
PART 1
—तुम्हारे पति ने कागज़ों पर हस्ताक्षर कर दिए हैं… प्रसव में तुम्हें कुछ हुआ, तो बच्ची इस परिवार की होगी—कंबल के नीचे काँपती काव्या ने फुसफुसाया।
अर्जुन सिंघानिया को लगा जैसे गुरुग्राम के उनके आलीशान घर का संगमरमर उसके पैरों के नीचे टूट गया हो।
वह कमरे में यह सोचकर आया था कि काव्या शायद उससे नाराज़ है। पिछले 6 दिनों से वह बिस्तर से नहीं उठी थी। उसने खाना छोड़ दिया था, प्रसूति विशेषज्ञ से मिलने से इनकार कर दिया था और खिड़कियाँ तक नहीं खुलने दी थीं। अर्जुन को लगा था कि गर्भावस्था के 6वें महीने में उसका स्वभाव चिड़चिड़ा हो गया है।
करोड़ों की निर्माण कंपनी चलाने वाला अर्जुन नकली दस्तावेज़ पहचान सकता था, पर अपनी पत्नी की आँखों में छिपी दहशत नहीं पहचान पाया।
काव्या दिल्ली की किसी अमीर बिरादरी से नहीं आई थी। शादी से पहले वह जयपुर में अपनी माँ के साथ छोटी-सी मिठाई की दुकान संभालती थी। उसके हाथों में हमेशा इलायची और घी की खुशबू रहती। वह ऊँचे खानदान, महँगी गाड़ियों और दिखावटी पार्टियों से प्रभावित नहीं होती थी।
यही बात अर्जुन को उससे प्रेम करने पर मजबूर कर गई थी।
और यही बात उसकी माँ सावित्री देवी को सबसे अधिक चुभती थी।
सावित्री उसे कभी बहू नहीं कहती थीं। रिश्तेदारों के सामने मुस्कराकर बोलतीं—“वह जयपुर वाली लड़की।”
अर्जुन का चचेरा भाई राघव परिवार का वकील था। काव्या ने शादी के कुछ महीने बाद कहा था—
—राघव लोगों की बात नहीं सुनता, अर्जुन। वह उनकी कीमत लगाता है।
अर्जुन हँस दिया था।
अब काव्या ने पैर हिलाने की कोशिश की, तो उसके मुँह से दर्द भरी चीख निकल गई।
—किसने कहा कि तुम बिस्तर से मत उठना?—अर्जुन ने पूछा।
—वही परिचारिका… जिसे माँजी ने भेजा था। उसने कहा, चलने से बच्चा मर सकता है।
अर्जुन को याद आया कि लखनऊ की यात्रा पर जाते समय उसकी माँ ने गर्भवती बहू की देखभाल के लिए निजी परिचारिका भेजने की बात कही थी।
उसने इसे माँ की चिंता समझा था।
काँपते हाथों से उसने कंबल उठाया।
काव्या की दोनों टाँगें सूजी हुई थीं। टखनों के चारों ओर नीले-काले निशान थे। घुटनों पर उँगलियों जैसे दबाव के चिह्न दिखाई दे रहे थे और त्वचा के नीचे उभरी नसें लाल होकर जल रही थीं।
—यह किसने किया?
काव्या ने चेहरा ढक लिया।
अर्जुन ने तुरंत आपातकालीन सहायता को फोन किया।
तभी काव्या उसका हाथ पकड़कर रो पड़ी—
—अस्पताल मत ले जाओ। उन्होंने कहा है, वहाँ से मैं वापस नहीं आऊँगी।
—किसने कहा?
