भाग 1
8 महीने की गर्भवती अदिति शर्मा फैमिली कोर्ट में खड़ी थी और अपने धोखेबाज़ पति राघव मल्होत्रा को घर, बैंक बैलेंस, कारें, दुकान और शादी के 7 साल में जुटाई हर चीज़ सौंपने के लिए दस्तखत करने जा रही थी, जबकि उसकी प्रेमिका नैना कपूर पीछे वाली कुर्सी पर ऐसे मुस्कुरा रही थी जैसे अदालत नहीं, कोई जीत का जश्न चल रहा हो।
दिल्ली के साकेत फैमिली कोर्ट की वह सुबह बाहर से सामान्य लग रही थी। बरामदे में चाय वाले की आवाज़, फाइलें पकड़े वकील, बच्चों को गोद में लिए थकी औरतें, सफेद शर्ट पहने क्लर्क, और दीवार पर धीमे घूमता पंखा। लेकिन कोर्टरूम नंबर 6 के अंदर हवा भारी थी।
अदिति ने हल्के गुलाबी रंग का सूट पहना था। दुपट्टा पेट पर खिसक आया था, और वह बार-बार उसे ठीक कर रही थी, जैसे अपने अंदर पल रहे बच्चे को दुनिया की गंदी नज़रों से बचा लेना चाहती हो। उसके चेहरे पर नींद की कमी थी, आँखों के नीचे गहरे घेरे थे, मगर रीढ़ सीधी थी।
उसके बगल में उसके वकील, अधिवक्ता समीर मेहरा, फाइल कसकर पकड़े खड़े थे। वे कई बार उसे समझा चुके थे कि यह समझौता आत्मसमर्पण था, तलाक नहीं। मगर अदिति ने हर बार बस एक ही बात कही थी—उसे शांति चाहिए।
सामने राघव मल्होत्रा बैठा था। महँगा नेवी ब्लू सूट, चमकते जूते, घड़ी ऐसी कि आम आदमी के 1 साल की कमाई लग जाए। उसके चेहरे पर पछतावा नहीं था। बस एक ठंडी संतुष्टि थी। जैसे उसने पत्नी नहीं, कोई मुश्किल डील बंद की हो।
उसके पीछे नैना कपूर बैठी थी। सफेद ब्लेज़र, लाल लिपस्टिक, खुले बाल और वह अजीब मुस्कान, जो किसी दूसरी औरत की टूटन देखकर और चमक जाती है। वह इस केस का हिस्सा नहीं थी, लेकिन उसकी मौजूदगी ही अदिति के लिए रोज़ की बेइज़्ज़ती का आखिरी तमाचा थी।
जज मीरा त्रिपाठी ने चश्मा उतारकर सामने रखे समझौते को देखा। उनकी उम्र करीब 50 के आसपास थी। आवाज़ धीमी, मगर ऐसी कि कमरे में बैठे हर आदमी को अपनी जगह याद आ जाए।
—अदिति शर्मा, क्या आप अदालत के सामने पुष्टि करती हैं कि आप मल्होत्रा हाउस, संयुक्त बैंक खाते, साउथ एक्सटेंशन वाली बुटीक की हिस्सेदारी, 2 कारें, नोएडा वाला फ्लैट और वैवाहिक संपत्ति से जुड़े किसी भी अधिकार से स्वेच्छा से त्याग कर रही हैं?
