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“तमाशा मत बनाओ” — पति ने सबके सामने अपमानित पत्नी को रोकना चाहा, जबकि उसकी सहायक मुस्कुरा रही थी; पर किसी ने नहीं जाना कि होटल के कैमरे और 1 गुप्त रिपोर्ट पूरी जीत को पलट देंगे।

भाग 1:
उस रात रिया मल्होत्रा ने नैना मेहता को सिर्फ थप्पड़ नहीं मारा था, उसने पूरे खुराना साम्राज्य की नींव पर हाथ रख दिया था।

दिल्ली के एरोसिटी वाले 5 सितारा होटल के निजी भोज कक्ष में 26 लोग बैठे थे। चमकते झूमर, सफेद मेज़पोश, चांदी की कटलरी, धीमा सितार संगीत और करोड़ों की डील पर मुस्कुराते चेहरे। बाहर मीडिया को बताया गया था कि यह सिर्फ एक कारोबारी रात्रिभोज है, लेकिन अंदर मौजूद हर इंसान जानता था कि अरविंद खुराना की कंपनी अगले 48 घंटों में या तो नई ऊंचाई छूने वाली है या कर्ज़ के नीचे दबने वाली है।

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तभी रिया की आवाज़ कांच की तरह चुभी।

—अगर तुम्हें कारोबारी मेज़ पर बैठने की तमीज़ नहीं है, तो बेहतर है कि रसोई के स्टाफ के साथ बैठ जाओ।

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वेटर अभी दाल मोरादाबादी परोस ही रहा था कि रिया का हाथ हवा में उठा और नैना के गाल पर पड़ गया।

पूरा कमरा जम गया।

एक निवेशक के हाथ में पकड़ा गिलास हवा में रुक गया। सितार बजाने वाला कलाकार उंगली रोक कर बैठ गया। अरविंद खुराना की मां सुधा देवी के चेहरे पर भी 1 पल के लिए रंग उड़ गया, लेकिन वह डर नैना के लिए नहीं था। वह डर इस बात का था कि नैना अब क्या करेगी।

रिया कोई सामान्य कर्मचारी नहीं थी। वह अरविंद की निजी सहायक थी। पिछले 2 सालों से वह उसके साथ हर बैठक, हर यात्रा, हर बंद दरवाज़े और हर देर रात कॉल में दिखाई देती थी। महंगे हीरे के झुमके, चांदी रंग की साड़ी, तीखी मुस्कान और वह आत्मविश्वास, जो सिर्फ किसी पद से नहीं आता, बल्कि किसी पुरुष की चुप्पी से पनपता है।

नैना का चेहरा थप्पड़ से एक तरफ मुड़ गया था। उसके गाल पर लाल निशान उभर आया। मगर उसकी आंखों में पानी नहीं था।

मेज़ के सिरहाने अरविंद बैठा था। वही अरविंद, जिससे नैना की शादी को 9 साल हुए थे। वही अरविंद, जिसने कभी नैना से कहा था कि वह उसकी किस्मत है। वही अरविंद, जो अब अपनी पत्नी को थप्पड़ खाते देख कर भी सबसे पहले निवेशकों की तरफ देख रहा था।

—नैना… शांत रहो।

नैना ने धीरे से उसकी तरफ देखा।

—शांत?

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अरविंद ने होंठ भींच लिए।

—आज की रात बहुत ज़रूरी है। तमाशा मत बनाओ।

रिया हल्का सा हंसी।

—देखा? मैंने कहा था न, इन्हें जगह समझ नहीं आती। अरविंद सर को साथ चाहिए, बोझ नहीं।

नैना कुर्सी से उठी।

कमरे में बैठे जयपुर, मुंबई, अहमदाबाद और बेंगलुरु के निवेशक अब सिर्फ डील नहीं देख रहे थे। वे एक शादी का अंत देख रहे थे, जिसे अभी तक सोने की परत से ढक कर रखा गया था।

नैना ने काली सिल्क साड़ी पहनी थी, बिना किसी भारी गहने के। बाल जूड़े में बंधे थे। गले में सिर्फ मोती की पतली माला थी। उसमें दिखावा नहीं था, और शायद यही रिया को सबसे ज़्यादा चुभता था। रिया जितना चमकती थी, नैना उतनी स्थिर लगती थी।

रिया ने गर्दन तिरछी की।

—अब क्या करोगी? मुझे भाषण दोगी?

