
PART 1
“यह बूढ़ा एक दिन उस बच्ची की जान ले लेगा, और पूरी सोसाइटी पर्दे खींचकर तमाशा देखती रहेगी।”
शकुंतला आंटी ने यह बात काँपती आवाज़ में कही थी। वह लखनऊ के गोमती नगर की शांत कॉलोनी में अपने ड्रॉइंग रूम की खिड़की के पीछे खड़ी थीं। सड़क के उस पार पंडित श्यामलाल त्रिपाठी का घर था, पुराना लेकिन साफ-सुथरा, तुलसी के गमले, पीतल की घंटी और बरामदे में रखी लकड़ी की आरामकुर्सी वाला।
श्यामलाल 68 साल के विधुर थे। उनकी इकलौती बेटी नंदिनी तलाक के बाद गुरुग्राम में नौकरी करती थी। उसकी 9 साल की बेटी अनन्या पिछले 1 साल से अपने नाना के पास रहती थी।
अनन्या उस गली की रौनक थी।
सुबह स्कूल की बस तक गुलाबी बैग झुलाते हुए जाती, शाम को छोटी साइकिल चलाते हुए सबको नमस्ते करती, कभी शर्मा हलवाई से जलेबी लेने जाती, कभी मंदिर के बाहर कबूतरों को दाना डालती। उसकी हँसी इतनी साफ थी कि बंद दरवाजों के भीतर बैठे लोग भी मुस्कुरा देते थे।
लेकिन उस शाम शकुंतला आंटी ने जो देखा, उसने उनके पैरों से ज़मीन खींच ली।
रसोई की हल्की पीली रोशनी में अनन्या फर्श पर बैठी थी। उसने अपने घुटने सीने से चिपकाए हुए थे और वह ऐसे रो रही थी जैसे भीतर कुछ टूट गया हो। उसके सामने श्यामलाल खड़े थे।
उनके हाथ में रसोई का बड़ा चाकू था।
वह सब्जी नहीं काट रहे थे।
उनका चेहरा पत्थर जैसा सख्त था। आँखें लाल थीं, जैसे कई रातों से सोए न हों। चाकू का धारदार हिस्सा रोशनी में चमक रहा था। अनन्या ने ऊपर देखा तो उसकी आँखों में ऐसा डर था कि शकुंतला आंटी के गले में चीख अटक गई।
उन्होंने खुद को समझाया।
शायद फल काट रहे होंगे।
शायद बच्ची ज़िद कर रही होगी।
शायद दूर से गलत दिखा होगा।
पर अनन्या की आँखें झूठ नहीं बोल रही थीं।
अगले दिन अनन्या बाहर नहीं आई। फिर दूसरे दिन भी नहीं। साइकिल बरामदे के कोने में पड़ी रही। खिड़कियों के पर्दे सुबह से रात तक बंद रहे। स्कूल बस आई, हॉर्न बजा, फिर चली गई। घर वैसा ही चुप रहा जैसे किसी ने उसकी साँस रोक दी हो।
तीसरे दिन शकुंतला आंटी एक डिब्बे में गरम मठरी और गुड़ के लड्डू लेकर सड़क पार गईं।
श्यामलाल ने दरवाज़ा बस 4 उंगलियों जितना खोला।
“नमस्ते भैया, अनन्या दिखाई नहीं दे रही। उसके लिए थोड़ा नाश्ता लाई थी।”
श्यामलाल ने डिब्बा लिया। आवाज़ सपाट थी।
“बुखार है। तेज़ सर्दी लग गई है।”
“मैं देख लूँ बच्ची को?”
