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पूरे अमीर खानदान के सामने जब बहू को चायवाले की बेटी कहकर हँसाया गया, उसने गंदी बाल्टी पति पर उड़ेल दी और फोन उठाकर बोली, “अब तुम्हारी सच्चाई सब सुनेंगे”, फिर दावत में छिपे पाप खुलने लगे

PART 1

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पूरे मेहरा परिवार की हँसी उस रात अचानक और भी तेज़ हो गई, जब अर्जुन ने 25 मेहमानों के सामने अपनी पत्नी नंदिनी से कहा कि उसकी माँ अगर बिना इलाज मरी, तो इसलिए क्योंकि उसे अमीर लोगों के दरवाज़े खटखटाना नहीं आता था।

दिल्ली के वसंत कुंज वाले उस विशाल बंगले में रोशनी झूमरों से नहीं, घमंड से गिर रही थी। लंबी मेज़ पर चाँदी के बर्तन चमक रहे थे, मेहमान रेशमी साड़ियों और महंगे सूटों में बैठे थे, और नंदिनी मेहरा हाथ में शराब की बोतल लिए खड़ी थी, जैसे वह इस घर की बहू नहीं, किसी दावत में रखी गई नौकरानी हो।

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5 साल पहले लखनऊ की नंदिनी शर्मा ने सोचा था कि अर्जुन मेहरा से शादी करके वह अपने माता-पिता की मेहनत का सम्मान बढ़ा रही है। उसके पिता रेलवे स्टेशन के बाहर छोटी-सी चाय की दुकान चलाते थे। माँ घरों में सिलाई करती थीं। उन्होंने अपनी बेटी को पढ़ाया, उसे साइबर सुरक्षा की नौकरी तक पहुँचाया, और विदाई के दिन कहा था, “बेटी, ससुराल में सिर झुकाना, पर आत्मा कभी मत झुकाना।”

नंदिनी ने सिर बहुत झुकाया था।

उसने टूटे होंठ पर लिपस्टिक लगाना सीखा। कलाई के नीले निशान चूड़ियों के नीचे छिपाना सीखा। मेहमानों के सामने मुस्कुराना सीखा, जबकि अर्जुन भीतर कमरे में उसे दीवार से धक्का देकर कहता था कि इस घर में उसकी हैसियत उसके नाम की वजह से है।

उस रात मेहरा इन्फ्रा को दिल्ली के 14 सरकारी स्कूलों और खेल मैदानों के नवीनीकरण का बड़ा ठेका मिला था। मेज़ पर स्थानीय नेता, बिल्डर, सलाहकार, रिश्तेदार और अर्जुन की माँ सावित्री मेहरा बैठी थीं, जिनकी गर्दन हमेशा इतनी सीधी रहती थी जैसे पूरा खानदान उनके इशारे पर साँस लेता हो।

अर्जुन ने गिलास उठाया।

“नंदिनी, वही महँगी वाली बोतल लाओ। जिसे तुम्हारे पिताजी नाम से नहीं, दाम से पहचानते।”

कई लोग हँसे। सावित्री ने मीठे ज़हर से कहा, “अर्जुन, बहू को मत चिढ़ा। वह अपने संस्कारों से जितना समझ सकती है, उतना कर रही है।”

नंदिनी का गला सूख गया। सुबह ही अर्जुन ने उसका होंठ वॉशबेसिन के किनारे से टकरा दिया था, क्योंकि उसने पूछ लिया था कि उसके नाम से बने डिजिटल परामर्श अनुबंध पर नकली हस्ताक्षर किसने किए। मगर आज उसकी साड़ी के किनारे में एक छोटा रिकॉर्डर सिला था। उसके बैग में फोन शुरू से सब रिकॉर्ड कर रहा था।

अर्जुन ने फिर कहा, “उसकी माँ सिलाई करती थी न? शायद इसलिए इसे हर बात जोड़-तोड़कर छिपाने की आदत है।”

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नंदिनी ने धीरे से कहा, “बस कीजिए।”

कमरा जम गया।

अर्जुन मुस्कुराया। “क्या कहा?”

