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6 दिन की बच्ची को सीने से लगाए जब सास ने बहू को ठंडी रात में घर से धक्का दिया और पति ने दरवाज़ा बंद कर कहा, “सुबह तक नहीं बचोगी,” तब वह चीखी नहीं, बस बाँह में छिपे फोन को कसकर पकड़े रही, क्योंकि 58 मिनट की रिकॉर्डिंग एक ऐसे राज़ को जगा चुकी थी जिसे पूरा परिवार दफना चुका था।

PART 1

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दिल्ली की कड़कड़ाती जनवरी की रात में, जब सास ने 6 दिन की बच्ची को गोद में लिए नंदिनी को हवेली के बाहर धक्का दिया, तो उसके नंगे पैरों के नीचे संगमरमर की सीढ़ियाँ बर्फ जैसी ठंडी थीं, मगर असली ठंड उसके पति रोहन की हँसी ने उसके खून में उतार दी।

दरवाज़े के भीतर से कुंडी चढ़ने की आवाज़ आई।

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“सुबह तक भी नहीं टिक पाओगी,” रोहन ने इतने शांत स्वर में कहा, जैसे उसने पत्नी और नवजात बेटी को नहीं, बस किसी पुराने बल्ब को बंद किया हो।

उसकी माँ, सावित्री मल्होत्रा, अभी भी नंदिनी के अस्पताल वाले हल्के शॉल का किनारा अपनी पतली, महँगी अंगूठियों वाली उँगलियों में पकड़े हुए थी। उसने आखिरी बार नंदिनी को अपनी ओर खींचा। उसके इत्र की तेज़ खुशबू, घी के दीयों और रजनीगंधा की मिली-जुली महक पर भारी पड़ रही थी।

“बहू बनकर आई थी, मालकिन बनने चली थी,” सावित्री ने दाँत भींचकर कहा। “अब देख, तेरी अकड़ कैसे निकलती है।”

फिर उसने उसे छोड़ दिया।

नंदिनी लड़खड़ाकर बाहर आँगन में लगे पत्थर के फर्श पर गिरते-गिरते बची। उसका शरीर अभी प्रसव के दर्द से टूटा हुआ था। एक हाथ में वह अपनी बेटी मीरा को सीने से चिपकाए थी, दूसरे हाथ से उस पतले शॉल को कसकर पकड़ रही थी, जो 2 जिंदगियों को बचाने के लिए बेहद छोटा था। मीरा ने हल्की-सी कराह भरी, जैसे किसी चिड़िया का बच्चा घोंसले से गिर गया हो।

लुटियंस दिल्ली की वह बड़ी कोठी अंदर से रोशनी में डूबी हुई थी। ड्राइंग रूम में हीटर चल रहा था, चाँदी की ट्रे में केसर वाला दूध रखा था, और मीरा की छोटी गुलाबी टोपी अभी भी दरवाज़े के पास पड़ी थी। वही टोपी जो नर्स ने अस्पताल से निकलते समय मुस्कुराकर पहनाई थी।

“रोहन,” नंदिनी ने शीशे वाले दरवाज़े पर काँपते हाथ से चोट की, “मीरा मर जाएगी ठंड से। कम से कम उसे अंदर ले लो।”

अंदर रोहन ने अपना ग्लास उठाया।

“तुम्हें कागज़ों पर साइन कर देने चाहिए थे, नंदिनी।”

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डाइनिंग टेबल पर वे कागज़ अब भी फैले हुए थे। शब्द ठंडे थे—हस्तांतरण, अचल संपत्ति, अभिभावक अधिकार, ट्रस्ट शेयर, अपरिवर्तनीय अधिकार। रोहन चाहता था कि नंदिनी अपने पिता की कंपनी आर्या मेडिटेक में मिले 28 प्रतिशत शेयर, जयपुर वाला पुश्तैनी घर और मुंबई के फ्लैट के अधिकार उसके नाम कर दे।

