
PART 1
—यह घर कभी तुम्हारा था ही नहीं, वीर ने सबके सामने धीमे से कहा, जबकि नंदिनी अपनी 12 दिन की बेटी को सीने से चिपकाए खड़ी थी।
दिल्ली के साकेत में बने उस महंगे वकीलों के दफ्तर में अचानक ऐसी खामोशी फैल गई, जैसे किसी अस्पताल के वार्ड में डॉक्टर ने अभी-अभी बुरी खबर सुनाई हो।
नंदिनी मल्होत्रा वहाँ भीख माँगने नहीं आई थी। वह अपनी नवजात बेटी तारा को दूधिया रंग की छोटी रज़ाई में लपेटकर लाई थी। उसके चेहरे पर 12 रातों की नींदहीन थकान थी, शरीर अभी प्रसव की पीड़ा से उबर भी नहीं पाया था, पर आँखों में अजीब साफ़ आग थी। वह टूट चुकी पत्नी नहीं लग रही थी। वह ऐसी माँ लग रही थी, जिसने अब डरना छोड़ दिया हो।
लंबी मेज़ के दूसरे सिरे पर वीर खुराना बैठा था। गुरुग्राम और दक्षिण दिल्ली में टावर खड़े करने वाला नामी बिल्डर। अखबारों में वह “परिवार, विरासत और भरोसे” पर भाषण देता था। घर में वही आदमी पत्नी को चुप रहने की सलाह देता था और माँ के इशारे पर दस्तावेज़ गायब करवाता था।
उसके दाहिने हाथ पर रिया माथुर बैठी थी।
नंदिनी ने उसे पहले कभी सामने से नहीं देखा था, पर चेहरा पहचानती थी। वही चेहरा जो महीनों से तस्वीरों में दिखता रहा था। गोवा के रिसॉर्ट में वीर के साथ। जयपुर की शादी में उसके कंधे से लगी हुई। मुंबई की बिज़नेस पार्टी में उसकी बाँह थामे हुए, जबकि नंदिनी 8वें महीने में अकेली डॉक्टर के पास जा रही थी।
रिया की नज़र तारा पर पड़ी और उसका चेहरा उड़ गया।
—यह बच्ची… वीर की है?
नंदिनी ने बच्ची को और कसकर पकड़ा।
—हमारी बेटी। तारा। 12 दिन पहले पैदा हुई है।
रिया ने धीरे से वीर को देखा।
—तुमने कहा था तुम्हारा रिश्ता 1 साल पहले खत्म हो चुका है।
वीर ने ठंडी आवाज़ में कहा—
—यह मुद्दा नहीं है।
नंदिनी हँसी, मगर वह हँसी चाकू जैसी सूखी थी।
—बिल्कुल। जैसे वह भी मुद्दा नहीं था कि तुम अस्पताल नहीं आए, क्योंकि तुम्हारी “अहमदाबाद मीटिंग” थी।
नंदिनी के वकील अधिवक्ता समीर अवस्थी ने मोटी फाइल मेज़ पर रखी।
—मेरी मुवक्किल बच्ची की प्राथमिक देखभाल, अंतरिम खर्च, विवाह के दौरान अर्जित संपत्ति का पूरा ब्योरा और किसी भी संपत्ति के हस्तांतरण पर तत्काल रोक चाहती हैं।
वीर आगे झुका।
—हमारी बात यह नहीं हुई थी।
—हमारी? —नंदिनी की आवाज़ काँपी नहीं। —तुमने मुझे अस्पताल से घर लौटते दिन मेल भेजा था, जब मेरे टांके अभी खिंच रहे थे और बच्ची दूध के लिए रो रही थी।
—मैंने तुम्हें सम्मानजनक रास्ता दिया था।
—नहीं, तुमने मुझे चुप रहने की कीमत दी थी।
नंदिनी ने डायपर बैग से एक भूरा लिफाफा निकाला। वीर के वकील का चेहरा पीला पड़ गया।
वीर ने तुरंत हाथ बढ़ाया।
—ये कागज़ तुम्हें कहाँ से मिले?