कमरे में धीमी फुसफुसाहट फैल गई।
समीर झट से अदिति की ओर झुके।
—अदिति जी, अभी भी समय है। यह त्याग नहीं, आपका सब कुछ छीना जाना है।
अदिति ने उनकी तरफ नहीं देखा। उसने सीधा जज को देखा।
—हाँ, माननीय न्यायाधीश। मैं पुष्टि करती हूँ।
नैना की हल्की हँसी सुनाई दी। बहुत धीमी, मगर इतनी साफ कि अदिति के कानों में चाकू की तरह लगी।
जज ने भौंहें उठाईं।
—मिस कपूर, यह अदालत है। अगली बार आपकी आवाज़ सुनाई दी तो आपको बाहर भेज दिया जाएगा।
नैना ने होंठ भींच लिए, पर मुस्कान नहीं गई।
राघव थोड़ा आगे झुका।
—माननीय न्यायाधीश, अदिति बहुत भावुक अवस्था में है। 8 महीने की गर्भावस्था है। वह चीज़ों को बढ़ा-चढ़ाकर देख रही है। मैं तो बस चाहता हूँ कि प्रक्रिया शांतिपूर्ण तरीके से पूरी हो जाए।
अदिति ने पहली बार उसे देखा।
राघव की वही आवाज़ थी, जिससे कभी उसने शादी के फेरे लिए थे। वही आदमी जिसने कहा था कि वह उसे रानी बनाकर रखेगा। वही आदमी जिसने पहली सोनोग्राफी में उसकी उंगली इतनी कसकर पकड़ी थी कि नर्स हँस पड़ी थी। वही आदमी बाद में हर डॉक्टर अपॉइंटमेंट पर “मीटिंग” बताकर गायब हो जाता था।
—शांतिपूर्ण? —अदिति की आवाज़ धीमी थी, पर टूटती नहीं थी।
राघव ने अभिनय किया।
—देखो अदिति, कोर्ट में ड्रामा मत करो।
अदिति के पेट में हल्की हरकत हुई। उसने हाथ रख लिया।
—ड्रामा तो तब शुरू हुआ था, जब तुम नैना को हमारे घर लाते थे और मुझे कहते थे कि मैं शक करती हूँ। ड्रामा तब हुआ था, जब मेरी अलमारी में उसके परफ्यूम की महक थी और तुम बोले थे कि गर्भवती औरतों को भ्रम होते हैं। ड्रामा तब हुआ था, जब मैं अस्पताल में अकेली बैठी थी और तुम उसके साथ जयपुर के रिसॉर्ट में थे।
नैना का चेहरा तन गया।
—ये सब बेबुनियाद है।
जज की आँखें नैना पर टिक गईं।
—आपको अभी चुप रहने की चेतावनी दी जा चुकी है।
राघव ने कुर्सी की बाँह पकड़ ली।
—माननीय न्यायाधीश, मेरी पत्नी मुझे बदनाम कर रही है। सच यह है कि वह मानसिक रूप से थक चुकी है। वह बच्चे को लेकर असुरक्षित है। मैं उसे मजबूर नहीं कर रहा।
समीर खड़े हो गए।
—माननीय न्यायालय, मेरी मुवक्किल जिस स्थिति में यह समझौता कर रही हैं, उसमें भावनात्मक दबाव, वैवाहिक उत्पीड़न और संपत्ति से वंचित करने की गंभीर संभावना है। हम अनुरोध करते हैं कि अदालत इस त्याग को तुरंत स्वीकार न करे।
राघव हँसा।
—अधिवक्ता साहब, आपकी फीस कौन देगा जब यह सब छोड़कर चली जाएगी?
समीर का चेहरा सख्त हो गया, लेकिन जवाब देने से पहले जज ने कलम टेबल पर रख दी।
—मिस्टर मल्होत्रा, अपनी भाषा पर नियंत्रण रखिए।
अदिति की सास, सरोज मल्होत्रा, पीछे की पंक्ति में बैठी थी। गले में मोतियों की माला, माथे पर बड़ी बिंदी और चेहरे पर परिवार की इज्जत का नकली दुख। उसके पास राघव का बड़ा भाई विनय बैठा था, जो बार-बार फोन देख रहा था, जैसे अदालत से ज्यादा उसे शेयर मार्केट की चिंता हो।
सरोज ने धीरे से कहा, मगर अदिति ने सुन लिया।
—इतना बड़ा घर संभालना हर लड़की के बस की बात नहीं। हमारी गलती थी इसे बहू बनाया।
अदिति का गला भर आया, लेकिन उसने आँसू रोक लिए। 7 साल की शादी में उसने उस घर को घर बनाया था। सरोज की दवाइयों से लेकर विनय के बेटे के स्कूल प्रोजेक्ट तक, हर चीज़ उसने संभाली थी। मगर जिस दिन उसे पता चला कि वह गर्भवती है, उसी दिन से सबका व्यवहार बदलने लगा था। सरोज को डर था कि बच्चा आने के बाद संपत्ति का हिस्सा बँटेगा। राघव को डर था कि अदिति अब आसानी से चुप नहीं रहेगी। नैना को डर था कि वह कभी “दूसरी औरत” से “घर की औरत” नहीं बन पाएगी।
जज मीरा त्रिपाठी ने फाइल बंद की।
—इस अदालत को इतने बड़े संपत्ति त्याग को स्वीकार करने से पहले यह सुनिश्चित करना होगा कि यह निर्णय स्वतंत्र इच्छा से लिया गया है।
राघव ने तुरंत कहा।
—बिल्कुल। मैं भी यही चाहता हूँ।
समीर ने कड़वाहट से उसकी तरफ देखा।
—आपकी जल्दबाज़ी कुछ और कहती है।
अचानक दरवाज़े के पास खड़ा कोर्ट अटेंडेंट अंदर आया और झुककर जज के कान में कुछ बोला।
जज का चेहरा बदल गया।
अदिति ने गौर किया कि राघव का चेहरा एक पल के लिए सफेद पड़ गया था।
जज ने धीरे से पूछा।
—किसके साथ आई है?
