
PART 1
“तेरा बेटा अब कमरे में नहीं सोता, नंदिनी… वह वहीं सोता है, जहाँ घर के पालतू जानवर सोते हैं।”
दिल्ली एयरपोर्ट से सीधे गुरुग्राम की अपनी कोठी में लौटते ही नंदिनी मल्होत्रा ने यही वाक्य सुना, और उसके हाथ से सूटकेस लगभग छूट गया।
5 साल पहले वह भारत सरकार के एक गुप्त सुरक्षा अनुबंध पर बाहर गई थी। कागज़ों पर उसका नाम तक दबा दिया गया था। फोन नहीं, संदेश नहीं, तस्वीर नहीं। उसने अपने पति आरव पर भरोसा किया था—अपने 1 साल के बेटे ईशान, अपने दिवंगत पिता की निर्माण कंपनी और सेक्टर 45 की उस कोठी की ज़िम्मेदारी उसी को देकर।
उसे लगा था, वह घर लौट रही है।
पर ड्रॉइंग रूम में गुलाब की खुशबू थी, चांदी की थाली में गरम पराठे थे, और सोफे पर आरव किसी राजा की तरह बैठा था। उसके पास लाल साड़ी में एक युवा औरत बैठी थी। आरव की मां, सावित्री देवी, अपनी गोद में नीले कंबल में लिपटा एक बच्चा झुला रही थीं।
—मेरा असली पोता, मेरे घर का भाग्य, सावित्री देवी बच्चे को चूमते हुए बोलीं।
आरव ने नंदिनी को देखा तो उसका चेहरा पीला पड़ गया।
—नंदिनी… तुम?
लाल साड़ी वाली औरत मुस्कुराई।
—तो यही हैं वो गायब बीवी।
नंदिनी ने कुछ नहीं कहा। तभी पीछे के आंगन से लोहे की घिसटती आवाज़ आई। फिर किसी बच्चे जैसी टूटी हुई कराह।
वह दौड़कर आंगन में गई।
नीम के पेड़ के नीचे, कुत्ते की गंदी झोपड़ी के पास, एक दुबला-पतला बच्चा घुटनों के बल बैठा था। उसके गले में कुत्ते की जंजीर थी। वह घर के बूढ़े लैब्राडोर शेरू के साथ सूखी रोटी के टुकड़े के लिए झपट रहा था।
नंदिनी की सांस रुक गई।
—ईशान…
बच्चे ने चेहरा उठाया। उसकी आंखों में पहचान नहीं थी। सिर्फ डर था।
उसका अपना बेटा उसे नहीं पहचानता था।
सावित्री देवी बच्चे को गोद में लिए बाहर आईं और बेहयाई से हंस पड़ीं।
—ज्यादा पास मत जाना। काटता है। ये लड़का पैदा ही टेढ़ा हुआ था। इसके आने के बाद घर की किस्मत फूट गई।
उन्होंने प्लेट से हड्डी उठाई और जमीन पर फेंक दी।
—खा ले, अभागे।
ईशान जंजीर खींचते हुए पीछे सरक गया। उसके घुटनों पर पुराने जख्म थे, हाथों पर नीले निशान, और गले की चमड़ी जंजीर से छिली हुई थी।
—तुम लोगों ने मेरे बच्चे के साथ क्या किया? नंदिनी की आवाज़ कांप रही थी।
आरव चुप रहा।
लाल साड़ी वाली औरत ने बाल ठीक किए।
—इतना नाटक मत कीजिए। आंटी जी ने ही इसे संभाला है। बच्चा शुरू से अजीब था।
नंदिनी धीरे-धीरे ईशान के पास झुकी।
—मैं मां हूं, बेटा… तुम्हारी मां।
ईशान गुर्राया। उसे शब्द याद नहीं थे। उसे सिर्फ बचना याद था।
तभी आरव उठा और उसने फाइल नंदिनी के पैरों के पास फेंक दी।
—अच्छा हुआ आ गई। तलाक के कागज़ों पर साइन कर दो। यह घर, कंपनी और ईशान—सब यहीं रहेंगे।
नंदिनी ने कागज़ उठाए। उसकी गैरहाज़िरी को कानूनी लापता दिखाकर आरव ने संपत्ति पर दावा शुरू कर दिया था।
सावित्री देवी ने गोद वाले बच्चे को कसकर पकड़ा।
—मेरा पोता यह है। वह तो अपशकुन है।
नंदिनी अचानक हंसी। ठंडी, टूटी हुई, डरावनी हंसी।
—आरव, सच में लगा कि मेरे पिता की कोठी तुम ऐसे हड़प लोगे?
