
PART 1
काव्या हर रात बाथरूम के फर्श पर बैठकर पढ़ाई करती थी, और पूरे घर में कोई भी शांता देवी को यह बताने की हिम्मत नहीं कर रहा था कि 12 साल की बच्ची अपनी कॉपी वहाँ क्यों खोलती है।
लखनऊ के हजरतगंज की पुरानी कोठी में शांता देवी अकेली रहती थीं। पति को गुज़रे 6 साल हो चुके थे। बेटा अरविंद नोएडा में नौकरी करता था, बहू मीरा एक विशेष बच्चों के केंद्र में काउंसलर थी, और पोती काव्या बोर्डिंग जैसे महंगे स्कूल में पढ़ती थी। शांता देवी को हमेशा शिकायत रहती थी कि बेटा अब माँ को भूल गया है।
फिर 3 महीने पहले अरविंद अचानक सामान से भरी गाड़ी लेकर आया।
—माँ, नोएडा वाले फ्लैट में मरम्मत चल रही है। कुछ हफ्ते आपके पास रहना होगा।
शांता देवी का सूना आँगन जैसे फिर से साँस लेने लगा। रसोई में फिर से पराठों की खुशबू उठी, तुलसी के पास फिर से बच्चों की चप्पलों की आवाज़ आई। उन्हें लगा, भगवान ने बुढ़ापे में परिवार लौटा दिया।
लेकिन पहली ही हफ्ते कुछ अजीब लगा।
रात के 10 बजे, जब घर में सब सोने की तैयारी कर रहे थे, शांता देवी ने गलियारे के बाथरूम से पेंसिल की खरखराहट सुनी। उन्होंने दरवाज़ा खटखटाया।
—काव्या, अंदर है क्या?
अंदर से घबराई हुई आवाज़ आई।
—हाँ दादी।
दरवाज़ा खुला तो शांता देवी का दिल बैठ गया। काव्या टॉयलेट सीट के ढक्कन पर आधी टेढ़ी बैठी थी। कॉपी घुटनों पर रखी थी। हल्की पीली रोशनी में वह गणित के सवाल हल कर रही थी।
—बिटिया, ये क्या तरीका है? इतनी बड़ी डाइनिंग टेबल पड़ी है, अपना कमरा है, फिर बाथरूम में क्यों?
काव्या ने नज़र झुका ली।
—मुझे यहीं ठीक लगता है।
—ठीक? यहाँ बदबू है, कम रोशनी है, पीठ दुख जाएगी।
—अब आदत हो गई है, दादी।
“आदत हो गई है”—यह शब्द शांता देवी के कानों में काँटे की तरह चुभ गए।
उसी रात खाने की मेज़ पर उन्होंने अरविंद से पूछा।
—तेरी बेटी बाथरूम में पढ़ती है। तू देखता नहीं?
अरविंद ने पानी का गिलास उठाया, पर आँखें नहीं उठाईं।
—माँ, उसे शांति चाहिए। आजकल बच्चे ऐसे ही होते हैं।
मीरा उस समय रसोई में खड़ी थी। उसके हाथ से चम्मच हल्का काँपा, लेकिन वह चुप रही।
फिर शांता देवी ने और बातें नोटिस करनी शुरू कीं। घर में 4 लोग दिखते थे, मगर रसोई में खाना 5 लोगों जितना बनता था। रात में मीरा चुपके से एक स्टील की थाली में नरम खिचड़ी और कटे फल लेकर पीछे वाले कमरे की तरफ जाती थी। कपड़े सुखाने की रस्सी पर कभी-कभी बड़ी लड़की के सलवार-कुर्ते दिखते, जो काव्या के नहीं थे।
सबसे बड़ा रहस्य था आँगन के पीछे वाला कमरा। अरविंद ने आते ही उस कमरे पर ताला लगा दिया था।
—माँ, वहाँ मेरे ऑफिस के जरूरी कागज़ हैं। कृपा करके मत खोलना।
एक दोपहर उस कमरे के अंदर से कुछ गिरने की आवाज़ आई। शांता देवी भागकर पहुँचीं।
—कौन है अंदर?