अटेंडेंट ने कहा।
—अकेली मिली, मैडम। बाहर बरामदे में रो रही थी। हाथ में एक पुराना खिलौना है। कह रही है कि उसे सुरक्षित जगह पर बात करनी है।
राघव झट से उठ खड़ा हुआ।
—माननीय न्यायाधीश, यह मेरी निजी पारिवारिक बात है। बच्ची को इस सब में घसीटना ठीक नहीं।
अदिति का दिल तेज़ धड़कने लगा।
—कौन बच्ची?
जज ने राघव की तरफ देखा।
—आप बैठ जाइए।
—लेकिन मेरी बेटी—
अदिति की साँस अटक गई।
—तारा?
नैना की मुस्कान पहली बार गायब हुई।
जज ने दरवाज़े की ओर इशारा किया।
—बच्ची को अंदर लाया जाए।
दरवाज़ा खुला।
6 साल की तारा मल्होत्रा अंदर आई। पीली फ्रॉक, सफेद जूते, बिखरी 2 चोटियाँ और आँखों में इतना डर जैसे वह किसी अदालत में नहीं, किसी तूफान के बीच खड़ी हो। उसके सीने से एक पुराना भूरा खरगोश का खिलौना चिपका हुआ था। उसकी 1 कान की सिलाई खुली थी, पेट पर हल्का दाग था, और गले में लाल रिबन बंधा था।
अदिति ने वह खिलौना तुरंत पहचान लिया।
वही खरगोश जो उसने तारा को 2 साल पहले दिया था, जब तारा अपनी माँ की मौत के बाद पहली बार राघव के घर रात रुकने आई थी। तारा तब सो नहीं पा रही थी। अदिति ने उसे गोद में लेकर कहा था कि यह खरगोश डर को खा जाता है। उस रात तारा पहली बार अदिति को “दिदी मम्मा” कहकर सोई थी।
राघव की पहली पत्नी की मौत के बाद तारा घर में सबसे चुप बच्ची थी। अदिति ने उसे स्कूल पहुँचाया, बुखार में रात भर माथा पोंछा, होमवर्क कराया, और हर राखी पर उसके लिए पीले फूल खरीदे, क्योंकि तारा कहती थी कि पीला रंग माँ जैसा लगता है।
आज वही तारा काँपते कदमों से कोर्ट में आई थी।
राघव ने बनावटी मुस्कान लगाई।
—तारा बेटा, इधर आओ। पापा के पास आओ।
तारा पीछे हट गई।
जज ने तुरंत कहा।
—मिस्टर मल्होत्रा, बच्ची से बिना अनुमति बात न करें।
कमरे में सन्नाटा फैल गया।
तारा ने अदिति को देखा। फिर उसके पेट को। फिर खिलौने को और कस लिया।
जज की आवाज़ नरम हो गई।
—तारा, तुम्हें डरने की जरूरत नहीं है। यहाँ कोई तुम्हें डाँटेगा नहीं। तुम जो कहना चाहो, कह सकती हो।
तारा ने होंठ काँपते हुए खोले।
—पापा ने कहा था कि अगर मैं बोलूँगी तो दिदी मम्मा चली जाएँगी।
अदिति के हाथ से रुमाल फर्श पर गिर गया।
राघव का चेहरा पत्थर जैसा हो गया।
—यह बच्ची कुछ नहीं समझती।
जज की आँखें तेज हो गईं।
—और शायद इसी बात का फायदा उठाया गया है।
तारा ने खरगोश के पेट पर हाथ रखा।
—मैं सब समझती हूँ।
नैना ने कुर्सी पकड़ी।
तारा ने धीरे-धीरे आगे कहा।
—मैं जानती हूँ कि नैना आंटी घर आती थीं, जब दिदी मम्मा डॉक्टर के पास जाती थीं। मैं जानती हूँ कि पापा कहते थे, बच्चा आने से सब झंझट बढ़ेगा। मैं जानती हूँ कि दादी कहती थीं, अदिति को खाली हाथ भेजो, तभी वह दोबारा सिर नहीं उठाएगी।
सरोज चीख पड़ी।
—झूठ! इसने बच्ची को सिखाया है!
