
भाग 1:
जिस आदमी ने अपनी पत्नी के सपनों के लिए अपनी पुश्तैनी कोठी तक गिरवी रखने की मंजूरी दे दी थी, उसी आदमी ने अस्पताल के दरवाजे के बाहर खड़े होकर सुना कि उसकी पत्नी उसे सिर्फ “आखिरी सीढ़ी” कह रही थी।
अर्जुन वशिष्ठ के हाथ में रजनीगंधा और सफेद ऑर्किड का बड़ा गुलदस्ता था। दिल्ली के साकेत में बने एक महंगे निजी अस्पताल की तीसरी मंजिल पर वह कमरे नंबर 317 के बाहर खड़ा था। कमरे का दरवाजा आधा खुला था, अंदर से उसकी पत्नी रिया की धीमी लेकिन साफ आवाज आ रही थी।
—मैं अर्जुन से नफरत नहीं करती, मीरा। सच में नहीं। वह अच्छा आदमी है, जिम्मेदार है, परिवार जैसा है… लेकिन पति जैसा नहीं।
अर्जुन की उंगलियां गुलदस्ते की डंडी पर कस गईं।
अंदर मीरा थी, रिया की कॉलेज वाली सबसे करीबी दोस्त। उसकी आवाज में बेचैनी थी।
—रिया, अर्जुन ने तुम्हारे लिए बहुत कुछ किया है। उसने तुम्हारे कोर्स, तुम्हारी वेबसाइट, तुम्हारे फोटोशूट, सब कुछ के पैसे दिए। तुम्हारी इवेंट कंपनी उसी के दम पर शुरू हो रही है।
रिया हल्का सा हंसी।
—इसीलिए तो कह रही हूं, वह काम का आदमी है। मुझे अभी अर्जुन का अच्छा पति होना नहीं चाहिए। मुझे उसका सिबिल स्कोर, उसकी कोठी और उसका चुप रहना चाहिए।
कमरे के बाहर खड़े अर्जुन को लगा जैसे अस्पताल की सफेद दीवारें अचानक बहुत दूर चली गई हों। आवाजें धीमी नहीं हुईं, बल्कि और साफ सुनाई देने लगीं।
—बैंक की लिमिट पास हो चुकी है। बस कागज पूरे होने हैं। पैसा आते ही “रिया रॉयल वेडिंग्स” लॉन्च होगी। 1 साल में क्लाइंट बन जाएंगे, फिर मैं साफ निकल जाऊंगी। बिना तमाशे के।
मीरा ने फुसफुसाकर पूछा।
—और करण?
कुछ पल खामोशी रही। फिर रिया की आवाज नरम हो गई।
—करण हमेशा से मेरा था। कॉलेज में बात अधूरी रह गई थी। पिछले महीने जब उसने फिर मैसेज किया, लगा जैसे 8 साल रुके ही नहीं थे।
—लेकिन तुम शादीशुदा हो।
—अभी हूं।
अर्जुन ने दरवाजे पर दस्तक देने के लिए उठाया हुआ हाथ नीचे कर लिया।
वह 38 साल का था, गुरुग्राम की एक बड़ी लॉजिस्टिक्स कंपनी में ऑपरेशंस मैनेजर। रात के 2 बजे ट्रक अटक जाए तो वह फोन उठाता था। किसी कर्मचारी की मां अस्पताल में हो तो वह खुद शिफ्ट बदल देता था। मशीन खराब हो जाए, ड्राइवर गायब हो जाए, क्लाइंट चिल्लाए, अर्जुन बिना शोर किए रास्ता निकालता था।
घर में भी वही करता था।
रिया ने 3 साल पहले कहा था कि उसे बड़े लोगों की शादियां प्लान करनी हैं, राजस्थानी महल, गोवा बीच, फार्महाउस, डिजाइनर फूल, सेलिब्रिटी मेकअप, ड्रोन शूट, सब। अर्जुन ने कभी पूछा नहीं कि इससे उसे क्या मिलेगा। उसने ओवरटाइम किया, अपनी पुरानी बुलेट बेच दी, पिता की घड़ी तक गिरवी रखी, रिया के कोर्स की फीस भरी, महंगे लैपटॉप का ईएमआई दिया, वेबसाइट बनवाई, इंस्टाग्राम शूट करवाया और यहां तक कि रिया की 78,000 रुपये की डेंटल सर्जरी भी करवाई।
वह हिसाब नहीं रखता था।
क्योंकि उसे लगता था, घर में प्यार का हिसाब नहीं होता।
लेकिन आज उसी घर की नींव पर उसकी पत्नी ने अपना भागने का पुल बना लिया था।
जिस कोठी पर बैंक की लिमिट पास हुई थी, वह अर्जुन के दादाजी की थी। पुरानी दिल्ली के दरियागंज की तंग गली में बनी 2 मंजिला हवेली, जिसमें लकड़ी के बड़े दरवाजे, लाल पत्थर की सीढ़ियां, छोटा सा आंगन और तुलसी का चौरा था। शादी से 1 साल पहले वह कोठी अर्जुन के नाम आई थी। उसने उसे धीरे-धीरे सुधारा था। दीवारें पुतवाई थीं, पुरानी जालियां ठीक करवाई थीं, छत पर बारिश का पानी रोकने के लिए नई परत डलवाई थी।
रिया अक्सर कहती थी।
—यह घर एक दिन हमारे लिए बड़े दरवाजे खोलेगा।
अर्जुन समझता था कि वह भविष्य की बात कर रही है।
आज उसे समझ आया कि वह निकास की बात कर रही थी।
रिया अस्पताल में अपेंडिक्स की सर्जरी के बाद भर्ती थी। 2 रात पहले रसोई में उसे तेज दर्द उठा था। अर्जुन उसे खुद गाड़ी में डालकर अस्पताल लाया था। फॉर्म भरे, डॉक्टरों से बात की, पैसे जमा किए, पूरी रात प्लास्टिक की कुर्सी पर बैठा रहा। नर्सों ने जबरदस्ती घर भेजा, लेकिन वह सोया नहीं। सुबह 6 बजे ऑफिस का काम संभाला, दोपहर में बैंक से खबर मिली कि घर पर ओवरड्राफ्ट लिमिट मंजूर हो गई है, फिर वह फूल लेकर अस्पताल पहुंचा था।
उसे लगा था रिया खुशी से रो पड़ेगी।
दरवाजे के बाहर उसे लगा, वह खुद रो पड़ेगा।
पर उसने नहीं रोया।
अर्जुन धीरे से पीछे हटा। 1 कदम। फिर दूसरा। फिर वह लिफ्ट के पास वाली खाली कुर्सी पर बैठ गया। उसने गुलदस्ता बगल की सीट पर रखा। सामने लिफ्ट खुली, बंद हुई, फिर खुली। लोग आते-जाते रहे। किसी बच्चे ने रोते हुए अपनी मां का दुपट्टा पकड़ा। एक वार्ड बॉय ने दवा की ट्रॉली धकेली। एक डॉक्टर हंसते हुए फोन पर बात कर रहा था।
दुनिया चलती रही।
बस अर्जुन के भीतर कुछ रुक गया।
कुछ मिनट बाद उसने मोबाइल निकाला और अपने पुराने दोस्त तथा वकील समर बत्रा को मैसेज किया।
“कल मिलना है। बहुत जरूरी।”
फिर उसने फोन जेब में रखा, गुलदस्ता उठाया और कमरे की तरफ लौटा।
इस बार उसने दस्तक दी।
अंदर से रिया की आवाज आई।
—आ जाओ।
अर्जुन अंदर गया। उसके चेहरे पर इतनी शांत मुस्कान थी कि मीरा के चेहरे का रंग उड़ गया।
—कैसी हो, रिया?