आरव ने नजरें चुरा लीं।
नंदिनी ने लाल साड़ी वाली औरत को देखा।
—और यह बच्चा? यह भी तुम्हारा है?
औरत का चेहरा उतर गया।
—चुप रहो, आरव फुसफुसाया।
—क्यों? 6 साल पहले तुम ही तो रो रहे थे जब दिल्ली के डॉक्टर ने कहा था कि तुम्हारे पिता बनने की संभावना लगभग खत्म है।
आंगन में सन्नाटा जम गया।
सावित्री देवी ने पहले बच्चे को देखा, फिर उस औरत को।
नंदिनी ने हाथ आगे बढ़ाया।
—जंजीर की चाबी दो।
कोई नहीं हिला।
नंदिनी चीखी।
—चाबी!
डरी हुई औरत ने चाबी फेंक दी। नंदिनी ने ईशान को आज़ाद किया। वह उससे लिपटा नहीं। उसने उसकी बांह काटी, छूटने की कोशिश की। नंदिनी ने उसे अपनी शॉल में लपेट लिया। वह इतना हल्का था, जैसे कोई टूटी हुई गुड़िया।
दरवाजे पर सावित्री देवी चिल्लाईं।
—ले जा अपने जानवर को, मगर इस घर में दोबारा मत आना!
नंदिनी रुकी नहीं।
पर जाते-जाते उसने घर, आरव, उसकी रखैल और उस बच्चे को देखा, जिसने उनकी सबसे बड़ी झूठी कहानी हिला दी थी।
उन्हें अंदाज़ा भी नहीं था कि तूफान अभी शुरू हुआ है।
PART 2
नंदिनी ईशान को लेकर मेदांता अस्पताल पहुंची तो आपातकालीन वार्ड की नर्सें उसे देखकर सन्न रह गईं। 6 साल का बच्चा 3 साल का लगता था। गला छिला हुआ, नाखून टूटे, पीठ पर गोल निशान, पैरों में सूजन, और आंखों में वह खालीपन जो बच्चों में नहीं, कैदियों में दिखता है।
बाल रोग विशेषज्ञ ने 2 घंटे बाद रिपोर्ट हाथ में दी।
—यह उपेक्षा नहीं है, मैडम। यह लंबे समय की यातना है।
नंदिनी ने दीवार पकड़ ली।
—उन्होंने मेरे बेटे को कुत्ते की तरह रखा?
डॉक्टर ने धीमे कहा।
—उन्होंने उसके बचपन को तोड़ दिया।
नंदिनी ने परिवार के पुराने वकील, देवेंद्र माथुर को फोन किया।
—सारे असली कागज़ लेकर अस्पताल आइए। घर, कंपनी, पावर ऑफ अटॉर्नी—सब।
फिर उसने ईशान के कमरे के बाहर 2 सुरक्षा गार्ड खड़े किए और अकेली कोठी लौट गई।
ड्रॉइंग रूम में आरव, सावित्री और वह औरत—रिया—घबराए बैठे थे।
नंदिनी ने फोन चलाया। वीडियो में सावित्री की आवाज़ गूंजी—
“इसे जानवर की तरह रखो, तभी घर बचेगा।”
रिया रो पड़ी। आरव ने गुस्से से मेज पर मुक्का मारा।
तभी देवेंद्र ने फाइल खोली।
—नंदिनी जी इस संपत्ति और कंपनी की एकमात्र वैध मालिक हैं। आरव जी सिर्फ अस्थायी प्रशासक थे।
आरव की आंखों में लालच चमका।
—फिर अलमारी की तिजोरी खोलो। तुम्हारे पिता ने जरूर कुछ छिपाया है।
रिया ने चुपके से फोन किया।
—भैया, जल्दी आओ।
10 मिनट बाद दरवाजा टूटा।
एक दागदार चेहरे वाला आदमी 2 गुंडों के साथ अंदर आया।
—चाबी दो, मैडम।
उसने चाकू नंदिनी के गले से लगा दिया।
और तभी बाहर सायरन बज उठा।
PART 3
दरवाजा झटके से खुला और गुरुग्राम पुलिस की टीम अंदर घुसी।
—हथियार नीचे! सब दीवार की तरफ!
