
PART 1
“जब तक अपना नाम सीधा नहीं लिखेगी, तब तक तू इसी तहखाने में रहेगी।”
अरविंद मल्होत्रा ने यह वाक्य अपनी ही कोठी के नीचे से सुना, और उसके कदम संगमरमर की सीढ़ियों पर जम गए। दिल्ली के वसंत विहार में बनी उसकी 3 मंज़िला कोठी बाहर से किसी महल जैसी लगती थी, लेकिन उस दोपहर उसके भीतर से आती 4 साल की बच्ची की सिसकियाँ किसी बंद कमरे की दीवारें चीर रही थीं।
अरविंद 42 साल का था, गुरुग्राम में रियल एस्टेट और होटल कारोबार का मालिक। लोग उसे तेज़, सख्त और सफल आदमी मानते थे। लेकिन उस दिन वह किसी मीटिंग के कारण नहीं, बल्कि अपनी बेटी तारा की डरी हुई आँखों के कारण घर लौटा था।
पिछले 15 दिनों से तारा सुबह यूनिफॉर्म देखते ही काँपने लगती थी।
“पापा, स्कूल नहीं जाना… प्लीज़…”
अरविंद समझता रहा कि शायद नए बच्चों से डरती है। उसकी दूसरी पत्नी काव्या हर बार मुस्कुराकर तारा को गोद में उठा लेती।
“आप ऑफिस जाइए, अरविंद। बच्ची ज़िद कर रही है। मैं संभाल लूँगी। आखिर मैं भी पहले प्री-स्कूल में पढ़ाती थी।”
काव्या उसकी ज़िंदगी में मीरा की मौत के 1 साल बाद आई थी। मीरा, तारा की माँ, कैंसर से चली गई थी। अरविंद टूट गया था। घर, बच्ची, कारोबार—सब बिखर रहा था। उसी वक्त काव्या रिश्तेदारों के ज़रिए आई। सधी हुई बोली, साड़ी में शालीनता, पूजा में सिर झुकाए खड़ी रहने वाली और मेहमानों के सामने तारा के बालों में रिबन बाँधने वाली।
सब कहते थे, “भगवान ने तारा को दूसरी माँ भेज दी।”
लेकिन उस सुबह अरविंद को कुछ अजीब लगा। ऑफिस जाते समय उसने देखा था, तारा ने अपना बैग नहीं उठाया था। काव्या ने कहा था कि वह बाद में ड्राइवर से भिजवा देगी। मीटिंग के बीच अरविंद बेचैन हुआ और उसने स्कूल में फोन कर दिया।
“मैं तारा मल्होत्रा का पिता बोल रहा हूँ। वह क्लास में है?”
उधर से जवाब आया, “सर, तारा आज आई ही नहीं। आपकी पत्नी ने सुबह कहा कि बच्ची को बुखार है।”
अरविंद का गला सूख गया। जब वह निकला था, तब काव्या तारा को स्कूल भेजने का नाटक कर रही थी।
वह बिना बताए घर लौटा। दरवाज़ा नौकरानी शांता ने खोला, लेकिन उसकी आँखें झुकी हुई थीं। घर असामान्य रूप से शांत था। न टीवी, न खिलौनों की आवाज़, न तारा की हँसी।
तभी तहखाने की तरफ से धीमी रोने की आवाज़ आई।
अरविंद नीचे उतरा।
तारा छोटी मेज़ के सामने बैठी थी। उसकी उंगलियाँ काँप रही थीं। कागज़ों पर बार-बार लिखा था—“तारा मल्होत्रा”। कहीं अक्षर टेढ़े थे, कहीं आधे, कहीं पेंसिल टूटकर फैल गई थी।
काव्या उसके ऊपर खड़ी थी, हाथ में लाल मार्कर।
“फिर से लिख। मल्होत्रा परिवार की बेटी ऐसी गंदी लिखावट नहीं रख सकती।”
“मम्मा… हाथ दुख रहा है…”
“मुझे मम्मा मत बोल जब तक नाम ठीक से लिखना न सीख जाए।”
तभी अरविंद दरवाज़े पर आया।
“काव्या, तुम मेरी बेटी के साथ क्या कर रही हो?”