रिया ने फूल देखे तो आंखें चमक उठीं।
—अर्जुन… ये मेरे पसंदीदा फूल हैं।
—मुझे याद है।
वह 2 घंटे उसके पास बैठा। तकिया ठीक किया। पानी दिया। दवा का समय लिखा। डॉक्टर से बात की। रिया ने उसका हाथ पकड़ा तो उसने हाथ नहीं छुड़ाया। वह मुस्कुराता रहा, जैसे कुछ सुना ही न हो।
लेकिन मीरा उसकी आंखों से बचती रही।
जाते-जाते अर्जुन ने मीरा की तरफ देखा। सिर्फ 1 पल के लिए। उस 1 पल में मीरा समझ गई कि दरवाजे के बाहर खड़ा आदमी बहरा नहीं था।
अगले दिन अर्जुन रिया को घर ले आया। उसने उसके लिए मूंग की खिचड़ी बनाई, दवाइयां साइड टेबल पर रखीं और कहा कि उसे ऑफिस जाना है।
लेकिन वह ऑफिस नहीं गया।
वह सीधे समर बत्रा के चैंबर पहुंचा।
समर ने पूरी बात सुनी। अर्जुन ने शब्द, ठहराव, नाम, सब याद रखकर बताए। जब वह चुप हुआ, समर ने फाइल बंद की और बहुत धीमे स्वर में कहा।
—अर्जुन, यह गुस्से में कही बात नहीं है। यह योजना है।
—मुझे पता है।
—बैंक की रकम निकली?
—अभी नहीं। सिर्फ मंजूरी मिली है।
—आज ही रोक दो।
अर्जुन ने सिर हिलाया।
समर ने पूछा।
—कोठी शादी से पहले तुम्हारे नाम आई थी?
—हां।
—रिया का नाम कहीं नहीं?
—नहीं।
—तो वह अलग संपत्ति है। वह उस पर दावा नहीं कर सकती। लेकिन अगर तुमने उसी पर लोन लेकर बिजनेस में पैसा डाला होता, तो मामला गंदा हो सकता था।
अर्जुन पहली बार हल्का सा सांस ले पाया।
लेकिन समर का चेहरा गंभीर रहा।
—अब भावुक होकर कुछ मत करना। अकाउंट स्टेटमेंट, ट्रांसफर, बिजनेस खर्च, होटल, चैट, कैलेंडर, सब जमा करो। अगर वह तुम्हें दोषी बनाकर कहानी तैयार कर रही है, तो सच को कागज पर लाना पड़ेगा।
उस रात से अर्जुन ने अपनी ही शादी की परतें खोलनी शुरू कीं।
रिया सो जाती, अर्जुन लैपटॉप खोलता। संयुक्त खाते से रिया के निजी खाते में छोटे-छोटे ट्रांसफर मिले। पहले 5,000, फिर 11,000, फिर 25,000। 30 महीनों में कुल रकम 9,40,000 रुपये के आसपास थी। कई खर्च “क्लाइंट मीटिंग” के नाम पर थे। कई कैब राइड्स ऐसे होटलों तक गई थीं जहां कोई वेडिंग वेंडर नहीं था।
फिर उसे नाम मिला।
करण मल्होत्रा।
मार्केटिंग कंसल्टेंट। रिया का पुराना कॉलेज साथी। वही करण, जिसके बारे में रिया ने शादी के बाद कभी जिक्र नहीं किया था।
समर ने 2 दिन में एक होटल बुकिंग की कॉपी निकलवाई। गुरुग्राम के 5 सितारा होटल में रिया वशिष्ठ और करण मल्होत्रा के नाम से 2 लोगों की बुकिंग थी।
1 कमरा।
अर्जुन ने प्रिंट निकाला। फाइल में लगाया।
उसने शोर नहीं किया।
क्योंकि अब दर्द से ज्यादा जरूरी था सच।
तीसरे दिन शाम को उसे एक अनजान नंबर से कॉल आया। आवाज कांप रही थी।
—जीजू… मैं अनन्या बोल रही हूं।
अनन्या रिया की छोटी बहन थी।
—हां, अनन्या?
—मुझे आपसे मिलना है। घर पर नहीं। मम्मी के सामने नहीं। कहीं बाहर।
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भाग 2:
अर्जुन और अनन्या की मुलाकात इंडिया गेट के पास एक शांत कैफे में हुई, जहां शाम की भीड़ के बीच भी दोनों की मेज पर अजीब सा सन्नाटा था। अनन्या की आंखें सूजी हुई थीं और हाथ लगातार कॉफी कप के किनारे रगड़ रहे थे। उसने बताया कि रिया ने अपनी मां की टैबलेट पर करण के साथ चैट खुली छोड़ दी थी। अनन्या पढ़ना नहीं चाहती थी, लेकिन स्क्रीन पर अर्जुन का नाम देखकर रुक गई। उन मैसेजों में रिया ने लिखा था कि अर्जुन “आखिरी कागजी रुकावट” है, बैंक का पैसा आते ही कंपनी शुरू करनी है, फिर सबको यह यकीन दिलाना है कि अर्जुन ने सालों तक उसे अकेला रखा, इसलिए वह मजबूरी में अलग हुई। सबसे ज्यादा चुभने वाली बात यह थी कि रिया की मां सविता और 2 मौसियां पहले से आधी कहानी सुन चुकी थीं। रिया ने घर-घर जाकर यह बीज बो दिया था कि अर्जुन बाहर से शांत लेकिन भीतर से ठंडा आदमी है, वह पत्नी को सपने नहीं देखने देता, सिर्फ अपने पुराने घर से चिपका है। अर्जुन को गुस्सा नहीं आया, क्योंकि अब उसे समझ आ रहा था कि यह विश्वासघात सिर्फ प्रेम का नहीं, प्रतिष्ठा का भी था। अनन्या ने रोते हुए कहा कि वह अपनी बहन से प्यार करती है, पर किसी अच्छे आदमी को जानबूझकर दोषी बनते नहीं देख सकती। उसी रात अर्जुन ने बैंक में लिखित आवेदन देकर पूरी लिमिट रद्द करवाई। 2 दिन बाद जब बैंक का पत्र घर आया, रिया की आवाज पहली बार कांपी। वह समझ गई कि जमीन उसके पैरों के नीचे से खिसक चुकी है। शनिवार रात अर्जुन ने डाइनिंग टेबल पर खाना लगाया, 2 प्लेटें रखीं और बीच में भूरे रंग की फाइल रख दी। रिया तैयार होकर नीचे आई थी, शायद मनाने, शायद रोने, शायद फिर झूठ बोलने। अर्जुन ने पहली शीट उसके सामने सरका दी। ट्रांसफर, होटल बुकिंग, कैलेंडर, करण का नाम, सब एक-एक कर सामने आ गया। फिर अर्जुन ने शांत स्वर में कहा कि अस्पताल के कमरे के बाहर वह सब सुन चुका है। रिया ने पहले इंकार किया, फिर रोई, फिर उसे अकेलापन, उपेक्षा और सपनों का बहाना सुनाया। तभी अर्जुन ने फाइल की आखिरी जेब से एक ऑडियो ट्रांसक्रिप्ट निकाली, जिसमें रिया की अपनी आवाज थी। वह आवाज कह रही थी कि अर्जुन कभी अपना बचाव नहीं करेगा। उसी पल रिया को पता चला कि इस बार चुप आदमी ने बोलने से पहले पूरा सच जमा कर लिया था।
भाग 3:
रिया की आंखें फाइल पर जमी रह गईं। कमरे में रखी पीतल की घड़ी की टिक-टिक इतनी साफ सुनाई दे रही थी जैसे हर सेकंड किसी रिश्ते की एक और परत काट रहा हो।
—तुमने मेरी जासूसी की?