तारा डरकर सिकुड़ गई, पर भागी नहीं।
जज ने सख्त आवाज़ में कहा।
—मिसेज मल्होत्रा, एक और शब्द और आपको बाहर करवाया जाएगा।
अदिति के आँसू अब बह रहे थे। वह तारा तक जाना चाहती थी, लेकिन समीर ने धीरे से रोका।
तारा ने खरगोश को थोड़ा ऊपर उठाया।
—मैं आज इसलिए आई हूँ क्योंकि पापा ने कल रात कहा कि दिदी मम्मा थक चुकी हैं। वो सब पेपर साइन कर देंगी। फिर घर, दुकान, पैसे सब हमारे रहेंगे। और नैना आंटी ने कहा कि बच्चा पैदा होने से पहले सब निपटा दो।
राघव ने मेज पर हाथ पटका।
—बस! यह बकवास है!
तारा काँप गई।
लेकिन इस बार उसने खरगोश नहीं छोड़ा।
उसने उसके फटे हुए पेट की सिलाई के अंदर हाथ डाला और एक पुराना छोटा मोबाइल निकाला, जिसकी स्क्रीन टूटी हुई थी।
राघव के होंठों से आवाज़ नहीं निकली।
नैना का चेहरा राख जैसा पड़ गया।
तारा ने मोबाइल दोनों हाथों से जज की ओर बढ़ाया।
—पापा को नहीं पता था कि मेरा खरगोश डर ही नहीं, आवाज़ भी रखता है।
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भाग 2
कोर्टरूम में बैठे लोगों को जैसे साँस लेना याद नहीं रहा। तारा के हाथ में पकड़ा वह पुराना मोबाइल कोई महँगा सबूत नहीं था, बस बच्चों के गाने चलाने वाला एक टूटा फोन था, जिसे राघव ने कभी बेकार समझकर उसे दे दिया था। अदिति जानती थी कि तारा उसे खरगोश के अंदर इसलिए रखती थी क्योंकि वह कहती थी कि खिलौने का भी दिल होना चाहिए। राघव अचानक आगे बढ़ा और फोन छीनने की कोशिश की, लेकिन कोर्ट के कॉन्स्टेबल ने तुरंत बीच में आकर उसका हाथ रोक दिया। जज मीरा ने कड़क आवाज़ में आदेश दिया कि मोबाइल अदालत के कर्मचारी को सौंपा जाए और बच्ची को पानी दिया जाए। तारा ने फोन देने से पहले अदिति की तरफ देखा, जैसे पूछ रही हो कि क्या सच बोलने से वह सचमुच अकेली पड़ जाएगी। अदिति ने पेट पर हाथ रखते हुए सिर हिलाया, और वह छोटा इशारा तारा के लिए पूरी हिम्मत बन गया। कर्मचारी ने सबसे हाल की रिकॉर्डिंग चलाई। आवाज़ धीमी थी, मगर साफ थी। उसमें राघव कह रहा था कि अदिति अब टूट चुकी है, गर्भ के कारण वह लड़ नहीं पाएगी, और अगर उसे घर से शांति चाहिए तो वह सब छोड़कर साइन कर देगी। फिर नैना की हँसी सुनाई दी, और उसने पूछा कि बच्ची का क्या होगा। राघव ने जवाब दिया कि तारा डरपोक है, उसे बता दिया है कि अगर उसने मुँह खोला तो अदिति उसे छोड़कर चली जाएगी, और नया बच्चा आने के बाद कोई उसे नहीं पूछेगा। फिर सरोज की आवाज़ आई कि बहू को बिना हिस्से के बाहर करो, वरना कल वही बच्चा मल्होत्रा संपत्ति में हिस्सा माँगेगा। यह सुनते ही अदिति का चेहरा सफेद पड़ गया, क्योंकि धोखा उसे मालूम था, पर तारा के डर को हथियार बनाना उसने कभी नहीं सोचा था। तभी रिकॉर्डिंग में अचानक एक और आवाज़ आई, विनय की, जो कह रहा था कि दुकान के कागज़ पहले ही राघव के नाम से हटाकर दूसरी कंपनी में डाल दिए गए हैं, और अदिति को पता चलने से पहले तलाक पूरा होना चाहिए। समीर मेहरा तुरंत खड़े हुए और बोले कि यह केवल वैवाहिक उत्पीड़न नहीं, संपत्ति छिपाने और मानसिक दबाव का मामला है। राघव ने नैना की तरफ देखा, नैना ने नज़रें फेर लीं। उसी पल कोर्ट के दरवाज़े पर 2 लोग आए—अदिति के पिता रमेश शर्मा और उनके साथ एक बैंक ऑडिटर, जिसके हाथ में वही फाइल थी जिसे राघव 3 महीने से गायब समझ रहा था।