रोहन कहता था यह “परिवार की सुरक्षा” के लिए है। सावित्री कहती थी कि नंदिनी “डिलीवरी के बाद मानसिक रूप से ठीक नहीं है।” पूरे शाम उन्होंने उसे समझाया नहीं, तोड़ा था। कहा था कि वह माँ बनने के बाद फैसले लेने लायक नहीं बची।

नंदिनी ने मना कर दिया।

फिर सावित्री ने मीरा को पालने से उठाया। रोहन ने मुख्य दरवाज़े की चाबी निकाल ली। और 3 मिनट में उसका घर, उसका विवाह, उसका भरोसा—सब किसी अदालत के झूठे बयान जैसा टूट गया।

“कल कह देंगे इसे प्रसव के बाद पागलपन का दौरा पड़ा था,” सावित्री ने अंदर से इतनी तेज़ आवाज़ में कहा कि नंदिनी की बाँह में छिपा फोन हर शब्द पकड़ सके। “बच्ची को लेकर खुद भाग गई। कौन मानेगा इसकी बात?”

रोहन हँसा।

“पड़ोसी भी यही कहेंगे। मैंने तो सबको पहले से बता रखा है कि नंदिनी का मूड ठीक नहीं रहता।”

नंदिनी ने अपनी बाँह की ओर देखा। फोन शॉल की सिलाई के नीचे फँसा था। रिकॉर्डिंग 58 मिनट से चल रही थी। उसने बटन तब दबा दिया था, जब सावित्री ने रसोई में पहली बार चीखकर कहा था कि “आज इसे सबक सिखाना ही पड़ेगा।”

हवा चाकू की तरह गाल काट रही थी। मीरा की साँसें छोटी होने लगी थीं। नंदिनी ने दरवाज़े के भीतर पड़ी टोपी को देखा। सिर्फ 2 मीटर दूर। मगर अब वह 2 मीटर नहीं, 2 जन्मों की दूरी लग रही थी।

“तेरा कोई नहीं है,” रोहन बोला। “तेरी माँ गई। तेरा बाप मर गया। रिश्तेदारों ने तुझसे नाता तोड़ लिया। दोस्तों को मैंने समझा दिया कि तू अस्थिर है। तू अकेली है।”

नंदिनी ने होंठ दबा लिए।

वे 1 बात पर गलत थे।

उसका पिता मरा नहीं था।

12 साल पहले सबने माना था कि अरविंद आर्या का हेलिकॉप्टर उदयपुर से जयपुर लौटते समय अरावली की पहाड़ियों में क्रैश हो गया था। अखबारों ने लिखा था—देश का बड़ा मेडिकल उपकरण उद्योगपति दुखद दुर्घटना में मृत। नंदिनी तब 18 साल की थी। उसे मलबे की तस्वीरें दिखाई गई थीं, सरकारी कागज़ दिखाए गए थे, शोक सभाएँ हुई थीं।

पर शरीर कभी नहीं मिला।

3 हफ्ते पहले उसे अपने पुराने ईमेल पर एक संदेश मिला था।

“मैं पापा हूँ। घर से जवाब मत देना।”

पहले उसे लगा कोई धोखा है। फिर फोन पर उस आदमी ने वह सब बताया जो सिर्फ उसके पिता जानते थे—जब नंदिनी ने 7 साल की उम्र में उसके ब्रीफकेस में मिट्टी का हाथी छिपा दिया था, जब जयपुर की छत पर दोनों पतंग उड़ाते थे, जब वह उसे बाल बनाते समय एक बेसुरी कविता सुनाता था ताकि वह रोए नहीं।

अरविंद आर्या ज़िंदा था।

उसने कंपनी के भीतर चल रहे अपराधी नेटवर्क और फर्जी मेडिकल सप्लाई घोटाले के खिलाफ गवाही दी थी। उसे मारने की कोशिश हुई, दुर्घटना का नाटक रचा गया, फिर सरकारी संरक्षण में उसे दुनिया से गायब कर दिया गया। सालों तक वह नंदिनी से संपर्क नहीं कर सकता था। अब खतरे खत्म हुए थे, और वह लौटना चाहता था—शर्म, पछतावे और डर के साथ।