—उस रजिस्ट्री ऑफिस से, जहाँ वसंत कुंज वाला घर एक नई कंपनी के नाम चढ़ाने की कोशिश हो रही थी। वही घर जिसमें तुमने कहा था कि हमारी बेटी की पहली दीवाली होगी।
रिया ने चौंककर पूछा—
—कौन-सा घर?
नंदिनी ने उसकी तरफ देखा।
—वही घर जिसे ये लोग मेरे प्रसव के 5वें दिन बेचने की तैयारी कर रहे थे।
तभी वीर के वकील का फोन चमका। उसने संदेश पढ़ा, वीर के कान में कुछ कहा। बस 1 पल के लिए वीर की आँखों में डर उतर आया।
फिर समीर अवस्थी का फोन बजा। उन्होंने सुना, 2 सवाल पूछे और फाइल बंद कर दी।
—आज कोई समझौता नहीं होगा।
नंदिनी का दिल धड़क उठा।
—क्यों?
समीर ने वीर की तरफ देखते हुए कहा—
—क्योंकि हमें अभी पुष्टि मिली है कि श्री वीर खुराना ने 1 घंटे पहले परिवार के घर की बिक्री का एग्रीमेंट साइन करने की कोशिश की है।
रिया कुर्सी से उठ गई।
—तुम आज घर बेचने वाले थे?
वीर ने उसकी तरफ देखा भी नहीं।
तारा ने नंदिनी की कमीज़ मुट्ठी में भींच ली। नंदिनी ने उसके माथे को चूमा।
—अब और क्या छिपाया है तुमने?
वीर थोड़ा झुका और इतना पास आया कि उसकी आवाज़ लगभग फुसफुसाहट बन गई।
—यह घर कभी तुम्हारा था ही नहीं।
वह “अब नहीं” नहीं बोला। वह “पहले से मेरा था” भी नहीं बोला। उसने कहा “कभी नहीं”।
और उसी क्षण नंदिनी समझ गई कि धोखा सिर्फ दूसरी औरत का नहीं था। धोखा उससे बड़ा था। धन से बड़ा। उस घर से भी बड़ा, जिसकी नर्सरी में उसने खुद हल्का बैंगनी रंग चुना था।
उस रात अपनी बड़ी बहन मीरा के छोटे से फ्लैट में, नंदिनी ने तारा को पड़ोसन से उधार मिले पालने में सुलाया और पहली बार बिना रोके रोई।
तभी फोन पर अनजान नंबर से संदेश आया।
“खुराना परिवार से भिड़ने की गलती मत करना। तुम्हारी बेटी का नाम भी मिटा देंगे।”
नंदिनी ने सोती हुई तारा को देखा।
अब यह तलाक नहीं था।
यह उसकी बेटी के अस्तित्व की लड़ाई थी।
PART 2
2 दिन बाद दोपहर में, जब नंदिनी खिड़की के पास बैठकर तारा को दूध पिला रही थी, उसका फोन बजा।
—नंदिनी? मैं रिया बोल रही हूँ। फोन मत काटना।
नंदिनी का चेहरा सख्त हो गया।
—तुमसे कहने को कुछ नहीं है।
रिया की आवाज़ टूटी हुई थी।
—वीर ने मुझसे भी झूठ बोला। पर बात सिर्फ अफेयर की नहीं है। मुझे उसके लैपटॉप बैग में एक पेन ड्राइव मिली है। उसमें तुम्हारी बेटी का ज़िक्र है।
नंदिनी की उंगलियाँ ठंडी पड़ गईं।
अगले दिन वह रिया से लाजपत नगर के एक शांत कैफे में मिली। रिया बिना मेकअप, सूजी आँखों और काँपते हाथों के साथ बैठी थी। उसने काली पेन ड्राइव मेज़ पर रख दी, जैसे कोई हथियार रख रही हो।
—वीर ने कहा था तुम माँ नहीं बन सकतीं। उसने कहा तुम सिर्फ खुराना नाम से चिपकी हो।
—और तुमने मान लिया?
