
PART 1
खाने की मेज पर बैठे-बैठे 61 वर्ष की सावित्री देवी के गाल पर उनके अपने बेटे ने ऐसा थप्पड़ मारा कि चांदी की कटोरी जमीन पर गिरकर घूमती रही, और उनकी बहू निधि हंसते हुए बोली—“अब समझ आया? यह घर मेरा है।”
लखनऊ के गोमती नगर में बने उस 2 मंजिला मकान की हर ईंट सावित्री देवी के संघर्ष की गवाह थी। उनके पति हरीश चंद्र लोक निर्माण विभाग में कनिष्ठ अभियंता थे। उनकी मृत्यु के बाद सावित्री ने अपनी चूड़ियां बेचीं, छोटी-सी पैतृक जमीन छोड़ी और पति की बचत जोड़कर वह मकान खरीदा था। लेकिन पिछले 3 वर्षों से उनका 39 वर्षीय बेटा रोहन उन्हें यही विश्वास दिला रहा था कि घर उसके नाम हो चुका है।
उस रात सावित्री ने रोहन की पसंद की अरहर की दाल, भरवां करेला और खीर बनाई थी। उन्हें उम्मीद थी कि घर का तनाव कुछ कम होगा। भोजन शुरू होते ही उन्होंने बस इतना कहा—
—रसोई की छत फिर टपक रही है। कल किसी कारीगर को बुला लेना।
रोहन ने शराब से लाल आंखें उठाईं।
—पैसे पेड़ पर उगते हैं क्या?
—मरम्मत जरूरी है, बेटा।
—तो अपनी पेंशन से करा लो। यहां मुफ्त में रहती हो, ऊपर से आदेश भी देती हो।
निधि ने होंठ दबाकर हंसी छिपाने का नाटक किया।
सावित्री का चेहरा अपमान से तप उठा।
—मुफ्त में? यह घर तुम्हारे पिता और मेरी मेहनत से बना है।
निधि ने कुर्सी पीछे खिसकाई।
—मांजी, कागज रोहन के पास हैं। अब पुरानी बातें दोहराने से मालिकाना हक नहीं बदलता।
सावित्री ने पहली बार उसकी आंखों में सीधे देखा।
—जिन कागजों की बात कर रही हो, उनका सच तुम्हें नहीं मालूम।
रोहन अचानक खड़ा हो गया।
—क्या कहा?
—यह घर आज भी मेरे नाम है। तुमने मुझे जिन कागजों पर हस्ताक्षर कराए थे, वे स्वामित्व हस्तांतरण के कागज नहीं थे।
रोहन का चेहरा विकृत हो गया। उसने मेज पर मुट्ठी मारी।
—बुढ़ापे में दिमाग खराब हो गया है तुम्हारा!
—मेरी उम्र हुई है, समझ नहीं मरी।
अगले ही क्षण उसका हाथ उठा।
पहले थप्पड़ के बाद सावित्री संभल भी नहीं पाईं कि रोहन ने उनका कंधा झकझोरकर उन्हें कुर्सी से नीचे गिरा दिया। निधि ने रोकने के बजाय अपना मोबाइल निकाल लिया।
—बनाओ चलचित्र—वह हंसते हुए बोली—कल कहेंगी कि हमने छुआ भी नहीं।
रोहन ने सावित्री की बांह मरोड़ी।
—सीख लो इस घर में किसकी चलती है।
सावित्री ने फटे होंठ से केवल इतना कहा—
—अगर मैं बोझ हूं तो वृद्धाश्रम भेज दो, लेकिन दोबारा हाथ मत उठाना।
रोहन ने उन्हें धक्का देकर छोड़ दिया।
रात भर सावित्री अपने कमरे में बैठी रहीं। बाहर निधि और रोहन हंसते हुए खीर खा रहे थे। उनके भीतर कुछ टूट नहीं रहा था; जो वर्षों से टूटा पड़ा था, वह पहली बार आकार ले रहा था—आत्मसम्मान।
आधी रात को उन्होंने अलमारी हटाई, दीवार में लगे पुराने लोहे के संदूक का ताला खोला और लाल कपड़े में लिपटी एक फाइल निकाली।
उसमें मकान की मूल रजिस्ट्री, बैंक की रसीदें और 8 महीने पहले तैयार कराया गया एक गोपनीय दस्तावेज था।
अगली सुबह रोहन और निधि कार्यालय चले गए। सावित्री ने चोटों पर दुपट्टा डाला, फाइल थैले में रखी और पुराने पारिवारिक अधिवक्ता महेंद्र त्रिपाठी के घर पहुंचीं।
महेंद्र ने उनके सूजे चेहरे को देखा तो उनकी आवाज कांप गई।
—यह किसने किया?
