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3 हफ्ते पहले घर लौटे पति ने देखा कि पत्नी और 6 साल का बेटा पिछवाड़े में ठंडी बची हुई बिरयानी खा रहे थे; माँ बोली, “ये दोनों हमेशा नाटक करते हैं,” पति ने बस लाल डायरी खोली, और 5 साल से भेजे गए ₹7,50,000 हर महीने का सच सबके सामने काँपने लगा।

PART 1

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3 हफ्ते पहले घर लौटे अरविंद मेहरा ने अपनी पत्नी और 6 साल के बेटे को उसी हवेली के पिछवाड़े ठंडी, बासी बिरयानी खाते देखा, जिसके लिए उसने खाड़ी की तपती रेत में अपनी जवानी के 5 साल बेच दिए थे।

वह किसी को बताए बिना लौटा था। सोचा था, दिल्ली से जयपुर तक की यह रात उसकी जिंदगी की सबसे खूबसूरत रात बनेगी। टैक्सी की डिक्की में 2 बड़े सूटकेस थे—मीरा के लिए रेशमी साड़ी, सोने की पतली चूड़ियाँ, इत्र की शीशी, आरव के लिए क्रिकेट बैट, खिलौना ट्रेन, रोबोट, रंगों का बड़ा डिब्बा और एक नीली साइकिल की रसीद, जिसे वह अगले दिन लेने वाला था।

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अरविंद 5 साल से कतर की एक निर्माण कंपनी में साइट सुपरवाइजर था। धूप ऐसी कि हेलमेट के नीचे खोपड़ी जलती रहती, कमरे छोटे, खाना बेस्वाद, नींद अधूरी। मगर हर महीने वह अपनी माँ शारदा देवी के खाते में ₹7,50,000 भेजता और सिर्फ एक बात लिखता—मीरा और आरव को किसी चीज़ की कमी मत होने देना।

शारदा देवी हर बार मीठी आवाज़ में कहतीं, “बेटा, तेरी बहू रानी की तरह रहती है। आरव तो घर का राजकुमार है।”

उसकी बहन कविता भी यही दोहराती, “भैया, तुम बेकार चिंता करते हो। माँ सब संभाल रही हैं। मीरा को तो तुम्हारे बिना भी कोई तकलीफ नहीं।”

अरविंद ने भरोसा किया, क्योंकि आदमी दुनिया से धोखा सोच सकता है, अपनी माँ से नहीं।

जयपुर के मालवीय नगर में वह घर अरविंद ने विदेश से बनवाया था। संगमरमर का फर्श, बड़ा आँगन, तुलसी का चौरा, आरव के लिए नीले रंग का कमरा, मीरा के लिए खिड़की वाली रसोई। उसने हर ईंट में अपने पसीने का पैसा लगाया था।

पर उस रात जब टैक्सी हवेली के बाहर रुकी, उसका दिल अजीब तरह से बैठ गया। गेट के सामने 5 गाड़ियाँ खड़ी थीं। भीतर से हँसी, ढोलक, फिल्मी गानों और काँच के गिलासों की आवाज़ आ रही थी। ड्राइंग रूम रोशनी से चमक रहा था। और उसकी पत्नी? उसका बेटा? कहीं दिखाई नहीं दिए।

वह मुख्य दरवाज़े से नहीं गया। चुपचाप साइड वाले रास्ते से पिछवाड़े की ओर बढ़ा। तभी उसे बच्चे की धीमी सिसकी सुनाई दी।

“मम्मा, बहुत भूख लगी है। अंदर इतने सारे पनीर टिक्के हैं। हम माँग लें?”

