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अस्पताल में मेरी टांग पर 18 टांके लग रहे थे, तभी पति ने 39वीं बार फोन करके कहा, “माँ भूखी है, घर आओ,” मैंने सिर्फ फोन काटा, मेडिकल रिपोर्ट ली और 10000000 रुपये वाला जॉइंट अकाउंट रुकवा दिया… उसे पता नहीं था कि मेरी चुप्पी में उसकी नौकरी तक छिपी थी।

PART 1

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जब सरकारी अस्पताल की इमरजेंसी में आरती की टांग पर 18 टांके लगाए जा रहे थे, उसी वक्त उसके पति ने 39 बार फोन करके सिर्फ इतना कहा—“माँ ने खाना नहीं खाया, नाटक बंद करो और घर आओ।”

नर्स के हाथ में खून से भीगी पट्टी ठिठक गई। डॉक्टर की उंगलियाँ 1 पल के लिए रुक गईं। दिल्ली के लोक नायक अस्पताल की सफेद रोशनी में सब कुछ बेरहम साफ दिख रहा था—आरती की फटी सलवार, सड़क की धूल से सना दुपट्टा, एड़ी से गायब चप्पल, और मोबाइल से निकलती वह आवाज़, जिसे उसकी तकलीफ से ज्यादा अपनी माँ की थाली की चिंता थी।

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आरती शर्मा को 1 घंटे पहले चांदनी चौक की भीड़भरी सड़क पर एक तेज डिलीवरी बाइक ने टक्कर मार दी थी। वह अपनी छोटी मिठाई की दुकान से लौट रही थी, हाथ में बेसन, सूखे मेवे और करवा चौथ के ऑर्डर की रसीदें थीं। बाइक ने उसे ऐसे उछाला जैसे वह कोई इंसान नहीं, सड़क पर पड़ा बोरा हो। जब आँख खुली, लोग चिल्ला रहे थे, एंबुलेंस आ चुकी थी और उसकी पिंडली से खून बह रहा था।

उसने फोन इसलिए उठाया था क्योंकि रोहन 39 बार कॉल कर चुका था।

“मैं अस्पताल में हूँ,” आरती ने सूखे गले से कहा। “टिबिया फ्रैक्चर है। अभी टांके लगा रहे हैं।”

दूसरी तरफ 1 पल की चुप्पी आई। डर वाली नहीं। झुंझलाहट वाली।

“तुम हमेशा बात बढ़ाती हो। माँ को 1 बजे से पहले बिना मिर्च का खाना चाहिए। तुम्हें पता है बाहर का खाना उन्हें सूट नहीं करता।”

आरती ने आँखें बंद कर लीं। सुई की चुभन से ज्यादा गहरी कोई पुरानी दरार भीतर खुल रही थी।

4 साल की शादी में वह सास सावित्री देवी के लिए ऐसे खाना बनाती रही जैसे विवाह के फेरे में 1 अतिरिक्त वचन यही लिया गया हो—कम नमक की दाल, मुलायम खिचड़ी, घी रहित पराठा, हल्की सब्जी, गरम दूध, सौंफ का पानी। सावित्री देवी बीमार नहीं थीं। मंदिर तक रोज 800 कदम चलती थीं, पड़ोसन के घर कीर्तन में 2 घंटे बैठती थीं, लेकिन रोहन के सामने आते ही कमर पकड़कर कराहने लगतीं और आरती तुरंत निकम्मी बहू बन जाती।

रोहन खुद को एक बड़ी इलेक्ट्रॉनिक्स कंपनी में रीजनल हेड बताता था। रिश्तेदारों के सामने कहता, “मेरे बिना नॉर्थ इंडिया की सेल्स बैठ जाए।” फिर आरती की ओर देखकर हंसता, “और ये मिठाई बनाती है। छोटा काम है, पर घर में हाथ बँट जाता है।”

उस दिन आरती ने आँखें खोलीं।

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“तुम्हारी माँ अब मेरी जिम्मेदारी नहीं हैं।”

“क्या?”

“और यह शादी भी नहीं।”

उसने फोन काट दिया।

नर्स ने धीरे से मोबाइल मेज पर रखा। “मैडम, क्या इन कॉल्स को मेडिकल रिकॉर्ड में नोट कर दें?”

