
भाग 1:
बूढ़े हरिराम चौधरी ने उसी रात अपनी मौत को खुद बुला लिया था, जब उसने शराब के नशे में सराय वालों के सामने कह दिया कि उसके बेटों के लिए मिट्टी के नीचे चांदी और सोने से भरा संदूक दबा है।
राजपुताना की रेत में बसे छोटे से कस्बे भैरवपुर में 1882 की गर्मियां ऐसी थीं कि दिन में हवा भी आग की तरह लगती थी और रात को सन्नाटा भी किसी छिपे हुए खतरे जैसा सुनाई देता था। वहां राज किसी राजा का नहीं, डर का चलता था। अंग्रेजों की चौकी 22 कोस दूर थी, ठाकुर अपने किले में बंद रहते थे और रास्तों पर असली हुकूमत उन लोगों की थी जिनकी कमर पर पिस्तौल और आंखों में रहम की कमी होती थी।
हरिराम चौधरी 72 साल का था। उसका बदन सूखकर नीम की पुरानी डाल जैसा हो गया था, मगर आंखों में अभी भी खेत जोतने वाले आदमी की जिद बाकी थी। उसने 40 साल पहले इस सूखी जमीन पर कदम रखा था, जब उसके पास सिर्फ 1 थकी हुई खच्चरी, 2 जोड़ी कपड़े और अपनी मर चुकी पत्नी गौरी से किया हुआ वादा था।
वादा यह था कि उसके बच्चे कभी किसी साहूकार के दरवाजे पर हाथ फैलाकर खड़े नहीं होंगे।
उसके 2 बेटे थे। बड़ा बेटा राघव, अजमेर में लोहे और खेती के औजारों की दुकान चलाता था। छोटा बेटा मोहन, ऊंटों के काफिलों के साथ बीकानेर से जयपुर तक माल ढोता था। दोनों अपने-अपने जीवन में फंस गए थे। महीनों से घर नहीं आए थे। हरिराम उन्हें दोष नहीं देता था। वह जानता था कि गरीबी से निकले बेटे अक्सर घर से दूर ही अपनी इज्जत बचाते हैं।
लेकिन अब उसकी खांसी बदल गई थी।
पहले सुबह आती थी। फिर रात को आने लगी। फिर खून की हल्की धार उसके रूमाल पर दिखने लगी। वैद्य ने नाड़ी देखकर कहा था कि अब धूप, मेहनत और चिंता छोड़नी होगी। हरिराम ने सिर हिला दिया था, जैसे बात मान ली हो, और अगले ही दिन कुएं की चरखी ठीक करने लगा।
उसे पता था कि शरीर जवाब दे रहा है। इसलिए उसने दोनों बेटों को संदेश भिजवाया। उसे मरने से पहले उन्हें देखना था। और उन्हें वह देना था जो उसने 40 साल की कमर तोड़ मेहनत से बचाया था—कीकर के पेड़ के नीचे दबा शीशम का संदूक, जिसमें चांदी के सिक्के, सोने की मुहरें और कुछ अंग्रेजी गिन्नियां रखी थीं।
वह खजाना लालच नहीं था। वह एक पिता की पीठ पर पड़े 40 साल के घाव थे।
गलती वाली रात वह भैरवपुर की मशहूर सराय “नीम की छांव” में बैठा था। मालिक गोकुल ने उसके सामने देसी शराब का छोटा गिलास रखा। हरिराम ने धीरे से घूंट लिया। उसकी आंखें कहीं दूर अपने बेटों के बचपन में अटक गईं।
—मेरे लड़के आने वाले हैं, गोकुल।
गोकुल ने पीतल का गिलास कपड़े से पोंछते हुए पूछा।
—तबीयत बहुत गिर गई है क्या, चौधरी जी?