सावित्री ने रजिस्ट्री मेज पर रख दी।
—मेरे बेटे ने। अब मुझे यह मकान बेचना है।
महेंद्र ने दस्तावेज पढ़े, फिर वह गोपनीय कागज खोला। कुछ क्षण बाद उन्होंने चश्मा उतार दिया।
—रोहन को इसका पता नहीं है?
—नहीं।
—तो उसे अभी तक यह भी नहीं मालूम कि जिस दिन उसने तुम्हें घर से निकालने की योजना बनाई थी, उसी दिन तुमने उसकी पूरी चाल कानूनी रूप से खत्म कर दी थी।
PART 2
वह दस्तावेज रोहन के नाम बनाई गई सामान्य मुख्तारनामा-शक्ति को निरस्त करने की पंजीकृत सूचना थी। सावित्री ने 8 महीने पहले ही उसे रद्द करा दिया था, क्योंकि उन्हें बैंक से पता चला था कि रोहन मकान गिरवी रखने की कोशिश कर रहा है।
महेंद्र उन्हें अस्पताल ले गए। चोटों की चिकित्सकीय जांच हुई और महिला थाने में शिकायत दर्ज कराई गई। निधि के मोबाइल से बनाया गया चलचित्र स्वयं उनके विरुद्ध सबसे बड़ा प्रमाण बन सकता था।
उसी दोपहर महेंद्र ने सावित्री की मुलाकात एक सेवानिवृत्त शिक्षिका दंपति से कराई, जो कई महीनों से उसी क्षेत्र में घर खोज रहे थे। उचित मूल्य तय हुआ। अग्रिम राशि सावित्री के नए खाते में जमा हुई और पंजीकरण की तारीख 4 दिन बाद रखी गई।
सावित्री घर लौटीं, अपने कपड़े, पति की तस्वीर और जरूरी सामान लेकर बाहर निकल गईं। जाते समय उन्होंने मुख्य द्वार पर एक लिफाफा चिपका दिया।
शाम को रोहन ने उसे फाड़कर पढ़ा—
“यह घर कभी तुम्हारा नहीं था। 4 दिन बाद इसका नया मालिक होगा। और तुम्हारी पत्नी ने जो चलचित्र बनाया है, वही अब अदालत में बोलेगा।”
तभी पुलिस की गाड़ी दरवाजे पर आकर रुकी।
PART 3
पुलिस को देखते ही रोहन की सारी अकड़ गायब हो गई। कुछ क्षण पहले तक वह लिफाफा मुट्ठी में दबाकर सावित्री को गालियां दे रहा था, लेकिन महिला उपनिरीक्षक कविता सिंह के सामने उसकी आवाज धीमी पड़ गई।
—यह पारिवारिक मामला है, अधिकारी जी। मां को गलतफहमी हुई है।
कविता सिंह ने उसकी ओर बिना पलक झपकाए देखा।
—सूजे हुए चेहरे, फटे होंठ और बांह पर उंगलियों के नीले निशान को गलतफहमी नहीं कहते।
निधि तुरंत बीच में आई।
—मांजी खुद गिर गई थीं। उम्र हो गई है, संतुलन नहीं रहता।
महिला आरक्षी ने शांत स्वर में पूछा—
—तो फिर वह चलचित्र दिखाइए, जो आपने भोजन के समय बनाया था।
निधि का चेहरा सफेद पड़ गया।
—कौन-सा चलचित्र?