अर्जुन ने उसकी तरफ देखा। उसकी आवाज में न गुस्सा था, न जीत।
—नहीं। मैंने अपनी बर्बादी की रसीदें इकट्ठी कीं।
रिया ने हंसने की कोशिश की, लेकिन हंसी गले में अटक गई।
—तुम इन कागजों से क्या साबित करोगे? शादी में लोग बातें करते हैं। गुस्से में कुछ भी बोल देते हैं।
अर्जुन ने अगली शीट सामने रखी।
—यह गुरुग्राम होटल की बुकिंग है। यह तुम्हारी कैब राइड है। यह उसी दिन का कार्ड खर्च है। यह वह दिन है जब तुमने मुझे कहा था कि तुम्हारी तबीयत खराब है और मैं रात 1 बजे तक ऑफिस में तुम्हारे लिए प्रोजेक्ट फाइल बना रहा था।
रिया ने नजरें फेर लीं।
—अर्जुन, तुम हमेशा काम में रहते थे। मुझे अकेलापन लगता था।
—इस फाइल के पेज 12 पर तुम्हारी जन्मदिन वाली उदयपुर यात्रा की बुकिंग है। मैंने 3 दिन की छुट्टी ली थी। तुमने कहा था माइग्रेन है। उसी शाम तुम करण के साथ गोल्फ कोर्स रोड के होटल में थीं।
रिया ने होंठ दबा लिए। उसका चेहरा अब आंसुओं से नहीं, डर से भीग रहा था।
—तुम क्या चाहते हो?
—3 बातें। पहली, समर बत्रा सोमवार को तलाक की याचिका दाखिल करेंगे। दूसरी, दरियागंज की कोठी मेरी अलग संपत्ति है, क्योंकि वह शादी से पहले मेरे नाम आई थी। तीसरी, बैंक की लिमिट रद्द हो चुकी है। उस घर पर कोई कर्ज नहीं चढ़ेगा।
रिया कुर्सी से उठी, जैसे किसी ने उसे धक्का दिया हो।
—तुम मुझे सड़क पर लाना चाहते हो?
—नहीं। मैं सिर्फ तुम्हें अपनी छाती पर चढ़कर सड़क पार नहीं करने दूंगा।
कुछ पल के लिए रिया वही खड़ी रही। फिर उसने अपना सबसे पुराना हथियार निकाला—आंसू, कांपती आवाज और आरोप।
—तुम इतने बेरहम कब हो गए? मैंने तुम्हें 7 साल दिए। तुम्हारे घर को घर बनाया। तुम्हारी मां की बरसी में पूरा इंतजाम किया। तुम्हारे रिश्तेदारों को संभाला। अब 1 गलती पर तुम मुझे फेंक दोगे?
अर्जुन की आंखें पहली बार भर आईं, लेकिन आवाज अब भी शांत रही।
—गलती वह होती है जो आदमी छिपाता है क्योंकि उसे शर्म आती है। योजना वह होती है जो आदमी दोहराता है क्योंकि उसे फायदा दिखता है। तुमने गलती नहीं की, रिया। तुमने योजना बनाई।
रिया चुप हो गई।
अर्जुन ने फाइल बंद कर दी।
—तुम्हारे पास 30 दिन हैं। सामान ले जाना। बाकी बात वकील से होगी।
रिया उस रात ऊपर कमरे में चली गई। दरवाजा जोर से बंद हुआ। अर्जुन डाइनिंग टेबल पर अकेला बैठा रहा। खाने की प्लेट ठंडी हो चुकी थी। उसने धीरे-धीरे खाना खत्म किया। अपनी प्लेट धोई। फिर रिया की प्लेट भी धोई।
यह सेवा नहीं थी।
यह विदाई थी।
लेकिन रिया इतनी आसानी से जाने वाली नहीं थी।
3 दिन बाद सविता ने अर्जुन को फोन किया। आवाज में वह कड़वाहट थी जो किसी मां को तब आती है जब बेटी पहले से कहानी लिख चुकी हो।
—कल शाम घर आना। परिवार बैठेगा। बात साफ होगी।
अर्जुन ने सिर्फ इतना कहा।
—ठीक है।
अगले दिन सविता के लाजपत नगर वाले घर में पूरा परिवार जमा था। मौसियां, मामा, 2 चचेरे भाई, अनन्या, मीरा और कुछ रिश्तेदार। बीच में रिया सफेद सूट पहनकर बैठी थी, माथे पर हल्का सा बैंडेज अभी भी था, जैसे बीमारी और बेचारगी को एक साथ मंच पर रख दिया गया हो।
सविता ने शुरुआत की।
—अर्जुन, हमने तुम्हें हमेशा बेटा माना। लेकिन अगर मेरी बेटी सालों से दुख झेल रही थी, तो हमें जानने का हक था।
अर्जुन ने कोई जवाब नहीं दिया।
रिया ने आंसू पोंछे।
—मैंने कभी तुमसे बहुत कुछ नहीं मांगा, अर्जुन। बस चाहती थी कि तुम मुझे समझो। मेरी अपनी पहचान हो। लेकिन तुम्हें मेरी मेहनत पर भरोसा नहीं था। तुम बस अपने घर, अपनी नौकरी और अपनी इज्जत से प्यार करते रहे।
एक मौसी बोली।
—आजकल लड़कियां सपने देखें तो मर्द डर जाते हैं।
दूसरी ने सिर हिलाया।
—और फिर उनको पागल, खर्चीली, धोखेबाज बोलते हैं।
अर्जुन ने सबको पूरा बोलने दिया। वह दीवार के पास रखी कुर्सी पर बैठा था। उसके हाथ में सिर्फ मोबाइल था।
मीरा एक कोने में बैठी थी, उसकी आंखें नीचे थीं। अनन्या बार-बार अपने नाखून चबा रही थी।
जब रिया ने आखिरी वाक्य बोला, तभी अर्जुन उठा।
—मैं यहां तुम्हें शर्मिंदा करने नहीं आया। लेकिन मैं अपनी चुप्पी को तुम्हारे झूठ की छत बनने भी नहीं दूंगा।
सविता ने गुस्से में कहा।
—सीधे बोलो।
अर्जुन ने मोबाइल खोला।
—सीधा ही बोलूंगा।
उसने 32 सेकंड की रिकॉर्डिंग चला दी। कमरे में रिया की अपनी आवाज गूंजी।
—क्रेडिट निकल जाए तो बाकी आसान है। अर्जुन कभी अपना बचाव नहीं करेगा। मम्मी को तो पहले ही लगने लगा है कि मैं सालों से दुखी हूं। करण कह रहा था बस थोड़ा और रुक जाओ।
रिकॉर्डिंग खत्म हुई तो कमरे में किसी ने सांस तक नहीं ली।
सविता का चेहरा जैसे पत्थर हो गया। मौसियों की नजरें जमीन पर टिक गईं। मीरा रो पड़ी। अनन्या ने आंखें बंद कर लीं।
रिया अचानक चिल्लाई।
—यह मेरी निजी बात थी!
अर्जुन ने मोबाइल बंद कर दिया।
—मेरा विवाह भी निजी था। उसे तुमने योजना बना दिया।
सविता ने धीमे से पूछा।
—करण कौन है?
रिया ने मां की तरफ देखा, लेकिन इस बार उसके पास शब्द नहीं थे।
अर्जुन ने फाइल से 3 कॉपी निकालीं और मेज पर रखीं।
—मैंने सिर्फ उतना लाया है जितना झूठ को रोकने के लिए काफी है। होटल बुकिंग, बैंक ट्रांसफर, बिजनेस खर्च। बाकी अदालत देखेगी।
एक चचेरा भाई, जो अब तक रिया के पक्ष में सिर हिला रहा था, धीरे से बोला।
—दीदी, यह सच है?