—माँजी और राघव ने। उन्होंने तुम्हारे हस्ताक्षर दिखाए। कहा, अगर मुझे कुछ हुआ तो बच्चा उनके पास रहेगा। अर्जुन… वादा करो, वे मेरी बच्ची नहीं ले जाएँगे।
—मैंने ऐसा कुछ नहीं लिखा। कोई तुम्हें छू भी नहीं सकेगा।
कुछ मिनट बाद चिकित्साकर्मी काव्या को लेकर नीचे पहुँचे।
मुख्य द्वार के पास सावित्री देवी मोतियों का हार पहने खड़ी थीं। उनके बगल में राघव था।
उसके हाथ में काले रंग की मोटी फाइल थी।
और फाइल के ऊपर अर्जुन के नाम वाला वही दस्तावेज़ रखा था, जिस पर उसकी हूबहू दिखने वाली हस्ताक्षर मौजूद थी।
PART 2
अस्पताल में जाँच के बाद चिकित्सक ने बताया कि काव्या की टाँगों में रक्त के थक्के बनने लगे थे। कुछ घंटे और बीतते, तो उसकी और बच्चे दोनों की जान जा सकती थी।
चोटों के निशान सामान्य नहीं थे।
किसी ने उसे पकड़कर रोका था।
अर्जुन का फोन लगातार बज रहा था। फिर राघव का संदेश आया—
“अस्पताल में कुछ मत बोलना। परिवार की इज्जत का सवाल है।”
अर्जुन ने भवन सुरक्षा प्रमुख इमरान को पिछले 10 दिनों की सारी दृश्य रिकॉर्डिंग सुरक्षित करने का आदेश दिया।
रिकॉर्डिंग में सावित्री, राघव और परिचारिका काव्या को कमरे में धकेलते दिखाई दिए। दूसरी रिकॉर्डिंग में काव्या बाहर निकलने का प्रयास कर रही थी और राघव उसका रास्ता रोक रहा था।
इमरान ने बताया कि परिचारिका का पंजीकरण 4 वर्ष पहले रद्द हो चुका था।
फिर उसने एक दस्तावेज़ दिखाया, जो राघव के कार्यालय से सावित्री को भेजा गया था।
शीर्षक था—“मातृ संकट की स्थिति में शिशु संरक्षण।”
नीचे अर्जुन की नकली हस्ताक्षर थी।
जब सावित्री अस्पताल पहुँचीं, उन्होंने ठंडे स्वर में कहा—
—वह लड़की केवल हमारे वंश के बच्चे को गर्भ में रख रही है।
अर्जुन ने उनकी ओर देखते हुए कहा—
—पुलिस को बुलाओ।
तभी इमरान ने धीमे स्वर में बताया—
—साहब, शयनकक्ष से एक छिपा हुआ कैमरा भी मिला है।
PART 3
छिपा हुआ कैमरा सजावटी पुस्तकों के बीच रखा गया था। उसका मुँह ठीक उस बिस्तर की ओर था जहाँ काव्या सोती थी, कपड़े बदलती थी और रात में अपने अजन्मे बच्चे से बातें करती थी।
अर्जुन ने उसे दीवार पर दे मारने के लिए हाथ उठाया, लेकिन इमरान ने रोक लिया।
—यह सबूत है, साहब।
उस एक शब्द ने अर्जुन को वहीं जमा दिया।
पुलिस ने घर को जाँच के लिए बंद कर दिया। तलाशी में काव्या का मोबाइल अलमारी के पीछे मिला। उसे बंद करके सावित्री की रेशमी ओढ़नी में लपेटा गया था। रसोई के कूड़ेदान में दवाइयों के फटे हुए पत्ते मिले। अतिथि कक्ष के स्नानघर से नींद की गोलियों की एक शीशी मिली, जिस पर सावित्री के घर में काम करने वाली महिला का नाम लिखा था।
पर सबसे भयावह चीज काव्या की पानी की बोतल से मिली।
उसमें हल्की मात्रा में नींद लाने वाली दवा मिलाई गई थी।
चिकित्सकों के अनुसार दवा इतनी अधिक नहीं थी कि उसे तुरंत बेहोश कर दे, लेकिन लगातार दिए जाने पर वह सुस्त, भ्रमित और निर्भर बनी रहती। उसे अपने शरीर पर विश्वास न रहता। वह सोचती कि उसकी कमजोरी गर्भावस्था के कारण है।
काव्या ने अस्पताल के बिस्तर पर लेटे हुए यह बात सुनी, तो उसका हाथ अनायास पेट पर चला गया।
