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उस माँ ने 5 साल बाद बेटी को घर में नहीं, सीढ़ियों के नीचे चेन से बंधा पाया—“वह कहीं होगी” कहने वाले पिता की चुप्पी ने पूरे परिवार का सबसे गंदा राज खोल दिया

PART 1

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जब अनन्या ने 5 साल बाद अपने ही घर के पीछे बने बंद स्टोररूम में अपनी 7 साल की बेटी को जंग लगी चेन से बंधा देखा, तो उसकी चीख इतनी भयानक थी कि लखनऊ की उस शांत गली के कुत्ते भी भौंकना भूल गए।

अनन्या त्रिपाठी उस सुबह दिल्ली से लखनऊ उतरी थी। हाथ में 2 सूटकेस थे, कंधे पर एक बैग था जिसमें रंग-बिरंगी फ्रॉक, गुड़िया, कहानी की किताबें और एक गुलाबी टेडी रखा था। पूरे रास्ते ट्रेन में वह एक ही दृश्य सोचती रही थी—उसकी बेटी मीरा दरवाजा खोलेगी, दौड़कर उसकी कमर से लिपट जाएगी और कहेगी, “मम्मा, आप सच में आ गईं?”

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लेकिन गोमतीनगर की उस बड़ी कोठी के बाहर अजीब सन्नाटा था।

लोहे का गेट आधा खुला था। बरामदे में सूखे पत्ते पड़े थे। तुलसी के गमले में मिट्टी फटी हुई थी। दरवाजे पर अखबारों का ढेर जमा था। अनन्या ने घंटी बजाई, फिर दरवाजा पीटा।

“अम्मा जी! बाबूजी! मीरा!”

कोई जवाब नहीं आया।

उसने अपने पूर्व पति राघव को फोन किया। 4 बार कॉल कटने के बाद उसने उठाया।

“मेरे मम्मी-पापा बाहर गए होंगे,” वह चिढ़कर बोला।

“मीरा कहाँ है?”

“मुझे क्या पता? किसी पड़ोसन के यहाँ होगी।”

“किस पड़ोसन के यहाँ?”

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राघव ने लंबी सांस छोड़ी।

“तुम 5 साल बाद आई हो और 5 मिनट में माँ बनने लगीं? ड्रामा बंद करो, अनन्या। लड़की कहीं होगी।”

यह वाक्य उसके कानों में हथौड़े की तरह लगा।

उसी समय सामने वाली बुजुर्ग पड़ोसन, शकुंतला आंटी, अपने गेट के पास आईं। उनके चेहरे पर डर था।

“बिटिया,” उन्होंने फुसफुसाकर कहा, “तुम मीरा की माँ हो न?”

अनन्या दौड़कर उनके पास गई।

“हाँ। आंटी, मेरी बेटी कहाँ है?”

शकुंतला आंटी की आँखें भर आईं।

“वो बच्ची बीमार नहीं है, जैसा तुम्हारी सास कहती थी। उसे बंद रखा गया है।”

अनन्या को लगा जैसे जमीन हिल गई।

“क्या कह रही हैं आप?”

“कई महीनों से उसकी रोने की आवाज आती थी। पहले लगा घर का मामला है। फिर तुम्हारी सास कहती थी कि बच्ची पागलपन के दौरे करती है, किसी से मिलना ठीक नहीं। लेकिन 3 दिन से घर से बदबू आ रही है। और परसों सुबह मैंने तुम्हारे सास-ससुर को 2 बड़े सूटकेस लेकर टैक्सी में जाते देखा।”

अनन्या का गला सूख गया।

वह बिना कुछ बोले कोठी के पीछे की ओर भागी। पिछला दरवाजा ठीक से बंद नहीं था। उसने धक्का दिया। अंदर घुसते ही बदबू ने उसे रोक दिया—बासी खाना, सीलन, गंदगी और बंद पड़े अकेलेपन की बदबू।

रसोई में सिंक भरा हुआ था। प्लेटों पर फफूंदी लगी थी। फ्रिज पर चुंबक के नीचे एक पर्ची चिपकी थी—“दक्षिण भारत यात्रा, 12 दिन। टिकट और पहचान पत्र याद रखना।”