आरती ने सिर हिला दिया। यह कागजी सवाल नहीं था, यह किसी अजनबी औरत का हाथ था।

30 मिनट बाद 2 पुलिसकर्मी उसके बेड के पास आए।

“आरती शर्मा?”

“जी।”

“आपके पति ने शिकायत की है कि आप घर में बुजुर्ग महिला को अकेला छोड़कर झगड़े के बाद निकल गईं। उन्होंने इसे लापरवाही बताया है।”

आरती हंसी, मगर उस हंसी में खुशी नहीं थी।

“मुझे 11:42 पर बाइक ने टक्कर मारी। एंबुलेंस मुझे यहाँ लाई। एडमिशन, एक्स-रे, डॉक्टर—सब रिकॉर्ड में है।”

बड़े पुलिसकर्मी ने उसकी पट्टी बंधी टांग देखी, फिर फोन स्क्रीन पर 39 मिस्ड कॉल्स।

“ये कॉल्स?”

“मुझे खाना बनाने बुलाने के लिए।”

डॉक्टर ने कड़े स्वर में कहा, “मरीज चल नहीं सकती। फ्रैक्चर है, गहरी चोट है और सख्त आराम चाहिए।”

पुलिसकर्मी ने वहीं से रोहन को कॉल किया। फोन उठते ही रोहन गरजा, “आखिर उठा लिया? आरती, तुम्हें—”

“दिल्ली पुलिस बोल रही है, श्री रोहन मेहरा। आपकी पत्नी सड़क दुर्घटना के बाद अस्पताल में भर्ती हैं। आपकी शिकायत तथ्यों से मेल नहीं खाती।”

स्पीकर में घबराई सांस गूंजी।

“मुझे… मुझे लगा मामूली चोट है।”

आरती ने दर्द के बावजूद सिर उठाया।

“तुम्हें इसलिए लगा क्योंकि तुमने पूछा ही नहीं।”

तभी रोहन की आवाज़ नीची, जहरीली हो गई।

“बहुत अच्छा। पुलिस के सामने मुझे राक्षस बनाओगी? तलाक चाहिए तो मिलेगा। मगर गुरुग्राम वाला फ्लैट, कार, जॉइंट अकाउंट के 10000000 रुपये—सब मेरे रहेंगे। तुम अपनी टूटी टांग और हलवाई वाली एप्रन लेकर निकल जाना।”

आरती ने सफेद छत को देखा।

“तुम गलत हो, रोहन।”

“किस बात पर?”

“उस औरत को पहचानने में, जिससे तुमने शादी की थी।”

PART 2

पुलिस के जाते ही आरती ने मेडिकल रिपोर्ट, एक्स-रे, कॉल रिकॉर्ड और एडमिशन पेपर की कॉपी मांगी। फिर उसने 4 फोन किए।

पहला बैंक को—जॉइंट अकाउंट से 10000000 रुपये बिना 2 हस्ताक्षर निकले नहीं।

दूसरा वकील नंदिता राव को—गुरुग्राम फ्लैट पर रोक लगवानी थी।

तीसरा अपनी सहेली मीरा को—कपड़े, लैपटॉप और चार्जर लेकर अस्पताल आने को।

चौथा कॉल उसने “सूर्या इलेक्ट्रोमार्ट” के मैनेजिंग डायरेक्टर विक्रम सूद को किया।

“मैडम,” विक्रम की आवाज़ तुरंत बदल गई, “आप आदेश दीजिए।”

“रोहन मेहरा की फाइल निकालिए। खर्चे, सप्लायर कॉन्ट्रैक्ट, ट्रैवल बिल, सब पर अचानक ऑडिट शुरू करें। अभी मेरा नाम बाहर नहीं आएगा।”

“क्या आप अपनी पोजीशन बताना चाहेंगी?”

आरती ने प्लास्टर को देखा।

“अभी नहीं। मैं देखना चाहती हूँ कि वह उस सीढ़ी पर कितना चढ़ता है, जिसे खरीदा मैंने था।”

क्योंकि रोहन नहीं जानता था। शादी से पहले आरती ने सूर्या इलेक्ट्रोमार्ट में बहुमत हिस्सेदारी बनाई थी। फिर अपनी संपत्ति “प्रभा होल्डिंग्स” में सुरक्षित कर दी थी। मिठाई की दुकान उसका शौक थी, मजबूरी नहीं।

उसी शाम रोहन अस्पताल पहुँचा, सावित्री देवी को साथ लेकर।

सावित्री ने छाती पकड़कर कहा, “हम भूख से मर रहे थे और बहू यहाँ आराम कर रही थी।”

आरती ने कॉल बटन दबाया।

“सिक्योरिटी बुलाइए। ये लोग इलाज में बाधा डाल रहे हैं।”

रोहन का चेहरा उतर गया।

“तुम अपने पति को निकलवाओगी?”

