
भाग 1
आदित्य की रूह उसी पल कांप गई जब उसके 4 साल के बेटे आरव ने फोन पर फुसफुसाते हुए कहा—
—पापा… मम्मी के दोस्त ने मुझे क्रिकेट बैट से मारा है… और बोला अगर रोया तो और जोर से मारेगा।
दिल्ली के कनॉट प्लेस में 12वीं मंजिल पर एक कांच की मीटिंग रूम में बैठे आदित्य मेहरा के सामने 9 लोग लैपटॉप खोले बैठे थे। स्क्रीन पर बजट, टारगेट, क्लाइंट और नंबर चमक रहे थे, मगर उस एक वाक्य ने सब कुछ मिटा दिया। आदित्य का फोन पहले भी 2 बार वाइब्रेट हुआ था, लेकिन मीटिंग की वजह से उसने नहीं उठाया। जब तीसरी बार स्क्रीन पर “आरव” लिखा दिखा, तो उसे अजीब डर लगा। आरव कभी ऑफिस में फोन नहीं करता था। तलाक के बाद भी आदित्य ने उसे एक बात सिखाई थी—अगर सच में डर लगे, तो पापा को कहीं भी फोन करना।
—आरव, बेटा, तुम कहां हो? —आदित्य कुर्सी से इतना तेजी से उठा कि कुर्सी पीछे दीवार से टकरा गई।
फोन के दूसरी तरफ बच्चे की टूटी हुई सांसें सुनाई दे रही थीं।
—ड्राइंग रूम में… मेरा हाथ बहुत दुख रहा है… विक्रम अंकल गुस्सा हैं।
विक्रम।
नेहा का नया साथी।
32 साल का, महंगी घड़ी पहनने वाला, सोशल मीडिया पर फिटनेस और लग्जरी की तस्वीरें डालने वाला आदमी, जिसकी आंखों में आरव के लिए कभी प्यार नहीं था। वह हर बार आरव को ऐसे देखता था जैसे बच्चा नेहा की जिंदगी में एक बोझ हो, जिसे हटाए बिना वह उस घर का मालिक नहीं बन सकता।
—मम्मी कहां हैं?
—पार्लर गई हैं… मौसी प्रिया के साथ… बोली थीं जल्दी आएंगी।
आदित्य के हाथ बर्फ जैसे ठंडे हो गए।
—आरव, मेरी बात सुनो। तुम बाथरूम में जाकर कुंडी लगा सकते हो?
जवाब आने से पहले ही पीछे से एक भारी आवाज गूंजी।
—किससे बात कर रहा है तू?
आरव की हल्की चीख निकली।
—फोन दे इधर!
कॉल कट गई।
1 सेकंड के लिए आदित्य के आसपास की दुनिया खत्म हो गई। मीटिंग रूम नहीं था, बॉस नहीं था, दिल्ली का ट्रैफिक नहीं था। बस उसका 4 साल का बच्चा था, अकेला, घायल, और उसी घर में फंसा हुआ जहां एक हिंसक आदमी बैट लेकर खड़ा था।
आदित्य ने चाबी उठाई और दौड़ पड़ा।
—आदित्य! कहां जा रहे हो? —बॉस ने पीछे से आवाज दी।
उसने जवाब नहीं दिया।
लिफ्ट का इंतजार करते हुए उसने एक हाथ से 112 मिलाया और दूसरे हाथ से अपने बड़े भाई राघव को फोन लगाया। राघव लाजपत नगर में रहता था, नेहा के साकेत वाले फ्लैट से 10 मिनट की दूरी पर। वह कभी नेशनल लेवल का बॉक्सर रह चुका था, अब बच्चों को सेल्फ-डिफेंस सिखाता था। बाहर से पहाड़ जैसा, अंदर से आरव की आवाज सुनते ही पिघल जाने वाला आदमी।
राघव ने पहले ही रिंग पर फोन उठा लिया।
—क्या हुआ?
—भैया, अभी नेहा के घर जाओ। विक्रम ने आरव को बैट से मारा है। मैं कनॉट प्लेस में हूं, पहुंचने में वक्त लगेगा।
कुछ पल भारी चुप्पी रही।
—आरव उसके साथ अकेला है?