रिया ने सिर झुका लिया।
—मैंने मानना चाहा।
शाम को समीर अवस्थी मीरा के घर आए। पुराने लैपटॉप पर फाइलें खुलीं। कंपनियाँ, बैंक ट्रांसफर, गुप्त संपत्तियाँ, अधूरे रजिस्ट्री कागज़, और फिर एक ऑडियो।
वीर की माँ शकुंतला खुराना की आवाज़ आई—
—जब तक वह प्रसव के बाद कमजोर है, सब साइन करवा लो।
फिर वीर बोला—
—मैं बच्ची को आधिकारिक रूप से नहीं मानूँगा, जब तक नंदिनी घर छोड़ने और कम खर्च पर राज़ी नहीं होती।
शकुंतला की आवाज़ और ठंडी थी—
—पितृत्व पर सवाल उठाओ। अभी वह डरी हुई है।
तारा कमरे में सो रही थी।
नंदिनी की बेटी 12 दिन की थी, और वे उसे पहले ही सौदे की शर्त बना चुके थे।
PART 3
अगली सुबह वीर मीरा के फ्लैट के नीचे आकर घंटी पर घंटी बजाने लगा। इमारत के गलियारे में 3 पड़ोसी दरवाज़े खोलकर झाँकने लगे। नंदिनी ने तारा को कंधे से लगाकर इंटरकॉम उठाया।
—क्या चाहिए?
—अपनी बेटी से मिलना है।
नंदिनी की आँखों में थकान थी, पर आवाज़ में नहीं।
—रिकॉर्डिंग में उसे नकारकर अब पड़ोसियों के सामने पिता बनने आए हो?
दूसरी तरफ कुछ पल सन्नाटा रहा।
—तुम अभी ठीक नहीं हो, नंदिनी। 12 दिन पहले डिलीवरी हुई है। तुम्हें समझ नहीं आ रहा कि तुम क्या कर रही हो।
नंदिनी ने फीकी मुस्कान के साथ आँखें बंद कीं।
यही उनकी चाल थी। उसे थकी हुई, टूटी हुई, प्रसव के बाद अस्थिर और भावुक औरत साबित करना। ताकि कोई उसके सबूत न देखे, सिर्फ उसके आँसू देखे।
—मुझे पहली बार सब साफ़ दिख रहा है, वीर।
उसकी आवाज़ भारी हो गई।
—तुम नहीं जानतीं किस परिवार से टकरा रही हो।
—जानती हूँ। उस परिवार से, जिसे लगता है कि पैसा कानून से बड़ा है और पोती भी संपत्ति की लाइन में लिखी जाने वाली कोई रकम है।
उसी दोपहर समीर अवस्थी ने फोन किया।
—नंदिनी, उन्होंने अदालत में जवाब दाखिल किया है। वीर बच्ची की संयुक्त अभिरक्षा मांग रहा है।
नंदिनी ने तारा के सिर पर हाथ रखा।
—और?