“जो आदमी खुली चोट वाली पत्नी से रसोई में लौटने को कहे, वह पति कहलाने लायक नहीं।”

PART 3

मीरा सबसे पहले पहुँची। उसके हाथ में बैग था और आँखों में इतना गुस्सा कि वह बोलती तो शायद रोहन को वहीं थप्पड़ मार देती। उसके पीछे वकील नंदिता राव आईं—सफेद साड़ी, काले कोट, शांत चेहरा और धारदार निगाह।

रोहन ने होंठ टेढ़े किए। “अब ये कौन है?”

आरती ने कहा, “मेरी वकील।”

सावित्री देवी चीख पड़ीं, “बहू पति के खिलाफ वकील नहीं लाती!”

नंदिता ने अपना कार्ड मेज पर रखा। “बहू भी बालिग इंसान होती है, देवी जी। घर के साथ खरीदा गया सामान नहीं।”

रोहन हंसा। “आरती के पास कुछ नहीं है। सब मेरा है।”

नंदिता ने पूछा, “फ्लैट सिर्फ आपके नाम है?”

वह चुप।

“जॉइंट अकाउंट में सिर्फ आपकी कमाई है?”

फिर चुप।

“कार निजी पैसों से खरीदी गई थी?”

रोहन के जबड़े कस गए।

आरती ने धीरे कहा, “मैडम, फ्लैट की बिक्री या मॉर्गेज पर तत्काल रोक लगवाइए। बैंक को लिखिए, कोई ट्रांजैक्शन बिना 2 हस्ताक्षर नहीं। कार, इंश्योरेंस, भुगतान और फंड्स की उत्पत्ति सब दर्ज कराइए।”

रोहन 1 कदम आगे बढ़ा। “मेरे पैसों को हाथ मत लगाना।”

नंदिता की आवाज़ ठंडी थी। “1 कदम और बढ़े तो तलाक में अस्पताल में धमकी की शिकायत भी जुड़ जाएगी।”

सिक्योरिटी आ गई। सावित्री देवी तुरंत रोने लगीं।

“देखो! बीमार बूढ़ी औरत को निकाल रही है!”

आरती ने सिर घुमाए बिना कहा, “आप बाहर रो सकती हैं। यहाँ मुझे शांति चाहिए।”

जाते-जाते रोहन झुका। “तुम 1 महीना भी ताकतवर औरत बनकर नहीं टिकोगी।”

आरती ने जवाब दिया, “अपनी कुर्सी संभालो, रोहन। हवा तेज होने वाली है।”

उसे समझ नहीं आया।

रात को विक्रम सूद ने पहली रिपोर्ट भेजी। रोहन के ट्रैवल बिल, बिजनेस डिनर, होटल रसीदें, फ्यूल क्लेम, सब में गड़बड़ी थी। सबसे बड़ा नाम था “मेहरा सप्लाई चेन”—जिसका मालिक था रोहन का मामा का बेटा करण। वही करण जिसे सावित्री देवी “घर का हीरा” कहती थीं, जबकि आधे शहर में उसकी उधारी फैली थी।

3 पुराने अलर्ट भी मिले। असिस्टेंट से बिल बदलवाना, पारिवारिक खाना कंपनी खर्च में डालना, और नकली सप्लायर को कॉन्ट्रैक्ट दिलवाना।

आरती ने सिर्फ इतना लिखा, “ऑडिट साफ-सुथरा हो। मेरा तलाक और कंपनी की जांच अलग रहें।”

अगली सुबह पारिवारिक व्हाट्सऐप ग्रुप में तूफान आ गया। बुआ, चाची, मामा, ननद—सबने आरती को लालची, चरित्रहीन, घर तोड़ने वाली कहा। रोहन ने लिखा कि आरती चोट का नाटक कर रही है ताकि उसकी माँ को बेघर करके पैसे हड़प सके।