तारा ने चेहरा उठाया, आँखें आँसुओं से सूजी हुई थीं।
“पापा… मुझे यहाँ से ले चलो… वो कहती हैं अगर मैं खराब लिखूँगी तो आप मुझे भी छोड़ देंगे, जैसे मम्मा चली गई…”
अरविंद के भीतर कुछ टूट गया।
उसे उसी पल समझ आ गया कि डर स्कूल से नहीं था।
डर इसी घर में रहता था।
PART 2
तारा दौड़कर अरविंद से लिपट गई, जैसे किसी अंधे कुएँ से बाहर निकली हो। उसने बेटी को गोद में उठाया तो उसकी छोटी उंगलियों पर पेंसिल के काले निशान थे, हथेली पर दबाव से लाल खरोंचें बनी थीं और होंठ सूखे हुए थे।
“ये कब से चल रहा है?” अरविंद की आवाज़ काँप रही थी।
काव्या ने बिना शर्म के कहा, “मैं उसे सुधार रही हूँ। 4 साल की है और अपना नाम भी ठीक नहीं लिखती। अमीर घर की बच्ची है, सड़कछाप नहीं।”
अरविंद ने मेज़ से कॉपी उठाई। ऊपर लाल अक्षरों में लिखा था—“निकम्मी”, “फिर से”, “शर्म करो”।
तारा ने उसके कान में फुसफुसाया, “वो कहती हैं अगर मैं परफेक्ट नहीं हुई तो मम्मा आसमान से रोएँगी।”
अरविंद ने स्कूल की टीचर को फोन लगाया। जवाब ने उसका शक पक्का कर दिया।
“सर, तारा बहुत प्यारी और रचनात्मक बच्ची है। इस उम्र में लिखावट पर इतना दबाव गलत है। मैंने आपकी पत्नी से कहा भी था कि तुलना न करें।”
काव्या ने झपटकर फोन काट दिया।
“ऐसी टीचर ही बच्चों को कमजोर बनाती हैं।”
तभी अरविंद की नज़र ड्रॉइंग रूम की मेज़ पर रखी नीली फाइल पर पड़ी। उसमें नकली प्रोग्रेस रिपोर्ट, स्कूल बदलने के आवेदन और फैमिली ट्रस्ट के कागज़ थे।
एक नोट पर लिखा था—“बच्ची की भावनात्मक अक्षमता दिखानी होगी। पिता व्यस्त है। शैक्षणिक अभिभावक का अधिकार माँ को मिले।”
आखिरी पन्ने पर मीरा के नाम से एक पुरानी चिट्ठी थी।
और उसे देखते ही अरविंद के पैरों तले ज़मीन खिसक गई।
PART 3
वह चिट्ठी मीरा की लिखावट में थी।
अरविंद ने उसे काँपते हाथों से खोला। कागज़ पीला पड़ चुका था, किनारे मुड़े हुए थे। ऊपर तारीख थी, मीरा की मौत से 3 महीने पहले की।
उसने पहली पंक्ति पढ़ते ही साँस रोक ली।
“अरविंद, अगर मैं कभी तारा के साथ न रह सकूँ, तो उसे यह मत सिखाना कि प्यार कमाने के लिए उसे परफेक्ट होना पड़ेगा।”
कमरे में अजीब सन्नाटा फैल गया। काव्या पहली बार घबराई। तारा अभी भी अरविंद की गर्दन से चिपकी हुई थी, पर उसकी छोटी आँखें उस कागज़ पर टिकी थीं, जैसे उसे महसूस हो रहा हो कि उसमें उसकी असली माँ की आवाज़ बंद है।
अरविंद पढ़ता गया।
“उसे मिट्टी में खेलने देना। उसे उल्टे अक्षर लिखने देना। उसे गाना बेसुरा गाने देना। उसे गलती करने देना। अगर कोई कभी अनुशासन के नाम पर उसका दिल तोड़े, तो मेरी तरफ से उसके सामने खड़े हो जाना।”
अरविंद की आँखों से आँसू गिर पड़े। उसने कितने महीनों से मीरा की कोई चीज़ खोली भी नहीं थी, क्योंकि हर याद उसे कमजोर कर देती थी। और इसी कमजोरी का फायदा काव्या ने उठाया था।
“ये चिट्ठी तुम्हारे पास क्यों थी?” उसने धीमे लेकिन भारी स्वर में पूछा।
काव्या ने होंठ भींच लिए।
“क्योंकि मीरा ने तारा को बिगाड़कर रखा होता। वह बच्ची को रानी बनाती थी। मैं उसे असली दुनिया के लिए तैयार कर रही थी।”
“असली दुनिया?” अरविंद की आवाज़ में आग थी। “4 साल की बच्ची को तहखाने में बंद करके?”