नंदिनी ने उसकी आँखों में देखा। पहली बार।

तभी अर्जुन झुककर बोला, “तेरी माँ मरते दम तक दूसरों के फटे कपड़े सीती रही। और तेरे बाप ने चाय बेच-बेचकर क्या दिया? एक ऐसी लड़की, जिसे मैंने नाम दिया, घर दिया, इज़्ज़त दी।”

हँसी फिर उठी। इस बार और गंदी।

नंदिनी की नज़र रसोई के दरवाज़े के पास रखी बाल्टी पर गई। उसमें बचा हुआ खाना, मछली की गंध, दही, गिरी हुई दाल, चिकनाई और गंदे नैपकिन भरे थे।

सावित्री ने उसकी नज़र पकड़ ली। “बहू, होश में रहना।”

लेकिन नंदिनी अब किसी की बहू नहीं रह गई थी।

वह बाल्टी उठाकर अर्जुन के सामने आ खड़ी हुई।

PART 2

अर्जुन ने कुर्सी पर टिककर हँसते हुए कहा, “क्या करेगी? मेरे ऊपर रोएगी?”

अगले ही पल पूरी बाल्टी उसके सिर पर उलट गई।

दही उसके बालों से बहा, दाल उसकी शेरवानी पर फैल गई, मछली का टुकड़ा उसके गाल से फिसलकर मेज़ पर गिरा। 2 सेकंड तक कोई आवाज़ नहीं आई। फिर सावित्री चीखी, “नीच लड़की! हमारे घर की इज़्ज़त मिट्टी में मिला दी!”

अर्जुन झपटकर उठा। “तुझे अभी बताता हूँ—”

नंदिनी ने फोन उठा दिया।

“मारो, अर्जुन। आज सब सुनेंगे।”

फोन से उसकी अपनी आवाज़ गूँजी, ठंडी और साफ़।

“अगर तूने अपनी माँ से बिना पूछे बात की, तो अगली बार होंठ नहीं, जबड़ा तोड़ दूँगा।”

मेज़ पर बैठे नेता का चेहरा सफेद पड़ गया।

दूसरी रिकॉर्डिंग चली।

“तेरा नाम हमारे काम आएगा। तू दस्तखत करेगी, वरना तुझे पागल साबित कर दूँगा।”

अर्जुन पहली बार डर गया।

फिर नंदिनी ने स्क्रीन पर एक फोल्डर खोला।

अनुबंध। भुगतान। संदेश। नकली कंपनियाँ। और सावित्री की आवाज़।

“बहू को कुछ समझ नहीं। अर्जुन उसके नाम से साइन कर देगा।”

तभी बाहर मुख्य दरवाज़े की घंटी बजी।

PART 3

घंटी की आवाज़ उस बंगले में ऐसी गूँजी जैसे किसी ने बंद तिजोरी पर हथौड़ा मार दिया हो। अर्जुन के चेहरे से दही टपक रहा था, मगर उसकी आँखों से पहली बार वह अकड़ गायब थी, जिसने 5 साल तक नंदिनी की हर साँस पर पहरा लगाया था।

दरवाज़ा खुला।

अंदर 2 पुलिस अधिकारी आए, उनके साथ भ्रष्टाचार निरोधक विभाग का एक अधिकारी और काले सूट में एक महिला वकील। उसका नाम कविता राव था। कॉलेज के दिनों में नंदिनी की सहेली, और पिछले 8 महीनों से उसकी चुप लड़ाई की गवाह।

सावित्री ने झट से पल्लू सिर पर रखा, जैसे उम्रभर की मर्यादा एक कपड़े में बच सकती हो। “यह सब क्या तमाशा है? हमारे घर में ऐसे घुसने की हिम्मत?”

कविता ने शांत स्वर में कहा, “तमाशा तो तब था, जब आप सब एक औरत को 5 साल से टूटते देखते रहे और उसे परिवार की इज़्ज़त कहकर चुप कराते रहे।”

पुलिस अधिकारी ने कागज़ खोला।

“अर्जुन मेहरा, आपको घरेलू हिंसा, धमकी, जालसाजी, सार्वजनिक धन की हेराफेरी, रिश्वत और फर्जी कंपनियों के माध्यम से धनशोधन के आरोप में हिरासत में लिया जा रहा है।”

मेज़ के दोनों ओर बैठे लोग अचानक कुर्सियों में छोटे पड़ने लगे। जो अभी तक हँस रहे थे, अब अपने फोन जेब में छिपा रहे थे। कोई सलाहकार अपने ड्राइवर को संदेश भेज रहा था। कोई नेता पानी पीते-पीते खाँस गया। अर्जुन ने गुस्से से नंदिनी की ओर देखा, पर उसका गुस्सा अब डर की चादर से ढका हुआ था।

