब नहीं दिया।

उसके बाद घटनाएँ तेजी से हुईं। बीमा कंपनी ने 18 करोड़ का भुगतान रोक दिया। नोटरी ने शेयर ट्रांसफर रद्द किया। बैंक ने सारे संदिग्ध लेन-देन जमा दिए। राठौर टेक्सटाइल्स ने वह पैसा वापस पा लिया, जो गायब होने ही वाला था।

अखबारों ने कई दिन तक इस मामले को छापा—“खाली ताबूत के सामने रोता पति”, “मरी हुई पत्नी अपनी अंतिम विदाई में लौटी”, “18 करोड़ के लिए पत्नी को मारने की साजिश”।

लेकिन खबरों के पीछे मीरा की लंबी रातें थीं। पसलियों का दर्द था। नींद टूटते ही गिरने का एहसास था। कुछ लोग माफी माँगने आए कि उन्होंने उसे सचमुच अस्थिर समझ लिया था। कुछ लोग उससे आँख मिलाने से बचते रहे। तब मीरा ने जाना कि हिंसा सिर्फ धक्का देकर नहीं मारती। वह अफवाहों, दया भरी मुस्कान और “बेचारी ठीक नहीं है” जैसे वाक्यों से भी मारती है।

नंदिता ने आखिरकार बयान दिया। उसने बताया कि कैसे आरव ने दवाइयाँ बदलीं, कैसे मीरा को सुस्त दिखाने की योजना बनी, कैसे फर्जी दस्तावेज़ तैयार हुए। अदालत में उसे 7 साल की सजा मिली। फैसला सुनते समय उसने पीछे मुड़कर मीरा को देखा।

“मुझे माफ कर दो,” उसने रोते हुए कहा।

मीरा ने उसे देर तक देखा। उसे 2 छोटी लड़कियाँ याद आईं, जो कभी जयपुर की गलियों में गोलगप्पे खाते हुए बड़े सपने देखती थीं।

“मुझे भी दुख है,” मीरा ने बस इतना कहा।

आरव ने कोई समझौता नहीं किया। उसे अब भी लगता था कि अदालत उसके महंगे सूट, उसके पढ़े-लिखे लहजे और दुखी पति वाले चेहरे पर भरोसा करेगी। लेकिन जज ने वीडियो देखे। रिकॉर्डिंग सुनी। लाल साड़ी, टूटी रेलिंग, जली कार और नकली दस्तखतों की रिपोर्ट देखी।

विक्रम ने अदालत में खड़े होकर पूरे आर्थिक षड्यंत्र को समझाया। उनकी आवाज़ कई बार टूटी, मगर तथ्य नहीं टूटे। मीरा ने अपनी गिरने की कहानी बिना आँसू सुनाई, क्योंकि वह उस औरत के लिए पहले ही रो चुकी थी जो कभी आरव पर भरोसा करती थी।

अदालत ने आरव को 30 साल की सजा सुनाई।

जब पुलिस उसे ले जा रही थी, वह आखिरी बार मीरा की तरफ मुड़ा। अब उसके बाल बिखरे थे, चेहरा सूख चुका था, और आँखों में वह चमक नहीं थी जो कभी सबको धोखा दे देती थी।

“मीरा…” उसने कहा।

मीरा ने नजरें नहीं झुकाईं।

1 साल बाद मीरा अपने पिता के साथ उसी पहाड़ी मंदिर के पीछे गई। नई लोहे की रेलिंग लग चुकी थी—ऊँची, मजबूत। नीचे वही खाई थी। हवा वैसी ही थी। कुछ लोग दर्शन करके लौट रहे थे। एक परिवार फोटो खिंचवा रहा था। दुनिया कभी-कभी अजीब तरह से सुंदर बनी रहती है, उसी जगह जहाँ किसी ने आपको मिटाने की कोशिश की थी।

मीरा ने हल्के रंग का सूट पहना था और लाल दुपट्टा ओढ़ा था। उसके निशान फीके पड़ चुके थे, पर सर्द सुबहों में शरीर अब भी उन्हें याद कर लेता था। विक्रम उसके साथ चुपचाप चले। अब उन्होंने हर चुप्पी को भरना छोड़ दिया था। वह बस उसके साथ रहते थे।

मीरा उस पेड़ के पास बैठी, जिसकी जड़ ने उसकी जान बचाई थी। उसने अपनी शादी की अंगूठी उतारी और 2 पत्थरों के बीच रख दी। यह आरव की याद में नहीं था। यह उस झूठ को जमीन को लौटा देना था, जिसने बहुत दिन तक उसकी उंगली जलाई थी।

हवा ने पत्तों को हिलाया।

विक्रम ने पूछा, “तैयार है?”

मीरा ने आखिरी बार खाई की ओर देखा। अब उसे वहाँ सिर्फ गिरने की जगह नहीं दिखती थी। उसे वहाँ वह जगह दिखती थी, जहाँ उसने मरने से इनकार किया था।

“हाँ,” उसने कहा।

उसने अपने पिता का हाथ पकड़ा—एक बेटी की तरह, और एक बची हुई औरत की तरह।

फिर वह खाई की ओर पीठ करके लौट गई।

पीछे पेड़ की जड़ के पास सोने की छोटी-सी अंगूठी पड़ी रही—एक आखिरी झूठ, जिसे धरती ने चुपचाप निगल लिया।

Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.