“मैंने उसे बंद नहीं किया। बस ध्यान भटकने से रोका। तुम समझते नहीं। तुम्हारे पास पैसा है, नाम है। लोग तुम्हारी बेटी को देखेंगे। अगर वह कमजोर निकली तो सब हँसेंगे।”
“लोग हँसेंगे या तुम्हें डर था कि वह बड़ी होकर अपने ट्रस्ट पर खुद अधिकार माँगेगी?”
काव्या का चेहरा सफेद पड़ गया।
अरविंद ने नीली फाइल के कागज़ उठाए। हर पन्ना जैसे उसके घर में छिपे षड्यंत्र का सबूत था। नकली स्कूल रिपोर्ट में लिखा था कि तारा “भावनात्मक रूप से अस्थिर” है। दूसरे कागज़ में सुझाव था कि बच्ची को “विशेष शैक्षणिक निगरानी” चाहिए। तीसरे में यह मसौदा था कि अरविंद की व्यस्त जीवनशैली के कारण काव्या को तारा की शिक्षा और देखभाल से जुड़े खर्चों पर अधिकार दिया जाए।
और सबसे नीचे फैमिली ट्रस्ट की कॉपी थी।
मीरा ने अपनी बीमारी के दौरान तारा के नाम एक बड़ा हिस्सा सुरक्षित रखा था। उस धन को तारा के 18 साल की होने तक केवल उसके पिता की अनुमति से ही इस्तेमाल किया जा सकता था। लेकिन अगर पिता को “भावनात्मक रूप से अनुपलब्ध” और बच्ची को “विशेष देखभाल की ज़रूरत” साबित कर दिया जाता, तो अदालत से एक सह-अभिभावक को वित्तीय अधिकार मिल सकते थे।
काव्या बेटी को परफेक्ट नहीं बनाना चाहती थी।
वह उसे टूटा हुआ साबित करना चाहती थी।
ताकि तारा की ज़िंदगी, उसकी पढ़ाई, उसकी विरासत, सब पर उसका नियंत्रण हो जाए।
अरविंद ने तुरंत अपने वकील निखिल मेहरा को फोन किया। फिर बाल मनोवैज्ञानिक डॉ. ईशा कपूर को बुलाया। उसके बाद मीरा की बड़ी बहन नंदिता को कॉल किया, जो जयपुर में रहती थी और तारा से बेहद प्यार करती थी।
काव्या हँस पड़ी।
“कॉल कर लो जिसे करना है। कौन मानेगा कि लिखना सिखाना अपराध है? दिल्ली में हर माता-पिता बच्चे पर दबाव डालते हैं। तुम मुझे खलनायिका बना दोगे?”
तभी पीछे से शांता की धीमी आवाज़ आई।
“साहब… मैं बोल सकती हूँ?”