आरती ने हर संदेश के स्क्रीनशॉट लिए।

नंदिता ने कानूनी नोटिस भेजा—दुर्घटना अस्पताल, पुलिस और एंबुलेंस रिकॉर्ड से प्रमाणित है; आगे की बदनामी पर मानहानि का केस होगा।

एक-एक करके संदेश मिटने लगे।

उसी शाम सावित्री देवी ने अज्ञात नंबर से फोन किया। आवाज़ कांपती हुई बनाई।

“आरती… मैं हार्ट अस्पताल में हूँ। आ जा। फ्लैट की सच्चाई बता दूंगी।”

मीरा ने तुरंत अस्पताल में कॉल किया। कोई सावित्री मेहरा भर्ती नहीं थी।

आरती ने फोन कान पर रखा। “आपका झूठ रिकॉर्ड हो चुका है, मम्मी जी।”

सावित्री की आवाज़ अचानक कठोर हो गई। “तू सोचती है तेरी मिठाई की दुकान तुझे बचा लेगी?”

“नहीं। मेरे सबूत बचाएंगे।”

5 मिनट बाद गुरुग्राम की सोसाइटी के गार्ड ने मीरा को फोन किया। घर के बाहर टेम्पो खड़ा था। अंदर से डिब्बे निकाले जा रहे थे।

आरती ने गहरी सांस ली। “मीरा, अकेले अंदर मत जाना। पुलिस, सोसाइटी मैनेजर और कैमरा साथ रखना। साफ बोलना कि मेरे पासपोर्ट, आधार, बैंक कार्ड, गहने और प्रभा होल्डिंग्स की फाइल उसी घर में हैं।”

1 घंटे बाद वीडियो आया। अलमारी खुली थी। ड्रॉअर उलटे पड़े थे। छोटा लॉकर टूटा हुआ था। पासपोर्ट, आधार कार्ड, दादी की पुरानी सोने की नथ, 1 कंगन, कई बैंक कार्ड और “प्रभा होल्डिंग्स” वाली फाइल गायब थी।

फिर रोहन का मैसेज आया।

“अपने कागज चाहिए तो तलाक वापस लो।”

आरती ने स्क्रीनशॉट नंदिता, पुलिस और विक्रम को भेज दिया।

उसने जवाब दिया, “तुमने अपनी बाकी बर्बादी खुद लिख दी।”

3 दिन बाद डॉक्टर ने उसे कुछ घंटों के लिए अस्पताल से बाहर जाने की इजाजत दी। वह बैसाखियों के सहारे गुरुग्राम पहुँची। साथ में मीरा, नंदिता, 2 पुलिसकर्मी और सोसाइटी मैनेजर थे।

दरवाजा खुलते ही सावित्री देवी ड्राइंग रूम के बीचोंबीच ऐसे बैठी थीं जैसे कोई रानी अपना किला बचा रही हो। चारों ओर रिश्तेदार, कचरे के बैग, बंद डिब्बे और दीवार से उतारे गए फोटो फ्रेम पड़े थे।

“आ गई?” सावित्री चिल्लाईं। “यह मेरे बेटे का घर है। तू कुछ नहीं ले जाएगी।”

आरती ने बैसाखी आगे टिकाई।

“उठिए।”

कमरा जम गया।

“क्या?”

“आप उस सोफे पर बैठी हैं जो जॉइंट फंड से खरीदा गया था, उस फ्लैट में जो रोहन मेहरा और आरती शर्मा दोनों के नाम है। आप मालिक नहीं हैं।”

नंदिता ने कागज पुलिस को दिए। “हम मेरी क्लाइंट के निजी दस्तावेज और चोरी किए गए सामान लेने आए हैं।”

सावित्री ने छाती पकड़ ली। “माँ को चोर कहोगे?”

नंदिता ने टैबलेट पर वीडियो दिखाया। “इसमें आप आरती जी का निजी लॉकर लेकर जाती दिख रही हैं। 1 मिनट में लौटाइए।”

एक बुआ बुदबुदाई, “हमें तो पता नहीं था…”

आरती ने उसे देखा। “गाली देने में आप सब परिवार थे। गवाही देने में सब मेहमान बन गए?”