“नंदिनी, बोलो न यह पति-पत्नी की लड़ाई है। तुम समझती नहीं, यह सब तुम्हें भी फँसा देगा।”

नंदिनी ने उसे देखा। उसके चेहरे पर न जीत थी, न बदला। सिर्फ थकान थी, वह थकान जो किसी स्त्री की हड्डियों में तब उतरती है जब उसे रोज़ अपने ही घर में अपनी सच्चाई साबित करनी पड़े।

“5 साल तक मैंने तुम्हारे लिए झूठ बोला,” उसने कहा। “आज पहली बार सच बोल रही हूँ।”

पुलिस ने अर्जुन के हाथों में हथकड़ी लगा दी।

सावित्री ने काँपती उँगली से नंदिनी की ओर इशारा किया। “तूने एक खानदान बर्बाद कर दिया।”

नंदिनी धीमे से आगे बढ़ी। “खानदान ईंटों से नहीं, इंसानियत से बनता है। आपके घर की नींव पहले से सड़ी थी। मैंने बस परदा हटाया है।”

कविता ने लाल फाइल खोली और मेज़ पर कागज़ रखे। “नंदिनी के नाम पर 7 परामर्श अनुबंध बनाए गए। उन पर नकली हस्ताक्षर हैं। भुगतान 3 फर्जी कंपनियों में गया। उन कंपनियों के खाते अर्जुन मेहरा और सावित्री मेहरा से जुड़े लोगों के नाम पर हैं।”

सावित्री का चेहरा राख जैसा हो गया।

नंदिनी ने फोन फिर चलाया। इस बार सावित्री की आवाज़ पूरे कमरे में फैली।

“लड़की भावुक है। माँ मर रही थी, तब भी रो-धोकर बैठी थी। ऐसी औरतों को डराकर रखना पड़ता है। वरना गरीब घर की बेटियाँ ससुराल में मालिक बनने लगती हैं।”

नंदिनी की आँखें भर आईं, पर आँसू गिरने से पहले ही ठहर गए।

उसकी माँ सुशीला शर्मा, जिसने मोहल्ले की लड़कियों के लहंगे आधे दाम में सी दिए थे। जिसने नंदिनी की पहली नौकरी के दिन उसके बैग में चुपचाप 500 रुपये रखे थे। जिसने अस्पताल के बिस्तर पर आखिरी बार बेटी से मिलने की ज़िद की थी, और अर्जुन ने कहा था, “ड्रामा मत करो, कल चली जाना।”

कल कभी नहीं आया था।

नंदिनी माँ के अंतिम शब्द सुन भी नहीं पाई थी।

अर्जुन को बाहर ले जाया जा रहा था। उसने झुककर फुसफुसाया, “तू मुझे नहीं जानती। बाहर आकर तुझे चैन से नहीं रहने दूँगा।”

नंदिनी ने फोन उसकी ओर घुमा दिया। “धन्यवाद। यह धमकी भी रिकॉर्ड हो गई।”

वह तिलमिला गया। “नंदिनी, मैंने तुम्हें प्यार किया था!”

वह बहुत देर तक उसे देखती रही। “तुमने मुझे कभी प्यार नहीं किया। तुमने मुझे इस्तेमाल किया। फर्क तुम्हें आज भी नहीं समझ आया।”

बाहर गेट पर पड़ोसी जमा हो गए थे। वही पड़ोसी, जिन्होंने कई रातों में चीखें सुनी थीं और कहा था कि बड़े घरों की बातें बड़ी होती हैं, बीच में नहीं पड़ना चाहिए। वही महिलाएँ, जिन्होंने नंदिनी की सूजी आँख देखकर पूछा था, “बहू, नींद नहीं आई क्या?” वही लोग अब वीडियो बना रहे थे, जैसे सच उनके सामने पहली बार आया हो।

सावित्री को भी हिरासत में लिया गया। वह चिल्लाती रही, “तुम्हें पता है मैं किसे फोन कर सकती हूँ?”

