
PART 1
दुल्हन ने 220 मेहमानों के सामने अपनी सास को भीगी मिट्टी में धक्का दिया और फिर ऐसे हँसी, जैसे किसी ने शादी की रस्म नहीं, कोई मज़ाक पूरा किया हो।
जयपुर के बाहर आमेर रोड पर बने आलीशान हवेली-रिसॉर्ट में रोशनी, फूलों और शहनाई की आवाज़ के बीच अचानक सब कुछ थम गया। गुलाब और गेंदे की झालरों के नीचे बैठे रिश्तेदारों ने अपनी गर्दनें मोड़ लीं। चाँदी की थालियाँ पकड़े खड़े नौकर वहीं जम गए। पंडाल के किनारे लगे फव्वारे के पास पानी की नमी से घास पहले ही फिसलन भरी हो चुकी थी।
वहीं, 62 साल की सावित्री खन्ना अपनी करवट पर गिरी पड़ी थीं।
उनकी हल्की फिरोज़ी रेशमी साड़ी, जिसे उन्होंने 3 बार बदलने के बाद इसलिए चुना था कि कहीं बहू से ज़्यादा चमकदार न लगे, अब मिट्टी से सन चुकी थी। उनके बालों में गीली मिट्टी चिपक गई थी। कलाई की चूड़ियाँ टूटकर घास में बिखर गई थीं। आँखों से आँसू बह रहे थे, मगर आवाज़ नहीं निकल रही थी।
उनसे कुछ कदम दूर, नई-नई दुल्हन बनी रिया माथुर ने अपना लाल दुपट्टा ठीक किया, नथ को हल्का-सा छुआ और अपने पति आरव की तरफ मुड़ गई। आरव ने उसकी कमर थाम ली, जैसे वह किसी परेशानी से उसे बचा रहा हो।
फिर रिया हँस पड़ी।
वह शर्म की हँसी नहीं थी।
वह साफ, तेज़ और बेपरवाह हँसी थी।
विक्रम खन्ना के भीतर उसी पल कुछ टूट गया।
38 साल से सावित्री उनकी पत्नी थीं। उन्होंने पुराने दिल्ली के किराए के कमरे से लेकर जयपुर के बड़े घर तक हर सफर उनके साथ तय किया था। जब विक्रम ने छोटी-सी लकड़ी की दुकान से अपना फर्नीचर कारोबार शुरू किया था, तब सावित्री ने अपने गहने गिरवी रखे थे। जब आरव बीमार पड़ता था, वह रात-रात भर उसकी छाती सहलाती थीं। जब बेटी नंदिनी की शादी टूटी थी, वही माँ बनकर उसके साथ खड़ी रहीं। और आज, उनके ही बेटे की शादी में, किसी ने उन्हें रास्ते की चीज़ समझकर किनारे धकेल दिया था।
नंदिनी सबसे पहले दौड़ी।
—माँ, हिलना मत। मेरा हाथ पकड़ो।
सावित्री ने उसका हाथ पकड़ लिया, मगर उनकी उँगलियाँ काँप रही थीं।
मुख्य मेज़ पर बैठे रिया के पिता, राजीव माथुर, जो दिन भर अपनी खानदानी इज़्ज़त और जयपुर की ऊँची पहचान का बखान कर रहे थे, बस कुर्सी पर पीछे टिके रहे। उन्होंने अपनी पत्नी की तरफ देखा और होंठ सिकोड़कर कहा कि दुल्हन पर बहुत दबाव था।
विक्रम ने न चिल्लाया, न किसी को गाली दी। वह सीधे संगीत वाले के पास गए।
—माइक दो।
संगीत वाला घबरा गया।
—साहब, अभी?