अनन्या की आँखें पर्ची पर जम गईं।

तभी नीचे से बहुत हल्की आवाज आई।

जैसे कोई सांस लेने की कोशिश कर रहा हो।

सीढ़ियों के नीचे लकड़ी का एक छोटा दरवाजा था, जिस पर पुराना ताला लटका था। ताला पूरी तरह बंद नहीं था। अनन्या ने काँपते हाथों से उसे खींचा। दरवाजा खुलते ही अंधेरा, बदबू और डर एक साथ बाहर आए।

नीचे फर्श पर एक पतला गद्दा था। पास में खाली बोतलें, टूटी कटोरी और सूखी रोटी के टुकड़े पड़े थे।

और दीवार के पास, एक लोहे के पाइप से पैर में चेन बांधे, एक बच्ची बैठी थी।

मीरा।

उसका चेहरा धंसा हुआ था। बाल उलझे थे। कलाई पर नीले निशान थे। पैर की हड्डियाँ ऐसे दिख रही थीं जैसे शरीर ने बचपन छोड़कर सिर्फ जिंदा रहना सीख लिया हो।

अनन्या घुटनों के बल गिर पड़ी।

“मीरा… मेरी बच्ची… मैं हूँ, मम्मा…”

मीरा ने धीरे से पलकें उठाईं।

न वह मुस्कुराई, न हाथ बढ़ाया।

सिर्फ टूटी आवाज में बोली—

“मैंने आवाज नहीं की… दादी नाराज नहीं होंगी न?”

अनन्या की चीख पूरे घर में गूंज गई।

PART 2

अस्पताल की सफेद रोशनी में मीरा और भी छोटी लग रही थी। डॉक्टर ने अनन्या को बताया कि बच्ची का वजन सिर्फ 16 किलो था, शरीर में पानी की भारी कमी थी, पुरानी टूटी हड्डी गलत तरह से जुड़ चुकी थी और डर ने उसके दिमाग को चुप रहना सिखा दिया था।

अनन्या की बहन निधि, जो दिल्ली में वकील थी, उसी रात लखनऊ पहुँची। उसने अस्पताल की कुर्सी पर लैपटॉप खोला और कहा, “अब कोई कहानी नहीं चलेगी। सिर्फ सबूत बोलेंगे।”

5 साल तक अनन्या ने हर महीने 75000 रुपये अपनी सास सरला और ससुर महेश को भेजे थे। हर भुगतान पर लिखा था—“मीरा की पढ़ाई और देखभाल के लिए।” वीडियो कॉल में सरला मीरा को गोद में दिखाती, फिर कहती—“बच्ची थकी है, बाद में बात करेगी।”

पुलिस ने कोठी की तलाशी ली। मीरा का कमरा सजाया हुआ था, लेकिन नकली। किताबें नई थीं, कपड़ों पर टैग लगे थे, खिलौनों पर धूल नहीं थी।

फिर सरला के फोन में संदेश मिला—

“लड़की संभलती नहीं, पर अनन्या पैसे अच्छे भेजती है। जब तक पैसे आएँ, काम चलाओ।”

और सबसे बड़ा झटका तब लगा जब पास की दुकान के कैमरे में राघव उसी घर में कई बार जाता दिखा।

वह जानता था।

PART 3

राघव तीसरे दिन अस्पताल आया। उसकी कमीज मुड़ी हुई थी, चेहरे पर चिंता से ज्यादा चिढ़ थी। उसने कमरे में झांककर मीरा को नहीं देखा। पहले उसने अनन्या से पूछा, “तुमने पुलिस को क्या-क्या बताया?”

अनन्या ने उसे ऐसे देखा जैसे पहली बार समझ रही हो कि उसके सामने खड़ा आदमी पिता नहीं, एक लंबा झूठ था।

“तुम्हारी बेटी चेन से बंधी मिली है।”

राघव ने आँखें चुरा लीं।

“मुझे नहीं पता था।”

निधि ने ठंडे स्वर में कहा, “तुम्हें पता नहीं था, या तुम जानना नहीं चाहते थे?”