रिया ने कोई जवाब नहीं दिया।
कई बार खामोशी स्वीकारोक्ति से ज्यादा साफ होती है।
सविता के हाथ कांप रहे थे। वह कुर्सी पर बैठ गईं। अर्जुन ने उनकी तरफ देखा।
—आपने मुझे हमेशा इज्जत दी, इसलिए मैं यहां आया। लेकिन मैं उस घर में वापस नहीं जाऊंगा जहां मेरा भरोसा कर्ज की फाइल बन गया।
वह दरवाजे की तरफ बढ़ा।
पीछे से रिया की आवाज आई।
—अर्जुन, रुको। बात कर सकते हैं।
अर्जुन रुका नहीं।
—अब बात होगी, लेकिन कागज पर।
तलाक की प्रक्रिया उतनी लंबी नहीं चली जितनी रिया ने सोची थी। समर ने सभी दस्तावेज जमा किए। बैंक लिमिट रद्द होने के कारण घर सुरक्षित रहा। अदालत ने साफ माना कि दरियागंज की कोठी शादी से पहले मिली संपत्ति थी। संयुक्त खाते से हुए ट्रांसफर और छिपे खर्चों ने रिया की “आर्थिक उपेक्षा” वाली कहानी कमजोर कर दी।
करण पहले कुछ दिन रिया के साथ खड़ा रहा। फिर जब उसके 2 कॉर्पोरेट क्लाइंट्स ने उसके व्यवहार पर सवाल उठाए और मार्केटिंग सर्कल में बात फैलने लगी, वह धीरे-धीरे गायब हो गया। कॉल कम हुए, फिर बंद। मैसेज का जवाब देर से आने लगा, फिर सिर्फ “व्यस्त हूं” आने लगा।
रिया की इवेंट कंपनी कभी लॉन्च नहीं हुई।
जिस ब्रांड के लिए उसने 3 साल तक सुनहरे अक्षरों वाला लोगो बनवाया था, उसका इंस्टाग्राम पेज 11 पोस्ट के बाद बंद पड़ा रहा।
रिया वापस सविता के घर के गेस्ट रूम में रहने लगी। वह पूरी तरह खत्म नहीं हुई, पर पहली बार उसे यह देखना पड़ा कि उसका प्लान बुद्धि से नहीं, बेशर्मी से बना था। और बेशर्मी तब टूटती है जब सामने वाला आदमी रोकर नहीं, दस्तावेज लेकर खड़ा हो।
अर्जुन ने उसकी तबाही पर जश्न नहीं मनाया।
वह सिर्फ अपनी जिंदगी वापस लेने लगा।
दरियागंज की कोठी पहले बहुत खाली लगती थी। हर कमरे में रिया की पसंद की कोई न कोई चीज थी—क्रीम रंग के पर्दे, नकली मोमबत्तियां, महंगे फूलदान, दीवार पर वेडिंग थीम वाले फ्रेम। अर्जुन ने धीरे-धीरे सब हटाया। उसने आंगन में तुलसी के पास चमेली लगा दी। छत पर पुरानी चारपाई रखी। रसोई की दीवार नीले रंग से रंगवाई।
एक रविवार को स्टोर रूम साफ करते हुए उसे सूखे रजनीगंधा और ऑर्किड का वही अस्पताल वाला गुलदस्ता मिला। कागज भूरा हो चुका था, पंखुड़ियां बिखर रही थीं। वह काफी देर तक उसे देखता रहा।
फिर उसने उसे कूड़ेदान में नहीं फेंका।
वह उसे आंगन में ले गया, मिट्टी में दबा दिया।
उसे लगा, कुछ चीजें फेंकी नहीं जातीं। दफनाई जाती हैं, ताकि उनसे बदबू नहीं, सीख निकले।
कुछ महीनों बाद अनन्या उससे मिलने आई। हाथ में मिठाई का डिब्बा था।
—जीजू… नहीं, अर्जुन भैया कहूं?
अर्जुन हल्का सा मुस्कुराया।
—जो आसान लगे।
अनन्या की आंखें नम थीं।
—मम्मी आपसे मिलना चाहती हैं। माफी मांगने। कोई दबाव नहीं है।
अर्जुन ने काफी देर सोचने के बाद हामी भर दी।
सविता जब आईं तो उनके हाथ में घर का बना राजमा और चावल था। वह दरवाजे पर ही रुक गईं।
—मैं बेटी पर भरोसा कर बैठी। शायद इसलिए कि मां होने का मतलब कभी-कभी सच से डरना भी होता है।
अर्जुन ने दरवाजा पूरा खोल दिया।
—मैं भी भरोसा कर बैठा था। शायद इसलिए कि पति होने का मतलब कभी-कभी संकेत न देखना भी होता है।
वे आंगन में बैठे। अनन्या भी थी। किसी ने रिया की बुराई नहीं की। किसी ने यह नाटक भी नहीं किया कि सब ठीक है। बस 3 लोग बैठे, खाना खाया, और उस सच को जगह दी जिसने सबको चोट पहुंचाई थी।
1 साल बाद अर्जुन उसी लॉजिस्टिक्स कंपनी में था, लेकिन अब वह अपनी हर सांस किसी और के सपनों की ईएमआई में नहीं बदलता था। उसने कंपनी में एक छोटी योजना शुरू करवाई, जिसमें ड्राइवरों और वेयरहाउस कर्मचारियों के बच्चों को टेक्निकल कोर्स की फीस में मदद दी जाती थी।
उसने योजना का नाम रखा—“बिना कर्ज का सहारा।”
सहकर्मी नाम सुनकर हंसे।
अर्जुन भी हंसा।
क्योंकि अब उसे पता था कि सहायता और इस्तेमाल में फर्क होता है।
इसी योजना के सिलसिले में उसकी मुलाकात निशा माथुर से हुई, जो पुराने भवनों की मरम्मत और सामुदायिक लाइब्रेरी प्रोजेक्ट पर काम करने वाली आर्किटेक्ट थी। निशा को अर्जुन की कहानी नहीं पता थी। वह उसे किसी तलाकशुदा आदमी की तरह नहीं, एक व्यवस्थित और शांत इंसान की तरह देखती थी।
एक दिन दरियागंज की गलियों में सर्वे करते हुए उसने अर्जुन से कहा।
—आपकी कोठी के आंगन में एक लंबी मेज होनी चाहिए। ऐसी जगहें अकेले रहने के लिए नहीं बनतीं।
अर्जुन ने पहली बार किसी नए व्यक्ति की बात सुनकर डर महसूस नहीं किया।
उसे जल्दबाजी नहीं थी। अब वह जानता था कि हर मुस्कान घर नहीं होती और हर सपना साझेदारी नहीं। लेकिन यह भी सच था कि हर आने वाला इंसान लुटेरा नहीं होता। कुछ लोग सचमुच वजन बांटने आते हैं, वजन चढ़ाने नहीं।
उस शाम अर्जुन ने छत पर खड़े होकर नीचे आंगन देखा। चमेली की खुशबू आ रही थी। तुलसी के पास मिट्टी में दफनाए गए पुराने फूलों की जगह छोटी हरी कोंपलें निकली थीं।
उसे अस्पताल का वह दरवाजा याद आया। वह आधी खुली लकड़ी, हाथ में फूल, अंदर से आती पत्नी की आवाज, और वह शब्द—सीढ़ी।
कभी-कभी आदमी को तोड़ने वाली बात ही उसे जगाती है।
अर्जुन उस दिन टूटा नहीं था।
वह जाग गया था।
क्योंकि सुखांत हमेशा यह नहीं होता कि जिसने वादा किया था, वही अंत तक साथ रहे।
कभी-कभी सुखांत यह होता है कि आदमी अपना घर बचा ले, अपनी आवाज वापस पा ले, अपना नाम झूठ से छुड़ा ले और फिर बिना नफरत के आगे बढ़ जाए।
