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“माँ, वो आदमी पापा हैं” — 9 साल के बेटे ने विमान में कांपते हुए कहा; विधवा बनी मां ने उसके हाथ का पुराना निशान देखा, और 3 साल की मौत की कहानी अचानक सबसे बड़ा धोखा लगने लगी।

ભાગ 1:

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—माँ… वो आदमी पापा हैं।

आरव की आवाज इतनी धीमी थी कि 1 पल के लिए मीरा अरोड़ा को लगा, जैसे विमान के इंजन की गूंज ने उसके दिल के अंदर कोई पुराना जख्म बोल दिया हो। लेकिन उसका 9 साल का बेटा सचमुच सीट के पास खड़ा था, चेहरा सफेद, होंठ कांपते हुए, और उसकी उंगलियां सीट की पीठ को ऐसे पकड़े थीं जैसे आसमान में उड़ता विमान अचानक खाई में गिरने वाला हो।

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दिल्ली से गोवा जाने वाली फ्लाइट अब तक बिल्कुल सामान्य थी। मीरा ने यह यात्रा किसी शौक में नहीं चुनी थी। उसने 3 साल तक सिलाई का काम करके, बच्चों को ट्यूशन पढ़ाकर और अपनी बची हुई छोटी-छोटी बचत जोड़कर 2 टिकट खरीदे थे। वह चाहती थी कि आरव पहली बार समुद्र देखे, ताकि उसके बचपन की यादों में सिर्फ अगरबत्ती, फोटो फ्रेम और पापा की अधूरी कहानियां न रहें।

3 साल पहले उसका पति अर्जुन अरोड़ा मुंबई के पास एक समुद्री तूफान में गायब हो गया था। कोई लाश नहीं मिली थी। सिर्फ उसकी नीली जैकेट एक खाली नाव में फंसी मिली, पानी में खराब हुआ मोबाइल और उसका भीगा हुआ आधार कार्ड। पुलिस ने कहा था कि समुद्र ने उसे निगल लिया। 2 महीने बाद मृत्यु प्रमाणपत्र आ गया था। ठंडी मुहर, सूखी भाषा और एक ऐसा सच, जिसे मीरा ने रोते-रोते मान लिया था।

लेकिन आरव ने कभी पूरा नहीं माना। वह हर रविवार अपने पिता की तस्वीर के सामने बैठकर स्कूल की बातें करता था। कभी-कभी होमवर्क की कॉपी फोटो के सामने खोलकर कहता था कि पापा देख रहे होंगे। मीरा ने मनोवैज्ञानिक से भी सलाह ली थी। डॉक्टर ने कहा था कि बच्चे कई बार शोक को कल्पना में बदल देते हैं। इसलिए मीरा ने गोवा चुना था। समुद्र, धूप, भीड़, आवाजें, नए दृश्य… शायद आरव के अंदर जमी हुई उदासी थोड़ी पिघल जाए।

लेकिन अब वही बच्चा विमान के आगे की तरफ इशारा कर रहा था।

—माँ, सच में वही हैं —आरव ने रोते हुए कहा— ग्रे टोपी वाले अंकल।

मीरा का गला सूख गया। वह उसे समझाना चाहती थी कि दर्द कई बार चेहरे बदल देता है। वह कहना चाहती थी कि किसी अजनबी की चाल, हंसी या हाथ किसी अपने की याद दिला सकते हैं। लेकिन जैसे ही उसने आगे देखा, उसकी सांस अटक गई।

बिजनेस क्लास की आखिरी सीट पर चौड़े कंधों वाला एक आदमी बैठा था। उसके साथ 1 जवान औरत थी, खुले भूरे बाल, बड़े काले चश्मे और महंगे सफेद कुर्ते में। आदमी ने हल्की दाढ़ी रखी हुई थी, आंखों पर चश्मा था और सिर पर ग्रे टोपी। जब उसने जूस का गिलास उठाया, मीरा की नजर उसके बाएं हाथ पर पड़ी।