—हां।
—मैं निकल रहा हूं।
—भैया…
—पहले बच्चे को निकालूंगा —राघव की आवाज बहुत शांत थी, और वही शांति डरावनी लग रही थी— फिर उस कायर का हिसाब देखेंगे।
आदित्य ने पुलिस को पता बताया, बच्चे की उम्र बताई, विक्रम का नाम बताया, और बार-बार कहा कि घर में एक बच्चा है, एक आदमी है, और क्रिकेट बैट से हमला हुआ है। पार्किंग तक पहुंचते-पहुंचते उसके हाथ इतने कांप रहे थे कि कार का दरवाजा खोलने में भी 3 बार चाबी फिसली।
दिल्ली का ट्रैफिक उस दिन जैसे उसकी बेबसी का मजाक उड़ा रहा था। हॉर्न, गालियां, ब्रेक की आवाजें, ऑटो, बाइक, बसें—सब कुछ धुंधला था। आदित्य ने गाड़ी को जैसे-तैसे आगे बढ़ाया, मगर हर लाल बत्ती उसे मौत जैसी लग रही थी।
फोन फिर बजा।
राघव।
—मैं बिल्डिंग के बाहर हूं। कॉल मत काटना।
—पुलिस आ रही है।
—ठीक है।
फोन पर आदित्य को गाड़ी का दरवाजा बंद होने की आवाज सुनाई दी, फिर तेज कदम, फिर लिफ्ट का डिंग, फिर किसी दरवाजे पर मुक्के की धमक।
—विक्रम! दरवाजा खोल!
कोई जवाब नहीं।
एक और जोरदार चोट।
—आरव! बेटा, मैं चाचू राघव हूं!
तभी आरव चीखा।
वह चीख छोटी थी, मगर उसमें इतना डर था कि आदित्य की गाड़ी लगभग डिवाइडर से टकरा गई।
—भैया!
अगली आवाज बहुत भयानक थी। लकड़ी टूटने की, कांच बिखरने की, किसी आदमी की गाली की, फर्नीचर घिसटने की।
—छोड़ उसे! —राघव की दहाड़ आई।
फिर एक भारी धक्का।
फिर दूसरा।
फिर किसी की दर्द भरी चीख।
आदित्य गाड़ी चला रहा था, मगर उसकी आंखें सड़क पर नहीं थीं। वह उस फोन के अंदर था, उस कमरे में था, उस बैट के सामने था, अपने बच्चे की सांसों के साथ बंधा हुआ था।
—आदित्य —राघव की आवाज अचानक आई, तेज और टूटी हुई— बच्चा मेरे पास है।
आदित्य की छाती में जैसे कोई बांध टूट गया।
—जिंदा है? ठीक है?
—होश में है। हाथ सूज गया है। टी-शर्ट पर खून है। शायद कांच से कटा है। मैं नीचे ला रहा हूं।
—और विक्रम?
राघव 1 पल चुप रहा।
—अभी उठने की हालत में नहीं है।
जब आदित्य साकेत की उस सोसाइटी में पहुंचा, तब पुलिस की गाड़ी भी पीछे आ रही थी और एम्बुलेंस अंदर मुड़ रही थी। उसने ब्रेक इतनी जोर से मारा कि सीट बेल्ट उसके सीने में धंस गई।
फ्लैट का दरवाजा आधा टूटा हुआ था। दरवाजे का फ्रेम उखड़ा था। गलियारे में टूटा फूलदान पड़ा था। पड़ोसी दरवाजों से झांक रहे थे—कुछ सहमे हुए, कुछ तमाशा देखने की भूखी आंखों से।
लिफ्ट के पास राघव खड़ा था, आरव को सीने से लगाए हुए।
आरव का चेहरा रो-रोकर लाल था। बाल माथे से चिपके थे। उसकी डायनासोर वाली टी-शर्ट पर खून के धब्बे थे। बायां हाथ सीने से चिपका हुआ था, जैसे जरा सा हिलने पर भी दुनिया टूट जाएगी।
आदित्य को देखते ही आरव ने बहुत धीमे कहा—
—पापा…
आदित्य ने उसे अपनी बाहों में लिया, मगर इतनी सावधानी से जैसे वह टूटे हुए कांच का टुकड़ा हो।
—मैं आ गया, बेटा। मैं आ गया। अब कुछ नहीं होगा।
आरव उसके गले से चिपक गया और तब जाकर फूट-फूटकर रोया। जैसे वह अब तक रोना रोककर बैठा था, क्योंकि उसे सचमुच डर था कि रोने पर फिर मारा जाएगा।