अरविंद ने मुड़कर देखा। शांता 12 साल से मल्होत्रा घर में काम कर रही थी। मीरा के समय से। उसकी आँखों में डर था, लेकिन उसके हाथ में पुराना मोबाइल था।
“मैंने 3 दिन पहले वीडियो बनाया था, साहब। मुझे डर था नौकरी चली जाएगी, पर बच्ची की हालत देखी नहीं गई।”
काव्या चीखी, “चुप! नौकरानी होकर घर के मामले में बोल रही है?”
शांता काँपी, लेकिन पीछे नहीं हटी।
“मैडम ने तारा बिटिया को 2 बार नीचे बंद किया। एक बार लाइट भी बंद कर दी थी। बोली थीं, अँधेरे में बैठेगी तो याद रहेगा।”
अरविंद ने मोबाइल लिया। वीडियो धुंधला था, पर आवाज़ साफ थी। तारा रो रही थी। काव्या कह रही थी, “अगर तूने पापा से शिकायत की तो मैं उन्हें कह दूँगी कि तू झूठ बोलती है। फिर वो तुझे बोर्डिंग स्कूल भेज देंगे।”
अरविंद का चेहरा पत्थर जैसा हो गया।
तारा ने “बोर्डिंग” शब्द सुनते ही फिर काँपना शुरू कर दिया।
उस शाम वकील आया। डॉ. ईशा ने तारा से बहुत धीरे बात की। तारा पहले चुप रही। फिर उसने अपना गुलाबी खिलौना हाथी पकड़कर बताया कि काव्या उसे “धीमी बच्ची” कहती थी, उसकी कॉपी फाड़ देती थी, और कहती थी कि असली माँ होती तो शर्म से मर जाती।
यह सुनकर नंदिता फोन पर रो पड़ी।
रात 9 बजे तक मामला स्पष्ट हो चुका था। अरविंद ने काव्या से कहा, “तुम अभी इस घर से जाओगी। बिना तारा से मिले।”
काव्या ने गुस्से में दीवार पर रखी मीरा की तस्वीर की ओर इशारा किया।
“तुम सब उसी औरत की पूजा करते रहो। मैंने इस घर को संभाला। मैंने बच्ची को नहलाया, खिलाया, स्कूल की मीटिंग में गई। तुम कहाँ थे?”
यह सच था, और यही सच अरविंद को भीतर से काट रहा था।
मीरा के जाने के बाद वह काम में डूब गया था। उसे लगा था कि पैसा सुरक्षा देता है। उसने बड़ी कोठी, महंगी नैनी, अच्छा स्कूल और दूसरी शादी को समाधान समझ लिया। वह भूल गया कि बच्ची को सबसे पहले पिता की आँख चाहिए होती है, जो देखे कि उसके दिल पर क्या बीत रही है।
“मैं गलत था,” उसने कहा। “लेकिन मेरी गलती तुम्हें मेरी बेटी को तोड़ने का अधिकार नहीं देती।”
काव्या ने जाते-जाते धमकी दी।
“मैं कोर्ट जाऊँगी। मैं कहूँगी तुमने मुझे घर से निकाला। मैं कहूँगी बच्ची सच में अस्थिर है।”
“जाओ,” अरविंद ने कहा। “इस बार सच भी साथ जाएगा।”
अगले 2 महीने आसान नहीं थे।
मामला परिवार तक सीमित नहीं रहा। काव्या के मायके वालों ने फोन किए। कुछ रिश्तेदारों ने कहा, “बच्चों को थोड़ा सख्त रखना पड़ता है।” कुछ ने अरविंद को दोष दिया कि उसने दूसरी शादी की ही क्यों। कुछ ने शांता को लालची कहा। समाज में हमेशा ऐसे लोग होते हैं जो बच्चे के आँसू से ज़्यादा परिवार की इज़्ज़त को बचाना चाहते हैं।
लेकिन इस बार अरविंद चुप नहीं रहा।
डॉ. ईशा की रिपोर्ट में लिखा था कि तारा को प्रदर्शन से जुड़ी गहरी घबराहट, गलती करने का डर और अक्षरों से जुड़ा भावनात्मक तनाव है। स्कूल की टीचर ने बयान दिया कि तारा खुशमिजाज बच्ची थी, लेकिन पिछले दिनों अक्षरों के समय उसके पेट में दर्द शुरू हो जाता था। स्कूल रिकॉर्ड से साबित हुआ कि काव्या ने कई बार झूठ बोलकर छुट्टी करवाई थी।