नैना ने 1 कदम आगे बढ़ाया।

अरविंद अचानक खड़ा हो गया।

—नैना, मत करो।

नैना ने पूछा:

—क्या मत करूं?

अरविंद चुप हो गया।

वह जानता था। वह बहुत अच्छी तरह जानता था कि नैना कौन है। बाकी लोग उसे खुराना परिवार की शांत बहू समझते थे। सुधा देवी उसे अक्सर रिश्तेदारों के सामने कहती थीं कि पढ़ाई-लिखाई ठीक है, मगर बहू की असली इज़्ज़त चुप रहने में होती है। अरविंद अपने दोस्तों से मज़ाक में कहता था कि नैना पुरानी हवेली जैसी है, खूबसूरत लेकिन धीमी।

मगर अरविंद एक बात कभी भूल नहीं पाया था।

नैना मेहता सिर्फ उसकी पत्नी नहीं थी। वह मेहता परिवार न्यास की कार्यकारी अध्यक्ष थी। उसी न्यास ने 4 साल पहले खुराना इंफ्रालिंक को डूबने से बचाया था। उसी न्यास की मंज़ूरी के बिना अरविंद की कंपनी को 600 करोड़ की वह पुल-राशि नहीं मिल सकती थी, जिसके सहारे वह पुणे की त्रिवेणी लॉजिस्टिक्स खरीदने वाला था।

रिया को यह नहीं पता था।

रिया ने उस महिला को थप्पड़ मार दिया था, जिसकी एक हस्ताक्षर से अरविंद का साम्राज्य सुबह होने से पहले रुक सकता था।

नैना ने रिया को देखा। फिर अपना हाथ उठाया।

थप्पड़ की आवाज़ पहले थप्पड़ से भी तेज़ थी।

रिया पीछे लड़खड़ा गई। उसके हीरे के झुमके हिल गए। उसके चेहरे से मुस्कान उतर गई।

—तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई!

नैना ने शांत स्वर में कहा:

—तुमने शुरू किया था। मैंने सिर्फ जवाब पूरा किया।

अरविंद ने मेज़ पर हाथ मारा।

—तुम पागल हो गई हो?

नैना ने उसे देखा।

—यह सवाल तुम फिर पूछना, जब मैं अपना परिचय पूरा कर लूं।

कमरे में सांसें अटक गईं।

सुधा देवी ने दांत भींच कर कहा:

—नैना, बहू होकर अपने पति की इज़्ज़त मिट्टी में मत मिलाओ।

नैना ने पहली बार अपनी सास की तरफ देखा।

—मांजी, इज़्ज़त वह चीज़ होती है जो घर के भीतर शुरू होती है। आपकी मेज़ पर तो मुझे बहुत पहले से जगह नहीं मिली।

अरविंद का छोटा भाई करण कुर्सी से उठ गया।

—भाभी, बात हाथ से निकल रही है।

—नहीं करण, पहली बार बात हाथ में आई है।

दरवाज़ा खुला। होटल मैनेजर 2 सुरक्षाकर्मियों के साथ अंदर आया। उसके पीछे एक महिला नीली साड़ी में थी, हाथ में चमड़े का फोल्डर। वह कोई मेहमान नहीं लग रही थी। उसका चेहरा इतना ठंडा था कि कमरे में बैठे वकील भी सीधे बैठ गए।

—श्रीमती नैना मेहता?

नैना ने सिर हिलाया।

—जी।

—मैं अधिवक्ता मीरा सहगल। क्या आप इस शारीरिक हमले की औपचारिक शिकायत दर्ज करवाना चाहेंगी?

रिया के चेहरे का रंग उड़ गया।

—यह क्या मज़ाक है? वकील यहां कैसे आई?

अरविंद ने धीरे से कहा:

—मीरा, अभी नहीं।

मीरा ने उसकी तरफ देखा भी नहीं।

नैना ने कहा:

—अभी ही।

अरविंद ने नैना का हाथ पकड़ने की कोशिश की।

—यह सब यहीं रोक दो। निवेशक बैठे हैं।

नैना ने अपना हाथ छुड़ा लिया।

—इसीलिए तो रोकना अब संभव नहीं है।

होटल मैनेजर ने विनम्र स्वर में पूछा:

—मैडम, हमें क्या करना है?