अंदर से कोई जवाब नहीं आया।
उस रात उन्होंने मीरा को धीरे से कहते सुना।
—डर मत, मेरी गुड़िया। मैं यहीं हूँ।
लेकिन काव्या तो उनके कमरे में सो रही थी।
अगली सुबह काव्या फिर बैग लेकर बाथरूम की तरफ चली। शांता देवी ने उसका हाथ पकड़ लिया।
—सच बता। तू वहाँ क्यों पढ़ती है?
काव्या की आँखें भर आईं।
—मैं नहीं बता सकती।
—किसने मना किया?
—पापा ने कहा… दादी समझेंगी नहीं।
शांता देवी पत्थर सी रह गईं। उन्हें अचानक 5 साल पुरानी बात याद आई। जब अरविंद ने मीरा से शादी करने की बात कही थी, तो उसने बताया था कि मीरा की पहली शादी से एक बेटी है, जो “सामान्य” नहीं है। शांता देवी ने गुस्से में कहा था कि दूसरे के खून और बीमारी को घर लाना समझदारी नहीं, ऐसी बच्ची जीवन भर बोझ बन जाती है।
उस दिन अरविंद बिना खाना खाए चला गया था।
अब उसी बंद कमरे के सामने खड़ी शांता देवी को लगा, उनकी कही हुई बात दीवार बनकर उनके ही घर में खड़ी हो गई है।
PART 2
उस दोपहर अरविंद और मीरा अस्पताल की अपॉइंटमेंट के बहाने बाहर गए। गाड़ी गेट से निकली ही थी कि काव्या काँपते हाथों से शांता देवी के कमरे में आई।
—दादी, आपको कुछ दिखाना है।
वह पीछे वाले कमरे के सामने रुकी। अपनी स्कूल यूनिफॉर्म की जेब से उसने एक छोटी चाबी निकाली।
—मैंने डुप्लीकेट बनवाई है।
ताला खुला।
अंदर ऑफिस नहीं था। कमरे की दीवारों पर मोटे गद्देदार पैनल लगे थे। खिड़कियों पर गहरे पर्दे थे। कोने में नरम लाइट, रंगीन ब्लॉक, हेडफोन, दवाइयाँ, थेरेपी की फाइलें और छोटी सी चार्ट-शीट टंगी थी—“सुबह की दिनचर्या”, “शोर से बचाव”, “संकट के समय क्या करें।”
फर्श पर 15 साल की एक लड़की बैठी लकड़ी का खिलौना घुमा रही थी। उसके लंबे बाल कंधों पर बिखरे थे। उसने शांता देवी को देखा, पर कुछ बोली नहीं।
काव्या ने धीमे से कहा—
—ये मेरी बड़ी बहन है। तारा।
शांता देवी की साँस अटक गई।
—तेरी बहन?
—मम्मी की बेटी। पापा ने आपसे छुपाया, क्योंकि उन्हें डर था कि आप हमें घर से निकाल देंगी।
तारा ने एक कॉपी उठाई और चित्र दिखाया। उसमें 4 लोग हाथ पकड़े थे। कोने में एक बूढ़ी औरत अकेली खड़ी थी।
काव्या फूट पड़ी।
—तारा रोज़ दादी को ऐसे बनाती है… दूर।
तभी मुख्य दरवाज़े की आवाज़ आई। अरविंद और मीरा लौट आए थे।
PART 3
अरविंद ने खुले दरवाज़े को देखा तो उसका चेहरा सफेद पड़ गया। मीरा के हाथ से दवाइयों का पैकेट नीचे गिरा। काव्या तारा के आगे ऐसे खड़ी हो गई जैसे छोटी बच्ची अपनी बड़ी बहन की ढाल बन सकती हो।
शांता देवी वहीं खड़ी थीं, हाथ काँप रहे थे, आँखों से आँसू बह रहे थे। उनके सामने वह लड़की थी जिसे उन्होंने कभी देखा नहीं था, फिर भी जिसके लिए उन्होंने वर्षों पहले फैसले सुना दिए थे। तारा ने शोर से घबराकर अपने कानों पर दोनों हथेलियाँ रख लीं। मीरा तुरंत घुटनों के बल बैठी।
—तारा, मेरी बच्ची, कुछ नहीं हुआ। मम्मा है न।
उसने कमरे की नरम लाइट धीमी की। अरविंद ने जल्दी से दरवाज़ा आधा बंद किया ताकि गलियारे की आवाज़ कम हो जाए। काव्या ने अपना छोटा रुमाल तारा की हथेली में रखा। धीरे-धीरे तारा की साँसें सामान्य हुईं।
शांता देवी के भीतर कुछ टूटकर गिर चुका था।
—अरविंद… तूने मुझसे अपनी बेटी छुपाई?