मीरा की टूटी हुई आवाज़ आई, “नहीं बेटा। दादी सुन लेंगी तो फिर कहेंगी हम घर की इज्जत मिट्टी में मिला रहे हैं। ये चावल खा लो। मैंने ऊपर का खराब हिस्सा हटा दिया है।”

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अरविंद वहीं जम गया।

पिछवाड़े की ठंडी फर्श पर मीरा बैठी थी। उसका सलवार-कुर्ता फीका, कोहनी से फटा हुआ था। चेहरा सूखकर नुकीला हो गया था। आरव उसकी गोद के पास बैठा एक मुड़े हुए फॉयल के डिब्बे में से चिपके हुए चावल खा रहा था।

आरव ने पिता को देखा तो दौड़ा नहीं।

उसने पहले डिब्बा अपनी पीठ के पीछे छिपा लिया।

यह शर्म अरविंद के सीने में खंजर की तरह उतर गई।

सूटकेस उसके हाथ से छूट गए। खिलौने फर्श पर बिखर गए। आरव काँपते हुए बोला, “पापा?”

फिर वह भागकर अरविंद से लिपट गया। अरविंद घुटनों के बल गिर पड़ा। उसने बेटे को पकड़ा तो शरीर हल्का लगा, बहुत हल्का। हड्डियाँ उभरी हुईं। कंधे इतने नाज़ुक कि जैसे भूख ने बचपन को भीतर से खा लिया हो।

“यह क्या हो रहा है?” अरविंद की आवाज़ इतनी शांत थी कि डर लगने लगा।

मीरा ने बोलने की कोशिश की, पर शब्द गले में मर गए।

तभी रसोई का दरवाज़ा खुला। शारदा देवी बनारसी साड़ी, मोतियों का हार और हाथ में जूस का गिलास लिए बाहर आईं। पीछे मेहमानों की गर्दनें झाँक रही थीं।

“अरे अरविंद! तूने बताया क्यों नहीं? अचानक?”

वह उसे गले लगाने बढ़ीं।

अरविंद पीछे हट गया।

“मुझे मत छूना।”

शारदा देवी का चेहरा सख्त हो गया। कविता भी फोन हाथ में लिए बाहर आई।

अरविंद ने ठंडी बिरयानी का डिब्बा उठाया और माँ की तरफ बढ़ाया।

“मेरी पत्नी और मेरा बेटा बाहर सड़ा खाना क्यों खा रहे हैं, जबकि मेरे घर में दावत चल रही है?”

शारदा देवी ने हँसकर कहा, “नाटक मत कर। बच्चे बढ़ा-चढ़ाकर बोलते हैं। मीरा को आदत है सहानुभूति बटोरने की।”

आरव ने पिता की गर्दन पकड़े-पकड़े कहा, “झूठ है पापा। हमने कल रात से कुछ नहीं खाया।”

आँगन में सन्नाटा जम गया।

तभी मीरा ने अपने फटे दुपट्टे के भीतर से एक पुरानी लाल डायरी निकाली। उसे देखते ही शारदा देवी का चेहरा पीला पड़ गया।

“मीरा, वह मुझे दे।”

मीरा पहली बार सीधी खड़ी हुई।

“नहीं। अब सच यहीं खुलेगा।”

PART 2

अरविंद ने डायरी खोली तो उसकी उँगलियाँ काँप गईं। हर पन्ने पर तारीख, रकम और अपमान दर्ज था।

“12 जनवरी—माँजी ने ₹7,50,000 निकाले। मुझे पूरे महीने के लिए ₹2,000 दिए।”

“3 मार्च—आरव को बुखार था। डॉक्टर बुलाने से मना किया।”

“21 अप्रैल—कविता दीदी मेरी साड़ी और चूड़ियाँ ले गईं। कहा, विदेश में कमाने वाले की बीवी को सादगी दिखानी चाहिए।”

फिर लिफाफे निकले। वे सारे खत, जो अरविंद ने कतर से भेजे थे। आरव के जन्मदिन के कार्ड, मीरा के लिए लिखे माफीनामे, पिता की याद में भेजी तस्वीरें।

सब खुले हुए थे।

कभी दिए ही नहीं गए थे।

आरव फुसफुसाया, “दादी कहती थीं, पापा हमें भूल गए। उनका कतर में दूसरा घर है।”

अरविंद की आँखों से आँसू गिर पड़े।

उसी क्षण दरवाज़े पर खड़े पुराने अकाउंटेंट रमेश जी आगे आए। उनके हाथ में फाइल थी।

“साहब, सच इससे भी बड़ा है। 5 साल में आपके भेजे पैसों में से लगभग ₹4,30,00,000 गायब हैं।”

कविता रो पड़ी, “माँ ने कहा था भैया कभी हिसाब नहीं माँगेगा!”