नोटरी ऑफिस ने भी बताया कि काव्या ने फैमिली ट्रस्ट से जुड़े कागज़ों की जानकारी लेने की कोशिश की थी, जबकि वह अधिकृत नहीं थी।
काव्या की सबसे बड़ी गलती यही थी कि उसने सब कुछ बहुत व्यवस्थित ढंग से किया था। हर नकली रिपोर्ट, हर नोट, हर आवेदन अब उसके खिलाफ सबूत बन गया।
कोर्ट में जब वीडियो चलाया गया, तारा को अंदर नहीं लाया गया। अरविंद ने साफ कहा था कि बेटी को फिर से वही डर नहीं झेलने देगा। जज ने वीडियो देखा, रिपोर्ट पढ़ी और काव्या की ओर देखकर बस इतना कहा, “अनुशासन और अपमान में फर्क होता है। बच्चा संपत्ति नहीं है।”
काव्या को तारा से दूर रहने का आदेश मिला। तलाक की प्रक्रिया शुरू हुई। उसे न घर पर अधिकार मिला, न ट्रस्ट पर, न बच्ची की शिक्षा पर। शांता की नौकरी बची, बल्कि अरविंद ने उसके बेटे की पढ़ाई का खर्च उठाने का निर्णय लिया, क्योंकि उसने वही साहस दिखाया था जो घर के अमीर लोगों ने नहीं दिखाया।
लेकिन असली लड़ाई कागज़ों में नहीं थी।
असली लड़ाई तारा के भीतर थी।
पहले कई हफ्तों तक वह पेंसिल देखते ही अरविंद की गोद में छिप जाती। स्कूल का बैग देखते ही कहती, “आज छुट्टी कर लो ना, पापा।” वह हर ड्रॉइंग बनाकर पूछती, “गलत है क्या?” हर अक्षर के बाद रबर ढूँढती। अगर पेंसिल की नोक टूट जाती तो रो पड़ती, जैसे कोई बड़ी गलती हो गई हो।
अरविंद ने अपनी ज़िंदगी बदल दी।
सुबह 7 बजे वह खुद तारा के साथ नाश्ता करता। कभी पराठा गोल नहीं बनता, तो वह हँसकर कहता, “देखो, ये तो भारत का नक्शा बन गया।” तारा पहले डरती, फिर धीरे से मुस्कुराती। शाम को वह मीटिंग छोड़कर उसे लोधी गार्डन ले जाता। वहाँ तारा मिट्टी में पत्ते दबाती, चींटियों को देखती, पत्थरों को नाम देती। अरविंद उसे रोकता नहीं था।
एक दिन डॉ. ईशा ने कहा, “उसे लिखने के लिए मत कहिए। पहले उसे गड़बड़ करने दीजिए।”
उस रात अरविंद ने डायनिंग टेबल पर अखबार बिछाया, रंग निकाले और खुद अपनी उंगलियाँ नीले रंग में डुबो दीं।
तारा हैरान होकर बोली, “पापा, गंदा हो जाएगा।”
“होने दो,” अरविंद ने कहा। “गंदा मतलब मज़ेदार।”
उसने कागज़ पर एक टेढ़ा-मेढ़ा हाथी बनाया। तारा ने उसे ध्यान से देखा और पहली बार खिलखिलाई।
“ये हाथी नहीं, आलू है।”
“तो आलू हाथी है।”
धीरे-धीरे तारा ने रंगों से दोस्ती की। फिर लकीरों से। फिर गोल-गोल आकारों से। अक्षर अभी भी दूर थे, लेकिन डर थोड़ा कम हो रहा था।
मीरा की चिट्ठी अरविंद ने फ्रेम करवाकर तारा के कमरे में नहीं लगाई। उसने उसे अपनी मेज़ की दराज़ में रखा, ताकि वह रोज़ पढ़ सके और याद रख सके कि एक बच्ची की परवरिश आदेश से नहीं, धैर्य से होती है।
नंदिता जयपुर से आई और 10 दिन रही। उसने तारा को कहानियाँ सुनाईं—ऊँटों की, पतंगों की, बारिश की। वह हर बार जानबूझकर कोई शब्द गलत बोलती, और तारा उसे सुधारती। एक दिन तारा ने खुद कहा, “मौसी, गलती करने से डाँट नहीं पड़ती?”