अरविंद की आँखें लाल थीं। उसने पहली बार माँ से आँख मिलाई।
—माँ, मैंने अपनी बेटी नहीं छुपाई। मैंने उसे आपकी बातों से बचाया।
यह वाक्य कमरे में धड़ाम से गिरा।
मीरा ने तारा का सिर सहलाते हुए कहा—
—जब हमारी शादी हुई थी, मैंने अरविंद से कहा था कि सच बता देना। मैं किसी के घर भीख माँगकर जगह नहीं चाहती थी। लेकिन उस दिन आपने कहा था कि ऐसी बच्चियाँ कुल पर बोझ होती हैं। आपने कहा था कि अपना खून ही अपना होता है। उसके बाद अरविंद 2 रात सोया नहीं।
शांता देवी को लगा किसी ने उनके पुराने शब्दों को जलते हुए कोयले की तरह उनके हाथों में रख दिया हो।
—मैं… मैंने गुस्से में कहा था।
अरविंद की आवाज़ भारी हो गई।
—आपने गुस्से में कहा था, माँ। पर मीरा ने वो शब्द 5 साल तक याद रखे। तारा ने भले सुनकर नहीं समझा, पर हमने समझा। जब डॉक्टर ने कहा कि लखनऊ के शांत माहौल में 3 महीने की विशेष थेरेपी तारा के लिए अच्छी रहेगी, तो मुझे आपकी कोठी याद आई। यहाँ सड़क का शोर कम है, पीछे खुला आँगन है। पर सच बताने की हिम्मत नहीं हुई।
शांता देवी ने कमरे को देखा। यह कैदखाना नहीं था। यह किसी डर से बनाई गई शरण थी। गद्देदार दीवारें, मुलायम बिस्तर, शोर रोकने वाले पर्दे—सब तारा को बचाने के लिए थे, छुपाने के लिए नहीं। मगर यह भी सच था कि उनके डर ने इस कमरे को रहस्य बना दिया था।
—और काव्या? —उन्होंने मुश्किल से पूछा—यह बच्ची बाथरूम में क्यों पढ़ती रही?
काव्या ने आँसू पोंछे।
—दादी, तारा को पेंसिल की खरखराहट और पन्ने पलटने की आवाज़ से बहुत तकलीफ होती है। कभी-कभी वह खुद को चोट पहुँचाने लगती है। बाथरूम का दरवाज़ा मोटा है। वहाँ मेरी आवाज़ कम जाती है।
शांता देवी ने अपनी 12 साल की पोती को देखा। वह बच्ची, जो स्कूल से आकर आराम कर सकती थी, टीवी देख सकती थी, आँगन में खेल सकती थी, 3 महीने तक बाथरूम में बैठकर पढ़ती रही ताकि उसकी बहन सुरक्षित रहे। न खून का रिश्ता, न समाज का दबाव, न किसी ने उससे शपथ ली। सिर्फ प्रेम।
शांता देवी धीरे-धीरे तारा के सामने बैठ गईं। उनके घुटनों में दर्द था, पर उस पल दर्द उनके शरीर में नहीं, आत्मा में था।
—तारा…
लड़की ने खिलौना रोककर उन्हें देखा।
—मैंने तुम्हें जाने बिना तुम्हारे बारे में गलत कहा। मैंने तुम्हारी माँ को दुख दिया। मैंने अपने बेटे को झूठ बोलने पर मजबूर किया। मैंने काव्या से उसका बचपन छीन लिया।
मीरा की आँखें भर आईं।
—माँजी, आपसे डर लगता था। पर मैं चाहती थी कि एक दिन आप तारा को देखें। वह बोझ नहीं है। वह मेरी साँस है।
शांता देवी ने हाथ आगे बढ़ाया, पर तुरंत रोक लिया।
—मैं छू सकती हूँ?
मीरा ने तारा की आँखों में देखकर धीरे से पूछा—
—दादी हाथ पकड़ें?