—अभी।
विक्रम पंडाल के बीच खड़े हुए। शहनाई थम गई। फुसफुसाहटें रुक गईं। आरव का चेहरा पीला पड़ गया। रिया की हँसी सूख गई।
विक्रम की आवाज़ बहुत शांत थी।
—आप सबका धन्यवाद कि आप हमारे बेटे की शादी में आए। लेकिन मैं और मेरी पत्नी अब यहाँ नहीं रुकेंगे। हम न भोजन करेंगे, न आशीर्वाद की रस्म में बैठेंगे, न इस उत्सव का हिस्सा बनेंगे।
चारों ओर सन्नाटा फैल गया।
उन्होंने आरव को देखा, फिर रिया को।
—मैं उस घर की खुशी पर पैसा नहीं बहा सकता, जिसकी नींव मेरी पत्नी की बेइज़्ज़ती पर रखी जा रही हो। जिसने मेरी पत्नी को 220 लोगों के सामने मिट्टी में गिराया, और जिसने यह देखकर भी अपनी पत्नी का हाथ नहीं छोड़ा, उसे मेरी तरफ से अब कोई सहारा नहीं मिलेगा।
सावित्री ने सिर झुका लिया। नंदिनी ने उन्हें सँभाला। विक्रम उनके पास पहुँचे, उनका खोया हुआ सैंडल उठाया, फिर उसे वहीं छोड़ दिया।
—चलो, सावित्री।
पीछे से आरव की आवाज़ आई।
—पापा, रुकिए!
विक्रम नहीं रुके।
लेकिन गाड़ी तक पहुँचते-पहुँचते सावित्री ने धीमे से कहा—
—उसने मुझे धक्का दिया था, विक्रम। दोनों हाथों से। उसने कहा, आज मेरा दिन है, आप बीच में मत आइए।
विक्रम ने गाड़ी का दरवाज़ा खोला। मिट्टी सीट पर लग गई, पर उन्होंने परवाह नहीं की।
उन्हें तब तक पता नहीं था कि यह सिर्फ शादी का अपमान नहीं था। असली तूफान सोमवार सुबह उठने वाला था, जब आरव को मालूम होगा कि उसका नया फ्लैट, उसका हनीमून और उसकी चमकदार शादी, सब पिता के पैसों पर टिके थे।
PART 2
रात 2 बजकर 11 मिनट पर विक्रम होटल के कमरे में बैठे थे। सावित्री स्नानघर में रो रही थीं। पानी की आवाज़ उनके रोने को छिपा नहीं पा रही थी।
विक्रम ने अपना फोन खोला और बैंक के प्रबंधक को संदेश भेजा।
सोमवार को आरव और रिया के गुरुग्राम वाले फ्लैट के लिए 1 करोड़ 35 लाख रुपये जाने थे। आरव को लगता था कि वह रकम पिता ने सहज आशीर्वाद की तरह दी है। रिया को लगता था कि खन्ना परिवार को यह सब करना ही चाहिए था, क्योंकि वह इतने बड़े घर की बेटी थी।
विक्रम ने लिखा—
“हस्तांतरण रोक दो।”
फिर उन्होंने विवाह स्थल, फोटोग्राफर, फूल सजाने वाले, बारातियों की गाड़ियों और उदयपुर के हनीमून पैकेज पर रोक लगा दी। जो अनुबंध उनके नाम पर थे, सब बंद हो गए।
सावित्री बाहर आईं। उनकी आँखें लाल थीं।
—क्या कर रहे हो?
—जो पहले कर देना चाहिए था।
—आरव हमसे नफरत करेगा।
विक्रम ने उनकी तरफ देखा।
—मैंने उसे कुछ देर पहले खो दिया था, जब वह तुम्हें मिट्टी में देखकर भी रिया की कमर थामे खड़ा था।
उसी समय नंदिनी का संदेश आया—
“पापा, यहाँ सब कह रहे हैं माँ ने जानबूझकर तमाशा किया। रिया कह रही है कि वह माफी तभी माँगेगी जब माँ मानेंगी कि उन्होंने उसे उकसाया।”
विक्रम ने फोन बंद कर दिया।
लेकिन सुबह तक यह संदेश आरव तक पहुँचा कि पैसे रुक चुके हैं।
और तब बेटा पहली बार पिता को नहीं, अपनी सुविधा को बचाने के लिए रोया।
PART 3
सोमवार सुबह 7 बजकर 38 मिनट पर आरव का फोन आया। विक्रम ने पहली घंटी बजने दी। दूसरी भी। तीसरी बार उन्होंने फोन उठाया।
—पापा, आपने पैसे रोक दिए?