नंदिनी ने उसे अब तक माफ नहीं किया था।

लेकिन उस रात, गेट के पास लगे अशोक के पेड़ की छाया में, मीरा की कमजोर होती साँसों के बीच माफी का कोई अर्थ नहीं रह गया था।

उसने फोन निकाले बिना आपात संदेश भेजा। 1 संदेश उसकी वकील अदिति राव को गया। 1 उस नंबर पर जो अरविंद ने दिया था।

सिर्फ 3 शब्द।

“आओ। सबके साथ।”

अंदर सावित्री ने पर्दा हटाकर बाहर देखा। उसके चेहरे पर दया नहीं, तमाशा देखने का सुख था।

“रोहन ने तुझे मौका दिया था,” वह बोली। “एक अच्छी बहू बनकर रहती तो राज करती।”

नंदिनी ने ठंडी आवाज़ में कहा, “उसने मुझसे शादी मेरे शेयरों के लिए की थी।”

दरवाज़ा थोड़ा खुला। भीतर की गर्म हवा बाहर आई।

रोहन मुस्कुराया।

“नहीं, मैंने तुमसे शादी इसलिए की क्योंकि तुम टूट चुकी थीं। टूटे हुए लोग संभालने में आसान होते हैं।”

दरवाज़ा फिर बंद हो गया।

नंदिनी घुटनों के बल बैठ गई। मीरा अब रो भी नहीं रही थी। यही सबसे डरावना था।

“तू रहेगी, मेरी बच्ची,” उसने उसके कान के पास फुसफुसाया। “तू धूप में खेलेगी। तेरे लिए गरम परांठे बनेंगे। तू स्कूल जाएगी। कोई तुझ पर दरवाज़ा बंद नहीं करेगा। माँ वादा करती है।”

दूर सड़क पर अंधेरा पसरा था।

फिर अचानक, रात के 1 बजकर 17 मिनट पर, गेट के बाहर पहली हेडलाइट चमकी।

फिर दूसरी।

फिर 5।

फिर 12।

PART 2

काली गाड़ियों की कतार कोठी के सामने आकर रुकी। उनके पीछे एंबुलेंस और पुलिस की जीप भी थी। रोहन का चेहरा पहली बार सफेद पड़ा।

“ये क्या ड्रामा है?” सावित्री ने घबराकर कहा।

सबसे आगे अदिति राव उतरीं। उनके पीछे 2 पुलिस अधिकारी, एक महिला कॉन्स्टेबल, एक बाल रोग विशेषज्ञ और फिर एक उम्रदराज़ आदमी उतरा, जिसके सफेद बालों के बावजूद आँखें वैसी ही थीं जैसी नंदिनी हर सुबह आईने में देखती थी।

अरविंद आर्या बर्फीली हवा को चीरते हुए अपनी बेटी के सामने घुटनों के बल बैठ गया।

“बेटा,” उसकी आवाज़ टूट गई, “मैं बहुत देर से आया।”

नंदिनी कुछ कह नहीं पाई। मीरा को डॉक्टरों ने तुरंत गरम कंबल में लपेटा। नंदिनी ने उसे छोड़ने से पहले इतनी मजबूती से पकड़ा कि नर्स को उसके चेहरे के पास आकर कहना पड़ा, “हम उसे बचा रहे हैं। वह साँस ले रही है।”

रोहन ने खुद को सँभालने की कोशिश की।

“यह पारिवारिक मामला है। मेरी पत्नी मानसिक रूप से ठीक नहीं है।”

अदिति ने अपना फोन उठाया।

“आपकी पत्नी ने 58 मिनट की रिकॉर्डिंग की है। आखिरी 12 मिनट पुलिस ने लाइव सुने हैं। धमकी, जबरन संपत्ति हस्तांतरण, झूठे मेडिकल कागज़ और नवजात बच्ची को ठंड में छोड़ने की स्वीकारोक्ति—सब कुछ।”

