
PART 1
न्यायाधीश के दस्तखत सूखे भी नहीं थे कि आरती सबके सामने फूट-फूटकर रो पड़ी, क्योंकि बाल आश्रय गृह से सौंपी गई 4 साल की बच्ची ने उसकी साड़ी का पल्लू पकड़कर बहुत धीमी आवाज़ में कहा था, “मम्मी।”
दिल्ली के कड़कड़डूमा कोर्ट की उस ठंडी, सफेद दीवारों वाली छोटी-सी कक्ष में अचानक ऐसी खामोशी छा गई, जैसे किसी ने सांस लेना भूल गया हो। सामने बैठी बाल कल्याण समिति की अधिकारी ने फाइल बंद कर दी। महिला पुलिसकर्मी ने नजरें झुका लीं। और आरती के पति, डॉ. निखिल मेहरा, वहीं खड़े रह गए—एक ऐसे आदमी की तरह, जिसके हाथों में पहली बार कोई बच्ची नहीं, बल्कि टूटा हुआ भरोसा रख दिया गया हो।
निखिल 39 साल का बाल रोग विशेषज्ञ था। दक्षिण दिल्ली के एक निजी अस्पताल में वह रोज बच्चों की धड़कन सुनता, माताओं को समझाता, बुखार की दवा लिखता और जन्म प्रमाणपत्रों पर मुस्कुराते पिता देखता। लेकिन उसके अपने घर, लाजपत नगर के 2 कमरे वाले फ्लैट में, 7 साल से एक कमरा बंद पड़ा था। उस कमरे में लकड़ी का पालना था, रंगीन परदे थे, छोटे कपड़ों की अलमारी थी—और आरती की वह चुप्पी थी, जिसे कोई डॉक्टर ठीक नहीं कर सकता था।
आरती जयपुर की एक स्कूल शिक्षिका थी, शादी के बाद दिल्ली आई थी। वह बच्चों को कविता पढ़ाते-पढ़ाते खुद मां बनने का सपना देखने लगी थी। लेकिन हर महीने उम्मीद टूटती रही। जांचें, दवाएं, पूजा-पाठ, रिश्तेदारों की सलाह, पड़ोस की औरतों की फुसफुसाहट—सबने मिलकर उसे भीतर से थका दिया था। सास कमला देवी हर तीज-त्योहार पर ताना मारतीं, “मेहरा खानदान का दीया कौन जलाएगा?” निखिल उन्हें रोकता, पर आरती के भीतर लगने वाली चोट कोई नहीं रोक पाता।
फिर उन्होंने गोद लेने का फैसला किया। यह दया नहीं थी। यह उस प्यार की जगह तलाश थी, जो उनके घर में जमा होकर भारी हो चुका था।
महीनों की पूछताछ, घर की जांच, आय प्रमाण, मानसिक तैयारी, समाजसेवियों के सवाल—सबके बाद वह दिन आया, जब उन्हें बाल आश्रय गृह की एक बच्ची से मिलवाया गया। उसका नाम कागजों में “मीरा” लिखा था। बड़ी काली आंखें, छोटे कटे बाल, पतली कलाई और हाथ में पुराना कपड़े का हाथी, जिसकी एक आंख नीले धागे से टांकी गई थी।
पहले दिन मीरा ने किसी से बात नहीं की। उसने बिस्कुट लिया, पर तब तक नहीं खाया जब तक निखिल 2 कदम पीछे नहीं हट गया। घर आकर उसने पानी पीने से पहले पूछा, “ले सकती हूं?” आरती की आंखें भर आईं। बच्ची हर आवाज़ पर चौंकती थी। दरवाजा तेज बंद हो जाए तो वह दीवार से चिपक जाती। रात को वह लाइट जलाकर सोती और हाथी को सीने से ऐसे दबाती, जैसे कोई उसे छीन ले जाएगा।
धीरे-धीरे वह खुलने लगी। एक सुबह उसने पीली कटोरी चुनी। एक दिन निखिल की जली हुई पराठा देखकर हंस पड़ी। फिर उस शाम, दो गवाहों—अधिकारी और पुलिसकर्मी—के सामने उसने आरती को “मम्मी” कहा।
उसी रात, जब आरती उसे नहलाने लगी, निखिल ने उसकी पीठ पर 5 पुराने निशान देखे। गहरे, बराबर, एक पंक्ति में। उसने फाइल मेज पर पटकी। उसमें कुछ नहीं लिखा था।
और तभी निखिल ने पुलिस को फोन कर दिया।
PART 2
आरती कांपती आवाज़ में मीरा से पूछती रही, “बेटा, ये निशान किसने दिए?”
