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बोर्डरूम में उद्योगपति ने महिला निवेशक का हाथ ठुकराकर कहा, “तुम जैसी औरतें यहां नहीं बैठतीं”… लेकिन उसी पल उसने ₹6200 करोड़ वापस लेकर उसकी छिपी हुई तबाही की योजना खोल दी

भाग 1

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—मैडम, मैं उन लोगों से हाथ नहीं मिलाता जो दान देकर बड़े लोगों की मेज पर बैठने का सपना देखते हैं।

राजवीर राठौड़ ने अनाया मेहता का बढ़ा हुआ हाथ हवा में ही छोड़ दिया। दिल्ली के कनॉट प्लेस की 38वीं मंजिल पर बने उस कांच के बोर्डरूम में 14 लोग बैठे थे, लेकिन उस पल सन्नाटा ऐसा था जैसे किसी ने कमरे की सांस रोक दी हो।

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अनाया ने हाथ धीरे से नीचे कर लिया। उसके चेहरे पर न शर्म थी, न गुस्सा, न अपमान का कोई खुला निशान। बस उसकी आंखों में वह ठंडक उतर आई थी जो तूफान से ठीक पहले आसमान में दिखती है।

राजवीर मुस्कुराया। वह 52 साल का, राठौड़ इंफ्राटेक का मालिक, अपने पिता की विरासत पर बैठा हुआ वह आदमी था जिसे बचपन से सिखाया गया था कि पैसा और खानदान मिलकर इंसान को कानून से भी ऊंचा बना देते हैं।

—यहां उद्योगपति बैठे हैं, भावुक समाजसेवी नहीं, उसने फिर कहा। —आपने कुछ स्कूल बनवा दिए, कुछ अस्पतालों को चंदा दे दिया, तो क्या समझ लिया कि आप हम जैसी कंपनियों में बराबरी से बात करेंगी?

बोर्ड के कुछ पुरुषों ने नजरें झुका लीं। 1 आदमी ने पानी के गिलास के पीछे अपनी मुस्कान छिपाई। सिर्फ 1 महिला चुपचाप अनाया को देख रही थी—नंदिता सेन, 64 साल की स्वतंत्र निदेशक, जिनकी आंखों में हैरानी से ज्यादा पहचान थी।

अनाया के साथ आया उसका सलाहकार करण माथुर कुर्सी से आधा उठ गया, पर अनाया ने सिर्फ उंगली के हल्के इशारे से उसे रोक दिया।

वह बैठ गई। वही कुर्सी जो उसे जानबूझकर मेज के किनारे दी गई थी, जबकि समझौते के कागजों में उसे मुख्य निवेशक के रूप में सबसे आगे बैठाया जाना था। उसके सामने फाइल रखी थी। उसी फाइल में ₹6200 करोड़ के निवेश की अंतिम स्वीकृति थी, जिसके बिना राजवीर का “नवभारत नगर पुनर्विकास” प्रोजेक्ट अधूरा, कमजोर और लगभग बेकार था।

राजवीर ने प्रस्तुति शुरू की। चमकदार स्लाइडें, ऊंचे टावरों की तस्वीरें, हरियाली से भरी सड़कों के नक्शे, और हर 5 मिनट में “जनहित”, “गरीबों का उत्थान” और “नया भारत” जैसे शब्द। अनाया सुनती रही। उसने पूछा कि मौजूदा किरायेदारों का क्या होगा। राजवीर ने जवाब करण की ओर देखकर दिया। उसने पूछा कि जिन बस्तियों को हटाया जाएगा, उनका लिखित पुनर्वास समझौता कहां है। राजवीर ने स्लाइड बदल दी। उसने पूछा कि नगर निगम के 3 अधिकारियों के साथ निजी रात्रिभोज क्यों दर्ज हैं। कमरे में फिर वही दबा हुआ असहज शोर फैल गया।

40 मिनट बाद तालियां बजीं। राजवीर ने मान लिया कि पैसा उसके हाथ में आ चुका है।

अनाया ने फाइल खोली। अंदर से 1 कागज निकाला। उसे मेज पर सरकाया।

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—मेहता कैपिटल इस प्रोजेक्ट से अपना ₹6200 करोड़ का निवेश तुरंत वापस ले रहा है, उसने शांत स्वर में कहा।

राजवीर की मुस्कान चेहरे से गिर गई।

—आप मजाक कर रही हैं?