—तबीयत तो मिट्टी की चीज है। आज है, कल नहीं। पर मैंने उनके लिए कुछ दबाकर रखा है। चांदी है, सोना है। जितना जीवन में बचा पाया, सब उनका है।
गोकुल ने तुरंत चारों तरफ देखा, पर देर हो चुकी थी।
सराय के अंधेरे कोने में बैठा एक दुबला-पतला आदमी, जिसकी मूंछें बिच्छू की पूंछ जैसी मुड़ी थीं, अचानक बिल्कुल शांत हो गया। उसका नाम भूरा नाहर था। वह कई हफ्तों से भैरवपुर में अजनबी बनकर घूम रहा था। लोग उसे व्यापारी समझते थे, मगर असल में वह डाकुओं का मुखिया था।
अगले दिन दोपहर को हरिराम ने अपनी झोपड़ीनुमा हवेली के बाहर धूल उठती देखी। 3 घुड़सवार उसकी ओर आ रहे थे। वे जल्दी में नहीं थे। वे वैसे आ रहे थे जैसे आदमी खेत देखने नहीं, हक छीनने आता है।
सबसे आगे भूरा नाहर था। उसके पीछे फत्ते खां, इतना भारी आदमी कि घोड़ा भी उसके नीचे दबा लगता था। तीसरा था काना शेरू, जिसकी दाईं आंख सफेद और बाईं आंख जहरीली थी।
हरिराम सब समझ गया।
दीवार पर टंगी पुरानी बंदूक तक पहुंचने का समय नहीं था। पर पीछे वाले दरवाजे से निकलकर वह अपनी 14 साल की खच्चरी “लाली” तक पहुंच गया। लाली बूढ़ी थी, पर पहाड़ी पगडंडियों को ऐसे पहचानती थी जैसे कोई मां अपने बच्चे की सांस पहचानती है।
हरिराम ने उसकी गर्दन थपथपाई।
—आज बचा ले, लाली। वरना तेरे मालिक और तेरा राज, दोनों यहीं दफन हो जाएंगे।
लाली ने बिना चाबुक के छलांग लगाई। वह मुख्य रास्ते पर नहीं गई। वह काले पत्थरों, सूखी नालियों और कांटेदार झाड़ियों के बीच से निकली। घोड़े तेज थे, पर उन टूटी पगडंडियों पर खच्चरी की अक्ल घोड़े की ताकत से बड़ी थी।
हरिराम जब भैरवपुर पहुंचा, उसकी सांस टूट रही थी। सीना जल रहा था। हाथ लगाम से ऐसे चिपके थे जैसे छोड़ते ही मौत पकड़ लेगी।
वह लड़खड़ाता हुआ “नीम की छांव” में घुसा।
अंदर गोकुल था, 2 बूढ़े चौपड़ खेल रहे थे और कोने में एक अजनबी बैठा था। उसकी पीठ दीवार से लगी थी। सिर पर काली पगड़ी, कंधे पर धूल भरी अंगरखी और पास में लंबी बंदूक रखी थी। उसकी मेज पर शराब नहीं, सिर्फ पानी था।
हरिराम सीधे उसके सामने बैठ गया। बूढ़े की आंखों में शर्म, डर और आखिरी उम्मीद साथ-साथ कांप रही थी।
—साहब, आप मुझे नहीं जानते। मेरा आप पर कोई हक नहीं। पर 3 आदमी मेरे पीछे हैं। वे मुझे मारेंगे, अगर मैंने उन्हें वह जगह नहीं बताई जहां मैंने अपने बेटों के लिए जमा पूंजी दबाई है।
अजनबी ने बिना पलक झपकाए पूछा।
—तुम मुझसे क्या चाहते हो?
हरिराम ने सूखे होंठों पर जीभ फेरी। उसने जीवन में मजदूरी मांगी थी, पानी मांगा था, कर्ज मांगा था, पर ऐसा सहारा कभी नहीं मांगा था।
—कृपा करके… कुछ देर के लिए मेरे बेटे बन जाइए।
सराय में जैसे हवा जम गई।
अजनबी ने पानी के गिलास को देखा। फिर बूढ़े को देखा। उसे बूढ़े में डर से ज्यादा अपमान दिखा—वह अपमान जो एक पिता को तब महसूस होता है जब उसे अपनी औलाद के नाम पर किसी पराए आदमी के आगे हाथ जोड़ना पड़े।
—कितने आदमी हैं?