तारा ने जवाब नहीं दिया। पर उसने अपना लकड़ी का खिलौना शांता देवी की ओर सरका दिया। यह उसका पहला स्वीकार था।
शांता देवी रो पड़ीं। उन्होंने खिलौने को ऐसे पकड़ा जैसे कोई माफी का प्रसाद मिला हो।
अरविंद दरवाज़े से टिककर खड़ा था। उसके चेहरे पर राहत और दर्द दोनों थे।
—माँ, मैं भी गलत था। मैंने आपको बदलने का मौका नहीं दिया। मैंने डर को सच से बड़ा बना दिया।
शांता देवी ने सिर हिलाया।
—नहीं बेटा। डर मैंने पैदा किया था। जिस घर में माँ का दिल छोटा हो जाए, वहाँ बच्चे झूठ बोलकर ही जगह बनाते हैं।
उस शाम पहली बार उस घर की डाइनिंग टेबल पर 5 थालियाँ रखीं गईं। शोर कम रखने के लिए टीवी बंद था। स्टील की जगह तारा के लिए हल्की प्लेट लाई गई, ताकि आवाज़ न हो। काव्या ने अपनी कॉपी मेज़ पर रखी, और जब उसने पेंसिल उठाई, तो मीरा ने डरकर तारा की तरफ देखा। तारा खिड़की के पास बैठी थी। उसने हेडफोन पहना हुआ था और अपनी प्लेट में दाल-चावल मिला रही थी।
काव्या ने धीमे से पूछा—
—मम्मी, मैं यहाँ पढ़ सकती हूँ?
मीरा की आँखों से फिर आँसू गिर पड़े।
—हाँ, बेटा। अब तू बाथरूम में नहीं पढ़ेगी।
शांता देवी ने अपने कमरे से पुराना पीतल का स्टैंड निकाला, जिसमें उनके पति अखबार पढ़ते समय लैंप रखते थे। उन्होंने उसे साफ किया, नया बल्ब लगाया और काव्या की तरफ सरका दिया।
—यह तेरी पढ़ाई की जगह है। इस घर में अब कोई बच्चा छुपकर नहीं रहेगा।
उस रात जब सब सो गए, शांता देवी तारा के कमरे के बाहर बैठीं। दरवाज़ा खुला था। तारा बिस्तर पर बैठकर रंगों से कुछ बना रही थी। शांता देवी ने आवाज़ नहीं की। उन्हें समझ आ गया था कि प्रेम हमेशा बोलकर नहीं जताया जाता। कभी-कभी चुप रहना भी सेवा होता है।
तारा ने पन्ना मोड़ा और उनकी ओर बढ़ाया। चित्र में वही घर था, वही खिड़की, वही तुलसी का चौरा। पर इस बार 5 लोग खड़े थे—अरविंद, मीरा, काव्या, तारा और शांता देवी। किसी कोने में कोई अकेला नहीं था।
शांता देवी ने कागज़ सीने से लगा लिया।
—मेरी पोती।
तारा ने उनकी ओर देखा। उसके चेहरे पर बहुत हल्की मुस्कान आई। इतनी हल्की कि कोई अनजान आदमी शायद देख भी न पाता, पर शांता देवी ने उसे पूरी आकाशगंगा की तरह महसूस किया।
अगले दिन सुबह मोहल्ले की पड़ोसन मिसेज माथुर आ गईं। उनकी आदत थी हर बात में नाक डालने की।
—शांता जी, सुना है घर में कोई और लड़की भी है? कौन है? रिश्तेदार?
पहले वाली शांता देवी शायद बात टाल देतीं। कहतीं—दूर की बच्ची है, मेहमान है, रहने दो। पर अब उनके भीतर एक नया साहस था।
उन्होंने तुलसी में पानी डाला, फिर साफ आवाज़ में कहा—
—मेरी पोती है। तारा।
मिसेज माथुर ने भौंहें चढ़ाईं।
—अच्छा… पर वो तो कुछ अलग लगती है न?