कविता ने ठंडे स्वर में कहा, “कभी-कभी यही समस्या होती है, मैडम। कुछ लोग समझते हैं कि उनका फोन कानून से बड़ा है।”

जब सब बाहर चले गए, बंगले की भोजन मेज़ पर गिरी दाल, टूटी कुर्सी, उलटे गिलास और झूठे रिश्तों की गंध रह गई। नंदिनी दरवाज़े पर खड़ी रही। 5 साल तक जिस घर में वह साँस लेने से पहले अनुमति खोजती थी, वहाँ आज पहली बार उसे लगा कि दीवारें उससे छोटी हैं।

कविता ने उसके कंधे पर हाथ रखा। “चल सकती हो?”

यह सवाल नंदिनी के भीतर कहीं बहुत गहरा लगा। क्योंकि इतने वर्षों में किसी ने उससे पूछा ही नहीं था कि वह चल सकती है या नहीं। सबने बस आदेश दिए थे—बैठो, उठो, चुप रहो, मुस्कुराओ, परोस दो, माफ़ी माँगो।

नंदिनी ने अपनी हथेलियाँ देखीं। उनमें दाल, तेल और गंदगी लगी थी। लेकिन वे काँप नहीं रही थीं।

“अभी पूरी तरह नहीं,” उसने कहा, “पर चलना सीख लूँगी।”

वह ऊपर अपने कमरे में नहीं गई। उसने वे गहने नहीं उठाए जो अर्जुन ने कभी उपहार कहकर दिए थे, मगर हर बार याद दिलाया था कि वे उसकी औकात से बाहर हैं। उसने महंगी साड़ियाँ नहीं लीं। केवल अपने बैग से एक पुरानी फोटो निकाली—उसकी माँ सिलाई मशीन के सामने बैठी थीं, गले में नाप की फीता, चेहरे पर थकी हुई पर साफ़ मुस्कान।

कविता की कार में एक छोटी अटैची रखी थी। उसमें नंदिनी की डिग्रियाँ, मेडिकल रिपोर्टें, पुलिस शिकायतों की प्रतियाँ, कुछ कपड़े और वह पेन ड्राइव थी जिसमें मेहरा परिवार की चमकती इमारत के नीचे छिपी दलदल बंद थी।

आने वाले हफ्ते आसान नहीं थे।

अखबारों ने पहले इसे “दिल्ली के कारोबारी घराने का पारिवारिक विवाद” कहा। फिर ऑडियो बाहर आए। फिर मेडिकल रिपोर्टें। फिर फर्जी अनुबंध। फिर सरकारी ठेके में कमीशन के संदेश। फिर वे तस्वीरें जिनमें नंदिनी के हाथ पर उँगलियों के निशान साफ़ दिखते थे।

समाज भी दो हिस्सों में बँट गया।

कुछ लोग बोले, “बहुत बहादुर है।”

कुछ ने कहा, “5 साल बाद याद आया?”

कुछ ने लिखा, “ऐसी औरतें पैसे के लिए पति को फँसाती हैं।”

नंदिनी ने ये सब टिप्पणियाँ एक छोटे किराए के कमरे में बैठकर पढ़ीं। कमरा दक्षिण दिल्ली की चमक से दूर था, मगर उसकी खिड़की खुलती थी। यह उसके लिए किसी महल से कम नहीं था।

कविता ने एक रात उसका लैपटॉप बंद कर दिया। “मत पढ़ो।”

नंदिनी ने सिर हिलाया। “नहीं। पढ़ूँगी। यही तो वजह है कि बोलना ज़रूरी है। लोग समझते हैं डर एक बटन है, जिसे कोई भी दबाकर बंद कर सकता है।”

धीरे-धीरे वह बोली।

पहले अदालत में। फिर एक महिला सहायता समूह में। फिर एक पत्रकार के सामने। उसकी आवाज़ पहले काँपी, फिर सख्त हुई, फिर गहरी हो गई। उसने सब कुछ नहीं बताया। कुछ अपमान उसने अपने भीतर ही रहने दिए, क्योंकि किसी घाव को पूरा खोलना ज़रूरी नहीं होता यह साबित करने के लिए कि वह सच है।

अर्जुन न्यायिक हिरासत में भेजा गया। सावित्री की संपत्तियों की जाँच शुरू हुई। मेहरा इन्फ्रा के कई खाते सील हुए। जिन नेताओं ने मेज़ पर बैठकर मिठाई खाई थी, वे अब कह रहे थे कि उन्हें कुछ पता नहीं था। रिश्तेदारों ने नंदिनी को पागल, लालची, कृतघ्न कहा। मगर रिकॉर्डिंग झूठ से ज्यादा साफ़ बोलती थी।