समीर कुछ सेकंड चुप रहे।
—वह तारा की पितृत्व पर भी सवाल उठा रहा है।
नंदिनी ने फोन कसकर पकड़ लिया।
कमरे की दीवारें जैसे दूर खिसक गईं। उसे शक नहीं था। वीर को भी शक नहीं था। उनके विवाह, तारीखों, अस्पताल, डॉक्टर, सबको सच पता था। उसे तोड़ने वाली बात यह नहीं थी कि उसने झूठ बोला। उसे तोड़ने वाली बात यह थी कि वह अपनी बेटी की पालना पर कीचड़ फेंकने को तैयार था, सिर्फ हिसाब छिपाने के लिए।
उस रात नंदिनी ने तारा की छोटी उंगलियाँ अपनी उंगलियों में लीं। तारा की पकड़ कमजोर होनी चाहिए थी, पर वह अजीब मजबूत थी।
उसी पल नंदिनी पत्नी नहीं रही।
वह युद्ध में उतरी माँ बन गई।
अगले कई हफ्ते दूध की गंध, अदालत के कागज़, नींदहीन रातों और अपमान से भरे रहे। नंदिनी रात 3 बजे स्क्रीनशॉट भेजती, सुबह 6 बजे बच्ची को नहलाती, दोपहर में वकील से बात करती, फिर शाम को तारा के बुखार से घबरा जाती। उसका शरीर अभी भी दर्द में था, पर दिमाग पहले से ज्यादा सतर्क था।
शकुंतला खुराना ने इस बीच अपना अलग किस्सा फैलाना शुरू कर दिया। ग्रेटर कैलाश के किटी समूहों में, रिश्तेदारों के व्हाट्सऐप पर, मंदिर की सीढ़ियों के बाहर धीमी आवाज़ों में यही कहा जाने लगा कि नंदिनी “प्रसव के बाद मानसिक रूप से अस्थिर” हो गई है। वह खुराना परिवार की इज्जत खराब करना चाहती है। उसे सिर्फ घर चाहिए। बच्ची को बहाना बना रही है।
एक दिन मीरा ने फोन नंदिनी के सामने रखा। शकुंतला का संदेश था—
“हम अपने बेटे को एक परेशान औरत से बचा रहे हैं। बेचारा बच्चा।”
नंदिनी ने वह वाक्य कई बार पढ़ा।
फिर फोन पलट दिया।
वह जवाब देना चाहती थी। सबको ऑडियो भेज देना चाहती थी। बताना चाहती थी कि कौन किसे मिटा रहा है। लेकिन समीर ने साफ़ कहा था—
—पहले अदालत। समाज बाद में।
तो नंदिनी ने अपने गुस्से को सबूतों में बदल दिया।
उसने अस्पताल की डिस्चार्ज शीट निकाली। बैंक कार्ड अस्वीकार होने की तारीखें लिखीं। घर का सुरक्षा कोड बदलने का संदेश रखा। रजिस्ट्री ऑफिस के दस्तावेज़ की कॉपी संभाली। वीर के देर रात के संदेश, शकुंतला की ठंडी सलाह, संपत्ति कंपनियों के नाम, सब क्रम से लगाए। हर कागज़ के पीछे उसकी बेइज्जती थी। हर फाइल के भीतर तारा का भविष्य।
सुनवाई के दिन साकेत परिवार न्यायालय के बाहर हल्की धूप थी। नंदिनी सफेद सूती सलवार-कुर्ते में आई, बाल सादे जूड़े में, आँखों के नीचे गहरे घेरे। तारा उसकी बाँहों में सो रही थी, गुलाबी टोपी में इतनी छोटी कि अदालत की कठोर दीवारें भी उसके सामने नरम लगती थीं।
गलियारे में वीर अपनी माँ के पास खड़ा था। शकुंतला ने क्रीम रंग की महंगी साड़ी पहनी थी, गले में मोती, हाथ में चमड़े का बैग। उसके चेहरे पर वही अभिमान था, जो वर्षों से नंदिनी को बताता रहा था कि बहू की आवाज़ हमेशा परिवार की इज्जत से छोटी होती है।
फिर रिया आई।
वीर ने उसे देखते ही आधी मुस्कान दी, जैसे वह अभी भी समझता हो कि कोई न कोई महिला आखिरकार उसकी तरफ ही आएगी।
रिया बिना रुके उसके पास से गुजरी और नंदिनी के बगल में बैठ गई।
