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गर्भवती बहू ठंडी बारिश में नंगे पाँव बस स्टैंड पर मिली, ससुराल ने उसे पागल बताया, लेकिन अदालत में रिकॉर्डिंग बजते ही सच फट पड़ा: “मेरा बच्चा गलती नहीं है”, और अमीर परिवार की इज्जत हथकड़ी में बदल गई

PART 1

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5:03 सुबह, तेज बारिश के बीच, 5 महीने की गर्भवती काव्या को जयपुर-अजमेर हाईवे के सुनसान बस स्टैंड के नीचे नंगे पाँव, भीगी साड़ी में, काँपते हुए पाया गया—उसके चेहरे पर सूजन थी और दोनों हाथ पेट पर ऐसे जकड़े थे जैसे वह आखिरी साँस तक अपने बच्चे को बचा रही हो।

मीरा शर्मा के हाथ से मोबाइल छूटकर रसोई के फर्श पर गिर पड़ा। गैस पर चाय उबल रही थी, पर उसकी आँखें दरवाजे पर जमी थीं। 2 दिन से उसकी बेटी काव्या का कोई जवाब नहीं आया था। दामाद अर्जुन राठौड़ ने बस एक सूखा संदेश भेजा था—“वह आराम कर रही है, बार-बार फोन मत कीजिए।”

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मीरा को उसी पल डर लग गया था। माँ को झूठ की आवाज शब्दों से पहले सुनाई दे जाती है।

फोन फिर बजा।

—मैडम, आप काव्या शर्मा की माँ बोल रही हैं?

मीरा का गला सूख गया।

—हाँ… मेरी बेटी कहाँ है?

—मैं उपनिरीक्षक धर्मवीर बोल रहा हूँ, बगरू थाना से। आपकी बेटी मिली है। वह गर्भवती है न?

मीरा दीवार से टिक गई।

—5 महीने की। उसे क्या हुआ?

कुछ पल चुप्पी रही।

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—आप तुरंत एसएमएस अस्पताल पहुँचिए। एंबुलेंस रास्ते में है। बारिश बहुत है, संभलकर आइए।

मीरा ने न चप्पल ठीक से पहनी, न दुपट्टा लिया। बस पुरानी शॉल उठाई और दरवाजा खुला छोड़कर बाहर भागी। ऑटो नहीं मिला, तो पड़ोसी के स्कूटर पर अस्पताल पहुँची। रास्ते भर बारिश उसके चेहरे पर नहीं, भीतर गिरती रही।

काव्या 24 साल की थी। शादी को 3 साल हुए थे। अर्जुन राठौड़ जयपुर के एक बड़े रियल एस्टेट परिवार का इकलौता बेटा था। सिविल लाइंस की हवेली, फार्महाउस, नेताओं से पहचान, बड़े वकील, मंदिरों में दान और समाज में इज्जत—राठौड़ परिवार के पास सब था। बस इंसानियत कम थी।

अर्जुन की माँ राजेश्वरी देवी हमेशा काव्या को “छोटी बहू” कहती थीं, लेकिन उस संबोधन में प्यार नहीं, नीचा दिखाने की आदत थी। मीरा को पहले दिन से वह घर ठंडा लगा था। वहाँ चाँदी के बर्तन चमकते थे, पर लोगों की आँखें पत्थर जैसी थीं।

काव्या हमेशा माँ को समझाती थी।

—माँ, आप ज्यादा सोचती हैं। बड़े घरों के तौर-तरीके अलग होते हैं।

पर बड़े घर के तौर-तरीके धीरे-धीरे उसके शरीर पर नीले निशान बनकर दिखने लगे थे। कभी काव्या कहती—सीढ़ी से फिसल गई। कभी—दरवाजे से हाथ टकरा गया। कभी—गर्भ की वजह से कमजोरी है।

अस्पताल पहुँचते ही मीरा ने काउंटर पकड़ लिया।

—मेरी बेटी काव्या राठौड़ कहाँ है?

नर्स ने उसे बैठाने की कोशिश की।

—पहले आप शांत हो जाइए।

—माँ कैसे शांत हो जाए जब बेटी खून से भीगी मिली हो?

तभी एक डॉक्टर बाहर आया। चेहरा गंभीर था।

—मरीज को सिर पर चोट है, 2 पसलियों में फ्रैक्चर है, पेट पर दबाव के निशान हैं और प्लेसेंटा में हल्का अलगाव दिख रहा है।

मीरा की आवाज फट गई।

—बच्चा?