मीरा पानी में तैरते प्लास्टिक के बतख को घुमाती रही। फिर बोली, “वो आंटी कहती थीं, सो जाओ… नहीं तो आवाज़ बाहर चली जाएगी।”
आरती का चेहरा सफेद पड़ गया। निखिल डॉक्टर था, उसने बच्चों के घाव देखे थे, पर यह कुछ और था। ये गिरने के निशान नहीं थे। ये बार-बार दी गई सूइयों जैसे थे। फाइल में कोई जिक्र नहीं। कोई जांच नहीं। कोई चेतावनी नहीं।
अगली सुबह आश्रय गृह की प्रभारी सुधा सक्सेना ने फोन पर कहा, “डॉक्टर साहब, आप ज्यादा भावुक हो रहे हैं। ऐसे बच्चे कहानियां बना लेते हैं।”
निखिल ने फोन काट दिया।
क्राइम शाखा की बाल सुरक्षा इकाई में इंस्पेक्टर शबनम खान ने मीरा की तस्वीरें, फाइल और जन्म-निशान देखा—बाएं टखने के पीछे चांद जैसा भूरा दाग। उनका चेहरा बदल गया।
उन्होंने धीरे से पूछा, “यह बच्ची किस नाम से आई थी?”
“मीरा,” निखिल ने कहा।
शबनम ने फाइल बंद की।
“शायद नहीं। 3 साल पहले गुड़गांव से 18 महीने की एक बच्ची गायब हुई थी। उसके टखने पर ठीक ऐसा ही निशान था।”
आरती ने कुर्सी पकड़ ली।
“तो फिर हमारी बेटी कौन है?”
शबनम ने जवाब दिया, “यही पता करना होगा।”
PART 3
उस रात मेहरा परिवार का घर घर नहीं, अदालत बन गया था। कमला देवी ने जैसे ही सुना कि पुलिस बच्ची की असली पहचान की जांच करेगी, उन्होंने माथा पीट लिया।
“हमारे घर में पुलिस आएगी? लोग क्या कहेंगे? 7 साल बाद बच्ची मिली और अब तुम खुद उसे हाथ से जाने दोगे?”
आरती ने पहली बार सास की आंखों में सीधा देखा।
“मांजी, अगर किसी की खोई हुई बेटी हमारे घर आ गई है, तो उसे छिपाना पाप होगा।”
कमला देवी चिल्लाईं, “और तेरी गोद? तेरे 7 साल? तेरी सूनी रातें?”
आरती का गला भर आया, लेकिन आवाज़ नहीं टूटी।
“मेरी गोद किसी और मां की चीख पर नहीं भर सकती।”
निखिल ने उसी रात मीरा की फाइल फिर खोली। कागज बहुत साफ थे। तारीखें सीधी, मुहरें सही, हस्ताक्षर पूरे। लेकिन एक डॉक्टर की नजर से सब अजीब था। किसी भी 4 साल की बच्ची का मेडिकल इतिहास इतना खाली नहीं हो सकता था। कोई टीकाकरण की पूरी जानकारी नहीं। कोई पुराना अस्पताल रिकॉर्ड नहीं। कोई जन्म प्रमाणपत्र नहीं, बस “परित्यक्त बच्ची” लिखकर आगे बढ़ा दिया गया था।
डीएनए जांच हुई। मीरा को सिर्फ इतना समझ आया कि पुलिस वाली आंटी उसके गाल के अंदर रुई लगाएंगी और फिर उसे जलेबी मिलेगी। आरती ने सचमुच उसके लिए 2 जलेबी मंगवाई। मीरा ने आधी खुद खाई, आधी आरती को खिलाई।
निखिल ने उस पल आरती का चेहरा देखा। वह मुस्कुरा रही थी, पर उसकी आंखों में भय था—वह भय, जो किसी मां को अपने बच्चे को खोने से पहले घेरता है।
5 दिन बाद रिपोर्ट आई।
