
PART 1
अपने 32वें जन्मदिन की रात अदिति को उसकी सास ने 18 मेहमानों के सामने थप्पड़ मारा, और सबसे ज़्यादा दर्द गाल पर नहीं, बल्कि उसके पति के खामोश खड़े रहने से हुआ।
दक्षिण दिल्ली के ग्रेटर कैलाश की उस बड़ी कोठी में कुछ पल के लिए सब कुछ जम गया। डाइनिंग टेबल पर चांदी के बर्तन चमक रहे थे, गुलाब-जामुन की खुशबू हवा में थी, और केक पर लगी सुनहरी मोमबत्तियां अभी बुझी भी नहीं थीं। अदिति ने अपना जलता हुआ गाल थामा। सामने सावित्री मल्होत्रा खड़ी थीं—सफेद रेशमी साड़ी, मोतियों का सेट, ठोड़ी ऊंची, जैसे उन्होंने कोई बहुत बड़ा अन्याय नहीं, बस घर की इज्जत बचाने का काम किया हो।
—इस घर में बहू बनकर आई हो, मालकिन बनकर नहीं।
सावित्री की आवाज़ इतनी साफ थी कि ड्राइंग रूम के कोने में खड़ी नौकरानी भी सहम गई। अदिति ने आरव की ओर देखा। उसका पति, जो कभी उसके हाथ की लकीरों में भविष्य पढ़ता था, आज अपनी मां की आंखों से डरकर जमीन देखने लगा।
अदिति ने 3 साल इस घर में काटे थे। शादी के बाद आरव ने कहा था—बस कुछ महीने, फिर अपना घर लेंगे। लेकिन कुछ महीने 3 साल बन गए। सावित्री के ताने भी रोज़मर्रा की चाय की तरह तय हो गए।
—इंटीरियर डिजाइन से घर नहीं चलते।
—मेरे बेटे की तरक्की शादी के बाद ही क्यों रुकी?
—बहू को पहले परिवार समझना चाहिए, करियर बाद में।
अदिति चुप रहती थी, क्योंकि वह आरव से प्यार करती थी। आरव एक होनहार आर्किटेक्ट था, मगर अपनी मां की छाया में पला हुआ ऐसा बेटा, जो सही जानता था, पर बोलने की हिम्मत खो चुका था। उसके पिता हरीश मल्होत्रा अलग थे—धीमे, शांत, किताबों और तुलसी के पौधों से प्रेम करने वाले। वह अदिति को बेटी की तरह देखते थे, जैसे उसकी हर चुप्पी का वजन समझते हों।
उस रात जन्मदिन की दावत सावित्री ने “बहू की खुशी” के नाम पर रखी थी। असल में मेहमान वही थे जिन्हें वह प्रभावित करना चाहती थीं—किट्टी पार्टी की महिलाएं, बिजनेस परिवारों के रिश्तेदार, और कुछ लोग जो अदिति को ऐसे देखते थे जैसे वह इस घर की दीवार पर गलत रंग लगा बैठी हो।
अदिति की सहेली मीरा भी आई थी, साथ में उसके डिजाइन स्टूडियो के 2 साथी। उन्होंने अदिति को आर्ट बुक, काम के नए कॉन्ट्रैक्ट और मुंबई की प्रदर्शनी के टिकट दिए। सावित्री ने उन तोहफों को देखकर होंठ सिकोड़ लिए।
जब टोस्ट का समय आया, सावित्री ने गिलास उठाया।
—अदिति को जन्मदिन की शुभकामनाएं। भगवान करे इस साल उसे समझ आए कि घर बसाना रंगों और पर्दों से बड़ा काम है। और अगर ऊपरवाला चाहे तो इस घर को जल्द एक वारिस भी मिले।
