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66 साल की माँ डायपर का पैकेट लेकर अस्पताल पहुँची तो 3 बच्चों ने सबके सामने कहा, “तुमने हमें शर्मिंदा कर दिया,” माँ बस चुपचाप जांच टेबल पर लेट गई, लेकिन स्क्रीन पर दाँत जैसी चीज दिखते ही डॉक्टर ने बच्चों को बाहर निकाल दिया… और फिर असली खतरा सामने आने लगा।

PART 1

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66 साल की सावित्री चौहान जब दिल्ली के लाजपत नगर की एक महिला क्लिनिक में बगल में नवजात बच्चों के डायपर का पैकेट दबाए घुसीं और बोलीं कि उन्हें आज बच्चा जनना है, तो उनके 3 बच्चे पूरे वेटिंग हॉल के सामने हँस पड़े।

बड़ी बेटी नेहा ने दुपट्टा चेहरे पर रखते हुए फुसफुसाया नहीं, लगभग चिल्लाया, “माँ, बस करो। हमारी इज्जत मिट्टी में मिला दी तुमने।”

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मंझला बेटा रोहित दाँत भींचकर बोला, “सीधे मनोचिकित्सक के पास ले जाना चाहिए था।”

सबसे छोटा अमन मोबाइल निकालकर वीडियो बनाने लगा। “परिवार वाले समूह में भेजूँगा। सबको पता चलेगा नानी माँ माँ बनने चली हैं।”

सावित्री ने कुछ नहीं कहा। उनके झुर्रियों भरे हाथ डायपर के पैकेट पर और कस गए। पेट काला सूती कुर्ता तानकर बाहर उभरा हुआ था। सफेद बाल जूड़े में बँधे थे। पैरों में पुरानी चप्पलें थीं। आसपास बैठी जवान गर्भवती औरतें उन्हें देख रही थीं, कुछ दया से, कुछ डर से, कुछ छिपी हँसी से।

लेकिन सावित्री पागल नहीं थीं।

या कम से कम पिछले 7 महीनों से वह खुद को यही समझाती रही थीं।

उनका घर पुरानी दिल्ली के शाहदरा में था, 2 मंजिला छोटा-सा मकान, जिसे उनके पति रमेश ने सिलाई मशीनों की दुकान चलाकर बनाया था। रमेश को गुजरे 5 साल हो चुके थे। उसके बाद घर में आवाजें कम होती गईं। नेहा आती तो बैंक पासबुक पूछती। रोहित आता तो बिल्डर की बात छेड़ता। अमन आता तो उधार माँगता या फ्रिज खाली कर जाता।

एक रात सावित्री रसोई में हल्दी वाला दूध गरम कर रही थीं, तभी पेट के भीतर जोर का धक्का लगा। गिलास हाथ से गिरा और फर्श पर दूध फैल गया।

उन्होंने काँपते हुए पेट पर हाथ रखा। भीतर कुछ जैसे पलटा था।

पहले सूजन हुई थी, फिर उल्टियाँ, भूख गायब, अजीब थकान। सरकारी डिस्पेंसरी के डॉक्टर ने जाँच देखकर कहा था, “कुछ हार्मोन अजीब हैं। गर्भ असंभव है, पर तुरंत महिला रोग विशेषज्ञ को दिखाइए।”

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पर सावित्री तुरंत नहीं गईं।

डर से नहीं।

उम्मीद से।

उन्हें लगा भगवान ने बुढ़ापे में कोई ऐसा साथ भेजा है जो उनसे जमीन के कागज नहीं माँगेगा, घर बेचने को नहीं कहेगा, उन्हें बोझ नहीं समझेगा। उन्होंने बाजार से पीला ऊन खरीदा। छोटी-छोटी जुराबें बुनीं। पुराना पालना साफ किया। मंदिर में दिया जलाकर पेट पर हाथ रखतीं और कहतीं, “अगर तू सच में आ रहा है, तो देर से सही, पर माँ तैयार है।”

पर मोहल्ला हँसने लगा। पड़ोसन ने फेसबुक पर लिख दिया, “हमारी गली में 66 साल की आंटी कहती हैं कि वह गर्भवती हैं, बच्चे तमाशा देख रहे हैं।”

उसी शाम नेहा, रोहित और अमन तूफान की तरह घर पहुँचे।

वे माँ की चिंता में नहीं आए थे।

वे बदनामी से डरकर आए थे।

अब क्लिनिक में डॉक्टर अद्वैत मेहरा ने सावित्री को बिस्तर पर लिटाया। ठंडा जेल पेट पर लगा। स्क्रीन पर धुंधली आकृतियाँ उभरीं। सावित्री ने धड़कन ढूँढी, चेहरा ढूँढा, कोई छोटा-सा हाथ ढूँढा।

कुछ नहीं था।

रोहित हँसा, “डॉक्टर साहब, अब नाटक खत्म?”