—हाँ।
दूसरी तरफ कुछ पल सन्नाटा रहा। फिर आरव की आवाज़ टूट गई।
—लेकिन पापा, आज अंतिम भुगतान जाना था। बिल्डर कह रहा है कि अगर रकम नहीं पहुँची तो फ्लैट किसी और को दे देगा। हमने किराए का घर खाली करने की सूचना दे दी है।
—तुम्हारी माँ भी 220 लोगों के सामने खाली कर दी गई थी, आरव। अपनी इज़्ज़त से।
—रिया ने जानबूझकर नहीं किया। वह बहुत तनाव में थी। शादी के दिन हर लड़की टूट जाती है।
—हर लड़की अपनी सास को मिट्टी में नहीं धकेलती।
—माँ भी हर जगह थीं। मेहमानों से मिल रही थीं, पंडाल देख रही थीं, रसोई वालों से बात कर रही थीं। रिया को लगा कि सब माँ की तारीफ कर रहे हैं।
विक्रम की आवाज़ और ठंडी हो गई।
—तो तारीफ का जवाब धक्का होता है?
आरव चुप हो गया।
—तुमने क्या किया जब तुम्हारी माँ गिरी?
—मैं… मैं जम गया था।
—नहीं। तुमने चुनाव किया था। तुमने उस आवाज़ को पकड़ा जो ज़्यादा तेज़ थी। तुम्हारी पत्नी गुस्से में थी, तुम्हारी माँ चुप थी। तुमने गुस्से को थामा, दर्द को छोड़ दिया।
आरव ने धीरे से कहा—
—मैं रिया से माफी मँगवा दूँगा।
—मुझे डर से निकली माफी नहीं चाहिए। मुझे सच चाहिए।
फोन कट गया।
दोपहर में रिया ने सावित्री को संदेश भेजा।
“मुझे दुख है कि आपको वह पल इतना बुरा लगा। शादी में सब पर दबाव था। मैं चाहती हूँ कि हम इस छोटी-सी गलतफहमी को परिवार तोड़ने की वजह न बनाएँ।”
सावित्री ने संदेश विक्रम को दिखाया। उन्होंने उसे 2 बार पढ़ा। उसमें कहीं नहीं था कि मैंने धक्का दिया। कहीं नहीं था कि मुझसे गलती हुई। कहीं नहीं था कि मुझे शर्म है।
सिर्फ यह था कि सावित्री ने उसे बुरा महसूस किया।
शाम को रिया ने सीधे विक्रम को फोन किया।
—आप अपने बेटे की जिंदगी बर्बाद कर रहे हैं।
—मैं सुन रहा हूँ।
—मैंने आंटी को संदेश भेजा। मैंने अपना कदम बढ़ाया।
—तुमने कदम नहीं बढ़ाया। तुमने शब्दों में धूल उड़ाई।
—आपको पता भी है शादी के दिन मुझ पर कितना दबाव था? सब लोग आपकी पत्नी की तरफ देख रहे थे। कोई मेरी साड़ी नहीं देख रहा था, कोई मेरे गहने नहीं पूछ रहा था। वह हर जगह थीं।
—वह दूल्हे की माँ थीं, सजावट का सामान नहीं।
रिया की आवाज़ तेज़ हो गई।
—उन्हें समझना चाहिए था कि यह मेरा दिन था।
—और तुम्हें समझना चाहिए था कि किसी बुजुर्ग औरत को धक्का देना इज़्ज़त नहीं, घटियापन है।
रिया कुछ पल चुप रही, फिर बोली—
—आप पछताएँगे।
—तुमने जो किया, उसका हिसाब पैसा नहीं, समय लेगा।
अगले 3 दिन खन्ना परिवार पर भारी थे। राजीव माथुर ने कई रिश्तेदारों को फोन किया। वह कहते रहे कि विक्रम अपने बेटे की शादी से जल गए हैं। उनकी पत्नी किरण ने औरतों के समूह में कहा कि सावित्री ने बहू को चमकने नहीं दिया। कुछ रिश्तेदारों ने सावित्री को समझाया कि बहू के सामने थोड़ा झुक जाना चाहिए, आखिर घर बसाना लड़कियों के लिए आसान नहीं होता।
सावित्री सुनती रहीं, फिर एक दिन उन्होंने फोन काट दिया। वह रसोई की खिड़की के पास 20 मिनट तक खड़ी रहीं। उनके हाथ अपने आप साड़ी के पल्लू को मसलते रहे, जैसे मिट्टी अब भी वहाँ लगी हो।
नंदिनी हर दूसरे दिन आती।
—माँ, आपने कुछ गलत नहीं किया।
सावित्री मुस्कुराने की कोशिश करतीं।
—दिमाग मानता है, बेटी। शरीर अभी भी उस धक्के को याद कर रहा है।
बुधवार को राजीव माथुर ने विक्रम को जयपुर के एक महंगे कैफे में बुलाया। विक्रम गए, क्योंकि उन्हें पता था कि यह बातचीत शांति के लिए नहीं, सौदे के लिए होगी।
राजीव ने बैठते ही कहा—
—देखिए, शादी में ऐसी बातें हो जाती हैं। रिया थोड़ी तेज़ है, पर बुरी नहीं है। आपकी पत्नी भी बहुत बीच में आ रही थीं।
विक्रम ने सीधा पूछा—
—क्या आपने अपनी बेटी को मेरी पत्नी को धक्का देते देखा?