—3।
अजनबी ने बंदूक उठाकर मेज के नीचे रख ली।
—आराम से बैठिए, बाबूजी।
कुछ ही मिनट बाद सराय के दरवाजे धक्का खाकर खुले। भूरा नाहर अंदर आया। फत्ते खां ने दरवाजे का आधा हिस्सा अपने कंधों से भर दिया। काना शेरू ने अपनी एक जिंदा आंख से पूरा कमरा नापा।
—चौधरी हरिराम, हम तुम्हारे घर गए थे। तुम मिले नहीं।
हरिराम की आवाज कांपी, मगर टूटी नहीं।
—मैं अपने बेटे से मिलने आया हूं।
भूरा नाहर ने अजनबी को देखा।
—बेटा?
अजनबी ने शांत स्वर में कहा।
—बाप के साथ खाना खा रहा है। कोई दिक्कत है?
फत्ते खां हंसा।
—तो बेटा उठ जाए। बड़ों की बात है।
—मैं कहीं नहीं जा रहा।
काना शेरू की उंगलियां कमर की पिस्तौल की तरफ सरकीं।
अजनबी ने उसकी हरकत देख ली।
—तुम्हें 1 मौका देता हूं। जिस दरवाजे से आए हो, उसी से बाहर चले जाओ। किसी और बूढ़े को लूटने की कोशिश करना।
भूरा नाहर का चेहरा सख्त हो गया।
—तू जानता नहीं, किससे उलझ रहा है।
काना शेरू ने पिस्तौल निकाली।
अगले ही पल बंदूक गरजी।
धुएं ने सराय भर दी। काना शेरू जमीन पर गिरा, उसकी पिस्तौल दूर जा पड़ी। फत्ते खां ने मेज उलट दी। भूरा नाहर पीछे हटते हुए चिल्लाया।
—इस हरामी ने मौत खरीद ली है!
लेकिन उस क्षण हरिराम समझ गया कि वह अजनबी उसका बेटा बनने का नाटक दया से नहीं कर रहा था।
वह उस शब्द को निभाने आया था।
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भाग 2:
फत्ते खां ने उलटी हुई मेज के पीछे से 2 गोलियां चलाईं, मगर काली पगड़ी वाला आदमी तब तक जमीन पर लुढ़ककर गोकुल की बार के पास पहुंच चुका था। भूरा नाहर ने बाईं तरफ से निशाना साधा, सराय में धुआं, टूटे मटके की गंध और डरे हुए लोगों की चीखें भर गईं। हरिराम एक बेंच के नीचे गिर पड़ा, खांसते-खांसते उसका सीना फटने लगा, फिर भी उसकी आंखें उसी अजनबी पर टिकी रहीं। बंदूक फिर गरजी। फत्ते खां के कंधे से खून नहीं, पर चीख निकली; गोली ने उसका हथियार तोड़ दिया था। भूरा नाहर समझ गया कि वह बूढ़े से खजाना लेने नहीं, अपनी जान बचाने आया है। वह दरवाजे से बाहर भागा और दोपहर की सफेद धूप में गायब हो गया। अजनबी उसके पीछे निकला, मगर गोली नहीं चलाई। हरिराम लड़खड़ाते हुए बाहर आया। —वह लौटेगा। अजनबी बोला। —हां, और इस बार ज्यादा लोगों के साथ। —तुम कितने पैसे लोगे मेरे साथ रहने के? —मैं बूढ़े बाप को बीच रास्ते छोड़ने की मजदूरी नहीं लेता। हरिराम ने पहली बार उसे सम्मान से देखा। —तो मेरी एक और विनती मान लो। मेरे बेटे पहुंचने तक मुझे जिंदा रखो। अजनबी ने सीटी बजाई। सराय के बाहर काला घोड़ा सिर उठाकर खड़ा हुआ। उसके माथे पर सफेद निशान था, जैसे अंधेरे में चांद का टुकड़ा चिपका हो। उसका नाम “साया” था। वह बिना लगाम खिंचे अपने मालिक के पास आया, शांत और चौकन्ना। शाम तक दोनों हरिराम के खेतनुमा घर लौटे। लाली थक चुकी थी, पर जिंदा थी। हरिराम ने उसके माथे को चूमा। —आज तूने कई आदमियों से ज्यादा हिम्मत दिखाई। रात की तैयारी शुरू हुई। उत्तर में कांटेदार झाड़ियां