नंदिता ने उसका माथा चूमा।
“नहीं, गलती करने से कहानी बनती है।”
स्कूल में भी व्यवस्था बदली गई। टीचर ने तारा को लिखने की जगह चित्रों से भाग लेने दिया। जब बच्चे अपना नाम लिखते, तारा पहले अपने नाम का सूरज बनाती। फिर एक दिन उसने कागज़ पर सिर्फ “ता” लिखा। टेढ़ा, बड़ा, काँपता हुआ।
टीचर ने तालियाँ नहीं बजाईं। उन्होंने सिर्फ मुस्कुराकर कहा, “मुझे दिख रहा है, तुमने मेहनत की।”
क्योंकि अब हर कोई समझ चुका था कि तारा को प्रशंसा से भी डर लग सकता है, अगर वह उसे फिर से परफेक्ट बनने की दौड़ में धकेल दे।
6 महीने बाद दीवाली आई।
मल्होत्रा कोठी में पहली बार बिना दिखावे की दीवाली थी। न बड़े मेहमान, न कारोबारी पार्टनर, न सजावटी हँसी। बस अरविंद, तारा, नंदिता मौसी, शांता और कुछ पुराने लोग जो सच में घर जैसे थे।
तारा ने रंगोली बनाई। रंग फैल गए। मोर की जगह कुछ ऐसा बना जो आधा पतंग, आधा बादल लगता था। पहले वह रुक गई। उसने अरविंद की ओर देखा, जैसे फैसला उसी के चेहरे पर लिखा होगा।
अरविंद ने पूछा, “ये क्या है?”
तारा ने थोड़ा सोचा।
“ये उड़ता हुआ मोर है। अभी सीख रहा है।”
अरविंद की आँखें भर आईं।
“तो ये सबसे सुंदर है।”
उस रात पूजा के बाद तारा अपने कमरे से एक मोड़ी हुई शीट लेकर आई। वह अरविंद के सामने खड़ी रही। उसकी उंगलियाँ अब भी थोड़ी काँप रही थीं, लेकिन आँखों में पहले जैसी दहशत नहीं थी।
“पापा, ये आपके लिए है।”
कागज़ पर 3 लोग बने थे। एक छोटी बच्ची, एक लंबा आदमी और आसमान में एक मुस्कुराती औरत। नीचे बड़े टेढ़े अक्षरों में लिखा था—“पापा तारा से प्यार करते हैं।”
“करते हैं?” अरविंद ने धीरे से पूछा।
तारा ने सिर हिलाया।
“हमेशा?”