डॉक्टर ने जवाब नहीं दिया। उन्होंने मशीन की नली फिर घुमाई। फिर उनका चेहरा सख्त हो गया।

कमरे की हवा जैसे रुक गई।

उन्होंने स्क्रीन देखा, फिर सावित्री को, फिर उनके 3 बच्चों को।

“आप लोग बाहर जाइए।”

नेहा भड़क उठी, “हम इनके बच्चे हैं।”

डॉक्टर की आवाज पत्थर जैसी हो गई।

“इसीलिए कह रहा हूँ। अभी बाहर जाइए।”

PART 2

कोई नहीं हिला। तभी डॉक्टर ने नर्स को बुलाया और धीमी आवाज में कहा, “एम्स की आपातकालीन महिला सर्जरी टीम को फोन कीजिए। तुरंत रेफर करना होगा।”

सावित्री का गला सूख गया। “डॉक्टर साहब… मेरा बच्चा कहाँ है?”

नर्स ने स्क्रीन पर देखा और होंठों पर हाथ रख लिया।

काली छाया के भीतर सफेद, टेढ़ी-मेढ़ी रेखाएँ दिख रही थीं। जैसे दाँत। जैसे हड्डी। जैसे कोई डरावना सच।

अमन का मोबाइल नीचे झुक गया। नेहा के हाथ से डायपर का पैकेट गिरा। पीली जुराबें फर्श पर लुढ़क गईं।

डॉक्टर मेहरा ने बच्चों की तरफ मुड़कर कहा, “आपकी माँ भ्रम में नहीं थीं। उनकी जान खतरे में है। पेट में बहुत बड़ा अंडाशय का ट्यूमर है। यह कभी भी फट सकता है।”

रोहित का चेहरा पीला पड़ गया। “ऑपरेशन… आज?”

“अगर मेरी माँ होतीं, तो 1 घंटा भी इंतजार नहीं करता।”

अमन ने काँपती आवाज में पूछा, “इसका खर्च कितना आएगा?”

सावित्री ने आँखें बंद कर लीं।

वह सवाल चाकू से भी गहरा लगा।

PART 3

एम्स के गलियारे में स्ट्रेचर की आवाजें, दवाइयों की गंध और भागते कदमों के बीच सावित्री को एक सफेद कमरे में ले जाया गया। उनके पेट पर कपड़ा डाला गया, हाथ में सुई लगी, और नर्स ने नाम पूछा।

“सावित्री चौहान।”

“उम्र?”

“66।”

“परिजन?”

सावित्री ने दरवाजे की तरफ देखा। बाहर उनके 3 बच्चे खड़े थे। नेहा किसी से फोन पर तेज आवाज में कह रही थी, “हाँ, अभी ऑपरेशन है, पर बाद में कागज करवाने ही पड़ेंगे।” रोहित किसी बिल्डर को संदेश भेज रहा था। अमन चुप था, पर उसकी नजर भी माँ पर नहीं, फर्श पर थी।

सावित्री ने धीरे से कहा, “परिजन हैं… पर अपने नहीं लगते।”

थोड़ी देर बाद एक सामाजिक कार्यकर्ता कमरे में आई। उसका नाम फराह अंसारी था। आवाज शांत थी, पर आँखें झूठ पकड़ना जानती थीं।

“सावित्री जी, क्या आपने हाल में कोई कागज साइन किए हैं?”

सावित्री का दिल धक से रह गया।

उन्हें याद आया, 2 हफ्ते पहले नेहा मिठाई का डिब्बा लेकर आई थी। बहुत दिनों बाद उसने माँ के पैर दबाए थे। बोली थी, “माँ, अस्पताल में जरूरत पड़े तो मुझे अधिकार चाहिए। बस सुविधा के लिए है।”

सावित्री ने बिना पढ़े 4 पन्नों पर दस्तखत कर दिए थे।

अब उस मिठाई का स्वाद जहर जैसा याद आया।

“हाँ,” उन्होंने फुसफुसाकर कहा, “मेरी बेटी लाई थी।”

फराह ने कलम रोक दी। “घर आपके नाम है?”