—वही, जिसमें आप कह रही हैं कि अब पता चलेगा इस घर में किसकी चलती है।
रोहन ने निधि की ओर ऐसा देखा जैसे पहली बार समझा हो कि उसका मजाक उनके विरुद्ध प्रमाण बन चुका था। निधि ने दावा किया कि उसने सब मिटा दिया है, लेकिन सावित्री ने रात में ही महेंद्र की मदद से अपने कमरे में लगे पुराने सुरक्षा कैमरे की स्मृति निकाल ली थी। पति की मृत्यु के बाद चोरी के डर से लगवाया गया वह कैमरा वर्षों से लगभग भुला दिया गया था। उसकी दिशा भोजन कक्ष के आधे हिस्से तक जाती थी।
उसमें थप्पड़ साफ दिखाई दे रहा था।
रोहन को उसी रात थाने ले जाया गया। सावित्री ने पुलिस से कोई झूठा आरोप नहीं लगाया। उन्होंने जितना हुआ था, उतना ही बताया। न कम, न अधिक। अस्पताल की रिपोर्ट, सुरक्षा कैमरे का दृश्य और पड़ोसियों के बयान पर्याप्त थे कि मामला केवल “घर की कहासुनी” कहकर दबाया न जा सके।
निधि रात भर घर में अकेली बैठी रही। अगले दिन उसने सावित्री को 27 बार फोन किया। कभी विनती की, कभी धमकाया, कभी रोई।
“मांजी, शिकायत वापस ले लीजिए।”
“लोग क्या कहेंगे?”
“रोहन की नौकरी चली जाएगी।”
“आपको अपने बेटे की जरा भी चिंता नहीं?”
सावित्री ने केवल एक संदेश भेजा—
“जिस रात वह मुझे मार रहा था, तब तुम्हें उसके भविष्य की चिंता क्यों नहीं हुई?”
उसके बाद उन्होंने मोबाइल बंद कर दिया।
महेंद्र ने उन्हें अपनी बहन सरोज के घर ठहराया। सरोज अयोध्या मार्ग के पास एक छोटे से घर में अकेली रहती थीं। उनके पति का देहांत 5 वर्ष पहले हो चुका था। बरामदे में तुलसी का चौरा था, दीवारों पर पुराने कैलेंडर और आंगन में अमरूद का पेड़। घर साधारण था, लेकिन वहां किसी के कदमों की आहट सुनकर सावित्री का शरीर नहीं कांपता था।
पहली रात सरोज ने उनके लिए हल्दी वाला दूध बनाया। सावित्री ने प्याला हाथ में लिया, पर पी नहीं पाईं।
—गलती मेरी है—उन्होंने फुसफुसाकर कहा—मैंने उसे हर बार बचाया। विद्यालय में किसी बच्चे को मारा तो कहा, बच्चा है। महाविद्यालय में कर्ज किया तो मैंने गहने बेच दिए। विवाह के बाद निधि ने मुझे नौकरानी की तरह रखा, तब भी सोचा नई बहू है, समय लगेगा। शायद मैंने ही उसे सिखाया कि मां कभी नहीं छोड़ेगी।
सरोज ने उनका हाथ पकड़ लिया।
—मां का प्रेम अपराध नहीं होता। लेकिन अपराध को प्रेम कहकर सहते रहना खुद के साथ अन्याय है।
4 दिन बाद पंजीकरण कार्यालय में सावित्री ने मकान बेचने के अंतिम दस्तावेजों पर हस्ताक्षर किए। खरीदार थे 67 वर्षीय प्रोफेसर देवेंद्र सक्सेना और उनकी पत्नी उमा। उनकी बेटी पास के अस्पताल में चिकित्सक थी और वे उसके निकट रहना चाहते थे।
उमा ने सावित्री के चेहरे पर बची सूजन देखी, लेकिन अनावश्यक प्रश्न नहीं किए।
—आप चाहें तो कुछ सामान ले जाने के लिए समय ले सकती हैं—उन्होंने कहा।
सावित्री ने पति की तस्वीर वाला छोटा थैला कसकर पकड़ा।
—जो मेरा था, वह मेरे साथ है। बाकी सामान से अधिक मुझे अपनी शांति चाहिए।