—इस कमरे, गलियारे, प्रवेश द्वार, लिफ्ट लॉबी और पार्किंग के सभी वीडियो सुरक्षित रखें। कोई फुटेज डिलीट नहीं होगी।

अरविंद का चेहरा सफेद पड़ गया।

मुंबई के निवेशक धर्मेश शाह ने तुरंत पूछा:

—अरविंद, वीडियो सुरक्षित रखने से तुम्हें परेशानी क्यों हो रही है?

किसी ने जवाब नहीं दिया।

वह चुप्पी थप्पड़ से ज़्यादा भारी थी।

रिया ने अरविंद की तरफ देखा, जैसे उम्मीद कर रही हो कि वह उसे बचा लेगा। अरविंद ने आंखें फेर लीं।

उसी पल रिया को समझ आया कि किसी मर्द की कुर्सी के पास खड़े रहना, उस कुर्सी का मालिक होना नहीं होता।

मीरा ने फोल्डर खोला।

—मेहता परिवार न्यास की प्राथमिक शासन समीक्षा में खुराना इंफ्रालिंक के खर्चों और अधिकारों में गंभीर विसंगतियां मिली हैं। आज की घटना के बाद न्यास पुल-राशि की स्वीकृति तुरंत रोक सकता है।

अरविंद गरजा:

—एक वैवाहिक झगड़े को व्यापार में मत घसीटो।

नैना ने जवाब दिया:

—तुमने विवाह को व्यापार में बहुत पहले घसीट लिया था, जब अपनी सहायक को मेरी जगह बैठाना शुरू किया था।

रिया बुरी तरह चौंकी।

—कौन सी विसंगतियां?

नैना ने उसकी तरफ मुड़ कर कहा:

—वही, जिनकी सुगंध तुम्हारे महंगे इत्र से भी तेज़ है।

मीरा ने दूसरी शीट मेज़ पर रखी।

कागज़ पर 17 भुगतान, 3 अपार्टमेंट एंट्री, 11 यात्राएं और 1 गुप्त अनुबंध की सूची थी।

अरविंद ने वह सूची देखते ही कुर्सी पकड़ ली।

नैना ने कलम उठाई और शिकायत पर हस्ताक्षर कर दिए।

उसके हाथ में ज़रा भी कंपन नहीं था।

और तभी मीरा ने तीसरा कागज़ निकाला, जिस पर सिर्फ 1 नाम लिखा था। वह नाम देखकर अरविंद की मां की चीख निकल गई।

कमेंट्स में दिए गए लिंक से पूरी कहानी पढ़े 👇.

भाग 2:

उस रात का अपमान अचानक नहीं जन्मा था। पिछले 8 महीनों से रिया धीरे-धीरे नैना की जगह घेर रही थी। पहले उसने घर के फूल बदलवाए, फिर पूजा के कमरे की सजावट पर राय दी, फिर मेहमानों के सामने अरविंद की थाली में खाना परोसने लगी। सुधा देवी ने इसे आधुनिक दफ्तर की आदत कह कर टाल दिया, मगर नैना समझ रही थी कि घर की सीमा जानबूझकर धुंधली की जा रही है। अरविंद रात-रात भर फोन पर रहता, रिया उसके संदेशों का जवाब देती, यात्राओं का कार्यक्रम बदलती और परिवार की बैठकों में उस कुर्सी पर बैठने लगी जो हमेशा नैना के लिए छोड़ी जाती थी। नैना ने झगड़ा नहीं किया। उसने हिसाब देखा। मेहता परिवार न्यास के नाम पर खुराना इंफ्रालिंक को दी गई राशि में अजीब खर्च जुड़े हुए थे। गुरुग्राम का सर्विस अपार्टमेंट, गोवा की यात्रा, डिजाइनर गहने, छवि-परामर्श का 2.4 करोड़ का अनुबंध और एक छोटी कंपनी, जिसकी मालिक रिया की मौसी थी। सबसे खतरनाक बात यह थी कि रिया को त्रिवेणी लॉजिस्टिक्स की खरीद से जुड़े गोपनीय दस्तावेज़ भेजे गए थे। नैना ने 3 हफ्ते पहले गुप्त ऑडिट शुरू करवा दिया था। उस रात मीरा सहगल होटल में संयोग से नहीं बैठी थी। वह बाहर के भोजन कक्ष में पूरी टीम के साथ प्रतीक्षा कर रही थी, क्योंकि नैना को शक था कि अरविंद डील से पहले कुछ छिपाने की कोशिश करेगा। मगर नैना ने यह नहीं सोचा था कि अपमान इतना खुला होगा। तीसरे कागज़ पर नाम था करण खुराना। अरविंद का छोटा भाई। वही करण, जो अभी तक बीच-बचाव का नाटक कर रहा था। खाते बताते थे कि रिया की मौसी की कंपनी से सबसे पहले भुगतान करण के शेल खाते में गया था। इसका मतलब सिर्फ अवैध खर्च नहीं था। इसका मतलब था कि परिवार के भीतर से किसी ने जानबूझकर कंपनी को खोखला किया, और नैना को घर की चुप बहू समझ कर उसके सामने सब कुछ किया। जब मीरा ने कहा कि सुबह 9 बजे आपातकालीन बोर्ड बैठक होगी, अरविंद की आंखों में पहली बार डर नहीं, विनती थी। लेकिन नैना ने उसकी तरफ देखा भी नहीं। उसी समय होटल के मुख्य द्वार पर पुलिस की जीप रुकी, और रिया ने फुसफुसाते हुए अपने फोन से एक संदेश भेजा। वह संदेश गलत आदमी को चला गया।