कोई नहीं बोला।

आखिर सावित्री ने स्टोर का दरवाजा खोला। लॉकर वहीं था। अंदर कागज, कार्ड, गहने और प्रभा होल्डिंग्स की फाइल थी। फाइल खुली हुई थी।

सावित्री बोलीं, “मैं बस देखना चाहती थी तू छुपा क्या रही है।”

आरती ने फाइल उठा ली। “अफसोस, देखकर भी समझ नहीं पाईं।”

“यह प्रभा होल्डिंग्स क्या है? तेरे पास पैसा है? तू रोहन की पत्नी है, यानी वह पैसा परिवार का है।”

आरती ने दरवाजे की ओर देखते हुए कहा, “3 दिन पहले आप कह रही थीं मैं 1 चम्मच भी नहीं ले जाऊंगी। अब इस एहसास को याद रखिए—कुछ सामने देखकर भी उसे कभी छू न पाना।”

दोपहर में रोहन ने 22 कॉल किए। आरती ने नंदिता के सामने कॉल उठाया।

“प्रभा होल्डिंग्स क्या है?” उसने बिना नमस्ते पूछ लिया।

“मेरी शादी से पहले की संपत्ति।”

“तुम्हारे शेयर हैं?”

“हाँ।”

“किसमें?”

“जिससे तुम्हारा कोई लेना-देना नहीं।”

उसकी सांस तेज हो गई। “तुमने अपनी हैसियत छुपाई।”

“तुमने मेहरा सप्लाई चेन छुपाई। नकली बिल छुपाए। माँ के रेस्टोरेंट खाने कंपनी खर्च में डाले। ऑफिस कार से हरिद्वार और जयपुर की निजी यात्राएँ छुपाईं।”

“तुमने मेरी जासूसी करवाई?”

“नहीं। तुम्हारी कंपनी ने तुम्हारा ऑडिट किया।”

“तुम ऐसे बोल रही हो जैसे वहाँ तुम्हारी चलती हो।”

आरती ने नंदिता की ओर देखा।

“जल्दी समझ जाओगे।”

2 हफ्ते बाद सुलह की पहली सुनवाई हुई। आरती 1 बैसाखी के सहारे अदालत में आई। रोहन दुबला दिख रहा था, मगर उसकी आँखों में अब भी वही अहंकार था।

जज ने पूछा, “क्या समझौते की कोई संभावना है?”

रोहन ने टूटी आवाज़ बनाई। “आरती, मुझसे गलती हुई। माँ बूढ़ी हैं। ऑफिस का दबाव था। हम परिवार हैं।”

आरती ने शांत स्वर में कहा, “जब मैं अस्पताल की मेज पर थी, तुमने नहीं पूछा कि दर्द हो रहा है या नहीं। तुमने कहा, माँ ने खाना नहीं खाया।”

रोहन के वकील ने समझौता रखा—आरती शिकायतें वापस ले, फ्लैट में अपना हिस्सा छोड़े, रोहन की प्रतिष्ठा बचाए। बदले में रोहन उसकी शादी से पहले की संपत्ति पर दावा नहीं करेगा, बशर्ते आरती “सामाजिक पहचान छुपाने” के लिए उसे मुआवजा दे।

मीरा हंस पड़ी।

आरती ने कागज उठाया और 2 टुकड़े कर दिए।

“मैं यहाँ जीने की अनुमति लेने नहीं आई।”

रोहन ने मेज पर हाथ मारा। “तुमने मुझे बेइज्जत किया! अगर पता होता तुम अमीर हो तो मैं माँ को ऐसे नहीं रहने देता!”

आरती की आँखों में ठंडी उदासी थी।

“तुम्हारी माँ 3 बेडरूम फ्लैट में रहती थीं, लिफ्ट थी, मेड थी, हफ्ते में 2 बार नर्स आती थी, और बहू घर का खाना बनाती थी। तुम इसलिए नाराज नहीं हो कि मैंने पैसा छुपाया। तुम इसलिए नाराज हो कि तुम उसे ले नहीं पाए।”

सुलह टूट गई।

फिर रोहन की कुर्सी सचमुच चली गई।

सूर्या इलेक्ट्रोमार्ट में बड़े अधिकारियों की विदाई शोर से नहीं होती। कांच के कमरे, पानी की बोतलें और फाइलों की कतार होती है। रोहन को कॉन्फ्रेंस रूम में बुलाया गया। सामने एचआर, लीगल और कम्प्लायंस बैठे थे।

“श्री रोहन मेहरा, आपका अनुबंध गंभीर कदाचार के कारण समाप्त किया जाता है—फर्जी खर्चे, हितों का टकराव, सप्लायर पक्षपात, कंपनी संपत्ति का दुरुपयोग और कर्मचारी पर दबाव।”

रोहन चिल्लाया, “यह मेरी पत्नी का काम है! मैं बोर्ड से बात करूंगा!”