—दिल धड़क रहा है। कमजोर है, पर धड़क रहा है।

मीरा ने आँखें बंद कर लीं। उसी क्षण डॉक्टर ने धीमे से कहा—

—होश खोने से पहले उसने कुछ शब्द कहे थे।

—क्या?

—“चाँदी की थाली… मैंने ठीक से नहीं चमकाई… मम्मीजी ने कहा, मेरा बच्चा गलती है…”

मीरा के कानों में जैसे आग भर गई।

एक रात पहले काव्या ने उसे हवेली के भोजन कक्ष की तस्वीर भेजी थी। लंबी मेज, चाँदी के बर्तन, गुलाब के फूल, पीतल के दीये। संदेश था—“आज राठौड़ों की बड़ी दावत है। मम्मीजी ने सारी चाँदी मुझे साफ करने को दी है। गलती हुई तो मेरी खैर नहीं।”

मीरा ने लिखा था—“बेटा, ऐसे मत बोल।”

काव्या ने सिर्फ एक दिल भेजा था।

सुबह 8:12 पर मीरा को आईसीयू में 2 मिनट के लिए अंदर जाने दिया गया। काव्या पहचान में नहीं आ रही थी। होंठ फटे थे, आँख सूजी थी, बाँहों पर निशान थे। पेट पर सफेद चादर थी, जिसके नीचे एक नन्ही जान अभी भी दुनिया से लड़ रही थी।

मीरा ने काँपते हाथ से बेटी की उँगलियाँ पकड़ीं।

—काव्या… माँ आ गई है।

काव्या ने आँख नहीं खोली, पर उसकी उँगलियाँ हल्की सी हिलीं।

मीरा रो पड़ी।

—जब तू 7 साल की थी, मकर संक्रांति के मेले में खो गई थी। तूने कहा था, “माँ का काम है अपने बच्चे को ढूँढना।” मैं तुझे ढूँढ लाई थी, बेटी। इस बार देर हो गई।

बाहर पुलिस खड़ी थी। मीरा ने सीधे कहा—

—अर्जुन और उसकी माँ ने किया है।

उपनिरीक्षक ने नोटबुक खोली।

—हमें सबूत चाहिए।

मीरा हँसी नहीं, पर उसके चेहरे पर दर्द भरी सख्ती आ गई।

—उनके पास पैसा है। सबूत भी वे खरीद लेंगे।

दोपहर तक राठौड़ परिवार के वकील ने मीडिया को बयान दे दिया—“काव्या मानसिक तनाव में थी और घर से खुद चली गई थी। परिवार उसकी सुरक्षा को लेकर चिंतित है।”

मीरा ने अस्पताल के टीवी पर यह देखा और दीवार पर सिर टिकाकर फुसफुसाई—

—मेरी बेटी आईसीयू में है, और ये लोग उसे पागल साबित कर रहे हैं।

तभी एक दुबली औरत धीरे से उसके पास आई। भीगा दुपट्टा कंधे से चिपका था।

—आप मीरा जी हैं?

—हाँ। तुम कौन?

—सुनीता। राठौड़ हवेली में काम करती थी। कल रात मैं वहीं थी।

मीरा एकदम सीधी खड़ी हो गई।

—तो पुलिस को बताओ।

सुनीता ने काँपते हुए पुराना मोबाइल निकाला।

—मैंने आवाज रिकॉर्ड की है… सब नहीं, बस जब चीखें शुरू हुईं।

मोबाइल से राजेश्वरी देवी की ठंडी आवाज गूँजी—

—शर्मा घर की लड़की को राठौड़ों की इज्जत क्या समझ आएगी? चाँदी की थाली पर दाग छोड़ दिया इसने।

फिर अर्जुन की आवाज आई—

—तूने मुझे सबके सामने नीचा दिखाया, काव्या।

एक भारी आवाज, जैसे किसी चीज से शरीर टकराया हो। फिर काव्या की टूटी चीख—

—मत मारो… बच्चा…

राजेश्वरी देवी ने कहा—

—यह बच्चा पहले ही एक गलती है। अगर बचा नहीं, तो शायद यही इस घर के लिए अच्छा होगा।

मीरा का चेहरा सफेद पड़ गया।

तभी आईसीयू का दरवाजा खुला और नर्स भागती हुई चिल्लाई—

—बच्चे की धड़कन गिर रही है! डॉक्टर को बुलाइए!