सावित्री दरवाज़ा बंद करने लगी, लेकिन पुलिस अधिकारी ने हाथ रख दिया।

“अंदर की कोई चीज़ छुई तो वह भी रिकॉर्ड में जाएगा।”

तभी अदिति ने स्पीकर चालू किया।

रोहन की आवाज़ कमरे में गूँजी।

“सुबह तक नहीं टिक पाओगी।”

फिर सावित्री की आवाज़ आई।

“ठंड हमारा काम आसान कर देगी।”

और उसी क्षण रोहन समझ गया कि जिस औरत को उसने अकेला समझा था, वह सच के साथ खड़ी थी।

PART 3

घर का दरवाज़ा खुला तो भीतर की गर्मी ने नंदिनी को झटका दिया। वही चमकते झूमर, वही रेशमी कुशन, वही भगवान के छोटे मंदिर में जलता दिया, वही महँगा कालीन। सब कुछ सभ्य दिख रहा था। बस उस सभ्यता के बीच टेबल पर रखे दस्तावेज़ किसी खुले जख्म की तरह पड़े थे।

नंदिनी को महिला कॉन्स्टेबल ने कंबल में लपेटा। उसका चेहरा पीला था, होंठ नीले पड़ चुके थे, मगर आँखों में अब डर की जगह कुछ और था—वह ठोस शांति, जो बहुत देर तक अपमान सहने के बाद आती है।

रोहन ने आखिरी कोशिश की।

“रिकॉर्डिंग से कुछ साबित नहीं होगा। कोई भी तनाव में कुछ भी बोल सकता है। नंदिनी हमेशा से संवेदनशील रही है, खासकर अपने पिता की मौत के बाद।”

अरविंद धीरे-धीरे आगे बढ़ा।

“मेरी मौत पर राजनीति बहुत लोगों ने की,” उसने कहा, “लेकिन अब मेरे नाम से झूठ मत बोलो।”

सावित्री दीवार से टिक गई। उसके चेहरे पर वह घमंड नहीं था, जो कुछ मिनट पहले तक था।

अदिति ने दस्तावेज़ खोले। हर पन्ना रोहन की बनाई दुनिया को गिरा रहा था। नकली मेडिकल रिपोर्ट, नंदिनी के फोन से उसकी सहेलियों को भेजे गए आक्रामक संदेश, उस दाई के खाते में गए पैसे जिसने झूठा बयान लिखा था, कंपनी शेयर बेचने का नकली ड्राफ्ट, और रोहन के लैपटॉप से निकला फोल्डर—“एन।”

पुलिस अधिकारी ने पूछा, “यह फोल्डर किसका है?”

रोहन चुप रहा।

अदिति ने पन्ना उठाया।

“इसमें लिखा है कि नंदिनी को अस्थिर साबित करने के बाद बच्ची की कस्टडी कैसे लेनी है। इसमें ठंड में नवजात शिशु के शरीर पर असर के बारे में खोजें हैं। इसमें यह भी लिखा है कि पत्नी के मरने या गायब होने पर शेयर नियंत्रण किस तरह लिया जा सकता है।”

सावित्री चिल्लाई, “यह सब रोहन ने किया! मैंने तो सिर्फ घर की इज्जत बचाने के लिए—”

“माँ!” रोहन चीखा। “आप ही कहती थीं कि बहू को साइन करवाना होगा।”

“मैंने कहा था समझाओ, मारो मत!”

“दरवाज़ा आपने बंद किया था!”

“और बच्ची को बाहर ले जाने का आदेश किसने दिया था?”