—वे मुझे पागल साबित करना चाहते थे—उसने कहा।
अर्जुन उत्तर नहीं दे पाया।
—तुम्हारी माँ कई दिनों से कह रही थीं कि मैं वहम करती हूँ। परिचारिका हर सुबह पूछती थी कि क्या मुझे आवाजें सुनाई देती हैं। राघव जानबूझकर ऐसे सवाल करता था, जैसे मैं अपनी बात भूल रही हूँ। फिर वे दोनों एक-दूसरे को देखकर मुस्कराते थे।
उसकी आवाज काँप रही थी, मगर अब उसमें डर से अधिक क्रोध था।
—जब मैंने फोन माँगा, माँजी ने कहा कि तुमने मुझे किसी से बात न करने का आदेश दिया है। जब मैंने बाहर जाने की कोशिश की, परिचारिका ने मेरे टखने पकड़ लिए। राघव ने दरवाजा बंद कर दिया। मैं चीखी, तो उन्होंने आवाज बढ़ाकर भजन चला दिया।
अर्जुन की आँखों के सामने अपने ही घर की तस्वीर बदल गई। जिस घर को उसने काव्या की सुरक्षा के लिए चुना था, वही उसके लिए कैदखाना बन गया था।
—तुमने पहले मुझे क्यों नहीं बताया?—उसके मुँह से अनायास निकल गया।
काव्या ने उसकी ओर ऐसा देखा कि वह अपनी ही बात से शर्मिंदा हो गया।
—मैंने बताया था।
अर्जुन चुप हो गया।
काव्या ने याद दिलाया कि शादी के बाद पहली दीपावली पर सावित्री ने रिश्तेदारों के सामने उसके मायके से आए उपहारों को “सस्ती चीजें” कहा था। उसने अर्जुन से कहा था कि यह केवल अपमान नहीं, बल्कि उसे नीचा दिखाने की शुरुआत है।
अर्जुन ने समझाया था—“माँ का स्वभाव ऐसा ही है।”
जब सावित्री ने घर के कर्मचारियों को आदेश दिया कि काव्या की माँ को मुख्य बैठक में न बैठाया जाए, तब भी काव्या ने विरोध किया था।
अर्जुन ने कहा था—“बात बढ़ाने से क्या मिलेगा?”
जब पहली बार गर्भपात हुआ, सावित्री ने अस्पताल से लौटते समय काव्या के सामने कहा था—
—हमारे परिवार में कभी किसी स्त्री का शरीर इतना कमजोर नहीं रहा।
काव्या उस रात रोती रही थी।
अर्जुन ने उसे गले लगाया था, लेकिन अपनी माँ से प्रश्न नहीं किया था।
अब उसे समझ आया कि हर बार उसका मौन सावित्री के लिए अनुमति बन गया था।
—तुम ठीक कह रही हो—उसने सिर झुकाकर कहा।—तुमने बताया था। मैंने सुनने के बजाय हर बार तुम्हें समझौता करने को कहा।
काव्या की आँखों से आँसू बह निकले।
—मैं उनसे अकेले नहीं लड़ सकती थी। मुझे अपने पति की जरूरत थी। मगर तुम हर बार उनके बेटे बन गए।
वह वाक्य अर्जुन के भीतर कहीं गहरे उतर गया।
उसने सफाई नहीं दी। कोई व्यापारिक यात्रा, कोई बैठक, कोई पारिवारिक दबाव उसके अपराधबोध को छोटा नहीं कर सकता था।
—इस बार मैं तुम्हारे सामने खड़ा नहीं होऊँगा—उसने धीमे स्वर में कहा।—तुम्हारे साथ खड़ा रहूँगा। चाहे इसके लिए मुझे अपने पूरे परिवार के विरुद्ध क्यों न जाना पड़े।
काव्या ने उसकी ओर देखा, लेकिन तुरंत विश्वास नहीं किया।
विश्वास कोई बत्ती नहीं था जिसे क्षमा माँगते ही दोबारा जलाया जा सके।
अगली सुबह समाचार माध्यमों में खबर फैल गई कि सिंघानिया परिवार की बहू को “गर्भावस्था से जुड़ी मानसिक परेशानी” के कारण अस्पताल में भर्ती किया गया है। कुछ समाचार पृष्ठों ने लिखा कि काव्या संपत्ति पर अधिकार पाने के लिए परिवार को बदनाम कर रही है।