भाग 3:

सुबह 9 बजे खुराना इंफ्रालिंक का बोर्डरूम किसी श्मशान जैसा शांत था।

कांच की दीवारों से गुरुग्राम की ऊंची इमारतें दिख रही थीं। नीचे ट्रैफिक चल रहा था, जैसे दुनिया को पता ही न हो कि 1 कमरे में 20 साल की बनाई हुई शक्ति टूटने वाली है।

अरविंद बिना टाई के आया था। उसकी आंखें लाल थीं। करण उसके पीछे था, मगर आज उसका चेहरा वैसा तेज़ नहीं था। सुधा देवी पूजा की माला हाथ में पकड़े बैठी थीं, लेकिन मंत्रों की जगह उनकी सांसें तेज़ चल रही थीं।

नैना स्क्रीन पर नहीं आई।

वह खुद कमरे में आई।

सफेद सूती साड़ी, बिना भारी गहनों के, गाल पर पिछली रात का लाल निशान अब भी साफ़। उसने उसे छिपाया नहीं था। वह निशान सबूत था, शर्म नहीं।

बोर्ड की अध्यक्ष वसुधा सेन ने फाइल खोली।

—यह आपात बैठक पिछले रात्रिभोज में हुई शारीरिक घटना, शासन समीक्षा और संभावित वित्तीय दुरुपयोग पर है।

अरविंद ने तुरंत कहा:

—मैं कल की घटना पर खेद व्यक्त करता हूं।

वसुधा सेन ने चश्मा उतार कर पूछा:

—किस बात पर खेद?

—रात्रिभोज बिगड़ गया।

कमरे में किसी ने खांसी भी नहीं की।

नैना ने पहली बार बोला।

—मेरे गाल पर पड़े थप्पड़ से तुम्हें डील बिगड़ने का दुख है?

अरविंद ने आंखें बंद कीं।

—नैना, मैं कहना चाहता था कि रिया ने सीमा पार की।

—और तुमने सीमा बनवाई।

करण बीच में बोला:

—भाभी, परिवार की बातें बोर्ड में मत लाओ।

नैना ने उसकी तरफ देखा।

—जब परिवार कंपनी के पैसे से अपार्टमेंट खरीदता है, तब वह बोर्ड की बात बन जाती है।

मीरा सहगल ने पहली फाइल खोली। स्क्रीन पर 1-1 कर दस्तावेज़ दिखने लगे। रिया के लिए गुरुग्राम के डीएलएफ फेज 5 में लिया गया अपार्टमेंट, जिसे कंपनी के खातों में अतिथि आवास लिखा गया था। गोवा की 5 यात्राएं, जिन्हें निवेशक संबंध यात्रा कहा गया था। 2.4 करोड़ का परामर्श अनुबंध, जिसकी कंपनी रिया की मौसी के नाम पर थी, पर खाते में अंतिम राशि करण के नियंत्रित खाते में जा रही थी।

कंपनी के वित्त प्रमुख, शांत स्वभाव वाले आशीष बत्रा, कई महीनों से चुप थे। उस दिन उन्होंने सिर उठाया।

—मैंने 4 बार ईमेल में विरोध दर्ज किया था। मुझे कहा गया था कि यह अध्यक्ष परिवार की स्वीकृत व्यवस्था है।

वसुधा सेन ने पूछा:

—किसने कहा?