इंस्पेक्टर शबनम ने उन्हें बिना मीरा के बुलाया। कमरे में एक काउंसलर भी बैठी थी। निखिल ने उसी क्षण समझ लिया कि अब कोई साधारण बात नहीं बचेगी।
शबनम ने कहा, “बच्ची का डीएनए गुड़गांव से 2023 में गायब हुई अनाया मल्होत्रा से मेल खाता है। वह 18 महीने की थी जब एक बाल चिकित्सालय के बाहर से गायब हुई थी।”
आरती के होंठ खुले, पर आवाज़ नहीं निकली।
“उसकी मां?” निखिल ने पूछा।
दरवाजा खुला।
एक औरत अंदर आई। उम्र 35 से ज्यादा नहीं होगी, लेकिन चेहरा जैसे 20 साल रो चुका था। साधारण सूती सलवार-कमीज, बिखरे बाल, आंखों के नीचे गहरे गड्ढे। उसके हाथ कांप रहे थे। उसने आरती को देखा, फिर निखिल को।
वह गुस्से से नहीं चीखी। उसने आरोप नहीं लगाया।
उसने बस कहा, “आपने उसे भूखा नहीं रखा… इसके लिए धन्यवाद।”
आरती वहीं टूट गई।
उस औरत का नाम नेहा मल्होत्रा था। वह गुड़गांव के एक छोटे नर्सिंग होम में रिसेप्शन पर काम करती थी। उसकी बेटी अनाया बुखार के बाद जांच के लिए लाई गई थी। भीड़ थी, बिजली गई थी, सीसीटीवी कुछ देर बंद था। नेहा ने सिर्फ 3 मिनट के लिए दवा काउंटर पर मुड़कर पर्ची ली थी। जब वह लौटी, बच्ची गायब थी।
लोगों ने उसी को दोष दिया। ससुराल ने कहा, “मां होकर 3 मिनट कैसे हटी?” पति रवि ने 8 महीने साथ दिया, फिर एक दिन बोला, “मैं हर दिन मरी हुई बच्ची का शोक नहीं मना सकता।” नेहा ने कहा, “मेरी बेटी मरी नहीं है।” रवि चला गया।
3 साल तक नेहा ने पोस्टर लगाए। बस अड्डों पर, मंदिरों के बाहर, अस्पतालों में, रेलवे स्टेशन पर। हर जन्मदिन पर वह छोटा केक लाती, 1 मोमबत्ती ज्यादा लगाती, और अपनी बेटी की खाली चारपाई के पास बैठकर काटती। उसकी मां कहती, “बेटी, अब भगवान का नाम ले और छोड़ दे।” नेहा जवाब देती, “भगवान ने मां बनाई है, हार मानने वाली मशीन नहीं।”
पहली मुलाकात एक बाल परामर्श केंद्र में रखी गई। मीरा ने नीली फ्रॉक पहनी, जिसे आरती ने चुना था। नेहा कमरे में आई तो उसके कदम डगमगा रहे थे। वह भागकर बच्ची से लिपटना चाहती थी, लेकिन काउंसलर ने पहले ही समझा दिया था—बच्ची को डराना नहीं।
नेहा घुटनों के बल बैठी।
“हैलो, अनाया।”
मीरा ने भौंहें सिकोड़ लीं।
“मेरा नाम मीरा है।”
नेहा की आंखों में दर्द उठा, लेकिन उसने खुद को संभाला।
“ठीक है। हैलो, मीरा।”
उसने अपने बैग से एक छोटी चांदी की पायल निकाली। “यह तुम्हारी थी। दूसरी मेरे पास घर पर है।”
मीरा ने पायल देखी। फिर अपने टखने को छुआ।
“तुम्हें मेरा चांद वाला दाग पता है?”
नेहा रो पड़ी। “जब तुम पैदा हुई थीं, डॉक्टर ने कहा था, देखिए, बच्ची चांद लेकर आई है।”
मीरा ने आरती की तरफ देखा।
“मम्मी, ये आंटी क्यों रो रही हैं?”