पंजीकरण पूरा होने के बाद राशि उनके नए बैंक खाते में पहुंच गई। सावित्री ने उसका एक हिस्सा सुरक्षित मासिक आय योजना में रखा। दूसरा हिस्सा उन्होंने बाराबंकी के पास एक छोटे घर के लिए अलग किया। तीसरे हिस्से से उन्होंने वृद्ध महिलाओं और घरेलू हिंसा से पीड़ित स्त्रियों के लिए काम करने वाले आश्रय “नई दिशा” को सहायता देने का निर्णय लिया।
महेंद्र ने पूछा—
—इतनी बड़ी राशि दान करने की क्या जरूरत है? पहले अपने भविष्य के बारे में सोचो।
सावित्री मुस्कराईं।
—इसीलिए तो दे रही हूं। जिस रात मैं बंद कमरे में बैठी थी, मेरे पास कागज थे, कुछ पैसे थे और आप जैसे व्यक्ति का सहारा था। बहुत-सी महिलाओं के पास इनमें से कुछ भी नहीं होता।
रोहन 2 दिन बाद जमानत पर बाहर आया। नौकरी में उसके विरुद्ध विभागीय जांच शुरू हो गई, क्योंकि वह एक निजी वित्तीय संस्था में शाखा प्रबंधक था और उस पर अपनी मां की संपत्ति के दस्तावेजों का दुरुपयोग कर ऋण लेने का प्रयास करने का संदेह भी सामने आया था।
जांच में पता चला कि उसने सावित्री की पुरानी पहचान-पत्र प्रतियों का उपयोग करके 42 लाख का ऋण लेने की प्रक्रिया शुरू की थी। उसका इरादा मकान गिरवी रखकर अपने असफल व्यापारिक निवेश का कर्ज चुकाने का था। निधि को सब पता था। वही सावित्री से दस्तावेज खोजने के लिए कई बार उनकी अलमारी खुलवाने की कोशिश कर चुकी थी।
रोहन को विश्वास था कि 2 वर्ष पहले सावित्री ने जिस कागज पर हस्ताक्षर किए थे, उससे उसे मकान बेचने और गिरवी रखने का अधिकार मिल गया है। वास्तव में वह सीमित मुख्तारनामा था, जो केवल नगर निगम में कर जमा करने और मरम्मत की अनुमति लेने तक सीमित था। फिर भी सावित्री को संदेह हुआ तो उन्होंने महेंद्र की सलाह पर उसे पंजीकृत रूप से निरस्त करा दिया था।
वही दस्तावेज उन्होंने लोहे के संदूक में छिपाकर रखा था।
मकान बिकने के 1 सप्ताह बाद सावित्री ने रोहन और निधि को कानूनी सूचना भिजवाई कि नए मालिकों को घर खाली सौंपना होगा। रोहन ने क्रोध में महेंद्र को फोन किया।
—मां को बहकाकर आपने संपत्ति बिकवा दी। मैं अदालत जाऊंगा।
महेंद्र ने शांत स्वर में उत्तर दिया—
—जाओ। साथ में वह ऋण आवेदन भी ले जाना, जिसमें तुमने खुद को संपत्ति का मालिक बताया है। अदालत को वह बहुत रुचिकर लगेगा।
रोहन ने फोन काट दिया।
निधि उसी रात अपना सामान लेकर मायके चली गई। जाते-जाते उसने रोहन को दोष दिया—
—तुमने कहा था घर पक्का तुम्हारा है। अब मैं किराए के कमरे में नहीं रहूंगी।
रोहन पहली बार समझा कि जिस स्त्री ने उसकी मां के अपमान पर हंसी थी, वह उसके साथ प्रेम के कारण नहीं, संपत्ति के भरोसे खड़ी थी।
नए मालिकों ने उन्हें 10 दिन का समय दिया। 10वें दिन रोहन 3 बक्सों, 2 बैग और पिता की पुरानी मोटरसाइकिल के साथ उस घर से निकला, जिसके दरवाजे पर वह वर्षों से स्वयं को मालिक कहता था। पड़ोसी खिड़कियों से देख रहे थे। वही पड़ोसी जिन्होंने कई रात सावित्री की दबाई हुई चीखें सुनी थीं, पर इसे “घर का मामला” मानकर चुप रहे थे।