—नहीं, अनाया ने कहा। —आपने अभी-अभी उस हाथ को ठुकराया है जो आपकी कंपनी को डूबने से बचाने आया था।

तभी करण का फोन बजा। स्क्रीन पर नाम चमका—सावित्री राठौड़।

राजवीर की मां।

और संदेश में सिर्फ 1 पंक्ति थी।

“अगर अनाया सच जानना चाहती है, तो उसे अभी मुझसे बात करनी होगी।”

भाग 2

होटल के शांत कोने में अनाया ने सावित्री राठौड़ को फोन किया। दूसरी तरफ आवाज उम्र से भारी थी, मगर डर से खाली। सावित्री ने बताया कि “नवभारत नगर” असल में विकास नहीं, उजाड़ने की योजना थी। दिल्ली के यमुना किनारे बसे 9000 परिवारों, 2 मंदिरों, 1 मदरसे, 1 पुरानी गुरुद्वारा रसोई, छोटे कारखानों और दुकानों को रातोंरात हटाने की तैयारी थी। राजवीर ने निगम अधिकारियों को नकली परामर्श कंपनियों के जरिए पैसे पहुंचाए थे। अनाया का निवेश आखिरी मुहर था, जिसके बाद कोई अदालत भी समय पर उन लोगों को बचा नहीं पाती। सावित्री ने यह भी कहा कि राजवीर उसके खिलाफ झूठी खबर फैलाएगा कि मेहता कैपिटल की शुरुआत काले धन से हुई थी। अनाया ने उसी रात अपनी जांच प्रमुख उर्मिला अय्यर को बुलाया। करण ने नक्शे खोले। नकली कंपनियों के पते निकले—बंद कमरे, खाली दफ्तर, किराए के बोर्ड। अगले दिन अनाया मौलाना नदीम और पंडित शंकरलाल से मिली, जो उस इलाके के लोगों को वर्षों से संभालते आए थे। उन्हें नक्शे दिखाते ही पंडित शंकरलाल कांप गए—लाल निशान उनके मंदिर के आंगन पर था, जहां हर साल गरीब बच्चियों की शादी करवाई जाती थी। उसी शाम राजवीर ने अनाया पर झूठा वित्तीय हमला छपवा दिया। निवेशक घबरा गए। अदालत में उसकी संपत्ति रोकने की अर्जी लगी। फिर आधी रात को उर्मिला को गुप्त संदेश मिला—राठौड़ इंफ्राटेक के कानूनी विभाग का 1 कर्मचारी राजवीर की रिकॉर्ड की हुई बातचीत भेजना चाहता था। लेकिन जब सबूत पहुंचने ही वाला था, खबर लीक हो गई। गवाह डर गया। जांच रुक गई। उसी रात राजवीर ने घोषणा की कि उसे दुबई के 1 गुप्त फंड से ₹6600 करोड़ मिल गए हैं। अनाया खिड़की के पास खड़ी रह गई। तभी सावित्री का दूसरा संदेश आया—“मेरे पास 4 साल की बोर्ड बैठकों की असली रिकॉर्डिंग हैं।”

भाग 3

सुबह 4 बजे दिल्ली अभी पूरी तरह जागी नहीं थी, लेकिन अनाया मेहता के होटल कमरे में नींद का नाम नहीं था। बाहर इंडिया गेट की ओर जाती सड़कें धुंध में लिपटी थीं, और कमरे के अंदर मेज पर फैले कागजों में 9000 परिवारों की पूरी जिंदगी अटकी हुई थी।

अनाया ने सावित्री राठौड़ को फिर फोन किया।

—आपके पास जो रिकॉर्डिंग हैं, क्या वे कानूनी रूप से इस्तेमाल हो सकती हैं? उसने पूछा।

सावित्री कुछ पल चुप रहीं। फिर बोलीं—

—मेरे पति वीरेंद्र राठौड़ ने कंपनी की स्थापना 1989 में की थी। उनके मूल चार्टर में लिखा है कि हर निदेशक मंडल बैठक का लेखा और ध्वनि रिकॉर्ड सुरक्षित रहेगा। राजवीर ने वह चार्टर कभी पढ़ा ही नहीं। उसे लगा विरासत सिर्फ कुर्सी होती है, जिम्मेदारी नहीं।

अनाया ने आंखें बंद कर लीं। यह वही गलती थी जो घमंडी लोग हमेशा करते हैं। वे दस्तावेजों को सजावट समझते हैं, जब तक वही दस्तावेज उनके खिलाफ गवाही न दे दें।