राघव तुनक गया।

“देखो, मेरी माँ बूढ़ी हैं। बच्ची बचपन से जिद्दी थी। अनन्या भी तो उसे छोड़कर चली गई थी। सारी गलती मेरे घरवालों पर मत डालो।”

थप्पड़ की आवाज गलियारे में गूंजी।

अनन्या का हाथ काँप रहा था, पर उसकी आँखें नहीं।

“मीरा के लिए एक शब्द और कहा, तो मैं अदालत में तुम्हें खुद कटघरे तक घसीटूंगी।”

राघव पीछे हट गया। पहली बार उसकी आवाज धीमी पड़ी।

“तुम पछताओगी।”

अनन्या ने दरवाजे के पार अपनी बच्ची को देखा। मीरा बिस्तर पर लेटी छत देख रही थी, जैसे किसी भी आवाज से फिर कोई ताला बंद हो सकता हो।

“मैं पहले ही बहुत पछता चुकी हूँ,” अनन्या बोली। “अब सिर्फ लड़ूंगी।”

सरला और महेश को चेन्नई हवाई अड्डे पर गिरफ्तार किया गया। वे यात्रा से लौट रहे थे। हाथ में मिठाई के डिब्बे और बैग में महंगे रेशमी कपड़े थे। जब पुलिस ने उन्हें रोका, सरला ने पूछा भी नहीं कि मीरा जिंदा है या नहीं।

उसने सिर्फ कहा, “गलतफहमी है।”

यह शब्द अनन्या के भीतर आग बन गया।

गलतफहमी वह होती है जब कोई पूजा का समय भूल जाए। गलतफहमी वह होती है जब किसी का फोन न उठे। एक बच्ची को सीढ़ियों के नीचे बंद करके पैसे से यात्रा, गहने और रेस्टोरेंट चलाना गलतफहमी नहीं था। यह सोच-समझकर किया गया अपराध था।

मीरा 27 दिन अस्पताल में रही। पहले उसे धीरे-धीरे खाना दिया गया, क्योंकि भूखे शरीर को अचानक भोजन भी चोट पहुँचा सकता था। हर बार नर्स कमरे का दरवाजा बंद करती, मीरा की सांस तेज हो जाती। वह चिल्लाती नहीं थी। बस जम जाती थी।

एक रात दरवाजा हल्के से बंद हुआ और मीरा की आँखें फैल गईं। अनन्या तुरंत उठी।

“दरवाजा खुला रहेगा,” उसने कहा।

उस रात के बाद पूरे वार्ड को पता था—मीरा का दरवाजा कभी बंद नहीं होगा।

निधि रोज अस्पताल आती। उसके हाथ में फाइलें, बैंक स्टेटमेंट, पुराने संदेश और फोटो होते। उसने एक अनुभवी वकील, अधिवक्ता फरहीन सिद्दीकी, को केस दिया। फरहीन शांत आवाज में बोलीं, “वे तुम्हारी माँ होने पर सवाल उठाएँगे। वे कहेंगे तुम विदेश गई थीं। लेकिन अदालत भावनाओं से नहीं, सबूतों से टूटती है।”

और सबूत बेरहम थे।

अनन्या 5 साल पहले दुबई गई थी। कोई सपना पूरा करने के लिए नहीं, बल्कि मजबूरी में। राघव ने व्यापार में घाटा किया था, घर में रोज झगड़े होते थे। मीरा तब 2 साल की थी। सरला ने रोते हुए कहा था, “बहू, तू जा। यहाँ मीरा हमारी जान है। तेरी कमाई से बच्ची की पढ़ाई भी चलेगी और घर भी संभलेगा। हम उसे पलकों पर रखेंगे।”

अनन्या ने विश्वास किया। यही उसकी गलती थी।

पहले साल वीडियो कॉल मीठे थे। मीरा माथे पर छोटी बिंदी लगाकर स्क्रीन पर आती। कहती, “मम्मा, देखो मेरी गुड़िया।” अनन्या कॉल कटने के बाद दुबई के छोटे कमरे में रोती और खुद को समझाती—दूरी भी माँ का त्याग हो सकती है।

फिर कॉल छोटे होने लगे। सरला कहती, “आज मीरा सो रही है।” “आज उसका मूड खराब है।” “आज डॉक्टर ने कहा ज्यादा बात मत कराओ।” तस्वीरें धुंधली आने लगीं। मीरा अक्सर दूर बैठी दिखती, बड़े स्वेटर में, आधा चेहरा छिपा हुआ।

निधि ने कई बार कहा था, “दीदी, कुछ ठीक नहीं है। मुझे जाकर देखना चाहिए।”