पैरामेडिक्स ने बच्चे को स्ट्रेचर पर लिटाने को कहा। आदित्य उसे छोड़ना नहीं चाहता था। राघव ने उसके कंधे पर हाथ रखा।
—डॉक्टर को देखने दे।
जब वे आरव की टी-शर्ट काट रहे थे, 2 पुलिसवाले विक्रम को फ्लैट से बाहर लाए। उसकी नाक से खून बह रहा था, एक आंख सूजी हुई थी, हाथ पीछे हथकड़ी में थे। फिर भी उसने आदित्य को देखकर मुस्कुराया।
मुस्कुराया।
—तेरा बेटा ड्रामा करता है —विक्रम थूकते हुए बोला— खुद गिरा है।
आदित्य एक कदम आगे बढ़ा, लेकिन राघव उसके सामने आ गया।
—बच्चे के सामने नहीं।
तभी विक्रम ने सिर घुमाकर स्ट्रेचर पर पड़े आरव को देखा और धीमे, मगर साफ शब्दों में कहा—
—अब सीखेगा मेरी चीजों को हाथ न लगाना।
आरव पूरा कांप गया।
आदित्य ने उसे मारा नहीं, क्योंकि उसका बेटा देख रहा था। मगर उसी पल उसे समझ आ गया कि असली लड़ाई अब शुरू हुई है।
और जब नेहा की कार सोसाइटी के गेट पर आकर रुकी, तो आदित्य को अंदाजा भी नहीं था कि उसकी पहली नजर किसे ढूंढेगी।
कमेंट्स में दिए गए लिंक से पूरी कहानी पढ़े 👇
भाग 2
नेहा कार से उतरी तो उसके बाल पार्लर से सेट थे, नाखूनों पर ताजा नेल पॉलिश चमक रही थी और हाथ में शॉपिंग बैग था। उसने पहले पुलिस देखी, फिर एम्बुलेंस, फिर टूटे दरवाजे की तरफ देखा, और उसके बाद उसकी आंखें आरव को नहीं, विक्रम को ढूंढने लगीं। —विक्रम को क्यों ले जा रहे हैं? क्या हुआ उसे? यह सवाल आदित्य के लिए किसी थप्पड़ से कम नहीं था। स्ट्रेचर पर पड़ा आरव अपनी अच्छी वाली हथेली से चेहरा ढकते हुए रो पड़ा। —मुझे मम्मी के पास नहीं जाना। नेहा जड़ हो गई। —आरव, मैं मम्मी हूं। —नहीं जाना… मैंने कहा था विक्रम अंकल बुरे हैं… आपने मुझे झूठा बोला था। वहां खड़े पड़ोसी तक चुप हो गए। नेहा ने हकलाते हुए कहा कि बच्चे बातें बढ़ा देते हैं, मगर आरव ने टूटी आवाज में बता दिया कि जब उसने जूस गिराया था, विक्रम ने उसका हाथ मरोड़ा था और नेहा ने कहा था कि वह जलन में झूठ बोल रहा है। एम्बुलेंस वाले ने कहा कि हाथ में फ्रैक्चर हो सकता है। नेहा चढ़ना चाहती थी, लेकिन आरव इतनी जोर से चीखा कि सब समझ गए यह जिद नहीं, डर है। अस्पताल में एक्स-रे ने सच बता दिया—बाएं हाथ की हड्डी में दरार, पीठ और जांघ पर चोटों के निशान, पसली के पास कांच से कटने का घाव। राघव थोड़ी देर बाद आया, शर्ट फटी हुई थी और उंगलियां सूजी थीं। उसने आदित्य को अलग ले जाकर कहा कि पुलिस को ड्राइंग रूम की शेल्फ में लगी वह छोटी सी कैमरा मिली है, जिसे नेहा ने कभी कामवाली पर नजर रखने के लिए लगाया था। मेमोरी कार्ड पुलिस के पास था। रात करीब 12 बजे नेहा अस्पताल पहुंची और आरव के कमरे के बाहर रोते हुए बोली कि वह उसे देखना चाहती है। आदित्य ने दरवाजा बंद कर दिया। —आज तुम उसकी मां होकर भी उसे बचा नहीं पाईं। नेहा ने कहा उसे नहीं पता था कि विक्रम ऐसा कर सकता है। आदित्य ने सिर्फ इतना कहा—आरव ने तुम्हें बताया था। तभी एक पुलिस अफसर फाइल लेकर आया। उसने कहा कि कैमरे में सिर्फ आज का हमला नहीं है, कई दिनों