सावित्री की आवाज इस बार मां की थी, मगर बेटे को बचाने वाली मां की नहीं। उस मां की, जिसने अपने ही बेटे के भीतर पनपी क्रूरता को पहचान लिया था।

—मैंने 4 साल पहले रिकॉर्डिंग सक्रिय करवाई थी, उन्होंने कहा। —मुझे डर था कि राजवीर कंपनी को सिर्फ लालच की मशीन बना देगा। 29 बैठकों में “नवभारत नगर” पर बात हुई है। 6 बैठकों में सीधे कहा गया है कि लोगों को पहले आश्वासन दो, फिर नोटिस भेजो। 1 बैठक में उसने कहा था—“त्योहारों के समय नोटिस भेजो, लोग वकील खोजने में देर करेंगे।” और 1 निदेशक ने हंसकर कहा था—“झुग्गी वालों को वाउचर दे देना, वे चुप हो जाएंगे।”

अनाया की उंगलियां फोन पर कस गईं।

—आपने पहले क्यों नहीं रोका?

सावित्री की सांस भारी हुई।

—क्योंकि मेरे घर में मेरा बेटा ही मेरा सबसे बड़ा विरोधी बन चुका था। बोर्ड में मेरे नाम का सम्मान था, पर नियंत्रण उसके हाथ में था। मैंने कई बार कोशिश की। उसने मुझे “पुरानी सोच वाली भावुक औरत” कहा। मेरे कमरे के स्टाफ तक बदल दिए। मेरे ड्राइवर से मेरी मुलाकातों की खबर लेने लगा। मैं मां थी, पर उस घर में मैं भी कैदी बन गई थी।

अनाया ने पहली बार उस आवाज में छिपा अकेलापन महसूस किया।

—फिर आपने मुझे क्यों चुना?

—क्योंकि तुमने अपमान के बाद चुपचाप घर नहीं लौटना चुना, सावित्री ने कहा। —तुम 9000 अनजान लोगों के लिए रुक गईं। मैंने बहुत निवेशक देखे हैं, अनाया। ज्यादातर लोग राजवीर का हाथ न मिलाने वाला अपमान भूलकर भी सौदा कर लेते, क्योंकि फायदा बड़ा था। तुमने पैसा खोया, पर सिर नहीं झुकाया।

कमरे में खामोशी उतर गई।

सुबह 8 बजे तक योजना तैयार थी। सावित्री की वकील, अधिवक्ता मीरा देशपांडे, सीधे आर्थिक अपराध शाखा और दिल्ली उच्च न्यायालय में सीलबंद डिजिटल अभिलेख जमा करेंगी। उर्मिला अय्यर नकली कंपनियों, निगम अधिकारियों को गई रकम और दुबई फंड की संदिग्ध कड़ियों का पूरा दस्तावेज देगी। पत्रकार रागिनी भल्ला को जांच रिपोर्ट मिलेगी, मगर खबर तब तक नहीं छपेगी जब तक अदालत प्राथमिक सुनवाई स्वीकार न कर ले। नंदिता सेन को बोर्ड के भीतर आपात बैठक बुलानी होगी। और सबसे कठिन काम अनाया खुद करेगी।

उसे उन लोगों के सामने जाना था जिन्हें अब तक विकास के नाम पर धोखा दिया गया था।

96 घंटे बाद यमुना किनारे की बस्ती के बीच बने सामुदायिक मैदान में भीड़ इकट्ठी होने लगी। कोई भव्य मंच नहीं था, बस लोहे की कुर्सियां, 2 माइक, सफेद चादर से ढकी लंबी मेज और पीछे पुरानी दीवार पर लगे बच्चों के रंगीन चित्र। शाम की आरती की घंटी दूर मंदिर से सुनाई दे रही थी। उसी समय मदरसे की तरफ से बच्चों की धीमी आवाजें भी हवा में घुल रही थीं।

करीब 700 लोग आए। बुजुर्ग औरतें शॉल ओढ़े बैठीं। रिक्शा चलाने वाले पुरुष अपने हाथों की दरारें छिपाए बिना खड़े रहे। दर्जी, चायवाले, कुम्हार, कबाड़ी, मजदूर, ट्यूशन पढ़ाने वाली लड़कियां, छोटे बच्चे—सब। वे “नवभारत नगर” का नाम सुनते आए थे, पर आज पहली बार उन्हें उसके भीतर छिपा सच दिखने वाला था।