आशीष ने अरविंद की तरफ देखा, फिर करण की तरफ।

—दोनों ने।

अरविंद भड़क उठा।

—तुम मुझे बेच रहे हो?

आशीष ने थकी हुई आवाज़ में कहा:

—मैं कंपनी बचा रहा हूं। बहुत देर से, लेकिन अब भी।

सुधा देवी अचानक बोल पड़ीं।

—नैना, तुम घर तोड़ रही हो।

नैना ने उनकी तरफ मुड़ कर शांत स्वर में कहा:

—घर तब टूटा था, जब आपने मुझे बहू नहीं, चेकबुक समझा था।

सुधा देवी की आंखें भर आईं, मगर नैना अब उस आंसू से प्रभावित होने वाली लड़की नहीं रही थी।

तभी मीरा ने वह संदेश स्क्रीन पर दिखाया, जो पिछली रात रिया ने पुलिस के आने पर भेजा था। वह संदेश अरविंद को जाना था, मगर जल्दबाज़ी में आशीष को चला गया था।

उसमें लिखा था कि अगर नैना ने वीडियो बचा लिया तो करण वाले खाते भी खुल जाएंगे, इसलिए ड्राइवर को तुरंत चुप कराओ।

कमरे में जैसे हवा खिंच गई।

वसुधा सेन ने कठोर स्वर में पूछा:

—कौन सा ड्राइवर?

मीरा ने दरवाज़े की तरफ इशारा किया।

दरवाज़ा खुला। होटल से अरविंद और रिया को लाने वाला ड्राइवर अंदर आया। उसका नाम रमेश यादव था। साधारण कुर्ता, घबराया चेहरा, मगर आंखों में वह थकान थी जो उन लोगों में होती है जो अमीरों के राज़ ढोते-ढोते बूढ़े हो जाते हैं।

वसुधा ने पूछा:

—रमेश, कल गाड़ी में क्या हुआ था?

रमेश ने नैना की तरफ देखा, जैसे क्षमा मांग रहा हो।

—मैडम, गाड़ी में रिया मैडम ने कहा था कि नैना मैडम उन्हें घूरती हैं। अरविंद सर ने कहा था कि आज रात कोई तमाशा नहीं चाहिए। अगर वह बोलें तो उन्हें संभाल लेना।

मीरा ने पूछा:

—संभाल लेना का मतलब?

रमेश ने होंठ भींचे।

—रिया मैडम ने हंस कर कहा था कि वह उन्हें उनकी जगह दिखा देंगी। सर ने कुछ नहीं कहा। बस मुस्कुरा दिए।

नैना की आंखें पहली बार झपकीं।

थप्पड़ का दर्द कम था। यह जानना ज़्यादा भारी था कि अपमान अचानक नहीं हुआ था। वह योजना था। उसके पति ने उसे चुप कराने का काम किसी और औरत को सौंप दिया था।

अरविंद टूटते हुए बोला:

—मैंने थप्पड़ मारने को नहीं कहा था।

नैना ने धीमे से कहा:

—तुमने रोकने को भी नहीं कहा था।

बोर्ड ने उसी दिन निर्णय लिया। अरविंद को कार्यकारी पद से तत्काल अवकाश पर भेजा गया। करण के वित्तीय अधिकार निलंबित हुए। रिया को जांच पूरी होने तक निलंबित किया गया। बाहरी फॉरेंसिक ऑडिट शुरू हुआ। मेहता परिवार न्यास ने 600 करोड़ की पुल-राशि रोक दी, मगर पूरी तरह वापस नहीं ली।

वसुधा सेन ने नैना से पूछा:

—आप चाहें तो यह कंपनी आज ही गिर सकती है। आपकी अनुशंसा क्या है?