“मम्मी” शब्द कमरे में हथौड़े की तरह गिरा। नेहा ने चेहरा मोड़ लिया। आरती ने अपनी उंगलियां कसकर भींच लीं। उस पल किसी की जीत नहीं थी। एक मां अपनी खोई बच्ची के सामने अजनबी थी। दूसरी मां अपने प्यार को सच के सामने दोषी महसूस कर रही थी। बच्ची सिर्फ यह जानना चाहती थी कि उसे समोसा मिलेगा या नहीं।
जांच खुलती गई। मीरा की फाइल झूठी थी। जिन दस्तावेजों को पानी में नष्ट बताया गया था, वे कभी बने ही नहीं थे। मेडिकल प्रमाणपत्र दूसरे बच्चों से नकल किए गए थे। कुछ मुहरें असली थीं, पर उनका इस्तेमाल गलत जगह किया गया था। सुधा सक्सेना ने पहले सब नकारा। फिर उसके खाते से जयपुर और दुबई के बीच संदिग्ध रकम निकली।
उसके पीछे एक जाल था। कोई फिल्मी गुंडा नहीं। कोई अंधेरी गली का अपहरणकर्ता नहीं। बल्कि नर्सिंग होम के कर्मचारी, आश्रय गृह के लोग, दलाल, और 2 डॉक्टर, जो व्यवस्था की कमजोरियों को हथियार बना चुके थे। वे गायब बच्चों को “छोड़ा हुआ” बनाते। नाम बदलते। फाइलें गढ़ते। फिर उन्हें उन परिवारों तक पहुंचाते, जो बच्चे के लिए तरस रहे होते और सवाल पूछने की हालत में नहीं होते।
मीरा की पीठ के 5 निशान पुराने शांतिदायक इंजेक्शनों के थे। उसे रोने से रोकने, सफर में चुप रखने और यादों को धुंधला करने के लिए दवाएं दी गई थीं। जब नेहा बारिश में पोस्टर चिपका रही थी, उसकी अनाया कहीं बंद कमरे में सोने को मजबूर की जा रही थी।
निखिल को पता चला कि उस जाल में शामिल एक डॉक्टर उसके ही अस्पताल से जुड़ा था—डॉ. प्रकाश राठौड़। वही प्रकाश, जो कॉफी मशीन पर हंसकर कहता था, “बच्चों से दूरी रखो, वरना पेशा मुश्किल हो जाएगा।” निखिल ने तब इसे व्यावसायिक सलाह समझा था। अब उसे लगा, शायद वह आदमी इंसानियत से दूरी की बात कर रहा था।
प्रकाश ने कई मेडिकल रिपोर्टों को “सामान्य” बताया था। उसने चोटें छिपाईं, इंजेक्शन के निशान अनदेखे किए, और अनाथ घोषित बच्चों की जांच में झूठ लिखा। गिरफ्तारी के दिन अस्पताल के बाहर मीडिया जमा हो गई। प्रबंधन ने बयान दिया, “हम पूरी तरह सहयोग करेंगे।” वही लोग, जो कल तक प्रकाश की तारीफ करते थे, आज कह रहे थे, “हमें हमेशा कुछ अजीब लगता था।”
आरती ने बयान दिया। निखिल ने सारे कागज सौंपे। नेहा ने 3 साल का दर्द अदालत में रखा। सुधा ने सजा कम कराने के लिए बाकी नाम बताए। डॉ. प्रकाश और नेटवर्क की मुखिया माधवी सेठ को जेल हुई। 4 और बच्चों की पहचान बदली हुई मिली। 2 परिवारों को वह फोन आया, जिसका इंतजार उन्होंने उम्मीद मरने के बाद भी किया था।
लेकिन मीरा, जो असल में अनाया थी, उसके लिए अदालत से कठिन लड़ाई घरों में थी।
वह पूछती, “मेरे 2 नाम क्यों हैं?”
वह नेहा से पूछती, “आप मुझे लेने पहले क्यों नहीं आईं?”
नेहा हर बार टूटकर भी कहती, “क्योंकि मुझे पता ही नहीं था कि मेरी बच्ची कहां है।”
वह आरती से पूछती, “अगर मैं वहां चली गई तो आप मम्मी नहीं रहेंगी?”