“सो रही है।”
“बस 1 मिनट—”
दरवाज़ा बंद हो गया।
शकुंतला आंटी देर तक वहीं खड़ी रहीं। उन्हें पहली बार लगा कि उस घर की चुप्पी बीमारी की नहीं, डर की है।
2 दिन बाद उन्होंने पिछवाड़े में अनन्या को देखा। बाल उलझे हुए थे, आँखों के नीचे काले घेरे, शरीर पर नाना का ढीला स्वेटर। वह दीवार के पास ऐसे चल रही थी जैसे हर आवाज़ से डरती हो।
“अनु,” शकुंतला आंटी ने धीरे से पुकारा, “बेटा, इधर आओ। तुम्हारे लिए पेड़ा लाई हूँ।”
अनन्या ने सिर उठाया।
जैसे ही उनकी नज़र मिली, बच्ची की आँखें भर आईं। उसने होंठ खोले, पर शब्द नहीं निकले। अगले ही पल वह भागकर अंदर चली गई।
उस रात शकुंतला आंटी ने अपनी पुरानी डायरी में सब लिख दिया—चाकू, रोना, बंद पर्दे, बंद दरवाज़ा, स्कूल न जाना, बच्ची की सूनी आँखें।
शायद वह गलत थीं।
लेकिन अगर वह सही हुईं, तो चुप रहना अपराध था।
रात करीब 12 बजे सामने वाले घर से ज़ोर का धक्का सुनाई दिया।
फिर श्यामलाल की भारी आवाज़ गूँजी।
“मैंने कहा था, आवाज़ मत करना।”
शकुंतला आंटी का खून जम गया।
सुबह होते ही उन्होंने नंदिनी को फ़ोन किया।
“बिटिया, अनन्या ठीक नहीं है। तुम तुरंत आओ।”
नंदिनी की आवाज़ थकी हुई थी।
“आंटी, पापा ने बताया है कि उसे वायरल है। मैं इस हफ्ते बहुत जरूरी काम में फँसी हूँ।”
“यह वायरल नहीं है,” शकुंतला आंटी ने दबे गुस्से से कहा, “बच्ची डरी हुई है।”
कुछ पल चुप्पी रही।
“मैं शनिवार को आ जाऊँगी।”
लेकिन उसी रात शकुंतला आंटी ने खिड़की से फिर देखा।
अनन्या बंद पर्दे के पीछे खड़ी थी। उसकी छोटी हथेली काँच पर चिपकी हुई थी।
मानो वह मदद माँग रही हो।
और उसके पीछे अँधेरे में किसी आदमी की परछाईं हिली।
PART 2
शकुंतला आंटी ने उस रात आँख नहीं झपकाई। सुबह 6 बजे वह खिड़की के पास बैठी थीं, हाथ में ठंडी चाय का कप, निगाहें सामने वाले घर पर जमी हुईं। कोई रोशनी नहीं, कोई आवाज़ नहीं, रसोई से पराठे सिकने की महक तक नहीं।
दोपहर में वह मोहल्ले की दुकान गईं, जहाँ अनन्या की स्कूल शिक्षिका रेखा मैडम मिल गईं।
“आंटी, अनन्या को देखा है आपने?” रेखा मैडम ने धीमे स्वर में पूछा। “वह 8 दिन से स्कूल नहीं आई। घर से कोई जवाब नहीं दे रहा।”
शकुंतला आंटी के भीतर डर ने आकार ले लिया।
शाम को उन्होंने अपने भतीजे आरव को बुलाया।
“मुझे सामने वाले घर के बाहर नज़र रखनी है।”
आरव घबरा गया। “बुआ, लोग कहेंगे हम जासूसी कर रहे हैं।”
“लोग क्या कहेंगे, यह बाद में देखेंगे। पहले यह देखना है कि बच्ची जिंदा डर रही है या नहीं।”
रात में आरव ने बरामदे के पास गमले में छोटा पुराना यंत्र छिपा दिया, जिससे दरवाज़े और खिड़की की हलचल दिख सके।
रात 1:18 पर पर्दा थोड़ा हिला।
अनन्या फर्श पर बैठी थी, तकिया पकड़े, शरीर धीरे-धीरे झूल रहा था। वह रो नहीं रही थी, पर उसका चेहरा ऐसा खाली था जैसे बचपन उससे छीन लिया गया हो।
तभी श्यामलाल की परछाईं उसके पीछे आई।
उन्होंने बस पर्दा बंद किया और धीमे बोले—
“मत रो, अगर उसने सुन लिया तो वह फिर आ जाएगा।”
शकुंतला आंटी साँस लेना भूल गईं।
वह?
अगले दिन नंदिनी पहुँची। पहले वह गुस्सा हुई, फिर चित्र देखकर उसका चेहरा सफेद पड़ गया।
वह दौड़कर पिता के घर पहुँची।
दरवाज़ा खुलते ही उसने कहा, “मुझे मेरी बेटी चाहिए।”
श्यामलाल ने रास्ता रोका। “वह सुरक्षित है।”
नंदिनी अंदर घुसी। अनन्या के कमरे पर ताला बाहर से लगा था।
“पापा, आपने मेरी बच्ची को बंद क्यों किया?”