अदिति का गला भर आया। कोई नहीं जानता था कि वह और आरव 1 साल से बच्चा चाह रहे थे। कोई नहीं जानता था डॉक्टरों की रिपोर्ट, रात की रोती हुई प्रार्थनाएं, और हर महीने टूटती उम्मीद।
तभी आरव के दोस्त कबीर ने मुस्कुराकर कहा—
—अदिति का नया रेस्टोरेंट प्रोजेक्ट कमाल है। पूरी दिल्ली में नाम होगा इसका।
सावित्री का चेहरा पत्थर हो गया।
—बहुत अच्छा है। पति की नौकरी गई और बहू चमकने लगी।
कमरे में सन्नाटा उतर आया। आरव की नौकरी 3 महीने पहले एक बड़ी फर्म से छंटनी में चली गई थी। अदिति ने ही घर के कई खर्च अपने प्रोजेक्ट्स से संभाले थे, लेकिन सावित्री ने दोष उसी पर रखा।
—मैंने आरव का कुछ नहीं छीना, मांजी, —अदिति ने कांपती आवाज़ में कहा।
—मुझे जवाब मत दो, —सावित्री चीखी—। जिस दिन से आई हो, मेरे बेटे को छोटा कर दिया। तुम्हारे सपने, तुम्हारे रंग, तुम्हारी आज़ादी… सबने उसे कमजोर बना दिया।
अदिति कुर्सी से उठी।
—आज मेरा जन्मदिन है। कम से कम आज मुझे अपमानित मत कीजिए।
सावित्री आगे बढ़ीं।
—तुम्हारा जन्मदिन? तुम्हारा घर? बहुत जल्दी भूल गई अपनी औकात।
और फिर थप्पड़ पड़ा।
मीरा खड़ी हो गई। हरीश जी ने छाती पर हाथ रखा। आरव के मुंह से निकला—
—मां!
बस इतना। न उससे ज़्यादा, न उसके बाद कुछ।
अदिति ने आरव की आंखों में देखा।
—मेरे साथ चलोगे या यहीं रहोगे?
आरव का चेहरा टूट गया।
—अदिति, मां की तबीयत… पापा भी…
अदिति समझ गई।
—तुम यहीं रहोगे।
वह ऊपर गई, एक बैग में कपड़े डाले और मीरा के साथ बाहर निकल गई। गेट पार करते हुए उसे लगा जैसे उसके भीतर की कोई आखिरी उम्मीद मर गई हो।
लेकिन उसे नहीं पता था कि उसी कोठी के आंगन में गेंदे और चंपा के नीचे दबा एक पुराना कांच का डिब्बा उसकी शादी, उसके पति और पूरे मल्होत्रा परिवार की नींव हिला देने वाला था।
PART 2
अदिति ने रात मीरा के छोटे से अपार्टमेंट में बिताई। आंसू सूख गए थे, पर गाल की जलन अब भी आत्मा तक पहुंच रही थी। सुबह आरव का संदेश आया—
“मुझे माफ कर दो। मां की तबीयत बिगड़ गई थी। डॉक्टर आया था। हम बात करेंगे। मैं तुमसे प्यार करता हूं।”
अदिति ने जवाब नहीं दिया।
2 दिन बाद आरव आया। आंखों के नीचे काले घेरे थे।
—हम अलग घर लेंगे, अदिति। इस बार सच में।
अदिति ने थके हुए स्वर में कहा—
—मैं उस कोठी में वापस नहीं जाऊंगी। अगर तुम्हारी मां फिर हमारे बीच आईं, तो मैं हमेशा के लिए चली जाऊंगी।
आरव ने सिर हिला दिया।
पर अदिति के भीतर अपमान का जहर बचा था। सावित्री का सबसे बड़ा घमंड उनका आंगन था—दुर्लभ चंपा, गेंदे और रातरानी के पौधे। बुधवार को सावित्री मंदिर समिति की बैठक में जाती थीं। घर खाली रहता था।