की रिकॉर्डिंग है। तस्वीरों में विक्रम आरव की कॉलर पकड़ता दिखा, बच्चा सोफे के पीछे छिपता दिखा, और एक वीडियो में आरव ने नेहा से कहा था कि विक्रम ने उसे चोट पहुंचाई है। पुलिस अफसर ने नेहा की तरफ देखकर कहा कि उसी वीडियो में वह बच्चे से कहती दिख रही है कि झूठ बोलना बंद करो, वरना उसका रिश्ता टूट जाएगा। नेहा का चेहरा राख जैसा सफेद हो गया। फिर अफसर ने कहा कि बाल संरक्षण समिति और अदालत से तुरंत सुरक्षा आदेश मांगा जाएगा, और मां की कस्टडी अस्थायी रूप से हट सकती है। नेहा ने आदित्य का हाथ पकड़ना चाहा, मगर तभी कमरे के अंदर से आरव की चीख आई। आदित्य दौड़कर अंदर गया। आरव कांपते हुए खिड़की की तरफ इशारा कर रहा था। —पापा… विक्रम ने कहा था अगर मैंने बताया, तो वह वापस आएगा।
भाग 3
उस एक वाक्य ने अस्पताल के गलियारे में खड़े हर आदमी का चेहरा बदल दिया। अब कोई इसे घरेलू झगड़ा नहीं कह सकता था। कोई इसे बच्चे की कल्पना नहीं कह सकता था। कोई यह नहीं बोल सकता था कि छोटा बच्चा बात बढ़ा रहा है।
विक्रम ने सिर्फ आरव को मारा नहीं था। उसने उसे डर से बांध दिया था। उसने एक 4 साल के बच्चे को यह यकीन दिला दिया था कि सच बोलने की कीमत दर्द होगी। और नेहा ने, अपने अकेलेपन, जिद और नए रिश्ते के लालच में, उसी सच को झूठ मान लिया था।
आदित्य ने आरव को सीने से लगा लिया।
—वह यहां नहीं आएगा, बेटा। पुलिस बाहर है। चाचू बाहर हैं। मैं यहीं हूं।
आरव की आंखें डरी हुई थीं।
—आप भी मुझसे गुस्सा हो?
आदित्य पलंग के पास बैठ गया और उसके बालों पर हाथ फेरने लगा।
—कभी नहीं। सच बोलने पर पापा कभी गुस्सा नहीं होते।
—मम्मी हुई थीं।
आदित्य चुप हो गया। वह नेहा को बचाने के लिए झूठ बोल सकता था, मगर आरव पहले ही बहुत झूठों के नीचे दब चुका था।
—मम्मी ने बहुत बड़ी गलती की —उसने धीरे से कहा— लेकिन गलती तुम्हारी नहीं थी।
आरव ने अपनी अच्छी वाली हथेली से उसका हाथ पकड़ लिया। वह सो भी गया, फिर भी हाथ नहीं छोड़ा।
अगली सुबह अस्पताल की रिपोर्ट पुलिस और बाल कल्याण समिति को भेज दी गई। रिपोर्ट में शब्द बहुत ठंडे थे—बाएं हाथ की हड्डी में दरार, पीठ और जांघ पर चोट के निशान, पसली के पास सतही कट, मानसिक आघात की आशंका। मगर कोई रिपोर्ट यह नहीं लिख सकती थी कि हर तेज आवाज पर आरव कैसे सिहर जाता था।
राघव पूरी रात नहीं सोया। वह कमरे के बाहर कुर्सी पर बैठा रहा, हाथ बांधे, नजर दरवाजे पर टिकाए।
—मुझे जल्दी पहुंचना चाहिए था —उसने धीमे कहा।
आदित्य ने उसकी तरफ देखा।
—आप सबसे पहले पहुंचे।
—जब दरवाजा तोड़ा, तब वह फर्श पर था। विक्रम के हाथ में बैट था। मेरी आंखों के सामने अंधेरा छा गया।
आदित्य जानता था राघव क्यों ऐसा कह रहा है। उनके पिता की मौत के बाद राघव ने ही उसे पाला था। स्कूल में लड़ाई हो, फीस की कमी हो, पहली नौकरी का डर हो—राघव हमेशा दीवार बनकर खड़ा रहा। और अब उसी ने आरव के लिए भी वही किया था।
—आपने उसे बचाया।
राघव ने सिर झुका लिया।
—परिवार को बचाने के लिए धन्यवाद नहीं बोलते।