उस दिन किसी ने उसका मजाक नहीं उड़ाया। लेकिन किसी ने उसके लिए दरवाजा भी नहीं खोला।
सावित्री बाराबंकी के बाहरी हिस्से में एक छोटी-सी एकमंजिला कोठरी खरीद चुकी थीं। सामने खुला आंगन था, किनारे 2 नींबू के पेड़ और पीछे इतनी जगह कि वह सब्जियां उगा सकें। घर की दीवारों पर सीलन थी, खिड़कियों के रंग उखड़े हुए थे, लेकिन चाबी केवल उनके हाथ में थी।
गृहप्रवेश के दिन सरोज ने आंगन में रंगोली बनाई। महेंद्र मिठाई लेकर आए। पड़ोस की 12 वर्षीय लड़की पिहू ने दरवाजे पर गेंदे की माला टांगी। सावित्री ने हवन या बड़ा समारोह नहीं रखा। उन्होंने बस पति की तस्वीर साफ कपड़े से पोंछकर बैठक की दीवार पर रखी और उसके सामने दीया जलाया।
—हरीश, इस बार घर छोटा है—उन्होंने धीमे से कहा—लेकिन डर से बड़ा है।
उस घर में उनकी पहली खरीद लाल किनारी वाले पर्दे नहीं, बल्कि नीले पर्दे थे। विवाह के बाद से रोहन और फिर निधि घर के रंग चुनते आए थे। सावित्री को हमेशा नीला रंग पसंद था, पर निधि कहती थी कि नीला घर को सस्ता दिखाता है।
उन्होंने नीली प्लेटें खरीदीं, नीले फूलों वाली चादर और एक आरामदायक लकड़ी की कुर्सी। छोटी-छोटी वस्तुएं उन्हें याद दिलाती थीं कि पसंद करना भी स्वतंत्रता का हिस्सा है।
कुछ सप्ताह बाद आंगन में एक घायल आवारा कुतिया आ गई। उसके पिछले पैर में चोट थी और शरीर मिट्टी से भरा था। सावित्री ने उसे रोटी और दूध दिया। कुतिया अगले दिन फिर आई, फिर उसके अगले दिन भी। सावित्री ने उसका नाम “गौरी” रखा।
गौरी रात को दरवाजे के पास सोती। किसी वाहन की आवाज आती तो पहले वह सिर उठाती, फिर सावित्री की ओर देखती। उसकी उपस्थिति से घर की खामोशी डरावनी नहीं, जीवित लगने लगी।
पर सावित्री के भीतर शांति अभी पूरी नहीं हुई थी। कई बार रात को नींद खुलती तो उन्हें लगता रोहन दरवाजा पीट रहा है। कोई ऊंची आवाज सुनते ही उनका हाथ अनायास गाल पर चला जाता। सरोज उन्हें मनोवैज्ञानिक परामर्श केंद्र ले गईं।
पहली बैठक में सावित्री ने कहा—
—दर्द तो थप्पड़ का था, लेकिन सबसे अधिक चोट इस बात की है कि वह मेरा बेटा था।
परामर्शदाता ने उत्तर दिया—
—रिश्ता चोट की गंभीरता कम नहीं करता। कभी-कभी वही उसे और गहरा बनाता है।
धीरे-धीरे सावित्री ने अपने अपराधबोध को पहचानना शुरू किया। वह समझीं कि उन्होंने घर बेचकर रोहन का जीवन नहीं बिगाड़ा था। रोहन ने अपने निर्णयों से अपना जीवन बिगाड़ा था। उन्होंने केवल अपनी संपत्ति और सुरक्षा वापस ली थी।
“नई दिशा” आश्रय में उनकी पहली यात्रा ने उन्हें भीतर तक बदल दिया। वहां 72 वर्षीय कमला थीं, जिनका बेटा उनकी पेंशन छीनकर उन्हें कमरे में बंद रखता था। 58 वर्षीय फरजाना थीं, जिन्हें उनके परिवार ने यह कहकर घर से निकाल दिया था कि विधवा होने के बाद संपत्ति में उनका कोई अधिकार नहीं। 65 वर्षीय लीला थीं, जिनकी बहू उनके भोजन में कटौती करती और उन्हें अतिथियों के सामने नौकरानी बताती थी।
कमला ने सावित्री के हाथ पर पड़े पुराने निशान देखे।
—आप भी बेटे के घर से आई हैं?