अदिति उसी दोपहर चाबी लेकर कोठी के पीछे से अंदर गई। वह सिर्फ एक पौधा उखाड़ना चाहती थी, बस इतना। लेकिन जब उसने चंपा की जड़ के पास मिट्टी हटाई, उसकी छोटी खुरपी किसी सख्त चीज़ से टकराई।
वह कांच का पुराना डिब्बा था, प्लास्टिक में लिपटा हुआ।
अंदर पीले पड़े लिफाफे थे। एक नाम बार-बार लिखा था—“सावित्री राव।”
सावित्री का मायके का नाम।
फिर अदिति की नजर एक पंक्ति पर अटक गई।
“हमारा बेटा, सावित्री। आरव मेरा खून है, हरीश का नहीं।”
अदिति के हाथ से पत्र गिरते-गिरते बचा।
तभी पीछे से हरीश जी की आवाज़ आई—
—बहू… जो तुमने पाया है, वह मैंने 32 साल पहले खो दिया था।
PART 3
अदिति के पैरों के नीचे की जमीन जैसे खिसक गई। हरीश जी चंपा के पेड़ के पास खड़े थे। उनके चेहरे पर गुस्सा नहीं था, सिर्फ वही पुरानी थकान थी जो शायद वर्षों से उनकी हड्डियों में बसी थी।
—पापा… मैं बस… मैं…
अदिति के शब्द टूट गए। उसके हाथ में अभी भी वह पत्र था। सावित्री राव के नाम लिखा हुआ, नीचे हस्ताक्षर—विक्रम सेन।
हरीश जी धीरे-धीरे आगे आए। उन्होंने पत्र छीनने की कोशिश नहीं की। बस मिट्टी में बने उस गड्ढे को देखा, फिर उस चंपा को, जिसे सावित्री हर सुबह पानी देती थीं जैसे वह कोई पूजा हो।
—अंदर चलो, —उन्होंने शांत आवाज़ में कहा—। यह बात आंगन में खड़े होकर नहीं कही जा सकती।
अदिति उनके पीछे बैठक में गई। वही बैठक जहां 2 रात पहले उसे थप्पड़ मारा गया था। वही सोफा, वही पीतल की ट्रे, वही दीवार पर परिवार की मुस्कुराती तस्वीर। तस्वीर में आरव हरीश जी के कंधे पर हाथ रखे खड़ा था। अदिति की आंखें उस चेहरे पर टिक गईं। क्या वह आदमी सच में उसका पिता नहीं था? या पिता होना खून से कहीं ज़्यादा बड़ा था?
हरीश जी ने पानी का गिलास उसके सामने रखा।
—मैंने पहली बार यह सच तब जाना जब आरव 6 महीने का था, —उन्होंने कहा—। सावित्री ने कभी माना नहीं, पर तारीखें झूठ नहीं बोलतीं। फिर एक दिन मुझे विक्रम का पत्र मिला। उसने लिखा था कि उसे अपने बेटे को गोद में लेने का हक भी नहीं मिला।
अदिति ने फुसफुसाकर पूछा—
—फिर आपने कुछ कहा क्यों नहीं?
हरीश जी की आंखें भर आईं, मगर आवाज़ नहीं कांपी।
—क्योंकि उस दिन आरव मेरी गोद में सो रहा था। उसके छोटे हाथ ने मेरी उंगली पकड़ी हुई थी। मैंने सोचा, अगर मैं सच को तलवार बनाऊंगा, तो कटेगा कौन? सावित्री? मैं? नहीं। सबसे पहले वह बच्चा कटेगा, जिसका कोई दोष नहीं था।
अदिति का सीना भारी हो गया। उसने उन्हें हमेशा शांत, दबे हुए, कभी-कभी कमज़ोर समझा था। आज पहली बार उसे समझ आया कि कुछ लोग चुप इसलिए नहीं रहते कि उनमें साहस नहीं होता, बल्कि इसलिए कि वे अपने दर्द से दूसरों को बचाते रहते हैं।
—आपने अकेले यह सब सहा?