दागदार चेहरे वाला आदमी, जिसका नाम बाद में विक्रम निकला, एक पल को ठिठका। इतना ही काफी था। नंदिनी ने पास रखी पीतल की भारी आरती थाली दोनों हाथों से उठाई और उसके हाथ पर दे मारी। चाकू फर्श पर गिर गया। 2 पुलिसकर्मियों ने उसे दबोच लिया।
आरव ने भागने की कोशिश की, पर दरवाजे पर खड़ी महिला इंस्पेक्टर अदिति राणा ने उसका कॉलर पकड़ लिया।
—इतनी जल्दी कहां, मल्होत्रा जी?
सावित्री देवी जोर-जोर से रोने लगीं।
—हम इज्जतदार लोग हैं। यह सब बहू की साजिश है।
नंदिनी ने पहली बार उन्हें बिना डर, बिना गुस्से, सिर्फ घृणा से देखा।
—इज्जतदार लोग बच्चे के गले में जंजीर नहीं डालते।
देवेंद्र माथुर का माथा कट गया था, पर वह खड़े रहे। उन्होंने पुलिस को वीडियो, तलाक के कागज़ और फाइलें सौंप दीं। मगर नंदिनी जानती थी कि असली जवाब अभी भी ऊपर, उसके माता-पिता के कमरे में छिपा था।
सभी लोग पुलिस के साथ पहली मंज़िल पर गए।
कमरा वैसा ही था जैसा नंदिनी ने छोड़ा था, पर अब उसमें आरव के महंगे परफ्यूम की गंध बस गई थी। दीवार पर उसके माता-पिता की बड़ी तस्वीर लगी थी। उसी के पीछे तिजोरी थी।
आरव के चेहरे पर अजीब बेचैनी थी। उसे लगता था, उसमें नकद, सोना या गुप्त संपत्ति के कागज़ होंगे।
सावित्री देवी की आंखों में लालच साफ था।
रिया कांप रही थी, क्योंकि उसका भाई हथकड़ी में नीचे बैठा था।
नंदिनी ने अपने गले में पड़ी पतली चेन से छोटी चाबी निकाली। आरव उसे देखकर तिलमिला गया।
—तुमने 5 साल तक इसे अपने पास रखा?
—यह मेरे पिता की आखिरी निशानी थी, नंदिनी ने कहा।
तिजोरी खुली।
अंदर सोना नहीं था। नोटों की गड्डियां नहीं थीं। सिर्फ एक पुरानी लाल फाइल, एक पेन ड्राइव, और एक छोटी रिकॉर्डिंग मशीन थी।
आरव ने कड़वाहट से हंसने की कोशिश की।
—बस इतना?
नंदिनी ने रिकॉर्डिंग मशीन उठाई। उसे वह शाम याद आई जब उसके पिता, राजेंद्र कपूर, अस्पताल के बिस्तर पर पड़े थे। उन्होंने उसका हाथ पकड़कर कहा था, “बेटी, भरोसा कर, पर सब लिखवा कर। प्यार बिना दस्तावेज़ के सुंदर लगता है, लेकिन लालच आने पर वही प्यार अदालत में मुकर जाता है।”
तब नंदिनी नाराज़ हुई थी।
आज उसे अपने पिता की दूरदर्शिता समझ आई।
उसने बटन दबाया।
आरव की 6 साल पुरानी आवाज़ कमरे में भर गई।
“मैं, आरव मल्होत्रा, यह स्वीकार करता हूं कि कपूर बिल्डटेक, सेक्टर 45 की कोठी और संबंधित संपत्तियां नंदिनी कपूर मल्होत्रा की निजी विरासत हैं। मैं केवल उनकी अनुपस्थिति में प्रशासनिक देखभाल करूंगा। किसी भी परिस्थिति में मुझे मालिकाना दावा नहीं होगा।”
कमरा बर्फ हो गया।
फिर उसके पिता की आवाज़ आई।
“और बच्चे ईशान की सुरक्षा तुम्हारी पहली जिम्मेदारी होगी। यदि नंदिनी कभी लौटे और उसे अपने बच्चे या संपत्ति को नुकसान की स्थिति में पाए, तो यह रिकॉर्डिंग कानूनी प्रमाण मानी जाएगी।”
आरव की टांगें ढीली पड़ गईं।
देवेंद्र ने लाल फाइल खोली। उसमें कंपनी के मूल शेयर, संपत्ति के कागज़, सीमित पावर ऑफ अटॉर्नी और वह शर्त थी जिसके अनुसार नंदिनी के जीवित लौटते ही आरव का अधिकार स्वतः समाप्त हो जाता था।
महिला इंस्पेक्टर ने आरव की ओर देखा।
—अब आपको बहुत कुछ समझाना पड़ेगा।
आरव चिल्लाया।
—सब मां ने किया! मैंने नहीं कहा था बच्चे को बांधने को!
