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302 यात्रियों की जान बचाने वाली महिला ने जैसे ही बेहोश सह-पायलट का नाम पढ़ा, उसके पैरों तले ज़मीन खिसक गई… वह उसके अतीत का सबसे बड़ा ज़ख्म था!

भाग 1

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विमान 801 में 302 यात्री बैठे थे, और कॉकपिट से अचानक यह आवाज आई कि दोनों पायलट बेहोश हो चुके हैं।

दिल्ली एयर ट्रैफिक कंट्रोल में बैठे विवेक माथुर का हाथ चाय के गिलास पर ही रुक गया। रेडियो पर एक शांत औरत की आवाज गूंजी, “मैं अदिति राणा बोल रही हूं। मैं यात्री हूं, लेकिन मेरे पास कमर्शियल लाइसेंस और वायुसेना का अनुभव है। मुझे तुरंत रनवे चाहिए।”

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विमान में 90 मिनट पहले सब सामान्य था। सागर एयरवेज की कोच्चि से दिल्ली जाने वाली उड़ान में परिवार, कारोबारी, बच्चे और तीर्थयात्री बैठे थे। सीट 23B पर अदिति राणा चुपचाप बैठी थी। सूती कुर्ता, बड़ा दुपट्टा, साधारण बैग। कोई नहीं जानता था कि वह कभी भारतीय वायुसेना की सबसे तेज पायलटों में गिनी जाती थी।

5 साल पहले एक मिशन में उसके साथी देव मल्होत्रा की मौत हो गई थी। अदिति खुद को आज तक दोष देती थी। उसने उड़ान छोड़ दी थी, आसमान से रिश्ता तोड़ दिया था। उसके बैग में देव की एक पुरानी तस्वीर थी, जिसके पीछे लिखा था, “अभी तो बच निकले। D”

विमान ने उड़ान भरी। सब शांत था। लेकिन 40 मिनट बाद अदिति ने सीट के नीचे एक अजीब कंपन महसूस किया। हवा साफ थी, मौसम सामान्य था, फिर भी विमान जैसे भीतर से लड़खड़ा रहा था। उसने देखा, एयरहोस्टेस नंदिता बार-बार कॉकपिट फोन उठा रही थी, लेकिन कोई जवाब नहीं आ रहा था।

फिर घोषणा हुई, “यदि विमान में कोई लाइसेंसधारी पायलट है, तो तुरंत क्रू से संपर्क करे।”

पूरा केबिन जम गया।

अदिति धीरे से उठी। उसने अपना काला फोल्डर खोला। वरिष्ठ केबिन मैनेजर अर्जुन मेहरा ने उसके कागजात देखे और बिना एक शब्द गंवाए उसे कॉकपिट तक ले गया।

दरवाजा खुलते ही अदिति की आंखें ठिठक गईं। कैप्टन आधे बेहोश थे। युवा को-पायलट पूरी तरह अचेत था। हवा की निगरानी करने वाला सेंसर बंद था।

अदिति ने ऑक्सीजन मास्क लगाया, सिस्टम बदला और कप्तान की सीट पर बैठ गई।

उसके हाथ कंट्रोल पर पड़े।

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5 साल बाद आसमान फिर उसके सामने था।

तभी उसने को-पायलट की नेम प्लेट देखी।

आरव मल्होत्रा।

देव मल्होत्रा का छोटा भाई।

भाग 2

अदिति का दिल एक पल के लिए रुक गया, लेकिन विमान नीचे जा रहा था। भावनाओं के लिए समय नहीं था। उसने रेडियो दबाया, “दिल्ली कंट्रोल, यह सागर एयरवेज 801 है। कॉकपिट क्रू अचेत है। मैं विमान संभाल रही हूं।”

विवेक माथुर की आवाज आई, “रनवे हिंडन एयरबेस पर खाली कराया जा रहा है। आप 31,000 फीट पर हैं। विमान में कितने लोग हैं?”

“302 यात्री। और यह लैंडिंग भारी होगी।”

केबिन में अर्जुन यात्रियों को शांत कर रहा था। एक मां अपने बच्चे को सीने से लगाए रो रही थी। बुजुर्ग दंपति राम नाम जप रहे थे। कुछ लोग वीडियो बना रहे थे, कुछ अपने घर फोन कर आखिरी बात करने की कोशिश कर रहे थे।

इसी बीच जांच टीम ने जानकारी भेजी। विमान का एयर क्वालिटी सेंसर 4 दिन पहले जानबूझकर बंद किया गया था। जिस तकनीशियन ने यह किया था, वह कंपनी से निकाला गया कर्मचारी विक्रम सावंत था। बदले की आग में उसने विमान को निशाना बनाया था, यात्रियों को नहीं।

अदिति ने दांत भींच लिए। “जांच बाद में होगी। पहले सबको जमीन पर उतारना है।”

तभी नई समस्या सामने आई। दाहिना फ्लैप अटक गया। विमान एक तरफ खिंचने लगा। अदिति को पैरों और हाथों से लगातार संतुलन बनाना पड़ रहा था। उसकी पुरानी चोट फिर जलने लगी।

आकाश में 2 वायुसेना के लड़ाकू विमान साथ आ गए। पायलट की आवाज आई, “मैम, क्या आप वही घोस्ट हॉक हैं?”