कंपनी के वकील ने घड़ी देखी। “आपके पास सामान लेने के लिए 10 मिनट हैं।”

15 मिनट बाद वह कार्डबोर्ड बॉक्स लेकर बाहर आया। सड़क पर एक काली कार रुकी थी। पीछे की खिड़की नीचे हुई।

आरती अंदर बैठी थी, सफेद कुर्ता, टांग पर सपोर्ट बेल्ट।

“तुम बोर्ड से बात करना चाहते थे, रोहन।”

उसका चेहरा सफेद पड़ गया। “तुम…”

“कंपनी ने तुम्हें बर्बाद नहीं किया। उसने सिर्फ तुम्हारे कर्म तोले। वजन तुम्हारे कर्मों का था।”

मेहरा सप्लाई चेन की फाइल अधिकारियों तक पहुँची। करण को नोटिस मिला। जिस असिस्टेंट ने सच बताया था, उसे दूसरे विभाग में सुरक्षित शिफ्ट कर दिया गया।

सावित्री देवी को नौकरी जाने की खबर मिली तो वह आरती के नए किराए के अपार्टमेंट के गेट पर आकर बैठ गईं।

“बेटी, दया कर। रोहन मेरा इकलौता बेटा है। तेरे पास कंपनी है। फ्लैट और पैसा तेरे लिए क्या है?”

आरती 1 मीटर दूर खड़ी रही।

“मैं इसलिए नहीं लड़ रही कि मुझे फ्लैट चाहिए। मैं इसलिए लड़ रही हूँ क्योंकि वह मेरा भी है।”

“तू हमें सड़क पर ला देगी!”

“अमीर औरत से चोरी भी चोरी ही होती है। मजबूत औरत को अपमानित करना भी हिंसा ही होती है। सास होना किसी की जिंदगी पर राज करने का लाइसेंस नहीं।”

सावित्री का चेहरा टेढ़ा हो गया। “जब तू बूढ़ी होगी, कोई पानी नहीं पूछेगा।”

“मैं पेशेवर मदद के पैसे दे दूंगी, मगर अपमान करने वालों से प्यार नहीं मांगूंगी।”

सुरक्षा गार्ड आ गया।

1 महीने बाद फैसला आया। आरती अब बिना बैसाखी के चल रही थी, थोड़ी लंगड़ाहट के साथ। अदालत में रोहन का सूट ढीला लग रहा था। सावित्री उसके पीछे रुमाल लेकर बैठी थीं।

रोहन के वकील ने प्रभा होल्डिंग्स पर हमला किया। “आरती ने बड़ी संपत्ति छुपाई, जिससे मेरे क्लाइंट को विवाह का सही निर्णय लेने से वंचित किया गया।”

नंदिता उठीं। “यह संपत्ति विवाह से पहले की है और नोटरीकृत अनुबंध से सुरक्षित है। रोहन मेहरा ने वह अनुबंध अपनी इच्छा से साइन किया। 4 साल तक उन्होंने अपनी पत्नी की मिठाई की दुकान का मजाक उड़ाया, उसे नौकरानी की तरह बरता। अब जब पता चला कि वह बड़े समूह की हिस्सेदार हैं, तो दावा कर रहे हैं। यह अधिकार नहीं, लालच है।”

जज ने रोहन से पूछा, “आपने अनुबंध पर हस्ताक्षर किए?”

“हाँ।”

“दबाव में?”

“नहीं।”

“क्या प्रमाण है कि विवाह के पैसे प्रभा होल्डिंग्स में गए?”

वह झुक गया। “नहीं।”

फैसला साफ था—तलाक मंजूर। प्रभा होल्डिंग्स पर कोई दावा नहीं। फ्लैट बिकेगा और हिस्से कानूनी अधिकार से बंटेंगे, मगर नुकसान, चोरी, बदनामी और कानूनी खर्च की कटौती होगी। जॉइंट अकाउंट विभाजित होगा, पर रोहन की रकम से गहनों, दस्तावेजों और मानहानि का भुगतान रोका जाएगा। उसे सार्वजनिक माफी भी लिखनी होगी।

सावित्री रोने लगीं। “और मैं? मुझे कहाँ भेजोगे?”