भाग 3
दरवाज़े पर खड़े रमेश शर्मा को देखकर अदिति की आँखों में हैरानी तैर गई। उसने उन्हें आने से मना किया था। वह नहीं चाहती थी कि उसके बूढ़े पिता उसकी शादी की राख अपनी आँखों से देखें। रमेश पहले सरकारी स्कूल में शिक्षक थे। अब घुटनों में दर्द रहता था, चश्मा मोटा हो गया था, और आवाज़ पहले जैसी भारी नहीं बची थी। मगर उस दिन उनके चेहरे पर वह स्थिरता थी जो सिर्फ उन लोगों में होती है जिन्होंने बहुत चुप रहकर सही समय का इंतज़ार किया हो।
उनके साथ खड़ा आदमी काले बैग में दस्तावेज़ लिए था। वह बैंक ऑडिटर देवाशीष सेन था, जो कभी अदिति की बुटीक के खातों की सालाना जाँच करता था।
राघव बुरी तरह चौंक गया।
—ये लोग यहाँ क्या कर रहे हैं?
जज मीरा ने कहा।
—मिस्टर मल्होत्रा, अब तक अदालत ने आपकी बातें बहुत सुनी हैं। अब दस्तावेज़ भी सुने जाएँगे।
रमेश ने अदिति की ओर देखा। उनकी आँखों में गुस्सा नहीं, दुख था। जैसे बेटी की हालत देखकर पिता का दिल कई टुकड़ों में टूट चुका हो, मगर वह उसे और कमजोर नहीं देखना चाहता।
—बेटा, तूने कहा था कि मैं न आऊँ। लेकिन पिता का काम सिर्फ बेटी की शादी में कन्यादान करना नहीं होता। कभी-कभी उसे बेटी की चुप्पी से भी लड़ना पड़ता है।
अदिति का चेहरा टूट गया।
—पापा…
जज ने देवाशीष सेन से पूछा कि वे किस आधार पर उपस्थित हुए हैं।
देवाशीष ने आगे आकर फाइल टेबल पर रखी।
—माननीय न्यायालय, अधिवक्ता समीर मेहरा ने 5 दिन पहले मुझसे वित्तीय रिकॉर्ड के संबंध में संपर्क किया था। प्रारंभिक जाँच में यह पता चला कि साउथ एक्सटेंशन की बुटीक, जिसे वैवाहिक व्यवसाय बताया जा रहा है, वास्तव में अदिति शर्मा की मूल पूँजी और उनके पिता के 12 लाख रुपये के निवेश से शुरू हुई थी। बाद में राघव मल्होत्रा ने कई दस्तावेज़ों में खुद को प्रमुख मालिक दिखाने की कोशिश की, लेकिन बैंक ट्रांसफर, जीएसटी रिकॉर्ड और किरायानामा कुछ और बताते हैं।
राघव चीखा।
—यह झूठ है! दुकान मेरी मेहनत से चली।
समीर ने तुरंत फाइल से एक पन्ना निकाला।
—आपकी मेहनत से? यहाँ 18 महीनों का रिकॉर्ड है, जिसमें अदिति जी गर्भावस्था से पहले तक रोज़ दुकान संभाल रही थीं, और आपके हस्ताक्षर केवल उन निकासी पर हैं जिनसे नैना कपूर के नाम पर होटल बुकिंग, ज्वेलरी और गोवा यात्रा का भुगतान हुआ।
नैना ने झट से कहा।
—मुझे इसमें मत घसीटिए। मुझे नहीं पता था पैसे कहाँ से आ रहे हैं।
अदिति ने पहली बार उसे सीधा देखा।
—तुम्हें पता नहीं था कि जिस घर में तुम आती थीं, वहाँ एक बच्ची डरकर कमरे में बंद हो जाती थी? तुम्हें पता नहीं था कि जिस बिस्तर पर बैठती थीं, उसके पास मेरी दवाइयाँ रखी होती थीं? तुम्हें पता नहीं था कि मैं 8 महीने की गर्भवती हूँ?
