Posted in

जिस महिला कमांडो को सबने मरा हुआ मान लिया था, वही खून से लथपथ लौटकर चिल्लाई—“असली दुश्मन हमारे बीच है!” और फिर एक ही गोली ने ऐसा राज़ खोला कि पूरी टीम सन्न रह गई।

भाग 1

Advertisements

घाटी के अंधेरे में जब पहला धमाका हुआ, तो बुलेटप्रूफ गाड़ी हवा में उछली और पूरी टीम को लगा कि आज कोई भी जिंदा वापस नहीं लौटेगा।

लद्दाख की तांगी घाटी उस रात बर्फ जैसी शांत थी, लेकिन उस शांति के पीछे मौत छिपी बैठी थी। भारतीय विशेष अभियान दल की 3 बख्तरबंद गाड़ियां बिना हेडलाइट के आगे बढ़ रही थीं। मिशन बेहद गोपनीय था। उन्हें खुफिया अधिकारी अरविंद मेहता को सुरक्षित निकालना था, जिसके हाथ में एक काला केस था। उस केस में ऐसी जानकारी थी, जो देश की सुरक्षा से जुड़ी 82 फाइलों को खोल सकती थी।

Advertisements

टीम लीडर मेजर विक्रम राठौड़ आगे बैठे थे। उनके चेहरे पर थकान थी, लेकिन आंखों में डर नहीं था। पीछे की सीट पर चीफ ऑपरेटर समायरा सिंह चुपचाप अपनी मशीन गन जांच रही थी। वह टीम की सबसे शांत, सबसे रहस्यमयी और सबसे खतरनाक सदस्य मानी जाती थी। कई लोग अब भी मानने को तैयार नहीं थे कि एक महिला इतनी कठोर ट्रेनिंग पार करके ऐसी यूनिट में जगह बना सकती है। लेकिन समायरा ने हर शक को अपने काम से जवाब दिया था।

अचानक पहाड़ी के बाईं तरफ तेज चमक हुई। दूसरी गाड़ी जोरदार धमाके के साथ पलट गई। रेडियो पर चीखें गूंज उठीं।

“हम घिर चुके हैं… बाहर निकलने का रास्ता नहीं!”

ऊपर पहाड़ियों से गोलियां बरसने लगीं। दुश्मन आम आतंकी नहीं लग रहे थे। उनकी चाल संगठित थी, हथियार महंगे थे, और हमला बिल्कुल योजना बनाकर किया गया था।

विक्रम ने आदेश दिया, “सब नीचे उतरो! अरविंद और केस को बचाओ!”

समायरा ने बिना एक पल गंवाए अरविंद को गाड़ी से खींचा और टूटे इंजन के पीछे धकेल दिया। अरविंद कांप रहा था। उसके हाथ केस पर ऐसे जकड़े थे, जैसे वही उसकी सांस हो।

“केस सुरक्षित है?” समायरा ने पूछा।

अरविंद ने हां में सिर हिलाया।

विक्रम ने रेडियो पर संपर्क करने की कोशिश की, लेकिन सिर्फ शोर सुनाई दिया। “सिग्नल जाम है। यह हमला अंदर की जानकारी के बिना नहीं हो सकता।”

Advertisements

समायरा ने पहाड़ी की धार देखी। वहां दुश्मन की भारी बंदूकें पूरी घाटी को दबाए हुए थीं।

“मैं ऊपर जा रही हूं,” उसने शांत आवाज में कहा।

विक्रम ने उसे घूरा। “यह मौत है, समायरा।”

समायरा ने जवाब दिया, “यहां रुके तो 10 मिनट में सब खत्म हो जाएगा।”

विक्रम कुछ पल चुप रहा। फिर बोला, “तुम्हारे पास 2 मिनट हैं।”

समायरा अंधेरे में गायब हो गई। नीचे गोलियां चल रही थीं, ऊपर मौत इंतजार कर रही थी। तभी उसने पहाड़ी पर कुछ देखा, जिसने उसकी रगों में खून जमा दिया।