अनाया मंच पर नहीं चढ़ी। वह लोगों के बीच खड़ी रही।

—9 दिन पहले मैं ₹6200 करोड़ लेकर राजवीर राठौड़ की कंपनी में निवेश करने गई थी, उसने कहा। —मुझे लगा था यह प्रोजेक्ट पुराने इलाकों को बेहतर बनाएगा। फिर मुझे पता चला कि बेहतर बनाने के नाम पर आपको हटाने की तैयारी थी।

भीड़ में बेचैनी फैल गई।

करण ने स्क्रीन पर नक्शा दिखाया। लाल रेखाएं बस्ती की गलियों पर पसर गईं। किसी ने अपनी दुकान का नाम पहचान लिया। किसी ने अपना घर। 1 बूढ़ी महिला ने चिल्लाकर कहा—

—यह तो हमारा आंगन है!

फिर एक छोटा सा ऑडियो चलाया गया। राजवीर की आवाज आई—शांत, आत्मविश्वासी, निर्मम।

“नोटिस त्योहार के बीच भेजो। संगठित होने से पहले समय खत्म हो जाएगा।”

इसके बाद दूसरी आवाज—

“अगर विरोध हुआ?”

राजवीर हंसा।

“वाउचर दे दो। उन्हें और क्या चाहिए?”

ऑडियो बंद होते ही मैदान में ऐसा सन्नाटा छा गया कि सड़क पर गुजरती बस की आवाज भी साफ सुनाई दी। फिर शोर उठा—गुस्सा, रोना, सवाल, अविश्वास। एक आदमी अपनी बेटी को छाती से लगाए खड़ा था। एक महिला मिट्टी उठाकर माथे से लगा रही थी, जैसे वह किसी कब्र से नहीं, अपने जिंदा घर से विदा ले रही हो।

मौलाना नदीम ने माइक पकड़ा।

—गुस्सा करो, मगर टूटो मत, उन्होंने कहा। —आज पहली बार झूठ हमारी आंखों के सामने खुला है। अब हमें संगठित होना है।

पंडित शंकरलाल आगे आए। उनका गला भरा हुआ था।

—यह मंदिर सिर्फ ईंट नहीं है, उन्होंने कहा। —यहां 37 गरीब लड़कियों की शादी हुई। यहां महामारी के समय खाना बंटा। अगर यह जगह मिटेगी, तो सिर्फ इमारत नहीं जाएगी, हमारी याद मिटेगी।

अनाया ने फिर माइक लिया।

—मैं यहां दया दिखाने नहीं आई हूं, उसने कहा। —मैं निवेशक हूं। और मैं कह रही हूं कि यह जमीन आपसे छीनकर नहीं, आपके साथ मिलकर बदलेगी। मेहता कैपिटल ₹500 करोड़ का सामुदायिक संरक्षण कोष बनाएगा। कोई भी योजना तब तक नहीं बनेगी जब तक आपकी समिति उसमें शामिल न हो। दुकानें बचेंगी। किरायेदारों के अधिकार लिखित होंगे। स्कूल और रसोई वहीं रहेंगे। और जो नया बनेगा, उसमें पहले हक आपका होगा।

भीड़ में पहली बार गुस्से के बीच आशा की हल्की लहर उठी।

उसी रात 10:15 बजे रागिनी भल्ला की जांच रिपोर्ट प्रकाशित हुई। शीर्षक ने पूरे देश को झकझोर दिया। सुबह तक 18 बड़े समाचार मंचों ने उसे उठा लिया। रिपोर्ट में नकली कंपनियों के बैंक रास्ते थे, निगम अधिकारियों से जुड़ी तारीखें थीं, बोर्ड बैठकों के प्रमाणित अंश थे, और दुबई फंड का वह संदिग्ध रिकॉर्ड था जो पहले 2 बार सरकारी जांच में आकर दब गया था।

सबसे ज्यादा पढ़ा गया हिस्सा तकनीकी नहीं था। वह 73 साल की जमुना देवी की कहानी थी, जो उस बस्ती में 51 साल से रह रही थीं। उनके पति ने वहीं चाय की दुकान शुरू की थी। उनके बेटे की मृत्यु के बाद उसी दुकान ने 2 पोतियों की पढ़ाई करवाई थी। रिपोर्ट में उनका 1 वाक्य था—