कमरा खुला। भीतर अँधेरा, खिड़की पर काली पट्टी, कोने में सिकुड़ी अनन्या।
माँ को देखकर भी वह नहीं दौड़ी।
बस फटी आवाज़ में बोली—
“उसे अंदर मत आने देना।”
PART 3
नंदिनी ने अनन्या को अपनी बाँहों में उठाया, लेकिन बच्ची का शरीर इतना हल्का लग रहा था जैसे कई दिनों से उसने ठीक से खाया ही न हो। उसकी त्वचा गर्म नहीं थी, फिर भी वह काँप रही थी। होंठ सूखे थे, बाल उलझे थे, और आँखें कमरे के दरवाज़े पर अटकी थीं, मानो कोई अभी भी वहीं खड़ा हो।
“कौन, अनन्या?” नंदिनी ने रोते हुए पूछा। “किसे अंदर नहीं आने देना?”
अनन्या ने नाना की ओर देखा।
श्यामलाल दीवार से टिके खड़े थे। उनका चेहरा टूट चुका था, लेकिन उन्होंने कुछ नहीं कहा।
“बोलो बेटा,” शकुंतला आंटी ने धीरे से कहा, “अब मम्मी आ गई है।”
अनन्या ने गर्दन हिलाई। उसकी साँस तेज़ हो गई। वह माँ के दुपट्टे में चेहरा छिपाकर फुसफुसाई—
“वह पार्क वाला अंकल।”
नंदिनी ने तुरंत उसे अस्पताल पहुँचाया। शहर के बाल चिकित्सालय में डॉक्टरों ने जाँच की। अनन्या को हल्का निर्जलीकरण था, अत्यधिक थकान थी, और उसके खून में नींद लाने वाली दवा के निशान मिले।
नंदिनी वहीं कुर्सी पर बैठते-बैठते गिर पड़ी।
“पापा ने उसे दवा दी?” उसकी आवाज़ फट गई।
डॉक्टर ने गंभीर होकर कहा, “बिना सलाह किसी बच्चे को ऐसी दवा देना खतरनाक है। लेकिन बच्ची पर चोट के निशान नहीं हैं। डर बहुत गहरा है। उसे अभी मनोवैज्ञानिक सहारे की ज़रूरत है।”
नंदिनी के भीतर गुस्सा और भय साथ उठे।
श्यामलाल अस्पताल के बाहर बेंच पर बैठे थे। लोग उन्हें देख रहे थे। कुछ फुसफुसा रहे थे। किसी ने कहा, “आजकल अपने ही लोग जानवर बन जाते हैं।” किसी ने मोबाइल निकालकर उनकी तस्वीर तक लेने की कोशिश की।
श्यामलाल ने सिर नहीं उठाया।
नंदिनी बाहर आई। उसकी आँखें लाल थीं।
“आपने मेरी बेटी को बंद कर दिया। उसे दवा दी। उससे झूठ बोला। पापा, आपने क्या कर दिया?”
श्यामलाल ने पहली बार उसकी ओर देखा। उनकी आँखों में नींद की जगह राख थी।
“मैंने उसे बचाने की कोशिश की।”
“किससे?”
वह जवाब देने ही वाले थे कि भीतर से अनन्या की चीख सुनाई दी।
नंदिनी भागी।
वार्ड के दरवाज़े पर सफाईकर्मी कपड़े बदल रहा था। उसके सिर पर टोपी थी। बस इतना देखकर अनन्या बेकाबू हो गई थी। वह बिस्तर से उतरकर कोने में छिप गई थी और बार-बार एक ही बात कह रही थी—
“वही टोपी… वही टोपी…”
बाल मनोवैज्ञानिक ने सबको बाहर कर दिया। वह बहुत देर तक अनन्या से धीरे-धीरे बात करती रही। कभी खिलौना हाथ में दिया, कभी कागज़ पर चित्र बनवाया, कभी सिर्फ चुप बैठी रही। आखिर अनन्या ने टूटे वाक्यों में कहानी कहना शुरू किया।
गोमती पार्क में 3 हफ्ते पहले एक आदमी उसके पास आया था। उसने कहा था कि वह नंदिनी का दोस्त है। उसने नंदिनी का नाम लिया, गुरुग्राम का नाम लिया, यहाँ तक कि यह भी कहा कि अनन्या को गुलाबी रंग पसंद है। बच्ची को लगा सच होगा, पर जब वह आदमी बोला, “चलो, मम्मी ने मुझे भेजा है,” तब अनन्या डर गई।
वह भागकर घर आई।