आरती पीछे नहीं मुड़ी। जिस दिन उसकी टांग खुली थी, उसी औरत ने उसे रसोई में लौटने को कहा था। अब उसे अपनी दूसरी चौखट ढूंढनी थी।

मगर रोहन ने हारना अभी खत्म नहीं किया था।

1 हफ्ते बाद उसने कार बेचने की कोशिश की, फर्जी 8000000 रुपये की देनदारी दिखाकर करण के नाम कागज बनाने लगा। गाड़ी पर पहले से कानूनी अलर्ट था। साइन होने से पहले अधिकारी पहुँच गए।

नंदिता ने कागज देखा। “तारीख बदली हुई, भुगतान नहीं, हस्ताक्षर संदिग्ध। यह कर्ज नहीं, सबूत है।”

उस रात रोहन ने आरती को कॉल किया।

“तुम मुझसे और क्या छीनना चाहती हो?”

“कुछ नहीं। बस जो देना है, वह लौटाओ।”

“माँ को फ्लैट में रहने दे सकती हो।”

“मैं अपने अधिकारों से शांति नहीं खरीदती।”

“तुम सच में हर रुपया गिनोगी?”

“हाँ। हर रुपया, जिसे तुम अपना समझकर चुराना चाहते थे।”

फ्लैट की जांच वाले दिन सावित्री देवी व्हीलचेयर पर आईं। सब जानते थे कि वह ठीक चलती हैं। अधिकारी आते ही उन्होंने माथा पकड़ लिया।

“मुझे सताया जा रहा है। मैं बीमार बूढ़ी औरत हूँ।”

नंदिता ने मेडिकल प्रमाणपत्र दिखाया। “कोई अक्षमता दर्ज नहीं।”

सावित्री ने गिलास उठाकर आरती की ओर फेंका। मीरा ने आरती को खींच लिया। गिलास फर्श पर टूट गया। पुलिसकर्मी ने कोशिश-ए-हमला नोट कर ली।

रोहन ने माँ का हाथ पकड़ा। “माँ, बस करो।”

सावित्री ने उसे इतना जोरदार थप्पड़ मारा कि कमरा कांप गया।

“अगर तूने इस औरत से शादी न की होती तो हम यहाँ न होते!”

रोहन स्थिर खड़ा रह गया। पहली बार उसने सचमुच देखा कि उसने अपनी शादी के बीच कौन सा हथियार खड़ा रखा था—अपनी माँ।

फ्लैट बिक गया। रोहन ने आखिरी दिनों में चाबियां छुपाईं, बल्ब निकाले, महंगे पर्दे उतारे, यहाँ तक कि दरवाजे के हैंडल ले जाने की कोशिश की। सब दर्ज हुआ, सब उसकी हिस्सेदारी से काटा गया।

आखिरी दिन आरती एक पुराना मोदक का साँचा लेने आई, जो किचन के ऊपरी शेल्फ में छूट गया था। शादी से पहले उसने रोहन से कहा था कि वह ऐसी मिठाई की दुकान खोलना चाहती है जहाँ बच्चे शीशे से चिपककर जलेबी और लड्डू देखें।

रोहन ने हंसकर कहा था, “मिठाई की दुकान? मुझे ऐसी पत्नी चाहिए जो अच्छी इमेज दे।”

उसे साथी नहीं चाहिए था। उसे सजावट चाहिए थी।

खाली ड्राइंग रूम में रोहन अकेला खड़ा था।

“अगर उस दिन मैं पूछ लेता कि तुम्हें दर्द हो रहा है… तो कुछ बदलता?”

आरती ने साँचा सीने से लगाया।

“सही सवाल इतना देर से मत पूछो कि क्रूरता भी अभिनय लगे।”

“कुछ नहीं बचा?”