उनकी मिलीभगत, जो नंदिनी को कुचलने तक मजबूत थी, अपने बचाव की पहली आँच में ही टूट गई। माँ-बेटे एक-दूसरे को ऐसे काटने लगे, जैसे अपराध कोई रिश्तेदारी नहीं जानता।

नंदिनी ने पहली बार स्पष्ट आवाज़ में कहा, “बस।”

कमरे में सन्नाटा फैल गया।

वह धीरे-धीरे उठी। उसके पैर काँप रहे थे, पर आवाज़ नहीं।

“तुम दोनों ने मुझे पागल कहा, क्योंकि मैं चुप रहती थी। मुझे कमजोर कहा, क्योंकि मैं नई माँ थी। मेरी बेटी को सौदा समझा, क्योंकि तुम्हें लगा माँ अपने बच्चे के लिए सब कागज़ों पर साइन कर देगी। तुमने सही सोचा था कि मैं मीरा के लिए कुछ भी करूँगी। पर तुमने गलत सोचा कि मैं उसे तुम्हारे हवाले कर दूँगी।”

सावित्री अचानक रोने लगी। उसके आँसू उतने ही तेज़ आए जितनी तेज़ उसकी क्रूरता आई थी।

“बहू, हमसे गलती हो गई। घर की इज्जत, समाज, रिश्तेदार… तू समझती क्यों नहीं? हम तुझे बचा रहे थे। तू बहुत थकी हुई थी। दरवाज़ा बस कुछ देर के लिए बंद हुआ था।”

नंदिनी ने उसकी ओर देखा। यादें एक-एक कर लौटीं।

अस्पताल में सावित्री ने मीरा को उसकी गोद से छीनकर कहा था, “तुम्हें बच्चा पकड़ना भी नहीं आता।”

रसोई में उसने नंदिनी की माँ की पुरानी चूड़ियाँ देखकर कहा था, “मरे हुए लोगों की चीज़ों से घर में उदासी आती है।”

करवा चौथ की पूजा में उसने रिश्तेदारों के सामने हँसते हुए कहा था, “हमारी बहू पढ़ी-लिखी है, मगर घर चलाना अभी सीख रही है।”

और रोहन हर बार मुस्कुराकर नंदिनी की पीठ सहलाता था।

“माँ ऐसी ही हैं,” वह कहता। “दिल की बुरी नहीं हैं।”

आज नंदिनी को समझ आया—कुछ लोग दिल से ही बुरे होते हैं, बस परिवार का नाम उनके लिए पर्दा बन जाता है।

“आपने मेरी बेटी को ठंड में रखा,” नंदिनी ने कहा। “यह गलती नहीं थी। यह आप थीं।”

सावित्री का चेहरा बदल गया। उसने झपटकर नंदिनी को थप्पड़ मारा।

आवाज़ कमरे में गूँज गई।

अरविंद आगे बढ़ा, मगर नंदिनी ने हाथ उठा दिया। उसकी आँखों में आँसू नहीं थे।

“धन्यवाद,” उसने बहुत धीरे कहा। “शायद पुलिस कैमरे को यह भी चाहिए था।”

सावित्री ने पीछे मुड़कर देखा। महिला कॉन्स्टेबल की बॉडी कैमरा लाइट जल रही थी।

सुबह होने से पहले रोहन और सावित्री को अलग-अलग गाड़ियों में ले जाया गया। बाहर 3 पड़ोसी खड़े थे, वही लोग जिनके सामने महीनों से रोहन नंदिनी को अस्थिर साबित कर रहा था। आज वही लोग उसकी हथकड़ी देख रहे थे।

रोहन ने जाते-जाते कहा, “नंदिनी, तुम पछताओगी। मैं मीरा का पिता हूँ।”

नंदिनी ने उत्तर नहीं दिया।

एंबुलेंस में डॉक्टर ने बताया कि मीरा की हालत खतरे से बाहर है, पर उसे अस्पताल में निगरानी की जरूरत होगी। उसके शरीर का तापमान बहुत गिर गया था, मगर समय पर मदद आ गई।

“वह जिएगी?” नंदिनी ने पूछा।

डॉक्टर ने उसके कंधे पर हाथ रखा।

“हाँ। आपने सही समय पर सही काम किया।”

इन 6 शब्दों ने नंदिनी को तोड़ दिया। वह पहली बार फूटकर रोई—डर से नहीं, बच जाने की थकान से।