PART 3

शारदा देवी ने कविता की ओर ऐसी नज़र से देखा जैसे बेटी ने नहीं, दुश्मन ने वार किया हो।

“चुप रह,” उन्होंने दाँत भींचकर कहा।

लेकिन अब देर हो चुकी थी। दावत का शोर मर चुका था। मेहमान, रिश्तेदार, पड़ोसी—सब उसी आँगन में खड़े थे जहाँ 5 साल तक मीरा और आरव को चुपचाप अपमान निगलना पड़ा था। आज वही आँगन अदालत बन गया था।

अरविंद ने रमेश जी से फाइल ली। उसमें बैंक स्टेटमेंट, नकद निकासी, गहनों की रसीदें, गोवा की यात्रा, कविता के नाम खरीदी कार, शारदा देवी के नाम फॉर्महाउस की किश्तें और हवेली की मरम्मत के झूठे बिल थे। हर कागज एक ही बात कह रहा था—अरविंद की कमाई उसके परिवार तक कभी पहुँची ही नहीं।

मीरा दीवार से टिक गई। उसे लगा जैसे सच बोलने के बाद भी शरीर डर से खाली हो गया हो। वह 5 साल तक इसी पल का इंतजार करती रही थी, फिर भी जब पल आया, तो पैर जवाब दे गए।

अरविंद ने उसका हाथ पकड़ा। उसकी कलाई पर नीले निशान थे। कुछ पुराने, कुछ नए। एक जली हुई छोटी सी रेखा भी थी।

“यह किसने किया?” उसने धीरे पूछा।

मीरा ने आँखें झुका लीं।

शारदा देवी तुरंत बोलीं, “रसोई में काम करती है तो लग ही जाता है। इसे तो हर बात में रोना है।”

मीरा ने पहली बार उनकी ओर देखकर कहा, “चिमटा आपने फेंका था। क्योंकि आरव ने मेहमानों के सामने पानी माँग लिया था।”

भीतर से किसी महिला की दबी हुई चीख निकली।

तभी नौकरानी कमला आगे आई। उसके हाथ काँप रहे थे, पर आवाज़ साफ थी।

“साहब, बहूजी झूठ नहीं बोल रहीं। कई बार मैंने देखा है। उन्हें मेहमानों के सामने आने नहीं दिया जाता था। बच्चे को मिठाई छूने पर डाँटा जाता था। एक बार मैंने आरव को रोटी दी तो मुझे नौकरी से निकालने की धमकी मिली।”

माली हरीश भी बोला, “मैंने खुद देखा है, सर्दी में बहूजी और बच्चा बाहर बैठे थे। अंदर हीटर चल रहा था। माँजी ने कहा था, ‘इनको आदत डालो, वरना सिर चढ़ जाएँगे।’”

शारदा देवी का मुखौटा अब टूट रहा था। पर पछतावा नहीं, अपमान की आग उनके चेहरे पर थी।

“हाँ, किया मैंने,” वह अचानक चीखीं। “क्योंकि यह लड़की इस घर में आई और मेरा बेटा मुझसे छिन गया। पहले अरविंद हर बात माँ से पूछता था। फिर इसे घर चाहिए, इसे रसोई चाहिए, इसे बच्चा चाहिए, इसे इज्जत चाहिए। मेरा बेटा विदेश में जलता रहा और रानी साहिबा यहाँ सहानुभूति खाती रहीं।”

अरविंद ने अविश्वास से उन्हें देखा।

“आपने मेरे बेटे को भूखा रखा क्योंकि आपको मेरी पत्नी से जलन थी?”