—मैंने बस एक दुर्भाग्यपूर्ण हरकत देखी।
—मैंने अपमान देखा।
राजीव मुस्कुराए।
—आप व्यापारी आदमी हैं। भावनाओं में आकर निर्णय मत लीजिए। बच्चों का फ्लैट चला गया तो दोनों परिवारों की नाक कटेगी।
—नाक तब भी कटी थी, जब आपकी बेटी हँस रही थी।
—आप आरव को सज़ा दे रहे हैं।
—आरव ने अपनी सज़ा उसी रात चुन ली थी, जब उसने अपनी माँ की जगह अपनी पत्नी की नाराज़गी संभाली।
राजीव ने पहली बार मुस्कुराना छोड़ा।
—आप बहुत कठोर हैं।
विक्रम उठ खड़े हुए।
—नहीं। मैं पति हूँ।
उस रात आरव बिना बताए माता-पिता के घर आया। दरवाज़ा खुलते ही वह बूढ़ा-सा लग रहा था। शादी को सिर्फ कुछ दिन हुए थे, मगर आँखों के नीचे गहरे घेरे थे।
—मैं पैसे माँगने नहीं आया, पापा।
—तो अंदर आओ।
सावित्री रसोई में थीं। उन्होंने आरव को देखा, पर तुरंत बाहर नहीं आईं। वह आटे में हाथ लगाए खड़ी रहीं, जैसे फैसला कर रही हों कि माँ पहले बने या जख्मी औरत।
आरव बैठा और बोला—
—रिया राक्षस नहीं है।
विक्रम चुप रहे।
—उसकी परवरिश हमेशा तुलना में हुई। उसकी माँ हर चीज़ में उसे कहती थी कि लोग क्या कहेंगे। शादी उसके लिए जीत जैसी थी। जब सब लोग माँ की सादगी, उनके हाथ के बने मिठाइयों, उनकी मेहमाननवाज़ी की तारीफ कर रहे थे, रिया को लगा कि उसका मंच छिन रहा है।
सावित्री दरवाज़े पर आ खड़ी हुईं।
—और तुमने उसे मान लिया?
आरव ने सिर झुका लिया।
—नहीं, माँ। मैं जानता था यह गलत है। लेकिन मैं शांति चाहता था। मैं हर बार कहता रहा कि शादी के बाद सब ठीक हो जाएगा।
—और जब मैं गिरी?