हाथ के ऊपर वही टेढ़ा निशान।

मीरा की आंखों के सामने 1 पुरानी दोपहर चमक गई। शादी के 6 साल बाद, जब वे अलीबाग गए थे, अर्जुन ने जंग लगी सीढ़ी ठीक करते हुए अपना हाथ काट लिया था। मीरा ने होटल के छोटे किचन में उसकी पट्टी की थी और अर्जुन हंसते हुए बोला था कि निशान आदमी को रहस्यमय बना देते हैं।

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वह निशान किसी अजनबी का नहीं हो सकता था।

—माँ, उन्होंने अभी अपनी अंगूठी वाली उंगली भी रगड़ी —आरव ने कांपते हुए कहा— पापा झूठ बोलते समय ऐसा ही करते थे।

मीरा का दिल जैसे किसी ने नंगे हाथ से मरोड़ दिया। अर्जुन सचमुच ऐसा करता था। जब उसने बैंक के अजीब मैसेजों पर सवाल पूछा था, तब भी। जब रात 2 बजे बालकनी में जाकर फोन उठाता था, तब भी। जब उसने कहा था कि मुंबई का बिजनेस ट्रिप सिर्फ 2 दिन का है और फिर कभी वापस नहीं आया, तब भी।

विमान उतरा तो मीरा अपनी सीट से तुरंत नहीं उठी। उसने आरव का हाथ कसकर पकड़ा और लोगों को उतरने दिया। वह आदमी अपनी सीट से उठा, ऊपर वाले खाने से चांदी रंग का बैग निकाला और उस औरत की कमर पर हाथ रखकर आगे बढ़ गया। दरवाजे के पास धूप उसके चेहरे पर पड़ी।

दाढ़ी नई थी। बालों में सफेदी बढ़ गई थी। चेहरा थोड़ा पतला था।

लेकिन वह अर्जुन था।

आरव के मुंह से दबा हुआ सिसकारा निकला।

—भागना मत —मीरा ने कहा, जबकि उसकी अपनी टांगें भागकर उसके सामने खड़े हो जाने को तड़प रही थीं।

वे दोनों दूरी बनाकर एयरपोर्ट के गलियारे में उसके पीछे चले। आदमी आत्मविश्वास से चल रहा था, जैसे किसी के आंसुओं की कोई जिम्मेदारी उसके कंधों पर नहीं थी। उसके साथ वाली औरत मोबाइल पर कुछ दिखाकर हंस रही थी। आदमी ने उसके कान में कुछ कहा और उसने उसे हल्के से बांह पर मारा।

मीरा को उल्टी जैसा महसूस हुआ।

बैगेज बेल्ट के पास उसने एयरलाइन काउंटर पर जाकर धीमी आवाज में पूछा।

—माफ कीजिए, क्या इस फ्लाइट में अर्जुन अरोड़ा नाम का कोई यात्री था?

कर्मचारी ने स्क्रीन देखी, फिर सिर हिला दिया।

—नहीं मैडम, इस नाम से कोई यात्री नहीं दिख रहा।

—कबीर? कबीर अरोड़ा? या अर्जुन मल्होत्रा?

—मैडम, हम यात्री की जानकारी नहीं दे सकते, लेकिन इन नामों से भी कोई रिकॉर्ड नहीं है।

मीरा ने धन्यवाद कहा और पीछे हट गई। आरव उसे ऐसे देख रहा था जैसे उसकी मां अभी कोई फैसला सुनाने वाली हो।

—वो पापा थे ना?