सावित्री ने सिर हिलाया।
—अपने घर से आई हूं। बेटा उसमें रहने लगा था और भूल गया था कि घर किसका है।
कमला की आंखों में पहली बार चमक आई।
उस दिन से सावित्री सप्ताह में 2 दिन आश्रय जाने लगीं। वह महिलाओं को बैंक खाते खुलवाने, पेंशन के कागज व्यवस्थित करने और संपत्ति के मूल दस्तावेज सुरक्षित रखने के लिए प्रेरित करतीं। महेंद्र महीने में 1 बार निःशुल्क कानूनी शिविर लगाने लगे।
सावित्री हर बैठक में लोहे के संदूक की कहानी सुनातीं।
—कागज केवल जमीन का प्रमाण नहीं था—वह कहतीं—वह इस बात का प्रमाण था कि मेरी जिंदगी पर मेरा अधिकार अभी खत्म नहीं हुआ।
उधर रोहन का जीवन तेजी से बिखर रहा था। वित्तीय संस्था ने उसे निलंबित कर दिया। निधि ने घरेलू सामान और संयुक्त खाते की बची राशि लेकर उससे अलग रहने का निर्णय किया। उसके व्यापारिक निवेश का कर्ज बढ़ता गया। कुछ मित्र, जो कभी उसके घर में बैठकर सावित्री के हाथ का भोजन खाते थे, उसके फोन उठाना बंद कर चुके थे।
1 शाम वह सावित्री के नए घर के बाहर आ खड़ा हुआ।
सावित्री आंगन में धनिया के पौधों में पानी दे रही थीं। गौरी ने उसे देखते ही भौंकना शुरू कर दिया। रोहन पहले से दुबला लग रहा था। दाढ़ी बढ़ी हुई, कमीज सिकुड़ी हुई और आंखों के नीचे काले घेरे थे।
—मां—उसने पुकारा।
सावित्री का हाथ रुक गया।
सरोज उस दिन वहीं थीं। वह तुरंत बाहर आईं।
—कहो तो पुलिस को फोन करूं?
सावित्री ने गहरी सांस ली।
—नहीं। इस बार वह दरवाजे के बाहर है और चाबी मेरे पास है।
वह फाटक तक गईं, मगर उसे खोला नहीं।
—क्यों आए हो?
रोहन की आंखें भर आईं।
—मेरे पास रहने की जगह नहीं है। निधि चली गई। नौकरी भी शायद नहीं बचेगी। मकान मालिक ने कमरा खाली करने को कहा है।
—तो काम खोजो। छोटा कमरा लो। जीवन फिर से शुरू करो।
—आप ऐसे कैसे कह सकती हैं? मैं आपका बेटा हूं।
सावित्री ने शांत स्वर में पूछा—
—क्या माफी मांगने आए हो?
रोहन चुप रहा।
—क्या यह कहने आए हो कि जो किया वह अपराध था?
उसने नजरें झुका लीं।
—मैं नशे में था। निधि मुझे भड़का रही थी।
—हाथ तुम्हारा था।
—मुझसे गलती हो गई।
—गलती चाय में चीनी अधिक डालना होती है। मां को पीटना निर्णय होता है।
रोहन का चेहरा कठोर होने लगा।
—तो आप चाहती क्या हैं? मैं सड़क पर मर जाऊं?