अगले महीनों में जो सच बाहर आया, उसने दिल्ली के बड़े घरों की चमक पर कालिख पोत दी। रोहन के लैपटॉप से पूरा प्लान निकला। उसने नंदिनी के फोन से उसकी कॉलेज की सहेलियों को ऐसे संदेश भेजे थे, जिनसे वे दूर हो जाएँ। उसने डॉक्टर से मिलकर प्रसवोत्तर अवसाद की झूठी फाइल बनवाई थी। उसने दाई को पैसे देकर बच्ची के साथ “असामान्य लगाव” का बयान लिखवाया था। उसने शेयर ट्रांसफर के लिए नंदिनी के पुराने सिग्नेचर की नकल भी करवाई थी।

सबसे भयानक वह पन्ना था, जिसमें लिखा था—“अगर घटना रात में हो और मौसम अत्यधिक ठंडा हो, तो परिणाम स्वाभाविक लग सकता है।”

अदालत में यह पढ़ा गया तो कई लोग काँप गए।

आर्या मेडिटेक ने रोहन पर धोखाधड़ी, जबरन वसूली, जालसाजी और संपत्ति हड़पने की कोशिश का मुकदमा किया। रोहन की कंसल्टेंसी कंपनी 11 दिन में अपने 4 बड़े क्लाइंट खो बैठी। उसके बिजनेस स्कूल वाले दोस्त, जो उसकी पार्टियों में शैंपेन खोलते थे, उसके फोन उठाने बंद कर चुके थे।

सावित्री ने अपने गहने बेचे, फिर गुरुग्राम का फ्लैट गिरवी रखा। तब उसे पता चला कि जिस दिल्ली कोठी पर वह खुद को रानी समझती थी, वह रोहन के नाम नहीं थी। वह एक पुराने ट्रस्ट के अधीन थी, जिसे अरविंद ने नंदिनी की सुरक्षा के लिए बनाया था। सावित्री ने 4 साल जिस घर में राज किया, वह कभी उसका था ही नहीं।

मुकदमे में रोहन ने कहा कि उसकी माँ ने उसे उकसाया। सावित्री ने कहा कि बेटा लालची था, वह तो बस परिवार बचाना चाहती थी। दोनों की आवाज़ें अदालत में अलग थीं, पर रिकॉर्डिंग में उनकी आत्मा एक जैसी सुनाई देती थी।

नंदिनी रोज़ अदालत नहीं जाती थी। वह मीरा को लेकर अस्पताल, थेरेपी और अपने टूटे हुए मन को जोड़ने में व्यस्त थी। लेकिन जिस दिन 58 मिनट की रिकॉर्डिंग चलाई गई, वह अदालत में मौजूद थी।

कमरे में मीरा की कमजोर कराह सुनाई दी। फिर रोहन की आवाज़।

“सुबह तक भी नहीं टिक पाओगी।”

किसी ने खाँसा तक नहीं।

सावित्री की आवाज़ आई।

“ठंड हमारा काम आसान कर देगी।”

न्यायाधीश ने कुछ पल के लिए चश्मा उतार दिया। अदालत की हवा भारी हो गई।

जब नंदिनी की बारी आई, वह धीरे से खड़ी हुई। उसने साधारण सफेद साड़ी पहनी थी। उसके माथे पर छोटी-सी बिंदी थी, और कलाई पर ठंड से पड़ी हल्की सफेद निशानी अब भी दिखती थी।

“आप लोगों ने मुझे अकेला इसलिए समझा,” उसने कहा, “क्योंकि आपने मेरे आसपास की हर आवाज़ काट दी थी। दोस्तों को दूर किया, रिश्तेदारों को भ्रमित किया, डॉक्टरों से झूठ लिखवाया, और मेरे मातृत्व को मेरी कमजोरी बना दिया। उस रात मैं इसलिए नहीं बची कि मेरे पिता गाड़ियों के साथ लौट आए। मैं इसलिए बची क्योंकि बर्फ पर घुटनों के बल बैठी हुई भी मुझे पता था कि मैं कौन हूँ। मेरी बेटी किसी सौदे का हिस्सा नहीं है। और कोई भी औरत परिवार के नाम पर मरने के लिए पैदा नहीं होती।”