“अगर घर छोटा है तो क्या हुआ, यहां मेरी जिंदगी पूरी है।”

उस वाक्य ने लोगों का दिल तोड़ दिया।

सुबह 7 बजे दुबई फंड ने राठौड़ इंफ्राटेक को दी गई ₹6600 करोड़ की सहमति वापस ले ली। कोई सार्वजनिक सफाई नहीं दी गई। बस कानूनी पत्र भेजा गया और पैसा गायब हो गया।

सुबह 8 बजे आर्थिक अपराध शाखा ने 3 निगम अधिकारियों को नोटिस भेजे। 1 अधिकारी ने तत्काल छुट्टी ले ली। दूसरे ने वकील कर लिया। तीसरे ने पूछताछ में सहयोग का संदेश भेज दिया।

सुबह 9 बजे नंदिता सेन ने राठौड़ इंफ्राटेक की आपात बोर्ड बैठक शुरू की। राजवीर देर से पहुंचा। जिस कुर्सी पर वह हमेशा बैठता था, वहां नंदिता बैठी थीं। उसके लिए मेज के किनारे कुर्सी रखी गई थी।

वह वही जगह थी जहां उसने अनाया को बैठाया था।

—यह क्या नाटक है? राजवीर ने गुस्से में पूछा।

नंदिता ने चश्मा उतारा।

—नाटक वह था जो तुम “विकास” कहकर बेच रहे थे।

राजवीर ने मां की ओर देखा। सावित्री भी कमरे में थीं। सफेद साड़ी, सीधा चेहरा, आंखों में थकान और एक अजीब शांति।

—मां, आपने यह किया? उसने लगभग फुसफुसाकर पूछा।

सावित्री ने उसे देखा। उस नजर में दुख था, मगर कोई पछतावा नहीं।

—नहीं, राजवीर। यह तुमने किया। मैंने सिर्फ सच को बाहर आने दिया।

राजवीर का चेहरा लाल पड़ गया।

—मैं आपका बेटा हूं।

—इसीलिए 4 साल इंतजार किया, सावित्री ने कहा। —पर जब बेटे का लालच हजारों परिवारों की रोटी, घर और इतिहास कुचलने लगे, तो मां की चुप्पी भी पाप बन जाती है।

कमरे में कोई नहीं बोला।

मीरा देशपांडे वीडियो पर जुड़ीं। उन्होंने बोर्ड को बताया कि रिकॉर्डिंग कंपनी चार्टर के तहत वैध हैं। अदालत ने प्राथमिक संरक्षण आदेश जारी कर दिया था। “नवभारत नगर” पर रोक लग चुकी थी। जांच शुरू हो चुकी थी। राजवीर की निजी स्वीकृतियां, नकली कंपनियों से जुड़ी मंजूरियां और गुप्त फंड की बातचीत अब सरकारी रिकॉर्ड का हिस्सा थीं।

मतदान हुआ। परिणाम लंबा नहीं था।

राजवीर राठौड़ को मुख्य पद से तत्काल हटाया गया। जांच पूरी होने तक उसका कार्यालय, डिजिटल पहुंच और वित्तीय हस्ताक्षर अधिकार निलंबित कर दिए गए।

सुरक्षा अधिकारी अंदर आए।

यह वही सुरक्षा दल था जो सालों से उसे “सर” कहकर सलाम करता था। आज वे उसे बोर्डरूम से बाहर ले जा रहे थे। राजवीर ने जाते-जाते सावित्री की तरफ देखा। शायद वह आखिरी बार मां से बचाव चाहता था। पर सावित्री ने सिर्फ आंखें बंद कर लीं।

उस दिन शाम को अनाया फिर यमुना किनारे गई। वहां कोई कैमरा नहीं था। कोई भाषण नहीं था। सिर्फ जमुना देवी अपने घर के बाहर बैठी थीं, हाथ में पीतल का पुराना गिलास, पास में चूल्हे पर चाय चढ़ी थी।

—बेटी, अंदर आओ, उन्होंने कहा।

अनाया चटाई पर बैठ गई। छोटा कमरा था। दीवार पर पुरानी शादी की तस्वीर, लकड़ी की अलमारी, 1 कोने में देवी की छोटी तस्वीर, दूसरे कोने में स्कूल बैग। गरीबी थी, पर बिखराव नहीं। हर चीज अपनी जगह पर थी, जैसे घर अपने मालिकों का सम्मान करता हो।