सभी ने नैना की तरफ देखा।

नैना ने मेज़ पर रखे दस्तावेज़ बंद कर दिए।

—कंपनी में 3200 कर्मचारी हैं। उनके बच्चों की फीस, घर की किश्तें और बुजुर्ग माता-पिता की दवाइयां अरविंद की बेवफाई की सज़ा नहीं भुगतेंगी।

अरविंद ने पहली बार उसकी तरफ उम्मीद से देखा।

नैना ने आगे कहा:

—मगर शर्तें मेरी होंगी। स्वतंत्र ऑडिट, सभी संदिग्ध भुगतान फ्रीज़, कर्मचारियों की नौकरी सुरक्षित, निदेशक मंडल की नई निगरानी, परिवार के खातों की जांच और अरविंद खुराना की कोई एकल स्वीकृति नहीं।

अरविंद की उम्मीद उसी पल मर गई।

—तुम मुझे मेरी ही कंपनी से बाहर कर रही हो?

नैना ने कहा:

—तुमने खुद को बाहर कर लिया था। मैं सिर्फ दरवाज़ा बंद कर रही हूं।

शाम तक खबर लीक हो गई। पहले सिर्फ 7 सेकंड का वीडियो बाहर आया, जिसमें रिया नैना को थप्पड़ मारती दिख रही थी, लेकिन उसके बाद की बात नहीं। कुछ पन्नों ने इसे अमीर पत्नी और मेहनती सहायक की लड़ाई बना दिया। कुछ ने लिखा कि नैना ने अपनी ताकत से कर्मचारी को कुचल दिया।

रिया ने भी एक बयान जारी कर दिया कि वह सिर्फ अपने बॉस की रक्षा कर रही थी।

नैना ने वह बयान 2 बार पढ़ा। फिर उसने मीरा को सिर्फ 1 संदेश भेजा।

—पूरा।

रात 8:40 पर पूरा वीडियो जारी हुआ। बिना संगीत, बिना नाटकीय शब्द, बिना काट-छांट।

रिया का ताना।

रिया का थप्पड़।

अरविंद की चुप्पी।

नैना का जवाब।

अरविंद का वीडियो रोकने की कोशिश करना।

मीरा का शिकायत दर्ज करवाना।

और फिर रमेश की आवाज़ वाला वह छोटा ऑडियो, जिसमें साफ़ सुनाई दे रहा था कि रिया पहले से नैना को उनकी जगह दिखाने की बात कर रही थी।

रात 10 बजे तक इंटरनेट ने अपना फैसला बदल दिया। वही लोग जो सुबह नैना को घमंडी कह रहे थे, अब लिख रहे थे कि शांत औरत जब उठती है तो महल हिलते हैं। खुराना इंफ्रालिंक का बयान मज़ाक बन गया। निवेशकों ने खुली जांच की मांग की। कर्मचारियों ने गुमनाम संदेश भेजे कि कंपनी में सालों से परिवार के नाम पर अत्याचार चल रहा था।

रिया ने अगले दिन पूछताछ में सहयोग शुरू कर दिया। उसने बताया कि करण ने उसे कई बार भुगतान छिपाने में मदद करने को कहा था। उसने यह भी बताया कि अरविंद ने उसे घर में जगह बनाने दिया, क्योंकि वह नैना को भावनात्मक रूप से अकेला करना चाहता था ताकि न्यास पर दबाव डाल सके।

यह सुनकर नैना हंसी नहीं, रोई भी नहीं।

वह सिर्फ खिड़की के पास खड़ी रही।

कुछ धोखे प्रेम को नहीं मारते। वे भीतर बैठी दया को मार देते हैं।

3 दिन बाद अरविंद नैना के दक्षिण दिल्ली वाले घर के बाहर आया। बारिश हो रही थी। गेट पर चौकीदार ने उसे रोक दिया।

—मुझे अंदर जाना है। मैं इस घर का दामाद हूं।

चौकीदार ने फोन पर बात करके कहा:

—मैडम ने मना किया है।

अरविंद ने नैना को कॉल किया।

—मैं बाहर खड़ा हूं।

—मुझे पता है।

—बारिश हो रही है।

—दिल्ली में जून की बारिश अक्सर अचानक आ जाती है।

—नैना, यह मज़ाक का समय नहीं है।

—मैं मज़ाक नहीं कर रही। पहली बार नहीं कर रही।

वह कुछ पल चुप रहा।

—मैंने गलती की।

—गलती तारीख़ भूलना होती है। तुमने मेरी चुप्पी को हथियार बनाया।

—मैं दबाव में था।

—तो तुमने मुझे ढाल बना दिया।

—मैं तुमसे प्यार करता हूं।

नैना ने आंखें बंद कीं।

—प्यार वह नहीं होता जो सार्वजनिक मेज़ पर किसी और को तुम्हारी पत्नी को अपमानित करने दे।

अरविंद की आवाज़ टूट गई।

—क्या अब कुछ बचा है?