नैना के पास जवाब नहीं था।
तारा अदिति के पास वाली कुर्सी पर बैठी थी। उसकी छोटी उँगलियाँ खरगोश की गर्दन का रिबन मरोड़ रही थीं। अदालत ने उसे दूर नहीं भेजा, क्योंकि जज ने साफ कहा था कि बच्ची को सुरक्षित महसूस होना चाहिए। एक महिला काउंसलर भी बुला ली गई थी, जो तारा के पास बैठकर उसे पानी पिला रही थी।
सरोज मल्होत्रा अब तक खुद को रोक रही थी, लेकिन जैसे ही देवाशीष ने संपत्ति की बात आगे बढ़ाई, वह फट पड़ी।
—हमने इसे घर दिया, नाम दिया, इज्जत दी! अब ये हमें कोर्ट में चोर बना रही है?
रमेश ने शांत आवाज़ में कहा।
—इज्जत दी होती तो मेरी बेटी 8 महीने के पेट के साथ अपनी जिंदगी खाली हाथ देकर भागने नहीं आती।
सरोज ने तीखे स्वर में कहा।
—आपकी बेटी बहुत चालाक निकली। बच्ची को भी सिखा दिया।
तारा अचानक बोल पड़ी।
—दादी, आपने ही कहा था कि अगर दिदी मम्मा साइन नहीं करेंगी तो उनके बच्चे को इस घर में जगह नहीं मिलेगी।
सरोज चुप हो गई।
जज मीरा त्रिपाठी ने नोट्स लिखे। फिर उन्होंने राघव की तरफ देखा।
—मिस्टर मल्होत्रा, अदालत के सामने अभी जो सामग्री आई है, वह गंभीर है। भावनात्मक दबाव, नाबालिग पर भय, गर्भवती पत्नी पर मानसिक उत्पीड़न, और संपत्ति छिपाने की आशंका। ऐसे में यह समझौता स्वीकार करना न्याय के विरुद्ध होगा।
राघव के माथे पर पसीना था।
—माननीय न्यायाधीश, यह सब गलतफहमी है। परिवारों में बातें हो जाती हैं। अदिति मेरी पत्नी है। मैं उसे छोड़ना नहीं चाहता था, बस…
अदिति हँस पड़ी। वह हँसी खुशी की नहीं थी। वह ऐसी थी जैसे किसी ने लंबे समय से रोती औरत के सामने अचानक झूठ का मजाक रख दिया हो।
—बस क्या? बस नैना को घर में रखना था? बस तारा को डराकर चुप कराना था? बस मेरे बच्चे के पैदा होने से पहले मुझे संपत्ति से बाहर करना था? बस मुझे इतना थका देना था कि मैं अपने हक को बोझ समझने लगूँ?
राघव ने धीरे से कहा।
—मैंने गलती की है, अदिति। मगर हम बात कर सकते हैं। बच्चा आने वाला है। तारा भी है। हम परिवार हैं।
तारा ने खरगोश को और कस लिया।
अदिति ने उसकी तरफ देखा। उस बच्ची की आँखों में डर और उम्मीद एक साथ थे। वह बेटी थी, लेकिन अदिति की कोख से नहीं। फिर भी पिछले 2 साल में वह अदिति के दिल में ऐसे जगह बना चुकी थी, जैसे खून से नहीं, भरोसे से जन्मी हो।
अदिति ने राघव से कहा।
—परिवार वह नहीं होता जहाँ एक आदमी सबको अपने डर से बाँधकर रखे। परिवार वह होता है जहाँ बच्चा सच बोलते हुए काँपे नहीं।
राघव ने चेहरा फेर लिया।
जज ने आदेश सुनाया कि प्रस्तुत समझौता स्थगित किया जाता है। संपत्ति का विस्तृत वित्तीय ऑडिट होगा। बुटीक और संयुक्त खातों से कोई निकासी अदालत की अनुमति के बिना नहीं होगी। अदिति के लिए अस्थायी निवास, चिकित्सा खर्च और गर्भावस्था सहायता हेतु अंतरिम भरण-पोषण तय किया जाएगा। तारा के लिए बाल काउंसलिंग और अस्थायी सुरक्षा व्यवस्था की जाएगी। राघव को तारा पर दबाव डालने, अदिति से सीधे संपर्क करने या संपत्ति से जुड़े दस्तावेज़ बदलने से रोका जाएगा।
नैना ने धीरे से कुर्सी छोड़ी।
—मैं जा सकती हूँ?