श्यामलाल ने बात सुनी। पहले वह थाने गए। वहाँ उनसे कहा गया कि बिना नाम, बिना प्रमाण, बिना चोट के मामला बनाना मुश्किल है। उन्होंने पार्क के चौकीदार से पूछा, दुकानदारों से पूछा, पर कोई साफ जवाब नहीं मिला।
फिर 1 शाम उन्होंने उस आदमी को घर के बाहर खड़े देखा।
पतला, लंबा, चेहरे पर नकली मुस्कान, सिर पर गहरी टोपी।
वह दूर से अनन्या की खिड़की की ओर देख रहा था।
श्यामलाल का खून सूख गया।
उन्होंने दरवाज़े बंद कर दिए। पर्दे खींच दिए। अनन्या को बाहर जाने से रोक दिया। स्कूल बंद कराया। रात-रात जागकर बरामदे में बैठने लगे। जब बच्ची डरकर रोती, वह उसे शांत कराने की कोशिश करते। जब वह नींद में चीखती, वह घबरा जाते। फिर एक रात उन्होंने अपनी दवाई की अलमारी से नींद की बूँदें निकालीं और उसे दूध में मिला दीं, यह सोचकर कि बच्ची कुछ घंटे सो जाएगी।
वह गलती थी।
भयानक गलती।
प्यार और डर के बीच उनका विवेक टूट गया था।
जिस चाकू को शकुंतला आंटी ने देखा था, वह उन्होंने रसोई से इसलिए उठाया था क्योंकि उन्हें पिछली दीवार के पास खड़खड़ाहट सुनाई दी थी। अनन्या उनके हाथ में चाकू देखकर और डर गई। श्यामलाल उसे समझा नहीं पाए। वह उस आदमी को रोकना चाहते थे, पर अपनी ही नातिन के लिए डर का दूसरा नाम बन गए।
नंदिनी ने यह सब सुना तो उसका गुस्सा भी काँपने लगा।
“आपने मुझे बताया क्यों नहीं?”
श्यामलाल की आवाज़ बहुत धीमी थी।
“बताया था। तुमने कहा था मैं हर बात में शक करता हूँ। तलाक के बाद तुम पहले ही टूट चुकी थीं। मैं तुम्हें और डराना नहीं चाहता था।”
नंदिनी को याद आया। 12 दिन पहले पिता ने फ़ोन पर कहा था, “यहाँ एक आदमी घूमता रहता है, अनन्या को बाहर मत भेजना।” उसने जल्दी में कहा था, “पापा, हर राह चलते आदमी को अपराधी मत समझिए।”
वह बात अब उसके सीने पर पत्थर बनकर गिर रही थी।
उधर आरव ने गमले वाले यंत्र की और पुरानी तस्वीरें देखीं। रात 2:07 पर एक आदमी पिछली दीवार के पास दिखा था। उसने झुककर गमलों में कुछ डाला था और फिर अँधेरे में गायब हो गया था। चेहरा साफ नहीं था, लेकिन टोपी वही थी।
शकुंतला आंटी ने तुरंत पुलिस को बुलाया। इस बार नंदिनी ने औपचारिक शिकायत दर्ज कराई। बाल कल्याण विभाग को सूचना दी गई। कॉलोनी के प्रवेश द्वार पर लगे चित्र यंत्र देखे गए। शर्मा हलवाई की दुकान, मंदिर के बाहर की सड़क और पार्क के सामने की दवा दुकान से पुराने चित्र जुटाए गए।
नाम सामने आया—विक्रम सहगल।
वह उसी कॉलोनी के पास किराए के कमरे में रहता था। लोगों को लगता था वह किसी बीमा कंपनी में काम करता है, क्योंकि वह हमेशा फाइल लेकर चलता था। पर उसके कमरे की तलाशी ने सबका दिल दहला दिया।
दीवार पर अनन्या की तस्वीरें थीं।
स्कूल बस के पास।
मंदिर में दाना डालते हुए।
साइकिल चलाते हुए।
पार्क में झूले पर।
अपने कमरे की खिड़की के पीछे खड़ी हुई।
एक कॉपी में उसके समय लिखे थे—स्कूल का समय, ट्यूशन का समय, नंदिनी का गुरुग्राम का पता, श्यामलाल की दवा लेने की दुकान, यहाँ तक कि शकुंतला आंटी के घर में किस समय रोशनी बंद होती है।
2 वाक्य लाल स्याही से लिखे मिले—
“बच्ची को अकेला करना होगा।”