टिप्पणियों में लोग उसे लालची, नाटक करने वाली और अस्थिर कह रहे थे।
राघव ने पहले ही कहानी तैयार कर रखी थी।
अर्जुन अस्पताल की भोजनशाला में बैठा हर पंक्ति पढ़ता रहा। उसे समझ आया कि साजिश केवल काव्या को कमरे में बंद करने की नहीं थी। वे उसकी आवाज को पहले ही अविश्वसनीय बनाना चाहते थे, ताकि सच बोलने पर भी कोई उसका विश्वास न करे।
उसी दिन अर्जुन ने अपनी कंपनी की ओर से सार्वजनिक वक्तव्य जारी किया।
उसमें साफ लिखा था कि उसकी पत्नी के विरुद्ध जाली हस्ताक्षर, गैरकानूनी निगरानी, दवाइयों के दुरुपयोग, धमकी और चिकित्सकीय सहायता रोकने की शिकायत दर्ज कराई गई है। काव्या के मानसिक स्वास्थ्य पर फैलाया गया कोई भी आरोप झूठा है।
उसने सावित्री या राघव का नाम नहीं लिखा।
फिर भी पूरे शहर को समझ आ गया कि तीर किस ओर था।
कंपनी के निदेशक मंडल में हड़कंप मच गया। कई वरिष्ठ सदस्यों ने अर्जुन को फोन कर परिवार की प्रतिष्ठा बचाने की सलाह दी। उसके मामा ने कहा—
—घर की बात घर में सुलझानी चाहिए थी।
अर्जुन ने पूछा—
—अगर आपकी बेटी को दवा देकर बंद किया जाता, तब भी आप यही कहते?
दूसरी ओर कुछ रिश्तेदार सावित्री के समर्थन में आ गए। उनका कहना था कि उन्होंने केवल अपने होने वाले पोते या पोती की सुरक्षा के लिए कठोर कदम उठाए थे।
अर्जुन ने पहली बार महसूस किया कि परिवार में क्रूरता अक्सर प्रेम का नाम पहनकर चलती है।
राघव उससे अस्पताल के प्रार्थना कक्ष में मिला।
—तुम समझ नहीं रहे हो कि क्या कर रहे हो—उसने धीमे स्वर में कहा।—अगर मैं फँसा, तो तुम्हारी माँ भी फँसेगी। और अगर वह बोलीं, तो कंपनी के पुराने मामले खुलेंगे। जमीन के समझौते, नेताओं को दिए गए चंदे, अधूरे निर्माण की स्वीकृतियाँ… सब बाहर आ सकता है।
—आने दो।
राघव ने अविश्वास से उसकी ओर देखा।
—तुम एक स्त्री के लिए अपना पूरा खानदान मिटा दोगे?
—वह “एक स्त्री” मेरी पत्नी है।
—पत्नी दूसरी भी मिल सकती है। खानदान दोबारा नहीं मिलता।
अर्जुन उसके इतना निकट गया कि राघव की आवाज रुक गई।
—यही सोच तुम्हें अपराधी बनाती है। तुम रिश्तों को बदलने योग्य सामान समझते हो। मेरी पत्नी की जान खतरे में थी, और तुम नाम बचाने की बात कर रहे हो।
राघव ने आखिरी कोशिश की—
—तुम्हारी माँ ने केवल एक सुरक्षा दस्तावेज़ बनवाने को कहा था। चोटों का आदेश किसी ने नहीं दिया।
—तो फिर जाली हस्ताक्षर क्यों किए?
राघव ने नजरें फेर लीं।
—क्योंकि काव्या हस्ताक्षर नहीं कर रही थी।
—और मेरा नाम इस्तेमाल करके उसे डराना आसान था?
कोई उत्तर नहीं आया।
अर्जुन ने दरवाजा खोला। बाहर 2 पुलिस अधिकारी प्रतीक्षा कर रहे थे।
राघव को वहीं पूछताछ के लिए ले जाया गया।
कुछ दिनों बाद काव्या की हालत सुधरने लगी। चिकित्सकों ने उसे हल्का चलने की अनुमति दी। हर कदम पर उसकी टाँगों में दर्द उठता, लेकिन वह सहारा लेकर आगे बढ़ती।
अर्जुन पास रहता, पर बिना पूछे उसे छूता नहीं था।
एक शाम चिकित्सक जाँच के बाद मुस्कराईं।
—बच्ची स्वस्थ है। धड़कन मजबूत है।
अर्जुन ने चौंककर काव्या की ओर देखा।
—बच्ची?