जज ने ठंडी नज़र से देखा।
—आप गवाह के रूप में नोट की जा चुकी हैं। बाहर जाना चाहें तो जाइए, पर तथ्यों से बाहर नहीं जा सकेंगी।
नैना बिना किसी को देखे बाहर निकल गई। उसकी हील्स की आवाज़ खाली गलियारे में दूर होती चली गई। वह आई थी किसी और की हार देखने, लेकिन जाते-जाते अपना चेहरा छिपा रही थी।
राघव कुर्सी पर बैठा रहा। उसके पास पहली बार कोई संवाद नहीं बचा था। उसका सूट, घड़ी, पैसा, माँ की आवाज़, प्रेमिका की मुस्कान—सब अदालत की मेज पर रखे उस टूटे मोबाइल से छोटे पड़ गए थे।
सुनवाई खत्म होने के बाद अदिति धीरे-धीरे उठी। 8 महीने का पेट, भारी कदम, भीगे गाल, लेकिन आँखों में वह खालीपन नहीं था जिसके साथ वह सुबह आई थी। तारा कुर्सी से उतरी और चुपचाप उसके पास आ खड़ी हुई।
—दिदी मम्मा…
अदिति झुक नहीं पा रही थी, इसलिए उसने हाथ बढ़ाया। तारा ने उसका हाथ पकड़ लिया।
—मैंने गलत किया क्या?
अदिति ने तारा का चेहरा दोनों हथेलियों में लेने की कोशिश की, फिर मुस्कुराकर उसके बाल सहला दिए।
—नहीं। तूने वह किया जो बड़े लोग भी करने से डरते हैं।
—पापा नाराज़ होंगे।
—शायद होंगे।
—दादी भी।
—शायद।
—फिर आप चली जाएँगी?
यह वही सवाल था जिसने अदिति को भीतर तक हिला दिया। अदालत के बाहर निकलने से पहले ही वह समझ गई थी कि अब उसकी लड़ाई सिर्फ संपत्ति की नहीं थी। यह उस बच्ची की भी लड़ाई थी जिसे डराकर चुप कराया गया था। वह राघव से विवाह तोड़ सकती थी, मल्होत्रा हाउस छोड़ सकती थी, मगर तारा की आँखों में अपना भरोसा छोड़कर नहीं जा सकती थी।
—मैं उस घर से जाऊँगी, तारा। क्योंकि वह घर अब घर नहीं रहा। लेकिन मैं तेरी जिंदगी से नहीं जाऊँगी।
तारा ने रोते हुए पूछा।
—सच?
—सच। अदालत में सच बोला है, अब झूठ कैसे बोलूँ?
तारा ने अदिति के पेट पर हल्का हाथ रखा।
—बेबी मुझसे नाराज़ तो नहीं होगा?
अदिति की आँखों से फिर आँसू गिर पड़े।
—नहीं। वह तो गर्व करेगा कि उसकी दीदी इतनी बहादुर है।
तारा ने पहली बार हल्की मुस्कान दी।
रमेश शर्मा उनके पास आए। उन्होंने अदिति के सिर पर हाथ रखा। इतने सालों बाद अदिति फिर बेटी बन गई। वह बहू, पत्नी, माँ बनने वाली औरत, अदालत में खड़ी पीड़ित—सब कुछ थी, लेकिन उस क्षण वह बस अपने पिता की बच्ची थी।
—घर चल, बेटा।
अदिति ने धीमे से कहा।
—कौन सा घर, पापा?