वीर की मुस्कान वहीं मर गई।
शकुंतला झुकी और फुसफुसाई—
—अभी भी समय है। खुद को तमाशा मत बनाइए।
रिया ने सीधी आँखों से देखा।
—तमाशा आपने बनाया है, आंटी। फर्क इतना है कि आज पर्दा उठेगा।
अदालत कक्ष ठंडा और उजला था। भीतर ऐसी हवा थी, जिसमें कई परिवारों के टूटने की आहटें अटकी हों। न्यायाधीश ने फाइलें देखीं। वीर के वकीलों ने शुरुआत की।
उन्होंने नंदिनी को कमजोर बताया। प्रसव के बाद भ्रमित। गुस्सैल। प्रभाव में आने वाली। उन्होंने कहा कि वह बच्ची को पिता से दूर रख रही है। उन्होंने कहा कि वीर जिम्मेदार पिता बनना चाहता है, पर पहले “सच्चाई” स्पष्ट होनी चाहिए।
नंदिनी ने सब सुना।
उसे एहसास हुआ कि यह सिर्फ उसका मुकदमा नहीं था। यह उन सभी औरतों की पुरानी कहानी थी जिनके हाथ में सबूत होते हैं, फिर भी उनके आँसू पर सवाल उठाए जाते हैं।
फिर समीर अवस्थी उठे।
उन्होंने कोई नाटक नहीं किया। बस पहली फाइल खोली।
उन्होंने विवाह के बाद खरीदी गई संपत्तियों के दस्तावेज़ रखे। नई कंपनियों के कागज़ रखे। फर्जी निदेशकों के नाम रखे। उन खातों की प्रविष्टियाँ रखीं, जिनसे प्रसव से कुछ दिन पहले भारी रकम हटाई गई थी। उन्होंने बताया कि वसंत कुंज का घर एक ऐसी कंपनी में डाला जा रहा था जिसका नाम नंदिनी ने कभी सुना तक नहीं था। उन्होंने वे ईमेल पढ़े जिनमें लिखा था—“मैडम को वित्तीय दायरे से बाहर करना है” और “प्रार्थना पत्र से पहले फाइल साफ़ करनी होगी।”
हर दस्तावेज़ खुराना नाम पर पत्थर की तरह गिरता गया।
न्यायाधीश ने गंभीर होकर पूछा—
—ये संपत्तियाँ कार्यवाही में घोषित क्यों नहीं की गईं?
वीर का वकील हकलाया।
समीर ने शांत आवाज़ में कहा—
—क्योंकि मेरी मुवक्किल को अंधेरे में रखा गया। यह सब उस समय हुआ जब वह गर्भवती थी और फिर नवजात बच्ची की देखभाल में थी।
फिर समीर ने पेन ड्राइव की फॉरेंसिक रिपोर्ट पेश की। फाइलों की तारीखें, लैपटॉप की पहचान, ऑडियो की जांच। अदालत ने रिकॉर्डिंग सुनने की अनुमति दी।
कमरे में साँसें रुक गईं।
पहले शकुंतला की आवाज़ आई—
—जब तक वह कमजोर है, साइन करवा लो।
फिर वीर—
—अगर वह घर छोड़ दे और कम पैसे पर राज़ी हो जाए, तो बच्ची को नाम देने में मुझे क्या दिक्कत है?
नंदिनी ने तारा को और करीब खींच लिया।
फिर शकुंतला की आवाज़ आई—
—कह देना बच्ची किसी की भी हो सकती है। डर जाएगी।
अदालत के कमरे में ऐसा सन्नाटा हुआ कि तारा की हल्की साँस भी सुनाई दे रही थी।
न्यायाधीश ने सिर उठाकर वीर को देखा। वह पहली बार नीचे देखने लगा। शकुंतला का चेहरा सख्त था, पर उसकी आँखों में बेचैनी तैर चुकी थी।
फिर डीएनए रिपोर्ट पढ़ी गई।
—रिपोर्ट के अनुसार 99.9 प्रतिशत से अधिक संभावना है कि श्री वीर खुराना ही बच्ची तारा के जैविक पिता हैं।
नंदिनी को कोई जीत महसूस नहीं हुई। सिर्फ गहरी उदासी हुई। एक बच्ची को अपने पिता की स्वार्थी राजनीति से बचाने के लिए प्रयोगशाला की मुहर क्यों चाहिए थी? क्या खून का रिश्ता भी तब तक रिश्ता नहीं, जब तक संपत्ति का हिसाब ठीक न हो जाए?