जब कोई तुम्हें सीढ़ी समझे, तो जरूरी नहीं कि तुम उसके पैरों के नीचे पड़े रहो।
तुम दरवाजा भी बन सकते हो।
एक जीवन बंद करने के लिए।
और दूसरा खोलने के लिए।
भाग 1:
जिस आदमी ने अपनी पत्नी के सपनों के लिए अपनी पुश्तैनी कोठी तक गिरवी रखने की मंजूरी दे दी थी, उसी आदमी ने अस्पताल के दरवाजे के बाहर खड़े होकर सुना कि उसकी पत्नी उसे सिर्फ “आखिरी सीढ़ी” कह रही थी।
अर्जुन वशिष्ठ के हाथ में रजनीगंधा और सफेद ऑर्किड का बड़ा गुलदस्ता था। दिल्ली के साकेत में बने एक महंगे निजी अस्पताल की तीसरी मंजिल पर वह कमरे नंबर 317 के बाहर खड़ा था। कमरे का दरवाजा आधा खुला था, अंदर से उसकी पत्नी रिया की धीमी लेकिन साफ आवाज आ रही थी।
—मैं अर्जुन से नफरत नहीं करती, मीरा। सच में नहीं। वह अच्छा आदमी है, जिम्मेदार है, परिवार जैसा है… लेकिन पति जैसा नहीं।
अर्जुन की उंगलियां गुलदस्ते की डंडी पर कस गईं।
अंदर मीरा थी, रिया की कॉलेज वाली सबसे करीबी दोस्त। उसकी आवाज में बेचैनी थी।
—रिया, अर्जुन ने तुम्हारे लिए बहुत कुछ किया है। उसने तुम्हारे कोर्स, तुम्हारी वेबसाइट, तुम्हारे फोटोशूट, सब कुछ के पैसे दिए। तुम्हारी इवेंट कंपनी उसी के दम पर शुरू हो रही है।
रिया हल्का सा हंसी।
—इसीलिए तो कह रही हूं, वह काम का आदमी है। मुझे अभी अर्जुन का अच्छा पति होना नहीं चाहिए। मुझे उसका सिबिल स्कोर, उसकी कोठी और उसका चुप रहना चाहिए।
कमरे के बाहर खड़े अर्जुन को लगा जैसे अस्पताल की सफेद दीवारें अचानक बहुत दूर चली गई हों। आवाजें धीमी नहीं हुईं, बल्कि और साफ सुनाई देने लगीं।
—बैंक की लिमिट पास हो चुकी है। बस कागज पूरे होने हैं। पैसा आते ही “रिया रॉयल वेडिंग्स” लॉन्च होगी। 1 साल में क्लाइंट बन जाएंगे, फिर मैं साफ निकल जाऊंगी। बिना तमाशे के।
मीरा ने फुसफुसाकर पूछा।
—और करण?
कुछ पल खामोशी रही। फिर रिया की आवाज नरम हो गई।
—करण हमेशा से मेरा था। कॉलेज में बात अधूरी रह गई थी। पिछले महीने जब उसने फिर मैसेज किया, लगा जैसे 8 साल रुके ही नहीं थे।
—लेकिन तुम शादीशुदा हो।
—अभी हूं।
अर्जुन ने दरवाजे पर दस्तक देने के लिए उठाया हुआ हाथ नीचे कर लिया।
वह 38 साल का था, गुरुग्राम की एक बड़ी लॉजिस्टिक्स कंपनी में ऑपरेशंस मैनेजर। रात के 2 बजे ट्रक अटक जाए तो वह फोन उठाता था। किसी कर्मचारी की मां अस्पताल में हो तो वह खुद शिफ्ट बदल देता था। मशीन खराब हो जाए, ड्राइवर गायब हो जाए, क्लाइंट चिल्लाए, अर्जुन बिना शोर किए रास्ता निकालता था।
घर में भी वही करता था।
रिया ने 3 साल पहले कहा था कि उसे बड़े लोगों की शादियां प्लान करनी हैं, राजस्थानी महल, गोवा बीच, फार्महाउस, डिजाइनर फूल, सेलिब्रिटी मेकअप, ड्रोन शूट, सब। अर्जुन ने कभी पूछा नहीं कि इससे उसे क्या मिलेगा। उसने ओवरटाइम किया, अपनी पुरानी बुलेट बेच दी, पिता की घड़ी तक गिरवी रखी, रिया के कोर्स की फीस भरी, महंगे लैपटॉप का ईएमआई दिया, वेबसाइट बनवाई, इंस्टाग्राम शूट करवाया और यहां तक कि रिया की 78,000 रुपये की डेंटल सर्जरी भी करवाई।
वह हिसाब नहीं रखता था।
क्योंकि उसे लगता था, घर में प्यार का हिसाब नहीं होता।
लेकिन आज उसी घर की नींव पर उसकी पत्नी ने अपना भागने का पुल बना लिया था।
जिस कोठी पर बैंक की लिमिट पास हुई थी, वह अर्जुन के दादाजी की थी। पुरानी दिल्ली के दरियागंज की तंग गली में बनी 2 मंजिला हवेली, जिसमें लकड़ी के बड़े दरवाजे, लाल पत्थर की सीढ़ियां, छोटा सा आंगन और तुलसी का चौरा था। शादी से 1 साल पहले वह कोठी अर्जुन के नाम आई थी। उसने उसे धीरे-धीरे सुधारा था। दीवारें पुतवाई थीं, पुरानी जालियां ठीक करवाई थीं, छत पर बारिश का पानी रोकने के लिए नई परत डलवाई थी।
रिया अक्सर कहती थी।
—यह घर एक दिन हमारे लिए बड़े दरवाजे खोलेगा।
अर्जुन समझता था कि वह भविष्य की बात कर रही है।
आज उसे समझ आया कि वह निकास की बात कर रही थी।
रिया अस्पताल में अपेंडिक्स की सर्जरी के बाद भर्ती थी। 2 रात पहले रसोई में उसे तेज दर्द उठा था। अर्जुन उसे खुद गाड़ी में डालकर अस्पताल लाया था। फॉर्म भरे, डॉक्टरों से बात की, पैसे जमा किए, पूरी रात प्लास्टिक की कुर्सी पर बैठा रहा। नर्सों ने जबरदस्ती घर भेजा, लेकिन वह सोया नहीं। सुबह 6 बजे ऑफिस का काम संभाला, दोपहर में बैंक से खबर मिली कि घर पर ओवरड्राफ्ट लिमिट मंजूर हो गई है, फिर वह फूल लेकर अस्पताल पहुंचा था।
उसे लगा था रिया खुशी से रो पड़ेगी।
दरवाजे के बाहर उसे लगा, वह खुद रो पड़ेगा।
पर उसने नहीं रोया।
अर्जुन धीरे से पीछे हटा। 1 कदम। फिर दूसरा। फिर वह लिफ्ट के पास वाली खाली कुर्सी पर बैठ गया। उसने गुलदस्ता बगल की सीट पर रखा। सामने लिफ्ट खुली, बंद हुई, फिर खुली। लोग आते-जाते रहे। किसी बच्चे ने रोते हुए अपनी मां का दुपट्टा पकड़ा। एक वार्ड बॉय ने दवा की ट्रॉली धकेली। एक डॉक्टर हंसते हुए फोन पर बात कर रहा था।
दुनिया चलती रही।
बस अर्जुन के भीतर कुछ रुक गया।
कुछ मिनट बाद उसने मोबाइल निकाला और अपने पुराने दोस्त तथा वकील समर बत्रा को मैसेज किया।
“कल मिलना है। बहुत जरूरी।”
फिर उसने फोन जेब में रखा, गुलदस्ता उठाया और कमरे की तरफ लौटा।
इस बार उसने दस्तक दी।
अंदर से रिया की आवाज आई।
—आ जाओ।
अर्जुन अंदर गया। उसके चेहरे पर इतनी शांत मुस्कान थी कि मीरा के चेहरे का रंग उड़ गया।
—कैसी हो, रिया?