—हर दिन, —हरीश जी ने हल्की मुस्कान के साथ कहा—। लेकिन आरव ने जब पहली बार मुझे पापा कहा, तब मैंने तय कर लिया था कि मेरी हार भी उसी की जीत होगी। खून ने उसे जन्म दिया होगा, पर मैंने उसकी हर बुखार वाली रात काटी, हर स्कूल मीटिंग में गया, हर डर के आगे खड़ा रहा। मैं उसका पिता था। हूं। रहूंगा।
अदिति ने पत्रों का डिब्बा मेज पर रख दिया।
—मैं इन्हें किसी के खिलाफ इस्तेमाल नहीं करूंगी।
हरीश जी ने पहली बार राहत से सांस ली।
—मैं यही मांगने आया था। सावित्री ने तुम्हारे साथ गलत किया। बहुत गलत। लेकिन सच बदले की आग में निकला तो आरव टूट जाएगा। उसे यह जानना चाहिए, मगर प्यार से, न कि अपमान से।
अदिति चुप रही। उसके गाल की जलन अब भी याद थी। सावित्री का थप्पड़, आरव की खामोशी, मेहमानों की नजरें—सब कुछ भीतर कांटे की तरह चुभ रहा था। फिर भी वह जानती थी कि हरीश जी सही थे। अगर वह इन पत्रों को हथियार बनाती, तो वह भी उसी तरह किसी की कमजोरी पर वार करती, जैसे सावित्री ने उसके दर्द पर किया था।
उस शाम अदिति मीरा के घर लौटी तो उसने सारे पत्र दुबारा पढ़े। विक्रम सेन दिल्ली विश्वविद्यालय में भौतिकी का शोधकर्ता था। सावित्री उससे एक सेमिनार में मिली थीं, शादी के 2 साल बाद। पत्रों में प्रेम था, अपराधबोध था, डर था, और एक वादा—अगर बेटा हुआ तो उसका नाम आरव रखना, क्योंकि विक्रम को “आकाश की पहली रोशनी” से प्रेम था।
अदिति ने पत्र बंद कर दिए। उस रात उसने आरव को फोन किया।
—फ्लैट देखा तुमने?
आरव कुछ पल चुप रहा, फिर बोला—
—हां। लाजपत नगर में छोटा है, लेकिन धूप आती है। तुम्हें पसंद आएगा।
—मैं कल देखने आऊंगी।
दूसरी तरफ से आरव की सांस टूटती हुई सुनाई दी।
—अदिति… मैं तुम्हारे लायक पति नहीं रहा उस रात।
—नहीं रहे, —अदिति ने साफ कहा—। लेकिन यह आखिरी मौका है। तुम्हें मेरी तरफ खड़ा होना होगा। सिर्फ कमरे में नहीं, जीवन में।
—मैं खड़ा रहूंगा।
1 सप्ताह बाद वे नए फ्लैट में शिफ्ट हो गए। 2 कमरों का घर था, बालकनी में बस 3 गमले रखने की जगह, रसोई छोटी, दीवारों पर हल्का पीला रंग। लेकिन अदिति को वह महल लगा, क्योंकि वहां कोई उसकी सांसों का हिसाब नहीं रखता था।
सावित्री ने पहले दिन ही फोन किया।
—बेटे, बहू ने आखिर तुझे घर से अलग कर ही दिया।
आरव ने इस बार फोन स्पीकर पर रखा। अदिति चुप रही।
—मां, मैं खुद आया हूं। और सुन लीजिए, अदिति मेरी पत्नी है। उसका अपमान होगा तो मैं आपके घर नहीं आऊंगा।
लाइन के उस पार सन्नाटा था। फिर सावित्री ने रोती आवाज़ बनाई—
—तेरे पापा को कुछ हो गया तो?