दुश्मनों के कंधों पर भारतीय मित्र-बलों जैसे पहचान चिन्ह चमक रहे थे।

यह हमला बाहर से नहीं, भीतर से बेचा गया था।

भाग 2

समायरा चट्टानों के बीच पेट के बल सरकती रही। नीचे उसकी टीम दुश्मन की गोलीबारी में फंसी थी, और ऊपर वे लोग बैठे थे जिन्हें रास्ता सुरक्षित बताने की जिम्मेदारी दी गई थी।

मुख्य मशीन गन पोस्ट से 3 लोग लगातार विक्रम की टीम पर फायर कर रहे थे। उनमें से एक अंग्रेजी में आदेश दे रहा था, “केस चाहिए, आदमी नहीं।”

समायरा के कानों में यह वाक्य हथौड़े की तरह लगा। यह कोई सामान्य हमला नहीं था। यह देशद्रोह था।

नीचे अरविंद ने डरते हुए विक्रम से कहा, “कैप्टन राघव मल्होत्रा ने कहा था यही रास्ता सुरक्षित है… उसने चेतावनी भी दी थी कि सिस्टम में गद्दार हैं।”

विक्रम का चेहरा सख्त हो गया। राघव मल्होत्रा एक निजी सुरक्षा कंपनी का भारतीय संपर्क अधिकारी था। वही इस मिशन का मार्ग तय कर रहा था।

विक्रम ने रेडियो दबाया, “समायरा, राघव ही गद्दार है। सभी निजी सुरक्षा कर्मियों को दुश्मन मानो।”

ऊपर समायरा की आंखें ठंडी हो गईं। उसने बिना शोर किए मशीन गन पोस्ट पर हमला किया। कुछ ही सेकंड में दुश्मन की सबसे मजबूत फायर लाइन टूट गई। घाटी में अचानक अफरातफरी मच गई।

नीचे विक्रम ने मौका देखा। “अब आगे बढ़ो!”

टीम घायल गाड़ी को ढाल बनाकर धीरे-धीरे बाहर निकलने लगी। अरविंद केस को सीने से लगाए भाग रहा था। उसके चेहरे पर डर के साथ अपराधबोध भी था, जैसे उसे पहले से कुछ शक था पर उसने किसी को समय पर नहीं बताया।

तभी आसमान से भिनभिनाहट आई।

समायरा ने ऊपर देखा। एक छोटा हमलावर ड्रोन सीधे उसकी तरफ उतर रहा था।

राघव अपने ही लोगों को उड़ाने को तैयार था, सिर्फ सबूत मिटाने के लिए।

“विक्रम, ऊपर ड्रोन आ रहा है,” समायरा ने कहा।

विक्रम चीखा, “समायरा, वहां से निकलो!”

समायरा पास की संकरी दरार में कूदी। अगले ही पल पहाड़ी का हिस्सा आग और धूल में डूब गया।

रेडियो पर सन्नाटा छा गया।

विक्रम ने पुकारा, “समायरा… जवाब दो!”

कोई आवाज नहीं आई।

टीम आगे बढ़ गई, लेकिन हर कदम पर विक्रम की आंखें धुएं से भरी चट्टान पर अटकी रहीं।

जब वे 1 किलोमीटर आगे निकले, तो सूखी नदी के मोड़ पर 2 काली एसयूवी उनका रास्ता रोककर खड़ी थीं।

उनके सामने कैप्टन राघव मल्होत्रा मुस्कुरा रहा था।

भाग 3

राघव मल्होत्रा ने हाथ में राइफल पकड़ी हुई थी और उसके पीछे 4 हथियारबंद आदमी खड़े थे। उसके चेहरे पर ऐसा आत्मविश्वास था, जैसे उसने पहले ही तय कर लिया हो कि कौन जिंदा रहेगा और कौन नहीं।

रेडियो पर उसकी आवाज आई, “मेजर विक्रम, बहुत लड़ लिए। केस मुझे दे दो। तुम्हारे बचे हुए लोग घर जा सकते हैं।”