रिया ने फूल देखे तो आंखें चमक उठीं।
—अर्जुन… ये मेरे पसंदीदा फूल हैं।
—मुझे याद है।
वह 2 घंटे उसके पास बैठा। तकिया ठीक किया। पानी दिया। दवा का समय लिखा। डॉक्टर से बात की। रिया ने उसका हाथ पकड़ा तो उसने हाथ नहीं छुड़ाया। वह मुस्कुराता रहा, जैसे कुछ सुना ही न हो।
लेकिन मीरा उसकी आंखों से बचती रही।
जाते-जाते अर्जुन ने मीरा की तरफ देखा। सिर्फ 1 पल के लिए। उस 1 पल में मीरा समझ गई कि दरवाजे के बाहर खड़ा आदमी बहरा नहीं था।
अगले दिन अर्जुन रिया को घर ले आया। उसने उसके लिए मूंग की खिचड़ी बनाई, दवाइयां साइड टेबल पर रखीं और कहा कि उसे ऑफिस जाना है।
लेकिन वह ऑफिस नहीं गया।
वह सीधे समर बत्रा के चैंबर पहुंचा।
समर ने पूरी बात सुनी। अर्जुन ने शब्द, ठहराव, नाम, सब याद रखकर बताए। जब वह चुप हुआ, समर ने फाइल बंद की और बहुत धीमे स्वर में कहा।
—अर्जुन, यह गुस्से में कही बात नहीं है। यह योजना है।
—मुझे पता है।
—बैंक की रकम निकली?
—अभी नहीं। सिर्फ मंजूरी मिली है।
—आज ही रोक दो।
अर्जुन ने सिर हिलाया।
समर ने पूछा।
—कोठी शादी से पहले तुम्हारे नाम आई थी?
—हां।
—रिया का नाम कहीं नहीं?
—नहीं।
—तो वह अलग संपत्ति है। वह उस पर दावा नहीं कर सकती। लेकिन अगर तुमने उसी पर लोन लेकर बिजनेस में पैसा डाला होता, तो मामला गंदा हो सकता था।
अर्जुन पहली बार हल्का सा सांस ले पाया।
लेकिन समर का चेहरा गंभीर रहा।
—अब भावुक होकर कुछ मत करना। अकाउंट स्टेटमेंट, ट्रांसफर, बिजनेस खर्च, होटल, चैट, कैलेंडर, सब जमा करो। अगर वह तुम्हें दोषी बनाकर कहानी तैयार कर रही है, तो सच को कागज पर लाना पड़ेगा।
उस रात से अर्जुन ने अपनी ही शादी की परतें खोलनी शुरू कीं।
रिया सो जाती, अर्जुन लैपटॉप खोलता। संयुक्त खाते से रिया के निजी खाते में छोटे-छोटे ट्रांसफर मिले। पहले 5,000, फिर 11,000, फिर 25,000। 30 महीनों में कुल रकम 9,40,000 रुपये के आसपास थी। कई खर्च “क्लाइंट मीटिंग” के नाम पर थे। कई कैब राइड्स ऐसे होटलों तक गई थीं जहां कोई वेडिंग वेंडर नहीं था।
फिर उसे नाम मिला।
करण मल्होत्रा।
मार्केटिंग कंसल्टेंट। रिया का पुराना कॉलेज साथी। वही करण, जिसके बारे में रिया ने शादी के बाद कभी जिक्र नहीं किया था।
समर ने 2 दिन में एक होटल बुकिंग की कॉपी निकलवाई। गुरुग्राम के 5 सितारा होटल में रिया वशिष्ठ और करण मल्होत्रा के नाम से 2 लोगों की बुकिंग थी।
1 कमरा।
अर्जुन ने प्रिंट निकाला। फाइल में लगाया।
उसने शोर नहीं किया।
क्योंकि अब दर्द से ज्यादा जरूरी था सच।
तीसरे दिन शाम को उसे एक अनजान नंबर से कॉल आया। आवाज कांप रही थी।
—जीजू… मैं अनन्या बोल रही हूं।
अनन्या रिया की छोटी बहन थी।
—हां, अनन्या?
—मुझे आपसे मिलना है। घर पर नहीं। मम्मी के सामने नहीं। कहीं बाहर।
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भाग 2:
अर्जुन और अनन्या की मुलाकात इंडिया गेट के पास एक शांत कैफे में हुई, जहां शाम की भीड़ के बीच भी दोनों की मेज पर अजीब सा सन्नाटा था। अनन्या की आंखें सूजी हुई थीं और हाथ लगातार कॉफी कप के किनारे रगड़ रहे थे। उसने बताया कि रिया ने अपनी मां की टैबलेट पर करण के साथ चैट खुली छोड़ दी थी। अनन्या पढ़ना नहीं चाहती थी, लेकिन स्क्रीन पर अर्जुन का नाम देखकर रुक गई। उन मैसेजों में रिया ने लिखा था कि अर्जुन “आखिरी कागजी रुकावट” है, बैंक का पैसा आते ही कंपनी शुरू करनी है, फिर सबको यह यकीन दिलाना है कि अर्जुन ने सालों तक उसे अकेला रखा, इसलिए वह मजबूरी में अलग हुई। सबसे ज्यादा चुभने वाली बात यह थी कि रिया की मां सविता और 2 मौसियां पहले से आधी कहानी सुन चुकी थीं। रिया ने घर-घर जाकर यह बीज बो दिया था कि अर्जुन बाहर से शांत लेकिन भीतर से ठंडा आदमी है, वह पत्नी को सपने नहीं देखने देता, सिर्फ अपने पुराने घर से चिपका है। अर्जुन को गुस्सा नहीं आया, क्योंकि अब उसे समझ आ रहा था कि यह विश्वासघात सिर्फ प्रेम का नहीं, प्रतिष्ठा का भी था। अनन्या ने रोते हुए कहा कि वह अपनी बहन से प्यार करती है, पर किसी अच्छे आदमी को जानबूझकर दोषी बनते नहीं देख सकती। उसी रात अर्जुन ने बैंक में लिखित आवेदन देकर पूरी लिमिट रद्द करवाई। 2 दिन बाद जब बैंक का पत्र घर आया, रिया की आवाज पहली बार कांपी। वह समझ गई कि जमीन उसके पैरों के नीचे से खिसक चुकी है। शनिवार रात अर्जुन ने डाइनिंग टेबल पर खाना लगाया, 2 प्लेटें रखीं और बीच में भूरे रंग की फाइल रख दी। रिया तैयार होकर नीचे आई थी, शायद मनाने, शायद रोने, शायद फिर झूठ बोलने। अर्जुन ने पहली शीट उसके सामने सरका दी। ट्रांसफर, होटल बुकिंग, कैलेंडर, करण का नाम, सब एक-एक कर सामने आ गया। फिर अर्जुन ने शांत स्वर में कहा कि अस्पताल के कमरे के बाहर वह सब सुन चुका है। रिया ने पहले इंकार किया, फिर रोई, फिर उसे अकेलापन, उपेक्षा और सपनों का बहाना सुनाया। तभी अर्जुन ने फाइल की आखिरी जेब से एक ऑडियो ट्रांसक्रिप्ट निकाली, जिसमें रिया की अपनी आवाज थी। वह आवाज कह रही थी कि अर्जुन कभी अपना बचाव नहीं करेगा। उसी पल रिया को पता चला कि इस बार चुप आदमी ने बोलने से पहले पूरा सच जमा कर लिया था।
भाग 3:
रिया की आंखें फाइल पर जमी रह गईं। कमरे में रखी पीतल की घड़ी की टिक-टिक इतनी साफ सुनाई दे रही थी जैसे हर सेकंड किसी रिश्ते की एक और परत काट रहा हो।
—तुमने मेरी जासूसी की?