“बूढ़ा सबसे बड़ी रुकावट है।”
पुलिस ने उसी रात विक्रम को पकड़ने की कोशिश की, पर वह कमरे से गायब था।
अस्पताल में सुरक्षा बढ़ा दी गई। वार्ड के बाहर 2 महिला सिपाही खड़ी की गईं। फिर भी अनन्या बेचैन थी। उसकी छोटी उँगलियाँ नंदिनी की साड़ी पकड़े थीं।
रात लगभग 10 बजे गलियारे में हल्की आहट हुई। दरवाज़े का हैंडल धीरे से घूमा।
अनन्या की आँखें फैल गईं।
“मम्मी,” उसने हाँफते हुए कहा, “वह बाहर है।”
नंदिनी ने उसे कसकर सीने से लगा लिया। शकुंतला आंटी ने तुरंत घंटी दबाई। दरवाज़ा आधा खुला।
अंदर पुलिस अधिकारी आईं।
“घबराइए नहीं,” उन्होंने कहा। “विक्रम पकड़ा गया है। वह अस्पताल के पीछे वाले रास्ते से घुसने की कोशिश कर रहा था। नकली पहचान पत्र बनाया हुआ था।”
अनन्या पहले जमी रही। फिर अचानक उसका शरीर ढीला पड़ गया और वह रो पड़ी।
इस बार उसके आँसू डर के नहीं थे।
वे बच जाने के आँसू थे।
अगले दिनों में सच्चाई पूरी तरह खुली। विक्रम कई महीनों से आसपास की बच्चियों पर नज़र रख रहा था। लेकिन अनन्या पर उसका जुनून गहरा हो गया था क्योंकि वह अक्सर अकेली स्कूल बस से उतरकर घर आती थी। उसने नंदिनी की सामाजिक तस्वीरों से जानकारी जुटाई, पड़ोसियों की बातों से परिवार की स्थिति समझी, और यह जान लिया कि माँ दूर शहर में काम करती है।
श्यामलाल उसे सचमुच रोक रहे थे।
लेकिन जिस ढंग से उन्होंने रोकना चाहा, उसने अनन्या की आत्मा पर दूसरा घाव कर दिया।
अदालत में मामला चला। विक्रम पर पीछा करने, निजता भंग करने, बच्ची को बहला कर ले जाने की कोशिश, घर में घुसने का प्रयास और अपहरण की तैयारी के गंभीर आरोप लगे। उसके कमरे से मिले प्रमाण इतने स्पष्ट थे कि बच निकलना मुश्किल था।
कॉलोनी के लोग अदालत में मौजूद थे। वही लोग जो कभी पर्दों के पीछे से बातें बना रहे थे। रेखा मैडम भी आईं। शर्मा हलवाई भी आए। आरव भी था, शकुंतला आंटी भी।
अनन्या ने बाल मनोवैज्ञानिक के साथ बयान दिया। उसकी आवाज़ धीमी थी, पर शब्द साफ थे।
“नानाजी बुरे नहीं थे। वह डर गए थे। मैं भी डर गई थी। बुरा वह आदमी था जो मुझे देखता रहता था।”
अदालत कक्ष में सन्नाटा फैल गया।
श्यामलाल पीछे की बेंच पर बैठे थे। उनके कंधे काँप रहे थे। नंदिनी ने पहली बार उनके हाथ पर अपना हाथ रखा।
विक्रम को लंबी सजा मिली। अदालत ने उसके बाहर आने के बाद भी निगरानी और मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन का आदेश दिया। श्यामलाल पर बच्ची को दवा देने और बंद रखने को लेकर कठोर टिप्पणी हुई। उन्हें जेल नहीं भेजा गया, लेकिन परिवार परामर्श, बाल सुरक्षा प्रशिक्षण और निगरानी की शर्तें लगाई गईं।
नंदिनी ने गुरुग्राम की नौकरी से लंबी छुट्टी ली। फिर उसने निर्णय लिया कि वह कुछ महीनों तक लखनऊ में ही रहेगी। यह फैसला डर से नहीं, रिश्तों की मरम्मत के लिए था।
सबसे कठिन मरम्मत श्यामलाल और अनन्या के बीच होनी थी।
पहले दिन अनन्या उनसे दूर रही। दूसरे दिन उसने सिर्फ नमस्ते किया। तीसरे दिन उसने दूध पीते समय पूछा, “नानाजी, आपने खिड़की पर काली पट्टी क्यों लगाई थी?”