आरव की आँखें भर आईं।
—मैं डर गया। रिया गुस्से में थी, सब देख रहे थे, मुझे लगा अगर मैं आपकी तरफ दौड़ा तो वह वहीं और तमाशा करेगी। मैंने उस आग को बुझाना चाहा जो सबसे तेज़ जल रही थी।
सावित्री की आवाज़ काँपी।
—मैं आग नहीं थी, बेटा। मैं मिट्टी में पड़ी थी।
आरव उठकर उनके पास गया, मगर सावित्री ने पीछे कदम नहीं लिया। उसने उनके पैरों के पास हाथ जोड़ दिए।
—माँ, माफ कर दो। मैंने उस पल तुम्हारी इज़्ज़त से ज़्यादा अपने विवाह की तस्वीर बचाने की कोशिश की। मैं गलत था।
सावित्री के आँसू पहली बार खुलकर निकले। उन्होंने बेटे के सिर पर हाथ रखा, लेकिन उसे उठाया नहीं।
—मुझे यही सुनना था। बहाने नहीं। सच।
विक्रम को लगा, शायद रास्ता खुल रहा है। लेकिन रिया ने अगले ही दिन सब बंद कर दिया।
उसने सावित्री को फोन किया और कहा—
—मैं आपको माफ करने को तैयार हूँ, अगर आप मान लें कि आपने मुझे शादी में उकसाया था।
सावित्री ने बिना उत्तर दिए फोन रख दिया।
विक्रम ने उसी शाम अपने वकील को बुलाया। उन्होंने आरव के नाम रखी एक और राशि, 75 लाख रुपये, जिसे वह भविष्य में उसके बच्चों की पढ़ाई और घर की सुरक्षा के लिए देना चाहते थे, पारिवारिक संरक्षण में डाल दी। वह पैसा नंदिनी को नहीं दिया गया, न खर्च किया गया। बस इतना किया गया कि रिया या कोई भी बाहरी दबाव उस पर हाथ न डाल सके।
कुछ सप्ताह बाद फ्लैट चला गया। आरव और रिया को रिया के माता-पिता के घर जाना पड़ा। पुरानी किशोरी उम्र वाली रिया की गुलाबी दीवारों वाला कमरा उनका नया घर बन गया। रिया ने इसे अपमान कहा। आरव ने पहली बार धीमे से कहा—
—अपमान माँ ने भी झेला था।
उस रात उनके बीच बहुत बड़ा झगड़ा हुआ।
रिश्तेदार दो हिस्सों में बँट गए। कुछ ने कहा विक्रम ने हद कर दी। कुछ ने कहा उन्होंने वही किया जो हर पति को करना चाहिए था। सावित्री किसी से बहस नहीं करती थीं। वह बस सुबह तुलसी में पानी देतीं, मंदिर में दीया जलातीं और फिर कभी-कभी अपने हाथों की हथेलियाँ रगड़ने लगतीं, जैसे मिट्टी सूखकर अब भी चिपकी हो।
फिर वह वीडियो सामने आया।
रिया की एक सहेली ने कुछ सेकंड का छोटा वीडियो डाला। लिख दिया—
“जब सास बहू की शादी में खुद को दुल्हन समझने लगे।”
48 घंटों में वीडियो लाखों लोगों तक पहुँच गया।
उसमें सब साफ दिख रहा था। रिया सावित्री के पास गई। उसने उँगली उठाकर कुछ कहा। सावित्री ने हाथ जोड़कर जैसे समझाने की कोशिश की। फिर रिया ने दोनों हाथ सावित्री के कंधों पर रखे और उन्हें पूरी ताकत से भीगी घास की तरफ धकेल दिया। सावित्री गिरीं। रिया मुड़ी। आरव पास आया। और रिया हँसी।
अब कोई इसे गलती नहीं कह सकता था।
सावित्री ने वीडियो सिर्फ 1 बार देखा। फिर फोन बंद करके कमरे में चली गईं।
विक्रम देर तक स्क्रीन देखते रहे। टिप्पणियाँ आग की तरह फैल रही थीं।
“बेटा सबसे बड़ा दोषी है।”
“पिता ने सही किया।”
“इस माँ की चुप्पी दिल तोड़ रही है।”
विक्रम के पास वह वीडियो शादी की रात से ही था। एक शांत रिश्तेदार ने भेजा था। उन्होंने उसे किसी को नहीं दिखाया था। मगर उस दिन उन्होंने आरव को वही वीडियो भेजा और बस लिखा—
“बिना सफाई दिए पूरा देखो।”
20 मिनट बाद आरव का फोन आया। लंबे समय तक वह कुछ नहीं बोला।
विक्रम ने पूछा—
—देख लिया?