PART 2

मीरा दरवाजे की ओर भागी, पर वार्ड बॉय ने उसे रोक लिया। अंदर मशीनों की आवाज तेज होती जा रही थी, और बाहर सुनीता मोबाइल सीने से लगाए बैठी रो रही थी।

उसी समय लिफ्ट से 2 आदमी उतरे। दोनों महंगे कपड़ों में थे, पर चाल में गुंडों जैसी बेशर्मी थी। एक ने सुनीता को देखा।

—चलो, फोन दे दो। मैडम ने भेजा है।

सुनीता पीछे हट गई।

—नहीं।

मीरा उसके सामने खड़ी हो गई।

—कौन मैडम?

आदमी मुस्कुराया।

—जिस घर की रोटी खाकर तुम लोग जिंदा हो।

मीरा ने पहली बार अपनी आवाज इतनी ठंडी सुनी।

—रोटी नहीं, जहर खिलाते हो तुम लोग।

तभी पीछे से एक शांत आवाज आई—

—गवाह को धमकाना भी अपराध है।

वह अधिवक्ता निखिल सक्सेना था, जिसे मीरा के पड़ोसी ने फोन किया था। उसने तुरंत पुलिस को बुलाया। अस्पताल की सीसीटीवी में सब रिकॉर्ड हो गया। पकड़े जाते वक्त एक आदमी टूट गया।

—राजेश्वरी मैडम ने कहा था, बस फोन ले आओ।

उसी पल डॉक्टर बाहर आया।

—माँ और बच्चा दोनों अभी जिंदा हैं… लेकिन हालत नाजुक है।

मीरा अंदर गई। काव्या ने आँख आधी खोली। नर्स ने उसे छोटी स्लेट दी।

काँपते हाथों से काव्या ने लिखा—

अर्जुन।

फिर—

राजेश्वरी।

फिर बहुत मुश्किल से—

गोल्फ क्लब।

और अंत में—

आग मत लगाना।

मीरा रो पड़ी, क्योंकि काव्या ने उसकी छाती में जलती हुई बदले की आग पढ़ ली थी।

PART 3

उस रात मीरा राठौड़ हवेली जलाने नहीं गई।

उसने उससे बड़ा काम किया।

उसने सुनीता का मोबाइल अधिवक्ता निखिल सक्सेना को सौंप दिया, पुलिस को बयान दिलवाया और काव्या की स्लेट पर लिखे हर शब्द को केस की धुरी बना दिया। “गोल्फ क्लब” पहले सबको अजीब लगा, पर निखिल ने उसी पर पकड़ बनाई। राठौड़ परिवार की दावत के बाद अर्जुन, उसकी माँ और उनके कुछ खास लोग शहर के बाहर एक निजी गोल्फ क्लब में मिलने वाले थे। वहीं से किसी को फोन किया गया था। वहीं से ड्राइवर को बुलाया गया था।

पुलिस ने कॉल डिटेल निकाली। रात 3:58 पर अर्जुन का फोन ड्राइवर रमेश को गया था। 4:16 पर हवेली के पीछे वाले गेट से कार निकली थी। 4:43 पर कार उसी बस स्टैंड के पास रुकी थी जहाँ काव्या मिली। जीपीएस ने झूठ बोलने से इनकार कर दिया।

पहले रमेश ने कहा—

—मालिक ने कहा था, बहूजी को मायके छोड़ना है।

पर जब उसे टोल प्लाजा की फुटेज दिखाई गई, जहाँ पिछली सीट पर काव्या बेहोश पड़ी दिख रही थी, वह टूट गया।

—साहब ने कहा था जल्दी चलो। मैडम बार-बार बोल रही थीं, “यहाँ नहीं मरनी चाहिए। घर पर मर गई तो बदनामी होगी।”

मीरा ने यह सुना तो कुर्सी पकड़ ली। उसे लगा जैसे दुनिया की हर माँ का दिल उसी पल फट गया हो।

अगली सुबह 6:30 पर राठौड़ हवेली के बाहर पुलिस की गाड़ियाँ रुकीं। बारिश बंद हो चुकी थी, पर जमीन अभी भी भीगी थी। बड़े लोहे के गेट पर राठौड़ परिवार का निशान चमक रहा था, जैसे अब भी उसे शर्म नहीं आई हो।