काव्या की आँखों में महीनों बाद हल्की चमक आई।
—हाँ, बेटी है।
अर्जुन कुर्सी पर बैठ गया। उसने दोनों हाथों से चेहरा ढक लिया। दुनिया उसे एक कठोर व्यापारी मानती थी, लेकिन उस क्षण उसके कंधे बच्चे की तरह काँप रहे थे।
—मैंने उसे देखे बिना ही लगभग खो दिया—उसने कहा।
काव्या ने उत्तर नहीं दिया। वह जानती थी कि यह केवल सावित्री की क्रूरता का परिणाम नहीं था। अर्जुन के लंबे मौन ने भी उस खतरे को बड़ा होने दिया था।
जाँच आगे बढ़ी, तो परिचारिका सीमा पकड़ी गई। पूछताछ में उसने स्वीकार किया कि सावित्री ने उसे नकद पैसे दिए थे। उसे काव्या की गतिविधियों पर नजर रखनी थी, फोन छीनना था और उसे विश्वास दिलाना था कि चलने से गर्भपात हो सकता है।
सीमा ने यह भी बताया कि योजना काव्या को मारने की नहीं थी।
योजना उससे भी अधिक ठंडी थी।
सावित्री चाहती थीं कि काव्या प्रसव तक पूरी तरह उन पर निर्भर हो जाए। यदि कोई चिकित्सकीय संकट आता, तो राघव के बनाए दस्तावेज़ों के आधार पर उसे मानसिक रूप से अयोग्य घोषित करने का प्रयास किया जाता। बच्चे की अस्थायी देखभाल सावित्री को मिलती। बाद में उसी स्थिति को स्थायी बनाने के लिए परिवार के प्रभाव का उपयोग किया जाता।
—उन्हें लगता था कि बहू चली भी जाए, तो बच्चा घर में रहना चाहिए—सीमा ने कहा।
पुलिस को राघव के संगणक से कई प्रारूप मिले। एक में लिखा था कि काव्या “भावनात्मक रूप से अस्थिर, आत्मघाती विचारों से ग्रस्त और शिशु की देखभाल में अक्षम” है।
यह सब पहले से तैयार था।
काव्या ने वह पंक्ति पढ़ी, तो उसकी उँगलियाँ ठंडी पड़ गईं।
—मैंने कभी आत्महत्या की बात नहीं की।
जाँच अधिकारी ने शांत स्वर में कहा—
—हमें पता है। आपके कमरे की रिकॉर्डिंग में भी ऐसा कुछ नहीं है। उलटे आप हर रात अपने बच्चे से कहती थीं कि आप उसके लिए जीवित रहेंगी।
काव्या का चेहरा आँसुओं से भीग गया।
जिस कैमरे से उसे अपमानित और नियंत्रित करने की कोशिश की गई थी, उसी ने अंततः उसकी सच्चाई बचा ली।
सावित्री ने गिरफ्तारी से बचने के लिए स्वयं को बीमार बताया। वह निजी अस्पताल में भर्ती हो गईं और अपने वकीलों के माध्यम से कहलवाया कि बहू ने उन्हें बेटे से दूर करने के लिए षड्यंत्र रचा है।
लेकिन पुलिस के पास उनकी आवाज की रिकॉर्डिंग थी।
एक दृश्य में काव्या दरवाजे तक घिसटते हुए पहुँचती दिखाई दी। वह कह रही थी—
—मुझे अस्पताल जाना है। मेरे पैर सुन्न हो रहे हैं।
सावित्री ने उत्तर दिया—
—तुम्हारा शरीर कमजोर है, पर बच्चा सिंघानिया है। तुम्हें केवल उसे सुरक्षित जन्म देना है। उसके बाद तुम्हारी जरूरत किसे है, यह समय बताएगा।
अदालत के आदेश पर सावित्री को हिरासत में लिया गया।
उनकी गिरफ्तारी के दिन परिवार के कई सदस्य पुलिस थाने के बाहर खड़े थे। कुछ रो रहे थे, कुछ अर्जुन को कोस रहे थे। एक बुआ ने उसकी ओर उँगली उठाकर कहा—
—तू पत्नी के लिए जन्म देने वाली माँ को जेल भेज रहा है!