इसके बाद रिया को गवाही के लिए बुलाया गया।
उसके कदम काँप रहे थे, मगर आवाज़ धीरे-धीरे स्थिर हो गई। उसने बताया कि वीर ने उसे कहा था कि नंदिनी माँ नहीं बन सकती। उसने कहा कि शादी सिर्फ नाम की है। उसने कहा कि नंदिनी तलाक नहीं दे रही क्योंकि उसे खुराना उपनाम चाहिए। उसने बताया कि पेन ड्राइव कैसे उसके लैपटॉप बैग से मिली और पहले उसे लगा कि वे प्रोजेक्ट फाइलें हैं, लेकिन जब उसने ऑडियो सुना तो समझ गई कि एक नवजात बच्ची को मिटाने की तैयारी हो रही है।
वीर के वकील ने तीखा सवाल किया—
—आपका श्री वीर खुराना से संबंध था, जबकि वह विवाहित थे?
रिया ने सिर नहीं झुकाया।
—हाँ। वह मेरी गलती थी। लेकिन धोखा खा जाना मुझे अपराध छिपाने की इजाज़त नहीं देता।
वाक्य ने कमरे की हवा बदल दी।
सुनवाई लंबी चली। अंत में न्यायाधीश ने अंतरिम आदेश दिए। वसंत कुंज के घर की बिक्री पर रोक लगी। विवाह के बाद खरीदी गई संपत्तियों और कंपनियों की वित्तीय जांच का आदेश हुआ। वीर को बच्ची और नंदिनी के खर्च के लिए अंतरिम राशि देनी पड़ी। तारा की प्राथमिक देखभाल नंदिनी को मिली। वीर की मुलाकातें निगरानी में तय हुईं, और परिवार परामर्श रिपोर्ट से पहले कोई अधिकार नहीं बढ़ाया गया। छिपी संपत्ति से जुड़ी अलग जांच भी शुरू हुई।
शकुंतला अचानक खड़ी हो गई।
—वह मेरी पोती है!
नंदिनी ने पहली बार उसकी ओर सीधा देखा।
उसकी आवाज़ शांत थी, पर हर शब्द लोहे का था।
—नहीं, आंटी। आप उसे पोती तब नहीं कह सकतीं, जब रिकॉर्डिंग में उसे “किसी की भी बच्ची” कहा था।
शकुंतला का चेहरा लाल पड़ गया।
नंदिनी ने कहा—
—आप खून को तब नकार नहीं सकतीं जब वह संपत्ति में हिस्सा माँगे, और तब अपना नहीं सकतीं जब अदालत देख रही हो। परिवार हथियार नहीं होता। बच्चा सौदे की शर्त नहीं होता।
न्यायाधीश ने शांति बनाए रखने को कहा। शकुंतला धीरे से बैठ गई। पहली बार वह डरावनी नहीं लगी। वह बस ऐसी औरत लगी, जिसे देर से पता चला था कि रसूख हर सच को नहीं कुचल सकता।
अदालत से बाहर निकलते समय वीर नंदिनी के पीछे आया।
—नंदिनी, रुको।
वह पूरी तरह नहीं मुड़ी। तारा उसके सीने से लगी सो रही थी।
वीर की आँखें लाल थीं। पहली बार वह मालिक जैसा नहीं लग रहा था। न घर का, न कहानी का, न अपनी छवि का।
—मैंने सब खो दिया, उसने कहा।
नंदिनी ने तारा की रज़ाई ठीक की।
—नहीं। तुमने सिर्फ वह खोया है जिसे तुम नियंत्रित करना चाहते थे।
वीर ने बच्ची को देखा।
—मैं उसका पिता बनना चाहता हूँ।
नंदिनी के भीतर हल्की टीस उठी। तारा पिता की हकदार थी। लेकिन उस पिता की नहीं जो नाम तब दे जब अदालत मजबूर करे। उस आदमी की नहीं जो बच्ची की साँसों से पहले संपत्ति का हिसाब लगाए।
—तो सच बोलना शुरू करो, उसने कहा। पिता होना नाम देने से नहीं होता। पिता होना तब होता है जब कोई नहीं देख रहा हो, फिर भी तुम बच्चे की रक्षा करो।
वीर ने धीमे से पूछा—
—क्या तुम कभी माफ कर पाओगी?