“मैंने उसे उसकी औकात बताई,” शारदा देवी बोलीं।

यह वाक्य आँगन में पत्थर की तरह गिरा।

आरव मीरा के पीछे छिप गया। उसके छोटे हाथ उसकी माँ के कुर्ते को पकड़े हुए थे।

“मम्मा, आज भी हम बाहर सोएँगे?” उसने डरते हुए पूछा।

अरविंद का दिल फट गया। वह बेटे के सामने घुटनों पर बैठा और उसका चेहरा अपनी हथेलियों में लिया।

“नहीं बेटा। आज नहीं। कभी नहीं। यह तुम्हारा घर है। तुम्हें भूख लगे तो तुम रसोई में जाओगे। तुम्हें ठंड लगे तो कंबल लोगे। तुम्हें रोना हो तो मेरे कंधे पर रोओगे। किसी से इजाज़त नहीं माँगोगे।”

आरव रो पड़ा। अरविंद ने उसे सीने से लगा लिया। 5 साल की दूरी, झूठ और भूख उस रोने में पिघलने लगी, पर पूरी तरह नहीं। कुछ चोटें आँसुओं से साफ नहीं होतीं, बस पहली बार दिखाई देती हैं।

अरविंद उठा और शारदा देवी की ओर मुड़ा।

“आपके पास 10 मिनट हैं। यह घर छोड़ दीजिए।”

शारदा देवी हँसीं, लेकिन आवाज़ काँप गई।

“तू अपनी माँ को निकाल देगा? समाज क्या कहेगा?”

“समाज ने आज सब देख लिया,” अरविंद ने कहा। “और अगर समाज को जवाब चाहिए, तो मैं दूँगा—जिस माँ ने मेरे बच्चे की थाली छीनी, वह मेरे घर में एक पल नहीं रहेगी।”

कविता हाथ जोड़कर आगे आई।

“भैया, गलती हो गई। हम परिवार हैं।”

अरविंद ने उसकी ओर देखा। उस नज़र में गुस्से से ज्यादा शोक था।

“परिवार पिता के खत नहीं छिपाता। परिवार बच्चे को यह विश्वास नहीं दिलाता कि उसका पिता उसे भूल गया। परिवार बहू को नौकरानी से भी बदतर हालत में नहीं रखता।”

रमेश जी ने पुलिस को फोन किया। कुछ रिश्तेदार धीरे-धीरे खिसकने लगे। कुछ औरतें मीरा के पास आईं, पर उनके पास माफी के शब्द भी कमजोर थे। उन्हें याद आया कि उन्होंने कई बार मीरा को रसोई के बाहर खड़ा देखा था, कई बार आरव को दूसरों की प्लेटों को देखते देखा था, पर सोचा—घर की बात है, क्यों बोलें।

आज वही चुप्पी उनकी आँखों में शर्म बनकर लौट आई।

पुलिस आई तो शारदा देवी ने आखिरी कोशिश की। उन्होंने कहा, “घर का मामला है। बहू मानसिक रूप से कमजोर है। बेटा विदेश से थका आया है। हिसाब-किताब में गड़बड़ हो जाती है।”

मगर लाल डायरी थी। बैंक फाइल थी। खत थे। गवाह थे। और सबसे बड़ा गवाह आरव था, जो गर्म दाल-चावल की प्लेट लेकर सोफे पर बैठा था और हर निवाले से पहले पिता को देख रहा था, जैसे पूछ रहा हो—सचमुच खा सकता हूँ?

उस रात शारदा देवी और कविता को घर से जाना पड़ा। मामला पुलिस और वकीलों तक पहुँचा। गहनों, कार और फॉर्महाउस की बिक्री से कुछ पैसा वापस आया, पर अरविंद जल्दी समझ गया कि रकम लौट सकती है, बचपन नहीं।

हवेली अगले दिन अजीब तरह से शांत थी। रोशनी वही थी, दीवारें वही थीं, फर्श वही था, पर घर की हवा बदल गई थी। शराब और इत्र की भारी गंध की जगह चाय, हल्दी, साबुन और ताज़े पराठों की खुशबू आने लगी।