आरती उसे सीने से लगाकर कहती, “मां होना कभी-कभी पकड़ना नहीं, सही जगह पहुंचाना होता है।”
पर रात को वही आरती बाथरूम में जाकर रोती, ताकि मीरा न सुन सके। निखिल दरवाजे के बाहर खड़ा रहता। अंदर जाने की हिम्मत भी नहीं होती, बाहर जाने की भी नहीं।
काउंसलरों ने कहा, “बच्ची को झटका नहीं देना। कोई एक मां दूसरी से लड़कर नहीं जीतेगी। बच्ची को खींचा नहीं जाएगा, संभाला जाएगा।”
धीरे-धीरे नेहा मेहरा घर आने लगी। पहले 30 मिनट, फिर 1 घंटा, फिर पूरी दोपहर। आरती ने उसे बताया कि मीरा दूध में हल्दी पसंद नहीं करती, लेकिन इलायची वाली खीर खाती है। उसे बंद दरवाजों से डर लगता है। वह सोने से पहले हाथी को दाहिने तरफ रखती है। चॉकलेट खाते हुए दांत दिखाकर हंसती है।
एक दिन नेहा ने आरती को रसोई में रोटी बेलते देखा और फुसफुसाई, “मैं तो यह भी नहीं जानती कि मेरी बेटी आलू पराठा कैसे खाती है।”
आरती ने बेलन रोक दिया।
“दही के साथ। अचार से जलन होती है। लेकिन अब वह कहती है, थोड़ा-सा तीखा खाऊंगी, मैं बड़ी हो गई हूं।”
नेहा रो पड़ी। आरती ने पहली बार उसका हाथ पकड़ा। दोनों में से कोई दोषी नहीं थी। दोनों एक ही अपराध के दो किनारों पर खड़ी थीं।
वापसी की प्रक्रिया 3 महीने चली। मीरा कुछ दिन नेहा के साथ गुड़गांव के नए किराए के फ्लैट में रहती, फिर मेहरा घर लौटती। कभी खुश, कभी चिड़चिड़ी, कभी डरी हुई। एक रात उसने चिल्लाकर कहा, “मुझे कहीं मत भेजो!” तीनों वयस्कों ने उसी रात समझ लिया कि बच्चे सच से नहीं, अचानक छूटने से टूटते हैं।
अंतिम दिन आया। मीरा ने लाल स्वेटर पहना। उसका नीला आंख वाला कपड़े का हाथी गुलाबी बैग में रखा था। आरती ने उसके बालों में छोटी क्लिप लगाई। हाथ कांप रहे थे।
नीचे नेहा खड़ी थी। उसने घर की चाबी नहीं, दोनों हाथ जोड़े हुए थे—जैसे किसी मंदिर के बाहर खड़ी हो।
आरती घुटनों के बल बैठी।
“तुम अब नेहा मम्मी के साथ रहोगी। याद है, हमने बात की थी?”
“मैं वापस आऊंगी?”
“जब यह तुम्हारे लिए अच्छा होगा, यह घर खुला रहेगा।”
“आप रो क्यों रही हो?”
आरती मुस्कुराई। “क्योंकि मैं तुमसे बहुत प्यार करती हूं।”
“अगर मैं दूसरी मम्मी के घर जाऊं तो भी?”
“तभी तो सबसे ज्यादा।”
मीरा ने निखिल को देखा।
“पापा निखिल, आप भी चलोगे?”
निखिल के भीतर कुछ टूट गया। “मैं मिलने आऊंगा। जब भी तुम्हें मेरी जरूरत होगी, मैं रहूंगा।”
नेहा आगे आई। आरती और नेहा एक-दूसरे के सामने खड़ी रहीं। फिर नेहा ने आरती को गले लगा लिया। यह आसान क्षमा नहीं थी। यह एक युद्ध का अंत था, जिसमें कोई विजेता नहीं था। एक मां अपनी बेटी पा रही थी। दूसरी मां उसे सच के नाम पर छोड़ रही थी। और बच्ची अपने हाथी को सीने से लगाए खड़ी थी, बिना जाने कि तीनों वयस्क उसे पहली बार सचमुच सुरक्षित बना रहे हैं।
घर खाली हो गया।
मीरा की पीली कटोरी 19 दिन तक सिंक के पास पड़ी रही। आरती उसे धोकर अलमारी में नहीं रख पाती थी। छोटे तौलिये की खुशबू बाथरूम में रह गई। रात को निखिल को गलियारे में छोटे कदमों की आहट सुनाई देती, जो असल में नहीं होती थी। कमला देवी, जो पहले वंश का रोना रोती थीं, अब चुपचाप मीरा की तस्वीर के सामने दीपक जलातीं।
नेहा ने वादा निभाया। मुलाकातें जारी रहीं। पहले पार्क में, फिर घर पर, फिर त्योहारों पर। मीरा धीरे-धीरे “नेहा मम्मी” और “आरती मम्मी” कहने लगी। काउंसलर ने कहा, “मत रोकिए। उसका दिल वही नक्शा बना रहा है, जो बड़े लोग फाड़ चुके थे।”
एक दिन उसने चित्र बनाया। उसमें 2 घर थे, 2 दरवाजे, बीच में एक पेड़, और 4 लोग—नेहा, आरती, निखिल और वह। ऊपर उसने शिक्षिका की मदद से लिखा था, “अनाया।” नीचे छोटा-सा लिखा, “मीरा।”
निखिल ने पूछा, “2 दरवाजे क्यों?”