दोपहर को बाल कल्याण अधिकारी आई। उसने आदित्य से उसके काम, घर, समय, बच्चे की पढ़ाई, मदद करने वाले रिश्तेदारों और सुरक्षा के बारे में पूछा। आदित्य ने हर सवाल का जवाब ठहरकर दिया। उसने बताया कि वह काम घर से कर सकता है, आरव का स्कूल पास है, उसके घर में बच्चे का कमरा है, और राघव मदद के लिए मौजूद है।
इसी दौरान नेहा अंदर आई। उसके साथ उसकी बहन प्रिया थी, वही प्रिया जिसके साथ वह पार्लर गई थी। नेहा एक रात में 10 साल बूढ़ी लग रही थी। चेहरे पर मेकअप नहीं था, आंखें सूजी हुई थीं, हाथ में फाइल थी।
—मैं विक्रम के खिलाफ बयान दूंगी —उसने अधिकारी से कहा— मैं सब बताऊंगी। जो सजा होगी, उसे स्वीकार करूंगी।
अधिकारी ने शांत स्वर में कहा—
—यह जरूरी है। लेकिन अभी सबसे जरूरी बच्चे की सुरक्षा है।
—मैं उसकी मां हूं —नेहा रो पड़ी— मैं उसे संभाल सकती हूं।
आरव, जो दाहिने हाथ से रंग भर रहा था, उसकी आवाज सुनते ही रुक गया। उसने न तो चीखा, न रोया। बस धीरे से आदित्य के पीछे छिप गया।
नेहा ने वह देखा।
और पहली बार वह आगे नहीं बढ़ी।
—आरव… मुझे माफ कर दो।
आरव ने नीचे देखा।
—मैंने आपको बताया था।
नेहा की सांस अटक गई।
—हां, बेटा। तुमने बताया था।
—आपने बोला था मैं झूठ बोलता हूं।
—मुझे नहीं बोलना चाहिए था।
—विक्रम अंकल ने कहा था अगर मैंने पापा को बताया तो आप मुझे प्यार नहीं करेंगी।
नेहा जैसे कुर्सी पर गिर गई।
—ऐसा कभी नहीं हो सकता।
आरव ने सिर उठाया। उसकी आंखों में डर से ज्यादा दुख था।
—लेकिन आपने उन्हीं की बात मानी थी।
कमरे में कोई आवाज नहीं रही।
2 दिन बाद आरव अस्पताल से डिस्चार्ज हुआ। उसके प्लास्टर पर नर्स ने छोटा सा सुपरहीरो स्टिकर चिपका दिया था। वह नेहा के फ्लैट पर खिलौने लेने भी नहीं जाना चाहता था। आदित्य और राघव अकेले गए। ड्राइंग रूम अब भी टूटे हुए दिन की गवाही दे रहा था—टेबल की एक टांग टूटी थी, कालीन पर सूखा धब्बा था, और शेल्फ में वह खाली जगह थी जहां से पुलिस कैमरा ले गई थी।
आरव के कमरे में आदित्य को दीवार के पास एक ड्राइंग मिली। उसमें 3 लोग बने थे—आरव, नेहा और आदित्य। विक्रम कहीं नहीं था। कोने में टेढ़े अक्षरों में लिखा था—“पापा आओ।”
आदित्य उन 2 शब्दों को बहुत देर तक देखता रहा।
राघव ने उसके कंधे पर हाथ रखा।
—चल।
5 दिन बाद अदालत में अस्थायी कस्टडी की सुनवाई हुई। नेहा बिना मेकअप, बिना बहाने, और झुकी हुई आंखों के साथ आई। विक्रम जेल में था, इसलिए वीडियो लिंक से पेश हुआ। उसका वकील कह रहा था कि यह घर का हादसा था, बच्चे ने खेलते हुए चोट खाई, और राघव ने बिना वजह हमला किया। लेकिन वीडियो ने सारी कहानी बदल दी।
पहले वीडियो में विक्रम आरव से खिलौना छीनकर उसे सोफे से धक्का देता दिखा।
दूसरे वीडियो में आरव ने नेहा से कहा—
—मम्मी, विक्रम अंकल ने हाथ बहुत जोर से पकड़ा।
नेहा स्क्रीन पर फोन देखते हुए बोली थी—
—बस करो आरव। हर बार ड्रामा मत किया करो जब वह घर आते हैं।