थीं, दक्षिण खुला मैदान, पूर्व में सूखी नाली और पश्चिम में टूटी पत्थर की दीवार। अजनबी ने झाड़ियों में रस्सियां बांधीं, खाली डिब्बों में कंकड़ भरे, कुएं के पास अपनी बंदूक की जगह बनाई। हरिराम पुरानी छत पर चढ़कर अपनी जंग लगी बंदूक लेकर बैठ गया। आधी रात के बाद लाली ने कान खड़े किए। भूरा नाहर 5 और आदमियों के साथ लौटा था। एक पैर रस्सी से टकराया। डिब्बे बज उठे। हरिराम ने आसमान में गोली चलाई। डाकू बिखर गए। कुएं के पास से अजनबी की बंदूक बोली। 1 आदमी गिर पड़ा। दूसरा हथियार छोड़कर भागा। तभी भूरा नाहर पीछे से दीवार चढ़ने लगा। वह हरिराम से सिर्फ 2 हाथ दूर था। उसी पल साया अंधेरे से निकला, काला, विशाल, मौन। उसने भूरा नाहर और दीवार के बीच खड़े होकर रास्ता रोक लिया। भूरा डरकर नीचे गिरा। बाकी डाकू भागने लगे। अजनबी ने भूरा की पिस्तौल पर गोली मारी। पिस्तौल रेत में गिर गई। —अब उत्तर की तरफ चल। फिर लौटा तो बात नहीं होगी। भूरा कांपता हुआ चला गया। तभी छत से भारी आवाज आई। अजनबी दौड़कर ऊपर पहुंचा। हरिराम जमीन पर पड़ा था, बाईं पसली पकड़े हुए। भटकी हुई गोली उसे अंधेरे में ढूंढ चुकी थी।
भाग 3:
अजनबी ने हरिराम को छत से ऐसे उतारा जैसे कोई अपने असली पिता को बाहों में उठाता है। उसने उसे भीतर मिट्टी की दीवारों वाले कमरे में बिछी पुरानी चारपाई पर लिटाया। गौरी की छोड़ी हुई सफेद चादर फाड़ी, लोहे के भगोने में पानी उबाला, शराब से जख्म साफ किया और बिना हाथ कांपाए गोली के पास फंसे कपड़े के रेशे निकाले।
हरिराम ने दांत भींच लिए, मगर चिल्लाया नहीं। बूढ़े किसान की पूरी जिंदगी दर्द से बनी थी; 1 गोली उसे तोड़ नहीं सकती थी।
अजनबी ने कपड़ा बांधते हुए कहा।
—अभी जाने की इजाजत नहीं है, बाबूजी।
हरिराम ने आधी खुली आंख से उसे देखा।
—अब तू मुझे आदेश देगा, बेटा?
अजनबी का हाथ 1 पल को रुक गया।
—आज की रात दूंगा।
हरिराम के सूखे होंठों पर हल्की मुस्कान आई। दर्द के बीच वह मुस्कान ऐसी थी जैसे सूखे कुएं में अचानक पानी की आवाज सुनाई दे।
सुबह तक बुखार चढ़ गया। हरिराम बार-बार बेहोशी में गौरी को पुकारता। कभी राघव को बुलाता, कभी मोहन को डांटता कि ऊंटों के पीछे इतना दूर मत जाया कर। कभी कहता कि खेत की मेड़ टूट गई है। कभी कहता कि कीकर के नीचे कोई मत जाना।
अजनबी ने पूरी रात आंख नहीं झपकाई। वह गीले कपड़े बदलता रहा, उबलते पानी को ठंडा करके चम्मच से पिलाता रहा, और दरवाजे के पास रखी बंदूक पर नजर भी बनाए रखता रहा। बाहर साया आंगन में घूमता था। लाली छप्पर के नीचे खड़ी थी, उसकी टांगें अब भी पिछली दौड़ से कांप रही थीं, मगर वह दरवाजे से दूर नहीं जाती थी।
दोपहर को पड़ोस की विधवा कमला काकी आईं। उन्होंने जख्म देखा तो माथे पर हाथ रख लिया।
—हे राम, ये तो बड़ा गहरा है। वैद्य को बुलाना पड़ेगा।
अजनबी ने कहा।
—भेज दीजिए। और किसी को मत बताइए कि बूढ़ा जिंदा है।
कमला काकी ने उसकी आंखों में देखा। वहां झूठ नहीं था, पर अतीत बहुत गहरा था।
—तुम कौन हो?