अर्जुन ने उसकी तरफ देखा। उसकी आवाज में न गुस्सा था, न जीत।
—नहीं। मैंने अपनी बर्बादी की रसीदें इकट्ठी कीं।
रिया ने हंसने की कोशिश की, लेकिन हंसी गले में अटक गई।
—तुम इन कागजों से क्या साबित करोगे? शादी में लोग बातें करते हैं। गुस्से में कुछ भी बोल देते हैं।
अर्जुन ने अगली शीट सामने रखी।
—यह गुरुग्राम होटल की बुकिंग है। यह तुम्हारी कैब राइड है। यह उसी दिन का कार्ड खर्च है। यह वह दिन है जब तुमने मुझे कहा था कि तुम्हारी तबीयत खराब है और मैं रात 1 बजे तक ऑफिस में तुम्हारे लिए प्रोजेक्ट फाइल बना रहा था।
रिया ने नजरें फेर लीं।
—अर्जुन, तुम हमेशा काम में रहते थे। मुझे अकेलापन लगता था।
—इस फाइल के पेज 12 पर तुम्हारी जन्मदिन वाली उदयपुर यात्रा की बुकिंग है। मैंने 3 दिन की छुट्टी ली थी। तुमने कहा था माइग्रेन है। उसी शाम तुम करण के साथ गोल्फ कोर्स रोड के होटल में थीं।
रिया ने होंठ दबा लिए। उसका चेहरा अब आंसुओं से नहीं, डर से भीग रहा था।
—तुम क्या चाहते हो?
—3 बातें। पहली, समर बत्रा सोमवार को तलाक की याचिका दाखिल करेंगे। दूसरी, दरियागंज की कोठी मेरी अलग संपत्ति है, क्योंकि वह शादी से पहले मेरे नाम आई थी। तीसरी, बैंक की लिमिट रद्द हो चुकी है। उस घर पर कोई कर्ज नहीं चढ़ेगा।
रिया कुर्सी से उठी, जैसे किसी ने उसे धक्का दिया हो।
—तुम मुझे सड़क पर लाना चाहते हो?
—नहीं। मैं सिर्फ तुम्हें अपनी छाती पर चढ़कर सड़क पार नहीं करने दूंगा।
कुछ पल के लिए रिया वही खड़ी रही। फिर उसने अपना सबसे पुराना हथियार निकाला—आंसू, कांपती आवाज और आरोप।
—तुम इतने बेरहम कब हो गए? मैंने तुम्हें 7 साल दिए। तुम्हारे घर को घर बनाया। तुम्हारी मां की बरसी में पूरा इंतजाम किया। तुम्हारे रिश्तेदारों को संभाला। अब 1 गलती पर तुम मुझे फेंक दोगे?
अर्जुन की आंखें पहली बार भर आईं, लेकिन आवाज अब भी शांत रही।
—गलती वह होती है जो आदमी छिपाता है क्योंकि उसे शर्म आती है। योजना वह होती है जो आदमी दोहराता है क्योंकि उसे फायदा दिखता है। तुमने गलती नहीं की, रिया। तुमने योजना बनाई।
रिया चुप हो गई।
अर्जुन ने फाइल बंद कर दी।
—तुम्हारे पास 30 दिन हैं। सामान ले जाना। बाकी बात वकील से होगी।
रिया उस रात ऊपर कमरे में चली गई। दरवाजा जोर से बंद हुआ। अर्जुन डाइनिंग टेबल पर अकेला बैठा रहा। खाने की प्लेट ठंडी हो चुकी थी। उसने धीरे-धीरे खाना खत्म किया। अपनी प्लेट धोई। फिर रिया की प्लेट भी धोई।
यह सेवा नहीं थी।
यह विदाई थी।
लेकिन रिया इतनी आसानी से जाने वाली नहीं थी।
3 दिन बाद सविता ने अर्जुन को फोन किया। आवाज में वह कड़वाहट थी जो किसी मां को तब आती है जब बेटी पहले से कहानी लिख चुकी हो।
—कल शाम घर आना। परिवार बैठेगा। बात साफ होगी।
अर्जुन ने सिर्फ इतना कहा।
—ठीक है।
अगले दिन सविता के लाजपत नगर वाले घर में पूरा परिवार जमा था। मौसियां, मामा, 2 चचेरे भाई, अनन्या, मीरा और कुछ रिश्तेदार। बीच में रिया सफेद सूट पहनकर बैठी थी, माथे पर हल्का सा बैंडेज अभी भी था, जैसे बीमारी और बेचारगी को एक साथ मंच पर रख दिया गया हो।
सविता ने शुरुआत की।
—अर्जुन, हमने तुम्हें हमेशा बेटा माना। लेकिन अगर मेरी बेटी सालों से दुख झेल रही थी, तो हमें जानने का हक था।
अर्जुन ने कोई जवाब नहीं दिया।
रिया ने आंसू पोंछे।
—मैंने कभी तुमसे बहुत कुछ नहीं मांगा, अर्जुन। बस चाहती थी कि तुम मुझे समझो। मेरी अपनी पहचान हो। लेकिन तुम्हें मेरी मेहनत पर भरोसा नहीं था। तुम बस अपने घर, अपनी नौकरी और अपनी इज्जत से प्यार करते रहे।
एक मौसी बोली।
—आजकल लड़कियां सपने देखें तो मर्द डर जाते हैं।
दूसरी ने सिर हिलाया।
—और फिर उनको पागल, खर्चीली, धोखेबाज बोलते हैं।
अर्जुन ने सबको पूरा बोलने दिया। वह दीवार के पास रखी कुर्सी पर बैठा था। उसके हाथ में सिर्फ मोबाइल था।
मीरा एक कोने में बैठी थी, उसकी आंखें नीचे थीं। अनन्या बार-बार अपने नाखून चबा रही थी।
जब रिया ने आखिरी वाक्य बोला, तभी अर्जुन उठा।
—मैं यहां तुम्हें शर्मिंदा करने नहीं आया। लेकिन मैं अपनी चुप्पी को तुम्हारे झूठ की छत बनने भी नहीं दूंगा।
सविता ने गुस्से में कहा।
—सीधे बोलो।
अर्जुन ने मोबाइल खोला।
—सीधा ही बोलूंगा।
उसने 32 सेकंड की रिकॉर्डिंग चला दी। कमरे में रिया की अपनी आवाज गूंजी।
—क्रेडिट निकल जाए तो बाकी आसान है। अर्जुन कभी अपना बचाव नहीं करेगा। मम्मी को तो पहले ही लगने लगा है कि मैं सालों से दुखी हूं। करण कह रहा था बस थोड़ा और रुक जाओ।
रिकॉर्डिंग खत्म हुई तो कमरे में किसी ने सांस तक नहीं ली।
सविता का चेहरा जैसे पत्थर हो गया। मौसियों की नजरें जमीन पर टिक गईं। मीरा रो पड़ी। अनन्या ने आंखें बंद कर लीं।
रिया अचानक चिल्लाई।
—यह मेरी निजी बात थी!
अर्जुन ने मोबाइल बंद कर दिया।
—मेरा विवाह भी निजी था। उसे तुमने योजना बना दिया।
सविता ने धीमे से पूछा।
—करण कौन है?
रिया ने मां की तरफ देखा, लेकिन इस बार उसके पास शब्द नहीं थे।
अर्जुन ने फाइल से 3 कॉपी निकालीं और मेज पर रखीं।
—मैंने सिर्फ उतना लाया है जितना झूठ को रोकने के लिए काफी है। होटल बुकिंग, बैंक ट्रांसफर, बिजनेस खर्च। बाकी अदालत देखेगी।
एक चचेरा भाई, जो अब तक रिया के पक्ष में सिर हिला रहा था, धीरे से बोला।
—दीदी, यह सच है?