शाहदरा का वह घर उनकी आँखों में तैर उठा। वही घर जहाँ रमेश रात-रात भर सिलाई मशीन ठीक करते थे। जहाँ नेहा ने पहली बार स्कूल ड्रेस पहनी थी। जहाँ रोहित की पतंगें छत पर अटकती थीं। जहाँ अमन बुखार में माँ की गोद से उतरता नहीं था। वही घर अब बच्चों की नजर में घर नहीं, जमीन था।

बिल्डर 1 करोड़ 20 लाख तक बोल चुके थे।

नेहा कहती थी, “माँ, इतने बड़े घर में अकेली क्या करोगी?”

रोहित कहता था, “मकान पुराना है, गिर जाएगा।”

अमन कहता था, “सबको हिस्सा मिल जाएगा तो जिंदगी बन जाएगी।”

पर कोई यह नहीं पूछता था कि सावित्री की जिंदगी कहाँ जाएगी।

ऑपरेशन से पहले नेहा अंदर आई। माथे पर चिंता का रंग था, पर आँखों में जल्दी थी।

“माँ, डरना मत। सब ठीक होगा।”

सावित्री ने उसकी कलाई पकड़ ली।

“तूने मुझसे क्या साइन करवाया था?”

नेहा का चेहरा तन गया। “अभी ये बात करने का समय नहीं है।”

“यही समय है। बताओ।”

रोहित भी आ गया। अमन दरवाजे पर रुका रहा।

नेहा ने गहरी साँस ली। “माँ, तुम्हारी हालत ठीक नहीं थी। तुम पेट से बात करती थीं। पालना सजाया था। मोहल्ले में हमारी हँसी उड़ रही थी। हमें तुम्हारी सुरक्षा करनी थी।”

“मेरी सुरक्षा या घर की?”

नेहा चुप हो गई।

स्ट्रेचर चल पड़ा। छत की लाइटें सावित्री की आँखों के ऊपर सफेद धारियों की तरह भागने लगीं। उन्होंने पहली बार अपने बच्चों के लिए प्रार्थना नहीं की। उन्होंने अपने लिए की।

“हे भगवान, मुझे बचा लेना। इस बार मुझे अपने ही बच्चों से बचा लेना।”

ऑपरेशन 5 घंटे चला।

जब सावित्री को होश आया, पेट पर भारी पट्टी थी और भीतर एक अजीब खालीपन था। जैसे शरीर से बीमारी ही नहीं, कोई भ्रम भी निकाल दिया गया हो।

डॉक्टर मेहरा पास बैठे थे।

“ऑपरेशन सफल रहा। बहुत बड़ा टेराटोमा था। उसमें चर्बी, बाल, कैल्शियम और दाँत जैसी संरचनाएँ थीं। अगर देर होती तो जान जा सकती थी। नमूना जाँच के लिए भेजा है, पर अभी सबसे जरूरी बात यह है कि आप समय पर आ गईं।”

सावित्री के आँसू बह निकले।

वह उस बच्चे के लिए नहीं रो रही थीं जो कभी था ही नहीं। वह इसलिए रो रही थीं कि उन्होंने महीनों तक बीमारी को प्यार समझकर सहलाया था।

“मेरे बच्चों ने पूछा मैं कैसी हूँ?”

डॉक्टर ने नजरें झुका लीं।

बस इतना काफी था।

फिर वह बोले, “उन्होंने पूछा आप कब दस्तखत करने लायक होंगी।”

सावित्री ने दीवार की तरफ मुँह फेर लिया।

वह रोईं, पर उस रोने में पहली बार कमजोरी कम और जागना ज्यादा था।

अगले दिन फराह अंसारी एक बुजुर्ग आदमी को लेकर आईं। वह जगदीश काका थे, उनके पुराने पड़ोसी, जो रमेश के साथ चाय पीते हुए राजनीति पर बहस किया करते थे।