मीरा घुटनों के बल उसके सामने बैठी। 3 साल तक उसने अपने बेटे को नरम झूठों से बचाया था। पापा तुमसे बहुत प्यार करते थे। समुद्र खतरनाक होता है। कुछ लोग मजबूरी में चले जाते हैं। लेकिन अब वह झूठ उसके गले में कांटे की तरह अटक गया।

—मुझे नहीं पता क्या हो रहा है —उसने कहा— लेकिन मैं सच पता लगाऊंगी।

वे एक साधारण होटल पहुंचे, जो बीच से थोड़ा दूर था। आरव थककर रोते-रोते सो गया, पर उसका हाथ अभी भी अपनी छोटी बैग पर रखा था, जिसमें वह अपने पिता की पुरानी तस्वीर लाया था।

मीरा पूरी रात नहीं सो पाई। रात 1:12 पर वह बालकनी में हवा लेने आई। नीचे होटल के छोटे से गार्डन से एक औरत की हंसी सुनाई दी। फिर एक पुरुष आवाज आई।

—निशा, मैं 72,000 रुपये का ब्रेसलेट सिर्फ इसलिए नहीं खरीदूंगा कि तुम्हें डिनर से पहले बोरियत हो रही है।

मीरा का पूरा शरीर पत्थर हो गया।

वह आवाज अर्जुन की थी।

थोड़ी भारी, थोड़ी थकी हुई, लेकिन वही आवाज।

औरत ने चिढ़कर कहा।

—तुमने कहा था गोवा में लग्जरी ट्रिप होगी, कबीर। यह होटल तो मिडिल क्लास फैमिली जैसा है।

कबीर।

मीरा ने बालकनी की रेलिंग इतनी जोर से पकड़ ली कि उसके नाखून दुखने लगे।

अर्जुन सिर्फ जिंदा नहीं था।

वह किसी और नाम से जी रहा था।

नीचे वह आदमी बोला।

—अपनी खूबसूरती को राष्ट्रीय आपदा की तरह मत पेश करो।

मीरा की आंखों से आंसू गिरने लगे। वही वाक्य। वही अंदाज। वही हल्की झुंझलाहट। अर्जुन ने यह बात उसे 5 साल पहले कही थी, जब मीरा ने आरव के जन्म के बाद पहली बार साड़ी पहनकर कॉलेज की नौकरी पर लौटना चाहा था।

अब कोई शक नहीं बचा था।

वह कोई हमशक्ल नहीं था।

वह कोई दुख से बनी कल्पना नहीं थी।

मरा हुआ आदमी उसके कमरे के नीचे सांस ले रहा था।

और मीरा को अचानक समझ आ गया कि असली हादसा यह नहीं था कि उसका पति जिंदा था। असली हादसा यह था कि शायद वह इतने सालों तक अपनी मौत से नहीं, अपने अपराधों से छिपा हुआ था।

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भाग 2:

अगली सुबह मीरा ने छुट्टी का नाटक किया। उसने आरव को इडली खिलाई, समुद्र किनारे नारियल पानी दिलाया और हर बार मुस्कुराई जब बच्चा उसकी आंखों में जवाब खोजता था, पर भीतर हर मिनट एक जलता हुआ सवाल था कि अर्जुन ने अपनी मौत क्यों रची, निशा कौन थी, वह कबीर बनकर कब से जी रहा था और क्या उसने कभी अपने बेटे की तस्वीर देखकर लौटने की कोशिश भी की थी। दोपहर 3 बजे आरव कमरे में सो गया तो मीरा लॉबी में उतर आई। उसने रिसेप्शन के पास बैठकर अखबार खोल लिया और नजरें दरवाजे पर टिकाए रखीं। तभी निशा काउंटर पर आई और गुस्से में बोली, —रूम 408 में शैम्पेन अभी तक क्यों नहीं भेजी? बुकिंग कबीर सेठी के नाम से है। मीरा की नसों में खून जल उठा। रात होते ही उसने आरव को कार्टून लगाकर बिस्तर पर बैठाया और खुद 1 मंजिल नीचे उतरी। रूम 408 के पास आइस मशीन थी। वह वहीं खड़ी रही। कुछ ही देर में दरवाजा जोर से खुला। निशा रोती हुई बाहर निकली, मेकअप फैला हुआ था और हाथ में फोन कांप रहा था। —तुमने कहा था तुम्हारी पत्नी मर चुकी है! तुमने कहा था तुम्हारा कोई बच्चा नहीं! अंदर से अर्जुन निकला, बिना टोपी, बिना चश्मे, वही चेहरा, वही आंखें। —आवाज नीचे रखो, निशा। —नहीं! तुम दुखी विधुर नहीं, जिंदा धोखा हो। निशा लिफ्ट की तरफ चली गई। अर्जुन कुछ देर दरवाजे पर खड़ा रहा, फिर होटल बार की तरफ मुड़ गया। मीरा उसका पीछा करती हुई गई और पास की मेज पर बैठ गई। दूसरे पेग के बाद अर्जुन ने उसे देखा। —आप समझदार लगती हैं। बताइए, कुछ औरतें पैसे को प्यार क्यों समझती हैं? मीरा ने बर्फ जैसी आवाज में कहा। —शायद क्योंकि कुछ आदमी खाली जेब से नहीं, खाली आत्मा से रिश्ते खरीदते हैं। अर्जुन चौंका। —हम मिले हैं क्या? मीरा उठ गई। —शायद मैं किसी ऐसी औरत जैसी लगती हूं, जिसे आपने जिंदा रहते हुए विधवा बना दिया। वह कमरे में लौटी तो आरव जाग रहा था। तभी मीरा ने पुराने पार्टनर विक्रम खन्ना को फोन किया। आवाज सुनते ही विक्रम चुप हो गया। —मैंने गोवा में अर्जुन को देखा है। उधर से टूटी सांस आई। —तुम्हें उसे नहीं देखना चाहिए था। मीरा चीखी नहीं, बस बोली। —तो तुम जानते थे। विक्रम ने आखिर सच उगल दिया कि अर्जुन ने काले साहूकारों से पैसा लिया, कंपनी डुबोई, फिर मीरा के नाम पर डिजिटल सिग्नेचर से लोन चढ़ाए और अपनी नकली मौत रच दी। उसी पल कमरे की घंटी बजी। मीरा ने झरोखे से देखा। दरवाजे पर अर्जुन खड़ा था। इससे पहले कि वह रोक पाती, आरव ने दरवाजा खोल दिया। ❤️नमस्ते, प्यारे रीडर्स! अगर आप अगले पार्ट के लिए तैयार हैं, तो प्लीज़ नीचे “Yes” लिखें, और मैं इसे तुरंत भेज दूँगा। मैं उन सभी के अच्छे स्वास्थ्य और खुशी की कामना करता हूँ जिन्होंने यह कहानी पढ़ी और पसंद की है! 💚

भाग 3:

अर्जुन और आरव एक-दूसरे को ऐसे देख रहे थे जैसे होटल का वह छोटा सा कमरा अचानक श्मशान बन गया हो, जहां 3 साल पहले जलाया गया नाम फिर से खड़ा हो गया था।

आरव ने दरवाजे का हैंडल पकड़ा हुआ था। उसकी आंखों में आंसू थे, पर वह अपने पिता की तरफ भागा नहीं। वह वही बच्चा था जो हर जन्मदिन पर केक काटने से पहले पिता की फोटो के सामने 1 टुकड़ा रखता था। वही बच्चा जिसने स्कूल में फादर्स डे कार्ड बनाकर तकिए के नीचे छिपा दिया था, क्योंकि वह किसी को दिखाना नहीं चाहता था कि उसने मृत आदमी के लिए कार्ड बनाया है।

अर्जुन ने कांपते हुए कहा।

—आरव…

बच्चे ने धीमे से पूछा।

—आप मर गए थे ना?

अर्जुन की आंखें लाल हो गईं। उसने मीरा की तरफ देखा, जैसे वह उससे अनुमति मांग रहा हो कि वह पिता बन सके। मीरा दरवाजे और बेटे के बीच आकर खड़ी हो गई।

—अंदर आने की गलती मत करना।

—मीरा, बस 5 मिनट। मुझे सब समझाने दो।

—तुम्हें हमारी रूम नंबर कैसे मिली?