अजनबी ने सिर्फ इतना कहा।
—जिसे कल रात एक पिता ने बुला लिया।
खबर फिर भी फैल गई। भैरवपुर में लोग कहते रहे कि हरिराम मर गया। कोई कहता डाकुओं ने खजाना ले लिया। कोई कहता काला घोड़ा शैतान था जिसने भूरा नाहर को गिरा दिया। सराय वाला गोकुल हर किसी को बताता कि अजनबी ने “बाबूजी” कहते ही पूरी सराय की हवा बदल दी थी।
तीसरे दिन सुबह, जब सूरज की रोशनी दीवार की दरारों से भीतर आ रही थी, साया ने अचानक जोर से हिनहिनाया। अजनबी बाहर निकला। दक्षिण की तरफ धूल उठ रही थी। 2 घुड़सवार पागलों की तरह घर की ओर दौड़ रहे थे।
पहले राघव उतरा। उसके कपड़े सफर की धूल से भरे थे। उसके पीछे मोहन उतरा, जिसकी आंखों में डर और गुस्सा दोनों थे। उसने कमर की छुरी पर हाथ रखा।
—तुम कौन हो?
अजनबी ने शांत होकर जवाब दिया।
—वह आदमी जिसे तुम्हारे पिता ने कुछ दिनों के लिए उधार लिया था।
राघव ने दीवारों पर गोलियों के निशान देखे। टूटी बाल्टी, खून लगा कपड़ा, और दरवाजे के पास बंदूक।
—बाबा जिंदा हैं?
—तुम्हारा इंतजार कर रहे हैं।
दोनों भाई भीतर दौड़े। अजनबी बाहर ही खड़ा रहा। उसे लगा, यह मिलन उसका नहीं है। अंदर से पहले सन्नाटा आया, फिर चारपाई खिसकने की आवाज, फिर मोहन की टूटी हुई आवाज।
—बाबा…
फिर राघव का दबा हुआ रोना सुनाई दिया। वह आदमी जो बाजार में किसी से नहीं डरता था, अपने बूढ़े पिता की हड्डियों जैसी पतली उंगलियां पकड़कर बच्चे की तरह रो पड़ा।
हरिराम की कमजोर आवाज आई।
—आ गए मेरे लाल… मैं कहता था ना, आएंगे।
मोहन बार-बार पूछ रहा था।
—किसने किया? किसने गोली मारी? मैं उसे जिंदा नहीं छोड़ूंगा।
हरिराम ने धीमे मगर कठोर स्वर में कहा।
—बदला बाद में लेना। पहले अपने बाप को पानी पिला।
राघव बाहर आया। उसकी आंखें लाल थीं। उसने अजनबी के सामने हाथ जोड़ दिए।
—बाबा ने बताया कि आपने क्या किया।
—जो करना चाहिए था, वही किया।
—नहीं। आपने वह किया जो कई सगे बेटे भी नहीं करते।
अजनबी ने नजर झुका ली।
—उन्होंने मुझे बेटा बनने को कहा था। शायद मैं नाटक थोड़ा ज्यादा सच करके बैठ गया।
अंदर से हरिराम की हंसी आई, जो खांसी में बदल गई।
—अरे अंदर आओ सब! मैं इन्हें बता रहा हूं कि इसने 9 डाकुओं को अकेले भगा दिया।
अजनबी ने दरवाजे से कहा।
—6 थे।
—आज 9 हैं। कल 12 होंगे। बूढ़े आदमी को अपनी कहानी सजाने दो।
पहली बार घर में हंसी गूंजी। वह घर जो 3 रातों से डर, खून और बुखार की गंध से भरा था, अचानक फिर परिवार की आवाजों से भर गया।