जमुना देवी ने चाय दी।

—आपके कारण घर बच गया, उन्होंने कहा।

अनाया ने सिर हिलाया।

—घर आपने बचाया। मैंने सिर्फ वह कागज बाहर निकाला जिसे आपसे छिपाया गया था।

बुजुर्ग औरत मुस्कुराईं।

—बड़े लोग जब हमारी गलियों में आते हैं, तो हमें गिनती समझते हैं। पहली बार कोई हमारे दरवाजे पर बैठा है।

अनाया के पास जवाब नहीं था।

6 हफ्ते बाद उसी मैदान में नई समिति की पहली बैठक हुई। इस बार नक्शे लाल निशानों वाले नहीं थे। उनमें स्कूल की मरम्मत थी, बारिश के पानी की निकासी थी, दुकानों के वैध पंजीकरण थे, किरायेदारों की सुरक्षा थी, और स्थानीय मजदूरों को काम देने की शर्तें थीं। मेहता कैपिटल का पैसा आया, पर इस बार पैसा ऊपर से नीचे नहीं गिराया गया। लोग मेज के दोनों तरफ नहीं, एक ही गोल घेरे में बैठे।

सावित्री भी आईं। धीरे-धीरे चलती हुईं, बिना किसी शोर के। जमुना देवी ने उन्हें देखा और पास बुलाया।

दोनों बूढ़ी औरतें कुछ देर चुप रहीं। एक ने बेटा खोया था, दूसरी ने लगभग घर खो दिया था। फिर जमुना देवी ने सावित्री का हाथ पकड़ लिया।

—मां होना आसान नहीं होता, उन्होंने कहा।

सावित्री की आंखें भर आईं।

—कभी-कभी सबसे कठिन फैसला अपने ही खून के खिलाफ खड़ा होना होता है।

अनाया थोड़ी दूर खड़ी यह दृश्य देख रही थी। करण उसके पास आया।

—आपने ₹6200 करोड़ खो दिए थे, उसने धीमे से कहा। —फिर ₹500 करोड़ और लगा दिए। व्यापार की किताब में इसे क्या कहेंगे?

अनाया ने मैदान की तरफ देखा। बच्चे दौड़ रहे थे। पंडित शंकरलाल और मौलाना नदीम साथ बैठे चाय पी रहे थे। जमुना देवी की पोती नई समिति की सूची लिख रही थी। सावित्री चुपचाप धूप में बैठी थीं, जैसे वर्षों बाद किसी बोझ से हल्की हुई हों।

—लंबी अवधि का निवेश, अनाया ने कहा।

करण हंस पड़ा, मगर उसकी आंखें भीगी थीं।

उसी समय 1 पत्रकार ने अनाया से पूछा—

—राजवीर राठौड़ ने उस दिन आपका हाथ ठुकराया था। आज अगर वह सामने आए तो आप क्या कहेंगी?

अनाया ने कुछ पल सोचा। फिर उसने हाथों को देखा। वही हाथ जिसने उस दिन अपमान सहा था। वही हाथ जिसने दस्तावेज पकड़े, नक्शे खोले, फोन किए, और आज जमुना देवी की चाय का गिलास थामा था।

—मैं कुछ नहीं कहूंगी, उसने शांत स्वर में कहा। —क्योंकि कुछ लोग हाथ मिलाकर भी भरोसे लायक नहीं होते, और कुछ लोग हाथ ठुकराए जाने के बाद भी हजारों लोगों का साथ नहीं छोड़ते।

फिर वह कैमरे से हट गई।

शाम की हवा में यमुना की नमी थी, मंदिर की घंटी थी, अजान की धीमी आवाज थी, और बच्चों की हंसी थी। वह बस्ती अब भी गरीब थी, अधूरी थी, संघर्षों से भरी थी। लेकिन वह मिटाई नहीं गई थी।

और अनाया मेहता उस संकरी गली से गुजर रही थी जहां पहली बार लोग उसे निवेशक नहीं, अपनी ओर खड़ी हुई इंसान की तरह देख रहे थे।

पीछे जमुना देवी ने अपनी पोती से कहा—

—देख, बड़ी इमारतें पैसे से बनती हैं। पर असली घर इंसाफ से बचते हैं।

लड़की ने यह वाक्य अपनी कॉपी में लिख लिया।

शायद 1 दिन वह इसे कहानी बनाएगी।

Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.