तीसरा वीडियो सबसे भयानक था। उसमें आरव फर्श पर था, अपना हाथ बचा रहा था। विक्रम के हाथ में बैट था। उसने वैसे नहीं मारा जैसे कोई खेल में गलती से छू जाए। उसने वैसे मारा जैसे कोई सजा देता है। फिर वह झुककर बोला—
—अगर रोया तो और बुरा होगा।
नेहा यह देखकर अदालत कक्ष से बाहर चली गई। उसकी रुलाई दीवारों से टकरा रही थी।
आदित्य नहीं गया। उसने पूरा देखा। वह जानता था कि अगर उसका बेटा यह सब झेल सकता है, तो वह आंखें बंद करने का अधिकार नहीं रखता।
जज ने अस्थायी पूर्ण कस्टडी आदित्य को दी। नेहा को मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन के बाद ही निगरानी में मुलाकात की अनुमति मिली। विक्रम पर बाल उत्पीड़न, धमकी और गंभीर चोट का मामला दर्ज हुआ। उसके खिलाफ restraining order जारी हुआ। आरव के लिए काउंसलिंग अनिवार्य की गई।
नेहा ने बहस नहीं की। शायद पहली बार उसने समझा कि लड़ना भी कभी-कभी अपने बच्चे को दोबारा चोट पहुंचाना होता है।
अदालत के बाहर उसने आदित्य को रोका।
—आदित्य।
राघव तन गया, मगर आदित्य ने उसे रुकने का इशारा किया।
नेहा 2 कदम दूर खड़ी रही। अब उसमें वह पुरानी जिद नहीं थी। सिर्फ पछतावे का बोझ था।
—मैं तुमसे भरोसा मांगने नहीं आई —उसने कहा— वह अधिकार मैंने खो दिया।
आदित्य चुप रहा।
—मैं थेरेपी करूंगी। हर बयान दूंगी। कोर्ट जो कहेगा, मानूंगी। बस… जब आरव पूछे, तो उससे मत कहना कि मैं उससे प्यार नहीं करती।
आदित्य के भीतर कहीं हल्की करुणा उठी, लेकिन उसने उसे फैसले पर हावी नहीं होने दिया।
—मैं उसके सामने तुम्हें बुरा नहीं कहूंगा। लेकिन तुम्हें बचाने के लिए उससे झूठ भी नहीं बोलूंगा।
नेहा ने सिर हिलाया।
—मैंने उसे खो दिया, है ना?
आदित्य का जवाब कठोर था, मगर सच था।
—तुमने उसका भरोसा खोया है। और यह प्यार से भी बड़ा होता है। अगर कभी वापस पाना है, तो रोकर नहीं, सुनकर पाना होगा। तब भी सुनना होगा जब उसकी बात तुम्हें तोड़ दे।
नेहा ने आंखें बंद कर लीं।
—उसे कहना मुझे माफ कर दे।
—जब वह तैयार होगा, तुम खुद कहना।
आदित्य चला गया।
अगले महीने आसान नहीं थे। कोई फिल्मी अंत नहीं हुआ। एक फैसले, एक गले लगाने या एक माफी से बच्चा ठीक नहीं हो गया।
आरव रात में चिल्लाकर उठता था। कहता था बैट फिर आ रहा है। कई हफ्तों तक क्रिकेट मैच देखते ही टीवी बंद करने को कहता। स्कूल में अगर कोई पुरुष शिक्षक उसके पास आ जाता, तो वह पीछे हट जाता। आदित्य अगर उसे लेने में 5 मिनट देर कर देता, तो आरव गेट के पास बैग पकड़कर बैठ जाता, जैसे दुनिया उसे फिर भूल जाएगी।
आदित्य ने अपनी जिंदगी बदल दी। उसने ऑफिस से हाइब्रिड काम मांगा। प्रमोशन छोड़ दिया, क्योंकि उसमें महीने में 2 बार मुंबई जाना पड़ता। उसने स्कूल के पास छोटा सा फ्लैट लिया। खिड़कियों पर मजबूत लॉक लगवाए। आरव के कमरे की दीवार हल्के नीले रंग से पुतवाई। छत पर चमकने वाले छोटे सितारे लगाए, क्योंकि आरव कहता था अंधेरा आवाज करता है।
हर रात उनका एक नियम बन गया—दरवाजा चेक करना, खिड़की चेक करना, बिस्तर के नीचे देखना, और चांद वाली छोटी लाइट जलाना।
—विक्रम को हमारा घर पता है?