वैद्य शाम को आया। उसने जख्म देखा, नाड़ी पकड़ी, फिर अजनबी की तरफ हैरानी से देखा।
—जिसने पट्टी की है, उसने जान बचा दी। पर यह आदमी मर भी सकता था।
हरिराम बोला।
—मैं 40 साल से मर सकता था। पर हर बार काम बाकी रह गया।
वैद्य ने सख्त आवाज में कहा।
—अब उठना नहीं है। कम से कम 15 दिन।
हरिराम ने सिर हिलाया। वैद्य गया। और उसके जाते ही हरिराम ने राघव से कहा।
—2 फावड़े लाओ।
राघव ने विरोध किया।
—बाबा, अभी नहीं।
मोहन ने भी कहा।
—आपको जख्म है। हम कहीं नहीं खोदेंगे।
हरिराम ने आंखें तरेरीं।
—40 साल इंतजार किया है। अब अपने बेटों के सामने 20 कदम चलने से कोई बूढ़ा नहीं मरता।
आखिर दोनों ने उसे संभाला। अजनबी पीछे चला। लाली भी धीमे-धीमे उनके साथ आई, जैसे उसे पता हो कि यह रास्ता उसी की वजह से बचा है। साया दूर खड़ा होकर देखता रहा।
वे पुराने कीकर के पेड़ तक पहुंचे। उसके नीचे मिट्टी थोड़ी कड़ी थी। हरिराम ने कांपते हाथ से एक चपटी राखी रंग की पत्थर की पटिया दिखाई।
—यहीं।
राघव और मोहन ने खोदना शुरू किया। 80 सेंटीमीटर नीचे फावड़ा किसी कठोर चीज से टकराया। दोनों ने मिट्टी हटाई। शीशम का संदूक निकला, जिसके लोहे के कुंडे जंग से लाल हो चुके थे।
जब संदूक खोला गया, तो शाम की रोशनी सिक्कों पर पड़ी। चांदी के रुपये, सोने की मुहरें, अंग्रेजी गिन्नियां, और कुछ पुराने गहने जो गौरी ने मरने से पहले हरिराम के हाथ में रखे थे। वह चमक दौलत की नहीं, बरसों की भूख, पसीने और चुप्पी की थी।
राघव घुटनों के बल बैठ गया।
—बाबा… आपने हमें कभी बताया क्यों नहीं?
हरिराम ने कहा।
—क्योंकि गरीब आदमी की जमा पूंजी की खबर हवा को भी नहीं देनी चाहिए। मैंने गलती से हवा को बता दिया, देख लिया न क्या हुआ?
मोहन ने मुट्ठी भींच ली।
—हम आपके पास पहले क्यों नहीं आए…
हरिराम ने उसके हाथ पर हाथ रखा।
—बेटा, पछतावा भी एक चोर है। वह आज का सुख चुरा लेता है। तुम आ गए, बस।
राघव की आंखों से आंसू गिर रहे थे।
—यह सब आपका है। हमें कुछ नहीं चाहिए।
हरिराम ने डांटते हुए कहा।
—मूर्ख मत बनो। यह तुम्हारे लिए ही है। अमीर बनने के लिए नहीं। इसीलिए कि कोई साहूकार, कोई ठाकुर, कोई भूरा नाहर तुम्हें भूख दिखाकर झुका न सके।
अजनबी ने यह दृश्य दूर खड़े होकर देखा। उसे लगा, अब उसका काम पूरा हो गया है। उसने धीरे से साया की लगाम उठाई।
हरिराम ने आवाज दी।
—रुक।
अजनबी ठिठक गया।
—तुम्हारा नाम तो बताओ।
अजनबी ने हल्की मुस्कान के साथ कहा।
—नाम से क्या होगा?