शांता देवी का चेहरा सख्त हुआ।
—हाँ, अलग है। जैसे हर बच्चा अलग होता है। लेकिन वह हमारे घर की बच्ची है। इतना काफी है।
मिसेज माथुर चुप हो गईं।
धीरे-धीरे घर बदलने लगा। तारा के कमरे से ताला हट गया। दरवाज़े पर छोटी सी घंटी लगाई गई, ताकि अचानक कोई अंदर न जाए। ड्राइंग रूम में एक शांत कोना बनाया गया—नरम कुशन, कम रोशनी, रंगीन ब्लॉक और चित्रों की फाइल। काव्या की पढ़ाई की मेज़ वहीं खिड़की के पास लग गई, जहाँ सुबह की धूप आती थी।
शांता देवी ने मीरा से सब सीखना शुरू किया—कब तारा को शोर से तकलीफ होती है, कौन से खाने की बनावट उसे पसंद नहीं, अचानक छूना क्यों गलत है, संकट के समय जोर से बोलने के बजाय जगह देना क्यों जरूरी है। पहले वह हर बात पर सलाह देती थीं। अब वह नोटबुक लेकर बैठती थीं।
एक दिन अरविंद ने उन्हें दवाई का टाइमर सेट करते देखा तो उसकी आँखें भर आईं।
—माँ, आप बदल गईं।
शांता देवी ने धीमे से कहा—
—नहीं बेटा, मैं पहली बार इंसान बनने की कोशिश कर रही हूँ।
काव्या भी बदल गई। पहले वह हर समय सावधान रहती थी, जैसे उसके कंधों पर घर की शांति का बोझ हो। अब वह हँसने लगी। स्कूल की सहेली रिद्धि को घर बुलाया। उसने गर्व से कहा—
—ये मेरी दीदी तारा हैं। ये कम बोलती हैं, पर बहुत अच्छे ड्रॉइंग बनाती हैं।
रिद्धि ने तारा को नमस्ते किया। तारा ने जवाब में अपनी रंगीन पेंसिल आगे बढ़ा दी। काव्या खिल उठी।
मीरा ने यह दृश्य देखा तो रसोई में जाकर चुपचाप रोई। इतने सालों में पहली बार उसकी बेटी किसी परिचय में शर्म का कारण नहीं, गर्व का कारण बनी थी।
3 महीने पूरे हुए तो डॉक्टर ने कहा कि थेरेपी अच्छा असर कर रही है। अरविंद ने नोएडा लौटने की बात छेड़ी। घर में अजीब चुप्पी फैल गई। शांता देवी ने उसी रात बेटे को बुलाया।
—तुम लोग वापस जाना चाहते हो तो जाओ। पर यह मत समझना कि यहाँ जगह खत्म हो गई। यह घर जितना मेरा है, उतना तारा का भी है।
अरविंद ने कहा—
—माँ, आपकी जिंदगी मुश्किल हो जाएगी।
—जिंदगी मुश्किल तब थी जब घर में लोग छुप रहे थे। अब तो साँस आसान है।
मीरा ने उनके पैर छूने चाहे, पर शांता देवी पीछे हट गईं।
—बहू, पैर मत छू। मुझे गले लगा। मैंने तुझे बहुत देर से बहू माना।
मीरा उनके गले लगकर फूट पड़ी। उन दोनों औरतों के बीच वर्षों का डर, अपमान और दूरी आँसुओं में बह गई।
कुछ हफ्तों बाद तारा का 16वाँ जन्मदिन आया। कोई तेज संगीत नहीं रखा गया, कोई पटाखा नहीं, कोई भीड़ नहीं। आँगन में हल्की रोशनी, घर का बना चॉकलेट केक, 5 लोग और धीमी आवाज़ में गाया गया जन्मदिन गीत। तारा ने मोमबत्ती बुझाई तो सबने धीरे से तालियाँ बजाईं। शांता देवी ने उसे एक डिब्बा दिया—लकड़ी के रंगों का नया सेट।
तारा ने डिब्बा खोला, रंगों को छुआ, फिर अचानक उठकर शांता देवी के पास आई। उसने बिना कहे अपना माथा शांता देवी के कंधे से टिकाया।
कमरे में किसी ने आवाज़ नहीं की। काव्या मुस्कुरा रही थी। अरविंद अपनी आँखें पोंछ रहा था। मीरा ने दोनों हाथ जोड़कर ऊपर देखा, जैसे किसी भारी परीक्षा के बाद धन्यवाद कह रही हो।
उस रात तारा ने एक नया चित्र बनाया। उसमें 5 लोग नहीं, 6 आकृतियाँ थीं। छठी आकृति तुलसी के पास खड़े सफेद बालों वाले आदमी की थी। शांता देवी समझ गईं—तारा ने उनके दिवंगत पति को भी परिवार में जोड़ दिया था, उस व्यक्ति को जिसे उसने कभी देखा नहीं।
शांता देवी ने चित्र देखते हुए फुसफुसाया—
—तू बोलती नहीं, पर सब समझती है।
तारा ने अपनी हथेली शांता देवी के हाथ पर रख दी।
1 साल बाद वही कोठी मोहल्ले में एक मिसाल बन गई। कभी जिस कमरे पर ताला लगा रहता था, वहाँ अब विशेष बच्चों के लिए छोटी-छोटी कला बैठकों का आयोजन होता था। मीरा हफ्ते में 1 दिन माता-पिता को बुलाती, शांता देवी चाय बनातीं, काव्या बच्चों को रंग देती, और तारा खिड़की के पास बैठकर चित्र बनाती।
लोग पूछते—
—शांता जी, आपको इतना धैर्य कैसे आ गया?