आरव ने गहरी सांस ली।
—पापा मुझे समझते हैं। आप भी समझने की कोशिश कीजिए।
फोन कट गया।
अदिति ने पहली बार आरव को अलग नज़र से देखा। वह अभी भी वही आदमी था जिसने उसे अकेला छोड़ा था, मगर शायद पहली बार वह अपने डर से बाहर निकल रहा था।
दिन बीतने लगे। अदिति ने अपने रेस्टोरेंट प्रोजेक्ट में खुद को झोंक दिया। आरव एक छोटी फर्म में मेहनत कर रहा था। रात को दोनों साथ खाना बनाते, कभी रोटी जल जाती, कभी दाल में नमक ज़्यादा हो जाता। वे हंसते भी थे, चुप भी रहते थे। घाव ठीक नहीं हुआ था, पर उस पर रोज़ थोड़ा मरहम लग रहा था।
फिर एक शाम दरवाजे की घंटी बजी।
अदिति ने दरवाजा खोला तो सामने सावित्री खड़ी थीं।
आज उनके चेहरे पर मेकअप नहीं था। बाल बिखरे थे। हाथ में एक सफेद लिफाफा था। वह वही औरत नहीं लग रही थीं जिसने 18 लोगों के सामने थप्पड़ मारा था। वह अचानक बूढ़ी, डरी हुई और बहुत अकेली लग रही थीं।
—मुझे तुमसे बात करनी है, —सावित्री ने कहा।
अदिति ने उन्हें अंदर आने दिया। आरव उस समय ऑफिस में था।
सावित्री ने बैठते ही लिफाफा मेज पर रख दिया।
—हरीश ने बताया कि तुमने पत्र पढ़ लिए।
अदिति का चेहरा सख्त हो गया।
—उन्होंने यह भी बताया होगा कि मैंने किसी से कुछ नहीं कहा।
सावित्री की आंखें भर आईं।
—इसीलिए आई हूं।
उन्होंने लिफाफा खोला। उसमें एक नया पत्र था। विक्रम सेन का। 32 साल बाद वह भारत लौटा था। चंडीगढ़ के एक अस्पताल में उसका इलाज चल रहा था। बीमारी जानलेवा नहीं थी, मगर उम्र और पछतावे ने उसे कमजोर कर दिया था। उसने लिखा था कि मरने से पहले नहीं, जीते-जी अपने बेटे से मिलना चाहता है।
अदिति ने पत्र पढ़कर सावित्री को देखा।
—अब आप क्या चाहती हैं?
सावित्री की आवाज़ टूट गई।
—मैं नहीं जानती। मैं आरव को खोना नहीं चाहती। हरीश को फिर से तोड़ना नहीं चाहती। और विक्रम… उसने भी इंतजार किया।
—सच बताइए, —अदिति ने कहा—। लेकिन इस बार अपने बचाव में नहीं। किसी पर दोष डालकर नहीं। बस सच।
सावित्री ने सिर झुका लिया।
काफी देर बाद उन्होंने कहना शुरू किया। उनका विवाह 23 की उम्र में हरीश से हुआ था। हरीश अच्छे थे, सम्मान देने वाले, मगर घर की परंपराएं, परिवार की उम्मीदें, और “अच्छी बहू” बनने का बोझ सावित्री को भीतर से खाली करता गया। वह पेंटिंग करना चाहती थीं, दिल्ली से बाहर पढ़ना चाहती थीं, अपना नाम बनाना चाहती थीं। फिर एक सेमिनार में विक्रम मिला—जो उनकी बात सुनता था, उनके रंगों की तारीफ करता था, उन्हें सिर्फ बहू या पत्नी नहीं, एक इंसान की तरह देखता था।