अदिति ने जवाब नहीं दिया।

पायलट बोला, “देव सर आपकी कहानियां सुनाते थे। उन्होंने कहा था, अगर अदिति राणा कंट्रोल पर हो, तो रनवे खाली कर दो।”

अदिति की आंखें भर आईं।

और तभी सामने हिंडन का रनवे दिखाई दिया।

भाग 3

हिंडन एयरबेस का रनवे धूप में चाकू की धार जैसा चमक रहा था। दोनों ओर फायर ब्रिगेड, एंबुलेंस, सेना के जवान और मेडिकल टीमें खड़ी थीं। जमीन पर सब तैयार थे, लेकिन असली लड़ाई अभी भी आसमान में थी।

अदिति ने गहरी सांस ली। विमान दाहिनी ओर खिंच रहा था। उसका पैर रडर पर पूरी ताकत से दबा हुआ था। हर सेकंड ऐसा लग रहा था जैसे शरीर जवाब दे देगा। लेकिन उसके पीछे 302 लोग थे। उनमें बच्चे थे, बुजुर्ग थे, पति-पत्नी थे, कोई पहली नौकरी के इंटरव्यू पर जा रहा था, कोई बेटे की शादी में, कोई अस्पताल में भर्ती पिता से मिलने।

वह हार नहीं सकती थी।

अर्जुन की आवाज इंटरकॉम पर आई, “सभी यात्री झुक जाएं। सिर नीचे रखें। हाथों से सिर ढकें। जो भी हो, सीट बेल्ट न खोलें।”

केबिन में सन्नाटा फैल गया।

रनवे नजदीक था।

अदिति ने थ्रॉटल कम किया। विमान भारी शरीर के साथ नीचे आया। पहिए जमीन से टकराए। जोरदार झटका लगा। केबिन में चीखें उठीं। विमान दाहिनी तरफ मुड़ा, लेकिन अदिति ने पूरी ताकत से उसे सीधा किया। टायरों से धुआं उठा। ब्रेक कांपे। पूरी मशीन जैसे जमीन से लड़ रही थी।

आखिरकार विमान रनवे के अंत से कुछ ही दूरी पर रुक गया।

कुछ सेकंड कोई आवाज नहीं आई।

फिर एक बच्चा रोया।

फिर किसी ने ताली बजाई।

फिर पूरा विमान तालियों से भर गया।

अदिति ने आंखें बंद कीं। उसके हाथ अब भी कंट्रोल पर थे। उसने धीरे से कहा, “हम जमीन पर हैं।”

दरवाजे खुले। यात्री बाहर निकाले गए। कई लोग घुटनों के बल बैठकर जमीन छू रहे थे। किसी ने माथा टेका। किसी ने फोन पर रोते हुए कहा, “मैं बच गया।”

अदिति चुपचाप कॉकपिट से निकली। तभी अर्जुन उसके पास आया। उसके हाथ में वही पुरानी तस्वीर थी। वह झिझका, फिर बोला, “मैम, मैंने यह आपके बैग से देखी थी। मुझे माफ कीजिए। लेकिन को-पायलट आरव मल्होत्रा… शायद देव मल्होत्रा का भाई है।”

अदिति के भीतर जैसे 5 साल पुराना दरवाजा खुल गया।

वह बेस अस्पताल पहुंची। आरव अब होश में था। कमजोर था, लेकिन उसकी आंखों में पहचान थी।

“कैप्टन राणा,” उसने धीमे से कहा, “भैया आपके बारे में बहुत बात करते थे।”

अदिति कुछ बोल नहीं पाई।

आरव ने अपने बैग से एक पुराना लिफाफा निकाला। “यह उन्होंने आपके लिए छोड़ा था। 5 साल से मेरे पास है।”

अदिति के हाथ कांप गए। लिफाफे पर उसका नाम देव की लिखावट में था।

उसने पत्र खोला।

देव ने लिखा था कि उस दिन मिशन में गलती अदिति की नहीं थी। उसने खुद दिशा बदली थी, ताकि दूसरे विमान को बचा सके। उसने लिखा था, “अगर अदिति खुद को दोष दे रही है, तो उसे बता देना कि मैं उसके कारण नहीं गया। मैं अपने फैसले के कारण गया। और आसमान वह जगह नहीं थी जहां मैं मरा। आसमान वह जगह थी जहां मैं सबसे ज्यादा जिंदा था।”

अदिति की आंखों से आंसू गिर पड़े।

5 साल से जिस अपराधबोध ने उसे अंदर से तोड़ रखा था, वह पहली बार हल्का हुआ।

आरव ने कहा, “भैया कहते थे, आपके साथ उड़ान में गिनती हमेशा पूरी लौटती थी।”

अदिति ने उसकी तरफ देखा। आज भी गिनती पूरी लौटी थी।

302 यात्री।

2 पायलट।

1 औरत, जो खुद को खत्म समझ चुकी थी।

उस शाम जब मीडिया कैमरे लेकर बाहर खड़ी थी, अदिति ने कोई बड़ा बयान नहीं दिया। उसने बस इतना कहा, “विमान क्रू ने साहस दिखाया। यात्रियों ने भरोसा किया। और आसमान ने आज सबको वापस दे दिया।”

कुछ दिन बाद वह अपने पुराने शहर लौटी। घर की अलमारी में रखी वायुसेना की जैकेट उसने 5 साल बाद बाहर निकाली। जेब में देव की तस्वीर रखी। फिर पुराने उड़ान प्रशिक्षक को फोन किया।

“सर,” अदिति ने कहा, “क्या वह छोटा विमान अब भी उड़ता है?”

उधर से हंसी आई, “तुम आओ, रनवे खाली है।”

अदिति ने खिड़की से आसमान देखा।

इस बार आसमान उसे सजा नहीं लग रहा था।

इस बार वह घर जैसा लग रहा था।

Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.