—मैं चाहती हूं कि तुम पहली बार अपने कर्मों का भार खुद उठाओ।
—आपने घर बेचकर मेरा सब कुछ छीन लिया।
—जिसे तुम अपना कह रहे हो, वह कभी तुम्हारा था ही नहीं।
—मैं मुकदमा करूंगा।
—करो। लेकिन अदालत में ऋण के झूठे कागज भी खुलेंगे और वह चलचित्र भी चलेगा जिसमें तुम मुझे मार रहे हो।
कुछ क्षण तक दोनों के बीच केवल गौरी के गुर्राने की आवाज रही।
रोहन ने दांत भींचे।
—आप बुरी मां हैं।
पहले यह वाक्य सावित्री को अंदर तक चीर देता। उस दिन उन्होंने केवल इतना कहा—
—और तुमने बुरा बेटा होना चुना। अंतर यह है कि मैंने तुम्हारे चुनाव की सजा भुगतना बंद कर दिया है।
रोहन मुड़कर चला गया।
उस रात सावित्री बहुत रोईं। इसलिए नहीं कि उन्होंने उसे अंदर नहीं आने दिया, बल्कि इसलिए कि वह पहली बार बिना किसी बहाने के अपने बेटे को वैसा देख रही थीं जैसा वह बन चुका था।
मां का हृदय दरवाजा बंद कर सकता है, स्मृतियां नहीं।
अगले कई महीनों तक रोहन ने संपर्क नहीं किया। न्यायालय ने उसे मां पर आक्रमण के मामले में परामर्श कार्यक्रम, सामुदायिक सेवा और सावित्री से दूर रहने का आदेश दिया। ऋण संबंधी जांच में उसे आर्थिक दंड भरना पड़ा। उसकी नौकरी चली गई, लेकिन कारावास से बचने के लिए उसे नियमित रूप से सुधार कार्यक्रम में भाग लेना पड़ा।
सावित्री ने किसी कठोरतम दंड की मांग नहीं की। उन्होंने केवल सुरक्षा और उत्तरदायित्व चाहा।
करीब 9 महीने बाद “नई दिशा” आश्रय ने वृद्ध महिलाओं के संपत्ति अधिकार पर एक सार्वजनिक कार्यक्रम आयोजित किया। सावित्री को मुख्य वक्ता बनाया गया। उन्होंने हल्की नीली साड़ी पहनी, बालों में चमेली लगाई और मंच पर पहुंचते समय उनके हाथ कांप रहे थे।
सामने 200 से अधिक स्त्रियां बैठी थीं।
उन्होंने अपनी कहानी बिना रोहन का नाम लिए सुनाई। भोजन की मेज, उठता हुआ हाथ, बहू की हंसी, लोहे का संदूक, रजिस्ट्री और वह छोटा घर—सब कुछ।
अंत में उन्होंने कहा—
—परिवार वह नहीं जो आपको चुप रहने के लिए मजबूर करे। परिवार वह है जो आपकी सुरक्षा करे। जिस दिन रिश्ते के नाम पर हिंसा शुरू हो जाए, उस दिन चुप्पी त्यागना परिवार तोड़ना नहीं, स्वयं को बचाना होता है।
पूरा सभागार खड़ा हो गया।
कार्यक्रम समाप्त होने के बाद सावित्री ने दरवाजे के पास रोहन को देखा। वह भीड़ से दूर खड़ा था। उसके हाथ में आश्रय का एक पत्रक था। वह पहले से शांत और संयमित दिखाई दे रहा था।
सरोज ने सावित्री की ओर प्रश्नभरी नजर से देखा।
सावित्री स्वयं उसके पास गईं।
—यहां क्यों आए हो?
रोहन ने कहा—
—सुधार केंद्र में आपके भाषण की सूचना मिली थी। सुनना चाहता था।
—सुना?
—हां।
उसने जेब से एक लिफाफा निकाला।
—यह कुछ पैसे हैं। बहुत नहीं। मैं अब एक गोदाम में लेखा-सहायक का काम करता हूं। हर महीने थोड़ा बचा रहा हूं।
सावित्री ने लिफाफा नहीं लिया।
—यह मुझे क्यों दे रहे हो?