मीरा तुरंत ठीक नहीं हुई। वह दरवाज़ा तेज़ बंद होने पर चौंक जाती। बची हुई रोटी कपड़े में बाँधकर छिपा देती। नए कपड़े पहनते हुए डरती कि कोई छीन न ले। कई रातों तक वह सोते-सोते उठकर आरव की साँस जाँचती रही, जैसे भूख सपने में लौट आएगी।

अरविंद ने पहली बार जाना कि लौट आना काफी नहीं होता। जिसे 5 साल तक अकेले डरना पड़ा हो, उसके पास बैठना पड़ता है, बार-बार, बिना जल्दी किए। उसने कतर का अगला अनुबंध ठुकरा दिया। जयपुर में ही एक सौर ऊर्जा कंपनी में कम वेतन की नौकरी ले ली। पैसे कम हुए, पर शामें घर लौट आईं।

आरव को स्कूल ले जाते समय वह उसका हाथ कसकर पकड़ता। पहले दिन आरव ने पूछा, “पापा, आप फिर बहुत दूर तो नहीं जाओगे?”

अरविंद ने गाड़ी रोक दी। बच्चे की तरफ मुड़कर बोला, “नहीं। अब काम दूर नहीं जाएगा, घर पास रहेगा।”

धीरे-धीरे घर में चीज़ें अपनी जगह पर आने लगीं। फ्रिज पर आरव की ड्रॉइंग लगी। मीरा ने तुलसी के पास गेंदे के फूल लगाए। रसोई की खिड़की पर धनिया, पुदीना और हरी मिर्च के छोटे गमले रखे। बरामदे में वही जगह, जहाँ कभी वह ठंडा खाना खाती थी, अब शाम की चाय की जगह बन गई।

एक दिन मीरा ने शारदा देवी के कमरे की अलमारी खाली करते हुए एक लोहे का डिब्बा पाया। उसके अंदर अरविंद के पुराने खत, आरव के जन्मदिन के कार्ड, छोटी तस्वीरें और कुछ पैकेट रखे थे। एक पैकेट पर लिखा था—“आरव के 4वें जन्मदिन के लिए, पापा की तरफ से, जो हर रात तुम्हें याद करते हैं।”

आरव ने पैकेट खोला। अंदर लकड़ी की छोटी ट्रेन थी। रंग थोड़ा फीका पड़ चुका था, पर पहिए ठीक थे।

“पापा, आपने सच में भेजी थी?” उसने पूछा।

अरविंद का गला भर आया।

“हाँ बेटा। मैंने बहुत कुछ भेजा था। खत भी, खिलौने भी, प्यार भी। बस तुम तक पहुँचने नहीं दिया गया।”

आरव ट्रेन को सीने से लगाकर बहुत देर चुप रहा। फिर बोला, “तो आप मुझे भूले नहीं थे?”

अरविंद ने उसे बाँहों में भर लिया।

“एक दिन भी नहीं।”

उस रात आरव ने एक चित्र बनाया। घर के सामने 3 लोग खड़े थे—पापा, मम्मा और वह। बगल में एक मेज थी, जिस पर 3 प्लेटें, 3 गिलास और बीच में बड़ा सा केक था। उसने पीछे दरवाज़ा खुला बनाया। नीचे लिखा—“हमारा घर।”

मीरा ने वह चित्र फ्रिज पर लगाया और बहुत देर तक उसे देखती रही।

कानूनी लड़ाई लंबी चली। शारदा देवी ने रिश्तेदारों में रो-रोकर अपनी कहानी सुनाई, पर अब हर कहानी के सामने कागज थे। कविता ने पहले माँ का साथ दिया, फिर जब पैसों का मामला भारी हुआ तो वही गवाही देने को तैयार हो गई। रिश्तों की असली कीमत अदालत की फाइलों में उतर आई।

अरविंद ने सीखा कि खून का रिश्ता हमेशा घर नहीं बनाता। कभी-कभी घर वह बनाते हैं जिन्हें एक-दूसरे को बचाना पड़ता है।