—बहुत कुछ होगा। मेरे पोते पूछेंगे कि दादा को किसने बचाया था।
अजनबी चुप रहा। फिर बोला।
—कभी मेरा नाम अर्जुन सिंह था। अब लोग मुझे बस राही कहते हैं।
राघव ने पूछा।
—कभी था? इसका क्या मतलब?
अजनबी की आंखों में पुराना अंधेरा उतर आया।
—मैंने भी एक पिता खोया था। डाकुओं ने नहीं, बेटों की लापरवाही ने। वह बीमार थे, मुझे बुलाते रहे, और मैं एक सौदे में फंसा रहा। जब पहुंचा, चिता ठंडी हो चुकी थी। तब से जहां कोई बूढ़ा आदमी मदद मांगता है, मैं देर नहीं करता।
हरिराम की आंखें भर आईं। वह समझ गया कि अजनबी ने उसकी रक्षा सिर्फ बहादुरी से नहीं, अपने अपराधबोध से भी की थी।
—अर्जुन, सुन। तू यहां पराया नहीं है। तू जिस दिन चाहे, इस आंगन में आकर बैठ सकता है। जब तक मैं जिंदा हूं, तेरे पास एक पिता है।
अर्जुन ने जवाब नहीं दिया। उसकी आंखें पत्थर जैसी थीं, मगर उनमें चमक आ गई थी। उसने बस आगे बढ़कर हरिराम के पैर छुए। हरिराम ने कांपते हाथ से उसके सिर पर हाथ रखा।
—सुखी रह, बेटा।
मोहन ने कहा।
—भूरा नाहर फिर आएगा तो?
अर्जुन ने साया की पीठ थपथपाई।
—अब वह नहीं आएगा। जो आदमी बूढ़े पिता और काले घोड़े दोनों से डर जाए, वह फिर उस रास्ते नहीं लौटता।
लाली ने जैसे बात समझी, हल्की आवाज की। हरिराम हंस पड़ा।
—और अगर लौटा, तो हमारी लाली उसे पहाड़ों में भटका देगी।
उस रात कई महीनों बाद हरिराम ने चैन से नींद ली। राघव और मोहन उसके पास बैठे रहे। बाहर लाली भूसे के पास आराम कर रही थी। साया द्वार पर खड़ा था, जैसे पहरेदार नहीं, परिवार का हिस्सा हो।
सुबह अर्जुन जाने लगा। राघव ने खाने की पोटली दी। मोहन ने पानी की मशक। हरिराम ने अपनी पुरानी अंगोछी उसके हाथ में रखी।
—यह रख ले। लौटते समय पहचान में आसानी होगी।
अर्जुन ने अंगोछी ली, आंखों से लगाई और साया पर बैठ गया। सूरज की रोशनी में काला घोड़ा चमक रहा था। वह धीरे-धीरे रेत के रास्ते आगे बढ़ा। कुछ दूर जाकर अर्जुन ने मुड़कर देखा। आंगन में हरिराम अपने 2 बेटों के बीच खड़ा था, लाली पास खड़ी थी, और कीकर के नीचे पुराना संदूक खुला पड़ा था।
भैरवपुर में बाद में लोग सोने से ज्यादा उस रात की बात करते थे। वे कहते थे कि एक बूढ़े ने शर्म से कांपते हुए किसी पराए आदमी से कहा था, “मेरा बेटा बन जाओ,” और वह आदमी सचमुच बेटा बन गया। वे लाली की बात करते थे, जिसने मौत से तेज दौड़ लगाई। वे साया की बात करते थे, जिसने अंधेरे में डाकू का रास्ता रोका।
और हरिराम जब भी चौपाल पर बैठता, वह अपने असली बेटों के साथ 1 तीसरे बेटे का नाम भी लेता।
क्योंकि परिवार हमेशा खून से नहीं बनता। कभी-कभी वह एक सराय के दरवाजे पर बनता है, जब मौत अंदर घुस रही होती है और कोई अजनबी बिना सोचे कह देता है—
—आराम से बैठिए, बाबूजी।
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