—हाँ।
—जिसे तुम बचा रहे थे, वह यही सच था।
दूसरी तरफ आरव की साँस टूट गई।
—पापा, मुझे शर्म आ रही है।
—अच्छा है। कुछ शर्में आदमी को वापस इंसान बना देती हैं।
अगस्त तक आरव और रिया की शादी दरकने लगी। रिया कहती रही कि सब विक्रम की वजह से हुआ। आरव पहली बार कहने लगा कि सब उस धक्के से शुरू हुआ था। रिया चाहती थी कि सावित्री सार्वजनिक माफी माँगें। आरव ने मना कर दिया।
सितंबर में सावित्री ने खुद आरव को फोन किया।
—घर आना चाहो तो आ सकते हो। लेकिन अकेले। और शर्त यह नहीं कि मैं भूल जाऊँगी।
आरव रविवार को आया। सावित्री ने दाल, आलू की सूखी सब्ज़ी, फूली रोटियाँ और गाजर का हलवा बनाया। जैसे यह कोई सामान्य रविवार हो। लेकिन घर में वह भारी सन्नाटा था, जिसमें प्रेम और चोट साथ बैठते हैं।
आरव दरवाज़े पर खड़ा रहा। फिर धीरे से माँ के पास आया।
—माँ, उस दिन तुम गिरी थीं, लेकिन मैं भी गिर गया था। फर्क बस इतना था कि मुझे देर से पता चला।
सावित्री ने उसकी तरफ देखा।
—मुझे तेरी पत्नी से ज़्यादा दर्द तुझसे मिला था।
—मुझे पता है।
—क्योंकि वह मेरे लिए नई थी। तू मेरा बेटा था।
आरव रो पड़ा। उसने माँ के पैर छुए। इस बार सावित्री ने उसे उठाकर सीने से लगा लिया।
—मैंने तुझे माफ कर दिया है। लेकिन मेरी बात याद रखना। जब कोई किसी अपने की बेइज़्ज़ती देखता है और चुप रहता है, तो वह सिर्फ दर्शक नहीं रहता। वह उस अपमान का हिस्सा बन जाता है।
आरव ने सिर हिलाया।
कुछ महीनों बाद उसने रिया से अलग रहने का निर्णय लिया। रिया ने पहले खर्चों का हिसाब माँगा, फिर शादी के उपहारों पर दावा किया, फिर यह कहकर धमकाया कि खन्ना परिवार ने उसकी जिंदगी खराब की। लेकिन वीडियो फिर से फैला। लोग अब उसके शब्दों से पहले उसके हाथों को याद करते थे। राजीव माथुर की ऊँची आवाज़ भी धीमी पड़ गई।
अंत में तलाक की प्रक्रिया शुरू हुई।
आरव ने जयपुर में एक छोटा-सा किराए का फ्लैट लिया। 2 कमरों का वह घर बहुत साधारण था। एक गद्दा, 2 कुर्सियाँ, छोटी मेज़, कुछ बर्तन और खिड़की के पास रखी तुलसी। सावित्री उसके लिए चादरें, मसाले, स्टील की 4 थालियाँ और एक प्रेशर कुकर लेकर पहुँचीं।
—माँ, इसकी जरूरत नहीं थी।
—मुझे पता है। इसलिए लाई हूँ।
विक्रम ने दीवार में कील ठोकी और आरव के साथ पुरानी किताबों की शेल्फ लगाई। काम करते हुए आरव ने धीरे से कहा—
—मैंने प्यार और डर में फर्क नहीं किया। मुझे लगता था, रिया को नाराज़ न करना ही प्रेम है।
विक्रम ने हथौड़ा नीचे रखा।
—बहुत लोग यही गलती करते हैं। लेकिन डर से बचाया गया रिश्ता धीरे-धीरे आदमी की रीढ़ खा जाता है।
समय बीतता गया। सावित्री के भीतर का डर पूरी तरह नहीं गया, पर वह हल्का होने लगा। वह फिर से रिश्तेदारों के बीच बैठने लगीं। नंदिनी माँ को बाज़ार ले जाती। विक्रम उनके साथ शाम की चाय पीते और कभी-कभी बिना वजह उनका हाथ पकड़ लेते।
दिसंबर में विक्रम को प्रारंभिक अवस्था का कैंसर पता चला। डॉक्टर ने कहा इलाज संभव है, समय पर पता चल गया है। मगर बीमारी का नाम घर में ठंडी हवा की तरह फैल गया।
आरव बिना बुलाए आया। रात 12 बजे तक पिता के पास बैठा रहा। उन्होंने पैसे की बात नहीं की, शादी की बात नहीं की, रिया की बात नहीं की। उन्होंने पुराने दिनों की बातें कीं—आरव की पहली साइकिल, नंदिनी से उसकी लड़ाई, सावित्री की वह खीर जिसे वह बचपन में छुपाकर खाता था।