—रिसेप्शन से पूछा। मैंने कहा कि कल रात वाली मैडम को धन्यवाद देना है।

मीरा कड़वाहट से मुस्कुराई।

—झूठ बोलने की आदत तुम्हारी सांस जैसी हो गई है। बिना सोचे निकलता है।

अर्जुन ने सिर झुका लिया।

आरव ने फिर पूछा।

—आप वापस क्यों नहीं आए?

इस बार कमरे की हवा भी भारी हो गई। मीरा ने देखा कि अर्जुन सचमुच टूट रहा था, और यही बात सबसे ज्यादा खतरनाक थी। अगर वह पूरा राक्षस होता तो नफरत आसान होती। लेकिन वह रो सकता था। शर्मिंदा दिख सकता था। इंसान लग सकता था। और ऐसे लोग सबसे गहरे घाव देते हैं, क्योंकि वे दर्द समझते हुए भी छोड़ देते हैं।

—यह बात कमरे में नहीं होगी —मीरा ने कठोर आवाज में कहा— नीचे गार्डन में चलो। आरव मेरे साथ रहेगा। तुम सामने बैठोगे। कोई चालाकी की तो पुलिस को फोन करूंगी।

अर्जुन ने बिना विरोध सिर हिलाया।

वे होटल के पीछे छोटे गार्डन में पहुंचे। कुछ परिवार खाना खा रहे थे, बच्चे पूल के पास चप्पल घसीटते दौड़ रहे थे, कहीं से पुराने हिंदी गाने की धुन आ रही थी। दुनिया इतनी सामान्य थी कि मीरा को गुस्सा आया। उसके जीवन का सच टूट रहा था और बाकी लोग चटनी मांग रहे थे।

अर्जुन सामने बैठा। उसकी उंगलियां फिर अंगूठी वाली जगह रगड़ रही थीं, जबकि अब वहां कोई अंगूठी नहीं थी।

मीरा ने मोबाइल रिकॉर्डिंग चालू कर दी और उसे मेज पर उल्टा रख दिया।

—अब बोलो। पूरा सच। बिना अपने आपको बेचारा बनाए।

अर्जुन ने गहरी सांस ली।

—मैंने मुंबई में शिपिंग और लॉजिस्टिक्स का काम शुरू किया था। विक्रम के साथ। शुरुआत में पैसा आया, फिर एक बड़ा कॉन्ट्रैक्ट फंस गया। मैंने सोचा 2 महीने में सब ठीक हो जाएगा। मैंने प्राइवेट फाइनेंसरों से पैसा लिया। वे लोग साधारण साहूकार नहीं थे। धमकी देते थे। घर के बाहर लोग खड़े करने लगे थे।

—और तुमने मेरा नाम इस्तेमाल किया —मीरा ने कहा।

अर्जुन ने आंखें बंद कर लीं।

—हां।

आरव ने अपनी मां का हाथ पकड़ लिया।

—मम्मी का नाम क्यों?

अर्जुन ने बेटे की तरफ देखा, पर जवाब मीरा को दिया।

—क्योंकि उसके डॉक्यूमेंट मेरे पास थे। पुरानी कंपनी के पेपरों में डिजिटल सिग्नेचर की कॉपी थी। मैंने लोन खोले, कुछ ट्रांजैक्शन किए। मुझे लगा पैसा लौटाकर सब मिटा दूंगा।

मीरा की हंसी निकली, लेकिन उसमें कोई गर्माहट नहीं थी।

—हर चोर पहले यही सोचता है कि चोरी पकड़े जाने से पहले ईमानदार बन जाएगा।

अर्जुन चुप रहा।

—फिर? —मीरा ने पूछा।

—फिर वे लोग घर तक आने लगे। 1 रात उन्होंने मुझे मुंबई डॉक पर घेर लिया। उन्होंने कहा पैसा नहीं दिया तो पहले मेरे परिवार को पता चलेगा, फिर परिवार भुगतेगा। मैं डर गया। मैंने नकली हादसा बनाया। नाव खाली छोड़ी। जैकेट, मोबाइल, कार्ड… सब।

आरव का चेहरा बिगड़ गया।

—तो समुद्र ने आपको नहीं लिया?