“मेरा आखिरी प्यार यही था कि मैंने तुम्हें पहले नहीं छोड़ा। अब जो देना है दो, और मुझे मत ढूंढना।”

वह बिना मुड़े चली गई।

6 महीने बाद मेहरा सप्लाई चेन पर धोखाधड़ी का केस चला। करण के कॉन्ट्रैक्ट खत्म हुए। रोहन को नागरिक हर्जाना भरना पड़ा। सावित्री देवी एक छोटे 2 कमरे के किराए के घर में रहने लगीं, बिना लिफ्ट, बिना मुफ्त बहू, बिना उस काल्पनिक व्हीलचेयर के सिंहासन के।

रोहन की सार्वजनिक माफी छोटी थी, क्योंकि नंदिता ने बहानों से भरे 3 ड्राफ्ट लौटा दिए थे।

“मैं, रोहन मेहरा, स्वीकार करता हूँ कि मैंने आरती शर्मा के बारे में झूठी बातें फैलाईं। मैंने उन्हें गंभीर चोट के इलाज के दौरान अस्पताल छोड़कर घर आने को कहा। मैंने उनकी प्रतिष्ठा, सुरक्षा और गरिमा को नुकसान पहुँचाया। मैं सार्वजनिक रूप से माफी मांगता हूँ और आगे उन्हें परेशान या बदनाम न करने का वचन देता हूँ।”

सावित्री ने नकली अकाउंट से आरती को अत्याचारी लिखा। 10 मिनट बाद कानूनी नोटिस गया। कमेंट गायब हो गया।

उसी दिन आरती ने चांदनी चौक के पास अपनी नई बड़ी मिठाई की दुकान खोली। सफेद रोशनी, पीतल की घंटी, काँच की लंबी अलमारी और दरवाजे पर पूरा नाम—आरती शर्मा। किसी पति के पीछे छुपा नहीं। किसी मजाक में छोटा नहीं किया गया। बस उसका नाम, गरम देसी घी की खुशबू के ऊपर चमकता हुआ।

शाम को रोहन बाहर दिखा—दुबला, दाढ़ी बढ़ी हुई, शर्ट सिकुड़ी।

“मैं बस 1 किलो पेड़ा लेना चाहता था,” उसने कहा।

आरती काँच के दरवाजे के पीछे खड़ी रही।

“यह दुकान उन लोगों को सेवा नहीं देती जिन पर संपर्क न करने का आदेश है।”

“मैंने माफी लिख दी।”

“माफी कर्ज चुकाती है। बंद दरवाजा नहीं खोलती।”

उसने बोर्ड देखा। “तुमने सच में कर दिखाया।”

“हाँ।”

“मैं कहता था एक दिन मदद करूंगा।”

“तुम बहुत कुछ कहते थे। किसी की कीमत नहीं थी।”

वह सिर झुकाकर बोला, “मुझे पछतावा है।”

“तुम्हारा पछतावा तुम्हारा है। मेरी शांति मेरी।”

आरती अंदर गई और चाबी घुमा दी।

रात को पहली खेप में गरम जलेबियाँ निकलीं। आरती ने 1 प्लेट मीरा को दी। मीरा मुस्कुराई।

“होल्डिंग कंपनी की मालकिन और हलवाई भी। लोग बातें करेंगे।”

आरती ने जवाब दिया, “औरत के हाथ में चाशनी हो सकती है और साम्राज्य की चाबी भी।”

उसने पुराना साँचा शेल्फ पर रख दिया, जैसे कोई शांत ट्रॉफी। अब कोई फोन नहीं था जो खाना माँगे। कोई सास नहीं थी जो बीमारी को हथियार बनाए। कोई पति नहीं था जो परिवार शब्द को जंजीर बना दे।

उस दिन के बाद आरती ने फोन तभी उठाया जब उसका मन हुआ। दरवाजे वही खोले जिनकी चाबी उसके पास थी। वह पहले से थोड़ा धीमे चलती थी, यह सच था, मगर हर कदम उसका अपना था।

जब कोई उससे पूछता कि गलत शादी छोड़ने में औरत क्या खोती है, तो वह कहती—झूठा घर, खड़े-खड़े खाए गए खाने, फर्ज के नाम पर मिले अपमान, और वह आदमी जो खुद को उसकी जिंदगी का मालिक समझता था।

फिर वह खुद को वापस पा लेती है।

और अगर कोई पूछता कि इसकी कीमत क्या थी, तो आरती अपनी टांग के निशान को छूकर मुस्कुरा देती।

1 फ्रैक्चर ने उसे पूरा रास्ता दिखा दिया था।

उसके बाद कोई उसे कभी पीछे नहीं लौटा पाया।

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