3 महीने बाद नंदिनी लखनऊ लौटी।

पुराने मोहल्ले की गली वैसी ही थी। चाय की भाप, सुबह की आरती की दूर आती आवाज़, सब्ज़ी वाले की पुकार, और बारिश से भीगी दीवारों पर उखड़ता रंग। पिता की दुकान अब बंद थी। ऊपर जंग लगा बोर्ड लटका था—“शर्मा चाय भंडार।” उसके बगल वाले कमरे में माँ की पुरानी सिलाई मशीन अभी भी पड़ी थी, कपड़े की धूल और वर्षों की खामोशी से ढकी।

नंदिनी ने ताला खोला।

भीतर घुसते ही उसे हल्दी, चायपत्ती, पुराने कपड़े और बचपन की मिली-जुली गंध ने घेर लिया। वह कुछ कदम चली, फिर उसी जगह बैठ गई जहाँ बच्ची होते हुए वह माँ के धागे उलझा देती थी और माँ मुस्कुराकर कहती थीं, “जिस दिन तू अपनी गाँठ खुद खोलना सीख जाएगी, कोई तुझे बाँध नहीं पाएगा।”

नंदिनी ने फोटो सिलाई मशीन पर रखी।

“माँ, माफ़ कर दो,” वह बुदबुदाई।

वह नहीं जानती थी किस बात की माफ़ी माँग रही है। माँ से आखिरी बार न मिल पाने की। यह कहने की कि वह खुश है, जबकि वह टूट रही थी। अपने पिता की चाय की दुकान से शर्मिंदा होने की, जब अर्जुन उसे “चायवाले की बेटी” कहकर चुभाता था। या इस बात की कि कई रातों में उसने सचमुच मान लिया था कि शायद वह कुछ नहीं है।

लेकिन उस छोटे कमरे की खामोशी ने उसे दोषी नहीं ठहराया।

उसने उसे वापस स्वीकार किया।

नंदिनी वहीं फर्श पर सिर झुकाकर रोई। बहुत देर तक। वह रोना हार का नहीं था। वह उस औरत का रोना था जो वर्षों बाद अपने ही शरीर, अपनी ही आवाज़, अपनी ही यादों में वापस लौट रही थी।

अगली सुबह उसने कविता को फोन किया।

“मैं यह जगह फिर से खोलना चाहती हूँ।”

“चाय की दुकान?”

“नहीं,” नंदिनी ने सिलाई मशीन पर हाथ फेरते हुए कहा। “एक सुरक्षित घर। उन औरतों के लिए जिन्हें घर से भागते वक्त यह भी नहीं पता होता कि वे रात कहाँ सोएँगी।”

1 साल बाद उसी गली में “सुशीला आश्रय” खुला। कोई चमकदार संस्था नहीं, कोई बड़ी तस्वीरों वाला मंच नहीं। बस एक साफ़ जगह, 10 बिस्तर, छोटी रसोई, कानूनी सलाह का कमरा, बच्चों के लिए कोना, और एक कंप्यूटर कक्ष जहाँ नंदिनी औरतों को सिखाती थी कि पासवर्ड कैसे बदलते हैं, संदेश कैसे सुरक्षित रखते हैं, धमकी की रिकॉर्डिंग कैसे बचाते हैं, और मदद माँगते समय फोन की निगरानी से कैसे बचते हैं।

पहली महिला जो वहाँ आई, उसका नाम रुक्मिणी था। उम्र 31, हाथ में 2 साल का बच्चा, आँखों में वही डर जो नंदिनी आईने में देखा करती थी।

“मुझे नहीं पता मैं यहाँ रह सकती हूँ या नहीं,” रुक्मिणी ने काँपते हुए कहा।

नंदिनी ने दरवाज़ा पूरा खोल दिया। “यहाँ रहने के लिए किसी की अनुमति नहीं चाहिए।”

रुक्मिणी रो पड़ी।

नंदिनी ने उसे चुप कराने की कोशिश नहीं की। उसने बस पानी दिया, बच्चे को बिस्कुट दिया, और पास बैठ गई। उस दिन उसे समझ आया कि न्याय सजा दे सकता है, पर हर चीज़ नहीं लौटा सकता। न्याय माँ की आखिरी आवाज़ वापस नहीं लाता। टूटे त्योहार वापस नहीं लाता। डरते हुए बिताई रातें वापस नहीं लाता। मगर एक खुला दरवाज़ा किसी और स्त्री की जान बचा सकता है।