“बहू,” जगदीश काका ने काँपते हाथ से एक भूरा लिफाफा निकाला, “रमेश ने मरने से पहले यह मुझे दिया था। कहा था, अगर बच्चे कभी सावित्री को बेअक्ल साबित करने लगें, तब देना।”

सावित्री की साँस अटक गई।

लिफाफे में संपत्ति के असली कागजों की प्रतियाँ थीं, कुछ बैंक रिकॉर्ड, और रमेश की लिखी चिट्ठी।

“सावी, बच्चे हमारे हैं, पर हर बच्चा न्याय करना नहीं सीखता। मैंने उनकी आँखों में घर की दीवारें नहीं, रुपयों की चमक देखी है। अगर वे कभी तेरे जीते-जी तेरी जगह बाँटने लगें, तो याद रखना—यह मकान हमारी मेहनत से बना है, उनकी अधीरता से नहीं।”

सावित्री ने चिट्ठी सीने से लगा ली।

रमेश मरकर भी उन्हें बचाने आया था।

2 दिन बाद नेहा, रोहित और अमन कमरे में आए। नेहा के हाथ में फूल थे, वैसे ही जैसे पेट्रोल पंप के पास मिलते हैं, जल्दी में खरीदे हुए। रोहित ने इस्त्री की हुई शर्ट पहनी थी। अमन का मोबाइल जेब में बंद था।

“माँ,” नेहा ने नरमी ओढ़कर कहा, “हम तुम्हारे भले के लिए आए हैं।”

सावित्री तकिए से टिककर बैठीं। उनकी आँखें कमजोर थीं, पर आवाज साफ थी।

“नहीं। तुम घर के लिए आए हो।”

कमरे में जैसे कोई अदृश्य चीज टूट गई।

नेहा ने होंठ भींचे। “तुम फिर गलत सोच रही हो।”

“मेरी सोच ऑपरेशन से बच गई।”

रोहित बीच में बोला, “माँ, हम सब डर गए थे।”

“इतना नहीं कि पूछते मैं जिंदा हूँ या नहीं। इतना जरूर कि पूछो मैं कब साइन करूँगी।”

अमन की आँखें भर आईं।

उसी समय फराह अंदर आईं, उनके साथ अस्पताल का कानूनी सलाहकार था।

सलाहकार ने फाइल खोली। “सावित्री जी, आपकी बेटी द्वारा लाए गए कागजों की जाँच हुई है। उनमें आपके खातों की पूर्ण पावर ऑफ अटॉर्नी और आपकी मानसिक क्षमता पर सवाल उठाने वाला आवेदन शामिल है।”

अमन चौंक गया। “दीदी, तुमने कहा था बस अस्पताल के बिल के लिए है।”

रोहित ने नेहा की तरफ देखा। “तुमने हमसे भी पूरा सच नहीं कहा?”

नेहा का चेहरा कठोर हो गया।

“सच? सच यह है कि माँ 66 साल की उम्र में खुद को गर्भवती समझ रही थीं। पालना लगा रखा था। डायपर खरीद रही थीं। मोहल्ले वाले हँस रहे थे। क्या मैं तमाशा देखती रहती? घर की कीमत 1 करोड़ 20 लाख है। वह अकेली बैठी सड़ते मकान से चिपकी रहें और हम सब बर्बाद होते रहें?”

सलाहकार ने शांत स्वर में कहा, “मकान पहले उसकी मालिक का है। बाकी लोगों की उम्मीद बाद में आती है।”

सावित्री ने नेहा को देखा। सामने वह बच्ची नहीं थी जो कभी माँ की साड़ी पकड़कर सोती थी। सामने एक अधीर औरत थी, जिसे माँ से ज्यादा मकान का नक्शा याद था।

“नेहा,” सावित्री ने कहा, “बूढ़ी माँ को संभालना कठिन है, मानती हूँ। पर जिंदा माँ को कागजों में पागल लिखना अपराध है।”

नेहा ने नजरें फेर लीं।

अमन धीरे से बोला, “माँ, मैं गलत था। मैंने वीडियो बनाया। मुझे शर्म आती है।”

सावित्री ने आँखें बंद कीं। “शर्म अच्छी शुरुआत है। माफी नहीं।”

रोहित ने फुसफुसाया, “माँ, मुझे लगा नेहा संभाल रही है।”