बच्ची ने कहा, “ताकि किसी को बाहर न जाना पड़े जब दूसरा अंदर आए।”
आरती बालकनी में जाकर रोई। इस बार उसके आंसुओं में सिर्फ दुख नहीं था। उनमें थोड़ी रोशनी भी थी।
2 साल बाद अनाया गुड़गांव में नेहा के साथ रहती है। वह स्कूल जाती है, नाच सीखती है, कभी-कभी रात को डरकर उठ जाती है। उसके कमरे का दरवाजा बंद नहीं किया जाता। वह छुट्टियों में मेहरा घर आती है। आरती अब भी उसके लिए खीर बनाती है। निखिल अब भी उसके टखने के चांद को देखता है और सोचता है कि दुनिया कभी-कभी कितनी क्रूर और कितनी दयालु एक साथ हो सकती है।
1 साल बाद आरती और निखिल ने 5 साल के एक लड़के, कबीर, को विधिवत गोद लिया। इस बार हर कागज 3 बार जांचा गया। कबीर के पास भी अपनी चोटें थीं। वह जूते पहनकर सोता था, ताकि कोई छोड़ दे तो भाग सके। आरती ने कभी उसे किसी की जगह नहीं कहा। कोई बच्चा किसी की जगह नहीं लेता। हर बच्चा अपनी जगह लेकर आता है।
एक रविवार अनाया ने कबीर को अपना पुराना कपड़े का हाथी दिया।
“ध्यान रखना,” उसने कहा, “इसने बहुत कुछ देखा है।”
कबीर ने उसे ऐसे पकड़ा जैसे कोई खजाना हो।
उस शाम आरती सचमुच हंसी। वैसी नहीं जैसी 7 साल पहले हंसा करती थी। यह हंसी घावों के साथ आई थी, पर सच्ची थी।
निखिल अक्सर उस रात को याद करता है, जब नहाते समय उसने मीरा की पीठ पर 5 निशान देखे थे। वही पल, जिसने उनका सुख तोड़ा, पर एक मां की खोई बेटी को रास्ता भी दिखाया।
परिवार सिर्फ कागज, नाम, कमरा और फोटो से नहीं बनता। परिवार कभी-कभी उस क्षण बनता है, जब कोई अपना सबसे प्यारा सपना छोड़ देता है, ताकि एक बच्चे की सच्चाई बची रहे।
एक रात अनाया ने निखिल से पूछा, “बुरे लोग मुझे सुलाना क्यों चाहते थे?”
निखिल बहुत देर चुप रहा। फिर बोला, “क्योंकि उन्हें डर था कि तुम सच बोल दोगी।”
अनाया ने खिड़की से बाहर देखा, फिर धीरे से कहा, “अब मैं जाग गई हूं।”
हाँ, वह जाग गई थी।
और शायद यही सबसे जरूरी अंत था—एक बच्ची, जिससे उसका नाम, उसकी मां और उसके पहले साल छीन लिए गए थे, अब 2 नामों, 2 घरों और 2 मांओं के बीच बड़ी हो रही थी। उसके दरवाजे पर ताला नहीं लगता था। उसकी आवाज़ दबाई नहीं जाती थी। और जिन निशानों को किसी ने फाइल से मिटा दिया था, वही निशान एक दिन सच की पहली लकीर बन गए थे।
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