अर्जुन ने मुश्किल से कहा।

—नहीं बेटा।

—आपने हमें छोड़ दिया।

यह वाक्य किसी अदालत के फैसले जैसा था। अर्जुन की गर्दन झुक गई।

मीरा ने शांत लेकिन टूटती हुई आवाज में कहा।

—3 साल तक मैंने तुम्हारी फोटो पर फूल चढ़ाए। आरव बुखार में तुम्हें बुलाता था। स्कूल में जब बच्चों के पिता आते थे, यह वॉशरूम में छिप जाता था। मैंने अपनी नौकरी खोई, क्योंकि मुझे लोन नोटिस, वकील और थेरेपी के बीच भागना पड़ता था। मैंने अपनी मां के गहने बेचे। मैंने सबको कहा कि मेरे पति अच्छे आदमी थे। मैंने तुम्हारी इज्जत बचाई, जबकि तुमने मेरा नाम बेच दिया था।

अर्जुन की आंखों से आंसू गिरने लगे।

—मैंने पैसे भेजे थे। विक्रम के जरिए।

—पैसा पिता नहीं बनता —मीरा ने तुरंत कहा— पैसा रात में डरकर उठे बच्चे की पीठ नहीं सहलाता। पैसा स्कूल प्रोजेक्ट में गोंद नहीं लगाता। पैसा उस औरत को जवाब नहीं देता जिसे लोग मनहूस विधवा कहकर शादी-ब्याह में पीछे बैठाते रहे।

अर्जुन ने चेहरा ढक लिया।

आरव बहुत देर तक उसे देखता रहा। फिर पूछा।

—क्या आपको मेरा 7वां जन्मदिन याद था?

—हां।

—8वां?

—हां।

—9वां?

अर्जुन रो पड़ा।

—हर जन्मदिन याद था।

आरव की आवाज पत्थर जैसी हो गई।

—याद करने से केक नहीं कटता।

मीरा ने आंखें बंद कर लीं। 9 साल का बच्चा उस रात 1 पल में बड़ा हो गया था।

उसी समय गार्डन के रास्ते पर तेज कदमों की आवाज आई। निशा वहां खड़ी थी। उसकी आंखें सूजी हुई थीं, हाथ में फोन था।

—कबीर, यह क्या है? ये लोग कौन हैं?

मीरा धीरे से उठी।

—इनका नाम कबीर नहीं है। यह अर्जुन अरोड़ा है। मेरा कानूनी पति।

निशा का चेहरा सफेद पड़ गया।

—नहीं… उन्होंने कहा था उनकी पत्नी 3 साल पहले कैंसर से मर गई।

मीरा ने आरव की तरफ इशारा किया।

—और यह उनका बेटा है। वही बेटा जिसे उन्होंने अपने पिता की मौत पर रोने दिया।

निशा ने अर्जुन की तरफ ऐसे देखा जैसे किसी महंगे शीशे के पीछे सड़ा हुआ मांस दिख गया हो।

—तुमने कहा था तुम अकेले हो। तुमने कहा था दुनिया ने तुमसे सब छीन लिया।

अर्जुन ने टूटी आवाज में कहा।

—मैंने बहुत झूठ बोले।

—तुम दुखी आदमी नहीं हो —निशा ने कांपती आवाज में कहा— तुम साफ कपड़े पहना हुआ डरपोक हो।

उसने अपने हाथ की सोने की चूड़ी उतारी और मेज पर फेंक दी।

—इसे बेचकर कोई नई कहानी खरीद लेना।

वह चली गई। अर्जुन ने उसे नहीं रोका। शायद पहली बार उसे समझ आ रहा था कि हर औरत को वह अपने झूठ से रोक नहीं सकता।