सावित्री देवी का रोना अचानक बंद हो गया।
—झूठ! तू ही कहता था कि वह लड़का रास्ते का कांटा है। तू ही डरता था कि बहू लौट आई तो सब चला जाएगा!
रिया ने बीच में रोते हुए कहा।
—मुझे लगा बच्चा बीमार है। आंटी जी बोलती थीं कि वह पागल है।
नंदिनी ने उसकी तरफ देखा।
—और तुमने एक बार भी नहीं पूछा कि पागल बच्चे को जंजीर से क्यों बांधा है?
रिया चुप हो गई।
उस रात थाने में बयान चलते रहे। अस्पताल की मेडिकल रिपोर्ट आई। ईशान की कुपोषण, चोटों और गले के घाव की पुष्टि हुई। आंगन की तस्वीरें ली गईं। कुत्ते की झोपड़ी, लोहे की जंजीर, गंदे बर्तन, पुराने कपड़े, टूटे खिलौने—सब जब्त हुआ।
पर सबसे दर्दनाक सच अगले दिन सामने आया।
पुरानी नौकरानी कमला बाई पुलिस स्टेशन आई। उसके हाथ कांप रहे थे। वह 3 साल पहले उस घर से निकाली गई थी।
—मैडम, मैंने बहुत पाप किया, उसने रोते हुए नंदिनी के पैरों में बैठने की कोशिश की। नंदिनी ने उसे उठाया।
—सच बोलो।
कमला बाई ने बताया कि नंदिनी के जाने के 6 महीने बाद ही सावित्री देवी ने ईशान को “मनहूस” कहना शुरू कर दिया था। बच्चे को पहले स्टोररूम में बंद किया जाता था। फिर जब वह रोता, तो उसे आंगन में सुलाया जाने लगा। आरव ने कई बार देखा। कई बार हंसा भी।
—जब रिया मैडम आईं और बच्चा साथ लाई, तब सब बदल गया, कमला बोली। आंटी जी कहती थीं, “अब घर में असली वारिस आ गया। पुराने अपशकुन को दूर रखना होगा।”
नंदिनी की उंगलियां कुर्सी के किनारे में धंस गईं।
—तुमने पुलिस को क्यों नहीं बताया?
कमला बाई फूट पड़ी।
—विक्रम ने धमकी दी थी। बोला, मेरी बेटी को उठा लेगा। एक दिन मैंने ईशान बाबू को दूध दिया तो मुझे उसी रात निकाल दिया। जाते-जाते मैंने सुना था, आरव साहब कह रहे थे, “बस इसे इतना कमजोर रखो कि अगर नंदिनी कभी लौटे, तो लोग कहें बच्चा पहले से बीमार था।”
थाने में बैठे अधिकारी की कलम रुक गई।
नंदिनी की आंखों में आंसू नहीं थे। दर्द इतना गहरा था कि वह पत्थर बन चुका था।
पुलिस ने घर की फिर तलाशी ली। स्टोररूम के कोने में पुराने बच्चों के कपड़ों की थैलियां मिलीं। एक छोटी डायरी मिली जिसमें सावित्री देवी पूजा-पाठ के खर्च के साथ ईशान के लिए लिखती थीं—“आज कम खाना दिया, कम रोया।” यह क्रूरता का हिसाब-किताब था।
कंपनी की जांच भी शुरू हुई। पता चला कि आरव ने नंदिनी की अनुपस्थिति में फर्जी ठेके बनाए, अवैध कर्ज लिए और रिया के भाई विक्रम से पैसे उधार लिए। बदले में उसने कंपनी के भविष्य के भुगतान गिरवी रख दिए। तिजोरी की चाबी इसलिए चाहिए थी कि उसे लगता था नंदिनी के पिता ने कोई गुप्त संपत्ति छिपाई होगी जिससे वह कर्ज चुका सके।
ईशान उनके लिए बच्चा नहीं था।
वह सबूत था कि असली घर किसका था।
वह याद दिलाता था कि नंदिनी कभी लौट सकती है।
और नंदिनी लौट आई थी।
कुछ ही दिनों में आरव का कंपनी पर नियंत्रण समाप्त हो गया। बैंक खातों पर रोक लगी। रिया को झूठे बयान और बाल यातना छिपाने के आरोप में गिरफ्तार किया गया। विक्रम और उसके साथियों पर अवैध प्रवेश, धमकी और हथियार रखने का मामला दर्ज हुआ। सावित्री देवी को बाल क्रूरता और षड्यंत्र के आरोप में हिरासत में लिया गया।
सबसे बड़ा अपमान आरव के लिए तब आया जब बच्चे की डीएनए रिपोर्ट आई।
रिया की गोद वाला बच्चा आरव का नहीं था।
थाने में यह सुनकर आरव ने सिर पकड़ लिया। नंदिनी को लगा, शायद अब उसे अपने असली बेटे की याद आएगी।
पर आरव ने सिर्फ इतना कहा—
—तो मैं सब कुछ बेकार में हार गया?