लेकिन हर बार सरला तुरंत कॉल कर देती। स्क्रीन पर मीरा 5 सेकंड दिखती, धीमे से हाथ हिलाती, और अनन्या अपने डर को फिर निगल जाती।

अब उसे समझ आया—वह माँ बनकर भरोसा कर रही थी, और वे भरोसे को निचोड़कर पैसा बना रहे थे।

पुलिस को सरला की अलमारी से एक लाल रजिस्टर मिला। उसमें हिसाब लिखा था—“अनन्या से 75000।” “मीरा खर्च 1200।” “महेश दवा 5000।” “राघव बाइक 18000।” “यात्रा 42000।” एक कोने में लिखा था—“कॉल से पहले लड़की को ऊपर मत लाना।”

अनन्या ने वह पन्ना देखा तो उसकी उंगलियाँ बर्फ हो गईं।

उसकी ममता का हिसाब लगाया गया था।

जब खबर फैली, मीडिया अस्पताल के बाहर जुट गया। कुछ लोगों ने अनन्या को दोषी कहा। सोशल मीडिया पर लिखा गया—“सच्ची माँ 5 साल बच्ची से दूर नहीं रहती।” “पैसे भेजना माँ होना नहीं होता।”

ये बातें उसे इसलिए ज्यादा लगीं क्योंकि वह खुद भी यही सोचती थी। एक रात वह अस्पताल के बाथरूम के फर्श पर बैठी रो रही थी। निधि ने उसे वहीं पाया।

“मत कहो कि मेरी गलती नहीं थी,” अनन्या ने टूटकर कहा। “मैंने उसे छोड़ा। मैंने तस्वीरों पर भरोसा किया। मैंने पैसे भेजे और उसे प्यार समझती रही।”

निधि ने उसका चेहरा पकड़कर कहा, “तुमने भरोसे की गलती की। उन्होंने अपराध किया। अपनी गलती को उनकी ढाल मत बनने दो।”

अदालत में मामला तेज चला, क्योंकि बच्ची की हालत ने पूरे शहर को हिला दिया था। मीरा को अदालत नहीं लाया गया। उसकी बात बाल मनोवैज्ञानिक और मजिस्ट्रेट के सामने दर्ज की गई। वह छोटे-छोटे शब्दों में बोलती थी—

“नीचे अंधेरा।”

“दादी कहती थीं चुप।”

“पापा आए थे।”

“पापा नीचे नहीं आए।”

हर वाक्य अदालत की दीवारों पर हथौड़े की तरह पड़ा।

सरला अदालत में सफेद साड़ी पहनकर आई, माथे पर बड़ी बिंदी, हाथ में माला। उसके वकील ने कहा कि वह बूढ़ी महिला है, थक गई थी, बच्ची मानसिक रूप से कठिन थी, माँ ने छोड़ दिया था।

फिर सरकारी वकील ने फोन के संदेश पढ़े। बैंक खाते दिखाए। नकली कमरे की तस्वीरें दिखाईं। सीढ़ियों के नीचे की चेन दिखाई। यात्रा की पर्ची दिखाई।

जब संदेश पढ़ा गया—“लड़की संभलती नहीं, पर अनन्या पैसे अच्छे भेजती है”—सरला ने सिर झुका लिया।

वह मीरा के लिए नहीं रोई।

वह सजा के डर से रोई।

राघव कटघरे में आया तो उसने वही पुरानी कहानी दोहराई—काम का दबाव, माता-पिता पर भरोसा, अनन्या से तलाक का तनाव।

फिर दुकान के कैमरे की रिकॉर्डिंग चलाई गई। राघव 2 साल में कई बार उस घर में घुसता दिखा। एक फुटेज में वह खाना लेकर अंदर गया और 19 मिनट बाद खाली हाथ बाहर निकला।

सरकारी वकील ने पूछा, “आपकी बेटी उसी घर में थी। आपने उसे देखा नहीं?”

“माँ कहती थीं वह सो रही है।”

“हर बार?”