रमेश ने बिना सोचे जवाब दिया।
—जहाँ तू बिना डर के सो सके, वही घर।
समीर मेहरा ने फाइलें समेटीं।
—अदिति जी, लड़ाई लंबी होगी। लेकिन आज आपने हार पर साइन नहीं किया। यह बहुत बड़ी शुरुआत है।
अदिति ने कोर्टरूम की ओर एक बार मुड़कर देखा। राघव अंदर ही बैठा था। सरोज उससे कुछ कह रही थी, विनय फोन पर बेचैनी से किसी से बात कर रहा था, और कर्मचारी रिकॉर्डिंग को सीलबंद कर रहे थे। वहाँ वह परिवार था जिसने उसे थकाकर खाली करना चाहा था। मगर उसके पास अब खाली हाथ नहीं थे। एक हाथ में तारा की उँगलियाँ थीं, दूसरे हाथ में अपने अजन्मे बच्चे की हलचल।
बाहर दिल्ली की दोपहर तेज थी। कोर्ट की सीढ़ियों पर लोग आते-जाते रहे। किसी के लिए वह दिन एक केस था। किसी के लिए फाइल नंबर। किसी के लिए गपशप। मगर अदिति के लिए वह दिन उसकी चुप्पी की अंतिम तारीख बन गया।
तारा ने अपना खरगोश ऊपर उठाया।
—इसका नाम अब डरू नहीं रखेंगे।
अदिति ने हैरानी से पूछा।
—तो क्या रखेंगे?
तारा ने थोड़ा सोचकर कहा।
—सच्चू।
रमेश हल्के से हँस पड़े। समीर भी मुस्कुरा दिए। अदिति ने खरगोश को देखा—फटा हुआ, पुराना, दागदार, मगर अंदर एक ऐसा दिल छिपाए हुए जिसने अदालत में सबकी नींद उड़ा दी थी।
कुछ सप्ताह बाद अदिति अपने पिता के पुराने घर में रहने लगी। वह बड़ा नहीं था। खिड़की से मेट्रो की आवाज़ आती थी। रसोई छोटी थी। कमरे में पुरानी अलमारी थी, और बालकनी में तुलसी का पौधा। मगर वहाँ कोई उसे पागल नहीं कहता था। कोई उसके बच्चे को बोझ नहीं कहता था। कोई तारा को चुप रहने की धमकी नहीं देता था।
अदालत की प्रक्रिया जारी रही। वित्तीय जाँच में और दस्तावेज़ निकले। बुटीक पर अदिति का अधिकार मजबूत हुआ। राघव की कई ट्रांसफर रोक दी गईं। तारा के लिए काउंसलिंग शुरू हुई। वह हर शनिवार अदिति से मिलने आती। कभी रंग भरती, कभी बच्चे के लिए नाम सोचती, कभी खरगोश के पेट में अब मोबाइल नहीं, छोटी-सी चिट्ठी रखती।
एक शाम बारिश हो रही थी। तारा बालकनी में खड़ी थी और अदिति कुर्सी पर बैठी ऊन से छोटे मोजे बुन रही थी।
—दिदी मम्मा, जब बेबी आएगा, क्या मैं उसे खरगोश दे सकती हूँ?
अदिति ने मुस्कुराकर पूछा।
—सच्चू?
तारा ने सिर हिलाया।
—हाँ। ताकि उसे कभी डर लगे तो वह सच बोल सके।
अदिति की आँखें नम हो गईं। उसने तारा को पास बुलाया और उसके माथे को चूम लिया।
—उसे पहले दिन से पता होगा कि उसकी दीदी ने उसकी माँ को बचाया था।
तारा ने धीरे से कहा।
—मैंने आपको नहीं बचाया। आपने पहले मुझे बचाया था। जब माँ नहीं थी, आपने मुझे सोना सिखाया था।
अदिति ने उसे बाँहों में भर लिया। उसके भीतर बच्चा हिला, जैसे वह भी उस गले लगाने में शामिल हो गया हो।
कहानी का अंत महल, तालियों या अचानक मिली करोड़ों की जीत से नहीं हुआ। असली जीत बहुत शांत थी। एक गर्भवती औरत ने अदालत में अपनी आवाज़ वापस पाई। एक 6 साल की बच्ची ने सीखा कि सच बोलने से घर टूटता नहीं, झूठ का पिंजरा टूटता है। और एक पुराना खरगोश, जिसे सब खिलौना समझते थे, उस दिन गवाह बन गया कि बच्चों की चुप्पी कभी-कभी सबसे बड़ी अदालत होती है।
क्योंकि औरत कमजोर नहीं होती जब वह थक जाती है।
बच्चा झूठा नहीं होता जब सच बोलते हुए काँपता है।
और जो आदमी परिवार के सबसे नर्म पल को हथियार बनाकर घर, पैसा और चुप्पी खरीदना चाहता है, वह देर-सबेर उसी चुप्पी में हार जाता है जिसे उसने दूसरों पर थोपना चाहा था।
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