नंदिनी ने अस्पताल का खाली कमरा याद किया। वह रात जब तारा रो रही थी और वीर का फोन बंद था। शकुंतला के संदेश। बदले हुए घर के कोड। लगभग बिक चुका घर। वह ऑडियो जिसमें उसकी बच्ची को डराने का औजार बनाया गया था।
—मैं तारा की जिंदगी तुम्हारे पछतावे के इर्द-गिर्द नहीं बनाऊँगी, उसने कहा। मैं उसे ऐसी जिंदगी दूँगी जहाँ सम्मान माँगना न पड़े।
महीनों बाद तलाक पूरा हुआ। नंदिनी को तारा की प्राथमिक देखभाल मिली, उचित भरण-पोषण मिला, छिपी संपत्ति में वैधानिक हिस्सा मिला। आर्थिक जांच चलती रही। वीर के साझेदारों ने दूरी बना ली। जिन लोगों ने कभी उसके पारिवारिक मूल्यों के भाषणों पर तालियाँ बजाई थीं, वही अब नज़रें चुराने लगे।
शकुंतला उनकी जिंदगी से गायब हो गई। नंदिनी जानती थी, यह शर्म नहीं थी। यह नियंत्रण खोने की चुप्पी थी।
रिया ने दिल्ली छोड़ दी। जाने से पहले उसने नंदिनी को संदेश भेजा—
“मैं अपनी गलती मिटा नहीं सकती। लेकिन सच बोलने का मौका देने के लिए धन्यवाद।”
नंदिनी ने कई दिन जवाब नहीं दिया। फिर एक रात, जब तारा उसके पास सो रही थी, उसने लिखा—
“हम दोनों फिर कभी वहाँ न रहें जहाँ हमें झूठ से छोटा बनाया जाए।”
अगले बसंत में नंदिनी ने नोएडा की एक शांत सोसायटी में छोटा-सा फ्लैट किराए पर लिया। वहाँ संगमरमर नहीं था, न बड़ा लॉन, न इलेक्ट्रॉनिक गेट। पर खिड़की से नीम का पेड़ दिखता था। रसोई में सुबह की धूप आती थी। पड़ोस की आंटी कभी दलिया भेज देती थीं, कभी तारा के लिए छोटी फ्रॉक। छोटी-सी नर्सरी में बैंगनी दीवारों पर कागज़ की तितलियाँ लगी थीं।
एक दोपहर तारा आखिरकार सो गई। नंदिनी खिड़की के पास बैठी चाय का कप हाथ में लिए बहुत देर तक चुप रही। कोई वकील का फोन नहीं। कोई धमकी वाला संदेश नहीं। कोई छिपी कंपनी का नाम नहीं। कोई दरवाज़ा जिसे खोलने से डर लगे।
बस दूर से आती मेट्रो की आवाज़ थी, कमरे में धूप थी, और पालने में तारा की शांत साँसें।
नंदिनी की आँखों से आँसू बहे, पर इस बार वे हार के नहीं थे।
उसे समझ आया कि उसने परिवार नहीं खोया था।
वह एक सजाए हुए झूठ से बच निकली थी।
वह उठी, पालने के पास गई और तारा के गाल को हल्के से छुआ।
—तुमने मेरी जिंदगी नहीं तोड़ी, मेरी बच्ची, उसने फुसफुसाकर कहा। तुमने मुझे सिखाया कि उसे कैसे बचाना है।
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