विक्रम ने चट्टान के पीछे से जवाब दिया, “गद्दार की बात पर भरोसा सिर्फ मूर्ख करता है।”

राघव हंसा। “देशभक्ति की बातें फिल्मों में अच्छी लगती हैं। उस केस में जो डाटा है, उसकी कीमत अरबों में है। तुम लोग वर्दी के लिए मरोगे, मैं उसी वर्दी से साम्राज्य खरीदूंगा।”

अरविंद मेहता का चेहरा पीला पड़ गया। वह समझ चुका था कि जिसे सहयोगी समझा गया, वही सबसे बड़ा खतरा था। उसने केस विक्रम की ओर बढ़ाते हुए कहा, “मेजर, अगर जरूरत पड़े तो इसे नष्ट कर देना… लेकिन इसे उसके हाथ मत लगने देना।”

विक्रम ने अपनी राइफल कसकर पकड़ी। उसके पास ज्यादा गोलियां नहीं बची थीं। टीम थकी हुई थी, घायल थी, और सामने दुश्मन पूरी तैयारी में था। फिर भी उसने कहा, “हम सौदा नहीं करेंगे।”

राघव ने अपने आदमियों को इशारा किया। वे आगे बढ़ने लगे।

तभी सूखी नदी के ऊपर चट्टान से एक भारी धातु जैसी आवाज गूंजी।

क्लैक।

सबने ऊपर देखा।

धूल से लथपथ, फटे दस्ताने, घायल माथा, लेकिन आंखों में वही ठंडा संकल्प लिए समायरा सिंह चट्टान के किनारे खड़ी थी। उसके हाथ में दुश्मन की स्नाइपर राइफल थी।

राघव के चेहरे से मुस्कान गायब हो गई।

“यह कैसे जिंदा है?” उसके मुंह से निकला।

समायरा की आवाज घाटी में गूंजी, “क्योंकि गद्दार अक्सर यह भूल जाते हैं कि देश के लिए लड़ने वाले लोग आदेश से नहीं, विश्वास से चलते हैं।”

राघव ने घबराकर राइफल उठाई। “गोली चलाओ!”

लेकिन देर हो चुकी थी।

समायरा ने निशाना साधा और एक ही वार में राघव को जमीन पर गिरा दिया। उसके आदमी पल भर को स्तब्ध रह गए। उसी क्षण विक्रम और उसकी टीम ने जवाबी हमला किया। कुछ ही देर में रास्ता साफ हो गया।

घाटी में फिर वही सन्नाटा लौट आया, लेकिन इस बार वह डर का नहीं, बची हुई सांसों का सन्नाटा था।

दूर हेलिकॉप्टरों की आवाज सुनाई दी। बचाव दल उतर रहा था।

अरविंद केस लेकर हेलिकॉप्टर में बैठा और पहली बार रो पड़ा। उसे शायद समझ आया कि कुछ लोग फाइलों की रक्षा नहीं करते, बल्कि उन अनगिनत चेहरों की रक्षा करते हैं जिन्हें कभी पता भी नहीं चलेगा कि वे किस खतरे से बचाए गए।

विक्रम ने समायरा के कंधे पर हाथ रखा। “तुमने मिशन ही नहीं, हम सबको बचाया।”

समायरा ने कोई जवाब नहीं दिया। उसने बस अंधेरी घाटी की ओर देखा, जहां धूल अब भी हवा में तैर रही थी।

हेलिकॉप्टर ऊपर उठा। नीचे तांगी घाटी धीरे-धीरे छोटी होती गई।

उस रात रिपोर्ट में सिर्फ इतना लिखा गया कि मिशन सफल रहा।

लेकिन जिन 7 लोगों ने समायरा सिंह को धूल, आग और विश्वासघात के बीच वापस लौटते देखा था, वे जानते थे कि कुछ कहानियां फाइलों में बंद नहीं होतीं।

वे उन आंखों में जिंदा रहती हैं, जिन्होंने मौत को सामने खड़ा देखकर भी पीछे हटना नहीं सीखा।

Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.