श्यामलाल ने झूठ नहीं बोला।
“क्योंकि मैं बहुत डर गया था, बेटा। मुझे लगा बाहर की दुनिया को बंद कर दूँगा तो तुम्हें बचा लूँगा। पर मैंने तुम्हें भी अँधेरे में बंद कर दिया।”
अनन्या चुप रही।
श्यामलाल की आँखें भर आईं।
“मैं तुम्हारा रक्षक बनना चाहता था। लेकिन तुम्हें मुझसे भी डर लगने लगा। यह मेरी सबसे बड़ी हार है।”
अनन्या ने धीरे से पूछा, “अब दरवाज़ा बंद नहीं करोगे?”
“कभी नहीं। जब तक तुम खुद न कहो।”
कुछ दिनों बाद घर की खिड़कियाँ खुलीं। काली पट्टियाँ उतारी गईं। बरामदे में साइकिल साफ की गई। तुलसी में फिर पानी डाला गया। रसोई में दाल की महक लौट आई।
शकुंतला आंटी एक शाम डिब्बा लेकर आईं। इस बार दरवाज़ा पूरा खुला था।
“मैं माफी माँगने आई हूँ,” उन्होंने धीमे से कहा। “मैंने जो देखा, उससे डर गई। मैंने सोचा आप राक्षस बन गए हैं।”
श्यामलाल मुस्कुराए नहीं। बस सिर झुका दिया।
“डर में किया गया प्यार भी कभी-कभी क्रूर दिखता है।”
शकुंतला आंटी की आँखें भीग गईं।
“लेकिन अगर आप सच पहले बता देते, तो शायद बच्ची इतना नहीं डरती।”
श्यामलाल ने स्वीकार किया।
“हाँ। चुप्पी ने हम सबको घायल किया।”
अनन्या बरामदे में खड़ी सब सुन रही थी। वह धीरे-धीरे आगे आई। उसके हाथ में आधा खाया लड्डू था।
“आंटी,” उसने कहा, “आपने मम्मी को बुलाया था न?”
“हाँ बेटा,” शकुंतला आंटी ने काँपते स्वर में कहा।
“तो आपने मुझे बचाया भी।”
फिर उसने नाना की तरफ देखा।
“और नानाजी ने भी। बस गलत तरीके से।”
उस एक वाक्य ने घर की दीवारों पर जमा महीनों का बोझ हल्का कर दिया।
श्यामलाल रो पड़े। उन्होंने हाथ आगे बढ़ाया, लेकिन अनन्या कुछ पल रुकी। फिर धीरे से उनके पास गई और उनके सीने से लग गई।
“अब डर लगे तो मुझे बंद मत करना,” उसने कहा। “मुझसे बात करना।”
श्यामलाल ने उसके सिर पर हाथ रखा।
“कसम है, अब कोई दरवाज़ा डर से बंद नहीं होगा।”
धीरे-धीरे अनन्या स्कूल लौटी। पहले दिन नंदिनी उसके साथ बस स्टॉप तक गई। श्यामलाल भी कुछ दूर पीछे खड़े रहे। शकुंतला आंटी खिड़की से नहीं, दरवाज़े पर खड़ी होकर हाथ हिला रही थीं।
बस आई तो अनन्या ने पलटकर देखा। उसकी आँखों में अभी भी डर की पतली परत थी, लेकिन उसके नीचे भरोसे की पहली रोशनी जल चुकी थी।
उसने नाना से कहा, “शाम को साइकिल चलाऊँगी।”
श्यामलाल ने गहरी साँस ली।
“मैं गेट के बाहर बैठूँगा। दरवाज़ा खुला रहेगा।”
कॉलोनी ने उस घटना को कभी नहीं भुलाया।
लोगों ने सीखा कि हर बंद दरवाज़े के पीछे अपराधी ही नहीं होता, कभी-कभी डर से टूटा हुआ रक्षक भी होता है।
पर यह भी सीखा कि बच्चे की घबराहट को बुखार कहकर टाल देना सबसे खतरनाक भूल है।
क्योंकि जब कोई बच्चा कहे, “मुझे डर लग रहा है,” तो वह नाटक नहीं कर रहा होता।
उसे डाँटो मत।
उसे चुप मत कराओ।
उसे अकेला मत छोड़ो।
पहले उसे सुनो।
फिर उसे बचाओ।
और फिर सच की पूरी रोशनी जलने तक दरवाज़ा खुला रखो।