—नहीं।
—अगर वह बाहर आ गया तो?
—वह पास नहीं आ सकता। पुलिस है, कोर्ट है, और हम हैं।
—आप कहीं जाओगे?
—नहीं।
—पापा वाली कसम?
—पापा वाली कसम।
राघव भी उस जिंदगी का हिस्सा बन गया। वह हफ्ते में 3 या 4 बार आता। कभी छोले भटूरे लाता, कभी स्कूल प्रोजेक्ट बनवाता, कभी फर्श पर बैठकर ब्लॉक्स से किला बनाता। उसने कभी आरव के सामने विक्रम की पिटाई का जिक्र नहीं किया। आरव के लिए राघव वह बड़ा आदमी था जो कागज के हवाई जहाज बनाता था और राक्षस की आवाज निकालकर हंसाता था।
एक शाम रंग भरते हुए आरव ने पूछा—
—चाचू, आपने बुरे अंकल को मारा था?
राघव ने क्रेयॉन धीरे से मेज पर रखा।
—मैंने उन्हें रोका था।
—क्योंकि वह मुझे फिर मारते?
राघव की आंखें भर आईं, मगर आवाज स्थिर रही।
—क्योंकि किसी को तुम्हें मारने का हक नहीं है।
आरव सोचने लगा।
—अगर मैं जूस गिरा दूं तब भी?
—तब भी नहीं।
—अगर खिलौना तोड़ दूं तब भी?
—तब भी नहीं।
—अगर रोऊं तब भी?
राघव हल्का मुस्कुराया।
—रोने पर तो बिल्कुल नहीं।
उस रात आरव ने पहली बार 6 घंटे लगातार नींद ली।
नेहा ने कोर्ट के हर आदेश का पालन किया। उसने विक्रम के खिलाफ बयान दिया। उसने वे मैसेज भी पुलिस को दिए जिनमें विक्रम उसे भड़काता था—कि आरव बिगड़ा हुआ बच्चा है, आदित्य उसे इस्तेमाल कर रहा है, और अगर नेहा को नई जिंदगी चाहिए तो बच्चे को “सीमा” में रखना होगा। विक्रम ने राघव को दोषी साबित करने की कोशिश की, लेकिन वीडियो में साफ था कि राघव दरवाजा तब तोड़ता है जब आरव चीखता है और विक्रम बैट पकड़े खड़ा है।
नेहा की पहली निगरानी वाली मुलाकात बहुत कठिन थी। आरव ने उसे एक पारिवारिक काउंसलिंग सेंटर में मिला, जहां मनोवैज्ञानिक भी मौजूद थी। आदित्य उसे छोड़कर बाहर बैठा रहा। वह अपनी नाराजगी आरव पर नहीं डालना चाहता था, लेकिन भीतर कहीं उसे लगता था कि नेहा 1 मिनट की भी हकदार नहीं।
मुलाकात के बाद आरव चुपचाप कार में बैठ गया।
—कैसा लगा?
—मम्मी रोईं।
—और तुम?
—मैं नहीं रोया।
—ठीक है।
थोड़ी देर बाद आरव ने खिड़की से बाहर देखते हुए कहा—
—उन्होंने सॉरी बोला।
—तुमने क्या कहा?
आरव ने बहुत देर बाद जवाब दिया।
—मैंने कहा अभी भी डर लगता है।
आदित्य ने स्टीयरिंग कसकर पकड़ा।
—यह कहना भी ठीक है।
उसने आरव को माफ करने के लिए मजबूर नहीं किया। उसने समझ लिया था कि बच्चों से जल्दी ठीक हो जाने की मांग करना भी एक तरह की क्रूरता है।
लगभग 1 साल लगा, तब जाकर आरव विक्रम का नाम बिना कांपे ले पाया। 1 साल से ज्यादा लगा, तब जाकर नेहा की निगरानी वाली मुलाकातें थोड़ी सहज हुईं। कस्टडी आदित्य के पास ही रही। नेहा ने अपनी मां होने की जगह दोबारा बनानी शुरू की—बिना अधिकार जताए, बिना बहाने बनाए, और बिना यह मानकर कि प्यार काफी है अगर सुरक्षा नहीं दी।
जब आरव 5 साल का हुआ, स्कूल में वार्षिक मेले का दिन आया। मैदान में झूले थे, गुब्बारे थे, भेलपूरी की खुशबू थी, बच्चे चेहरे पर रंग लगवाकर भाग रहे थे। एक कोने में बच्चों के लिए प्लास्टिक बैट और नरम गेंद वाला खेल था।
आरव उसे देखकर ठहर गया।
आदित्य उसके पास घुटनों के बल बैठ गया।
—हम कोई दूसरा खेल खेल सकते हैं।
आरव ने सिर हिलाया।
—यह प्लास्टिक का है।
—हां।
—जोर से नहीं लगता।
—नहीं।
—आप यहीं रहोगे?