नैना ने साफ़ कहा:

—तलाक।

बारिश की आवाज़ फोन के दोनों तरफ सुनाई दे रही थी।

अरविंद ने धीमे से कहा:

—तुम सच में मुझे छोड़ दोगी?

—नहीं। मैं उस जगह से उठ रही हूं, जहां तुमने मुझे बहुत देर तक बैठाए रखा।

तलाक की अर्जी अगले सोमवार दाखिल हुई। वैवाहिक समझौते के अनुसार नैना की संपत्ति सुरक्षित थी। घर मेहता न्यास के नाम पर था। अरविंद के हिस्से में कंपनी के कुछ शेयर बचे, मगर कुर्सी नहीं। करण पर आर्थिक अपराध शाखा की जांच शुरू हुई। रिया ने अपने बयान के बदले हल्की कानूनी राहत मांगी, लेकिन उसका करियर उसी रात खत्म हो चुका था, जब उसने सत्ता को प्रेम समझने की भूल की थी।

6 महीने बाद खुराना इंफ्रालिंक में नया प्रबंधन आया। कर्मचारियों की नौकरी बची। त्रिवेणी लॉजिस्टिक्स की खरीद फिर हुई, मगर इस बार खुली निगरानी में। आशीष बत्रा अंतरिम प्रमुख बने। मेहता परिवार न्यास ने कंपनी को बचाया, पर परिवार के नियंत्रण से दूर रखा।

नैना ने कभी टीवी पर जाकर रोना नहीं बेचा। उसने कोई बदला वाला साक्षात्कार नहीं दिया। लेकिन एक दिन दिल्ली विश्वविद्यालय के विधि संकाय में उसे बोलने बुलाया गया।

सभागार में सैकड़ों लड़कियां बैठी थीं। कई ने वह वीडियो देखा था। कई ने अपने घरों में वैसा ही छोटा अपमान महसूस किया था, बस कैमरा नहीं था।

नैना मंच पर खड़ी हुई।

—लड़कियों को बचपन से सिखाया जाता है कि घर बचाने के लिए थोड़ा सह लो। शादी बचाने के लिए मुस्कुरा दो। परिवार की इज़्ज़त के लिए चुप रहो।

कोई नहीं हिला।

—लेकिन चुप्पी अगर रोज़ किसी और की ताकत बन जाए, तो वह संस्कार नहीं रहती। वह आपकी ही कैद बन जाती है।

एक छात्रा ने पूछा:

—अगर जवाब देने पर लोग कहें कि आप भी वैसी ही हो गईं तो?

नैना ने अपने गाल को हल्के से छुआ। निशान अब नहीं था, मगर याद थी।

—हर थप्पड़ का जवाब थप्पड़ नहीं होता। कभी जवाब एक ईमेल संभाल कर रखना होता है। कभी वकील को बुलाना होता है। कभी बोर्डरूम में सच बोलना होता है। और कभी सिर्फ इतना कहना होता है कि अब मेरी जगह मैं खुद तय करूंगी।

सभागार तालियों से भर गया।

उस रात नैना घर लौटी तो भोजन मेज़ पर सिर्फ 1 थाली लगी थी। खिड़की खुली थी। बारिश के बाद की हवा में मिट्टी की गंध थी। कमरे में कोई ऊंची आवाज़ नहीं थी, कोई आदेश नहीं था, कोई बनावटी मुस्कान नहीं थी।

सालों बाद पहली बार वह अकेली नहीं लगी।

वह अपने साथ थी।

और कभी-कभी औरत की सबसे बड़ी जीत यही होती है कि जिस चुप्पी को लोग उसकी हार समझते थे, वही एक दिन उसकी शांति बन जाती है।

Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.