उस वाक्य ने नंदिनी के भीतर बचा हुआ आखिरी दुख भी जला दिया। वह समझ गई कि जिस आदमी से उसने कभी प्रेम किया था, वह शायद कभी था ही नहीं। वह सिर्फ एक चेहरा था, जिसके पीछे लालच, डर और कायरता छिपी थी।
उधर अस्पताल में ईशान धीरे-धीरे संभल रहा था। पहले 4 दिन उसने किसी को पास नहीं आने दिया। प्लेट देखकर पीछे हट जाता। बिस्तर पर लेटने से डरता। जब नर्स पानी देती, तो वह पहले फर्श की तरफ देखता, जैसे उसे वहीं रख दिया जाएगा।
नंदिनी हर रात उसके कमरे के बाहर कुर्सी पर बैठती। कभी वह सोफे पर नहीं सोती थी। उसे डर था कि ईशान उठे और उसे न पाए।
वह रोज एक ही बात कहती—
—तुझे आज मुझे पहचानना जरूरी नहीं। आज मुझे मां कहना जरूरी नहीं। बस इतना जान ले कि मैं कहीं नहीं जा रही।
ईशान उसे घूरता रहता। कभी गुर्राता। कभी कंबल सिर पर खींच लेता। डॉक्टर ने कहा कि उसके मन पर चोट शरीर से ज्यादा गहरी है।
नंदिनी ने जल्दी नहीं की।
उसने उसके लिए रंगीन चप्पलें खरीदीं, मगर पहनने को मजबूर नहीं किया। उसने खिलौने रखे, मगर हाथ में नहीं थमाए। उसने कमरे में शेरू की तस्वीर नहीं आने दी, क्योंकि कुत्ते की आवाज़ से ईशान कांपने लगता था।
फिर एक सुबह कुछ बदल गया।
नंदिनी खिड़की के पास बैठी अस्पताल की फीस और कानूनी कागज़ देख रही थी। ईशान बिस्तर पर बैठा था। उसने पानी का गिलास उठाया, आधा पिया, फिर गिलास नंदिनी की तरफ बढ़ाया।
उसकी आवाज़ बहुत धीमी थी।
—मां… पानी।
नंदिनी ने गिलास लिया। उसके हाथ कांप रहे थे। वह रोना चाहती थी, पर डरती थी कि कहीं ईशान घबरा न जाए।
उसने बस मुस्कुराकर कहा—
—हाँ, बेटा।
वह 1 शब्द नंदिनी के लिए जन्म जैसा था।
अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद वह कोठी में वापस नहीं गई। उसने साफ कहा कि ईशान उस जगह की दीवारों के बीच कभी नहीं रहेगा, जहां उसकी चीखें दबाई गई थीं। उसने कोठी सील रखी, फिर कानूनी प्रक्रिया के बाद उसे बेच दिया। लोगों ने कहा, “इतनी बड़ी संपत्ति क्यों बेच रही हो?” नंदिनी ने जवाब दिया—
—घर वह नहीं होता जिसकी कीमत करोड़ों में हो। घर वह होता है जहां बच्चा डरकर खाना न खाए।
वह ईशान को लेकर जयपुर के पास एक शांत कॉलोनी में चली गई। छोटा-सा घर लिया, खुला आंगन, सफेद दीवारें, और एक कमरा जिसे ईशान ने खुद चुना। उसने रंग चुना—हरा। क्योंकि अस्पताल की खिड़की से उसे पहली बार पेड़ों को देखकर मुस्कान आई थी।
कंपनी का नाम भी बदला गया। “मल्होत्रा कंस्ट्रक्शन” का बोर्ड हटाकर “कपूर इंफ्रालाइंस” लगाया गया। उद्घाटन के दिन नंदिनी ने किसी मंत्री को नहीं बुलाया। उसने बाल संरक्षण केंद्र की 20 बच्चियों और बच्चों को बुलाया। देवेंद्र माथुर भी आए। उन्होंने धीरे से पूछा—
—अब चैन मिला?