अर्जुन सफेद कुर्ते में बाहर आया।

—आप लोग समझ नहीं रहे। मेरी पत्नी भावुक है। गर्भावस्था में उसे भ्रम होने लगे थे।

राजेश्वरी देवी पीछे से आईं। क्रीम रंग की साड़ी, मोती की माला, माथे पर बड़ी बिंदी। चेहरा वैसा ही ठंडा।

—हमारे परिवार की प्रतिष्ठा है। आप ऐसे अंदर नहीं आ सकते।

महिला पुलिस अधिकारी ने उसके हाथ में हथकड़ी लगाई।

—प्रतिष्ठा अदालत में दिखाइएगा।

मीरा सड़क के उस पार खड़ी थी। निखिल ने उसे आने से मना किया था, पर वह आई। वह चिल्लाई नहीं। उसने बस मोबाइल पर रिकॉर्डिंग चला दी।

राजेश्वरी की आवाज हवेली की दीवारों से टकराई—

—अगर बचा नहीं, तो शायद यही इस घर के लिए अच्छा होगा।

गेट के बाहर खड़े पड़ोसी, नौकर, गार्ड, सब चुप हो गए। पहली बार राजेश्वरी देवी ने आँखें झुका लीं।

केस ने पूरे राजस्थान को हिला दिया। चैनलों ने हवेली की तस्वीरें दिखाईं। अखबारों ने लिखा—“इज्जत के नाम पर गर्भवती बहू को मरने छोड़ा।” राठौड़ों ने पलटवार किया। उन्होंने कहा काव्या मानसिक रूप से कमजोर थी। उन्होंने सुनीता पर चोरी का आरोप लगाया। मीरा को लालची माँ बताया। यहाँ तक कि एक निजी डॉक्टर का प्रमाणपत्र लगाया गया कि काव्या को “घर छोड़ने की आदत” थी।

निखिल ने उस डॉक्टर की कॉल रिकॉर्डिंग निकलवाई। 4:24 पर राजेश्वरी ने उसे संदेश भेजा था—“अभी मत आना। अगर बच्चा गया तो हम कहेंगे उसे दौरा पड़ा। अर्जुन उसे दूर कर रहा है।”

डॉक्टर ने जवाब नहीं दिया। उसने एंबुलेंस भी नहीं बुलाई। अदालत में जब यह पढ़ा गया, तो उसकी गर्दन झुक गई।

उधर अस्पताल में काव्या मौत से लौटना सीख रही थी।

पहले उसने उँगली हिलाई।

फिर आँखों से जवाब देना शुरू किया।

फिर स्लेट पर छोटे वाक्य लिखने लगी।

मीरा हर रात उसके पास बैठती। कभी रामायण का दोहा धीमे से पढ़ती, कभी काव्या के बचपन की बातें सुनाती। कभी बस उसके पेट पर हाथ रखकर कहती—

—बेटा, तू भी लड़। तेरी माँ अकेली नहीं है।

काव्या कभी-कभी रो देती।

एक दिन उसने बहुत धीमे कहा—

—माँ, मैं सोचती थी अगर मैं अच्छी बहू बन जाऊँ, तो वो मुझे अपना लेंगे।

मीरा ने उसके माथे को चूमा।

—बेटी, जो लोग इंसान को चीज समझते हैं, वे उसे अपनाते नहीं, इस्तेमाल करते हैं।

7वें महीने में अचानक काव्या को तेज दर्द उठा। डॉक्टरों ने तत्काल ऑपरेशन का फैसला किया। मीरा ऑपरेशन थिएटर के बाहर हाथ जोड़कर बैठ गई। उसने भगवान से पहली बार कोई बड़ा वरदान नहीं माँगा। बस इतना कहा—

—दोनों को साँस दे दो।

कुछ घंटों बाद डॉक्टर बाहर आया।

—बेटा हुआ है। वजन 1.8 किलो है। अभी एनआईसीयू में रहेगा, लेकिन रोया है।

मीरा वहीं फर्श पर बैठकर रो पड़ी। इतने दिनों बाद पहली बार यह रोना टूटने का नहीं, बच जाने का था।

काव्या ने बच्चे का नाम आरव रखा। जब उसे पहली बार बच्चे को दिखाया गया, वह नन्हा सा शरीर तारों से जुड़ा था। आँखें बंद थीं, हथेली मुट्ठी में बंद। मीरा ने उंगली पास रखी तो उसने पकड़ ली।