—मैं गलत थी, —सावित्री ने कहा—। प्यार के नाम पर भी गलत थी। डर के नाम पर भी। मैंने हरीश को धोखा दिया, विक्रम को अधूरा छोड़ा, और आरव से सच छिपाया। फिर जब तुम इस घर में आईं… तुम वैसी थीं जैसी मैं कभी बनना चाहती थी। अपने काम से प्यार करने वाली, अपनी बात कहने वाली। मैं तुम्हें देखकर जलती थी।
अदिति की आंखों में नमी आ गई, मगर आवाज़ सख्त रही।
—तो आपने मुझे सज़ा दी उस जिंदगी की, जो आप जी नहीं पाईं।
—हां, —सावित्री ने पहली बार बिना बहाना बनाए कहा—। मैंने तुम्हारे साथ बहुत अन्याय किया। वह थप्पड़… वह मेरे हाथ का नहीं, मेरी सारी कड़वाहट का था। लेकिन उससे तुम्हारा अपमान हुआ। मुझे माफ कर दो, अगर कभी कर सको।
अदिति ने तुरंत जवाब नहीं दिया। माफी कोई पूजा की थाली नहीं थी जो सामने रखते ही स्वीकार कर ली जाए। उसमें समय लगता है, भरोसा लगता है, और बार-बार बदलते हुए व्यवहार का सबूत लगता है।
—आज नहीं, —अदिति ने धीरे से कहा—। लेकिन मैं कोशिश कर सकती हूं कि नफरत में न जीऊं।
अगले दिन आरव को पुराने घर बुलाया गया। अदिति 1 घंटे बाद पहुंची। बैठक में आरव सोफे पर बैठा था, आंखें लाल, चेहरा सफेद। सामने हरीश जी और सावित्री बैठे थे। मेज पर पुराने पत्र रखे थे।
आरव ने अदिति को देखते ही पूछा—
—तुम जानती थीं?
अदिति का दिल धक से रह गया।
—कुछ दिन पहले पता चला। लेकिन यह मेरी सच्चाई नहीं थी कहने के लिए।
आरव ने नजरें झुका लीं। वह आहत था, मगर उसकी आंखों में वह गुस्सा नहीं था जिससे रिश्ते खत्म होते हैं। वह उस आदमी की तरह दिख रहा था जिसे अचानक अपना बचपन दोबारा समझना पड़ रहा हो।
—पापा, —उसने हरीश जी की ओर देखा—। आपको कब से पता था?
—शुरू से।
आरव उठ खड़ा हुआ।
—फिर भी आपने मुझे पाला?
हरीश जी भी उठे। उनकी आवाज़ में ऐसा प्रेम था कि कमरे की हवा भारी हो गई।
—फिर भी नहीं, बेटे। इसलिए पाला क्योंकि तुम मेरे बेटे थे। जब तुम बीमार पड़ते थे, तुम्हारा माथा मैंने पकड़ा। जब तुम गिरते थे, मैंने उठाया। जब तुम्हें डर लगता था, तुम मेरे कमरे में आते थे। खून यह नहीं तय करता कि रात 3 बजे कौन तुम्हारे सिरहाने बैठा है।
आरव टूट गया। वह बच्चे की तरह उनके सीने से लगकर रो पड़ा।
—आप ही मेरे पापा हैं। हमेशा।
सावित्री दोनों हाथों से मुंह दबाए रो रही थीं। आरव ने देर से उनकी ओर देखा।
—मां, आपने झूठ बोला। पापा से, मुझसे, खुद से। मुझे समय चाहिए।
सावित्री ने सिर हिलाया।
—मुझे पता है। इस बार मैं तुम्हें मजबूर नहीं करूंगी।
कुछ सप्ताह बाद आरव ने विक्रम सेन से मिलने का निर्णय लिया। वह अकेले चंडीगढ़ गया। रात को लौटा तो बहुत देर तक बालकनी में खड़ा रहा। अदिति उसके पास आई।
—कैसे थे?