राघव चुप हो गया।

तभी एक ऑडियो चलाया गया, जो सरला ने गलती से अपनी बहन को भेज दिया था।

“राघव को पता है कि लड़की नीचे है। वो कहता है मुझे झंझट में मत डालो। अनन्या पैसे भेज रही है, तो चलने दो।”

अदालत में ऐसी खामोशी छा गई कि पंखे की आवाज भी भारी लगने लगी।

अनन्या ने राघव की तरफ नहीं देखा। उसे डर था कि कहीं उसे वह आदमी याद न आ जाए जिसने कभी अस्पताल में नवजात मीरा को गोद में लेकर कहा था, “इसकी आँखें तुम्हारी जैसी हैं।”

अब वही आदमी अपनी बेटी के डर के ऊपर से गुजरकर बाहर निकलता रहा था।

निर्णय एक बरसाती मंगलवार को आया।

सरला को नाबालिग पर क्रूरता, कैद, इलाज से वंचित रखने और धोखाधड़ी के लिए 15 साल की सजा मिली। महेश को सहयोग, हिंसा और चुप्पी के अपराध के लिए 10 साल। राघव को पिता की जिम्मेदारी से भागने, अपराध छिपाने और मदद न करने के लिए 6 साल की सजा मिली। उसका अभिभावक अधिकार हमेशा के लिए समाप्त कर दिया गया।

अनन्या को मीरा की पूर्ण अभिरक्षा मिली।

वह जीतना चाहती थी, पर जीत जैसा कुछ महसूस नहीं हुआ। सिर्फ एक भारी राहत थी और उसके नीचे अनगिनत टूटे हुए जन्मदिन, स्कूल के पहले दिन, डर से भरी रातें और वह आवाज, जो एक बच्ची ने कभी लगाई ही नहीं क्योंकि उसे सिखा दिया गया था कि कोई आएगा नहीं।

अदालत के बाहर पत्रकार ने माइक आगे किया।

“आप अपनी पूर्व सास से क्या कहना चाहेंगी?”

अनन्या के भीतर बहुत शब्द थे। गुस्सा, अपमान, श्राप।

लेकिन उसने सिर्फ इतना कहा—

“मीरा अब कभी बड़ों की चुप्पी में कैद नहीं रहेगी।”

फिर वह चली गई।

नई जिंदगी किसी फिल्म की तरह सुंदर नहीं थी। वह धीमी, थकाने वाली और कई बार बेहद दर्दनाक थी। अनन्या ने लखनऊ में ही एक छोटा सा फ्लैट लिया। खिड़की से अमलतास का पेड़ दिखता था। निधि ने मीरा के कमरे की दीवार हल्के पीले रंग से रंगवाई। कमरे में चाँद जैसी लाइट, सफेद पर्दे, छोटी अलमारी और नीचे रखी किताबें थीं।

पहली रात मीरा कमरे में गई, बिस्तर को देखा और फर्श पर लेट गई।

अनन्या का मन हुआ कि उसे उठाकर बिस्तर पर सुला दे, लेकिन डॉक्टर ने कहा था—“जिस बच्ची से हर चुनाव छीन लिया गया हो, उसे छोटे फैसले वापस दो।”

इसलिए अनन्या ने चुपचाप एक चादर ली और मीरा से 1 मीटर दूर फर्श पर लेट गई। उसने धीमे स्वर में कहानी पढ़नी शुरू की।

मीरा ने कोई जवाब नहीं दिया।

अगले दिन भी यही हुआ।

फिर कई हफ्तों तक दरवाजे खुले रहे, रात की लाइट जलती रही, रसोई में खाना दिखता रहा। अनन्या हर काम बोलकर करती।

“मीरा, मैं अंदर आ रही हूँ।”

“मीरा, मैं प्लेट यहाँ रख रही हूँ।”

“मीरा, मैं खिड़की बंद कर रही हूँ, दरवाजा नहीं।”

मीरा तकिए के नीचे रोटी छिपाती थी। कभी अपनी जेब में केला रख लेती। रात में 3 बार पूछती—

“दरवाजा खुला है?”

अनन्या हर बार कहती—

“हाँ, मेरी जान। खुला है।”

धीरे-धीरे मीरा ने रंगों को छूना शुरू किया। पहले काला, फिर भूरा, फिर पीला। वह घर बनाती, लेकिन हर घर में दरवाजा खुला होता। अनन्या उन चित्रों को फ्रिज पर चिपका देती, जैसे वे जीत के छोटे झंडे हों।

6 महीने बाद एक दोपहर, जब बाहर हल्की धूप थी और अनन्या कपड़े तह कर रही थी, मीरा ने अचानक कहा—

“मम्मा।”

अनन्या के हाथ से कपड़ा गिर गया।

वह दौड़ी नहीं। उसने खुशी को भी धीरे चलना सिखा लिया था।

“हाँ, बेटा। मैं यहीं हूँ।”

मीरा ने कागज पर पेंसिल घुमाते हुए पूछा—

“हम एक कुत्ता ला सकते हैं?”