कई महीने बाद दिवाली आई। पहले इसी हवेली में शारदा देवी दिखावे की पूजा, महंगे तोहफे और बड़े मेहमान बुलाती थीं। इस बार घर में केवल 3 लोग थे। मीरा ने छोटी सी रंगोली बनाई। आरव ने दीये जलाए। अरविंद ने रसोई में खड़े होकर खीर हिलाई, जो थोड़ी ज्यादा गाढ़ी हो गई थी।

आरव ने हँसते हुए कहा, “पापा, आपसे खीर नहीं बनेगी।”

मीरा बहुत दिनों बाद खुलकर हँसी। अरविंद ने उस हँसी को ऐसे सुना जैसे किसी बंद कमरे की खिड़की खुली हो।

पूजा के बाद वे तीनों आँगन में बैठे। वही आँगन। वही फर्श। पर इस बार आरव के सामने गरम पूरी, आलू की सब्ज़ी, खीर और लड्डू थे। वह खाते-खाते अचानक रुका।

“मम्मा, मैं एक और लड्डू ले सकता हूँ?”

मीरा की आँखें भर आईं। उसने थाली उसकी तरफ खिसका दी।

“यह घर तुम्हारा है बेटा। पूछना नहीं, लेना।”

अरविंद ने देखा, आरव ने लड्डू उठाया, फिर आधा तोड़कर माँ को दिया और आधा पिता को। जैसे बच्चा अपने हिस्से का भरोसा बाँटना चाहता हो।

रात को सोने से पहले आरव ने लकड़ी की ट्रेन तकिए के पास रखी। अरविंद कमरे से निकलने ही वाला था कि उसने पुकारा, “पापा?”

“हाँ बेटा?”

“कल सुबह आप यहीं होंगे?”

अरविंद दरवाज़े पर रुक गया। उसके भीतर कुछ फिर टूटकर जुड़ गया।

“हाँ। कल भी, परसों भी, और उसके बाद भी।”

आरव ने आँखें बंद कर लीं। इस बार उसके चेहरे पर डर नहीं था।

गलियारे में मीरा खड़ी थी। उसने अरविंद का हाथ पकड़ा। दोनों बिना बोले बच्चे की शांत साँसें सुनते रहे।

कुछ देर बाद मीरा लाल डायरी लेकर आई। वही डायरी, जिसमें भूख, अपमान, चोट और चोरी की तारीखें दर्ज थीं।

“मैं इसे अब तकिए के नीचे नहीं रखना चाहती,” उसने कहा।

“फेंक दें?” अरविंद ने पूछा।

मीरा ने सिर हिलाया।

“नहीं। यह गवाही है कि हम बचे। इसे छिपाकर नहीं, सँभालकर रखेंगे।”

उन्होंने डायरी को अरविंद के खतों, आरव के चित्रों और कुछ नई तस्वीरों के साथ एक लकड़ी के बक्से में रख दिया। बक्सा बंद हुआ तो लगा जैसे दर्द खत्म नहीं हुआ, पर अब वह घर का मालिक नहीं रहा।

उस रात हवेली वैसी चमकदार नहीं थी जैसी दावतों में दिखती थी। दीवार पर हल्के निशान थे। बरामदे में पुराने सूटकेस पड़े थे। मेज पर वकील की फीस की फाइल थी। रसोई में खीर का बर्तन अभी भी धुलना बाकी था।

पर 5 साल बाद पहली बार उस घर में कोई भूखा नहीं सोया।

और आरव के बिस्तर के ऊपर अरविंद ने कतर से भेजा पहला खत फ्रेम करवाकर टाँग दिया। वही खत जिसे शारदा देवी ने छिपा दिया था। उसके शब्द टेढ़े-मेढ़े, साधारण और अधूरे थे, मगर अब वे पूरे घर की नींव बन गए थे—

“मेरे छोटे आरव, पापा दूर हैं, लेकिन उनका दिल हर रात तुम्हारे सिरहाने सोता है।”

Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.