मीरा ने अपना मोबाइल उठाया और स्क्रीन उसकी तरफ घुमा दी।

—सब रिकॉर्ड हो गया है। डिजिटल सिग्नेचर, फर्जी लोन, नकली मौत, नया नाम, सब। कल दिल्ली लौटकर मैं अपनी वकील शालिनी मेहरा को यह दूंगी। पुलिस में शिकायत होगी। बैंक में आपत्ति जाएगी। कोर्ट में मैं हर कागज चुनौती दूंगी। और इस बार तुम्हारी कहानी तुम नहीं लिखोगे।

अर्जुन घबरा गया।

—मीरा, मुझे जेल मत भिजवाओ। मैं सच में वापस आना चाहता था। मैं डर गया था।

—तुम मुझे मत बताओ कि डर क्या होता है। डर वह था जब रात में 2 आदमी मेरे घर के बाहर बाइक रोककर पूछते थे कि अर्जुन का पैसा कौन चुकाएगा। डर वह था जब मैंने आरव को कमरे में बंद किया और पुलिस को फोन करने की हिम्मत नहीं हुई, क्योंकि मुझे कर्ज का मतलब भी नहीं पता था। डर वह था जब नोटिस पर मेरा नाम था और पति की तस्वीर पर माला।

अर्जुन की सांसें तेज हो गईं।

—मैं सब ठीक कर दूंगा।

—नहीं —मीरा बोली— तुम जो तोड़ चुके हो, उसे ठीक नहीं कर सकते। बस उसका हिसाब दे सकते हो।

आरव ने धीरे से पूछा।

—क्या आप फिर गायब हो जाओगे?

अर्जुन ने तुरंत सिर हिलाया।

—नहीं। कभी नहीं।

मीरा ने कठोर आवाज में कहा।

—उससे वादा मत करो ताकि तुम्हें अपने बारे में अच्छा लगे। वादा तभी करो जब उसे निभाने की सजा भी सह सको।

अर्जुन ने पहली बार सीधे अपने बेटे की आंखों में देखा।

—मैं पुलिस के सामने जाऊंगा। मैं सच बोलूंगा। मैं तुम्हारी मां का नाम साफ करूंगा। तुम मुझे माफ करो या मत करो, लेकिन मैं अब भागूंगा नहीं।

उस रात मीरा आरव को लेकर कमरे में लौटी। बच्चा सोया नहीं। वह बस खिड़की के पास बैठकर अंधेरे समुद्र को देखता रहा।

—मम्मी, अगर पापा बुरे थे तो आपने मुझे क्यों कहा कि वे अच्छे थे?

मीरा का दिल फट गया।

—क्योंकि मैं चाहती थी कि तुम्हारे अंदर नफरत से ज्यादा प्यार बचे। मैं गलत थी या सही, नहीं जानती। लेकिन मैंने तुम्हें बचाने की कोशिश की।

आरव ने धीरे से अपना सिर उसकी गोद में रख दिया।

—मैं अब फोटो से बात नहीं करूंगा।

मीरा ने उसके बाल सहलाए।

—अब तुम्हें फोटो से बात करने की जरूरत नहीं है। अब सच है। दर्दनाक है, लेकिन सच है।

अगली सुबह मीरा ने अर्जुन को सिर्फ 30 मिनट दिए। होटल की कैफेटेरिया में। यह मौका उसने अर्जुन के लिए नहीं, आरव के लिए दिया था। बच्चे को सवाल पूछने का हक था।

अर्जुन आया तो बिना टोपी, बिना चश्मे, बिना महंगे दिखावे के था। वह अचानक बूढ़ा लग रहा था।