अनन्या की आँखें भर आईं। इतने लंबे मौन के बाद उसकी बेटी ने न्याय नहीं मांगा, जवाब नहीं मांगा, सिर्फ एक ऐसा जीव मांगा जो उसके पास रहे।

“हाँ,” वह बोली, “हम ला सकते हैं।”

वे एक पशु आश्रय गृह गईं। कई कुत्ते भौंके, उछले, पूँछ हिलाई। मीरा चुपचाप चलती रही। सबसे आखिरी पिंजरे में एक छोटी शहद रंग की कुतिया शांत बैठी थी। वह न भौंकी, न कूदी। बस मीरा को देखती रही, जैसे समझती हो कि कुछ दुखों के पास धीरे जाना पड़ता है।

“यही,” मीरा ने फुसफुसाया।

उसका नाम पहले चंपा था, लेकिन मीरा ने उसे “मिश्री” कहा।

मिश्री ने वह समझ लिया जो कई इंसान नहीं समझ पाए थे। वह मीरा पर नहीं कूदती थी। चेहरा नहीं चाटती थी। बस थोड़ी दूरी पर बैठती, इंतजार करती। पहली रात वह बिस्तर के पास लेट गई। मीरा ने उसे बहुत देर देखा, फिर पहली बार बिस्तर पर चढ़ी और अपना हाथ मिश्री की गर्म पीठ पर रखकर सो गई।

अनन्या दरवाजे पर खड़ी रोती रही।

एक छोटे से जीव ने 7 दिन में वह कर दिया था जो बड़े लोग महीनों से सीख रहे थे—मीरा को यह भरोसा देना कि कोई पास रहकर भी चोट नहीं पहुँचाता।

सालों ने सब कुछ ठीक नहीं किया। मीरा अब भी चाबी की आवाज से चौंक जाती। बंद दरवाजे उसे पसंद नहीं थे। तेज आवाज से उसका चेहरा सफेद पड़ जाता। लेकिन वह बढ़ी। धीरे-धीरे। खुले दरवाजों, थेरेपी, स्कूल की नई कॉपी, पार्क की शामों, निधि मौसी के घर के खाने और मिश्री के साथ लंबी सैरों के बीच।

एक दिन अनन्या को खाने की मेज पर एक चित्र मिला। उसमें 4 आकृतियाँ थीं—एक बच्ची, एक माँ, घुँघराले बालों वाली मौसी और शहद रंग की कुतिया। ऊपर टेढ़े अक्षरों में लिखा था—

“मेरा घर।”

अनन्या उस कागज को बहुत देर तक देखती रही।

वह जानती थी कि उसके भीतर पछतावा हमेशा रहेगा। लेकिन उसने यह भी सीख लिया था कि पछतावा सच नहीं होता। सच यह था कि कुछ बड़ों ने पैसा, झूठ और आराम को एक बच्ची से बड़ा समझा। सच यह भी था कि वह वापस आई। उसने दरवाजा खोला। वह नीचे उतरी। उसने मीरा को पाया।

एक सर्द शाम बारिश खिड़की पर फिसल रही थी। कमरे में दाल की खुशबू थी। मिश्री सोफे के पास सो रही थी। मीरा अब 8 साल की थी। वह धीरे से आकर अनन्या के पास बैठी और उसका हाथ पकड़ लिया।

“आप फिर जाओगी?”

अनन्या झुककर उसकी आँखों के बराबर आई।

“नहीं। अब कभी नहीं।”

मीरा ने उसे लंबे समय तक देखा, जैसे हर शब्द में छिपा ताला ढूँढ रही हो।

फिर उसने अपना सिर माँ की बांह पर रख दिया।

और उस शांत कमरे में, खुले दरवाजे के बीच, अनन्या ने पहली बार महसूस किया कि उसकी बेटी ने उसे सच में मान लिया है।

Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.