मीरा हँसी और रोई एक साथ।

—देख काव्या, इसने तो अभी से फैसला कर लिया है कि छोड़ना नहीं है।

काव्या की आँखों में पहली बार हल्की चमक लौटी।

—ये मेरा बेटा है, माँ। गलती नहीं है।

8 महीने बाद जयपुर की सत्र अदालत में मुकदमा शुरू हुआ। अदालत के बाहर भीड़ थी। कुछ लोग काव्या के लिए फूल लाए थे। कुछ सिर्फ तमाशा देखने। राठौड़ परिवार महंगे वकीलों के साथ आया। अर्जुन ने दाढ़ी बढ़ा ली थी, जैसे पश्चाताप का चेहरा पहन लिया हो। राजेश्वरी देवी अब भी सिर ऊँचा रखे थीं, पर आँखों में पहले वाली सत्ता नहीं थी।

काव्या बैसाखी के सहारे अदालत में आई। उसके चेहरे पर चोटों के निशान हल्के पड़ चुके थे, पर मिटे नहीं थे। मीरा ने आरव को गोद में लिया हुआ था। बच्चा अब मजबूत हो रहा था, पर उसकी छोटी-छोटी साँसें मीरा को हर पल उस रात की याद दिलाती थीं।

सुनीता गवाही देने खड़ी हुई। उसकी आवाज काँपी, पर वह रुकी नहीं।

—मैंने देखा था कि बहूजी को सीढ़ियों के पास धक्का दिया गया। मैंने खून साफ किया था। मुझे धमकाया गया था कि अगर मैंने मुँह खोला तो मुझे चोरी में फँसा देंगे।

ड्राइवर रमेश ने भी गवाही दी।

—मैं डर गया था। पर बहूजी पिछली सीट पर कराह रही थीं। उन्होंने कहा था, “मुझे अस्पताल ले चलो।” मगर साहब बोले, “बस स्टैंड पर छोड़ो। लोग समझेंगे खुद निकली थी।”

रिकॉर्डिंग अदालत में चली। काव्या ने आँखें बंद कर लीं। मीरा ने आरव को सीने से कस लिया। राजेश्वरी की अपनी ही आवाज कमरे में फैल गई—ठंडी, निर्दयी, बिना पछतावे के।

फिर निखिल ने पूछा—

—अर्जुन राठौड़, जब आपकी गर्भवती पत्नी आपसे कह रही थी कि बच्चा बचाइए, तब आपने एंबुलेंस क्यों नहीं बुलाई?

अर्जुन ने होंठ भींचे।

—वह हिस्टेरिकल थी।

काव्या अचानक खड़ी हो गई।

जज ने पूछा—

—क्या आप कुछ कहना चाहती हैं?

काव्या ने बैसाखी संभाली। मीरा उठना चाहती थी, पर काव्या ने आँखों से मना कर दिया। यह रास्ता उसे खुद चलना था।

—मैंने अर्जुन से प्यार किया था, क्योंकि उसने मुझे शुरुआत में यह भरोसा दिया था कि मैं चुनी गई हूँ। बाद में समझ आया कि मुझे बहू नहीं, सजावट की चीज बनाकर लाया गया था। मुझे बताया गया कि मेरे मायके वाले छोटे हैं, मेरी बोली छोटी है, मेरा खाना छोटा है, मेरी औकात छोटी है। मैं चुप रही क्योंकि मुझे लगा शादी निभानी चाहिए। जब मैं गर्भवती हुई, मैंने सोचा शायद बच्चा आने से सब बदल जाएगा। पर उस रात, जब मैं फर्श पर पड़ी थी और अपने पेट को पकड़कर रो रही थी, मेरे पति ने कहा कि यह बच्चा उनके नाम पर दाग है।

उसने राजेश्वरी की ओर देखा।

—आपने कहा था मेरा बच्चा गलती है।

फिर अर्जुन की ओर मुड़ी।

—वह गलती नहीं है। वह जिंदा है। मैं भी जिंदा हूँ। अब आप दोनों मेरे जीवन से बाहर होंगे, कानून के रास्ते।