अरविंद घुटनों के बल बैठ गया।
“हमेशा। जब तुम सही लिखो, तब भी। जब गलत लिखो, तब भी। जब कुछ न लिखो, तब भी।”
तारा ने पहली बार बिना डर के पेंसिल उठाई और नीचे एक और पंक्ति जोड़ने लगी। अक्षर बिखरे, पेंसिल अटकी, “र” अजीब बन गया, लेकिन उसने रबर नहीं उठाया।
उसने लिखा—“मम्मा भी।”
अरविंद ने उसे सीने से लगा लिया। इतने महीनों बाद पहली बार उसे लगा कि मीरा कहीं गई नहीं है। वह तारा की हँसी में, उसके टेढ़े अक्षरों में, उस कमरे की हवा में वापस आ गई है।
2 साल बाद तारा अपनी क्लास की सबसे तेज़ लिखने वाली बच्ची नहीं बनी। वह अभी भी कभी-कभी “मल्होत्रा” में अक्षर उलट देती थी। गणित में उसे मदद चाहिए होती थी। ड्रॉइंग में वह घरों को पहाड़ से बड़ा बना देती थी। लेकिन वह अब पेंसिल से नहीं डरती थी।
काव्या की दुनिया छोटी हो गई। समाज में जिन लोगों ने पहले उसे “संस्कारी” कहा था, वही अब फुसफुसाते थे। उसके खिलाफ आर्थिक धोखाधड़ी की जाँच भी चली, क्योंकि ट्रस्ट से जुड़े दस्तावेज़ों में छेड़छाड़ साबित हुई। उसे जेल नहीं हुई, लेकिन अदालत ने जुर्माना लगाया और तारा से किसी भी संपर्क पर रोक कायम रखी। कभी-कभी न्याय सजा से ज़्यादा दूरी का नाम होता है।
अरविंद ने फिर शादी नहीं की। लोगों ने बहुत कहा, “बच्ची को माँ की ज़रूरत होती है।” वह हर बार शांत स्वर में जवाब देता, “बच्ची को पहले सुरक्षित घर की ज़रूरत होती है।”
तारा बड़ी होती गई। घर की फ्रिज पर अब भी उसके कागज़ चिपकते रहे—कभी टेढ़े अक्षर, कभी रंग से भरे हाथ, कभी आधा लिखा शब्द। हर शीट के नीचे अरविंद तारीख लिखता, जैसे वे कोई महँगी पेंटिंग हों।
एक दिन किसी मेहमान ने हँसते हुए कहा, “इतने बड़े बिजनेसमैन के घर में ये बच्चों वाली गंदी ड्रॉइंग क्यों लगी हैं?”
तारा उस समय पास ही खड़ी थी। उसका चेहरा एक पल को बुझा।
अरविंद ने बिना गुस्से के फ्रिज की ओर देखा।
“क्योंकि इस घर में अब गलती छिपाई नहीं जाती। संभालकर रखी जाती है।”
मेहमान चुप हो गया।
तारा ने धीरे से अपने पिता का हाथ पकड़ लिया।
उस रात अरविंद ने मीरा की चिट्ठी फिर पढ़ी। आखिरी पंक्ति पर उसकी नज़र ठहर गई।
“तारा को दुनिया के लिए मजबूत बनाना, लेकिन पहले उसे यह यकीन देना कि घर उसके खिलाफ नहीं है।”
अरविंद ने चिट्ठी बंद की, कमरे की बत्ती धीमी की और तारा के दरवाज़े तक गया। अंदर वह गहरी नींद में थी। मेज़ पर खुली कॉपी पड़ी थी। उसमें एक वाक्य लिखा था—
“मेरी लिखाई टेढ़ी है, पर मेरा घर सीधा है।”
अरविंद ने कॉपी को छुआ नहीं। सुधारा नहीं। लाल निशान नहीं लगाया।
बस चुपचाप दरवाज़े के बाहर खड़ा रहा, जैसे पहरा दे रहा हो।
क्योंकि एक बच्चे का बचपन लाल मार्कर से ठीक नहीं किया जाता।
उसे पिता की बाँहों, सच की हिम्मत और बिना शर्त प्यार से बचाया जाता है।
Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.