आरव ने सामने बैठकर कहा।

—मुझे पूरा सच चाहिए। कोई बहाना नहीं।

अर्जुन ने आंसू रोकने की कोशिश नहीं की।

—सच यह है कि मैं डरपोक निकला। मैंने तुम्हारी मां से चोरी की, तुम्हें छोड़ दिया और अपनी गलती को मजबूरी का नाम दिया। तुम मेरी वजह से रोए। तुम्हारी कोई गलती नहीं थी। तुम हमेशा मेरे बेटे थे। कमी तुम्हारे अंदर नहीं, मेरे अंदर थी।

आरव ने बहुत देर तक उसे देखा। फिर उठा और धीरे से उसके पास गया। अर्जुन ने हाथ आगे नहीं बढ़ाया। शायद उसे डर था कि वह अधिकार खो चुका है। लेकिन आरव ने खुद उसे गले लगा लिया।

वह गले मिलना माफी नहीं था। वह किसी टूटे हुए बच्चे की आखिरी कोशिश थी कि वह अपने सपनों वाले पिता को सम्मान से विदा कर सके। अर्जुन फूटकर रो पड़ा। मीरा ने खिड़की की तरफ मुंह मोड़ लिया, ताकि उसका बेटा अपनी इस छोटी-सी विदाई को बिना शर्म जी सके।

दोपहर तक वे एयरपोर्ट के लिए निकले। अर्जुन होटल के बाहर खड़ा था।

—मैं दिल्ली आकर आत्मसमर्पण करूंगा —उसने कहा— विक्रम भी गवाही देगा। मैं सब लिखकर दूंगा।

मीरा ने उसे देखा।

—तुम्हारे पास अब सिर्फ 1 रास्ता है। सच से भागे तो मैं तुम्हें ढूंढूंगी नहीं, कानून ढूंढेगा।

अर्जुन ने सिर झुका लिया।

—क्या हमारे लिए कोई मौका है?

मीरा ने उस आदमी को देखा जिससे उसने कभी सचमुच प्यार किया था। उसे शादी का मंडप याद आया, आरव के जन्म पर अर्जुन की रोती हुई हंसी याद आई, वे रातें याद आईं जब वह उसके पुराने कुरते को सीने से लगाकर सोई थी। यादें उसे नरम बनाना चाहती थीं, लेकिन सच ने उसकी रीढ़ सीधी कर दी।

—तुम्हारे पास पिता बनने का मौका है —उसने कहा— लेकिन मेरे पति बनने का नहीं।

अर्जुन ने यह सुनकर आंखें बंद कर लीं। इस बार उसने बहस नहीं की। शायद पहली बार उसने समझा कि कुछ दरवाजे रोकर नहीं खुलते।

फ्लाइट में आरव मीरा के कंधे पर सिर रखकर सो गया। उसकी मुट्ठी में अब पिता की तस्वीर नहीं थी। वह खाली हाथ था, लेकिन शायद पहली बार झूठ के बोझ से खाली था।

मीरा ने बादलों के पार देखा और चुपचाप रोई। वह अर्जुन के लिए नहीं रो रही थी। वह उस औरत के लिए रो रही थी जिसने 3 साल तक खुद को विधवा समझा, जबकि सच में उसे एक जिंदा आदमी ने अकेला छोड़ दिया था। वह औरत अब खत्म हो चुकी थी।

दिल्ली उतरते समय आरव जागा। उसने मां का हाथ पकड़ा और पूछा।

—मम्मी, अब हम ठीक हो जाएंगे ना?

मीरा ने उसके माथे को चूमा।

—हां, मेरे बच्चे। इस बार सच में ठीक होंगे।

वह विधवा नहीं थी।

वह अब किसी की छोड़ी हुई पत्नी भी नहीं थी।

वह एक मां थी, जिसने अपने बेटे का हाथ पकड़कर झूठ के समुद्र को पार किया था। और उस दिन उसे समझ आया कि माफ करना हमेशा गले लगाना नहीं होता।

कभी-कभी माफ करना दरवाजा बंद करना होता है, चाबी अपने पास रखना होता है, और बिना पीछे मुड़े अपनी जिंदगी वापस ले लेना होता है।

Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.