वह मुस्कुराकर कहतीं—
—धैर्य नहीं आया। शर्म आई। और जब इंसान अपनी शर्म को सच में देख ले, तो दिल थोड़ा बड़ा हो जाता है।
काव्या अब बाथरूम में नहीं पढ़ती थी। उसकी किताबें खुली मेज़ पर रहतीं। तारा अब बंद कमरे की लड़की नहीं थी। वह घर की सुबह थी—धीमी, अलग, पर अपनी रोशनी वाली।
एक दिन शांता देवी ने पुराने संदूक से अपनी सोने की चूड़ियाँ निकालीं। अरविंद ने पूछा—
—माँ, ये क्यों?
—दो पोतियों के नाम रख रही हूँ। बराबर।
अरविंद ने कहा—
—समाज क्या कहेगा?
शांता देवी हँसीं। वही औरत, जो कभी समाज से डरकर खून का हिसाब लगाती थी, अब सीधी खड़ी थी।
—समाज ने मेरे घर में कभी बाथरूम में बैठकर पढ़ाई नहीं की। समाज ने मेरी पोती को अपनी आवाज़ के बिना प्यार करना नहीं सिखाया। समाज को जो कहना है कहने दे।
उस शाम तारा ने शांता देवी को एक और चित्र दिया। इसमें बाथरूम का बंद दरवाज़ा बना था, उसके बाहर छोटी काव्या बैठी थी, और पीछे से एक बूढ़ी औरत दरवाज़ा खोल रही थी। नीचे तारा ने अक्षर नहीं लिखे थे, पर रंगों से सब कह दिया था—दरवाज़ा खुल गया।
शांता देवी ने काव्या को पास बुलाया।
—बिटिया, तूने 3 महीने तक अपनी सुविधा छोड़ी। कभी शिकायत नहीं की। क्यों?
काव्या ने सरलता से कहा—
—क्योंकि तारा दीदी डर जाती थीं। और घर में कोई तो था जिसे डरना बंद करना था।
शांता देवी ने उसे सीने से लगा लिया।
उस रात उन्होंने पहली बार अपने मंदिर में लंबी प्रार्थना नहीं की। बस दीपक जलाया और मन ही मन कहा कि भगवान, खून से बड़ा रिश्ता दिखाने के लिए धन्यवाद।
कभी उन्होंने सोचा था कि परिवार वह है जो वंश चलाए, नाम रखे, समाज में सम्मान दे। अब उन्हें समझ आया कि परिवार वह है जो किसी की कमजोरी छुपाने के लिए नहीं, उसे सुरक्षित रखने के लिए दीवार बनता है। परिवार वह है जहाँ 12 साल की बच्ची अपनी बहन की खातिर बाथरूम में पढ़ लेती है। जहाँ बहू अपमान सहकर भी बेटी को बचाती है। जहाँ बेटा झूठ बोलता है, पर उस झूठ के पीछे प्रेम और भय दोनों छुपे होते हैं। और जहाँ एक बूढ़ी औरत देर से सही, मगर अपनी गलती मानकर दरवाज़ा खोल देती है।
तारा अब भी बहुत कम बोलती थी। पर जब भी शांता देवी सुबह तुलसी में पानी डालतीं, वह खिड़की से हाथ हिलाती। शांता देवी हर बार जवाब में कहतीं—
—आ गई मेरी पोती की सुबह।
और सच में, उस घर में सुबह उसी दिन आई थी, जिस दिन एक गुप्त चाबी ने बंद कमरे का ताला नहीं, एक दादी के दिल का ताला खोला था।
Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.