अदालत में ऐसा सन्नाटा छा गया जैसे हर व्यक्ति अपनी साँस सुन सकता हो।

फैसला तीसरे दिन आया। अर्जुन को गर्भवती पत्नी पर गंभीर हिंसा, हत्या के प्रयास, अवैध रूप से छोड़ने, सबूत मिटाने और गवाह को धमकाने के अपराध में 28 साल की सजा हुई। राजेश्वरी देवी को साजिश, सहायता न देने, अपराध छिपाने और गवाह को डराने के लिए 20 साल की सजा मिली। डॉक्टर का लाइसेंस निलंबित हुआ और उसके खिलाफ अलग मामला चला। ड्राइवर को सरकारी गवाह बनने के बाद कम सजा मिली, लेकिन अदालत ने साफ कहा कि डर अपराध को मिटा नहीं सकता।

जब अर्जुन को ले जाया जा रहा था, उसने आखिरी बार काव्या की ओर देखा।

—काव्या, मुझे माफ कर दो।

काव्या ने कोई जवाब नहीं दिया।

मीरा ने धीरे से कहा—

—बस स्टैंड याद है?

अर्जुन का चेहरा पीला पड़ गया।

शायद पहली बार उसे उस बारिश की ठंड महसूस हुई, जिसमें उसने अपनी पत्नी और बच्चे को मरने के लिए छोड़ दिया था।

1 साल बाद मीरा के छोटे से घर में सुबह की धूप खिड़की से आ रही थी। रसोई में अदरक वाली चाय की खुशबू थी। काव्या अब भी कभी-कभी बैसाखी लेती थी, पर अब उसका सिर झुका नहीं रहता था। आरव 6 महीने का था, और जब भी मीरा उसके सामने ताली बजाती, वह हँसते-हँसते पैर पटकने लगता।

राठौड़ हवेली जब्त हो चुकी थी। संपत्ति का एक हिस्सा काव्या को मुआवजे में मिला। उसने अपने लिए महंगा घर नहीं खरीदा। उसने जयपुर के बाहर एक पुरानी धर्मशाला खरीदी और उसे महिलाओं के लिए सुरक्षित आश्रय में बदलवा दिया।

दरवाजे पर पीतल की पट्टिका लगी—

आरव निवास।

उस दिन उद्घाटन पर कई औरतें आईं। कोई बच्चे को गोद में लिए थी, कोई चोट छुपाने के लिए घूँघट में थी, कोई प्लास्टिक की थैली में कपड़े भरकर लाई थी। उनके चेहरों पर वही शर्म थी जो समाज पीड़ितों को दे देता है, अपराधियों को नहीं।

काव्या ने आरव को गोद में लिया और दरवाजे के पास खड़ी हो गई।

—माँ, मैं नहीं चाहती कि कोई औरत यह सोचे कि बारिश में बस स्टैंड उसके अपने घर से ज्यादा सुरक्षित है।

मीरा ने उसके कंधे पर हाथ रखा।

—तो इस घर की बत्ती कभी बंद नहीं होगी।

शाम को सब चले गए। काव्या, मीरा और आरव छोटी रसोई में बैठे रहे। बाहर हल्की बारिश शुरू हो गई थी। वही आवाज, वही गंध, वही ठंड, पर इस बार दरवाजा खुला था और भीतर रोशनी थी।

काव्या ने धीरे से पूछा—

—माँ, आप सच में हवेली जला देतीं?

मीरा ने खिड़की से बाहर देखा।

—हाँ।

काव्या चुप रही।

—फिर तूने लिखा था, आग मत लगाना।

—मुझे पता था आप मेरा बदला ले सकती हैं।

मीरा की आँखें भर आईं।

—तूने मुझे याद दिलाया कि मुझे बदला नहीं, तुझे वापस पाना था।

काव्या ने माँ का हाथ पकड़ लिया। बहुत देर तक दोनों चुप रहीं। कुछ घाव ऐसे होते हैं जो पूरी तरह नहीं भरते। वे बस दर्द से स्मृति बन जाते हैं। उस स्मृति में बारिश थी, अस्पताल की मशीनें थीं, अदालत की आवाजें थीं, और एक माँ की वह चीख थी जिसे दुनिया ने देर से सुना।

पर अब उसी स्मृति के पास आरव की साँसें थीं। आरव निवास का खुला दरवाजा था। सुनीता वहाँ नौकरी नहीं, सम्मान से काम करती थी। और हर रात मीरा मुख्य दरवाजे के पास एक बल्ब जलता छोड़ देती थी।

क्योंकि एक रात उसकी बेटी अंधेरे में मरते-मरते बची थी।

अब किसी और बेटी को अंधेरे में अकेला नहीं छोड़ा जाना था।

Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.