अगले दिन विक्रम ने अपनी वसीयत बदली।
—तू उसमें रहेगा, आरव। लेकिन तेरी हिस्सेदारी सुरक्षित ढाँचे में होगी। वह तेरी होगी, किसी दबाव, किसी पत्नी, किसी ससुराल, किसी अहंकार की नहीं।
आरव ने कोई विरोध नहीं किया।
—मैं समझता हूँ, पापा। यह सज़ा नहीं है। यह देर से मिली समझ है।
विक्रम ने पहली बार महसूस किया कि उनका बेटा सचमुच लौट रहा है।
वसंत में नंदिनी ने बताया कि वह माँ बनने वाली है। सावित्री ने रसोई में खड़े-खड़े रोना शुरू कर दिया। उनके हाथ में आटे से सना कटोरा था और आँखों में ऐसी रोशनी, जैसे किसी ने घर के पुराने कोने में दीपक रख दिया हो।
आरव हर गुरुवार घर आने लगा। पहले बातचीत छोटी होती थी। फिर धीरे-धीरे खाने की मेज़ पर हँसी लौट आई। सावित्री कभी पुरानी बात नहीं छेड़तीं, लेकिन घर में किसी ने यह अभिनय भी नहीं किया कि वह रात हुई ही नहीं थी।
क्योंकि वह हुई थी।
220 लोगों के सामने।
एक बहू ने एक माँ को रास्ते की बाधा समझकर धक्का दिया था।
एक बेटा खड़ा रह गया था।
और एक पति ने माइक उठाकर दुनिया को बता दिया था कि वह अपनी पत्नी की इज़्ज़त पर दावत नहीं देगा।
कुछ लोगों ने आज भी कहा कि विक्रम ने बहुत कठोर कदम उठाया। कुछ ने कहा कि उन्होंने वही किया जो समाज में बहुत कम पुरुष करते हैं। विक्रम ने किसी को समझाने की कोशिश नहीं की। उन्हें बस इतना पता था कि दया और धन तब खतरनाक हो जाते हैं, जब वे क्रूरता को आरामदायक बना दें।
सावित्री ने वह फिरोज़ी साड़ी साफ करवा ली थी। मिट्टी का दाग लगभग चला गया, पर किनारे पर एक हल्की धुँधली छाया रह गई। उन्होंने साड़ी कभी दोबारा नहीं पहनी। वह अलमारी में रखी रही, किसी पुराने घाव की तरह, जो भर गया हो मगर मौसम बदलते ही हल्का चुभ जाए।
सितंबर में नंदिनी ने बेटे को जन्म दिया। अस्पताल की काँच वाली खिड़की के पीछे आरव सबसे पहले रोया। सावित्री ने अपने हाथ से बुनी छोटी सफेद चादर सीने से लगा रखी थी। विक्रम इलाज से कमजोर थे, पर खड़े थे। उन्होंने पत्नी के कंधे पर हाथ रखा।
आरव माँ के पास आया।
—माँ, मैं तुम्हारी और बच्चे की तस्वीर ले दूँ?
सावित्री मुस्कुराईं।
—हाँ, लेकिन मैं थोड़ा किनारे खड़ी हो जाती हूँ। कहीं मैं ध्यान न खींच लूँ।
आरव का चेहरा पीला पड़ गया।
फिर वह समझ गया। यह बदला नहीं था। यह वह काँच का टुकड़ा था जो कुछ वाक्यों के बाद परिवारों के भीतर रह जाता है।
उसने सावित्री का हाथ धीरे से थामा।
—माँ, तुम्हारी जगह बीच में है। हमेशा।
सावित्री ने उसे बहुत देर तक देखा। फिर पहली बार उस रात के बाद उनके चेहरे पर वह मुस्कान आई, जिसमें शर्म नहीं थी।
विक्रम चुपचाप उन्हें देख रहे थे। उन्हें मिट्टी वाला पंडाल याद आया, हाथ में पकड़ा माइक याद आया, सावित्री की काँपती उँगलियाँ याद आईं, और रिया की वह हँसी भी, जिसे समय ने आखिरकार उसके अपने घर में गूँजाकर लौटा दिया था।
विक्रम को कोई कड़वी खुशी नहीं हुई।
बस एक गंभीर शांति हुई।
क्योंकि पत्नी की गरिमा बचाने में उन्होंने बेटे को कुछ समय के लिए खो दिया था।
लेकिन उसी गरिमा ने उन्हें बेटा वापस दिया—झूठ के बिना, डर के बिना, और उस चुप्पी के बिना जिसने कभी एक माँ को मिट्टी में अकेला छोड़ दिया था।
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