—आपसे जो छीना, उसका हिसाब कभी पूरा नहीं होगा। फिर भी शुरुआत करना चाहता हूं।
—इसे आश्रय को दे दो।
रोहन ने सिर हिलाया।
—दे दूंगा।
कुछ क्षण बाद उसने कहा—
—मैंने पहले दिन आपका भाषण सुनते समय सोचा कि आपने मेरी बदनामी कर दी। फिर समझ आया कि बदनामी आपने नहीं, मैंने की थी। आपने केवल सच बताया।
सावित्री की आंखें नम हो गईं, लेकिन उनकी आवाज स्थिर रही।
—सच समझ लेना बदलाव नहीं होता। उसे रोज जीना पड़ता है।
—मैं कोशिश कर रहा हूं।
—अपने लिए करो। मेरे क्षमा करने के लिए नहीं।
रोहन ने पहली बार कोई बहाना नहीं बनाया।
—मैं जानता हूं कि शायद आप कभी मुझे माफ न करें।
—मैं अभी नहीं कर सकती।
—फिर भी क्या कभी दूर से आपका हाल पूछ सकता हूं?
सावित्री ने तुरंत उत्तर नहीं दिया।
—जब तक तुम सीमा समझते हो, संदेश भेज सकते हो। लेकिन मेरे घर की चाबी तुम्हें कभी नहीं मिलेगी।
रोहन की आंखों से आंसू बह निकले।
—ठीक है।
वह बिना गले मिले चला गया। सावित्री ने उसे रोका नहीं। हर घाव का अंत आलिंगन से नहीं होता। कुछ घाव तब भरते हैं जब पीड़ित व्यक्ति दूरी चुनता है और दोषी उस दूरी का सम्मान करना सीखता है।
2 वर्ष बाद सावित्री के 63वें जन्मदिन पर एक छोटा पार्सल आया। उसमें हरीश चंद्र की पुरानी जेब-घड़ी थी, जिसे सावित्री मकान छोड़ते समय ढूंढ़ नहीं पाई थीं। साथ में रोहन की लिखी पर्ची थी—
“पिता की अलमारी के पीछे मिली। यह आपकी थी और आपको ही लौटनी चाहिए। मैंने आश्रय में 12 महीने से नियमित सहायता भेजी है। क्षमा का अधिकार आपका है। बदलने की जिम्मेदारी मेरी।”
सावित्री ने घड़ी हथेली पर रखी और देर तक रोती रहीं।
गौरी उनके पैरों के पास बैठी थी। आंगन में नींबू पक चुके थे। नीले पर्दे हवा में हिल रहे थे। भीतर दीवार पर हरीश की तस्वीर के सामने दीपक जल रहा था।
सावित्री ने उस दिन समझा कि न्याय हमेशा ऊंची आवाजों, हथकड़ियों या सार्वजनिक अपमान के रूप में नहीं आता। कभी-कभी न्याय वह क्षण होता है जब 61 वर्ष की एक मां अपने सूजे चेहरे के साथ लोहे का संदूक खोलती है, अपने नाम की रजिस्ट्री उठाती है और निर्णय करती है कि रक्त का रिश्ता उसकी देह, संपत्ति और आत्मसम्मान पर अधिकार नहीं देता।
रोहन ने अपना जीवन दूर रहकर दोबारा बनाना शुरू किया।
सावित्री ने अपना जीवन स्वयं के निकट रहकर दोबारा बनाया।
अब वह हर नई स्त्री से केवल 3 बातें कहती थीं—
हिंसा को संस्कार मत कहो।
चुप्पी को त्याग मत समझो।
और किसी भी रिश्ते को यह अधिकार मत दो कि वह तुम्हें तुम्हारे ही घर, शरीर या जीवन में पराया बना दे।
क्योंकि मां होना सहते रहने की सजा नहीं है।
प्रेम का अर्थ अपमान स्वीकार करना नहीं है।
और अपनी शांति बचाने के लिए बंद किया गया दरवाजा परिवार के विरुद्ध विद्रोह नहीं, स्वयं के पक्ष में दिया गया सबसे साहसी निर्णय होता है।
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