“नहीं रोहित,” सावित्री बोलीं, “तुम्हें लगा न देखने से तुम्हारा हिस्सा साफ रहेगा।”

कमरे में कोई बहस नहीं बची।

कागजों को रोक दिया गया। अस्पताल की सामाजिक टीम ने कानूनी सहायता जोड़ी। बाद में स्वतंत्र जाँच हुई। साबित हुआ कि सावित्री बीमारी में थीं, पर अपने घर और निर्णयों को समझने की क्षमता रखती थीं। उनकी कथित “पागलपन” की बात बच्चों ने बढ़ा-चढ़ाकर लिखी थी ताकि संपत्ति पर नियंत्रण मिल सके।

पावर ऑफ अटॉर्नी रद्द हुई।

नेहा को चेतावनी मिली। आगे सावित्री के नाम पर कोई भी प्रक्रिया उनकी उपस्थिति, स्वतंत्र सलाह और रिकॉर्डेड सहमति के बिना नहीं हो सकती थी।

यह फिल्मी बदला नहीं था।

कोई थप्पड़ नहीं पड़ा। कोई जेल की गाड़ी नहीं आई। कोई कैमरा नहीं चमका।

बस लालच के सामने एक दरवाजा बंद हो गया।

सावित्री 21 दिन बाद घर लौटीं।

मोहल्ले ने इस बार हँसकर नहीं, सिर झुकाकर उनका स्वागत किया। पड़ोस की रेखा ने दलिया भेजा। जगदीश काका ने पौधों में पानी दिया था। ऊपर वाली किराएदार लड़की ने फ्रिज पर अपना नंबर चिपका दिया था, “कभी भी आवाज दे देना।”

वे लोग भी आए जिन्होंने पहले ताने मारे थे।

“गलती हो गई, आंटी,” किसी ने कहा।

सावित्री ने बस इतना कहा, “हाँ, हुई थी।”

उन्होंने किसी को झूठी सांत्वना नहीं दी। सारी जिंदगी दूसरों की शर्म ढकते-ढकते उनकी अपनी देह कट चुकी थी।

बैठक में वह पालना अभी भी रखा था। पीला कपड़ा, छोटी जुराबें, धुली चादर। 3 दिन तक सावित्री उसे देखती रहीं। चौथे दिन सुबह उन्होंने छड़ी के सहारे उठकर पालना खाली किया। उसमें तुलसी, पुदीना, गेंदे और एक छोटा गुलाब लगा दिया।

धूप खिड़की से आई और पालने पर पड़ गई।

जगदीश काका बोले, “लगता है, फिर भी कुछ पैदा हुआ है।”

सावित्री ने पूछा, “क्या?”

काका मुस्कुराए। “तुम।”

अमन सबसे पहले वापस आया। वह रविवार को संतरे और चायपत्ती लेकर आया। दरवाजे पर खड़ा रहा, जैसे अदालत में खड़ा अपराधी।

“माँ, आसान माफी माँगने नहीं आया। पूछने आया हूँ कि डरपोक बेटा सुधार कहाँ से शुरू करे।”

सावित्री ने बहुत देर तक उसे देखा।

फिर दरवाजा खोल दिया।

“मोबाइल बाहर रख। संतरे छील। और सुनना सीख।”

अमन ने वैसा ही किया।

उस दिन सावित्री ने उसे बताया कि अकेलापन कैसा होता है। कैसे त्योहार पर खाली घर में दीया जलाना भी आवाज करता है। कैसे माँ अपने बच्चों के कदमों की आहट पहचानती रहती है, पर कभी-कभी महीनों तक कोई नहीं आता। अमन रोया। इस बार उसने चेहरा नहीं छिपाया।

रोहित 1 महीने बाद आया। हाथ में बाथरूम की पकड़ने वाली रॉड, दवाइयाँ और फल थे।

“माँ, मुझे समझ नहीं आया कि मैं कहाँ गलत हुआ।”

सावित्री ने चाय छानी। “जहाँ तुमने सुविधा को सच से बड़ा मान लिया।”

रोहित ने धीरे से कहा, “मैंने तुम्हें लगभग खो दिया।”

सावित्री ने उसकी तरफ देखा। “नहीं। तुम लोगों ने मुझे लगभग सौंप दिया था।”