अर्जुन ने पहली बार बिना झिझक उत्तर दिया—
—जन्म देने से किसी को दूसरे की जान लेने का अधिकार नहीं मिल जाता।
काव्या ने बाद में दंडाधिकारी के सामने अपना बयान दर्ज कराया। उसने चोटों, दवा, बंद कमरे, जाली दस्तावेज़, छिपे कैमरे और धमकियों का पूरा विवरण दिया।
बयान समाप्त होने के बाद उसकी साँस तेज चल रही थी। बाहर अर्जुन प्रतीक्षा कर रहा था।
—हो गया?—उसने पूछा।
काव्या ने सिर हिलाया।
—हाँ।
—तुम बहुत बहादुर हो।
काव्या ने कुछ क्षण उसकी ओर देखा।
—मुझे बहादुर नहीं बनना था, अर्जुन। मुझे सुरक्षित होना था।
उस वाक्य ने उसे फिर मौन कर दिया।
—मैं जानता हूँ—उसने कहा।—और तुम्हें सुरक्षित न रख पाने की जिम्मेदारी मेरी भी है।
काव्या ने पहली बार उसके शब्दों में केवल पछतावा नहीं, स्वीकार देखा।
मुकदमा 5 महीने चला। राघव ने अंततः अपराध स्वीकार कर लिया। उसने माना कि हस्ताक्षर उसने बनाए थे और सावित्री के आदेश पर काव्या के विरुद्ध मानसिक अस्थिरता का झूठा विवरण तैयार किया था। बदले में उसने जाँच अधिकारियों को परिवार के पुराने वित्तीय अपराधों की जानकारी दी।
अर्जुन की कंपनी को भी भारी नुकसान हुआ। कई परियोजनाओं की जाँच शुरू हुई। निदेशक मंडल ने उससे कहा कि वह शिकायत वापस लेकर समझौता कर ले, तो स्थिति संभल सकती है।
अर्जुन ने इनकार कर दिया।
उसने अवैध सौदों से जुड़ी सभी फाइलें अधिकारियों को सौंप दीं और कंपनी के प्रबंध निदेशक पद से अस्थायी रूप से हट गया। उसे पता था कि सत्य बोलने की कीमत केवल अपराधियों को नहीं, उस व्यवस्था से लाभ उठाने वालों को भी चुकानी पड़ती है।
अदालत में काव्या ने सावित्री की ओर देखकर कहा—
—आपने मुझे मनुष्य नहीं समझा। आपके लिए मैं केवल वह शरीर थी जिसमें आपके वंश का बच्चा पल रहा था। आपने सोचा कि धन, रिश्ते और प्रतिष्ठा मेरी आवाज से बड़े हैं। आज मैं इसलिए खड़ी हूँ क्योंकि मैं बच गई। लेकिन हर स्त्री के पास कैमरा, सबूत या शक्तिशाली पति नहीं होता। इसलिए यह फैसला केवल मेरे लिए नहीं होना चाहिए।
अदालत में पूर्ण सन्नाटा छा गया।
सावित्री को जाली दस्तावेज़ बनवाने, अवैध बंधन, धमकी, गोपनीयता भंग करने और चिकित्सकीय सहायता रोकने की साजिश में दोषी पाया गया। राघव का वकालत पंजीकरण रद्द हुआ और उसे कारावास मिला। सीमा को भी सजा सुनाई गई, हालाँकि सहयोग के कारण उसकी अवधि कम रखी गई।
सजा सुनाते समय सावित्री ने अर्जुन को घूरकर कहा—
—तुम अपनी माँ को एक बाहरी लड़की के लिए छोड़ रहे हो?