रोहन ने 12 साल की सज़ा पाई। सावित्री को 8 साल मिले। झूठा बयान देने वाली दाई का लाइसेंस रद्द हुआ और उसे भी सज़ा मिली। नकली दस्तावेज़ रद्द हुए। मीरा की कस्टडी पूरी तरह नंदिनी को मिली। आर्या मेडिटेक में नंदिनी के शेयर उसी के रहे।

अरविंद को अदालत से बाहर कोई जीत जैसा सुख नहीं मिला। वह जानता था कि लौट आने से 12 साल वापस नहीं आते। वह नंदिनी से माफी माँगता, पर बदले में माफी की माँग नहीं करता।

शुरू में नंदिनी उसे दूरी पर रखती थी। वह मीरा के लिए खिलौने लाता, बगीचे की झूला कुर्सी ठीक करता, चाय पीने से पहले ही लौट जाता। कभी अपने बलिदान की कहानी नहीं सुनाता। बस कहता, “आज हूँ। कल भी रहूँगा।”

धीरे-धीरे यह वाक्य दलीलों से ज्यादा भरोसेमंद लगने लगा।

1 साल बाद नंदिनी ने जयपुर के बाहर एक सफेद हवेली खरीदी, जहाँ सुबह मोर की आवाज़ आती थी और शाम को आँगन में पीली रोशनी गिरती थी। उसने अपने पिता की कंपनी से जुड़ी एक फाउंडेशन शुरू की—उन महिलाओं और बच्चों के लिए जो घर के भीतर होने वाली हिंसा से भागते हैं। वहाँ सुरक्षित कमरे बने, आपात फोन रखे गए, कानूनी मदद मिली, रात की टैक्सी सेवा शुरू हुई, और डॉक्टरों की टीम तैयार रखी गई।

वह हर औरत से एक ही बात कहती।

“तुम पहले क्यों नहीं गईं?” कभी नहीं।

वह कहती, “तुम अब यहाँ हो। पहले तुम्हें गरम चाय देते हैं।”

मीरा के पहले जन्मदिन पर हवेली के आँगन में गेंदे की मालाएँ लगीं। अरविंद ने खुद सीढ़ियों पर रंगोली के पास छोटे दीये सजाए। नंदिनी ने टेढ़ा-मेढ़ा सूजी का हलवा बनाया, जिसे सबने दुनिया का सबसे अच्छा हलवा कहा।

मीरा ने लकड़ी की छोटी मेज पकड़कर 3 कदम चलने की कोशिश की। वह धप्प से बैठ गई, फिर खिलखिलाकर हँस पड़ी।

नंदिनी ने मुँह पर हाथ रख लिया। उसकी आँखें भर आईं।

अरविंद बरामदे में खड़ा रहा। उसके चेहरे पर पछतावा भी था, शांति भी।

रात को मेहमान चले गए। नंदिनी ने मीरा को मोटे ऊनी कंबल में लपेटा और बरामदे में आ गई। हवा ठंडी थी, मगर निर्दयी नहीं। अंदर का दरवाज़ा खुला था। भीतर से पीली रोशनी बाहर गिर रही थी।

मीरा ने अपनी छोटी उँगली नंदिनी की कलाई पर रखी, ठीक उसी निशान पर जहाँ उस रात की ठंड अब भी हल्की सफेदी बनकर रह गई थी। फिर वह मुस्कुराई, जैसे बिना सुने भी उसने पूरी कहानी समझ ली हो।

नंदिनी ने खुले दरवाज़े, रोशन घर, बगीचे में खड़े अपने पिता और अपनी बाँहों में सुरक्षित बेटी को देखा।

उस रात के बाद सुबह बहुत पहले आ चुकी थी।

मगर उस पल पहली बार उसे लगा कि वे सचमुच अँधेरे से बाहर आ गई हैं।

Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.