रिया ने कोई जवाब नहीं दिया।
कई बार खामोशी स्वीकारोक्ति से ज्यादा साफ होती है।
सविता के हाथ कांप रहे थे। वह कुर्सी पर बैठ गईं। अर्जुन ने उनकी तरफ देखा।
—आपने मुझे हमेशा इज्जत दी, इसलिए मैं यहां आया। लेकिन मैं उस घर में वापस नहीं जाऊंगा जहां मेरा भरोसा कर्ज की फाइल बन गया।
वह दरवाजे की तरफ बढ़ा।
पीछे से रिया की आवाज आई।
—अर्जुन, रुको। बात कर सकते हैं।
अर्जुन रुका नहीं।
—अब बात होगी, लेकिन कागज पर।
तलाक की प्रक्रिया उतनी लंबी नहीं चली जितनी रिया ने सोची थी। समर ने सभी दस्तावेज जमा किए। बैंक लिमिट रद्द होने के कारण घर सुरक्षित रहा। अदालत ने साफ माना कि दरियागंज की कोठी शादी से पहले मिली संपत्ति थी। संयुक्त खाते से हुए ट्रांसफर और छिपे खर्चों ने रिया की “आर्थिक उपेक्षा” वाली कहानी कमजोर कर दी।
करण पहले कुछ दिन रिया के साथ खड़ा रहा। फिर जब उसके 2 कॉर्पोरेट क्लाइंट्स ने उसके व्यवहार पर सवाल उठाए और मार्केटिंग सर्कल में बात फैलने लगी, वह धीरे-धीरे गायब हो गया। कॉल कम हुए, फिर बंद। मैसेज का जवाब देर से आने लगा, फिर सिर्फ “व्यस्त हूं” आने लगा।
रिया की इवेंट कंपनी कभी लॉन्च नहीं हुई।
जिस ब्रांड के लिए उसने 3 साल तक सुनहरे अक्षरों वाला लोगो बनवाया था, उसका इंस्टाग्राम पेज 11 पोस्ट के बाद बंद पड़ा रहा।
रिया वापस सविता के घर के गेस्ट रूम में रहने लगी। वह पूरी तरह खत्म नहीं हुई, पर पहली बार उसे यह देखना पड़ा कि उसका प्लान बुद्धि से नहीं, बेशर्मी से बना था। और बेशर्मी तब टूटती है जब सामने वाला आदमी रोकर नहीं, दस्तावेज लेकर खड़ा हो।
अर्जुन ने उसकी तबाही पर जश्न नहीं मनाया।
वह सिर्फ अपनी जिंदगी वापस लेने लगा।
दरियागंज की कोठी पहले बहुत खाली लगती थी। हर कमरे में रिया की पसंद की कोई न कोई चीज थी—क्रीम रंग के पर्दे, नकली मोमबत्तियां, महंगे फूलदान, दीवार पर वेडिंग थीम वाले फ्रेम। अर्जुन ने धीरे-धीरे सब हटाया। उसने आंगन में तुलसी के पास चमेली लगा दी। छत पर पुरानी चारपाई रखी। रसोई की दीवार नीले रंग से रंगवाई।
एक रविवार को स्टोर रूम साफ करते हुए उसे सूखे रजनीगंधा और ऑर्किड का वही अस्पताल वाला गुलदस्ता मिला। कागज भूरा हो चुका था, पंखुड़ियां बिखर रही थीं। वह काफी देर तक उसे देखता रहा।
फिर उसने उसे कूड़ेदान में नहीं फेंका।
वह उसे आंगन में ले गया, मिट्टी में दबा दिया।
उसे लगा, कुछ चीजें फेंकी नहीं जातीं। दफनाई जाती हैं, ताकि उनसे बदबू नहीं, सीख निकले।
कुछ महीनों बाद अनन्या उससे मिलने आई। हाथ में मिठाई का डिब्बा था।
—जीजू… नहीं, अर्जुन भैया कहूं?
अर्जुन हल्का सा मुस्कुराया।
—जो आसान लगे।
अनन्या की आंखें नम थीं।
—मम्मी आपसे मिलना चाहती हैं। माफी मांगने। कोई दबाव नहीं है।
अर्जुन ने काफी देर सोचने के बाद हामी भर दी।
सविता जब आईं तो उनके हाथ में घर का बना राजमा और चावल था। वह दरवाजे पर ही रुक गईं।
—मैं बेटी पर भरोसा कर बैठी। शायद इसलिए कि मां होने का मतलब कभी-कभी सच से डरना भी होता है।
अर्जुन ने दरवाजा पूरा खोल दिया।
—मैं भी भरोसा कर बैठा था। शायद इसलिए कि पति होने का मतलब कभी-कभी संकेत न देखना भी होता है।
वे आंगन में बैठे। अनन्या भी थी। किसी ने रिया की बुराई नहीं की। किसी ने यह नाटक भी नहीं किया कि सब ठीक है। बस 3 लोग बैठे, खाना खाया, और उस सच को जगह दी जिसने सबको चोट पहुंचाई थी।
1 साल बाद अर्जुन उसी लॉजिस्टिक्स कंपनी में था, लेकिन अब वह अपनी हर सांस किसी और के सपनों की ईएमआई में नहीं बदलता था। उसने कंपनी में एक छोटी योजना शुरू करवाई, जिसमें ड्राइवरों और वेयरहाउस कर्मचारियों के बच्चों को टेक्निकल कोर्स की फीस में मदद दी जाती थी।
उसने योजना का नाम रखा—“बिना कर्ज का सहारा।”
सहकर्मी नाम सुनकर हंसे।
अर्जुन भी हंसा।
क्योंकि अब उसे पता था कि सहायता और इस्तेमाल में फर्क होता है।
इसी योजना के सिलसिले में उसकी मुलाकात निशा माथुर से हुई, जो पुराने भवनों की मरम्मत और सामुदायिक लाइब्रेरी प्रोजेक्ट पर काम करने वाली आर्किटेक्ट थी। निशा को अर्जुन की कहानी नहीं पता थी। वह उसे किसी तलाकशुदा आदमी की तरह नहीं, एक व्यवस्थित और शांत इंसान की तरह देखती थी।
एक दिन दरियागंज की गलियों में सर्वे करते हुए उसने अर्जुन से कहा।
—आपकी कोठी के आंगन में एक लंबी मेज होनी चाहिए। ऐसी जगहें अकेले रहने के लिए नहीं बनतीं।
अर्जुन ने पहली बार किसी नए व्यक्ति की बात सुनकर डर महसूस नहीं किया।
उसे जल्दबाजी नहीं थी। अब वह जानता था कि हर मुस्कान घर नहीं होती और हर सपना साझेदारी नहीं। लेकिन यह भी सच था कि हर आने वाला इंसान लुटेरा नहीं होता। कुछ लोग सचमुच वजन बांटने आते हैं, वजन चढ़ाने नहीं।
उस शाम अर्जुन ने छत पर खड़े होकर नीचे आंगन देखा। चमेली की खुशबू आ रही थी। तुलसी के पास मिट्टी में दफनाए गए पुराने फूलों की जगह छोटी हरी कोंपलें निकली थीं।
उसे अस्पताल का वह दरवाजा याद आया। वह आधी खुली लकड़ी, हाथ में फूल, अंदर से आती पत्नी की आवाज, और वह शब्द—सीढ़ी।
कभी-कभी आदमी को तोड़ने वाली बात ही उसे जगाती है।
अर्जुन उस दिन टूटा नहीं था।
वह जाग गया था।
क्योंकि सुखांत हमेशा यह नहीं होता कि जिसने वादा किया था, वही अंत तक साथ रहे।
कभी-कभी सुखांत यह होता है कि आदमी अपना घर बचा ले, अपनी आवाज वापस पा ले, अपना नाम झूठ से छुड़ा ले और फिर बिना नफरत के आगे बढ़ जाए।
जब कोई तुम्हें सीढ़ी समझे, तो जरूरी नहीं कि तुम उसके पैरों के नीचे पड़े रहो।
तुम दरवाजा भी बन सकते हो।
एक जीवन बंद करने के लिए।
और दूसरा खोलने के लिए।
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