तभी पीछे से नवजात बच्ची के रोने की आवाज आई।
काव्या ने कुछ सप्ताह पहले एक स्वस्थ बेटी को जन्म दिया था। वह बच्ची को बाँहों में लिए अदालत के अंतिम दिन उपस्थित थी।
अर्जुन ने अपनी माँ से कहा—
—मैं अपनी माँ को नहीं छोड़ रहा। मैं उस अपराध से दूर जा रहा हूँ जिसे आपने मातृत्व का नाम दिया। और काव्या बाहरी नहीं है। वही मेरा परिवार है।
सावित्री ने होंठ भींच लिए।
अर्जुन ने फिर उनकी ओर कभी नहीं देखा।
लगभग 1 वर्ष बाद काव्या ने जयपुर में अपनी माँ की पुरानी मिठाई की दुकान के पास एक छोटी बेकरी खोली। उसका नाम उसने “नन्ही रोशनी” रखा।
वहाँ इटली का संगमरमर नहीं था। लकड़ी की साधारण मेजें थीं, पीतल की छोटी घंटी थी और सुबह होते ही इलायची, मक्खन तथा ताजी रोटी की खुशबू गली में फैल जाती थी।
अर्जुन वहाँ हिसाब-किताब संभालता था। करोड़ों के अनुबंध पढ़ने वाला आदमी ग्राहकों के 20 और 50 के नोटों का हिसाब करते समय बार-बार गलती करता। कभी डिब्बा उल्टा मोड़ देता, कभी पर्ची पर गलत कीमत लिख देता।
काव्या हँसते हुए कहती—
—इतनी बड़ी कंपनी चलाते थे, फिर भी 6 समोसे नहीं गिन पाते?
अर्जुन उनकी बेटी अन्वी को सीने से लगाए उत्तर देता—
—कंपनी में तुम मेरी परीक्षा लेने नहीं बैठती थीं।
एक दिन एक ग्राहक ने उसे पहचान लिया।
—क्या आप वही अर्जुन सिंघानिया हैं?
काव्या मुस्कराई।
—थे। अब मेरी दुकान में काम करते हैं।
पूरी दुकान हँसी से भर गई।
रात को दुकान बंद होने के बाद काव्या आँगन में बैठी थी। उसके पैरों पर हल्का कंबल रखा था। कई महीनों तक वह कंबल सहन नहीं कर पाती थी। कपड़े का भार उसे उस बंद कमरे, सूजी टाँगों और सावित्री की ठंडी आवाज की याद दिलाता था।
अर्जुन पास आया, लेकिन कुछ दूरी पर रुक गया।
—कंबल हटा दूँ?
काव्या ने कपड़े को उँगलियों से छुआ।
—नहीं। आज यह डर जैसा नहीं लग रहा।
अंदर अन्वी अपनी नानी की गोद में सो रही थी। उसके माथे पर आटे का छोटा-सा सफेद निशान था।
कुछ देर बाद काव्या ने कहा—
—मुझे सबसे अधिक डर इस बात का नहीं था कि तुम्हारी माँ मेरी बच्ची ले जाएँगी। मुझे डर था कि वह बड़ी होकर उनकी कहानी सुनेगी। उसे बताया जाएगा कि उसकी माँ कमजोर, लालची और पागल थी।
अर्जुन उसके पास बैठ गया।
—वह सच सुनेगी।
—क्या सच?
—कि उसकी माँ ने उस समय भी उसे बचाया, जब कोई उसकी बात पर विश्वास नहीं कर रहा था। कि उसकी माँ ने चुप रहने से इनकार किया। और यह कि किसी खानदान का नाम, धन या इज्जत किसी स्त्री की जिंदगी से बड़ी नहीं होती।
काव्या ने सिर उसके कंधे पर रख दिया।
उनके बीच अब भी कुछ घाव थे, जिन्हें समय चाहिए था। अर्जुन का पश्चाताप अतीत नहीं मिटा सकता था और काव्या की क्षमा किसी एक दिन में पूरी नहीं हो सकती थी।
लेकिन अब उनके घर में कोई बंद दरवाजा नहीं था।
कोई छिपा कैमरा नहीं था।
कोई नकली हस्ताक्षर उनके रिश्ते का निर्णय नहीं कर रही थी।
आँगन में रात की हवा बह रही थी। रसोई से इलायची की हल्की सुगंध आ रही थी और अंदर सोती हुई अन्वी की साँसें सुनाई दे रही थीं।
काव्या ने आँखें बंद कर लीं।
लंबे समय बाद उनके बीच छाया मौन किसी भय, धमकी या छिपे हुए अपराध को नहीं ढक रहा था।
उस मौन में केवल शांति थी।
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