यह वाक्य उसके भीतर धँस गया।

नेहा नहीं आई।

कई महीने बाद सावित्री उससे एक कानूनी दफ्तर में मिलीं। नेहा सज-धजकर आई थी, साथ में वकील था। उसने कहा कि वह सिर्फ माँ की सुरक्षा चाहती थी। उसने कहा कि 66 साल की औरत अगर खुद को गर्भवती माने तो परिवार को निर्णय लेना पड़ता है।

सावित्री ने अपने थैले से पीली जुराबें निकालीं और मेज पर रख दीं।

“मैं अकेली थी। बीमार थी। मेरा शरीर अंदर से चिल्ला रहा था। मैंने उसे उम्मीद समझ लिया। पर तुम लोगों ने मेरी पीड़ा में शर्म देखी, मेरी बीमारी में पागलपन देखा, और मेरे जिंदा रहते मेरे घर में हिस्सा देखा।”

कमरा शांत हो गया।

सावित्री ने आगे कहा, “इन जुराबों में बच्चा नहीं आया। पर इन्होंने मुझे बता दिया कि किसे मेरी धड़कन सुननी थी और किसे ताला खुलने का इंतजार था।”

उस दिन नेहा पहली बार जवाब नहीं दे पाई।

सावित्री ने बाद में अपनी वसीयत बदल दी। घर बच्चों को नहीं मिलेगा। उनकी मृत्यु के बाद वह घर इलाके की बुजुर्ग और अकेली महिलाओं के लिए दिनभर का आश्रय बनेगा—उन औरतों के लिए जिन्हें दर्द बताने पर नाटकबाज कहा जाता है, जिन्हें उम्र के नाम पर चुप कराया जाता है, जिन्हें परिवार अपनी सुविधा से पागल और समझदार घोषित करता रहता है।

उन्होंने उसका नाम रखा—“पीली जुराबें।”

लोगों ने कहा, नाम अजीब है।

सावित्री ने कहा, “अजीब चीजें ही कभी-कभी जान बचाती हैं।”

अब शाम को वह खिड़की के पास बैठतीं। पालने में तुलसी महकती। पुदीने की पत्तियाँ हवा में काँपतीं। घर की दीवारें पुरानी थीं, पर अब उनमें डर नहीं बसता था। बिल्डर के पत्र आते रहे। नेहा का फोन बहुत कम आया। रोहित कभी-कभी मरम्मत कर जाता। अमन हर रविवार आता और मोबाइल जेब में रखकर रसोई में बैठता।

सावित्री की जिंदगी पहले जैसी नहीं रही।

और उन्हें वैसी चाहिए भी नहीं थी।

उन्होंने एक झूठी उम्मीद खोई, शरीर का एक हिस्सा खोया, बच्चों पर अंधा भरोसा खोया। पर उन्होंने कुछ बड़ा पा लिया—अपने दर्द पर भरोसा करने का अधिकार।

एक शाम दवा लेकर लौटते हुए उन्होंने मेडिकल स्टोर की खिड़की में वैसा ही डायपर का पैकेट देखा। पहले यह दृश्य उन्हें तोड़ देता। इस बार वह रुकीं। पेट की सिलाई पर हाथ रखा। हल्की मुस्कान आई।

सचमुच कुछ जन्मा था।

बच्चा नहीं।

भ्रम नहीं।

एक औरत, जो अब अपने अस्तित्व के लिए बच्चों की इजाजत नहीं माँगती थी।

रात को उन्होंने दरवाजा बंद किया, तुलसी को पानी दिया और पालने के सामने बैठ गईं। उन्हें वह स्क्रीन याद आई, जिसमें सफेद दाँत चमके थे। उन्हें वह हँसी याद आई, जिसने उन्हें पागल कहा था। उन्हें वह आवाज याद आई, जिसने कहा था, “आपकी माँ खतरे में हैं।”

और फिर सावित्री को पूरी बात समझ आई।

उनके पेट ने बच्चा नहीं छिपाया था।

उसने वह चीख छिपाई थी, जिसने उन्हें बचा लिया।

अब जब कोई घंटी बजाता, सावित्री भागकर दरवाजा नहीं खोलतीं। पहले खिड़की से देखतीं। फिर साँस लेतीं। फिर तय करतीं।

दरवाजा तभी खुलता, जब वह चाहतीं।

क्योंकि वह घर अब भी उनका था।

और वह खुद भी।

Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.