—यहीं।
आरव ने अपने ठीक हो चुके हाथ से बैट पकड़ा। टीचर ने धीरे से गेंद फेंकी। पहली बार वह चूक गया। दूसरी बार भी। तीसरी बार उसने हल्का सा बल्ला घुमाया और गेंद थोड़ी दूर लुढ़क गई।
सबने ताली बजाई, जैसे उसने वर्ल्ड कप जीत लिया हो।
आरव दौड़कर आदित्य से लिपट गया।
—पापा, मैंने मारा!
आदित्य ने उसे उठा लिया।
—हां, मेरे शेर। तुमने कर दिखाया।
थोड़ी दूरी पर नेहा खड़ी थी। उसकी आंखों में आंसू थे। वह आगे नहीं आई। उसने पल को अपने पछतावे से खराब नहीं किया। बस दूर से देखती रही। शायद अब वह समझ चुकी थी कि उसकी सबसे बड़ी सजा अदालत का आदेश नहीं था, बल्कि अपने बेटे की जिंदगी के सबसे साहसी पलों को दूर से देखना था।
उस रात सोने से पहले आरव ने कहा—
—पापा, वह कहानी सुनाओ जब मैंने आपको फोन किया था।
पहले यह कहानी आदित्य को तोड़ देती थी। मगर काउंसलर ने समझाया था कि आरव को उस याद में खुद को सिर्फ पीड़ित नहीं, बल्कि मदद मांगने वाला बहादुर बच्चा महसूस करना जरूरी है।
इसलिए आदित्य ने हर बार की तरह कहा—
—एक बार एक बहुत बहादुर बच्चा था। उसे डर लग रहा था, लेकिन उसने समझ लिया कि कुछ गलत है। वह रोया भी, कांपा भी, फिर भी उसने मदद मांगी। उसने पापा को फोन किया। पापा ने चाचू को फोन किया। और सब मिलकर समय पर पहुंच गए।
आरव ने अपने नीले डायनासोर को सीने से लगाया।
—वह बच्चा मैं था?
—हां।
—मैं रोया था, फिर भी बहादुर था?
—तुम इसलिए बहादुर थे क्योंकि डर और रोने के बावजूद तुमने सच बोला।
आरव कुछ देर सोचता रहा।
—तो रोना बुरी बात नहीं है?
आदित्य का गला भर आया।
—नहीं, बेटा। रोना उन लोगों को आता है जिनके दिल में एहसास होता है। और मदद मांगना मजबूत लोगों का काम है।
आरव ने नींद में मुस्कुराते हुए कहा—
—अगर कभी कोई बच्चा बोले कि उसे दर्द हो रहा है, तो मैं उसकी बात मानूंगा।
आदित्य तुरंत जवाब नहीं दे पाया। उसने बस आरव के माथे को चूमा।
—यही सबसे जरूरी बात है।
आरव के सो जाने के बाद आदित्य देर तक उसके कमरे में बैठा रहा। छत पर चमकते छोटे सितारे देखता रहा। उसे वह फोन कॉल याद आई। वह ट्रैफिक, वह टूटा दरवाजा, वह एम्बुलेंस, वह वीडियो, वह अदालत, और वह एक छोटी आवाज जो समय रहते सच बोल गई थी।
जिंदगी हमेशा चेतावनी देकर सब कुछ नहीं छीनती।
कभी बस फोन 1 मीटिंग के बीच वाइब्रेट होता है।
कभी 4 साल का बच्चा वह हिम्मत दिखा देता है, जो बड़े लोग नहीं दिखा पाते।
और कभी एक त्रासदी और दूसरी जिंदगी के बीच सिर्फ इतना फर्क होता है कि कोई समय पर एक छोटी सी आवाज पर यकीन कर ले—
—पापा, मुझे ले जाओ।
Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.