नंदिनी ने दूर ईशान को देखा। वह अभी भी भीड़ से दूर खड़ा था। पर खड़ा था। अपने पैरों पर।
—चैन नहीं, उसने कहा। 5 साल कोई अदालत वापस नहीं दे सकती। पर न्याय से बच्चे को यह पता चलता है कि उसका दर्द किसी की नजर में छोटा नहीं था।
मुकदमा महीनों चला। सावित्री देवी अदालत में कभी उम्र का सहारा लेतीं, कभी धर्म का, कभी मां होने का। जज ने सख्ती से कहा—
—मां कहलाने से कोई पवित्र नहीं हो जाता। बच्चे पर अत्याचार करने वाला हर व्यक्ति जवाबदेह होगा।
आरव ने आखिरी सुनवाई में नंदिनी से समझौते की कोशिश की। उसने जेल की वर्दी में झुकी आवाज़ से कहा—
—ईशान से मिलवा दो। मैं उसका पिता हूं।
नंदिनी ने पहली बार उसे सीधे जवाब दिया।
—पिता वह नहीं होता जो बच्चे का नाम कागज़ पर लिखवा दे। पिता वह होता जो बच्चे के गले से जंजीर खोल दे। तुमने तो उसे कसते हुए देखा था।
आरव ने सिर झुका लिया।
अदालत ने आरव, सावित्री, रिया और विक्रम को अलग-अलग अपराधों में सजा सुनाई। कंपनी की वित्तीय धोखाधड़ी का मामला चलता रहा, लेकिन ईशान की सुरक्षा के लिए स्थायी आदेश मिल गया। नंदिनी को पूर्ण अभिभावकत्व मिला। आरव को बच्चे से मिलने का कोई अधिकार नहीं दिया गया।
उस शाम नंदिनी जयपुर के घर के आंगन में बैठी थी। हल्की बारिश हो रही थी। मिट्टी की खुशबू हवा में थी। ईशान धीरे-धीरे बाहर आया। वह अभी भी तेज आवाज़ से चौंक जाता था, अभी भी कभी-कभी खाना छिपा देता था, अभी भी रात को डरकर उठता था। लेकिन उस दिन उसके हाथ में छोटी रंगीन पतंग थी।
—मां, उसने पूछा, अगर धागा टूट जाए तो पतंग गिर जाती है?
नंदिनी ने उसे अपने पास बैठाया।
—कभी-कभी गिरती है। लेकिन कोई उसे उठा ले तो फिर उड़ सकती है।
ईशान ने कुछ देर आसमान देखा।
फिर उसने बहुत धीरे से पूछा—
—मुझे फिर जंजीर नहीं लगाएंगे?
नंदिनी का दिल टूटकर फिर जुड़ गया। वह घुटनों के बल उसके सामने बैठी।
—कभी नहीं। जब तक मैं सांस ले रही हूं, कोई तुझे छू भी नहीं पाएगा।
ईशान ने पहली बार खुद अपनी बांहें उसके गले में डालीं। कसकर नहीं, बहुत सावधानी से, जैसे गले लगाना भी वह नया-नया सीख रहा हो।
नंदिनी ने उसे बांहों में भर लिया।
बारिश तेज हो गई। आंगन में मिट्टी भीगती रही। कहीं दूर मंदिर की घंटी बज रही थी। और उस छोटे-से घर में, जहां कोई जंजीर नहीं थी, कोई फेंकी हुई रोटी नहीं थी, कोई झूठा वारिस नहीं था—एक बच्चा फिर से इंसान बनना सीख रहा था।
नंदिनी ने आंखें बंद कीं और मन ही मन अपने पिता से कहा—
“मैं लौट आई, पापा। देर हुई, मगर खाली हाथ नहीं लौटी। मैं अपना बेटा वापस ले आई।”
उस रात ईशान पहली बार बिस्तर पर सोया।
फर्श पर नहीं।
दरवाजे के पास नहीं।
किसी जानवर की तरह नहीं।
अपनी मां की हथेली पकड़े हुए, एक बच्चे की तरह।
Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.