अर्जुन को अंततः घरेलू हिंसा, धमकी, जालसाजी और भ्रष्टाचार के मामलों में सजा मिली। सावित्री को भी आर्थिक अपराधों में दोषी पाया गया और मेहरा बंगले का बड़ा हिस्सा जब्त हुआ। कई लोग बचे, कई ने समझौते किए, कुछ नाम दब गए। दुनिया पूरी तरह न्यायप्रिय नहीं हुई। पर नंदिनी ने पहली बार जाना कि सच हमेशा जीतता नहीं, मगर जब वह दस्तावेज़, आवाज़ और साहस लेकर खड़ा हो, तो सबसे ऊँची दीवारों में भी दरार डाल देता है।

एक दिन एक पत्रकार “सुशीला आश्रय” आई। उसने पूछा, “क्या आपने अर्जुन मेहरा को माफ़ कर दिया?”

नंदिनी ने आँगन में बैठी महिलाओं को देखा। कोई बच्ची की चोटी बना रही थी, कोई फॉर्म भर रही थी, कोई पहली बार खुलकर हँस रही थी। उसने माँ की सिलाई मशीन देखी, जिसे अब स्वागत कक्ष में रखा गया था।

“मैंने यह जगह उसे माफ़ करने के लिए नहीं बनाई,” नंदिनी ने कहा। “मैंने इसे इसलिए बनाया है ताकि अगली औरत को अपनी सच्चाई सुनाने में 5 साल न लगें।”

पत्रकार ने फिर पूछा, “और अगर कोई औरत आज वही सब झेल रही हो जो आपने झेला?”

नंदिनी ने गहरी साँस ली।

“मैं उसे कहूँगी कि वह पागल नहीं है। वह बढ़ा-चढ़ाकर नहीं बोल रही। प्यार कभी होंठ नहीं फाड़ता, फोन नहीं छीनता, माँ-बाप की मौत का अपमान नहीं करता, दोस्तों से मिलने पर रोक नहीं लगाता। मैं कहूँगी कि डरना शर्म की बात नहीं। सबूत बचाना समझदारी है। किसी भरोसेमंद इंसान को चुनना कमजोरी नहीं, पहला कदम है। और सबसे ज़रूरी—एक दिन उसे अपनी आवाज़ फिर सुनाई देगी। वह आवाज़ काँपेगी, टूटेगी, मगर वही उसकी आज़ादी की शुरुआत होगी।”

शाम को नंदिनी पुरानी गली के बाहर खड़ी थी। बोर्ड पर अब लिखा था—“सुशीला आश्रय।” भीतर बच्चों की हँसी आ रही थी। रसोई से अदरक वाली चाय की खुशबू उठ रही थी। दरवाज़ा खुला था।

उसने फोन निकाला। उसमें अर्जुन की एक पुरानी तस्वीर अभी भी बची थी। एक शादी में वह रेशमी शेरवानी पहने खड़ा था, हाथ नंदिनी की कमर पर ऐसे रखा जैसे वह कोई इंसान नहीं, संपत्ति हो। नंदिनी तस्वीर में मुस्कुरा रही थी, मगर आँखें मदद माँग रही थीं।

उसने उस तस्वीर को कुछ पल देखा।

फिर हटा दिया।

उसके भीतर कोई आतिशबाज़ी नहीं हुई। कोई नाटकीय खुशी नहीं उमड़ी। उसे उससे भी बेहतर चीज़ महसूस हुई।

जगह।

जैसे सीने में बंद खिड़की खुल गई हो।

उसने फोन रखा, माँ की सिलाई मशीन पर हाथ फेरा और बाहर आसमान की ओर देखा। न्याय ने सब कुछ ठीक नहीं किया था। दुनिया भी अचानक दयालु नहीं हो गई थी। डर पूरी तरह गायब नहीं हुआ था।

फिर भी नंदिनी मुस्कुराई।

क्योंकि 5 साल तक जिस हवेली में वह परछाईं बनकर जीती रही, वहाँ से निकलकर वह आखिर अपने घर लौट आई थी।

और इस बार कोई उसे आवाज़ देकर यह नहीं कहने वाला था कि मेहमानों को शराब परोस दो।

Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.