आरव ने फोन में एक तस्वीर दिखाई। एक दुबला, सफेद बालों वाला आदमी, आंखें आरव जैसी।
—अजीब था, —आरव ने कहा—। जैसे आईने में कोई अधूरा सवाल खड़ा हो। वह मेरे बारे में सब जानना चाहता था—स्कूल, कॉलेज, मेरी नौकरी, मेरी शादी। उसने कहा, उसने कभी मेरा जन्मदिन नहीं भूला।
—तुमने क्या महसूस किया?
आरव ने लंबी सांस ली।
—कि मैंने पिता नहीं खोया। मेरे पापा हरीश हैं। लेकिन मेरी कहानी में एक पन्ना और जुड़ गया है। बस इतना।
धीरे-धीरे मल्होत्रा परिवार बदलने लगा। सच ने घर को तोड़ा नहीं, उसकी दीवारों में छिपी सीलन बाहर ला दी। सावित्री ने किट्टी पार्टी कम कर दी। एक दिन उन्होंने अपने पुराने रंग और ब्रश निकाले। अदिति ने उनके लिए पुराने स्टोररूम को छोटा-सा स्टूडियो बना दिया। दीवार पर सफेद बोर्ड लगा, खिड़की के पास ईजल रखा, और चंपा के कुछ फूल मेज पर।
सावित्री ने एक दिन रंग मिलाते हुए कहा—
—मैंने सारी उम्र फूलों को पानी दिया, क्योंकि अपने सपनों को देने की हिम्मत नहीं थी।
अदिति ने उनके कैनवास को देखा। उस पर एक औरत थी, आधा चेहरा रोशनी में, आधा परछाई में।
—सपने मरे नहीं हैं, मांजी। बस देर से जागे हैं।
उनका रिश्ता अचानक मीठा नहीं हुआ। अदिति अब भी उस थप्पड़ को भूल नहीं पाई थी। सावित्री अब भी पुराने स्वभाव से लड़ती थीं। कई बार बात अटकती, कई बार चुप्पी खिंच जाती। लेकिन फर्क इतना था कि अब झूठ बीच में नहीं बैठता था।
कुछ महीनों बाद, उसी कोठी में एक छोटी-सी पारिवारिक दावत हुई। इस बार मेहमान कम थे। कोई दिखावा नहीं, कोई जहरीला टोस्ट नहीं। हरीश जी ने अपने हाथ से नींबू पानी बनाया। आरव ने अदिति की पसंद की नीली साड़ी चुनी। सावित्री ने गिलास उठाया।
कमरा फिर शांत हुआ, मगर इस बार डर से नहीं।
—मैं अदिति के नाम पर कहना चाहती हूं, —सावित्री बोलीं—। कभी-कभी एक बहू घर तोड़ने नहीं आती। वह सिर्फ उस दरवाजे को खोल देती है, जिसके पीछे हम सालों से सच बंद करके बैठे होते हैं।
अदिति की आंखें भर आईं। आरव ने मेज के नीचे उसका हाथ थाम लिया। हरीश जी ने चुपचाप मुस्कुराकर आशीर्वाद दिया।
उस रात अदिति जब घर लौटी, तो बालकनी के 3 गमलों में से एक में चंपा का छोटा पौधा लगा था। हरीश जी ने भेजा था। साथ में एक पर्ची थी—
“कुछ पौधे जड़ों से नहीं, देखभाल से घर पाते हैं।”
अदिति ने वह पर्ची बहुत देर तक हाथ में पकड़े रखी।
उसे समझ आ गया था कि सच कभी-कभी थप्पड़ की तरह जलता है, लेकिन झूठ सालों तक आत्मा को खाता रहता है। और न्याय हमेशा बदला लेने में नहीं होता। कभी-कभी न्याय यह होता है कि इंसान उस जैसा बनने से इनकार कर दे, जिसने उसे सबसे ज़्यादा चोट पहुंचाई थी।
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